गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

विजय वर्मा की कविता ' मन ' का दर्द [ ठीक है ? ]

कविता

' मन ' का दर्द

    [    ठीक है ?  ]

दस दिनों से

जल रही दिल्ली है ,

सामूहिक -दुष्कर्म पर

आहत सारा देश है;

मेरे कहने को अब

रहा क्या शेष है?

जानते तो है आप कि मुझे

ज्यादा नहीं बोलने की ताकीद है।

ठीक है ?

 

कभी महंगाई ,कभी भ्रष्टाचार पर

तो कभी मैडम की फटकार पर

मैं तो खुद त्रस्त हूँ।

पर ख़ुदा-कसम

मैं तो नहीं भ्रष्ट हूँ।

फिर भी जाने क्यूँ हरदम

लगी रहती चिक-चिक है।

ठीक है?

 

बार-बार मेरे ख़िलाफ़

उठती आवाज़ है।

समझ नहीं पता क्यूँ लोग

मुझसे नाराज़ है।

मैंने तो कुछ किया नहीं,

मैं तो कुछ करता नहीं।

सभी कहते रहते है

यह आदमी बड़ा 'वीक'  है।

ठीक है?

 

लोकपाल बिल पर भी

कुछ लोग तंग करते है,

फिर भी हमें देखो हम

नहीं मौन भंग करते है।

उनके सौ सवालों पर

मेरी बस एक चुप्पी है।

मेरे पास उनके लिए नहीं

कोई जादू की झप्पी है।

वे हमें करते परेशां अत्यधिक है।

ठीक है ?

 

इतने दुःख-दर्द के बाद

क्या कम है मैं रोता नहीं।

एक सन्देश-प्रसारण भी तो

ठीक ढंग से होता नहीं।

और उस पर तुर्रा कि यह खबर भी

हो जाती ' लीक '  है।

ठीक है? 

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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