रविवार, 23 दिसंबर 2012

दुर्गेश ओझा की कविता इज्जत की रखो इज्जत

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एक निर्दोष परिन्दे को कुचल रहे थे छः वहशी दरिन्दे

बहुत हुआ अब तो उठनी चाहिए हम सबकी नींदें

बस की खिड़की पर नहीं, नराधमों पर लगे थे क्रूरता के पर्दे

कहेने को तो वो जीवित, पर वास्तव में है ये सब बदमाश मुर्दे

बस में नहीं, बलात्कारियों के अंदर जमा था घनघोर अँधेरा

हवस मिटाने नराधमों ने भोली लड़की को बड़ी निर्दयता से घेरा

हर दामिनी हैं, हमारे घर की ही वो सदस्य, उठनी चाहिए अंदर से चीख

कड़ी सज़ा,अवगणना,फटकार द्वारा हेवानों को मिलनी चाहिए कड़ी सीख

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वेदनाकी कविता- ‘इज्जतकी रखो इज्जत’ – (दामिनी पर दिल्हीमें हुइ ज्यादतीके उपलक्षमे.) रचनाकार – दुर्गेश ओझा १ जलाराम नगर, नरसंग टेकरी,पोरबंदर ३६०५७५ गुजरात इ-मेल –durgeshoza@yahoo.co.in

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  1. दुर्गेश जी, बहुत ही सही फ़रमाया आपने. ऐसे दरिंदों को तो मौत की सजा भी कम है |शंकर लाल

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    1. प्रिय शंकरजी,टिपण्णीके लिए धन्यवाद,में कहानी और कविता लिखता हू. दिलको छू जाये,कला और अच्छा संदेश हो तो कहानी या गीत जिवंगित बन जाता है. धन्यवाद आपका और रचनाकारका.

      हटाएं
    2. प्रिय शंकरजी, धन्यवाद टिप्पणीके लिए. में कहानी और गीत लिखता हू. कला भाव और संदेश वाला .दिलको छू लेनेवाला लिखनेमे मजा आता आता है. आपका और रचनाकारका धन्यवाद.

      हटाएं

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