गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

शंकर लाल की कविता - देश एक बार फिर से शर्मसार है

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देश एक बार फिर से शर्मसार है

देश एक बार फिर से शर्मसार है

दिल्ली की सड़कों पर

हो रहे बलात्कार है

सारे पुलिसिया इंतजामात बेकार है

संसद भी लाचार है

हर तरफ दरिन्दगी और अत्याचार है

माताओं के राज में बहनों की इज्जत तार तार है

इस पर भी खाना खा रही सरकार है

लगता है इस देश में

मानवता मरणासार है

देश एक बार फिर से शर्मसार है

कानून बना है गुलाम यहाँ

जन-जन रावनावतार है

और किसी से आशा ना कर

बन रण चंडी तेरी इज्जत

अब तू ही तारणहार है

देश एक बार फिर से शर्मसार है

--

शर्म भी शर्मसार है

अब तो शर्म भी शर्मसार है

आप की बेशर्मी पर

घर की इज्जत तार-तार हुई

दरिंदगी की हद पार हुई

फिर भी क्यों मौन छाया है तुम्हारी मुंडी पर ?

तुम कब गुलामी की बेडियां तोड़ोगे ?

कब अपना मुख तुम खोलोगे ?

क्या तुम्हें इंतजार है

और अस्मित बिखरे सड़कों पर

अब तो शर्म भी शर्मसार है

आप की बेशर्मी पर |

--

शंकर लाल, इंदौर, मध्यप्रदेश

1 blogger-facebook:

  1. bhut hi sundar kavita rhi ..
    aur is smaj me itne anaitik kary ho rhe hai..jiski koi seema nhi hai ..delhi ki is ghtna pure yuva varg ko jaga diya hai..aur ye ang ab sant hone wali nhi hai..

    उत्तर देंहटाएं

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