रविवार, 30 दिसंबर 2012

मोहसिना जीलानी की कहानी - फटी चादर

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मोहसिना जीलानी

फटी चादर

वो सफ़ेद बुर्के में लिपटी हुई पाँच वर्षीय फज़लू का हाथ थामें तेज़ी से चल रही थी। फज़लू के पैर, फिलिप फ्‍लॉप चप्‍पलों में जो उसकी साइज से बड़ी थी धूल में अँट रहे थे। खुले गरेबान की बड़ी-सी शर्ट और घुटनों तक लटकी हुई नेकर- वो माँ का हाथ मज़बूती से थामे उसके तेज़ तेज़ क़दमों का साथ देने की अनथक कोशिश कर रहा था। छोटे-छोटे ख़तरों ने उस नन्‍हें मस्‍तिष्‍क को घेर रखा था। अगर कहीं माँ का हाथ छूट गया तो वो खो जायेगा और फिर उसे घर का रास्‍ता भी नहीं मालूम। सीधी सड़क से निकल कर वो एक गली में प्रवेश कर गई। गर्मियों की सुनसान दोपहर, एक गली से दूसरी गली पार करते-करते वो पसीने में चूर हो चुकी थी। गर्म हवा की उलझी-उलझी साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। हर तरफ़ सन्‍नाटा था। और गली सुनसान थी। लेकिन ख़दीजा एक ऐसी भीड़ में खो जाना चाहती थी जहाँ उसे कोई पहचानता न हो, चलते-चलते वो इतनी निढाल हो गई कि उसे दम लेने के लिये रुकना पड़ा। फ़ज़लू इस बात से अनजान था कि आख़िर वे कहाँ जा रहे हैं। शायद माँ को बहुत ज़रूरी काम है। जब वो किसी ज़रूरी काम से निकलती है तभी उसके पैरों में इतनी तेज़ी आती है।

तेज़-तेज़ क़दमों से चलते-चलते एक बार फिर वो सपनों की दुनिया में लौट गई थी। पिछली रात शरफू की दी हुई गुलाबी साड़ी का ख़याल उसकी खुरदरी उँगलियों में अजीब- सी सन्‍तुष्‍टि का एहसास पैदा कर रहा था। सुलगते हुए गुलाबी रंग ने उसके शरीर में आँच सी लगा दी थी- और शरफू का प्‍यार छतनार बन कर उसके जलते तन को ठण्‍डक पहुँचा रहा था। लेकिन शादी की ये कैसी कड़ी शर्त थी, “अपने बच्‍चे को कहीं ठिकाने लगा दे जब तक ये तेरे साथ हैं मेरा तेरा निबाह नहीं।” उसने साफ़-साफ़ कह दिया था। ख़दीजा को अचानक फ़ज़लू के पिता का ख़याल आ गया। मज़दूरी करने एक दिन ऐसा निकला कि फिर वापस ही नहीं आया। कुछ दिनों बाद ख़बर मिली कि शहर में बच्‍चा ट्रक के नीचे आकर कुचल गया है। उस बस्‍ती में न जाने कितने लोग थे जो ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार होते रहते हैं। उनके लिये ये अनहोनी बात न थी कि खदीजा इस ग़म को सीने से लगा कर बैठ जाती, रो धोकर संतोष कर लिया। वो इस बस्‍ती में अकेली न थी। मुसीबतों ने जैसे उसका घर भी देख लिया था। वो सोचा करती, ‘जब से फ�ज़लू पैदा हुआ था उस पर एक न एक मुसीबत टूटती रहती। ये बच्‍चा उसके लिये भाग्‍यवान साबित नहीं हुआ था।' मगर फिर भी अपना ख़ून था। गोद में लिये, सीने से चिपटाये वो घरों में बरतन धोती फिरती। पाँव-पाँंव चलने लगा तब भी उसका आँचल पकड़े साये की तरह साथ-साथ था। अगर उसे अच्‍छा घर मिल जाये, अच्‍छे लोग मिल जायें तो क्‍या अच्‍छा हो और अगर शरफ़ू मेरा हो गया तो उस जैसे चार बेटे और पैदा कर लूँगी अब तो मैं उसे पेट भर खाना भी नहीं दे सकती मगर... मगर इसे लेगा आिख़र कौन?

यतीमख़ाना या फिर चौधरी साहब जिनके घर वो बरतन धोती है। पर यूँ तो वो हर समय उसके सामने रहेगा। उसने घबरा कर सर ‘ना' में हिलाया... और ठंडी साँस भर कर सोचा... फिर मैं क्‍या करूँ आिख़र...

वो बहुत देर तक सोचती रही, और अपने अन्‍दर उठने वाले तूफ़ान से लड़ती रही। मुहब्‍बत और ममता... दोनों टकरा रही थीं। सामने नुक्‍कड़ पर उसे नल नज़र आ गया। वो बहुत प्‍यासी थी। सड़क पार करते-करते और नल तक पहुँचते उसने फ़ैसला कर लिया था। उसका सर झुका हुआ था और मुहब्‍बत जीत गई थी। वो बड़े पीर के मज़ार पर जा रही थी जहाँ गुरुवार का मेला लगा था। उसने नल से ओक लगा कर पानी पिया, ये नल कब से टूटा पड़ा था। पानी हर वक़्‍त रिसता रहता था। किसी ने सफ़ेद कपड़े की एक चिंदी उसमें बाँध दी थी। पानी टप-टप बहता रहता- जैसे नलका न हो, चीखता चिल्‍लाता शोर मचाता नासूर।

“तू भी पानी पी ले... अभी दूर जाना है। कितनी गरमी है।” उसने फ़ज़लू को पुकारा। वो पानी तक आया, छोटे-छोटे हाथों की ओक बनाकर... उनमें लबालब पानी भरा और बड़े मज़े में मुँह पर पानी से छींटे डालने लगा। चप्‍पलों में फँसे हुए पैरों पर पानी के छीटें पड़ने लगे और पैरों में लगी रेत साफ होने लगी।

“जल्‍दी कर”, ख़दीजा बोली। फिर उसने अपने मैले बुर्के के कोने से उसके मुँह-हाथ पोंछे और उसका हाथ पकड़कर फिर से सड़क पर निकल आई...। उसके पास इतना वक़्‍त कहाँ था जो मुँह धोने जैसी बेकार हरकतों पर बर्बाद करती। अंधेरा होने से पहले उसे फज़लू को ठिकाने लगा कर घर वापस आना था। चलते-चलते शाम के साये लम्‍बे होने लगे थे। न सूरज की तपिश कम हो रही थी, न ही शरीर को सुकून का एहसास हो रहा था। फिर दूर ही से शोर-शराबे की आवाज़ सुनाई देने लगी। बडे़ पीर का मज़ार करीब आ रहा था। पीर साहब की करामात की बातें सारे गाँव में मशहूर थीं। हर गुरुवार को लोग झुण्‍ड के झुण्‍ड में दूर-दूर से मज़ार पर आते। फूल बताशें क़ब्र पर चढ़ाते और मुरादें माँगते और मुरादें पूरी हो जाती तो मज़ार पर खाने पकाते। देगें चढ़तीं, क़व्‍वालियाँ होतीं और कान पड़ी आवाज़ सुनाई न देती। सालों से ऐसा होता आया था, मगर ख़दीजा पहली मरतबा यहाँ आई थी। उसे मेले में कोई रुचि नहीं थी, वो तो यहाँ भीड़ में कुछ खोने आई थी।

मज़ार के आसपास लाचार अंधे, लूले, लँगडे़ और गूंगे फ़कीरों ने अपनी फटी हुई दरियाँ और मैली गोनिया बिछा दी थीं। अपने सामने खाने के बरतन फैलाये वे विचित्र-विचित्र आवाज़ें निकाल रहे थे। इतने सारे लोगों के हाथ-पैर कटे हुए देखकर ख़दीजा को लगा जैसे पूरी कौम लँगड़ी और गूंगी हो गई हो। उसने अपने आप को लम्‍बे सफ़ेद बुर्के़ में अच्‍छी तरह से टाँक लिया। उसकी घबराहट ख़त्‍म हो रही थी। वो सब उस जैसे थे, उससे भिन्‍न नहीं थे। वो उनमें से एक थी। मोतिया के गजरों, अगरबत्तियों और बिरयानी की मिल-जुली सुगंध उसकी नाक में घुसी तो उसकी भूख चमक उठी। यहीं उन लोगों की लाइन में लग जाये, खाना बँटने ही वाला है- वो फ़कीरों की लाइन में उकड़ूं होकर बैठ गई। फ़ज़लू भी झट से माँ के कंधे से लटक कर बैठ गया। उसने माँ को याद दिलाया- “मगर हमारे पास प्‍याला नहीं है- बिरयानी कैसे खायेंगे?” कुछ खाने के लिये प्‍याला भी कितना ज़रूरी है। उसने चारों तरफ़ देखा, पास बैठे हुए एक टाँग वाले फ़क़ीर ने अपना तांबे का प्‍याला उनके आगे बढ़ा दिया।

“ये ले लो, खाना खाकर वापस कर देना। मेरे पास एक और भी है।” फ़ज़लू ने फ़कीर को प्‍यार से देखा- “कितना अच्‍छा है ये!”

उसने जीवन में पहली बार इतनी स्‍वादिष्‍ट और इतनी ज़्‍यादा बिरयानी खाई थी। उसने चारों तरफ देखा तो हर कोई खाने पर टूटा पड़ा था जैसे वे सब ज़िन्‍दगी भर के अभावों का बदला ले रहे हों। आखिर माँ हर दिन यहाँ क्‍यों नहीं आ जाती? उसने सोचा कैसी अच्‍छी जगह है, और ये कैसे अच्‍छे लोग हैं जो माँ से बिना काम कराये यूँ मुफ़्‍त में ख़ाना दे देते हैं। मेले के साथ-साथ उसका सर भी भारी हो रहा था और उसे बड़े ज़ोरों की नींद आ रही थी। माँ से लगकर वो ऊँघने लगा-मगर आँखें मूँदे-मूँदे माँ को छूकर देख लेता, मौजूद है या कहीं चली तो नहीं गई। चंद पलों में वो बेख़बर सो रहा था। ख़दीजा ने उसे ज़मीन पर लिटा दिया- खाने की एक पोटली बनाकर उसके पास रखी और खुद ... अपने आपसे बोली, जैसे पास वाले फ�कीर को सुनाना चाहती हो। “ज़रा पीर साहेब से मुराद माँग लूँ- अभी आई।” फ़ज़लू ने कसमसा कर आँखें खोलीं तो वह बोली-“आराम से सो जा मैं अभी आई।”

“जल्‍दी आना अम्‍माँ”- वो नींद में बड़बड़ाया।

ख़दीजा का दिल एलार्म बन कर चीख़ रहा था जैसे अभी सीने की दीवार चीरकर बाहर निकल पड़ेगा। वो तेज़ तेज़ क़दमों से मेले से बाहर निकली और फिर तकरीबन वो भागने लगी। कहीं फ़ज़लू जाग न जाये- बाजे ताशे की आवाज़ उसका पीछा कर रही थी। वो पीछे मुड़ मुड़कर देख रही थी। एक गली से दूसरी गली में छिपती-छिपाती वो शरफू के पास जा रही थी। आखिरी बार उसने मुड़कर पीछे देखा और मुँह में बड़बड़ाई।

“पीर साहेब, मियाँ साहेब, मेरे फ़ज़लू की देखभाल करना।” बड़े-बड़े आँंसू आँखों के पोर भिगो गये- उसने हाथों से आँंखों को मला।

चारपाई पर पड़ी हुई गुलाबी गोट के किनारे वाली साड़ी, चाँदी का जेवर और आईना उसका इंतज़ार कर रहे थे। शरफ़ू ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। एक सप्‍ताह कितना अच्‍छा लगा। खुशियाँ ही खुशियाँ, कोई फ़ज़लू को पूछता तो झट से कह देती- अपनी मौसी के गाँव गया है। बस आ जायेगा। और फ़ज़लू... दिन में न जाने कितनी बार चला आता, आईने में अपना मुँह देखते, रोटियाँ बेलते, झाडू़ देते और गायों को भूसा डालने वो चुपके से चला आता...।

“माँ-माँ, तू मुझे क्‍यों छोड़ आई? माँ, मुझे अकेले डर लगता है... माँ..” वो सर झटक-झटक कर इस ख़याल से पीछा छुड़ाती। दिन में जाने कितनी बार... दिल में छुपी हुई फाँसों की तेज़ी उसका जिगर काट काट देती। हाथ काम करते-करते रुक जाते- वो रोहाँसी हो जाती। लेकिन उस रात सारी की सारी फाँसें दिल के आर पार हो गइर्ं। जिस रात उसने शरफू के साथ एक नई लड़की को देखा- वो उससे ज़्‍यादा कमसिन और उससे ज़्‍यादा सुन्‍दर थी। माँ-बाप ने उसे शरफू के हाथ बेच दिया था। या वो खुद चली आई थी उसे कुछ नहीं मालूम था।

वो नई नवेली दुल्‍हन की तरह लजाती लाल कपड़े पहने, होंठों पर गुलाबी गहरा रंग लिये,आरसी, कंगन और चाँदी के गहनों से लदाफदी उसे यूँ देख रही थी जैसे कह रही हो, “अब तुम्‍हारा यहाँ क्‍या काम भला...।” और शरफू ने इस ख�ुशी में इतनी पी ली थी कि वो अपने होश हवास में नहीं था। “ये मेरी बीवी है... इससे ... मैंने निकाह कर लिया है।” वो टूटे फूटे शब्‍द जोड़ रहा था। “अब तू अपने फ़ज़लू के पास चली जा... वो बहुत याद... आता था ना .... तुझे।” वो कह रहा था।

ख़दीजा के तन का सारा ख़ून सर-सर करता उसके सर में चढ़ गया.. “तू.. तू अपने होश हवास में नहीं है। तेरे लिये मैंने अपने बच्‍चे को खो दिया।” वो अटक-अटक कर कह रही थी। “मैं तेरा क़तल कर दूँगी। तेरा खून पी जाऊँगी, कमीने ज़लील।”

जवाब में शरफू के कहकहे उसके कान फाड़ने लगे। वो जितना चिल्‍लाती चीखती, शरफू उतना ही अधिक ज़ोरों से कहकहे लगाता। कहकहे बढ़ते रहे और नई नवेली दुल्‍हन मुस्‍कुराये जा रही थी। कोठरी में उसका दम घुटने लगा तो वो घबरा कर बाहर निकल आई। जब भ्रम टूट जाये तो क्‍या रह जाता है? उसे यूँ लगा जैसे वो मिट्टी की गुजरिया है, जिसकी सुनहरी मिट्टी जगह-जगह से झड़ गई है और उसे मोखल (ताक़) से उठाकर घूरे पर फेंक दिया गया है और उसकी जगह नई गुजरिया ने ले ली है। लोग ठीक कहते थे कि शरफू किसका हुआ जो तेरा होगा- इतना जल्‍दी न कर लेकिन ज़िन्‍दगी भर का अभाव और कच्‍ची उम्र की नातजु़र्बेकारियाँ उसका आँचल कस कर पकड़े थीं- शरफू उसके मस्‍तिष्‍क पर आंधी तूफान बनकर छा रहा था।

कहकहे रुक गये थे और हर तरफ� दम घोंटने वाला सन्‍नाटा छा गया था। केवल सुहाग की चूड़ियों की छनक और पायल की दबी-दबी चीखें उसका दिल मसोस रही थीं। वो बाहर खुले आसमान तले गाय के खूंटे के पास चुपचाप बैठ गई। हवा दम साधे थी और घने पीपल के पत्ते ख़ामोश थे। गहरे काले आकाश में दूर एक कोने में टंगा हुआ एक तारा उसके साथ रो रहा था। क्‍या उस आसमान पर ईश्‍वर रहता है? क्‍या वो किसी के साथ इंसाफ करता है- क्‍या बड़े पीर ने मेरे फ़ज़लू की देखभाल की होगी? वो न जाने कहाँ होगा। मैं उसे किधर ढूँढूँ अब? गाय ने जुगाली करते करते सर उठाकर ख़दीजा को हसरत से देखा, और उसके गले में पड़ी घण्‍टियाँ बज उठीं- दोनों में कितनी समानता थी। दोनों बेजु़बान थीं और दोनों को ही विरोध करना नहीं आता है। दुख की एक गम्‍भीर चादर उनके सरों पर तनी हुई थी। दोनों बंधी हुई थीं और बगैर आँसुओं के रो रही थीं। दो सप्‍ताह के बिछड़े को माँ से दूर शरफू ने सिर्फ इसलिये बाँध दिया था कि वो माँ का सारा दूध न पी सके और... माँ उसे बड़ी हसरत से मुँह उठाकर उठाकर देखती और हृदय विदारक आवाजें निकलती रहती मगर उस घर में सब बहरे थे, कौन सुनता? सारी रात वो गाय के खूंटे से लगी बैठी रही, जैसे पत्‍थर की हो गई हो। सुबह की पहली अज़ान कान में पड़ी तो उसने झट आँगन में बने चूल्‍हे के ऊपर खूंटी पर टंगे बुर्कें को उतारा और सर पर डालकर तेज़ी से बाहर निकल आई। वो तेज़ी से पीर साहब के मज़ार की तरफ़ जा रही थी। उसकी टाँगों में बला की शक्‍ति आ गई थी। फ़ज़लू को ढूँढने निकली थी।

पीर साहब की सुरक्षा में जो देकर आई थी, वहीं कहीं होगा, जायेगा कहाँ? आख़िर मिल जायेगा, ज़रूर मिल जायेगा। वो उससे बहुत नाराज़ होगा। वो उसे मना लेगी, “मेरे बेटे, मेरे लाल, मैं तुझे अब अपने से कभी अलग नहीं करूँगी।”

मज़ार तक पहुँचने वाले पल सदियों पर ठहर गये थे- सुबह आते आते कितनी देर लगी थी। उसके दिमाग़ में आंधियाँ चल रही थीं। दिल जैसे फटा जा रहा था। मज़ार पर पहुँचकर वो बेदम सी हो गई।

“पीर साहेब! बडे़ पीर साहेब!!” वो कलेजा फाड़ कर चिल्‍लाई- “ मेरा फ़ज़लू कहां है?” वातावरण में ख़ामोशी के सिवा कुछ न था। “फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है? फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है रे?” उसने अपना सर क़ब्र पर ज़ोर से टकराया। सर लहूलुहान हो गया- “बता, बता मेरा फ़ज़लू कहाँ है? मैं सब कुछ तेरी भेंट चढ़ा दूँगी, मेरे बच्‍चे को मुझे वापस दिलवा दे।” उसने अपने हाथों से काँच की लाल चूड़ियाँ उतारीं और बड़ी श्रद्धा से कब्र पर डाल दीं- फिर उसने अपना बारीक गुलाबी दोपट्टा गले से खींचकर मज़ार पर फेंका- फिर अपनी शलवार, अपनी कमीज़ उतार फेंकी और छोटे-छोटे सारे कपड़े एक-एक करके कब्र पर ढेर लगा दिये- “ ये सब तेरी भेंट सब कुछ ले ले। मेरा फ़ज़लू मुझे वापस दे दे। तेरे लिये कुछ मुश्‍किल नहीं।” वो पागल अन्‍दाज़ में इतने ज़ोर से चिल्‍लाकर रोई कि पीपल के नीचे सोया हुआ मुजबिर (पुजारी) जाग पड़ा और दौड़ा चला आया।

“क्‍या हुआ? तू किस को तलाश कर रही है? अरे... अरे ये तू क्‍या कर रही है?” उसने अपनी आँखें मलमल कर देखा हवा के तेज़ झोकों ने सारे पत्ते झाड़ दिये थे और चन्‍दन की लुन्‍जमुन्‍ज डाली की तरह उसका जिस्‍म सुबह की हवा में कँपकँपा रहा था। उसने जल्‍दी से अपने काँधों की फटी चादर उतारकर ख़दीजा के बदन पर डाल दी।

“मुझे नहीं मालूम तुझे क्‍या दुख है, तुझ पर क्‍या गुज़री है? मगर ... मगर ये न कर बहन, कपड़े पहन ले, हिम्‍मत से काम ले... मैं... मैं तेरे हाथ जोड़ता हूँ। दो वक़्‍त की रोटी मिल जाती है... वो भी छिन जायेगी।”

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