गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

मनोज 'आजिज़' की नज़्म - चाहत

DSCN1080 (Mobile)

मनोज 'आजिज़' की नज़्म
चाहत
     --- मनोज 'आजिज़'
गुलदानों की खूबसूरती
आँखों को रौशनी देती है
दिल को सुकूँ पहुंचाती है
और चाहत होती है
हर शख्श कुछ ऐसा ही खिले।
पर ये मंजर कहाँ !
सपने तो अक्सर बिखरते हैं,
अरमान अक्सर टूटता है
रंज
हर नब्ज़ को थाम बैठा है
जैसे लोहे में जंग
ऐसा हो--
हर शख्श लब पे
हंसी का गुल खिलाले
और
चेहरे को गुलदान ;
रौशन हो हर आँख
हर दिल में सुकूँ कायम हो ।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------