शनिवार, 29 दिसंबर 2012

फहीम अख़्तर की कहानी - प्यासी नदियाँ

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प्‍यासी नदियाँ

अमन को शहर में आये हुए कोई एक हफ़्‍ते से ज़्‍यादा समय हो चुका था वो एक होटल में ठहरा था। लेकिन उसे एक ऐसे घर की तलाश थी जहाँ रहने के साथ-साथ खाने-पीने का भी प्रबंध हो। प्रति-दिन की तरह वो आफ़िस से आने के बाद चाय-पीने के लिये पास ही स्‍थित रामू की चाय की दुकान पर चला आया और “अरे रामू एक कप चाय लाना”। उसने चाय का आर्डर दिया

“अभी लाया साहब” रामू ने आवाज़ लगाई।

“ये लीजिये बाबूजी, आज तो कड़ाके की चाय बनाई है”। अपने अंगोछे से चेहरे का पसीना पोंछते हुए बत्तीसी का प्रदर्शन करते हुए, रामू कुछ कहते हुए रुक गया। जैसे ही अमन ने चाय की चुस्‍की ली रामू ने कहा-

“आप को पसंद आई साहब?” फिर जैसे कुछ याद आया हो, माथे पर हाथ रखते हुए कहा- “अरे हाँ, मैं तो भूल ही गया कुछ रहने का प्रबंध हुआ बाबूजी?” अमन ने मायूसी से जवाब दिया, “नहीं अब तो लगता है कहीं और जाना पड़ेगा हम तो चाहते थे कि तुम्‍हारे हाथों की चाय पीते रहें। इसी क्षेत्र में कोई उचित जगह मिल जाती तो अच्‍छा होता। अरे हाँ कल तुम किसी मोहन बाबू के बारे में बता रहे थे। तुमने उनसे बात की?” “नहीं बाबूजी आज वो आयेंगे तो मैं उनसे ज़रूर बात करूँगा वो बहुत शांत और सीधे आदमी हैं वो बच्‍चों को बहुत पसंद करते हैं। जब वे यहाँ आते हैं तो मोहल्‍ले के बच्‍चे उनका पीछा नहीं छोड़ते।”

दूसरे दिन अमन थका हारा आफ़िस से आया और सीधे चाय की दुकान पर चला गया। उसने जैसे ही रामू को आवाज़ दी, राम तुरंत हाज़िर हो गया और कहने लगा- ‘बाबूजी, आज तो दो चाय का आर्डर देना पड़ेगा, आज आपका काम बन गया। मोहन बाबू आये थे मैंने उनसे आपके बारे में बात की थी- उन्‍होंने आप को बुलाया है।' उसने अंगोछे का कोना खोल कर उसमें से मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और अमन की ओर बढ़ाते हुए कहा, “यह उनका पता है”।

अमन की बाँछे खिल गईं अचानक खुशी के मारे शरीर लहराने लगा। उसने खुशी से झूमते हुए कहा अब तो एक गरमा-गरम चाय पिला दो। रामू दौड़ा-दौड़ा गया और एक कप चाय ले आया और बोला “ये लो बाबूजी भगवान ने चाहा तो आज आपका काम हो जायेगा”। अमन ने जल्‍दी-जल्‍दी चाय ख़त्‍म की और जेब से पैसे निकालकर रामू को दिये और कहा “बाकी के पैसे तुम रख लो।” अमन ने पता दोबारा पढ़ा। शतुरमुर्ग़ की तरह गर्दन घुमा कर इधर-उधर देखा और कहा “रामू ये जगह तो यहाँ से ज़्‍यादा दूर नहीं है।”और तेज़ी से उसी दिशा में रवाना हो गया थोड़ी दूर की यात्रा के बाद ही मोहन बाबू का घर मिल गया। उसने द्वार पर दस्‍तक दी तभी उस की निगाह चिक के परदे की ओर गई, उसने देखा कि तीलियों से कोई औरत उसे देख रही है। थोड़ी देर बाद ही दरवाज़ा खुला और एक औरत ने सिर निकाल कर उससे पूछा। “कहिये”, अमन ने सादगी से कहा। “जी मेरा नाम अमन है मुझे मोहन बाबू से मिलना है”। औरत ने पीछे हटते हुए कहा “वो तो बाज़ार गये है। आप अन्‍दर बैठिये वो आते ही होंगे।”

अमन उस औरत के पीछे चलने लगा और सोचने लगा कि मोहन बाबू की बेटी होगी उस औरत ने अमन को कमरे में बिठाया और पंखा चला दिया।

“आप आराम से सुस्‍ताइये मैं अभी चाय लाती हूँ” उसने अमन से कहा फिर थोड़ा चलने के बाद पलटकर अमन से पूछा, “आप चाय लेंगे या ठण्‍डा?”

अमन ने संकोच से जवाब दिया, “चाय, चलेगी”। थोड़ी देर बाद अमन चाय की चुस्‍कियाँ ले रहा था। तभी उसे दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई दी शायद मोहन बाबू आ गये थे, उन्‍होंने उस औरत को आवाज़ दी, “अर्चना, इधर आना, देखो मैं तुम्‍हारे लिये क्‍या लाया हूँ?”

“इधर आ जाइये, कोई आप से मिलने आये है।” उस औरत यानि अर्चना ने वहीं से आवाज़ दी। मोहन बाबू सीध्‍ो कमरे में आ गये। अमन एक वृद्ध व्‍यक्‍ति को देखते ही खड़ा हो गया, और हाथ जोड़ते हुए कहा, “नमस्‍कार मोहन बाबू” मोहन बाबू ने भी हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया, “नमस्‍कार तो आप है अमन, जिनको कमरा चाहिये।”

“जी हाँ, मैं ...” मोहन बाबू ने बात काटते हुए कहा,

“हाँ, मुझे रामू ने आपके बारे में बताया था। आप बैठे मैं अभी आया।” यह कह कर वे अन्‍दर चले गये अमन सोचने लगा। मोहन बाबू पचास वर्ष के तो होंगे ही और वो अर्चना... राम बाबू की चुटिया तो साफ़ थी लेकिन बालों की झालरें लटकी थीं। आँखों के कोनों पर मकड़ी का जाल बुनना आरंभ हो गया था। उनका क़द लम्‍बा था जिसके कारण तोंद का फैलाव नज़र नहीं आता था। उनकी आवाज़ में मिठास तो नहीं थी मगर कोमलता थी और अर्चना की लम्‍बाई ज़्‍यादा नही थी। हाँ बाल लम्‍बे और आँखें नशीली थीं उनमें प्रेम की चाहत नही थीं, उसके यौवन में बेबसी नहीं थी बल्‍कि जागरूकता थी। मुख पर मुस्‍कराहट का पर्दा था। अभी अमन इन्‍हीं विचारों में था कि मोहन बाबू की आवाज़ ने उसे चौंका दिया, “अभी आप कहाँ रह रहे हैं?” उसने कहा,ब “फ़िलहाल तो मैं अपने आफ़िस के एक कर्मचारी के एक कमरे में रह रहा हूँ उसकी बीवी बच्‍चे अपने मैके गये हुए हैं।”

“आप रहने वाले कहाँ के हो?” मोहन बाबू ने पूछा अमन ने कहा, “वैसे तो मैं मिशनरी की चार दीवारी में आँख खोली है और वहीं से शिक्षा भी प्राप्‍त की है। माँ-बाप के विषय में इतना ही मालूम है कि अगर वे होते तो उन के साथ ही रहता। बस, लोग कहते हैं कि किसी ने मुझे गिरजाघर के बाहर छोड़ दिया था बस यही अपनी कहानी है।”

मोहन बाबू यह सब सुन कर उदास हो गये- अपने आप को सँभालने हुए उन्‍होंने कहा- “दुनिया दुख भरी कहानियों से भरी पड़ी है। खैर, आइये में आपको आपका कमरा दिखा दूँ।”

“अंधा क्‍या चाहे दो आँखें। कमरा देखते ही उसकी बांछें खिल गईं मोहन बाबू ने मुस्‍कराते हुए अमन से पूछा-

“लगता है, कमरा आप को पंसद आ गया है।”

“जी हाँ मुझे पंसद आया।” उसने जवाब दिया। उन्‍होंने पूछा- “शराब वग़ैरा तो नहीं पीते हो ना?” उसने हँसी दबाते हुए कहा “अगर कमरा नहीं मिला तो शुरू करना पड़ेगी।” दोनों ठहठहा लगाकर हँसने लगे। तभी घड़ी देखते हुए उसने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, “अच्‍छा मोहन बाबू बात पक्‍की हो गई मैं चलता हूँ। मुझे आफ़िस का कुछ काम निपटाना है।” तभी अर्चना आ गई उसने अमन से कहा “आप रुकिये मैं आप लोगों का खाना-परोसने जा रही हूँ।” अमन कुछ कहता इससे पहले मोहन बाबू कह उठे - “जी हाँ आपको मेरी पत्‍नी की बात माननी ही होगी।”

पत्‍नी का शब्‍द सुनकर अमन को धक्‍का सा लगा फिर भी उसने कहा- “जी मैं खाना खा कर आया था। कल से आप का साथ ज़रूर दूँगा, अच्‍छा नमस्‍कार।”

और वो निकल गया घर आकर बिस्‍तर पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा मगर खुशी के मारे उसे नींद नहीं आई।

दूसरे दिन अमन आफ़िस से जल्‍दी आ गया और अपना सामान लेकर मोहन बाबू के घर आ गया और अपने कमरे में सामान लगा ही रहा था कि अर्चना की आवाज़ ने उसे चौंका दिया- “आप मटन खाते हैं? और वैसे भी आप को खाने में क्‍या पसंद है?”

“जो आप को पसंद हो वही मेरी पसंद होगी।”

अमन ने कहा अर्चना उसका जवाब सुनकर जैसे ही पलटी कि अमन ने उससे पूछ लिया- “अगर आप बुरा न माने तो आपका नाम पूछ सकता हूँ?”

“जी मेरा नाम अर्चना है।” शरमाते हुए अर्चना ने कहा और वहाँ से चली गई।

खाने की टेबल पर तीनों खाना खा रहे थे वातावरण में ख़ामोशी छाई थी, मोहन बाबू ने अमन से पूछा-

“तुम्‍हारी उम्र कितनी है?”

“ये ही कोई इक्‍कीस-बाइस साल के बीच होगी क्‍यों?”

“नहीं, तुम उम्र में कम लगते हो।” मोहन बाबू ने कहा-

अमन ने भोजन ख़त्‍म किया और शुभरात्रि कहकर अपने कमरे में चला आया।

दूसरे दिन आफ़िस जाते समय जैसे ही अमन कमरे से बाहर निकला, अर्चना सामने आ गई। दोनों कुछ देर के लिये एक दूसरे को देखते रहे फिर अर्चना ने पूछा-

“आज आप कितने बजे आयेंगे?”

अमन ने घड़ी बाँधते हुए कहा “यही कोई 6 बजे क्‍यों?”

“आज चिकन बना रही हूँ आप को पसंद है ना?” अर्चना ने कहा। अमन ने गर्दन हिलाकर ‘हाँ' में जवाब दिया और निकल गया। शाम को मोहन बाबू अपने कमरे में सामान ठीक कर रहे थे कि अर्चना ने कहा।

“ए जी सुनते हैं। ये अमन अब तक क्‍यों नहीं आया?”

“अरे भई, तुम यूँ ही परेशान हो रही हो आफ़िस के काम में उलझ गया होगा।” मोहन बाबू ने कहा तभी अमन आ गया- “ये, लो आ गया, भई अमन अभी हम तुम्‍हारे बारे में ही बातें कर रहे थे।”

अमन ने कहा “खैरियत?” मोहन बाबू ने कहा “हाँ भई सब कुशल मंगल है। तुम हाथ मुँह धोकर यहाँ आ जाओ।” अमन अपने कमरे में चला गया।

खाने की टेबल पर सब खाने में व्‍यस्‍त थे अमन ने ख़ामोशी तोड़ते हुए अर्चना से कहा, “आप खाना बहुत अच्‍छा पकाती है।”

अर्चना ने कहा “आपको पसंद आया?”

अमन ने कहा “बहुत।”

तभी मोहन बाबू बोल उठे “भई, शादी से पहले हमारी एक ही शर्त थी कि लड़की को खाना बनाना आना चाहिये।”

अमन ने कहा “वाकई आपकी शर्त वाजिब थी।” अर्चना अमन की बात सुनकर झेंप गई। मोहन बाबू खाना ख़त्‍म करके अपने कमरे में चले गये। अमन जूठे बर्तन उठाने में अर्चना की मदद करने लगा बर्तन उठाते हुए उसने कहा, “आपने नोट किया मोहन बाबू आज बहुत ख़ामोश से थे। प्‍लेटें अमन के हाथों से लेते हुए कहा, “वो अक्‍सर ऐसे ही ख़ामोश हो जाया करते हैं।” अमन ने जिज्ञासा भरे अंदाज़ में पूछा-

“अरे हाँ आपके बच्‍चे....”।

अर्चना के मुख पर बेबसी के भाव आ गये उसने बात का विषय बदलते हुए अमन से सवाल किया-

“क्‍या तुम शादीशुदा हो?”

“अभी तो मैं खुद बच्‍चा हूँ।” मुस्‍कुराते हुए अमन ने कहा इस तरह समय का पहिया चलता रहा दिन महीनों में बदलते रहे और एक साल की मुद्‌दत ख़त्‍म हो गई। अमन ने अपने रवैये से दोनों के मध्‍य एक स्‍थान बना लिया। धीरे-धीरे परायापन अपनत्‍व में बदलने लगा और अमन उस घर का एक मेम्‍बर बन गया। मोहन बाबू अक्‍सर अपने आफ़िस के कामों से शहर के बाहर जाते थे और कभी-कभी दो-दो तीन-तीन दिनों तक घर नहीं आ पाते थे। मोहन बाबू जब शाम को नहीं आये तो अर्चना समझ गई कि ज़रूर वो आफ़िस के काम से दौरे पर गये होंगे। अमन अपने कमरे में लेटा हुआ कोई किताब पढ़ रहा था कि उसे वर्षा की टपटप सुनाई दी और साथ ही बादल की गरज सुनाई दी। बूंदों की रिमझिम ने तेज़ी पकड़ ली थी और फिर मूसलाधार बरसात शुरू हो गई। अमन को बादलों की गरज और बिजली की कड़क ने कुछ बेचैन सा कर दिया, वो किताब को रखकर खिड़की की ओर लपका जो आँगन की तरफ़ खुलती थी। अंध्‍ोरे की वजह से उसे कुछ नज़र नहीं आया, वो आँगन का दरवाज़ा खोलकर वर्षा की रिमझिम का आनन्‍द ले रहा था। कि अचानक बिजली चमकी उसने देखा एक कोने में अर्चना खम्‍बे से लगी खड़ी थी और बरसात का पानी उसके बदन को भिगो रहा था। कपड़े शरीर से चिपके हुए थे। बिजली की चमक में उसने देखा कि उसका यौवन भी निखर आया था। उसे अनुभव होने लगा कि जो बिजली को चमक अर्चना के तन पर पड़ रही है वो अमन के शरीर में फैल रही है। अमन बुत बना ये दृश्‍य देख ही रहा था कि अर्चना की नज़र अमन पर पड़ गई और वो सहमती शरमाती अपने कमरे में भाग गई। वो अपने कमरे में जाने के बजाये आँगन में उसी जगह खड़ा हो गया जहाँ अर्चना खड़ी थी। उसके तन में आग सी लगी हुई थी, वो कुछ कहना चाह रहा था मगर उसके होंट सिले हुए थे वर्षा में भीगते हुए भी उसका शरीर जल रहा था। वो खुले में आ गया और वर्षा में भीगने लगा। थोड़ी देर बाद जब उसे महसूस हुआ कि अब उसके शरीर की गरमी समाप्‍त हो गई है, तब वो अपने कमरे में आकर गीले कपड़ों में ही बिस्‍तर में घुस गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी आँख लग गई।

इस घटना के कुछ दिन बाद की बात है अमन अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसे बूंदा-बांदी की आवाज़ सुनाई दी। उसकी हिम्‍मत ही नहीं हुई कि वो आँगन का दरवाज़ा खोले, तभी उसे याद आया कि मोहन बाबू तो घर में ही है वह उठकर उनके कमरे की ओर आया। कमरे में प्रवेश करते ही वह आश्‍चर्य चकित रह गया उसने देखा, शराब की एक खाली बोतल ज़मीन पर लुढ़की हुई है। दूसरी बोतल से मोहन बाबू अपना ग्‍लास भर रहे थे वो भी आधी ख़ाली हो चुकी थी जैसे ही मोहन बाबू की नज़र अमन पर पड़ी वो उछल पड़े झेंपे हुए अन्‍दाज़ में दबी ज़बान से बोले-

“आओ, आओ, अन्‍दर आओ अरे। हाँ, तुम तो पीते नहीं। वैसे में भी पीता नहीं लेकिन मस्‍तिष्‍क में लगी आग को बुझाने के लिये में पी रहा हूँ।” और ये कहते कहते वो रोने लगे, ओर एक हारे हुए इंसान की तरह कहने लगे।

“तुम से क्‍या छिपाना अर्चना और मैं पति-पत्‍नी तो ज़रूर हैं परन्‍तु केवल नाम के। अर्चना को देखकर मैं निराशा बढ़ा सकता हूँ, आँसू बहा सकता हूँ, आज तक मैंने उसे वो ख़ुशी नहीं दी, जो एक औरत का अधिकार होती है। परन्‍तु उस भली मानस ने आज तक किसी को इसका एहसास ही नहीं होने दिया कि कमी मुझमें है। मैं तो अब लोगों के ताने सुन-सुनकर तंग आ चुका हूँ उसे लोग बांझ समझते हैं फिर माथे पर हाथ मारते हुए कहने लगे, हे भगवान ऐसी ज़िन्‍दगी से तो मौत अच्‍छी है।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे हाथ जोड़कर अमन से कहने लगे।

“अमन, मैं जानता हूँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ उसे सुनकर विश्‍वास नहीं होगा मेरी तुमसे एक ही विनती है कि आज की रात की प्‍यासी ज़मीन को तृप्‍त कर दो।”

अमन यह सुनते ही बुरी तरह से चौंक गया। उसने तेज़ी से कहा, “ये आप क्‍या कह रहे है? आपका दिमाग तो नहीं चल गया?”

“हाँ कुछ ऐसी ही बात है।” मोहन बाबू हाथ जोड़कर और गिड़गिड़ा कर अपनी मजबूरी की भीख माँग रहे थे। अमन के कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्‍या करे उसे मोहन बाबू पर गु़स्‍सा भी आ रहा था मगर उनकी ये हालत देखकर तरस भी आ रहा था, वो ज़िन्‍दगी के कई इम्‍तिहानों से गुज़र चुका था, मगर आज वो एक विचित्र मोड़ पर खड़ा था जहाँ वह स्‍वयं को बहुत बेबस अनुभव कर रहा था उसे अपने कालेज की वह घटना याद आ गई जब वह अपने एक प्रोफेसर को अपना नोट दिखाने गया था। उसे बड़ा आश्‍चर्य हुआ जब उसने प्रोफेसर को नशे में धुत पाया। अमन को देखकर वो क्रोध में चिल्‍लाने लगा, फिर पास आ कर उससे लिपट कर रोने लगा। अमन जो सहमा हुआ था वह स्‍वयं को एक ऐसे जाल में जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था, जहाँ से न तो वह भाग सकता था नहीं वहाँ ठहर सकता था। जब प्रोफेसर ने रोना बंद किया तो अमन से कहने लगा, मुझे मालूम है तुम यहाँ नोट दिखाने आये हो, मगर मैं तुम्‍हें आज कुछ बताने जा रहा हूँ, क्‍योंकि तुम्‍हें मालूम है कि मैंने बुढ़ापे में शादी की है लेकिन किसी को इस बात का विश्‍वास नहीं है कि मेरी औरत बांझ है, वह माँ नहीं बन सकती। यह कहकर वह फिर रोने लगे “तुम्‍हें मेरी बात पर विश्‍वास नहीं है तो तुम स्‍वयं आजमा कर देख लो।”

ये शब्‍द सुनते ही अमन अपने नोट वहीं छोड़कर भाग खड़ा हुआ। अमन अभी इन्‍हीं विचारों में डूबा था कि उसे मोहन बाबू की आवाज़ ने चौंका दिया।

“क्‍या सोचने लगे। अमन मुझ पर यह उपकार कर दो मैं तुम्‍हारा जीवन भर एहसान मंद रहूँगा।” और वे यह कहते हुए अमन के पैरो में गिर गये। अमन बुत बना खड़ा रहा वह कुछ कहना चाहता था मगर उसके होंटों को जैसे किसी ने सी दिया था, वो भागना चाहता था मगर उसे महसूस हो रहा था जैसे किसी ने उसके पैरों में बेड़ी डाल दी हो। उसके दिमाग में बरसात वाला दृश्‍य बार-बार डोलने लगा। अर्चना का बरसात में भीगा यौवन से भरपूर बदन यह दृश्‍य उसके मस्‍तिष्‍क के एक कोने में दबा पड़ा था जो मोहन बाबू के खुले निमंत्रण से उभरकर सामने आ गया। उसके शरीर में आग सी लग गई वह वहाँ से जाना नहीं चाहता था क्‍योंकि उसको एक घर का सुकून हासिल हो गया था। जिसका अब वो अभ्‍यस्‍त (आदी) हो चुका था। मोहन बाबू उस पर अत्‍यधिक मेहरबान थे। हर पल उसका ख़याल रखते, अमन उनकी मदद करना अपना फ़र्ज़ महसूस करने लगा उसे लगने लगा कि उनकी सहायता करना उसकी ज़िम्‍मेदारियों में शामिल है। फिर प्रोफेसर के शब्‍द उसके कानों में गूँजने लगे “तुम्‍हें विश्‍वास न हो तो स्‍वयं आज़मा कर देख लो।” तभी मोहन बाबू उसका हाथ पकड़कर अर्चना के कमरे की तरफ़ ले जाने लगे। अमन उनके मुँह की शराब की बदबू सहन नहीं कर पा रहा था वह घबरा रहा था। अर्चना के कमरे तक लाकर उन्‍होंने अमन का हाथ छोड़ दिया। अर्चना के कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था बत्ती बुझी हुई थी। मगर बाहर से हल्‍की रोशनी खिड़कियों की दरार से रेंगती हुई अन्‍दर पहुँच रही थी.. जब वो कमरे में दाख़िल हुआ तो उसे अपने कदम एक एक मन के प्रतीत हो रहे थे। वह पलंग के एक कोने में बैठ गया, उसका चेहरा पसीने से तर हो चुका था। हाथ कँपकँपा रहे थे, ज़बान सूखकर कांटा हो चुकी थी। अर्चना दूसरी ओर मुँह किये लेटी थी। उसने थोड़े इन्‍तिज़ार के बाद बिना करवट बदले कहना शुरू किया-

“आप आ गये? कितने देर से इंतज़ार कर रही थी। कई दिनों से एक बात कहना चाह रही थी। लेकिन हिम्‍मत ही नहीं पड़ रही थी।”

अमन और असमंजस में पड़ गया। उसके मुँह से आवाज़ ही नहीं निकल पा रही थी। जैसे तालू में किसी ने काँटे बिखेर दिये हों, तभी अर्चना की आवाज़ उसके कानों से टकराई।

“आप ख़ामोश क्‍यों हैं? आज आप ख़ामोश भी रहेंगे तो भी में अमन के बारे में आपसे कुछ बातें ज़रूर करूँगी।”

अमन यह सुनकर और सिकुड़ गया अब तो जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं रह गई थी। अर्चना की आवाज़ आई, वह कह रही थी - “सुनते हैं? क्‍यों न हम लोग अमन को गोद ले लें, वह आप को भी पसंद है और मुझे भी। ज़िन्‍दगी का शून्‍य (खालीपन) भी भर जायेगा, और हमारा परिवार भी पूरा हो जायेगा।”

अमन यह सुनते ही खड़ा हो गया उसके पैरों तले ज़मीन निकल गई। वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया

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