सोमवार, 31 दिसंबर 2012

गोवर्धन यादव की कहानी - नए वर्ष से एक मुलाकात

अंतिम सप्ताह दिसंबर का चल रहा है। चार दिन की केजुअल बाकी है। यदि जेब में मनीराम होते तो मजा आ जाता। दोस्तों की ओर से भी तरह-तरह के प्रस्ताव मिल रहे थे। परंतु सभी को कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता हूं, बिना पैसों के किया भी क्या जा सकता था। अतः आफिस से चिपके रहकर समय पास करना ही श्रेयस्कर लगा।

31 दिसम्बर का दिन, पहाड़ जैसा कट तो गया पर शाम एवं रात्रि कैसे कटेगी यह सोचकर दिल घबराने-सा लगा। उड़ने को घायल पंछी जैसी मेरी हालत हो रही थी। अनमना जानकर पत्नी ने कुछ पूछने की हिम्मत की, पर ठीक नहीं लग रहा है, कहकर मैं उसे टाल गया।

खाना खाने बैठा तो खाया नहीं गया। थाली सरका कर हाथ धोया। मुंह में सुपारी का कतरा डाला। थोड़ा घूम कर आता हूं, कहकर घर के बाहर निकल गया।

ठंड अपने शबाब पर थी। दोनों हाथ पतलून की जेब में कुनकुना कर रहे थे। तभी उंगलियों के पोर से कुछ सिक्के टकराए। अंदर ही अंदर उन्हें गिनने का प्रयास करता हूं एक सिक्का और दो चवन्नियां भर जेब में पड़ी थीं। सोचा एक पान और एक सिगरेट का सेजा जम जायेगा। पान के ठेले पर चिर-परिचितों को पाकर आगे बढ़ जाता हूं। दूसरे पान के ठेले पर भी यही नजारा था। एक के बाद एक पान के ठेलों को पीछे छोड़ता हुआ काफी दूर चला आया था।

उद्विग्न मन लिये, मैं सड़क के किनारे-किनारे चला जा रहा था। तभी मैंने महसूस किया कि कोई व्हीकल मेरे पीछे आ रही है। तनिक पलट कर देखा। एक चमचमाती जेन ठीक मेरे पीछे रेंग रही थी। मैं और थोड़ा हटकर चलने लगता हूं कि वह आगे निकल जाए, पर अब वह मुझसे सटकर चलने लगी।

सहसा गाड़ी में से एक हाथ निकलता है और मेरी कलाई को मजबूती से थाम लेता है। इस अप्रत्याशित घटना से मैं हड़बड़ा जाता हूं। मेरी पेशानी पर पसीना चू उठता है। मैं कुछ समझूं इससे पूर्व ही वह दरवाजा खोलकर मेरे सामने खड़ा हो गया। उसका इस तरह ऐंठकर खड़ा हो जाना मुझे ड्रेकुला की तरह लगा। मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह से कांप उठा। उसने बड़ी बेतकल्लुफी से मेरे कंधे पर अपने भारी भरकम हाथ की धौंस जमाते हुए कहा, ‘क्यों... क्या हालचाल हैं।’ उसकी कड़कदार आवाज सुनकर मेरी तो जैसे घिग्गी ही बंध गई थी। कुछ कहना चाह भी रहा था, परंतु जीभ जैसे तालू से चिपक गई थी और शब्द आकर गले में फंस गए थे। मेरी आंखें बराबर देख रही थीं। वह मंद-मंद मुस्करा रहा था। उसकी यह मुस्कान मुझे बड़ी वीभत्स सी लग रही थी।

प्रत्युत्तर न पाकर, उसने फिर वही प्रश्न दागा। कड़ाके की ठंड में मैं पसीना-पसीना हुआ जा रहा था। आंखें पथरा-सी गई थीं और सोचने- समझने की शक्ति एकदम गायब हो गई थी। मैं बुत बना उसके सामने खड़ा था।

‘अरे यार, तेरा तो नर्वस ब्रेक डाउन हो गया लगता है, मैं कोई भूत-वूत नहीं बल्कि तेरे बचपन का दोस्त हूं। बरसों-बरस बाद तू मुझे दिखाई दिया सो सोचा कि कुछ सरप्राईज दूंगा, गौर से मेरी तरफ देख तो सही।’

उसके शब्दों में अब आत्मीयता की खुश्बू आ रही थी, जिसने संजीवनी का काम किया। मैं अब होश में आने लगा था, बल्कि अब नॉर्मल हो गया था। मैंने उसके चेहरे को पहचानने की कोशिश की पर असफलता ही हाथ लगी। पहचान लायक कोई भी अवशेष उसके चेहरे पर नजर नहीं आ रहे थे। एक हारे हुए जुआरी की तरह मेरी हालत हो गई थी।

‘वेरी सॉरी यार, मैं तुझे सचमुच नहीं पहचान पाया।’ मैंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी असमर्थता उस पर प्रकट कर दी।

‘हां यार मुझे बड़ी हैरानी हो रही है कि तू मुझे पहचान नहीं पाया। सुन, तेरे बारे में मैं सब कुछ बताता हूं। तेरा नाम गोवर्धन यादव है न? तू मुकनाई का रहने वाला है न? तुम डाक विभाग में कार्य करते हो न? तुमने छिन्दवाड़ा में अपना मकान बना लिया है न?’ उसने और भी ढेरों बातें मेरे बारे में बतलाईं।

उसने सचमुच ही मेरा सारा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया था। निश्चित ही वह मेरा पूर्व परिचित रहा होगा। तभी तो उसने इतनी सारी बातें मेरे बारे में बतलाईं। इतना सब कुछ घटित होने के बाद भी मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था। मेरी नजरें झुक आईं और निराशा का भाव मेरे चेहरे पर उतर आया था। उसने मुझे भरपूर नजरों से घूरा और जोरदार ठहाका लगाया। और मुझ से कहने लगा, ‘अरे यार, इसमें इतना परेशान होने कि क्या बात है। अब तुम पूरे समय मेरे साथ रहोगे। तुम खुद-ब-खुद मुझे जान जाओगे। फिर भी यदि नहीं पहचान पाओगे तो मैं तुम्हें खुद ही अपने बारे में बता दूंगा। चल आ बैठ।’ उसने शालीनता से कार का दरवाजा खोला। मैं यंत्रवत् गाड़ी में जा धंसा। गाड़ी का स्टेयरिंग सम्हालते हुए अपने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं एक सिगरेट ले लेता हूं। उसने भी एक सिगरेट अपने ओठों से दबाते हुए लाईटर जलाया। लाईटर के जलते ही एक जल-तरंग की आवाज थिरकने लगती है। सिगरेट जलाते हुए मैंने एक लंबा कश खींचा। तब तक वह गाड़ी स्टार्ट कर चुका था।

गाड़ी अब एक आलशीन बगीचे में से होते हुए गुजर रही थी। जगह-जगह फव्वारे रंग-बिरंगी रोशनी में थिरक रहे थे। बगीचे में लाईटिंग भी बड़े करीने से की गई थी। तभी कार एक आलीशान महल के सामने जाकर रुकती है। वह हार्न बजाता है। एक सूटेड-बूटेड वाचमैन आकर कार का दरवाजा खोलता है। वह कार के बाहर आ जाता है। उसके बाहर आते ही वाचमैन ने जोरदार सैल्यूट मारा। अब वह आगे बढ़ने लगता है। वाचमैन ने आगे बढ़कर कांच का आदमकद दरवाजा खोला। अब वह अन्दर प्रवेश करने लगता है। मैं यंत्रवत् उसके पीछे हो लेता हूं।

अंदर पहुंचते ही मुझे ऐसा लगा कि मैं जन्नत में आ गया हूं, जगह-जगह कलात्मक पेंटिंग्स लगी हुई थीं। झाड़-फानूसों से रोशनी बिखर रही थी। दीवारों से सटकर आदमकद अप्सराओं की नग्न-अर्धनग्न मूर्तियां मादकता बिखेर रही थी पूरे फर्श पर बेशकीमती कालीन बिछा हुआ था। हॉल में हल्की गुलाबी-सी रोशनी छाई थी। हर एक टेबल पर प्रेमी-प्रेमिकाएं अस्त-व्यस्त मुद्राओं में बैठे चियर्स कर रहे थे। हल्की धीमी आवाज में कोई इंगलिश-टयूनिंग माहौल में उत्तेजना भर रही थी। कई जोड़े डांसिंग फ्लोर पर एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरक रहे थे। एक जवान बाला थिरकती जाती थी और खाली होते पैमानों को भरती जा रही थी।

अब वह इठलाती, बलखाती मेरी ओर बढ़ी चली आ रही थी। आगे बढ़कर उसने गिलास मेरे ओठों से लगा दिया। उसके अपने चेहरे पर चिपकी मुस्कुराहट, अस्त-व्यस्त कपड़ों से झांकते गदराए यौवन ने मेरे अंदर एक सनसनी सी पैदा कर दी। मैंने उसके नाजुक हाथों से गिलास ले लिया और एक ही सांस में पूरा उतार लिया। वह एक के बाद एक गिलास मेरी ओर बढ़ाती चली गई। मुझे बिल्कुल ही नहीं मालूम कि मैं कितने गिलास चढ़ा चुका होऊंगा। अब उसने मेरा हाथ थाम लिया और अब वह डांसिंग फ्लोर की ओर बढ़ने लग जाती है। डांसिंग फ्लोर पर मैं न जाने कब तक डांस करता रहा। मुझे याद नहीं और न ही वह कथित मित्र मुझे याद आया।

सहसा माईक पर एक स्वर उभरता है। ‘लेडीज़ एण्ड जेन्टलमैन,’ थिरकते हुए जोड़े थम जाते हैं। प्रायः सभी की निगाहें डायस की ओर मुड़ जाती हैं। वह कोई और नहीं मेरा अपना कथित मित्र था। फ्लैश लाइट में वह हीरे का सा जगमगा रहा था। उसने मौन भंग करते हुए मेरा नाम लेकर पुकारा और कहा कि मैं डायस पर पहुंच जाऊं। बहके हुए कदमों से मैं वहां पहुंच जाता हूं।

बड़े मनोहारिक तरीके से उसने मेरा परिचय दिया। कहा, ‘दोस्तों... आप इन्हें नहीं जानते। ये एक अच्छे गीतकार हैं, तथा गायक भी हैं। इनके अंदर एक से बढ़कर एक अनमोल खजाने छुपे हुए हैं और जब ये गाते हैं तो लगता है कि कोई झरना आकाश से उतर रहा हो और मीठी स्वर लहरी बिखेर रहा हो पर... ?’ अचानक उसकी सूई ‘पर’ पर अटक जाती है। लोग अपनी सांसों को रोककर आगे कुछ सुनना चाह रहे हैं। पर वह एक लंबी चुप्पी साध लेता है। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने कहा, ‘हां तो दोस्तों मैं तो इनके बारे में एक चीज बतलाना तो भूल ही गया। जानते हैं, इनकी जेब में अब भी एक सिक्का और दो चवन्नियां पड़ी हैं। वर्ष के अंतिम दिन, ये बेचारे जश्न नहीं मना पा रहे थे। रास्ते में इनसे अनायास ही मुलाकात हो गई और मैं इन्हें यहां उठा लाया। शायद मैंने ठीक किया वरना आज महफिल बिना गीत-संगीत के सूनी-सूनी सी लगती।’

उसके उद्बोधन को सुनकर मेरा सारा नशा जाता रहा। मुझे ऐसा लगा जैसे स्वर्ग से उठा कर धरती पर फेंक दिया गया होऊं। अपने आप को संयत करते हुए मैंने माईक सम्हाला और कहा, ‘मित्रों, मैं अभी तक इस व्यक्ति को नहीं जान पाया जो मुझे उठाकर यहां लाया। इन्होंने अपनी ओर से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। और मैंने इन्हें एक विश्वास के साथ गले लगाया था। यह घटना ज्यादा पुरानी नहीं है अपितु चंद घंटों पहले की है। इन्होंने दोस्ती को ऐसे झटक दिया जैसे धूल पड़ने पर आदमी अपने कपड़े झाड़ने लगता है। अब मैं इन्हें दोस्त कहूं या दुश्मन। खैर जो भी हो, इन्होंने एक विश्वास तोड़ा है, एक दिल तोड़ा है और जब दिल टूटता है तो एक दर्द भरा गीत मुखरित होता है-

तुम कहते हो गीत सुनाओ ‘तो’ कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

मेरे हिरदा पीर जगी है कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

आशाओं की पी पी कर खाली प्याली, मैं बूंद-बूंद को तरसा हूं,

उम्मीदों का सेहरा बांधे, मैं द्वार-द्वार भटका हूं ,

तुम कहते हो राह बताऊँ तो कैसे राह दिखाऊं रे।

मन एक व्यथा जागी है। कैसे हमराही बन जाऊं रे।

रंग-रंगों में रंगी नियति नटी क्या-क्या दृश्य दिखाती है,

पांतो की हर थिरकन पर मदमाती-मस्ताती है,

तुम कहते हो नाच दिखाऊं तो कैसे नाचू और नचाऊं रे।

मनमयूर विरहा रंजित है, कैसे नांचू और नचाऊं रे।

दिन दूनी सांस बांटता सपन रात दे आया हूं,

तन में थोड़ी सांस बची है, मन में थोड़ी आस बची है,

तिस पर तुमने सुरभि मांगी तो कैसे-कैसे मैं बिखराऊं रे।

तुम कहते हो गीत सुनाओ तो कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

गीत गाते-गाते मैं लगभग रुआंसा हो गया था। अब फफक कर रो पड़ता हूं, तमाम लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा, मैं नहीं जानता और न ही जानना उपयुक्त समझा। जिस मजबूती के साथ उसने मेरी कलाई थामी थी, उससे कहीं दूनी ताकत से मैंने उसका हाथ पकड़ा और लगभग घसीटता हुआ उसे बाहर ले आया। बाहर आते ही मैं वाक्युद्ध पर उतर आया था।

‘मित्र, तुमने मुझे जिगरी यार कहा; दोस्त कहा, मेरे गले में हाथ डाला और चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर यहां ले आए। तुमने मेरा स्वागत बड़ी गर्मजोशी के साथ किया। तुमने सबकी नजरों में मेरा मान बढ़ाया तो दूसरी ओर, तुमने मेरे साथ बड़ा ही भद्दा मजाक भी कर डाला। तुमने मुझे जलील किया। आखिर क्यों?’ मैं एक सांस में न जाने कितना कुछ बोल गया। परंतु वह न जाने किस मिट्टी का बना था कि उस पर कोई असर ही नहीं हो रहा था। बल्कि मेरे द्वारा अपमानित किए जाने के बावजूद उसके चेहरे पर पूर्व की तरह मंद-मंद मुस्कान खेल रही थी। उसने न तो अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की और न ही प्रयास किया। बल्कि मेरे आंखों में आंखें डालकर उसने कहा, ‘अच्छा मित्र तो तुम मेरा नाम जानना चाहते हो! तो सुनो मेरा नाम वक्त है। लोग मुझे समय के नाम से भी जानते हैं। मैं सन् ’????-?? का मिला-जुला रूप तुम्हारे सामने खड़ा हूं। बस कुछ ही मिनटों के बाद मैं तुमसे विदाई ले लूंगा और फिर तुम्हारे सामने एक नूतन वर्ष के रूप में-एक नई सदी के रूप में प्रकट हो जाऊंगा। सारी दुनिया एक नई सदी का बेसब्री से इंतजार कर रही है। पर मित्र जाते-जाते मैं तुमसे एक पते की बात कहे जा रहा हूं। सच कहूं तुम मेरे अब भी मित्र हो। मैंने तुम्हें हकीकत के दर्शन कराए हैं। एक वास्तविकता से परिचित कराया है। और तुम हो कि बुरा मान गए। मेरी एक बात हमेशा ध्यान में रखना, जिस तरह तुम अपने गीतों में नये-नए रंग भरते हो-ठीक उसी की तरह अपने जीवन में ऐश्वर्य का भी रंग भरो। जी तोड़-ईमानदारी से मेहनत करो और उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ चलो। खूब धन कमाओ। बलशाली बनो, ताकि तुम कंचन और कामिनी का जी भरके उपभोग कर सको। धन एक ऐसी शक्ति है जिससे तुम अध्यात्म के शिखर पर भी जा सकते हो। सिद्धार्थ किसी भिखारी के घर नहीं जन्मे थे बल्कि वे राजा के बेटे थे, राजकुमार थे। धन बल से तृप्त होने के बाद ही वे बुद्ध कहला पाए। मैं भी उन्हीं का साथ देने को तत्पर रहता हूं जो सचमुच में कुछ बनना चाहते हैं। अच्छा दोस्त अब मैं विदा ले रहा हूं सारी दुनिया मेरी बाट जोह रही है।’’

सारा शहर पटाखों की गूंज से थिरक उठा। एक आतिशबाजी रंग-बिरंगी फुलझड़ियां बिखेरती हुई आसमान की तरफ उठती है। सहसा मेरा ध्यान उस ओर बंध जाता है तभी एक जोरदार धमाका होता है। काली अंधेरी रात में, नीले आकाश के बोर्ड पर एक-एक शब्द क्रमशः उभरते चले जाते हैं-‘हेप्पी न्यू ईयर’, ‘वेलकम न्यू ईअर’, ‘स्वागतम् नई शताब्दी।’

नजरें झुका कर देखता हूं वह गायब हो चुका था

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