शनिवार, 15 दिसंबर 2012

प्रमोद कुमार सतीश की कविता - भरोसा नहीं...

DSCN1901 (Mobile)

है हवस इतनी पी लूं समन्दर मगर
प्यास बुझ पाएगी ये भरोसा नहीं


यूं तो हर बात उसकी मरहम लगे
घाव भर पाएगी ये भरोसा नहीं


महफिलों में दीदार हो जाएगा
बात हो पाएगी ये भरोसा नहीं


रास्तों पर मिलेंगे वो अक्सर हमें
आँख मिल पाएगी ये भरोसा नहीं


घर में जितनी थी यादें मिटा दीं मगर
दिल से मिट पाएंगी ये भरोसा नहीं


उसको पाने की चाहत तो जन्मों से है
पर वो मिल पाएगी ये भरोसा नहीं


उसकी खातिर इबादत तो कर ली मगर
पूरी हो पाएगी ये भरोसा नहीं

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------