सोमवार, 31 दिसंबर 2012

क़ैस जौनपुरी की कविता - कोई दे जवाब

कविता

(संदर्भ - दिल्ली में हालिया बलात्कार व हत्या कांड)

क़ैस जौनपुरी

कोई दे जवाब

 

फूल जैसी थी मैं किसी के लिए

किसी के अरमानों का सबूत भी थी

किसी की दुआ किसी की मन्‍नत

किसी का न टूटे उसूल थी मैं

हो रही है बहस अब मेरे हाल पे

 

छिन गया क्‍या आएगा अब लौटके

कोई दे जवाब बता दे मुझे

कुछ घाव हैं जिस्मों पे मेरे

कुछ दाग हैं चेहरे पे मेरे

 

हो सकूंगी किसी की न मैं अब कभी

हो सकेगा न मेरा कोई अब कभी

एक अहसास था कितना प्यारा सा जो

हो गया है ज़हर जबरन पिला के मुझे

हक़ तो मेरा भी था खुल के जी लेती मैं

 

कोई दे जवाब बता दे मुझे

क्‍या मैं देखूंगी सपने सुनहरे कभी

खिलखिलाके हसूंगी क्‍या सबमें कभी

दोष मेरा क्‍या था मैं तो नाज़ुक सी थी

क्‍यूं था मसला गया मेरे ज़ज़्बात को

क्‍यूं था कुचला गया मेरे अहसास को

 

कोई दे जवाब बता दे मुझे

मुझसे पूछो अगर चाहती हूं मैं क्‍या

फूल जैसी हूं मैं बस जरा प्यार दो

हूं मैं मरती हुई बस जिला दो मुझे

4 blogger-facebook:

  1. कन्याओं की भावुकता की सहज अभिव्यक्ति है यह रचना ..साधुवाद ..स्त्री प्रकृति की अभिव्यक्ति है ..उसका स्नेह ..सत्कार सम्मान किये बिना पुरुष के जीवन में सुख शांति नहीं आ सकती ..पुरुष यह तथ्य समझें और अपने अहंकार को तिरोहित करें क्योंकि प्रेम का शत्रु है अहंकार ..कृष्ण जैसे पुरुष ही स्त्री के पूज्य होते हैं न के दम्भी और अभिमानी ..

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  2. कोशिश तो की थी उस मासूम की आवाज़ को दूर तक पहुंचाने की...मगर शायद ऊपरवाले से भी उस मासूम का दर्द सहा नहीं गया...उसे अपने पास बुला लिया...

    उत्तर देंहटाएं
  3. कोशिश तो की थी उस मासूम की आवाज़ दूर तक पहुंचाने की...मग़र शायद ऊपरवाले से भी उस मासूम का दर्द सहा नहीं गया...उसे अपने पास बुला लिया...

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  4. कानून बना है गुलाम यहाँ
    जन-जन रावनातार है
    और किसी से आश ना कर
    बन रण चंडी तेरी इज्जत
    अब तू ही तारणहार है

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