गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

राजीव आनंद की कविताएँ

DSCN1907 (Mobile)

लब तेरे


तेरे लबों की कसम प्‍यारे है दोनों
तेरे झील सी आंखों से भी न्‍यारे है दोनों
लबों की रंगत के गुलाब हो जैसे
बोल तेरे लबों की झरती पंखुरियां वैसे
उधर लब तेरे खुशी का पैगाम लाए
इधर हयात मेरी गमों को भूल सा जाए
लबों ने तेरे यूं करिश्‍मा दिखाया
एक बेवफा को बदलकर बावफा बनाया
लबों के तेरे जो तलबगार हो गया
उसे हयात में रब से मुलाकात हो गया
खुद को लबे तमन्‍ना में फना कौन करेगा ?
दीवाना हो, सौदाई हो और कौन मरेगा !

मकसद-ए-हयात


भटकता रहा मैं इस हयात में
हर पल एक खुशी की तलाश में
साधक बना विकट कामना थी मेरी
कोई दुखी न रहे अपने हयात में
चुभा कांटा निकाला था बच्‍चे का एक दिन
बेशुमार खुशियां आयी थी अपने हयात में
रोते एक शख्‍स को हंसा दिया था एक दिन
जश्‍न मनाया इतनी खुशियां मिली हयात में
गम खत्‍म बेजारों का गर कर सकूं
जीने का मकसद मिल जाए इस हयात में

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा
गिरिडीह, झारखंड़ 815301

1 blogger-facebook:

  1. पुरुषों की ऐसी कोमलता समाज की आवश्यकता है ..साधुवाद।।अपने स्नेह को सींचते रहिये

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------