बलबीर राणा “भैजी” की कविता - अदृश्य पहरा

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अदृश्य पहरा

उस वीरान सरहदी सड़क पर

संगमरमर का एक पत्थर

स्मृति शेष अडिग खडा,

अडिग, इसमें उस वीर की आत्मा,

जो चिर काल से पहरा दे रहा

सरहद अपनी जीवन्त कर रहा।

सैल्यूट करते, नत मस्तक होते,

आते जाते सरहद के रक्षक,

क्षेत्र में अब आराध्य भी वही,

रक्षक भी वही, जिसका युगयुगान्तर

इस माटी के लिए समर्पित।

पूस की कांपती रात हो,

या हो, सावन की गरजती बरसात 

उस घाटी में उस रणबांकुरे की आवाज

नित्य गुंजती, सजग करती

पकडो मारो, पकडो मारो

उस अटल आत्मा का

अदृश्य पहरा तटस्थ सजग।

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बलबीर राणा “भैजी”

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