प्रतिभा शुक्ला की लघुकथा - जगह

जगह

प्रतिभा शुक्ला

DSCN1954 (Mobile)

ट्रेन आकर रुकी। मुझे लखनऊ जाना था। भीड़भाड़ देख आशंका  हुई कि जगह मिलेगी या नहीं। अक्सर  होता है कि  जिनकी सीट  होती है वह जगह नहीं देते। पतिदेव एक सीट  को देखते ही बोले, बैठ जाओ  यही पर। मैं खड़ा रहता हू। लेकिन उनके इतना बोलते ही सीट  पर बैठा परिवार सजग होकर और पाँव पसार दिया।  देखा पतिदेव थोड़े असहज हुए, लेकिन मैंने उनको समझाते हुए कहा, आप नाहक परेशान हो रहे हैं। कोई बात नहीं। मैं तो खड़े-खड़े भी जा सकती हूँ। लेकिन मेरे बैठने से इनको परेशानी हो जाएगी। इशारे से समझाया की धैर्य रखें।  मेरा संयम काम आया। तने पाँव सिकुड़ने लगे। औरतों में बहनापा जागा। एक बोली, आ जाइए। मैंने कृतज्ञता के साथ मुस्कुरा दिया।

पति कान से मुंह सटा बोले, यह चमत्कार कैसे हुआ?
शालीनता से।
वे हंस पड़े। तब तक एक और चमत्कार। सभी थोड़ा-थोड़ा और खिसक गए। करीब आठ इंच और जगह निकल आई। यह पति के लिए थी।
लखनऊ पहुंचते पहुंचते पूरी सीट मेरी थी। सीट के लोग मेरे अपने हो चुके थे

पुलिस अस्पताल के पीछे
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर
उत्तर प्रदेश।

2 टिप्पणियाँ "प्रतिभा शुक्ला की लघुकथा - जगह"

  1. शालीनता ही एक दूसरे को जोड़ती है ...

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  2. सहज , सरल शब्दों में एक सुन्दर लघुकथा ।बिल्कुल इसके कथ्य की तरह ।

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