शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक की गीति कविता/ है शीर्षस्थ आज टुच्चापन

बर्र-ततैयोँ जैसे

डंक मार जाता है

यह निष्ठुर-निराकार

पवन हिमानी.

 

ज़ेहन मेँ अँटी पड़ीँ

सोचोँ की झरबेरियाँ,

पहर-दर-पहर चीखेँ

क्षोभ के सियार ;

 

ठिठुरे संकल्पोँ का

लोहू गर्माने को

सो रहे अलावोँ मेँ

जागते अंगार ;

 

प्रश्नाकुल ख़ामोशी

असर-पसर जाती है

ओढ़े उम्मीदोँ की

कथरी पुरानी.

 

दुधमुँह मंसूबोँ के

मरभुखहे पिल्ले

किस्मत की कुतिया की

छातियाँ चिंचोड़ते ;

 

बैठकर मुँड़ेरोँ पर

खद्दरधारी कौवे

सुबह और सूरज की

अफवाहेँ छोड़ते ;

 

कोहरे के कर्फ्यू मेँ

नज़रबंद सूरज है,

साँसोँ की सड़कोँ पर

हाँफे हलकानी.

--

devendra.mahroom@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. bhaw gambhir rachana se kafi behtar mahsus kar raha hun sir. nischit rup se ye bat charitarth ho rahi hai ki--'' dekhan me chhot lage, ghaw kare gambhir'
    Manoj'Aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  2. Dharmendra Tripathi6:58 pm

    Aapki kavitayen aur aapka vyaktitva ek nayi prerna ka sanchar karta hai. isi tarah aap likhte rahen yahi subechchha hai. aapki rachnaye urja ka sanchar karti hain.

    उत्तर देंहटाएं

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