गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

सृष्टि शर्मा की बाल कहानी - पुरस्कार चतुराई का

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पुरस्कार चतुराई का

सृष्टि शर्मा

राजनांदगांव

एक बार एक राजा ने घोषणा करवाई कि पहला पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जायेगा जो ऐसी कहानी सुनाए जो दूसरों को एकदम सत्य लगे। दूसरा पुरस्कार उसे मिलेगा जिसके घर का बना पकवान सबसे अधिक स्वादिष्ट होगा और तीसरा पुरस्कार का अधिकारी वह होगा जो यह सिद्ध कर दे कि वह विश्व का सबसे खुशहाल व्यक्ति है।

इसकी घोषणा होते ही राजदरबार खचाखच भर गया। बड़े - बड़े विद्वान, कहानीकार, कलाकार, आए। निश्चित समय पर प्रधानमंत्री ने घोषणा की। वहां उपस्थित विद्वान, कलाकार, कहानीकार ने अपनी - अपनी बात रखी पर न राजा को उनकी कहानियां सच्ची घटना के तरह लगी और न ही राजदरबार में उपस्थित लोगों को। अभी प्रतियोगिता जारी थी कि एक व्यक्ति दौड़ते - दौड़ते दरबार में आया। उसने राजा से हाथ जोड़कर कहा - क्षमा करें महाराज, मुझे इस बात का संदेह है कि आपने जितने सोने की मोहरे देने की घोषणा की है उतने मोहरे तश्तरी में नहीं है। मुझे तश्तरी में रखी सोने के मोहरे गिननी पड़ेगी। क्या आप मुझे इसकी अनुमति देंगें?

राजा को उसकी बात सुनकर बहुत क्रोध आया। राजा ने क्रोध में कहा - तुम्हें दरबार तक पहुंचने की भी तमीज नहीं है, देर से आते हो और कहते हो संदेह है। पहले इसका उत्तर दो कि तुम यहां इतनी देर से क्यों आये?

- केले के हलुए का नाश्ता अधिक खा लेने के कारण मुझे आलस्य आ गया। और मैं सो गया। इसलिए यहां पहुंचने में देर हो गई। उस व्यक्ति का उत्तर था।

राजा को उसकी बात जंच गई मगर प्रधानमंत्री को विश्वास नही हुआ। उसने कहा - महाराज, यह आदमी असत्य कह रहा है। इस मौसम में तो हमारे देश में तो केले ही नहीं होते, फिर इसने केले का हलुआ कैसे खाया?

- मंत्री महोदय का कहना सत्य है। राजा ने कहा

- महाराज यह सत्य है कि इस मौसम में हमारे देश में केले नहीं होते किन्तु हमारे बगीचे में जो केले का पेड़ लगा है उस पर इस मौसम में भी केले के फल लगते हैं। इस पेड़ को मेरी पत्नी अपनी मायके से लाई है।

- तुम्हारी पत्नी केले का पेड़ अपनी मायके से कैसे उठा लाई। राजा ने आश्चर्य से पूछा।

उस आदमी ने मुस्करा कर कहा - महाराज मेरी पत्नी का मायका दूसरे देश में है। पिछली बार जब वह मायके से आयी तो केले के दो छोटी - छोटी कलम ले आई थी और अब वह एक पेड़ बन गया है। इस पेड़ पर बारहों महीने फल लगता है। आज प्रातः मेरी पत्नी ने इसी पेड़ से केले तोड़कर हलुवा बनायी थी। मैंने हलुवा इतना अधिक खा लिया कि मुझे नींद आ गई। महाराज, मुझे देर से पहुंचने के लिए क्षमा कर दीजिए।

राजा को वह आदमी बड़ा अजीब सा लगा। वह सोचने लगा कि यह आदमी बात - बात में अपनी पत्नी का ही जिक्र क्यों कर रहा है? शायद यह पत्नी का गुलाम है। राजा कुछ कहता इससे पहले वह आदमी फिर कहने लगा - महाराज, मेरी पत्नी जो केले का पौधा अपनी मायके से लाई है वह कोई साधारण पौधा नहीं है। उसके एक - एक गुच्छे में सौ - सौ केले लगते हैं। आप ही बताइये, ऐसी पत्नी का भला गुणगान कौन नहीं करेगा।

राजा अब उसकी बातों में दिलचस्पी लेने लगा। पास बैठे प्रधानमंत्री ने कहा - महाराज, यह व्यक्ति हलुवे का जिस प्रकार वर्णन कर रहा है उससे तो लगता है कि ऐसा स्वादिष्ट हलुवा किसी ने आज तक चखा ही नहीं। राजन, आप इस आदमी को आदेश दे कि वह हलुवा जिसे इसने खाया है, दरबार में लेकर आये ताकि हम सब भी खा सके।

सिर्फ राजा को ही नहीं अपितु वहां उपस्थित सभी लोगो को प्रधानमंत्री की बात जम गई। राजा ने कहा - हां, प्रधानमंत्री ठीक कह रहे हैं, तुम अपने घर जाओ और हलुवा दरबार में लेकर आओ ताकि हम भी ऐसा स्वादिष्ट हलुवे का मजा ले सके।

अब वह आदमी उठा और सोने की मोहरे से भरी एक थाली को उठाने लगा, तभी राजा ने कहा - ये तुम क्या कर रहे हो ? तुम्हें किसने इस पुरस्कार को छूने का अधिकार दिया?

वह आदमी हंसा और कहने लगा - महाराज, मैं तो अभी अपना प्रथम पुरस्कार उठा रहा हूं। मैंने जो कहानी आपको सुनाई, वह काल्पनिक थी जबकि लोगों को एकदम सच्ची लगी। मैंने आपसे बात - बात में मेरी पत्नी मेरी पत्नी कहता रहा। और आप लोग विश्वास करते रहे जबकि सच तो यह है कि मैं अभी तक अविवाहित हूं।

उस व्यक्ति की बात सुनकर वहां बैठे सभी लोगों के मुंह आश्चर्य से खुले ही रह गए। राजा भी चकित हुए। उन्होंने कहा - सच में तुमने असत्य कहानी गढ़ कर हमें उस पर विश्वास करने बाध्य कर दिया अतः प्रथम पुरस्कार पर तुम्हारा ही अधिकार बनता है, ले जाओ ...।

राजा अभी यह बात कह ही रहे थे कि उस व्यक्ति ने दूसरी थाली की ओर भी अपना हाथ बढ़ाया। राजा चीख उठे - अब इस थाली को क्यों उठा रहे हो ?

- महाराज, इससे अधिक स्वादिष्ट और कोई खाद्य पदार्थ क्या होगा जिसे चखने यहां बैठे सभी लोगों का मन ललचा आया। आप ही बताइये क्या दूसरे पुरस्कार पर मेरा अधिकार नहीं बनता ?

- बनता है ...। राजा ने कहा।

वह व्यक्ति तीसरी थाली की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा - महाराज, दो - दो पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति से अधिक खुशहाल भला यहां कौन होगा?

राजा ने प्रसन्न होकर कहा - सो तो तुम हो ही, यह लो, तीसरा पुरस्कार भी मैं तुम्हें ही देता हूं।

सारा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस तरह राजा ने 3-3 पुरस्कार जीतने वाले उस व्यक्ति को खुशी - खुशी विदा किया।

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