शनिवार, 15 दिसंबर 2012

देवी नागरानी का संस्मरण - शहादत

शहादत (sansmaran)

कौन कहता है सिर्फ जंगे-मैदाँ की सरहदों पर वतन की हिफाज़त में जान देने वाले शहीद होते हैं. क्या उनकी माएँ, बहनें व् पत्नियां जो घर बैठे आँखों के सूनेपन में भी आशाओं के झिलमिलाते दीप जलाकर उनके लिए दुआएं मांगती हैं, हर रात के अंधियारे में मरती है, हर सुबह के उजाले में साँस लेती है, वीरों से कम हैं? क्या वे वीरांगनाएं जिनका देश के वीरों के साथ चोली दामन का साथ है , उन वीरों से कुछ कम है? नतमस्तक हो जाता है हर सोच का मस्तक जब उनके मुखारबिंद से सुनती हूँ उनके जिए हुए पलों की दास्तान जिसमें ख़ुशी ग़म की मिली -जुली भावनाएं धड़कती है. ऐसी ही एक वीरांगना से मैं मिली हूँ -वह है हमारी स्नेहिल भाव रखने वाली श्रीमती शशि पाधा, जो अपने पति केशव पाधा जी के सफ़र की हमसफ़र रही है.

उनकी ज़ुबानी कही गयी गाथाएं सुनकर मन की गहराइयां सन्नाटों में धंस जाती हैं, धड़कनें रोमांचित हो जातीं है, अभिभूत हो जाती है कल्पनाएँ, और जीवन के सच का साक्षात्कार होता है!!

ज़िन्दगी एक आह होती है

मौत जिसकी पनाह होती है!

हमने इन खुली आँखों से मर कर न मरने वाले शहीदों को सलीबों पे चढ़ते देखा है, अभी २००८ दिवाली के पर्व के आस- पास आतंक की उस चुभती हुई रोशनी से आँखों से रोशनी छीन ली. हाहाकार मचा, गर्द उड़ी, नारे लगाये गए, पर फिर क्या हुआ?  कुछ भी नहीं! जो नौजवान "ताज"  की मर्यादा और उसकी घायल अवस्था को बचाने में जुट गए, सीने पर गोलियां झेलते रहे, साँसों की पूंजी लुटाते रहे, अपनी जान खो बैठे, जिन्होंने पर एक बार भी पीछे मुड़कर अपना स्वार्थ नहीं देखा, उनकी शहादत का हम कहाँ क़र्ज़ चुका पाते हैं? भारत माँ को दिया गया वचन तन-मन से, निष्ठा के साथ, अपने लहू से ममता का क़र्ज़ चुकाया।

शहादत की राह और मंज़िल एक होती है और उसपर चलने वाला हर नौजवान भारत माँ का बेटा होता है, न वो हिन्दू होता है न, मुसलमान। जात-पात, रंग-रूप, प्रांतीय सहरदों को रौंदते हुए ये नौजवान हदों की सरहदों पर सीना ताने आगे, और आगे बढ़ते हुए पाते है, उनके कदमों के तले बिछी ज़मीन उनके माथे को सजना चाहती है, उनके माथे पर लहू का टीका सजा कर अपने सौभाग्य को चमकना चाहती है।

सरहदों पर जब ऐसे नौजवान जागते हैं तब जाकर आम जनता सो पाती है, जब ये जां-बाज़ सीने पे गोलियां झेलते है, तब कहीं जाकर घर के ठंडे चूल्हे फिर से पेट की आग बुझा पाते हैं, क्या ऐसे वीरों का हर साल यादों में दीप जलाकर उनके ऋण से मुक्त हो पाएंगे? क्या श्रद्धांजली के नाम पर फूल मालाएँ या नारे लगाए जाने से उनकी आत्मा को शांति मिलेगी? नहीं? कतई नहीं? उनके नक्शे-पा की पाक मिट्टी पावों की धूल नहीं, माथे का चन्दन है, जिसकी महक हम अपनी साँसों में महसूस कर सकते हैं। आंसुओं के पुष्प चढ़ाकर भी हमारा फर्ज़ भी कहाँ पूरा होता है?

ये भाई-भाई के नारे बंद हो जाएँ और अपने जात, प्रांत, भाषा हर वर्ग की सीमाओं को मिटाकर जब ये भाई हमकदम होकर साथ-साथ चलने लगेंगे, तब ही शायद यादों के दिये और जियादा रौशन होंगे, यही उनको एक पाक समर्पित श्रद्धांजली होगी!

 

clip_image002 देवी नागरानी

९-D कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५० . dnangrani@gmail.com

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