प्रतिभा शुक्ला की कविताएँ

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prathibha1 (Mobile)

तीसरा


 

जब भी किसी "तीसरे" ने
फैसला करना चाहा
दो लोगों के विवादों का
विवाद बढ़ गए
तीसरे का नजरिया
अपनी भाषा को पुख्ता बनाना था
न कि मामले को सुलझाना।
युग बदल गया जब
दो को बचने के लिए
कोई तीसरा
अपनी खुशियाँ कुर्बान कर देता था
और दोनों के मलाल
धुल जाते।
आज विवाद हैं
तीसरा प्रभावी है
यह तीसरे का नहीं
हमारी नाकामी है।

घर


 

घर हमारा
परिजन हमारे
मामले हमसे ही जुड़े
बाहर सब जान गए
बस एक मुझे छोड़कर
सब रिश्ते नए
हम अपनों से हार गए।


 

बेचारा भेड़िया


 

तुम गलतियाँ करते रहे
माफियाँ माँगते रहे
मैं क्या करती
खामोश रहती
और तुम मान लेते
अपनी बेगुनाही।

तुम धीरे-धीरे
गलतियाँ बढाते गए
और क्षमा का अनुरोध भी
पर अब उनमें
पश्चाताप न था
एक शातिराना हंसी थी
मेरे जज्बातों का मखौल था।
मेरी दया का कोष
तभी से चुक गया।
मेरे लिए तुम बेचारे हो गए
और
भेडियों पर भी लोग
दया करने के लिए विवश हो जाते हैं।


पुलिस अस्पताल के पीछे
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर
उत्तर प्रदेश।

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