एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - तुम कहाँ हो?

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तुम कहाँ हो ?

नीलोत्पल ने मुझसे पूछा “संत लोग कहते हैं कि यह संसार माया है । मिथ्या है । लेकिन जो हमारे सामने प्रत्यक्ष है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है” ? मैंने कहा “ठीक ही तो कहते हैं । संसार सत्य है । यह तो आभास मात्र है । वस्तुतः यह मिथ्या ही है” ।

मैंने आगे कहा “ हम और आप आमने-सामने प्रत्यक्ष बैठे हैं । लेकिन वस्तुतः हम तो हैं ही नहीं” ।

यह सुनकर वह कुछ बोला नहीं । शायद वह कुछ समझ नहीं पा रहा था । इसलिए उसे और समझाने की गरज से मैंने उसके हाथ की ओर इशारा करके पूछा “यह क्या है” ? जबाब मिला “यह मेरा हाथ है” । फिर मैंने उसके पैर की ओर इशारा करके पूछा “यह क्या है” ? फिर जबाब मिला “यह मेरा पैर है” ।

इसी तरह जबाब मिलता गया “ यह मेरी आँख है । यह मेरी नाक है । यह मेरा कान है । यह मेरा सिर है” । आदि ।

यह सुनकर मुझे हँसी आ गई । मैंने कहा “सब कुछ तो तुम्हारा है । लेकिन तुम कहाँ हो” ?

नीलोत्पल ने कोई जबाब नहीं दिया ।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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