प्रभुदयाल श्रीवास्तव के दो बाल गीत

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[1]
कहां जांयें हम‌
भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में।
बोले'अब तो सभी रहेंगे,
यहीं आपके घर में।'


तरुवर सारे काट लिये हैं ,
नहीं बचे जंगल हैं।
जहाँ देखिये वहीं दिख रहे,
बंगले और महल हैं।
अब तो अपना नहीं ठिकाना,
लटके सभी अधर में।
भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में


जगह जगह मैदान बन गये,
नहीं बची हरियाली।
जहाँ देखिये वहीं आदमी,
जगह नहीं है खाली।
अब तो हम हैं बिना सहारे,
भटके डगर डगर में।


भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में।
पता नहीं कैसा विकास का ,
घोड़ा यह दौड़ाया।
का‍ट छांट कर दिया,वनों का
ही संपूर्ण सफाया।
बोलो बोलो जांयं कहां अब,
गरमी भरी दोपहर में।
भालू चीता शेर सियार सब ,
रहने आये शहर में।


                              [2]
चुहिया और संपादक‌
चुहिया रानी रोज डाक से,
कवितायें भिजवाती।
संपादक हाथी साहब को,
कभी नहीं मिल पातीं।
एक दिन चुहिया सुबह सुबह ही,
हाथी पर चिल्लाई।


बाल पत्रिका में मैं अब तक ,
कभी नहीं छप पाई।
तब हाथी ने मोबाइल पर,
चुहिया को समझाया।
क्यों न ,मिस, अब तक तुमने,
अपना ए मेल बनाया?
अगर मेल पर,
अपनी रचनायें मुझको भिजवातीं।
तो मिस चुहिया निश्चित ही ,
तुम कई बार छप जातीं।

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