रविवार, 16 दिसंबर 2012

हीरालाल प्रजापति के मुक्तक

मुक्तक प्रसून

DSCN1468 (Mobile)

      - डॉ. हीरालाल प्रजापति

[1] नर्म डंठल की जगह सख्त तना हो जाना ॥
बिखरे बिखरे से चाहता था घना हो जाना ॥
कोशिशों में तो कसर कुछ न उठा रक्खी थी ,
पर था किस्मत में हर इक हाँ का मना हो जाना ॥

[2] चूहे सब शेर-ए-बब्बर की बात करते हैं ॥
जितने हारे हैं सिकंदर की बात करते हैं ॥
रब ने जब दी है ज़बाँ तब ही तो कमाल है ये ,
अंधे रंगीनी-ए-मंजर की बात करते हैं ॥

[3] बेशुमार और बेहिसाब यों सितम झेले ॥
अब किसी ग़म का ग़म नहीं कि कितने ग़म झेले ॥
दूसरों को जो देखता हूँ सिसकते रोते ,
सोचता हूँ कि मैंने उनसे बहुत कम झेले ॥

[4] चटाई नर्म गद्दा तौलिया चद्दर समझते हैं ॥
जो नींद आ जाये पत्थर को पलंग बिस्तर समझते हैं ॥
खुशी में बोलते हैं बेहिचक बगुले को भी हम हंस ,
रहें बरहम तो रेशम को भी फिर खद्दर समझते हैं ॥

[5] कहाँ को गया मुझसे मुंह मोड़कर वो ॥
कि कसके मेरा हाथ गह छोडकर वो ॥
निभाते निभाते जो लीं थीं अचानक ,
कथित हर प्रतिज्ञा शपथ तोड़कर वो ॥

[6] पानी तलब करो मैं ला दूँ अर्क-ए-गुलाब ॥
गर तुम कहो तो इक सफ़्हा क्या लिख दूँ मैं किताब ॥
हसरत है तुम जो मांगो उससे बढ़के तुमको दूँ ,
बदले में अपनी सच्ची मोहब्बत दो बेहिसाब ॥

[7] चाहता हूँ कि मेरे दिल में तेरी मूरत हो ॥
तू किया करती मेरी रात दिन इबादत हो ॥
लैला मजनूँ से हीर राँझे टोला मारू से ,
अपनी दुनिया-ए-इश्क़ में ज़ियादा शोहरत हो ॥

[8] आँखें बारिश न बनें क्यों ये मरुस्थल होएँ ॥
जब मशीन हम नहीं तो दर्द में क्यों न रोएँ ।
जब कसक उठती है होती है घुटन सीने में ,
क्यों न अपनों से कहें गम अकेले चुप ढोएँ ॥

[9] धीरे-धीरे हो रहा है ज्ञात मुझको ॥
हर घड़ी रखता है यों वो साथ मुझको ॥
जाने क्यों लेकिन कहीं दिल कह रहा है ,
दोस्त है पर दे न जाए घात मुझको ॥

[10] सारी दुनिया में अमन चैन कैसे कायम हो ॥
घर किसी के न कभी भूले कोई मातम हो ॥
सोचता हूँ कि क्या उपाय करूँ मैं जिससे ,
सारे चेहरे खिलें औ' बाग-बाग आलम हो ॥

[11] हो कितनी खूबसूरत जस परी या अप्सरा ॥
न पा पाती है बीवी का तवायफ ओहदा ॥
ज़माना इनके मानी में कुछ इतना फर्क करता ,
कि इक मस्जिद हो जैसे दूसरी हो मैकदा ॥

[12] मुफ़लिसी मेरी मिटी मेरी गरीबी कम हुई ॥
सच कहूँ तो जब से मेरी बदनसीबी कम हुई ॥
दोस्त रिश्तेदार मुझसे पेश यों आने लगे ,
मुझको लगता है मेरी उनसे करीबी कम हुई ॥

[13] अपनी पूरी हरेक चुन के रज़ा करते हैं ॥
किए हैं काम कुछ ऐसे कि मज़ा करते हैं ॥
सख़्त बचते हैं बुराई से बुरे लोगों से ,
जो भी करते हैं बहुत ठोंक-बजा करते हैं ॥

[14] किससे बुझाऊँ आग कि पानी ही जल रहा ॥
करता है जो इलाज वो बीमार चल रहा ॥
गैरों पे एतबार का उठता कहाँ सवाल ,
अपनों को जबकि अपना ही हँस हँस के छल रहा ॥

[15] किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप मत करिए ॥
झकाझक साफ़ चेहरों पर यूं श्यामल लेप मत करिए ॥
वो प्रेमी-प्रेमिका हैं हक़ है उनका गुप्त बातों का ,
कभी छिपकर के टेलीफ़ोन उनका टेप मत करिए ॥

[16] इक बार बसर उसके साथ रात हमने की ॥
सब रात जाग जाग फकत बात हमने की ॥
काबू में दिल को कैसे रखा कुछ न पूछिए ,
बस दूर दूर रह के मुलाक़ात हमने की ॥

[17] ज्यों नदी कोई समुंदर से जा के मिलती है ॥
खलवतों में वो मुझसे ऐसे आ के मिलती है ॥
और दुनिया के आगे एक अजनबी की तरह ,
दूर से ही नज़र झुका-झुका के मिलती है ॥

[18] सर्दियों में ज्यों सुलगती लकड़ियाँ अच्छी लगें ॥
जैसे हँसती खिलखिलाती लड़कियां अच्छी लगें ॥
मुझको मौसम कोई हो जलता जमाता भीगता ,
बंद कमरे की खुली यों खिड़कियाँ अच्छी लगें ॥

[ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------