गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

पुस्तक समीक्षा - दूर क्षितिज में...

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पुस्तक समीक्षा
जीवन-रथ के गीत-सारथीःपं. रमाकान्त शर्मा

 
समीक्षकः डॉ. गणेश खरे (राजनांदगांव)
पुस्तक समीक्षा
कृति - दूर क्षितिज में
कवि - पं. रमाकान्त शर्मा
मूल्य - 250 रूपये
प्रकाशक -हिन्दी साहित्य
समिति, छुईखदान,

‘दूर क्षितिज में ’ नामक कविता संग्रह में पं. रमाकान्त शर्मा की 101 कवितायें संग्रहीत हैं जिनमें 74 गीत-कविताये,ं 23 हास्य, व्यंग्य तथा नयी कवितायें और 4 छत्तीसगढ़ी भाषा में कवितायें हैं। इससे भी अधिक कवितायें अभी आपकी अप्रकाशित हैं। यह आपका पहला काव्य संग्रह है जिसे मई 2012 ई. में हिन्दी साहित्य समिति, छुईखदान, जिला राजनांदगांव, (छ.ग.) द्वारा प्रकाशित किया गया है


पं. शर्मा 20 शताब्दी के छठवें दशक  से काव्य-साधना में लीन हैं तथा शिक्षकीय कार्य से निवृत्त होने बाद अब भी वे इस कार्य के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। आप मूलतः गीतकार हैं। दर्द, वेदना, पीड़ा- यह त्रिवेणी आपकी जीवन-संगिनी भी है और आपके गीतों की प्ररेणा-भूमि भी। इनका सरगम आपकी हर सांस में बजता रहता है। आपके गीतों में अंतर्व्यथा की यही झंकार झंकृत होती रहती है। पर आपकी वेदना व्यक्तिगत न होकर समष्टिमूलक है। आपको दुख इस बात का है कि आज बेशरम भ्रष्टाचार अमरबेल की तरह सारे समाज में फैल गया है जिसके कारण आज सारा लोक जीवन संत्रस्त है, अधिकारी तथा नेतागण मौज मस्ती से जी रहे हैं और गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाली शोषित, पीड़ित पीढ़ी आहें भर रही है, उसकी सुख सुविधाओं की ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। इस तरह आपकी वेदना मानवीय धरातल पर आधारित है। इस संदर्भ में एक उदाहरण प्रस्तुत है।


मेरे गीतों में टीस, वेदना, पीड़ायें हैं
आंखों के दर्पण में दिखती धारायें हैं...(पृ.55)
चोर लुटेरे घूम रहे बन जादूगर, संन्यासी
दानवता हो गई है कितनी, आज खून की प्यासी (पृ.56)

आपके आत्मपरक गीतों का मूल स्वर यही है। मूलतः शिक्षक होने के कारण आपकी रचनायें नैतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। मंहगाई की मार से संत्रस्त कवि इस बात की चर्चा अपनी अनेक रचनाओं में करता है। ‘चांदी है’ नामक रचना में वह लिखता है--


कहने को आजाद देश है, पर हुई बहुत बर्बादी है
भूख गरीबी है घर-घर में, नेताओं की चांदी हैं।
न्यायालय में न्याय नहीं है, आसमान मंहगाई है
कुटियों में फैला अंधकार है, सिसक रही तरूणाई है. (पृ. 88)


मानवीय जीवन की विषमताओं, मंहगाई और भ्रष्टाचार के कारण जनता की विवशताओं का अंकन आपने ‘कलियुग चालीसा’ में और व्यापक ढंग से किया है, यहां एक उदाहरण प्रस्तुत है--
मंहगाई सुरसा भई, प्रतिदिन चढ़े अकास
बेचारी जनता पिस रही, शेष रही न आस. (पृ. 93)


इस तरह वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्यों के आंकन में आपने पूरी निष्ठा, ईमानदारी, पारदिर्शता और निर्भीकता का परिचय दिया है। इस प्रकार के युग-बोधों के अनेक चित्र में  हमें उनकी निम्न रचनाओं में भी मिल जाते हैं । आजादी की त्रासदी, दाल-दर्शन, मास्टर की पेशी, शिक्षक, अपना देश, मृग मरीचिका, चेहरा हिन्दुस्तान का आदि। इन सब रचनाओं में कवि की सपाट बयानी ही श्रोताओं और पाठकों को प्रभावित करती है। इनमें न हमें कोई अलंकार मिलेगा, न बिम्ब और न कोई प्रतीक जो रसास्वादन में किसी प्रकार की दीवार खड़ी करें।


‘दूर क्षितिज में...’ में सबसे अच्छी रचनायें वे है ंजो कवि की आकांक्षा, विवशता, उद्बोधन ओर आवाहन से संबंधित है। कवि की आकांक्षा से संबंधित पंक्तियां देखिए--
हर देहरी का मिटे अंधेरा, ऐसा दीप जले
श्रम की धरती पर फसलों की बाली खूब फले...
सौख्य शांति की किरणें फूटें उज्जवल प्रभा ढले... (पृ. 64)


इसी संदर्भ में कवि का कथन है कि भारतीय संस्कृति के सुन्दर और सुहाने रूप की महिमा सारा विश्व जानता है अतः हम सबके मन में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव प्रतिपल बढ़ते रहना चाहिए। हमें अपने अमर शहीदों की कुर्बानी को भी याद रखना होगा और हम सबका जीवन ऐसा हो जैसा हंसता हुआ मस्त गुलाब होता है। हमें ऐसे प्रयत्न करने हैं कि जिससे स्वार्थ और पाप की भट्टी में कोई भी इंसान गल न सके।


यह आकांक्षा तो मानवीय है पर वर्तमान जीवन का दानवीय पक्ष भी देखिए जिसके कारण कवि अपने घर के द्वार पर दीप जलाने में भी स्वयं को विवश पाता है। वह लिखता है--


साथी कैसे दीप जलाऊ...
बेकारों की भरपूर फसल है, नेताओं की मरी अकल है,
भाषण का अंबार यहां है, नारों का गुंजारा यहां है,
जर्जर तन है, मूक है वाणी, कैसे पापाचार मिटाऊं...(पृ. 71)


इसी संदर्भ में कवि के आवाहन और उद्बोधन के स्वर भी देखिए...
दीप पर्व है आज द्वार पर आओ दीप धरें
आलोकित हो द्वार, तमस को दूर करें। (पृ. 69)


आगे कवि लिखता है कि आज मानवता भटक गई है, छल प्रपंच की घास चारों ओर उग आई है, मीठी बोली में भी विष की बूदें घुल गई हैं पर यह विषपान करके भी और तिल-तिल जलकर भी हम इस विश्व को प्रकाश से भर देंगे।
उद्बोधनों से संबंधित कविताओं की संख्या तो काफी है, यथा ऐसा दीप जलाता चल, अब न बैठो हाथ पर तुम हाथ धर कर, यह तो कुछ भी कर गुजरने का समय हैं, झंझा है दूर अभी, हंस ले जीवन-प्रसून, जगती की बगिया में सौरभ तू भर दे, या आवाहन है आज तुम्हारा आओ कल की याद करें, जो बीती काली रातें हैं, उन रातों को याद करें आदि


पत्नी के निधन पर लिखित ‘दूर क्षितिज’ में शोक गीत की मर्मस्पर्शता है और बेटी की विदाई में विरह-व्यथा का दंश। इनके अतिरिक्त कवि ने कुछ प्रशस्तिपरक और वर्णनात्मक रचनायें भी लिखी हैं पर इस संग्रह में पं. शर्मा की प्रकृति परक रचनायें अधिक कलात्मक और प्रभावशाली हैं। इस संदर्भ में बादलों से संबंधित उसकी रचनायें दृष्टव्य हैं। असाढ़ के काले बादलों में बिजली की पायल के चमकने तथा रेतों की चादर में घायल नदियों के तड़पने के मानवीय बिम्ब हमें सहज ही केदारनाथ अग्रवाल की याद दिला देते हैं।


समग्रतः हम पं. शर्मा की इन रचनाओं को हिन्दी के किसी वाद की सीमा में बांध नहीं सकते। उनके गीतों में उनके करूणामय हृदय की तीव्र अभिव्यक्ति है, आव्हान-उद्बोधनमूलक रचनाओं में उनके सृजनधर्मा कवि का कौशल है, आत्मपरक और संबंधपरक रचनाओं में उनके मन के उद्वेग तीव्र गति से फूट पड़े हैं तथा प्रकृतिपरक रचनाओं में उनके छायावादी संस्कार मुखरित हैं पर उनका समस्त कृतित्व उनके चिंतनशील शिक्षकीय जीवन से आच्छादित हैं।


तुम जग के हो पालनहारी गावें गौरव विश्व तुम्हारी, (42) मां ने अपनी छोटी बगिया बस दिन स्वार्थहीन ही सींचा (47), मुझमें पलती हैं विश्वासें...व्यथा वेदना की हैं राशें (49) आदि पंक्तियां मैं इसलिए उद्धृत कर रहा हूं कि पाठकगण इनकी ओर ध्यान न दें, भले ही इनमें व्याकरणिक या लयभंग आदि के कुछ दोष हों पर कवि के भावावेग के प्रवाह में ऐसे दोष स्वयं तिरोहित हो जाते हैं।


डॉ. गणेश खरे
-98 सृष्टि कालोनी, राजनांदगांव (छ.ग.)

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