मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

विजेंद्र शर्मा का आलेख - संदर्भ: दिल्ली रेप कांड - आसान बहुत है काम, ख़ाकी पर इल्ज़ाम.........

"...उस मासूम सी लड़की के जिस्म और रूह को नोचने के बाद उन दरिंदों ने उसे और उसके साथी को तक़रीबन मरे हुए समझकर महिपालपुर की पहाड़ियों के क़रीब फेंक दिया था ! लड़की के साथी ने बेहोशी की सी हालत में पुलिस को सिर्फ़ इतना बताया कि बस के ऊपर “ यादव “ लिखा था ! इस लीड के अलावा दिल्ली पुलिस के पास कोई भी और क्लू नहीं था ! पुलिस पर अक्सर संवेदनहीन होने का आरोप लगता है , हो सकता है कोई और केस होता तो पुलिस इतना मश्क नहीं करती पर कहीं ना कहीं दिल्ली पुलिस की उस टीम में संवेदना थी जो उस बच्ची की वो हालत देखकर उन्होंने अपनी एडी – चोटी का ज़ोर लगा दिया ! आधे घंटे तक पास से गुज़रने वाले लोगों ने उनकी पुकार नहीं सुनी, दो फ़रिश्ते ( फ़रिश्ते इस लिए लिखा क्यूंकि इंसान तो रुके ही नहीं ) अपनी बाइक पर जा रहे थे उन्होंने जब एक लड़के के कराहने की आवाज़ सुनी तो वे रुके उन्होंने 100 नंबर पे पी.सी.आर को फोन किया ! उनके फोन करने के ठीक साढ़े पांच मिनट के बाद पुलिस की गाड़ी आ गयी ,पुलिस वालों ने अपनी जैकट से उनके जिस्म को ढका ,वो दोनों फ़रिश्ते पास के एक ढाबे से चद्दर लेकर आये जिसमें लपेट कर पीड़िता और उसके साथी को अस्पताल ले जाया गया !.."

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आसान बहुत है काम , ख़ाकी पर इल्ज़ाम .........

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली गैंग - रेप के हादसे ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया ! दरिन्दगी का ऐसा घिनौना कृत्य शायद ही इससे पहले किसी ने सुना हो ! दिल - दहला देने वाले इस हादसे ने उन लोगों के अन्दर भी संवेदना के बीज अंकुरित कर दिए जिनका संवेदना से दूर - दूर तक कोई सरोकार ही नहीं था ! पूरे देश का सोया हुआ हस्सास इस घटना से एका-एक जाग गया ! ऐसी घटना सभ्य समाज के माथे पे कभी ना मिटने वाला कलंक है !

ऐसी वीभत्स घटना के बाद आवाम का ग़ुस्सा जायज़ था , लोगों ने अपने इस आक्रोश को ज़ाहिर भी किया मगर आरोप – प्रत्यारोप के बीच अगर सब से ज़ियादा किसी पे गाज गिरी तो वो गिरी दिल्ली पुलिस पर ! ख़ाकी की यहाँ, मैं इस लिए पैरवी नहीं कर रहा कि मेरा त-अल्लुक़ भी ख़ाकी से है !

एक क्षण के लिए सोचिये इस घटना के बाद अगर वो भेड़िये ना पकड़े जाते तो हिन्दुस्तान की जम्हूरियत(लोकतंत्र )के मरकज़ (केंद्र ) राजपथ पर हज़ारों लोग किन्हें फांसी पे चढाने की आवाज़ बुलंद करते !

सोयी हुई हुकूमत को जगाने वाले प्रदर्शनकारियों की हर तख्ती पर लिखा था “ बलात्कारियों को फांसी दो “ अगर वे दरिन्दे हाथ ना आते तो शायद इस जन- आन्दोलन का स्वरुप आज कुछ और ही होता !

उस मासूम सी लड़की के जिस्म और रूह को नोचने के बाद उन दरिंदों ने उसे और उसके साथी को तक़रीबन मरे हुए समझकर महिपालपुर की पहाड़ियों के क़रीब फेंक दिया था ! लड़की के साथी ने बेहोशी की सी हालत में पुलिस को सिर्फ़ इतना बताया कि बस के ऊपर “ यादव “ लिखा था ! इस लीड के अलावा दिल्ली पुलिस के पास कोई भी और क्लू नहीं था ! पुलिस पर अक्सर संवेदनहीन होने का आरोप लगता है , हो सकता है कोई और केस होता तो पुलिस इतना मश्क नहीं करती पर कहीं ना कहीं दिल्ली पुलिस की उस टीम में संवेदना थी जो उस बच्ची की वो हालत देखकर उन्होंने अपनी एडी – चोटी का ज़ोर लगा दिया ! आधे घंटे तक पास से गुज़रने वाले लोगों ने उनकी पुकार नहीं सुनी, दो फ़रिश्ते ( फ़रिश्ते इस लिए लिखा क्यूंकि इंसान तो रुके ही नहीं ) अपनी बाइक पर जा रहे थे उन्होंने जब एक लड़के के कराहने की आवाज़ सुनी तो वे रुके उन्होंने 100 नंबर पे पी.सी.आर को फोन किया ! उनके फोन करने के ठीक साढ़े पांच मिनट के बाद पुलिस की गाड़ी आ गयी ,पुलिस वालों ने अपनी जैकट से उनके जिस्म को ढका ,वो दोनों फ़रिश्ते पास के एक ढाबे से चद्दर लेकर आये जिसमें लपेट कर पीड़िता और उसके साथी को अस्पताल ले जाया गया !

इसके फ़ौरन बाद मुआमले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने अपनी कई टीमें गठित की जिन्होंने अपना काम शुरू कर दिया !

दिल्ली में जितनी भी चार्टड बसे चलती है रात भर उनका रिकॉर्ड खंगाला गया , पता चला लगभग ऐसी 370 बसें है जिन पर यादव लिखा है ! सोलह दिसंबर की उस सर्द और सियाह रात में पुलिस की टीम एक – एक बस ,उसके मालिक और बसों के ड्राइवरों को ढूंढती रही ! पूरी रात की मशक्कत के बाद सुबह तक पुलिस उस बस को ढूंढ पाने में कामयाब हो गयी जिस बस में हैवानियत का गंदा नाच हुआ था ! मुख्य आरोपी राम सिंह के गिरफ़्त में आने के बाद पुलिस के लिए बाक़ी भेड़ियों को पकड़ने की राह आसान हो गयी ! अगले दिन शाम तक पुलिस ने चार आरोपी अदालत में पेश कर दिए ! एक नाबालिग आरोपी राजू को पकड़ने में भी दिल्ली पुलिस ने अपनी सूझ –बुझ का परिचय दिया केवल राम सिंह उसे पहचानता था उसका न कोई पता था न कोई मोबाईल नंबर ! राजू को दो दिन की भाग –दौड़ के बाद दिल्ली के आनंन्द विहार इलाके से पकड़ा गया जिसके पास पीड़ित बच्ची का ऐटीएम् कार्ड और पर्स मिला !

किसी ब्लाइंड केस को इस तरह दिल से सुलझाने की ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है !

ये भी सच है कि जज़्बात का चश्मा हमे हर चीज़ साफ़ - साफ़ नहीं दिखाता, लोग शानदार जांच और इतनी जल्द समाज के दुश्मनों को पकड़ने वालों के ऊपर ही इल्ज़ाम लगाने लगे !

अमेरिका में छुटियाँ मना रहे दिल्ली के उप राज्यपाल ने आते ही दिल्ली पुलिस के दो सहायक कमिश्नर बर्खाश्त कर दिए ! पुलिस पर दवाब बना कर काम करवाने वाले हुक्मरानों ने इतना भी नहीं सोचा कि ऐसा करने से उन पुलिसवालों के मनोबल पे क्या असर पड़ेगा जो इस हादसे के बाद 36 घंटों तक लगातार बिना सोये इस केस के लिए काम करते रहे ! कमज़ोर सियासत का वर्दी पर इस तरह इल्ज़ाम ढोल देना कोई नई बात नहीं है !

जितने लोग उतनी बातें , किसी ने कहा की दरिन्दे दो घंटे तक दिल्ली की सड़कों पर बस घुमाते रहे पुलिस उस वक़्त क्या सोयी रही ? इस बात का जवाब वो लोग आसानी से समझ सकते है जो दिन – रात दिल्ली की सड़कों पर सफ़र करते हैं ! उस चार्टड बस में परदे लगे थे , अन्दर से बस की लाइट्स बंद थी ! दिल्ली की सड़कों पर वाहन कीड़े – मकोड़ों की तरह चौबीसों घंटे रेंगते रहते है ऐसा प्रायोगिक रूप से कतई संभव नहीं है कि बस को किसी चेक पोस्ट या लाल बत्ती पर जांच के लिए रोका जाता ! यूँ तो बस के क़रीब से भी कई वाहन गुजरें होंगे ..क्या उन्हें नहीं दिखा ये सब ? दिखता कैसे ये सब तो संभव नहीं था ! जो लोग वहाँ रोज़ सफ़र करते है वे ये बात समझ सकते है ! जनता के आक्रोश के सामने दिल्ली पुलिस का तमाम मुल्ज़िमों को इतने कम समय में सलाखों के पीछे कर देने का काम किसी को दिखाई ही नहीं दिया ! मुझे हैरत इस बात की भी हुई कि पुलिस की कार्य - प्रणाली समझने वाले भी पुलिस को ही इस हादसे का ज़िम्मेदार ठहराने लगे ! हमारे समाज और पुलिस के बीच आंकडा वैसे भी 36 से कम होता ही नहीं है यही वज़ह है कि समाज पुलिस को कभी उसके अच्छे काम के लिए भी शाबाशी नहीं देता !

पुलिस पे इल्ज़ाम धर देना बड़ा आसान है मगर ऐसे हादसे क्यूँ होते हैं इस पर समाज कभी गौर नहीं करता ! अदालतों में हज़ारों बलात्कार के मुआमले लंबित है ऐसा नहीं है कि ये तमाम केस पुलिस की अकर्मण्यता के कारण किसी अंजाम तक नहीं पहुँच पा रहे है ! राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड संस्थान के आंकड़ों के अनुसार देश में ९० % बलात्कार महिला के जानकार या किसी सगे संबंधी के द्वारा किये गए हैं ! दिल्ली गैंग रेप अपने आप में एक अलग और राष्ट्रीय शर्म का केस है !

ये बात मेरी समझ से परे है कि किसी महिला से उसके घर में किसी रिश्तेदार या जानकार द्वारा ये घृणित कृत्य किया जाता है तो इसमें पुलिस कहाँ दोषी हो जाती है ?

पीड़ित महिला को इन्साफ़ देरी से मिलता है इसके लिए हमारी न्यायिक प्रक्रिया भी बराबर की कुसूरवार है ! अभी तक “बलात्कार “ की परिभाषा भी हमारा क़ानून ठीक से गढ़ नहीं पाया है ! एक तो किसी की अस्मत लूट ली जाती है उस पर घटना के बाद पीड़िता से इन्साफ़ के मंदिर अदालत में ऐसे ऐसे सवाल किये जाते हैं जैसे उसी ने ही बलात्कार किया हो ! बकौल राहत इन्दौरी :--

इन्साफ़ जालिमों की हिमायत में जाएगा

ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा

मगर दिल्ली गैंग रेप की इस घटना ने इंसाफ़ को भी सोचने पे मजबूर किया है ! हमारी पुलिस , सियासत , आवाम और समाज का सर वाकई शर्म से झुक गया है ! सच तो ये है की इस घटना के बाद हम अपने आप से भी नज़र नहीं मिला पा रहे हैं !

इंसानियत को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसके लिए हम ख़ुद अपने गिरेबान में झांके ना कि पुलिस पे दोष मंढ कर हम हक़ीक़त से पल्ला झाड़लें ! समाज को ख़ुद सजग होना पडेगा , हमें अपने बच्चों, ख़ास तौर पे लड़कों को ऐसे संस्कार देने होंगे कि उनकी निगाह किसी महिला की तरफ़ जब भी उठे तो इज्ज़त ओ एहतराम के साथ उठे ! अपने इर्द-गिर्द ऐसी फ़िज़ां हमें बनानी होगी जिससे कि मनचलों का मन जब भी चले तो सही दिशा में चले !

भौतिकवादी इस दौर में हम लोग चाहते है कि हमारे बच्चे डाक्टर बने इंजीनियर बने हम ये क्यूँ नहीं चाहते कि हमारी नस्ल कबीर बने , नानक बने , गौतम बने , भगत सिंह बने ,बोस बने ,अशफ़ाक़ बने ! इस दौरे-तरक्क़ी की सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि हम लोग अपने बच्चों का कैरियर बनाने में मसरूफ हैं ना कि किरदार बनाने में ! बच्चों को किरदार बनाने की तालीम ना तो स्कूल कॉलेज में दी जा रही है ना ही घरों में ऊपर से रही सही कसर टी.वी , मोबाईल , इंटरनेट ने पूरी कर दी है ! अपने आप को आधुनिक समझने और ज़माने से आगे निकलने के चस्के में हमे ख़बर ही नहीं है कि हमारे बच्ची क्या पढ़ रहें हैं और उन्हें क्या परोसा जा रहा है !

अपनी आबरू की कुर्बानी देकर दिल्ली गैंग रेप की शिकार इस बच्ची ने हमारे मृत पड़े ज़मीर को जीवित किया है , पूरा राष्ट्र आज एक स्वर में बोल रहा है ! हमारी सियासत कितनी संवेदनशील है हमने देख लिया , इंडिया गेट पर हुए जन आन्दोलन के दवाब के बिना अगर हुकूमत कोई कठोर क़दम उठाती तो बात कुछ और होती !

इतवार के रोज़ राजपथ पर ज़बरदस्त आन्दोलन हुआ , सरकार आवाम की भावनाओं का सम्मान नहीं कर पायी ,बड़ी बर्बरता के साथ लाठी-चार्ज हुआ ,कंपकंपाती ठण्ड में छात्र – छात्राओं पर पानी की बौछारें , यहाँ तक उम्रदराज़ महिलाओं पर भी लाठी-चार्ज किया गया ! इन सब के लिए भी आरोप दिल्ली पुलिस पर लगा दिया गया , एक चीज़ लोगों को समझनी चाहिए की पुलिस को भी कहीं से हुक्म मिलते है , पुलिस की अपनी मजबूरियां है , मैं सुरक्षा बल की उस कार्यवाही को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ पर मॉब को नियंत्रण में करना उतना आसान नहीं है जितना बाहर से दिखता है ! प्रदर्शन-कारियों में कुछ सियासी रोटियां सेंकने वाले भी घुस गए और हालात बिगड़ते गए कुछ ज़ियादती सुरक्षा बल से भी हुई ! इस पूरे प्रदर्शन में पुलिस ने भी अपना एक जवान सुभाष तोमर खो दिया !

पुलिस समाज से अलग नहीं है , एक पुलिस वाला भी एक भाई है, एक बाप है, एक बेटा है उसकी भी रगों में लाल रंग का ही खून दौड़ता है हाँ अगर कहीं कोई कमी है तो वो है हम में और पुलिस में आपसी ऐतबार की ! सबसे पहले पुलिस और समाज को ये ऐतबार बहाल करना होगा !

बहरहाल, इन तमाम बातों से हटकर मेरी एक गुज़ारिश है कि हम सब मिलकर ऐसा माहौल बनाए की इस तरह की घटनाएं मुस्तक़बिल में ना हों ..और पुलिस को हम अपने समाज का ही हिस्सा समझें ना कि कोई छूत की बीमारी ! हमारी पुलिस अपनी मेहनत और जांबाज़ी से जब कोई अच्छा काम करे तो हमे उसकी पीठ भी थपथपानी चाहिए ना कि पूर्वा-ग्रहों से ग्रसित हो हम उसपे आरोप ही आरोप थोपते रहें !

आख़िर में ईश्वर से यही प्रार्थना कि अभी तक बहादुरी के साथ मौत से जंग लड़ने वाली उस बच्ची को इतनी हिम्मत और हौसला दे ताकि वो पूरी तरह ठीक होकर अपनी आँखों से उन भेड़ियों का हश्र देख सके और हमारे मुंसिफ़ों की क़लम में ईश्वर वो ताक़त दे जिससे कि वे उन दरिंदों के हक़ में मौत से भी बदतर सज़ा लिख सकें !..आमीन

हाकिम हो गर मुल्क के , जल्द करो इन्साफ़ !

वरना तुमको बेटियाँ , नहीं करेंगी माफ़ !!

--

विजेंद्र शर्मा

सीमा सुरक्षा बल ,बीकानेर

Vijendra.vijen@gmail.com

16 blogger-facebook:

  1. जो हुआ बहुत ही बुरा हुआ.
    विदेशी मीडिया भी देश की कमज़ोर रग को पकडने में लगे रहते हैं.इस समय जब लहर पूरी तरह विरोध में है उस समय आप ने खाकी वर्दी के पक्ष को बड़े ही संतुलित तरीके से सामने रखा.
    कितने दवाब के तहत उन्हें काम करना पड़ता है इस बात को बताने का प्रयास किया है . आशा है लोग आप की बात को समझेंगे.
    -
    आप की ही बात दोहराती हूँ -
    हाकिम हो गर मुल्क के , जल्द करो इन्साफ़ !

    वरना तुमको बेटियाँ , नहीं करेंगी माफ़ !!


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  2. घायल पुलिस कर्मी सुभाष सिंह तोमर की मौत ...बड़ी अजीब बात है लोग बदनाम भी करते है फिर भी सरकार का हुक्म बजाना काम है इनका सरकारी नौकर जो है ....लगभग १८-से २० घंटे ड्यूटी करते है ..............सभी विभाग वाले हड़ताल करतें है यहाँ तक की जीवन के रक्षक डाक्टर भी......... पर पुलिस वाले नहीं फिर भी .........पुलिस वालो का कोई दुश्मन नहीं पर जनता उसकी दुश्मन जरुर हो जाती है ......घायलों के इजाफे इस बात का गवाह भी है ...........हम तो कहतें है हड़ताल कर देना चाहिए पुलिसवालों को भी ...ना ढंग का भोजन ना मकान ..और ना ही तनख्वाह ...........पुलिस ...पी ए सी ..आर पी एफ ...सभी मिल कर ..फिर शायद सरकार भी समझे और जनता भी .................

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  3. घायल पुलिस कर्मी सुभाष सिंह तोमर की मौत ...बड़ी अजीब बात है लोग बदनाम भी करते है फिर भी सरकार का हुक्म बजाना काम है इनका सरकारी नौकर जो है ....लगभग १८-से २० घंटे ड्यूटी करते है ..............सभी विभाग वाले हड़ताल करतें है यहाँ तक की जीवन के रक्षक डाक्टर भी......... पर पुलिस वाले नहीं फिर भी .........पुलिस वालो का कोई दुश्मन नहीं पर जनता उसकी दुश्मन जरुर हो जाती है ......घायलों के इजाफे इस बात का गवाह भी है ...........हम तो कहतें है हड़ताल कर देना चाहिए पुलिसवालों को भी ...ना ढंग का भोजन ना मकान ..और ना ही तनख्वाह ...........पुलिस ...पी ए सी ..आर पी एफ ...सभी मिल कर ..फिर शायद सरकार भी समझे और जनता भी .................

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  4. बहुत पहले हम एक स्टेटस डाले थे अपने वाल पर .............यह सही बात है की अच्छे लोग पुलिस विभाग में कम है..... .पर वह हर विभाग में कम है यही नहीं .....बुरे लोग इस वर्दी को पहनकर दागदार कर दिए है...... पर क्या करे सभी जगह पैसा चलता है आजकल अपने योग्यता पर नहीं बल्कि पैसे के बल पर भर्ती हो जाते है तो जाहिर है थोड़ी तो गन्दगी होगी ही ........पुलिस वालो का जनता के बीच सम्मान कम होने के कई कारन है ..एक तो उसका सीधा सम्बन्ध जनता से होता है हर पल झेलना पड़ता है .......लेकिन इसका एक कारन और भी है आजकल जनता चाहती है वह शिकायत करे तुरंत उसका काम हो जाये जैसे जादू की छड़ी हो पुलिस वालो के पास नहीं होता तो वह बुराईयां करने लगती है .....कोई सहयोग तो करता नहीं चाहता हा आरोप सभी लगा देते है .....रही बात गश्त करने की करते है पर क्या आप जानते है की हर दसवा व्यक्ति अपराधी बन गया है ...यहाँ तक की आप न अपने घर की रक्षा कर पाते है ना ही अपनी घर के बच्चो की .....एक महीने में तीन चार तो घर से लड़कियों के भाग जाने की बात आ जाती है उनको खोजना कोई छोटी बात तो है नहीं ............. आप अपने घर की रक्षा नहीं कर सकते और आप चाहते है मुट्ठी भर पुलिस वाले पुरे मुह्हले की रक्षा करे ...कितनी नाइंसाफी है .....खैर कई बाते है पर आप नहीं समझेगे ....क्योकि एक कहावत है जब तक फांटे न पैर बेवाई उ का जाने पीर पराई ...

    .भावनाये नहीं मरती भैया किसी कि हा कही खो जाती है क्योकि चौतरफा दबाव जो रहता है......अब किसी चोर उचक्के से आप प्यार से तो पूछेगे नहीं कि बेटा बता कहा कहा चोरी किया ....हा शक पर कोई शाह भी पकड़ा जाता है ओउर वाही चंद लोग बदनाम कर रक्खे है ...एक मुह से दूसरे मुह बात फैलती है अतः यहाँ भी वही फार्मूला कायम है धीरे धीरे बदनाम हो गयी...........................

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  5. फिर हाल आपने बहुत अच्छा लिखा है ....

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  6. यह सही है कि हर बार दोष पुलिस को ही दिया जाता है । पुलिस हर जगह तो हर व्यक्ति के साथ तो हो नहीं सकती । कुछ तो दोष आम जनता का भी है कि वह वस्तुस्थिति को कभी नहीं समझती । हमारे राजनेता तो और भी महान हैं !!!

    वो रोज़ करते हैं ज़ुल्म हमारी बच्चियों पर,
    हम मूँह, कान बन्द किए आँखें मीचते रहे ।

    डॉ.मोहसिन ख़ान
    अलीबाग

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  7. ----------और पुलिस को हम अपने समाज का ही हिस्सा समझें ना कि कोई छूत की बीमारी ! हमारी पुलिस अपनी मेहनत और जांबाज़ी से जब कोई अच्छा काम करे तो हमे उसकी पीठ भी थपथपानी चाहिए ना कि पूर्वा-ग्रहों से ग्रसित हो हम उसपे आरोप ही आरोप थोपते रहें !
    शर्मा जी,
    बहुत ठीक लिखा है आपने, एक संवेदना पूर्ण लेख है आपका। लेकिन जहां तक पुलिस के विषय में जो ऊपर की लाइनें पेस्ट की हैं मैंने आपके लेख से- आपका नजरिया अभी किताबी और आदर्शात्मक ज्यादा है, और यह बात मैं आपको इस लिए कह पा रहा हूं और मैं जानता हूं कि जब तक युवा इस देश की फौज में होता है, उसके अंदर यही भाव होता है क्योंकि मैं भी 20 वर्ष यूनीफार्म में रहा हूं, लेकिन जब आप यू पी के किसी थाने में अगर ( भगवान ना करे ऐसा कोई दिन आए) गए तो दावे के साथ कह सकता हूं आपके विचार बदल जाएंगे। आपका विचार बहुत सही है कि हमें शाबासी भी देनी चाहिए- हम तो पुलिस को अपना अंग समझते हैं पर वह हमें 100,200,500,100,लाख रुपया समझती है।इस विषय पर आपने बहुत सतही विवेचना कर दी है पुलिस की कार्यप्रणाली की और उसे कुछ दोषमुक्त कर पवित्रता का प्रमाणपत्र देने का कुछ आग्रह दिख रहा है. हां इस केस में आप सराहना कर सकते हैं पर क्या यह सच नहीं है कि इस जैसे एक दो केस को छोड़कर वाकी 98 केस में पुलिस क्या करती है और क्या हर अपराध उसकी मिलीभगत से नहीं होता ?
    फिर भी आपके विचार और लेखन अच्छा है और इस शर्मनाक घटना को अंततः हम सब भूल जाएंगे और होगा कुछ नहीं- ऐसा हमारा अनुभव हो चला है और यही रीति बन गई है। कल एबीपी न्यूज पर इस बहस के बीचों बीच हर ब्रेक के पहले उदघोषिका महोदया भारत पाकिस्तान के बीच महामुकाबले के विषय में हर पांच मिनट पर बताना नहीं भूलती थी... इतना तो बाजार हावी है हमारे ऊपर..यह सिर्फ तब तक चर्चा में रहेगा जबतक कोई और सनसनी नहीं घटती----। उम्मीद ही कर सकते हैं कि समाज बदलेगा और उसकी मानसिकता में बदलाव आए- पर समाज जब नित नई घटती कपड़ों की कतरनों में नायिकाओं को देख रहा है, फिल्मों की सफलता का राज नंगापन और बलात्कार के सीन बन रहे हैं तो हम समाज से किस रामभाव की आशा कर रहे हैं..... खैर बहुत लंबा विषय है... आप किसी बात को अन्यथा मत लेना - हमें अपने अपने स्तर से सदप्रयास करते रहना है । सादर

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  8. पुलिस को दोषी करार देने के कई कारण मौजूद है, मैने आपका पत्र पढ़ा .....अच्छा लिखा है आपने वर्तमान घटना के परिप्रेक्ष्य में......सराहनिय कार्य रहा पुलिस का .....किंतु ये भी सत्य है कि, पुलिस जनता की मित्र आज तक नही बन सकी...जब की पुलिस ही ऐसा सरकारी तंत्र है जो जनता के सबसे करीब रहता है....पुलिस को तो सबसे अधिक समाज सेवी और समाज सुधार का दायित्व निभाना चाहिये लेकिन ऐसा कोई भी आचरण पुलिस विभाग के पास नही है.....90 कार्य अनसुलझे रह जाते हैं...10 में से पाँच केस पर विशेष ध्यान दिया जाता है बचे हुए पाँच केस पूरे वर्ष पुलिसिया कार्यवाही के द्वारा सक्रिय बने रहते हैं.......किंतु दिल्ली रेप काण्ड के आरोपियों को चमत्कारिक काबीलियत दिखाते हुए पकड़ना वाकई सराहनिय कार्य है... वाह।

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  9. पुलिस को दोषी करार देने के कई कारण मौजूद है, मैने आपका पत्र पढ़ा .....अच्छा लिखा है आपने वर्तमान घटना के परिप्रेक्ष्य में......सराहनिय कार्य रहा पुलिस का .....किंतु ये भी सत्य है कि, पुलिस जनता की मित्र आज तक नही बन सकी...जब की पुलिस ही ऐसा सरकारी तंत्र है जो जनता के सबसे करीब रहता है....पुलिस को तो सबसे अधिक समाज सेवी और समाज सुधार का दायित्व निभाना चाहिये लेकिन ऐसा कोई भी आचरण पुलिस विभाग के पास नही है.....90 कार्य अनसुलझे रह जाते हैं...10 में से पाँच केस पर विशेष ध्यान दिया जाता है बचे हुए पाँच केस पूरे वर्ष पुलिसिया कार्यवाही के द्वारा सक्रिय बने रहते हैं.......किंतु दिल्ली रेप काण्ड के आरोपियों को चमत्कारिक काबीलियत दिखाते हुए पकड़ना वाकई सराहनिय कार्य है... वाह।

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  10. @rajeev rawat g. you r right, per ye to koi samjhna hi nahi chahta koi sipahi hai koi aam janta hai per jo wo hukmraan baithe hai un logon ko koi kuch nahi kehta ki agar pehle hi agar koi sakhat kadam udhaye jate to etna hangama nahi hota aur hamare desh main ladkiyain apne aap ko etna asurkshit nahi samjhti.

    maaf kijiye mujhe likhna nahi aata agar koi galti ho to maaf karna.

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  11. baaten sahi par, main samajhta hun bharatiya police ko aur bhi professional hone ki jarurat hai.aur sabse jaruri hai community policing ko bhadawa deni ki par farz samajhkar na ki 8ghante ki duty.1861 wali baat nahi rahi. biswas kayam karna police ki chunouti hai.training aur political influnce ko ghatane ki bat sochni chahiye.
    Manoj 'Aajiz'

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  12. प्रताप8:56 pm

    Remove the Police from India and see the positive changes. जो एक बार पुलिस के पल्ले पड़ जाता है जिन्दगी भर दूर से हाथ जोड़ लेता है. लिखने को तो ढ़ेर सारी बातें लिख दो कि पुलिस ये है, पुलिस वो है.

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  13. Prataap Ji kahnaa badaa aasaan hai " remove the police from India " ...... Maine jo likha hai use sanjeedagee se socheche ek baar....

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  14. हाकिम हो गर मुल्क के , जल्द करो इन्साफ़ !

    वरना तुमको बेटियाँ , नहीं करेंगी माफ़ !!


    आगे पढ़ें: रचनाकार: विजेंद्र शर्मा का आलेख - संदर्भ: दिल्ली रेप कांड - आसान बहुत है काम, ख़ाकी पर इल्ज़ाम......... http://www.rachanakar.org/2012/12/blog-post_25.html#ixzz2IEEJ7dfT

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