सोमवार, 24 दिसंबर 2012

नोबेल पुरस्कार प्राप्त जर्मन लेखिका हेर्टा मुएलर की कविता

हेर्टा मुएलर

साहित्‍य के लिये नोबेल पुरस्‍कार पाने वाली 12वीं महिला जर्मन लेखिका हेर्टा मुएलर की कविता, जिन्‍हें 2009 के नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया है।

पहले हेर्टा मुएलर के बारे में � रूमानिया में जन्‍मी HERTA MUELLER ने यह कविता 1982 में अपने देश के क्रूर तानाशाह निकोले काउसेस्‍कू के आततायी शासनकाल में उसी यातना शिविर में लिखी है, जहाँ उनकी माँ ने गर्भस्‍थ हेर्टा के लिए पाँच साल गुजारे। 1989 में काउसेस्‍कू के अपदस्‍थ होने और मारे जाने के बाद उन्‍होंने अपने जर्मन भाषा-भाषी गाँव निटकिडोर्क को हमेशा के लिए अलविदा कहकर पति रिचर्ड वेज्‍नर के साथ बर्लिन को घर बना लिया। जर्मनी के एकीकरण से पहले हेर्टा मुएलर की सारी रचनाएँ सुलभ नहीं थी। खासकर यह कविता तो उसके बाद भी प्राप्‍य नहीं थी। नोबेल पुरस्‍कार मिलने की घोषणा के बाद उनकी डायरी से जर्मन पत्रिका ‘डेन्‌ स्‍पीगैल' ने उद्‌घृत किया है। पत्रिका का कहना है कि हेर्टा कहानीकार से ज्‍यादा कवि के रूप में संवेदनशील हैं।

अनुवाद ः शशीधर खां

तोपखाने की दीवार से सटी आत्‍माएँ

लगता है

फिर चीखी

कोई इर्ंट

पर इसके पहले

कि उठे मेरी माँ

हाव पूछने

स्‍वचालित

राइफल की नोक

जो निकला है

बट के आगे

अटक जाता है

माँ के पेट पर

और माँ

सोचने लगती है

निढाल लेटकर

इस शिविर

के इर्द-गिर्द

चीखती छटपटाती

रूघ जिंदा जलती आत्‍माएं

अपना असर

डाल रही हैं

बाहर की दुनिया को

देखने को बेचैन

अनजाने अनदेखे

भ्रूण पर

झपकी आते ही

जगा देती है

बंदूकधारी की बूट

लेकिन आज

वर्षों बाद

मेरी आँखों में

उतरी है

वो झपकी

जो आती-जाती रही

खुली आँखों में

जिनमें कल्‍लोल करती

अस्‍थियाँ माँसपेशियाँ

खून की धार में तब्‍दील

लाल तप्‍त सूखी नदियाँ

तैरती नहीं

स्‍थिर हैं

जिनसे बनी है

तोपखाने की दीवार

इसकी हर ईंट

जिंदा है

अटका रखा है

हर आत्‍मा को

मटक नहीं रही

कोई भी

हिलने नहीं दे रही

धरती को

आकाश को

हवा की गति भी

रुक जाती है

इनकी रुकी साँस की

अमानत पर

मेरे गांव की निटकिडोर्क

की मिठास भरी बोली ने

बना डाला है

विष को अमृत

अगर तैयार हो जाए

कोई गार्ड/यातना शिविर का

मुझसे शादी करने को

तो मैं उसे साथ लिए

जाऊँ अपनों के बीच

जहाँ गुजारा बचपन

पली बढ़ी

लिखना बोलना सीखा

उसे ढाल लूँ

अपने परिवेश के अनुकूल

बेकसूर मासूम को

कत्‍ल करनेवाला

जुल्‍म ढानेवाला

यह गार्ड तो

स्‍वयं है बेचारा

अपनी रोटी के लिये

तड़पाता है

रुलाता है

बिना यह जाने

कि आखिर

गुनाह क्‍या है उनका

काश!

उसे समझा पाती

अपना बनाकर

कि कोई फर्क नहीं है

इनमें और तुम्‍हारे में

इन्‍होंने भी तो

आवाज़ उठायी

रोटी के लिए

पर उन्‍हें अपनी नहीं

देश के पेट की फिक्र है

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