रविवार, 23 दिसंबर 2012

शंकर लाल की कविता - जीवन और उम्र

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जीवन और उम्र

जीवन में होते है उम्र के बहुत दौर
एक तरफ है बचपन तो बुढ़ापा है दूसरी और
पहले से होता है उद्गम
दूसरा ले जाये समागम की और 
जीवन में होते है उम्र के बहुत दौर |
बचपन और बुढ़ापे के बीच
जवानी की सरिता बहती है
आदमी के विकास और विनाश की कहानी कहती है
अगर सरल गमन हो सीमाओं में 
संस्कार, सत्य का जल हो  
तो ले जाये ये स्वर्ग की और
और अगर
क्रोध हो मन में
सिने में दानव गरल हो 
तो ले जाये नर्क की और
जीवन में होते है उम्र के बहुत दौर |
बीत गया वो बीत गया
अब तो करो अपनी करनी पर गौर
कह रहे भोले शंकर
विधि का विधान कुछ नहीं
तुम खुद तय  करो तुम्हें जाना है किस और
जीवन में होते है ...|
विकास की रफ्तार और जिंदगी
विकास की रफ्तार में जिंदगी कहाँ जा रही है ?
प्यार महोब्बत को छोड़कर 
बात-बात पर बीवी मियां से टक्करा रही रही है
विकास की रफ्तार में जिंदगी कहाँ जा रही है?
भोग विलास की खातिर, घर की इज्जत आबरू
खुद लुटने के लिए बाजारों में जा रही है 
विकास की रफ्तार में जिंदगी कहाँ जा रही है ?
बुढ़ापा सँवारने की तिकडम में
जवानी जंग बनती जा रही है
कल सुख चैन से सोने के लिए
आज नींद नहीं आ रही है
कहने को बेशक,
दायरे बढ़ते जा रहे है इंसानी बसावट के
इंसानियत मगर मरती जा रही है
विकास की रफ्तार में जिंदगी कहाँ जा रही है ?
यो तो जगमगा रही है सुनसान राहे भी
दिलो में कालिख मगर गहराती जा रही है 
कहने को बहुत सिविलाइज्ड हो गये है हम
जहाँ में मगर हैवानियत बढ़ती जा रही है
विकास की रफ्तार में जिंदगी कहाँ जा रही है ?

चलो हम भी नेता नेता खेले
चलो हम भी नेता नेता खेले
एक दूसरे पर कीचड़ डाले 
भद्दा बोले गाली देले
चलो हम भी नेता नेता खेले |

फर्जी कंपनी घड़़ ले
घर में हीरे मोती जड़ ले
पैसो से जेबें भर ले
चलो हम भी नेता नेता खेले |

करे कमाई काली लेकिन
सच्चाई के दंड पेले
चलो हम भी नेता नेता खेले |

गली मोहल्ले धरना दे ले
सुबह –सुबह खाना खाकर
दिन भर भूखा रह ले
लोगो से चंदा लेकर   
रात को दारू पिले

 

चलो हम भी नेता नेता खेले |

26 जनवरी 15 अगस्त को 
नैतिकता का भाषण बोले
फिर बेले पर ठुमका देले
चलो हम भी नेता नेता खेले |


-    शंकर लाल , इंदौर मध्यप्रदेश

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