रविवार, 16 दिसंबर 2012

प्रतिभा शुक्ला की लघुकथा - माँ

माँ

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प्रतिभा शुक्ला 

हमारे एक मित्र हैं। शायराना मिजाज के खुशदिल आदमी। कई दिनों से भेंट न हुई तो रहा न गया। जा धमका उनके घर। सांकल खटखटाई तो उनका मुरझाया चेहरा नुमाया हुआ। बाल बिखरे हुए और चेहरा खिसियाहट से भरा हुआ।
क्या बात है भाई? आज चेहरे पर गोधूली क्यों?


अफसोस के साथ बोले, अब क्या बताऊँ भैया। अब आप खुद ही देख लीजिये।
अन्दर दाखिल हुआ तो छह-सात साल का उनका बेटा खिलौनों के ढेर पर मायूश बैठा था। शायद रोते-रोते मेरी आहट से चुप हो गया हो। बाल बिखरे थे और रह रह सुबकियां रह रह फफक जा रही थीं। सामने दूध-भात छितराया पडा था और कटोरी अपनी पूंछ आसमान की ओर किये औंधी पड़ी थी


मेरी हंसी रोके न रुकी। पूछा, यार ये क्या है? भाभी कहाँ हैं?
उसने रोनी सूरत बनाकर कहा, वो एक विषय में पीजी कर रही है। परीक्षा के कारण एक सप्ताह से गाजियाबाद है। अब उनके लाडले को न हमारे हाथ की कोई चीज पसंद आ रही है और न ही हमारे प्यार का तौर-तरीका। उस पर भी ये कुछ अस्वस्थ भी हो गए हैं। समझ में नहीं आता कि क्या करूं। यद्यपि मैं जनाब की देखभाल इनके माताश्री के नोट के नुश्खे पर ही कर रहा हूँ, फिर भी भाई मैं माँ तो हूँ नहीं कि इनके दिल की बात समझ लूंगा।


लम्बी सांस लेकर बोले, ये रोता है तो मै सोचता हूँ कि शायद भूख लगी हो। दौड़कर खाने-पीने की ढेर सारी चीजें परोस देता हूँ। पर जनाब हैं कि उसे देखने की बजाय और जोर से रोना शुरू कर देते हैं। जानते हैं, मै दफ्तर से छुट्टी लेकर परवरिश कर रहा हूँ, फिर भी ये खुश नहीं हैं। हर पल इनकी आँखें जैसे माँ को ढूंढ रही होती हैं। क्या करूं!!
बच्चा मेरी ओर एकटक देखे जा रहा था। बस खुद को रोक न सका। मित्र से बोला, इसे अपने घर ले जा रहा हूँ। बच्चों के साथ शायद मन लग जाए।
पत्नी ने देखा और हाल जाना  तो ममता उमड़ आई। प्यार से सर पर हाथ फेरते हुए गले लगा लिया। जलती यादों पर कुछ फुहार पड़ी। बच्चे का रोना कम हो गया। कुछ देर बाद वह सामान्य दिखने लगा।


मै संतुष्ट हुआ। मित्र को फोन कर बोला, आप भी यही आकर खा-पी लिया करो। भाभी के आने पर यह चला जाएगा। फिलहाल तो इसे यही रहने दो।
बच्चे का रोना और जिद करना तो कम हो गया, पर ज्यादातर खामोश रहने लगा। न कुछ मांगता न खेलता। हर समय शांत बैठा रहता। जैसे इस दुनिया  से उसका कोई लेना-देना ही न हो। अधिकतर एकटक दरवाजे की और देखता रहता।


भाभी चार दिन बाद लौट आईं। उन्होंने बच्चे को गोद में उठाया तो वह जोर से  चीख पडा और लिपट कर रोने लगा। थोड़ी देर तक सुबकियाँ बंद हो गयीं और वह सो गया। माँ के हाथ सर पर देर तक फिरते रहे।


आज पहली बार वह पूरे चार घंटे गहरी नींद में सोया था। जागा तो माँ को देख चिल्ला पडा, भूख लगी है कुछ खाने को दो न माँ। और पीठ पर झूल गया। धीरे से कान में बोला, माँ तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता। अब मुझे छोड़कर कहीं मत जाना।
मित्र की आँखें भर आयीं। मैंने सान्त्वना में कंधे पर हाथ  रखा तो बोल पड़े, माँ बनना आसान नहीं। वह दिल कहाँ से लाता, जो बिना बोले माँ समझ लेती हैं।

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पुलिस अस्पताल के पीछे,
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश।
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5 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छी...मां तो होती ही ऐसी है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्तर
    1. बेनामी8:01 am

      shukriya upasana didi. ham aapke aabhari hain. ----pratibha shukla

      हटाएं
  3. बेनामी8:00 am

    शुक्रिया बीना जी आपका आशीर्वाद है यह।

    उत्तर देंहटाएं

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