गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

सौरभ राय 'भगीरथ' की कविताएँ

 

संतुलनimage

मेरे नगर में
मर रहे हैं पूर्वज
ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ
अदृश्य सम्वाद !
किसी की नहीं याद -
हम ग़ुलाम अच्छे थे
या आज़ाद ?

बहुत ऊँचाई से गिरो
और लगातार गिरते रहो
तो उड़ने जैसा लगता है
एक अजीब सा
समन्वय है
डायनमिक इक्वीलिब्रियम !

अपने उत्त्थान की चमक में
ऊब रहे
या अपने अपने अंधकार को
इकट्ठी रोशनी बतलाकर
डूब रहे हैं हम ?

हमने खो दिये
वो शब्द
जिनमें अर्थ थे
ध्वनि, रस, गंध, रूप थे
शायद व्यर्थ थे ।
शब्द जिन्हें
कलम लिख न पाए
शब्द जो
सपने बुनते थे
हमने खोए चंद शब्द
और भरे अगिनत ग्रंथ
वो ग्रंथ
शायद सपनों से
डरते थे ।

थोड़े हम ऊंचे हुए
थोड़े पहाड़ उतर आए
पर पता नहीं
इस आरोहण में

हम चल रहे
या फिसल ?

हम दौड़ते रहे

और कहीं नहीं गए

बाँध टूटने

और घर डूबने के बीच

जैसे रुक सा गया हो

जीवन ।

यहाँ इस क्षण
न चीख़
न शांति
जैसे ठोकर के बाद का
संतुलन ।

जूते

इन भूरे जूतों ने
तय किए हैं
कितने ही सफ़र !

चक्खा है इन्होंने
समुद्र का खारापन
थिरके हैं ये
पहाड़ी लोकगीत पर
और फिसले हैं
बर्फ की ढलान पर
मेरे संग |

इन्होंने सहर्ष पिया है
मेरे पैरों का पसीना
सही हैं ठोकरें सिर पर
गिरने से बचाया है मुझे
अनगिनत बार |
इनकी छाती पर
पहाड़ी चट्टानों की रगड़ है
इनके घुटनों में दबे हैं
दुर्गम जंगलों के काँटें |

इनकी सिलवटों में दर्ज़ है
मेरी अनगिनत यात्राओं का लेखा जोखा |

मेरे जूतों नें मुझे गढ़ा है
जैसे दुनियाभर के तमाम जूतों ने मिलकर
जोतें हैं खेत
उगाई हैं फसलें
ढोए हैं पहाड़
जीते हैं जंग !

इन बदबूदार जूतों में
दुनियाभर की तमाम
ख़ुशबूदार किताबों से ज़्यादा
इतिहास लिक्खा है |

दो भूरे जूतों ने मुझे पहन रक्खा है
इनके लिए मैं महज़
एक जोड़ी पैर हूँ ||

भौतिकी

याद हैं वो दिन संदीपन

जब हम

रात भर जाग कर

हल करते थे

रेसनिक हेलिडे

एच सी वर्मा

इरोडोव ?

हम ढूंढते थे वो एक सूत्र

जिसमे उपलब्ध जानकारी डाल

हम सुलझा देना चाहते थे

अपनी भूख

पिता का पसीना

माँ की मेहनत

रोटी का संघर्ष

देश की गरीबी !

हम कभी

घर्षणहीन फर्श पर फिसलते

दो न्यूटन का बल आगे से लगता

कभी स्प्रिंग डाल कर

घंटों ऑक्सिलेट करते रहते

और पुली में लिपट कर

उछाल दिए जाते

प्रोजेक्टाइल बनाकर !

श्रोडिंगर के समीकरण

और हेसेनबर्ग की अनिश्चित्ता का

सही अर्थ

समझा था हमने |

सारे कणों को जोड़ने के बाद

अहसास हुआ था -

“अरे ! एक रोशनी तो छूट गयी !”

हमें ज्ञात हुआ था

इतना संघर्ष

हो सकता है बेकार

हमारे मेहनत का फल फूटेगा

महज़ तीन घंटे की

एक परीक्षा में |

पर हम योगी थे

हमने फिज़िक्स में मिलाया था

रियलपॉलिटिक !

हमने टकराते देखा था

पृथ्वी से बृहस्पति को |

हमने सिद्ध किया था

कि सूरज को फ़र्क नहीं पड़ता

चाँद रहे न रहे |

राह चलती गाड़ी को देख

उसकी सुडोलता से अधिक

हम चर्चा करते

रोलिंग फ़्रीक्शन की |

eiπ को हमने देखा था

उसके श्रृंगार के परे

हमने बहती नदी में

बर्नोली का सिद्धांत मिलाया था

हमने किसानों के हल में

टॉर्क लगाकर जोते थे खेत |

हम दो समय यात्री थे

बिना काँटों वाली घड़ी पहन

प्रकाश वर्षों की यात्रा

तय की थी हमने

‘उत्तर = तीन सेकंड’

लिखते हुए |

आज

वर्षों बाद

मेरी घड़ी में कांटें हैं

जो बहुत तेज़ दौड़ते हैं

जेब में फ़ोन

फ़ोन में पैसा

तुम्हारा नंबर है

पर तुमसे संपर्क नहीं है |

पेट में भूख नहीं

बदहज़मी है |

देश में गरीबी है |

सच कहूँ संदीपन

सूत्र तो मिला

समाधान नहीं ||

जनपथ

जनपथ में सजा है दरबार
गुज़रता है बच्चा
बेचता रंगीन अख़बार
“आज की ताज़ा ख़बर -
फलानां दुकान में भारी छूट !
आज की ताज़ा ख़बर -

(मौका मिले तो तू भी लूट)”

यह सड़क

सीधी होकर भी

गोल है

पैंसठ साल का सनकी बुढ्ढा

इसपर चलता हुआ

एक दिन अचानक पाता है

इसी सड़क के

बेईमान तारकोल में

धंसा हुआ गरदन तक

सड़क में डूबती

असंख्य अपाहिज अमूर्तियाँ

सड़ांध है विसर्जन तक |

वहीं जनपथ के अजायबघर में

सजी है

क्रांति

चहलकदमी

चीख़ें !

दीवारों पर लटकी

यात्ना प्रताड़ना उत्तेजना है

जनपथ के अजायबघर में

लाशों का

फोटू खींचना मना है |

जनपथ में दिन भर

आग जलती है

और अंधरात्री में

चलती हैं

प्रणय लीलाएँ |

जनपथ के हर खंभे पर लिक्खा है -

“यहाँ रोशनी न जलाएँ |”

सड़क के इस पार जो है

उस पार न होने की उम्मीद

अब कोई नहीं धरता

खंभे के नीचे मूतता

कुत्ता भी

लकड़ी मशाल कोयले में

विश्वास नहीं करता |

वहीं दूसरी छोर पर

संसद -

चर्बी का गोदाम

अश्लील और सिद्धांत के बीच

मेज़ें बजाते सभासद

इनकी आत्मा झाग है

भारतवर्ष इनके तोंद में

उठी हुई आग है |

पास जनपथ और राजपथ के चौराहे पर

दमकती हैं

विदेशी कम्पनियाँ !

(वर्चुअल बिल्डिंगों में

ईट ढ़ोते भारतीय इंजीनियर)

सच है -

इन्डिया गेट से

जनपथ तक

पराधीन है राजपथ !

जनपथ पर विचरने वालों की

हर यात्रा

ख़त्म हो जाती है

ए.सी. कमरे की टीवी में |

हर जिज्ञासा

ख़त्म हो जाती है

इंटरनेट पर एक सर्च कर -

’32,047 रिज़ल्टस रिटरण्ड’ पढ़कर |

जनपथ पर विचरने वालों के

हर विचार ख़त्म हो जाते हैं

जनपथ पर विचरकर |

जनपथ सिकुड़ चला है

जैसे निचुड़ रहा है

किसी बंजर गर्भ से भविष्य |

डबल लेन ट्रैफिक के नाम पर

तारकोल में लथपथ

गति और दुर्गति

के बीच टंगा हुआ

पजामा है जनपथ |

जनपथ से गुज़रते हुए

अहसास हो बस इतना -

कि तरसे हुए इस सड़क में

जीवन है शेष !

जनपथ के शोर शराबों के सन्नाटों में

कितनी अनिवार्य हो जाती है

दुर्घटना ||

गंवार

हमारे गाँवों में आकर
हमारे संग
फोटो खींचते वक्त
तुम नहीं दे पाओगे हमें
मुस्कुराने की
एक भी वजह |

शहर में घूमते हुए हम
आलिशान मकानों
नखरीली लड़कियों
मोटरों को देखने के बजाय
बार-बार सड़क-दुर्घटना से ही बचेंगे !

तुम्हारे घर में आकर
हम फर्श पर न चलकर
उसे साफ रखने में व्यस्त रहेंगे
चमकते बाथरूम में
घंटों खड़े सोचेंगे
ख़ुशबू आने का रहस्य !

तुम्हारे नृत्य में

शामिल भी कर लो
पर नहीं मिला पाएंगे हम कदम
तुम्हारे साथ !
तुम्हारा संगीत
हमारी नसों में गूँजेगा
शोर की तरह |

तुम्हारे परोसे शराब से आएगी
हीनता की बदबू |

और अगर हम
तुम्हारी तरह बन भी गए
तो पल में ही फिसल जाएँगे
हाथों से तुम्हारे सारे पैसे
मिट्टी में मिला देंगे
तुम्हारे ऐशो आराम के समस्त साधन
हममें नहीं है वो रौब
वो नखरा, वो नज़ाकत
हमारा गुस्सा हमें
भाई, पति और पिता ही बना सकता है |

तुम हमारी स्त्रियों को
अपने कपड़े पहना भी दो
पर नहीं लौटा सकोगे
उनके देह की सुडोलता और ऊष्मा |
भूखे चूहों की तरह
हमारे मरघिल्ले तन पर
तुम डाल दो
कितना ही पाउडर
मल दो चाहे
जितनी क्रीम
हम ताकते रहेंगे तुम्हारा ही मुंह |

शहरी बनने की उत्सुकता से
कहीं अधिक
चाहिए हमें
गंवार रह जाने की वजह |

चेहरे

कुछ चेहरे बचे हैं
इनकी हड्डियों में मज्जा
शिराओं में रक्त नहीं है |

ये चेहरे

खेतों में दबे हैं

मशीनों के गियर के बीच

घड़घड़ाकर पिस रहें हैं

दुकानों में

इंतज़ार कर रहें हैं

ग्राहक का |

यही चेहरे हैं

जो दंगों में बिलबिलाते हैं

हिंदू को हिंदू

मुस्लिम को मुस्लिम हूँ

बताते हैं

यही चेहरे हैं

जिनपर यूनियन कार्बाइड

छिड़क दिया जाता है

इत्र की तरह

यही चेहरे हैं

चासनाला कोलियरी में

जो आज भी

कोयला बन

जलते हैं |

ये चेहरे एक से हैं

पाँच हज़ार वर्षों से

बदसूरत चेहरों की मिलावट कर

जैसे जबरदस्ती अलग अलग

किए गए हैं

ये चेहरे एक से हैं

पर एक नहीं हैं

इनके एक होने का

ख़तरा है |

इन्हीं चेहरों की भीड़ में

मंत्री जी डकारते हैं -

“जो चेहरे बच गए हैं

देश के शत्रु हैं

उनको मारो

जो चेहरे कम हो रहे हैं

वे दिवंगत हैं

देश को उनपर नाज़ है…”

मंत्री जी को नहीं पता

जब चेहरों में मज्जा और

रक्त नहीं होता

तो ज़्यादा दबाने पर

कुछ चेहरे

बम की तरह फटते हैं |

लोहा

चुम्बक के छर्रे से खेलता बच्चा
तपाक से पूछता है -
कहाँ-कहाँ है लोहा ?

माँ कहती
हर तरफ लोहा !
चिमटा छेनी हथौड़ा संडासी

फावड़ा खुरपी कुदाली

चाकू हंसिया कुल्हाड़ी

सेफ्टी पिन साईकिल रेलगाड़ी

हर तरफ लोहा !

बच्चा बारी-बारी

सबपर चुम्बक लगाता

ताली पीटता

ख़ुश हो जाता |

फिर अचानक

चुम्बक उछल जा चिपका

माँ की पीठ से

माँ हड़बड़ाई

बच्चा परेशान !

बच्चे को नहीं पता

हर मेहनतकश

लोहा है

ठोकर खाकर जो न टूटे

लोहा !

दबी कुचली तपाई गई हर कुरुप वस्तु

लोहा !

चिड़ियाघर

एक रोज़ चिड़ियाघर में मचा बवाल
कुछ जानवरों ने किया हड़ताल, कहा- करो हमें स्वतंत्र
निकाल फेंका चिड़ियाघर के सभी अफसरों को
संस्थापित किया लोकतंत्र |

मतदान हुआ चिड़ियाघर में
सारे जानवरों ने प्यास बुझाई
मदमस्त होकर नाचते गाते
विजयी पार्टी सत्ता में आई |

दार्शनिक सी सूरत बना घड़ियाल बना राष्ट्रपति
गदहे के पीठ पड़ा प्रधानमंत्री का भार
रोज़गार मंत्रालय खाली छोड़कर
खड़ी हो गयी सरकार |

सूचना प्रसारण विभाग पर
चिमगादढ़ उल्टा लटका रहा
हाथी बना खाद्य मिनिस्टर
“कृषि मंत्रालय मेरा !” टिड्डे ने कहा |

गृह मंत्रालय गीदड़ के जिम्मे
इन्कम टैक्स ऊँट ने संभाला
शांति व्यवस्था का लीडर बना
गली का झबरा कुत्ता काला |

लोमड़ को क़ानून मिला
मक्खी ने संभाली साफ़ सफाई
कला एवं संस्कृति की करने लगे
बन्दर लंगूर मिलकर अगुवाई |

उल्लू को विद्युत आपूर्ति मिला
सुन उसकी आँखें घूमी गोल गोल
विदेश मंत्रालय उसका सुनकर
सूअर नाचने लगा कपड़े खोल |

चूहा करे भवन निर्माण
रेल लेकर कछुआ दौड़ा
रक्षा मंत्रालय मेरा कहकर
मुर्गी ने किया सीना चौड़ा |

गलती जानवरों की नहीं थी
गलत थी चिड़ियाघर की जनता
जो आंक न सकी
अपने एक एक वोट की क्षमता |

बच्चों तुमने स्कूल में पढ़ा होगा-
यथा राजा – तथा प्रजा
सुन लो लोकतंत्र का नया मंत्र भी आज-
” यथा प्रजा – तथा राजा ” ||

राष्ट्रगान

जहां प्यार करने के लिए
दिल होने से ज्यादा गुंडा होना ज़रूरी है |
जहां ‘सत्य’ शब्द का इस्तेमाल
केवल अर्थी ले जाने पर किया जाता है |
जहां का राष्ट्रीय पशु कीचड़ में रहता है |
और राष्ट्रीय पुष्प भी कीचड़ में ही बहता है |
जहां के डॉक्टर थर्मामीटर पढ़ना नहीं जानते
और कुत्ते अपने बच्चों को नहीं पहचानते |
जहां का हर चोर प्रधानमंत्री बनना चाहता है |
और हर नेता अभिनेता; और हर अभिनेता नेता |
जहां की आज़ादी का जशन
ढोल ताशों संग मनाया जाता है
और अगले रोज़ गटर में बहता तिरंगा पाया जाता है |
जहां टीवी, रेडियो, फ्रीज रिश्ते तय करते हैं
और लड़की के हाथ की लकीरों को फाड़कर
उसमे खून की मेहंदी रच दी जाती है |
जहां के सरहद निर्दोषों के खून से रंग दिए जाते हैं
सीज़फायर के लिए |
जहां के श्रेष्ठ अस्पताल में मरीज़ मर जाता है
क्योंकि उसे रक्तदान करने वाला सूई से डर जाता है |
जहां के मजूर भूखे पेट मर जाते हैं
और उसके मालिक के कुत्ते बिस्कुट खाने से मुकर जाते हैं |
जहां के मध्यम वर्गीय लोग साले मरते न जीते हैं
खूंटे पर अपनी इज्ज़त को टांग, अपना ही खून पीते हैं |
जहां का बेटा प्यार में औन्धे मुंह इस कदर गड़ जाता है
माता पिता के सपनों से खेल, काठ सा अकड़ जाता है |
जहां लड़की के जन्म पर शोकगीत गाई जाती है
फिर उसके मौत पर गरीबों में कचौड़ी खिलाई जाती है
जहां मिट्टी के कीड़े, मिट्टी खाकर, मिट्टी उगलते हैं
फिर उसी मिट्टी पर छाती के बल चलते हैं |
जहां कागज़ पर क्षणों में फसल उगाए जाते हैं |
और उसी कागज़ में आगे कहीं वे
गरीबों में जिजीविषा भी बंटवाते हैं |
जहां चीख की भाषा छिछोरी हो गयी है
लेटेस्ट फैशन गालियों का है |
उस नपुंसक किन्तु सभ्य समाज में
कुछ कुत्तों के बीच घिरा अकेला कुत्ता
फिर भी चीखता है -
” घिन्न होती है सोचते हुए कि
छुटपन में मैंने कभी गाया था -
सारे जहाँ से अच्छा… “

चप्पल से लिपटी चाहतें

चाहता हूँ
एक पुरानी डायरी
कविता लिखने के लिए
एक कोरा काग़ज़
चित्र बनाने के लिए
एक शांत कोना
पृथ्वी का
गुनगुनाने के लिए |

चाहता हूँ
नीली – कत्थई नक्शे से निकल
हरी ज़मीन पर रहूँ |
चाहता हूँ
भीतर के वेताल को
निकाल फेकूं |
खरीदना है मुझे
मोल भाव करके
आलू प्याज़ बैंगन
अर्थशास्त्र पढ़ने से पहले |
चाहता हूँ कई अनंत यात्राओं को
पूरा करना |
बादल को सूखने से बचाना चाहता हूँ |
गेहूं को भूख से बचाना चाहता हूँ
और कपास को नंगा होने से |
रोटी कपड़े और मकान को
स्पंज बनने से बचाना चाहता हूँ |
इन अनथकी यात्राओं के बीच
मुझे कीचड़ से निकलकर
जाना है नौकरी मांगने…||

भारतवर्ष

वो किस राह का भटका पथिक है ?
मेगस्थिनिस बन बैठा है
चन्द्रगुप्त के दरबार में
लिखता चुटकुले
दैनिक अखबार में |
सिन्कदर नहीं रहा
नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब
चाणक्य का पैर
घांस में फंसता है
हंसता है महमूद गज़नी
घांस उखाड़कर घर उजाड़कर
घोड़ों को पछाड़कर
समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है
विक्रमादित्य फ़ा हाइन संग
बेताल पकड़ने जाता है |
वैदिक मंत्रो से गूँज उठा है आकाश
नींद नहीं आती है शूद्र को
नहीं जानता वो अग्नि को इंद्र को
उसे बारिश चाहिए
पेट की आग बुझाने को |
सच है-
कुछ भी तो नहीं बदला
पांच हज़ार वर्षों में !
वर्षा नहीं हुई इस साल
बिम्बिसार अस्सी हज़ार ग्रामिकों संग
सभा में बैठा है

पास बैठा है अजातशत्रु
पटना के गोलघर पर
कोसल की ओर नज़र गड़ाए |
कासी में मारे गए
कलिंग में मारे गए
एक लाख लोग
उतने ही तक्षशिला में
केवल अशोक लौटा है युद्ध से
केवल अशोक लड़ रहा था
सौ चूहे मार कर
बिल्ली लौटी है हज से
मेरा कुसूर क्या है ?-
चोर पूछता है जज से |
नालंदा में रोशनी है
ग़ौरी देख रहा है
मुह्हमद बिन बख्तियार खिलजी को
लूटते हुए नालंदा
क्लास बंक करके
ह्वेन सांग रो रहा है
सो रहा है महायान
जाग रहा है कुबलाई ख़ान |
पल्लव और चालुक्य लड़ रहें हैं
जीत रहा है चोल
मदुरै की संगम सभा में कवि
आंसू बहाता है
राजराज चोल लंका तट पर
वानर सेना संग नहाता है |

इब्न बतूता दौड़ा चला आ रहा है
पश्चिम से
मार्को पोलो दक्षिण से
उत्तर से नहीं आता कोई उत्तर
आता है जहाँगीर कश्मीर से
गुरु अर्जुन देव को
मौत के घात उतारकर |
नहीं रही
नहीं रही सभ्यता
सिन्धु – सताद्रू घाटी में
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से
चीखता है भिंडरावाले
गूँज रहा है इन्द्रप्रस्थ
सौराष्ट्र
इल्तुतमिश भाला लेकर आता है
मल्ल देश के आखिरी पड़ाव तक
चंगेज़ ख़ान की प्रतीक्षा में |
कोई नहीं रोकने आता
तैमूर लंग को |
बहुत लम्बी रात है
सोमनाथ के बरामदे में
कटा हुआ हाथ है |
लड़ रहें हैं राजपूत वीर
आपस में
रानियाँ सती होने को
चूल्हा जलाती हैं |
चमक रहा है ताजमहल
धुल रहा है मजदूरों का ख़ून

धुल रहा है
कन्नौज
मथुरा
कांगरा |
कृषि कर हटाकर
तुगलक रोता है-
“पानी की किल्लत है
झूठ है
झूठ है सब
केवल राम नाम सत् है”
वास्को डि गामा ढूंढ रहा है
कहाँ है ?
कहाँ है भारतवर्ष ?

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