सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मंजरी शुक्ल की रम्य रचना - दर्प

दूर बर्फ के पेड़ों पर ढकी हुई बर्फ यूँ लग रही थी मानों आसमान से कहीं से महीन पतली चाँदी की चमकती हुई चादर बिछा दी हो और जिस पर चाँद की किरणें एक दूजे को ढूँढ़ते हुए चारों ओर चांदनी की खूबसूरती की शोभा में चार चाँद लगा रही हो I रात के सन्नाटे में डूबी हुई चुप्पी में सारा शहर जब नींद के आगोश में सोया हुआ था तो एक बूढ़ा अपनी झुकी हुई कमर के साथ अपनी एकमात्र पुरानी लाठी के सहारे धीमे धीमे आगे बढ़ रहा था I शरीर के मैले हो चुके कपड़ों को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि ना जाने कितने दिनों से ना तो उसने नहाया था और ना ही कपड़े बदले थे I फटे हुए पैरों से हल्का सा खून भी रिस रहा था और बिना चप्पल के चलते हुए बार बार उसे जब कोई ठोकर लग जाती थी और उसके पैरों मैं कोई कंकड़ या काँटा चुभ जाता था जिसे वो बड़े ही इत्मीनान से चेहरे पर बिना कोई दर्द या उपेक्षा का भाव लाये निकाल देता था I

रात सोच रही थी,  यह मुझे क्यों तंग कर रहा है चुपचाप अपने घर में सोता क्यों नहीं I चाँद सितारों से पूछ रहा था कि मुसाफिर को कहाँ तक जाना था ताकि वो थोड़ा सा ओर तेज चमके जिससे उसे आगे बढ़ने में परेशानी न हो पर किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था सब निःशब्द और स्तब्ध थे I पर बूढ़ा था जो बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने आगे बढ़ा ही जा रहा था I अचानक पता नहीं क्या हुआ कि वो सड़क के किनारे पड़े एक बड़े पत्थर पर बैठ गया जिसके आस पास हल्की बारिश के कारण छोटी छोटी घास उग आई थी I उसके खुरदुरे और सूजे हुए पैरों को नर्म मुलायम घास का स्पर्श बहुत भला लगा और उसने आसमान की तरफ अपने हाथ फैलाकर ईश्वर की तरफ कृतज्ञ भाव से देखते हुए कहा -" परमात्मा तेरा लाख लाख शुक्र है कि तूने मुझे ये जगह थोड़ी देर के लिए सुस्ताने को दी जिससे मुझे ये असीम सुख मिला वरना पता नहीं मैं अपनी मर्जी से कहाँ जाकर बैठता I

घास मुस्कुराकर इतरा उठी और उसने गर्व से उन गगनचुम्बी पेड़ों की ओर देखा जो हमेशा उसका मजाक उड़ाया करते थे और वो हमेशा नज़रे नीचे करके वापस उसी बड़े से पत्थर के पीछे छुपने की नाकाम कोशिश करती थी I पर आज इस ख़ामोशी में जैसे उसके जीवन को फिर से झूमने का नया आयाम मिल गया था और बार बार वो अपनी ख़ुशी जताने के लिए बूढ़े के पैरो के पास भरसक प्रयत्न करती हुई उन्हें चूमने को बेताब हो रही थी I

पेड़ों ने जैसे एक प्रकार का निर्विकार भाव ओढ़ लिया था जिसमें उनको जैसे घास की उफ़नती ख़ुशी से कोई लेना देना नहीं था पर मन ही मन उनके साथ घास भी जानती थी कि ईश्वर की रची हुई कोई भी रचना कभी व्यर्थ नहीं होती , चाहे उसकी एहमियत कोई देर सबेर ही समझे तभी बूढ़ा उठा और फिर अपनी झुकी हुई कमर को सीधे करने की कोशिश करते अपनी लाठी मजबूती से पकड़ कर चल दिया I

घास ने खुद को धन्य माना कि अब पेड़ उससे ऐंठ कर बात नहीं करते थे I  पेड़ों ने मन ही मन बूढ़े का धन्यवाद दिया कि वो उनको अहंकार की गहरी अँधेरी सुरंग से बाहर खींच लाया था I चाँद और सितारे सोच रहे थे ..आखिर उनके जाने की भी बेला हो गई और बूढ़ा निर्विकार भाव से चला जा रहा है I.आज उनका दर्प चूर चूर होकर चांदनी कि शक्ल में चारों ओर बिखर गया था I सितारों ने चाँद की ओर शर्मिंदगी से देखा और चाँद धीमे स्वर में बोला -'आज के बाद अब हम कभी नहीं कहेंगे कि रात भर केवल हम ही बिना थके चलते हैं....."......

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