शनिवार, 29 दिसंबर 2012

फ़हीम अख़्तर की कहानी - कुत्ते की मौत

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कुत्ते की मौत

डेविड की उमर पैंसठ साल से कुछ अधिक थी उसके चेहरे की झुरियाँ उसकी बढ़ती उम्र की निशानदेही करती थी। फिर भी उसकी हरकतों में बला की फुर्ती झलकती थी। डेविड जैसे व्‍यक्‍ति के लिये आराम से एक स्‍थिर रिटायर्ड ज़िन्‍दगी गुज़ारना मौत के बराबर था। इसलिये उसने अपनी बाकी ज़िन्‍दगी की व्‍यस्‍तता के लिये बुजुर्ग लोगों के ‘मुस्‍कान क्‍लब' में मामूली सी नौकरी कर ली थी। इस तरह वो सुबह होते ही वृद्ध लोगों को क्‍लब में लाता और शाम होते ही उन्‍हें उनके घर छोड़ आता, अब यही उसके रिटायर्ड जीवन का नियम बन गया था।

मुझे अच्‍छी तरह से याद नहीं कि डेविड से मेरी पहली मुलाक़ात कब और किस प्रकार हुई लेकिन जब भी हुई उसके बाद से ही वो मुझसे काफ़ी बेतकल्‍लुफ़ हो गया। जब भी मिलता अपनी सारी बकवास रामकथायें सुनाया करता- शायद मैं उसकी वक़्‍त गुज़ारी का प्रभावकारी नुस्‍खा था लेकिन अब मुझे उसकी कथाबाज़ी से तकलीफ़ होने लगी थी। उस दिन जब संयोग से आफिस में सामना हो गया तो वो मुझे पकड़ कर जबरदस्‍ती कैन्‍टीन ले गया और अनाप-शनाप बातों का कभी न ख़त्‍म होने वाला सिलसिला शुरू कर दिया। मैं भी उस समय फुर्सत के मूड में था और वो भी पूरी तरह वक़्‍त गुज़ारी का शिकार था- मैं बड़े ध्‍यान से उसकी बकवास सुनने के लिये तैयार था... बातों का आरम्‍भ दूसरे विश्‍वयुद्ध से हुआ। जिसमें उसने अपने फौजी कारनामों की अतिश्‍योक्‍त कहानियों का एक पूरा दफ़्‍तर खोल कर रख दिया। कुछ ही देर बाद उसका झूट सच से भरपूर कहानियों का बेलगाम सिलसिला ऐसे चल पड़ा कि मेरी रुचि उक्‍ताहट में बदल गई मैं अपनी घड़ी की ओर बार-बार बेचैनी से देखने लगा और फिर उससे क्षमा माँग कर कि ‘बाकी फिर कभी' वहाँ से चलने लगा मगर वो भी कम घाघ नहीं था, अपनी बकबक से मेरे कानों को होने वाली तकलीफ के लिये फौरन ‘सॉरी' का शब्‍द दाग़ दिया- लेकिन गतांक से आगे को पूरा करने के सिलसिले में ‘वीक एन्‍ड' के लिये बज़िद होकर मेरे हाथ को अपनी पकड़ में ले लिया। बहरहाल मैंने हाँ - में सर को हिला कर अपनी जान छुड़ाई- लेकिन महाशय अपने मतलब में अत्‍याधिक तेज़ थे। बातों के बीच अगर शाम को उनकी ड्‌यूटी का समय करीब आ जाता तो झट से बातों के सिलसिले की लम्‍बाई पर इमरजेंसी ब्रेक लगाते और तुरंत लोगों को गाड़ी में बिठाकर ये जा और वो जा हो जाते।

खैर ये तो थे डेविड के कथन की सुंदरता के संयोजक तत्त्व, जिनके ताने बाने बुनने में वो बेचारा हमेशा लगा रहता, इस तरह वो अपने बेमतलब के दिन-रात को गुज़ारने का उन्‍हें एक कारआमद ज़रीआ ख़याल करता था।

समय गुज़रता गया और डेविड से एक लंबे अरसे तक ऑफिस में मुठभेड़ नहीं हुई इधर मैं अपने काम की ट्रेनिंग के सिलसिले में दो हफ़्‍ते बाहर था। उधर डेविड अपनी छुट्टियाँ गुज़ारने आयरलैंड चला गया था।

ट्रेनिंग से वापस आते ही काम पर वापस लग गया, इस बीच डेविड भी नज़र नहीं आया। मैंने जब आफिस के दूसरे विभागों में पता लगाने की कोशिश की तो लोगों ने मेरी डेविड को ढूँढने की बेताबी को मुँह बनाकर लाल झन्‍डी दिखा दी। मैंने अपने पिछले काम के विस्‍तार को निपटाने में कुछ इस तरह लगा कि लंच का भी ख़याल न रहा। जब कुर्सी से उठा तो चार बज रहे थे। फिर से डेविड की तरफ़ से चिंता सताने लगी। मानवी रिश्‍ते भी अजीब होते हैं जिस व्‍यक्‍ति से मिलने को दिल नहीं करता, फिर न मिलने पर उसकी तरफ से ख्‍वाहमुखाह चिंता पैदा हो जाती है। मैं इस सोच में से बाहर निकला तो देखा कि आफिस के मेन गेट के बाहर कुछ लोगों भीड़ इकट्ठा थी, जैसे ही मैंने इस भीड़ में संकोच से शामिल होना चाहा तो डेविड महाशय की वहाँ गम की तस्‍वीर बने खड़ा पाया। जैसे उसके किसी रिश्‍तेदार की मौत हो गई हो- मैंने घबराकर दूर से आवाज़ देकर उसे बुलाया, और पूछा मैं-“डेविड आर यू ऑल राइट?”

लेकिन वो कुछ न कह सका जैसे उसके बोलने की सारी शक्‍ति खत्‍म हो गई हो वहाँ मौजूद एक परिचित दर्शक ने बताया कि डेविड का कुत्ता मर गया। मैंने तेज़ी से नज़दीक आकर डेविड से बात करने की कोशिश की परन्‍तु वो अपने आस पास के जिंदा माहौल से बेखबर होकर मुर्दा जानवर की मौत की घटना पर बेबस खड़ा आँसू बहा रहा था। मैं हक्‍का-बक्‍का सोच रहा था कि मरने वाले के रिश्‍तेदारों को किस तरह शोक ज़ाहिर करूँ? लाचार मैं हैरत व इच्‍छा का मारा चुपचाप डेविड के ख़ामोश मातमियों सम्‍मिलित हो गया लेकिन थोड़ी देर बाद ही हमदर्दी की सारी भावना हवा हो गई और मैं ज़्‍यादा कुछ कहे सुने बिना भीड़ को पीछे छोड़ कर चुपचाप आगे बढ़ गया। क्‍योंकि विद्वानों ने ऐसे मौकों को ध्‍यान में रखकर ही कहा है, ख़ामोशी ही अक्‍लमंदी है।”

घर की ओर कदम बढ़ने लगे, और मैं रास्‍ते भर यही सोचता रहा कि एक बोलने वाला जीव कैसे बेज़बान जीव की मौत पर इस तरह और इतनी तेज़ी से ग़मज़दा हो सकता है- काश मेरा भी सम्‍बन्‍ध किसी जानवर से रहा होता तो मैं भी डेविड के गम को डेविड की तरह महसूस कर सकता।

इस वक़्‍त मुझे कोलकता की सड़कों पर दिन-रात घूमते, भोंकते आवारा कुत्तों की याद बहुत तेज़ी से सताने लगी, जो डेविड जैसे जानवरों के पारखी दोस्‍त की तलाश में लगे रहते हैं। दिमाग़ के कोने में भूतकाल एक फ्‍लैशबैक के रूप में उजागर हो गया। बाकी टोपी सर पर धरे, लम्‍बी लम्‍बी लटकती हुई मूँछों वाले ‘चुन्‍नू मियाँं' की छवि (सूरत) आँखों में घूमने लगी कि वो मटन की दुकान पर बिराजमान हलाल जानवरों के कटे हुए हिस्‍सों को खूँटी पर लटका रहे हैं - नीचे बेचारे मरियल भूक से त्रस्‍त कुत्तों का झुन्‍ड है जो चुन्‍नू मियाँ के क्रोध से डर कर दूर से टकटक देख रहा है कि इतने में चुन्‍नू मियाँ का गजभर लम्‍बा डन्‍डा दनदनाता हुआ हमला करता है और कुत्ते डर कर कोसों दूर भाग कर इधर-उधर फैल जाते हैं।

इस घटना को गुज़रे एक मुद्दत गुज़र चुकी थी। मेरे ख़याल में मरने वाले का तेरही चतुर्थी सब ही हो चुके होंगे। डेविड की ड्‌यूटी वक़्‍ती तौर पर दूसरे विभाग में लग गई थी। यही कारण था कि अब डेविड से कभी-कभार ही मुलाक़ात की नौबत आती। इसके अलावा मैं भी अपने आफिस के काम में कुछ इस तरह से व्‍यस्‍त हो गया कि डेविड को तलाश करने और उससे मिलने का अवसर ही नहीं मिला।

एक दिन मैं अपने एक मित्र के साथ ऑफिस के बाद किसी रेस्‍टोरेन्‍ट में कॉफी पीने रुक गया। बातों ही बातों में डेविड की चर्चा निकल आई उसने बताया कि डेविड की माँ का देहांत हो गया है। बेचारी एक लम्‍बे समय से बीमार थी मैं यक़ीन करना चाहता था कि ये इसी डेविड की तरफ़ इशारा है जो आफिस की ओर से वृद्ध शहरियों को लाने ले जाने की ड्‌यूटी पर तैनात है।

मित्र - “हाँ-हाँ वही अपना डेविड।”

मैं - “वही डेविड- जिसका कुत्ता अभी हाल ही में मर गया था?”

मित्र- “हाँ-हाँ वही, अब उसकी माँ भी मर गई- बेचारी!”

कॉफी खत्‍म हो चुकी थी। हम दोनों उठकर काउन्‍टर पर गये बिल दिया, और बाय-बाय करके अपने अपने रास्‍ते चल पड़े। मैं हमदर्दी की भावना से भरा पूरा सारे रास्‍ते डेविड की माँ की मौत के बारे में सोचता रहा। डेविड कितना परेशान होगा। माँ की हस्‍ती बहुत पवित्र ईश्‍वर की देन है। निश्‍चित तौर पर डेविड की तन्‍हा ज़िन्‍दगी के लिये ये एक कभी न भूलने वाली (अविस्‍मरणीय) महान घटना होगी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं जब डेविड से मिलूँगा तो कैसे उसे सांत्‍वना दे पाऊँगा। संवेदना के शब्‍दों की परंपरा मरने वालों के रिश्‍ते और नातेदारों के लिये बहुत कष्‍टदायक होती है, और फिर डेविड जैसा तन्‍हाई का मारा स्‍वाभिमानी व्‍यक्‍ति जो एक जानवर की मौत पर टूटकर बुरी तरह बिखर जाता है तो एक इंसान की मौत का जानलेवा सदमा कैसे सहन करेगा। ख़ासकर वो महान इंसान जो उसकी माँ थी। जिसकी गोद में उसका वजूद परवान चढ़ा था। मेरा दिमाग़ ऐसे ही ख्‍़यालों का घर बना हुआ था।

दूसरे दिन मैं ऑफिस आया तो देखा डेविड किसी बुजुर्ग व्‍यक्‍ति को गाड़ी से उतारकर बड़ी ऊँची आवाज़ में बात कर रहा था। कुछ ही देर बाद वो हँसता हुआ तेज़ी से अपनी गाड़ी का दरवाज़ा बंद करने लगा। उस एक क्षण के मध्‍य डेविड मेरे लिये अनगिनत गुत्‍थियों का एक मिक्‍चर बन गया जिसको मेरा दिमाग़ समझने में असमर्थ था। उस एक पल का असर ख़त्‍म होते ही मैंने पास जाकर डेविड से बात करने की कोशिश की मेरी आवाज़ में अफ़सोस का ऐसा दर्द उभर आया जिसका इज़हार नहीं किया जा सकता था।

मैं - “डेविड Plesae, I am Sorry. मुझे कल ही तुम्‍हारी माँ की मौत का समाचार मिला।”

डेविड - “ओह! हाँ - माई मदर ....”

मैं - “तुम, तुम ठीक तो हो?”

डेविड- O' yes वो बूढ़ी थी यार Don't worry.Þ डेविड ये कहकर हँसते हुए गाड़ी में बैठ गया- कुछ ही देर में वो अपनी गाड़ी के साथ मेरी नजरों से ओझल हो चुका था। मैं शाक्‍ड था- जैसे मेरे तमाम होश हवास किसी ने मुझ से छीन लिये हों- उसके शब्‍द “बूढ़ी थी यार- Dont worry”. मेरे दिमाग़ पर पत्‍थर की तरह गिरे और मैं चौंक कर संभल गया, और अपने घर की ओर मुड़ गया और सोचने लगा कि डेविड को कोई ग़म नहीं था। एक ऐसे इन्‍सान की मौत जो उसकी माँ का महान रूप थी, डेविड के नज़दीक उसकी कोई अहमियत नहीं थी। मैं पश्‍चिमी संस्‍कृति का मामूली आदमी पूरब के इन्‍सानी अधिकारों के ठेकेदारों की शानदार संस्‍कृति और नैतिक क़दरों को समझने और अपनाने से शायद हमेशा वंचित रहा हूँ।

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