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January 2012
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तुम अहसास हो

तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ
तब तक न मिलें
जिन्दगी अधूरी है....
यही है रिश्ता
हमारा तुम्हारा

बिन एक दूजे के
तू भी कुछ नहीं
मैं भी खाक हूँ
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ....
मिल जाएँ अगर
तो कुछ बात हो...
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ....

बिन तुम्हारे
मैं हूँ क्या
इक बिगड़ी हुई
हालात हूँ...
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ...

कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com

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स्मृतियाँ.....

उन प्यार करने वालों के नाम जिन्हें अपनी बीती ग़ज़ल हर रोज याद आती है,
और दिल  भूलना चाहता है उस परी को...
पर आँखें भी.. क्यूँ  हर  दिन अज़ीब  से मंज़र दिखाती है ,
कि उसकी यादों की ओढ़नी रोज़ कुछ घटनाओं  के सहारे उडी चली आती है,,
उन्हीं छोटी - छोटी प्यार भरी घटनाओं को समेटती  एक कविता स्मृतियाँ.....

हर आस मिटा दी जाती है, हर सांस सुला दी जाती है...
फिर भी यादों के पन्नों से कुछ स्म्रतियाँ  चली आती है...
उन यादों  में खो जाता हूँ, बस तू ही दिखाई देती है,
ठीक उसी पल दरवाजे पर एक आहट सी सुनाई देती है,
हम बिस्तर  से दरवाजे तक दौड़े - दौड़े फिरते हैं ,
पर वो तो हवा के झोकें थे जो मजाक बनाया करते हैं ,
दिल घर की छत के एक किनारे बैठा आहें भरता है,
दो हंसों का जोड़ा नदिया के पानी में क्रंदन करता है,
जब हंसों के करुण विनय से नदिया तक भर जाती है,
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.


उन भूली - भटकी यादों को कैसे मैंने बिसराया है,
तेरे हर ख़त को मैंने उस उपवन में दफनाया है,
उन ख़त के रूठे शब्दों  से पुष्प नहीं खिल पाते हैं,
शायद तेरे भेजे गुलाब मुझे नहीं मिल पाते हैं,
जन्मदिवस की संध्या पर जब जश्न मनाया जाता है,
सारा घर भर जाता है हर कक्ष सजाया जाता है
जब वो भुला चुकी है मुझको तो हिचकी क्यूँ आ जाती है ?
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.

अर्धरात्रि के सपनों में वो सहसा ही आ जाती है,
मेरे सुन्दर समतल जीवन में तरल मेघ सी छा जाती है,
प्रथम बिंदु से मध्य बिंदु तक  मुझे रिझाया करती है,
मध्य बिंदु से अंत तक वो शरमाया करती है,
मैं अक्सर खिल जाता हूँ जब वो अधरों को कसती है,
बिलकुल बच्ची  सी लगती है जब वो हौले से हँसती है,
जब रोज़ सवेरे उसकी बिंदिया टुकड़ों  में बँट जाती है,
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.


शायद रूठ गयी है मुझसे या फिर कोई रुसवाई है,
तेरे पाँव की पायल मैंने अपने आँगन में पाई है,
आज अचानक खनकी पायल मुझको यूँ समझती है,
अब और खनक ना पाऊँगी यह कहकर मुझे रुलाती है.
और गली के नुक्कड़ पर जब कुछ बच्चे खेलने आ जाते है,
घंटों हुई बहस में एक - दूजे का सर खा जाते है,
जब वो छोटी लड़की उन सबको भाषण सा दे जाती है,
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.


कैसे मैंने उस नीले फाटक वाले घर का पता भुलाया है?
क्यूँ नहीं पहले ख़त को उसने तकिये के नीचे सुलाया है?
मैंने हर शाम उन उपहारों की होली जलती देखी है,
उन उपहारों के साथ रखी वो कलियाँ ढलती देखी है,
हम बंद अँधेरे कमरे में कविता तक लिख लेते है,
पर कलम कागज के मध्य शब्द तेरे ही सुनाई देते है,
जब प्रणय गीत लिखते - लिखते कलम अचानक रुक जाती है,
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.

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“ कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ? ”

दिल की संवेदनाओं  को मैं मार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?
पथ भ्रष्ट हो गया, पथिक भ्रष्ट  हो गया,
गाँधी और सुभाष का ये राष्ट्र भ्रष्ट  हो गया,
चंद रुपयों को भाई भाई भ्रष्ट  हो गया,
जगदगुरु- सा मेरा देश भ्रष्ट  हो गया..
राम राज्य लाने वाली सरकार कैसे दूं?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

भ्रष्टाचार की खातिर शत्रु सीमा से सट जाते हैं  ,
बुनियादी आरोपों से अब संसद तक पट जाते हैं ,
मानचित्र में हर साल राज्य बंट जाते हैं,
भारत माता के कोमल अंग कट जाते हैं..
इस अखंड राष्ट्र को आकर कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आरक्षण  विधान कर नेता यूँ सो जाते हैं,
मेहनतकश बच्चे खून के आंसू रो जाते हैं,
कर्म करते -करते कई युग हो जाते हैं,
कलयुग  के कर्मयोगी पन्नो में खो जाते हैं,
कृष्ण ने जो दे दिया वो सार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

माँ अपने बच्चे को ममता से सींच देती है,
मंहगाई  की मार गर्दनें खींच देती है,
रोटी के अभाव में माँ बच्चा फेंक देती है,
फिर भी पेट ना भरा तो जिस्म बेच देती है,
इस पापी पेट को आहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

एक लाठी वाला पूरी दुनिया  पे छा गया,
दूजा  सत्ताधारी तो चारा तक खा  गया,
चम्बल के डाकुओं को संसद  भी भा  गया,
शायद जीत जायेगा लो चुनाव आ  गया,
ऐसे भ्रष्ट नेता को विजय हार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

तिब्बत चला गया अब कश्मीर चला जायेगा ,
यदुवंशी  रजवाड़ों  में जब बाबर घुस  आएगा ,
देश का  सिंघासन चंद सिक्कों में बँट जायेगा ,
तब बोलो भारतवालो तुम  पर क्या रह जायेगा  ?
आती  हुई  गुलामी  का समाचार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

सीमा  के खतों  में हिंसा तांडव करती  है,
सूनी  राखी  देख कर बहिन रोज़ डरती  है,
नयी दुल्हन सेज पर रोज़ मरती है,
और बूढी  माँ की आँखें रोज़ जल भरती है,
माँ को बेटे की लाश का उपहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आज के भी दशरथ चार पुत्रों को पढ़ाते है,
फिर भी चार पुत्रों पर वो बोझ बन जाते है,
कलयुग में राम कैसे मर्यादा निभाते है ?
राम घर मौज ले और दशरथ  वन  जाते है,
ऐसे  राम को दीपों की कतार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

मानव अंगों का व्यापार यहाँ खिलता  है,
शहीदों के ताबूतों  में कमीशन भी मिलता है,
बेरोज़गारों  का झुण्ड चौराहों  पे दिखता है,
"फील गुड"  कहने से सत्य नहीं छिपता  है,
देश की प्रगति  को रफ़्तार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

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ANANT BHARDWAJ

33, SURYA NAGAR  BODHASHRAM

FIROZABAD (U.P.) INDIA

283203

blog:  http://kavianantbhardwaj.blogspot.com/

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किशोरावस्‍था में किशोर छात्र-छात्राओं को एड्‌स जागरूकता के बहाने सरकारी पाठशालाओं में यौन शिक्षा परोसने की तैयारी राष्‍ट्रीय महिला आयोग करने जा रहा है। इस तरह की नाकाम कोशिश मध्‍यप्रदेश सरकार चर्चा परिचर्चाओं के माध्‍यम से की थी, लेकिन सेवा-निवृत्ति की उम्र के करीब पहुंचे शिक्षक किशोरावस्‍था की दहलीज पर खड़े चौदह-पन्‍द्रह साल के बालक-बालिकाओं किस मनोवैज्ञानिक तरीके से यौन शिक्षा का पाठ पढाऐंगे इस गंभीर विचारणीय बिन्‍दु पर सात साल से बात अटकी है। क्‍योंकि उम्र में कई दशकों का अंतराल और पारंपरिक मर्यादा साठ साल के शिक्षक को सेक्‍स का पाठ पढ़ाने के लिये मानसिक रूप से किस तरह से और किस स्‍तर पर तैयार करेगी यह शिक्षक के लिये एक बड़ी चुनौती है। इस असहज चुनौती को स्‍वीकार कर भी लिया जाए तो भविष्‍य में इसके क्‍या परिणाम अथवा दुष्‍परिणाम निकलेंगे इन पर भी गंभीर वैचारिक विश्लेषण की जरूरत है।

हमारे देश में आजकल विद्यालय स्‍तर पर यौन शिक्षा को लेकर जबरदस्‍त हो-हल्‍ला है। हो-हल्‍ला अथवा हल्‍ला बोल शब्‍दों का इस्‍तेमाल इसलिए किया जा रहा है क्‍योंकि शालाओं में यौन शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में न तो कोई नियोजित वैज्ञानिक नजरिया है, न ही कोई दूरदृष्‍टि और न ही नैतिकता के संदर्भ में किसी चिंतन की परवाह है। अर्थात्‌ यौन शिक्षा के संदर्भ में जब तक भारतीय परिवेश में सामाजिक और नैतिक मूल्‍यों व मान्‍यताओं के अनुरूप यौन शिक्षा के स्‍वरूप और पद्धति निर्धारित नहीं हो जाते तब तक यौन शिक्षा को शालाओं में लागू करने के गैर जिम्‍मेदाराना दबाव को हल्‍ला बोल कहना ही औचित्‍यपूर्ण होगा ? आयोग की अध्‍यक्ष ममता शर्मा ने कहा है कि 10 वीं और 12 वीं कक्षा के स्‍तर पर गृह विज्ञान के पाठ्‌यक्रम में यौन शिक्षा को सहायक विषय के रूप में शामिल किया जाए। इससे महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे यौन अपराधों में कमी आएगी।

मध्‍य-प्रदेश के पूर्व शालेय शिक्षा मंत्री महेन्‍द्र सिंह, दिग्‍विजय सिंह सरकार के दौरान काहिरा में जनसंख्‍या व विकास विषय पर संपन्‍न हुए अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में गर्भपात, विवाह पूर्व संतानोत्‍पति के अधिकार जैसे विवादास्‍पद मुद्‌दों पर बहस मुबाहिशा करके और सम्‍मेलन की भावना से उत्‍प्रेरित होकर जब लौटे थे, तब उन्‍होंने मध्‍य-प्रदेश के स्‍कूलों में यौन शिक्षा लागू करने का हल्‍ला सा बोल दिया था। यौन शिक्षा लागू करने के सिलसिले में महेन्‍द्र सिंह का नजरिया था कि यदि शालेय स्‍तर पर ही बच्‍चों को यौन शिक्षा सही व स्‍वस्‍थ रूप से दे दी जाये तो एड्‌स जैसे भीषण रोग से देश को मुक्‍ति मिल सकती है। साथ ही सेक्‍स के संबंध में आधा अधूरा ज्ञान किशोरों को कुंठित और मानसिक अपंगता की ओर ले जाता है। ऐसे में किशोर अखबारों में सेक्‍स क्‍लीनिक के इश्‍तहारों और टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले गर्भ निरोध के साधनों को पढ़ व देखकर अपनी कुंठित जिज्ञासाओं को शांत करता है।

इसके पहले दिल्‍ली में जनसंख्‍या और यौन शिक्षा संबंधी विषयों से जुड़ा एक एशियाई देशों का सम्‍मेलन हुआ था, जिसमें यौन शिक्षा शालाओं में लागू करने के लिए जबरदस्‍त वातावरण निर्मित किया गया। इस सम्‍मेलन में दावे किए गए कि बालक-बालिकाओं में आज जितना भी अंधविश्‍वास और अज्ञान है उसका कारण उन्‍हें यौन शिक्षा न दिया जाना ही है। इस सम्‍मेलन में उपस्‍थित शिक्षाशास्‍त्री जनसंख्‍या वृद्धि के आतंक से इतने आतंकित थे कि उन्‍हें स्‍कूलों में यौन शिक्षा इसलिये अनिवार्य लग रही थी ताकि शुरूआत से ही संतति निरोध की जागरूकता पैदा हो जाऐ।

इसके पहले राष्‍ट्रीय स्‍तर की शैक्षिक संस्‍था एन.सी.ई.आर.टी. भी 1993 में किशोरों को यौन शिक्षा देने की सिफारिश कर चुकी है।

यौन शिक्षा के संदर्भ में इस तरह लगातार सम्‍मेलन कर स्‍कूलों में उसकी अनिवार्यता सिद्ध करने के ये कथित औचित्‍य और खोखले व अविवेकपूर्ण दावे बेबुनियाद साबित हो चुके हैं ? हालांकि इन सभी सम्‍मेलनों में मनौवैज्ञानिक आधार पर विशेष सतर्कता के साथ यौन शिक्षा दिए जाने के प्रावधान रखे गए हैं। लेकिन यौन शिक्षा के नाम से इसे पाठ्‌यक्रम में शामिल किए जाने के मायने इस बात के द्योतक हैं कि शुरूआत से ही इस शिक्षा को लागू करने के सिलसिले में मनोवैज्ञानिक समझ से काम नहीं लिये जाने के प्रयत्‍न नहीं किये गये। सांस्‍कृतिक चिंतन देने और परिवार ही संस्‍कार की पाठशाला मानने वाले देश में यौन शिक्षा केवल सुरक्षित यौनाचार की तरकीबों की जानकारी भर नहीं होना चाहिए ? यदि पाठ्‌यक्रमों के निर्माता थोड़ी सूझबूझ काम लें तो यौन शिक्षा को शरीर विज्ञान और स्‍वास्‍थ्‍य रक्षा विषयक जैसे नाम दिए जा सकते हैं और यौन शिक्षा को कामालाप की पद्धति बनाए बिना उपरोक्‍त विषयों में समावेश किया जा सकता है।

यौन शिक्षा के साथ नैतिकता और शिष्‍टाचार के संदर्भ जोड़े जाने नितांत अनिवार्य है। अंग्रेजी शिक्षा पद्वति पाश्‍चात्‍य मूल्‍य और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया ने जब से घरों में हिंसा, अपसंस्‍कृति और अनैतिकता के दुष्‍प्रभाव छोड़ना शुरू किए हैं, तब से जबरदस्‍त तरीके से सांस्‍कृतिक मूल्‍यों के हृास के साथ नैतिकता का पतन हुआ है। इस तरह जो दूषित वातावरण निर्मित हुआ, उसके चलते ही कम आयु के लड़कों द्वारा नाबालिग लड़कियों के साथ यौनिक अत्‍याचार अथवा बलात्‍कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हालांकि इस तरह के अपराधी पेशेवर नहीं होते वे मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर व विकृत होते हैं और इस मानसिक विकृति के विकार की जड़ में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया द्वारा सामाजिक मूल्‍यों को धता बताकर परोसे जा रहे ऐसे कार्यक्रम हैं जिनमें सेक्‍स और नाजायज संबंधों के मूल्‍यों को स्‍थापित कर थोपा जा रहा है। ये अश्‍लील विज्ञापन और कार्यक्रम ही स्‍कूली बच्‍चों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहे हैं।

यौन शिक्षा को मौजूदा स्‍वरूप में विद्यालय स्‍तर पर लागू करना इन्‍हीं विकारों का विस्‍तार करना होगा। क्‍योंकि बच्‍चों को जब जननांगों के स्‍वरूप और उनकी क्रियाओं के बारे में बताया व समझाया जाएगा तो क्‍या बालमनों में कामभावनाओं की कामजनित जुगुप्‍सा जागृत नहीं होगी ? और यदि होगी तो क्‍या वे बतौर प्रयोग शारीरिक मिलन के लिए उत्‍कट नहीं होंगे ? यौन शिक्षा वाले स्‍कूलों में यदि शिक्षा का यह कुरूप सिलसिला चल निकला तो नाबालिगों के बीच बलात्‍कार अथवा यौनाचार की संख्‍या बढ़ेगी ही, अविवाहित मातृत्‍व की समस्‍या भी पाश्‍चात्‍य देशों की तरह विकराल रूप धारण कर सामने आएगी। समाज और परिवार के लिये ऐसे प्रकरण शर्मनाक होंगे, लिहाजा तय है कि यौन अपराधों में भी बेतहाशा इजाफा होगा, जिस पर बाद में अंकुश लगाना नामुमकिन होगा। दुनिया के जिन देशों में भी यौन शिक्षा पाठ्‌यक्रम में शामिल रही है वे न तो खजुराहो जैसे काम-कला के श्रेष्‍ठ मंदिर दे पाए और न ही वात्‍स्‍यायन द्वारा लिखित ‘कामसूत्र' जैसा काम-विषयक अनूठा ग्रंथ दे पाए दरअसल हमारी ये प्राचीन धरोहरें नग्‍नता और अश्‍लीलता के प्रतीक न होकर सृष्‍टि-सृजन के ज्ञान-स्‍त्रोत हैं।

प्रछन्‍न रूप से यौन शिक्षा बाजारवाद का हिस्‍सा भी है। दरअसल, बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की आमद के साथ दवाओं के लिए खुले बाजार के जो कानून बने हैं और जिस तेजी से कामवर्धक दवाएं व यौन सुरक्षा संबंधी वस्‍तुओं की आमद बढ़ी है, उससे लगता है देश में यौनाचार को बढ़ावा देने के लिये ये कंपनियां यौन शिक्षा को एक बहाना बना रही हैं। इन कंपनियों का खास मकसद तो अपने उत्‍पाद खपाने के लिये उपभोक्‍ता तैयार करना है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मंशा के संबंध में यहां एक सटीक लेकिन नितांत बेहूदा उदाहरण देना बेहद जरूरी है। कुछ समय पहले अखबारों में एक समाचार छपा था कि बिहार के धनबाद के एक कन्‍या हायर सेकेण्‍ड्री स्‍कूल में, एक बहुराष्‍ट्रीय कंपनी ने पहले तो यौन शिक्षा पर एक फिल्‍म दिखाई फिर प्रचार के लिये अपने उत्‍पाद के रूप ‘नेपकिन' मुफ्‍त में भेंट किये। कल ऐसी ही कोई कंपनी किसी स्‍कूल में जाकर यौन शिक्षा के बहाने एड्‌स की रोकथाम पर फिल्‍म दिखाए और फिर बालकों को मुफ्‍त निरोध के पैकेट बांटे तो आश्‍चर्यचकित होने की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि कालांतर में यौन शिक्षा लाभ का साधन और साध्‍य बनने वाली है।

चूंकि मेरी राय में यौन शिक्षा या यौन जागरूकता एक सार्वजनिक मुद्‌दा न होकर नितांत व्‍यक्‍तिगत मामला है, जो बच्‍चों की प्रकृति, मानसिकता और स्‍वास्‍थ्‍य के अनुरूप अलग-अलग उम्र में स्‍वयं काम भावनाओं को जगाता है। अब जरूरत है कि ये भावनाएं उम्र के तकाजे के चलते दूषित वातावरण से प्रभावित न हों तो इन्‍हें जागरूक बनाने का पहला दायित्‍व परिवार में माता-पिता अथवा बड़े भाई-बहिनों को ही संभालना चाहिए। अनुभवी दोस्‍त और सखियां भी यौन शिक्षा का पाठ पढ़ाने के सबसे अच्‍छे सहायक साबित हो सकते हैं, क्‍योंकि उनकी अंतरंग निकटस्‍थता होती है। फिर भी यदि इस देश के कथित भविष्‍य दृष्‍टा यौन शिक्षा को स्‍कूलों में पढ़ाया जाना अनिवार्य समझ ही रहे हैं तो भारतीय सामाजिक और नैतिक मूल्‍यों के परिप्रेक्ष्‍य में यौन शिक्षा के स्‍वरूप और पद्धति निश्‍चित होने चाहिएं। और इस शिक्षा को यौन शिक्षा के बजाय शरीर विज्ञान या स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान नामों से पाठ्‌यक्रम में शामिल करना चाहिए। अन्‍यथा यह शिक्षा किशोर-किशोरियों में काम जनित ज्ञान के बजाय कामजनित विकार ही पैदा करेगी।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

फोन 07492-232007, 233882

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1

जरा समय निकाल कर आ...

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा।।

बमुश्किल खुशियाँ जोड़ी हैं, तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा।।

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े हैं , तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा।।

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखे हैं

कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर

बाकी कुछ तेरे हिस्से रखे हैं।

जरा समय निकाल कर आ

अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा।।

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है

आँखों में, आंसुओं का ,समन्दर भरा है

उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ

अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा।

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

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२.

तुम हमें क्या रुलाओगे?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

हम चाँद को छेड़ देते हैं , सूरज के साये में
तुमको अब भी , हम सयाने लगते हैं ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हंसी कोई
जब गम होते हैं ज्यादा दिल में , हम लोगों को हंसाने लगते हैं।

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियों से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगते हैं।

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगते हैं।

तुम फूल हो, तो हमें fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी हैं , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते हैं।

तुम बाग़ में रहो या घने जंगल में , परवाह किसे है?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्ते बनाने लगते हैं।

तुम हमें क्या रुलाओगे ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

विजय पाटनी

नसीराबाद राजस्थान

पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीन, चार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरह, चौदह, पंद्रह, 16, 17, 18

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

कामवाली बाई

मैं एक कामवाली बाई हूँ. वैसे तो कामवाली बाई का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में एक चालीस-पचास साल की बूढी औरत का खयाल आता है. लेकिन बदलते हुए वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है. उसी तरह हम कामवाली बाईयों का भी हिसाब-किताब बदल चुका है. पहले कोई कामवाली बाई मजबूरी में बनती थी लेकिन आज बात कुछ और है. मजबूरी ने पेशे का रूप ले लिया है.

पहले कामवाली बाई पैसे कमाकर अपने बच्चों का पेट पालती थी. आज माँ भी काम करती है और बेटी भी. मैं भी एक कामवाली बाई की बेटी और एक कामवाली हूँ. मेरी उमर है सत्रह साल. बदकिस्मती है लेकिन बताना जरुरी है क्यूंकि बात ही ऐसी है.

हम कामवाली बाईयां लड़कों को स्कूल भेजती हैं ताकि वो सर उठाके जी सकें. और लड़कियाँ तो काम करने के लिए ही बनी हैं. कामवाली बाई के घर में पैदा होने वाली लड़की एक नई बाई बन जाती है. जिस तरह सबके घर में लड़का होता है तो खुशी होती है कि “चलो लड़का है. बात आगे बढ़ेगी.” उसी तरह हमारे यहाँ जब लड़की होती है तो लगता है जैसे “एक और हाथ-पैर हो गए.”

कभी-कभी बुरा भी लगता है कि “एक और आ गई हमारी तरह दूसरों का कचरा साफ़ करने के लिए.”

कुछ भी हो, जिन्दा रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है. अगर हम भी पैदा होतीं किसी अमीर के घर, तो हम भी स्कूल जातीं. इस बात का इतना ज्यादा अफ़सोस नहीं होता कि मैं एक कामवाली बाई हूँ. अपनी मेहनत का खाती हूँ. दुनिया भर के कामों में एक काम ये भी है, तो क्या बुरा है? वैसे भी, वेश्या बनकर इज्जत गवाने से तो अच्छा ही है कि हम इज्जतदार लोगों के घरों में काम करती हैं.

मैं भी एक इज्जतदार घर में काम करती हूँ. इस घर में एक पति-पत्नी हैं. अभी-अभी एक प्यारा सा बेटा हुआ है जो ज्यादातर मेरे ही पास रहता है. उसी की देखभाल के लिए मुझे रखा गया है. अच्छी सोसाइटी है. पति-पत्नी दोनों काम पर जाते हैं.

सबकुछ अच्छा चल रहा था. अचानक, एक दिन मुझे कुछ महसूस हुआ. पत्नी जिसे मैं ‘दीदीजी’ कहती हूँ, अपने पति जिसे मैं ‘साबजी’ कहती हूँ, का मोबाइल ढूँढ़ रहीं थीं. और साबजी बड़े सकपकाए से थे. पता नहीं क्यूँ? उस वक्त मैं बाथरूम में नहा रही थी. मैं मियाँ-बीवी दोनों की बातें सुन रही थी. पत्नी कह रही थी, “अरे तुमने अपना फोन कहाँ रख दिया?” और पति का जवाब था “पता नहीं यार, मिल नहीं रहा. यहीं सोफे पे ही तो रखा था.” मैं सब सुन रही थी. और सोच रही थी “ये लोग बिना मेरे एक फोन भी नहीं सम्भाल सकते तो एक बच्चा क्या संभालेंगे?” मैं जल्दी-जल्दी नहा के बाहर आई और फोन ढूंढने लगी. तभी मैंने देखा ‘साबजी’ जल्दी से बाथरूम में घुस गए. ऐसा लगा जैसे वो मेरे निकलने का ही इन्तजार कर रहे थे. और जल्दी से बाथरूम से बाहर आए और सोफे पे बैठ गए. मुझे कुछ अजीब लग रहा था. पहले कभी ‘साबजी’ को इतनी हड़बड़ी में नहीं देखा था. मैं ये सब देख रही थी और सोच रही थी कि “साबजी का फोन घर में ही होगा इसमें इतना घबराने वाली बात क्या थी? और फिर तीन-तीन लोग मिलकर एक फोन को ढूँढ़ रहे थे.”

तभी फोन मिल गया. ‘साबजी’ को ही मिला. उन्होंने कहा, “ये रहा, सोफे में घुस गया था.” और इतना कहकर फोन उन्होंने ‘दीदीजी’ को दे दिया. और खुद एक लम्बी सांस ली. ऐसा लगा जैसे कोई कीमती चीज खो गई थी और अचानक मिल गई हो.

खैर, बात आई, गई और हो गई. उसके बाद फिर कभी फोन नहीं खोया. कुछ दिन बीते, उस दिन सन्डे था. मैं नहाने के लिए बाथरूम में जा ही रही थी. तभी ‘साबजी’ ने कहा, “दो मिनट रुको.” मैं पीछे हट गई. ‘साबजी’ बाथरूम में गए और थोड़ी देर बाद वापस आए. फिर मैं नहाने के लिए अन्दर घुस गई. मैंने बाथरूम को गौर से देखा. सबकुछ अपनी जगह पे था. मैं नहाके बाहर आई और देखा ‘साबजी’ बाहर बेसब्री से मेरे निकलने का इन्तजार कर रहे थे. मेरे निकलते ही वो बाथरूम में घुस गए और उसी दिन की तरह जल्दी से बाहर आ गए.

अब मुझे कुछ शक हुआ “कुछ तो गडबड है?” थोड़ी देर बाद मैं वापस बाथरूम में गई और ध्यान से देखा. सबकुछ अपनी ही जगह पे था सिवाय एक चीज के. और वो चीज थी ‘ओडोनिल’ का पैकेट. उस पैकेट में ओडोनिल नहीं था. वो खाली था. अब मेरा माथा ठनका. इसका क्या मतलब है? घर में सारा काम तो मैं करती हूँ. ओडोनिल भी मैं ही बदलती हूँ फिर ये पैकेट खाली कैसे हुआ? इसका मतलब ‘साबजी’ मेरा नहाते हुए विडियो बनाते हैं? मैं तो बाथरूम की दीवार से सटकर खड़ी हो गई. ये क्या बात थी? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. ‘साबजी’ ने कभी ऐसी कोई हरकत नहीं की थी जिससे मैं उनकी नियत पे शक करती. मगर ये क्या था? इससे क्या मिलेगा साबजी को? ये मर्द लोग भी ना बड़े अजीब होते हैं. इन्हें कब क्या चीज अच्छी लगती है कोई नहीं जानता. लेकिन मुझे ये जानना था कि मेरे साबजी मेरे नहाने से पहले बाथरूम में क्यूँ जाते हैं? और क्यूँ मेरे निकलते ही बाथरूम में फिर जाते हैं?

इसके लिए मैंने मौका देखकर साबजी का मोबाइल उठाया और देखने लगी. मगर तभी साबजी ने देखा लिया और मैंने जल्दी से फोन वापस रख दिया. मैंने साबजी को देखा. उन्होंने मुझे डांटने के बजाय कुछ नहीं कहा. और वो डर से गए थे. अब मुझे पूरा यकीन हो गया था कि ये मोबाइल का ही चक्कर है.

इस बात को बीते कई दिन हो गए हैं. उस दिन से साबजी मुझसे कटे-कटे से रहते हैं. खुद मुझे कोई काम नहीं कहते. सारा काम दीदीजी से ही कहलवा देते हैं.

अब मुझे ये नहीं समझ में आ रहा कि मैं क्या करूँ? मैंने तो सबूत के तौर पे कुछ देखा भी नहीं. लेकिन साबजी अपने भोलेपन से पकड़े गए. मैं कई बातों से डरती हूँ. एक तो ये कि अगर मैंने कुछ कहा तो सबसे पहले मेरी नौकरी जायेगी. उससे भी ज्यादा नुकसान दीदीजी का होगा. उनका अपने पति के ऊपर से विश्वास उठ जाएगा. घर में झगड़े होंगे सो अलग. और कौन जाने साबजी के मन में क्या था? क्यूंकि उसके बाद वो फिर कभी इस तरह मेरे और बाथरूम के आसपास मँडराते हुए नजर नहीं आए. अगर वो गलत नियत के होते तो जरुर कुछ न कुछ गलत करते. कुछ भी हो साबजी आदमी बड़े अच्छे हैं. और अगर उन्होंने मेरा एमएमएस बनाया भी तो कभी मुझे ब्लैकमेल करने की कोशिश क्यूँ नहीं की? अब ऐसे साबजी के ऊपर इल्जाम भी लगाऊं तो कैसे?

मैं जितने भी साबजी हैं और जो लोग घर में कामवाली बाई रखते हैं उनसे बस यही कहना चाहती हूँ कि हमें इस तरह तमाशा न बनाएँ. आपलोग बड़े लोग हैं. हम छोटे लोग हैं. लेकिन इज्जत हमें भी प्यारी होती है. इस तरह हमारी मजबूरी का फायदा न उठाएँ.

हम तो अपने काम से काम रखते हैं. हमें नहीं पता कब आपकी नजर हमारे शरीर के किस हिस्से पे पड़ती है. सच कहा जाए तो हम जो काम करते हैं वो आपकी घर की औरतों का है लेकिन आप बड़े लोग हैं. पैसे खर्च कर सकते हैं. इसलिए आराम खरीद सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप हमें शर्मशार करें. हम जो भी हैं, हैं तो एक औरत ही ना. हमें पता है मर्द की जात और मर्द की औकात.

हम बहुत कुछ सहते हैं ताकि आपके घरों में शान्ति रहे. हम भी मजबूर हैं क्या करें? एक औरत का जिस्म लेके घूमते हैं कहाँ तक लोगों की नजर पे इल्जाम लगाते रहेंगे. वैसे भी, एक औरत की जगह एक मर्द के पास ही होती है. अगर हम इंसानी फितरत समझते हैं तो थोड़ी शराफत आपलोग भी दिखाएँ.

मैं गलत-सही की बात नहीं कर रही. सच कहूँ तो किसी गैरमर्द के घर में घर की औरत का काम करना ही गलत है लेकिन क्या करें? ये रिवाज हमने नहीं बनाया. हमें तो ये विरासत में मिला है. ये हमारी किस्मत है. लेकिन अब आपलोग हमारी किस्मत का मजाक तो न बनाएँ...? मुझे पता है कुछ बाईलोग ऐसा करती हैं. साबजी को खुश रखती हैं और अपनी आमदनी बढ़ाती हैं. इसीलिए मैंने पहले ही कहा मैं सही-गलत की बात नहीं कर रही हूँ. दुनिया में बहुत कुछ होता है. लेकिन आपलोग इस तरह मत कीजिए. आपलोग डरते हैं इसलिए ऐसा करते हैं. औरत सिर्फ प्यार करने के लिए बनी है. उसे सिर्फ प्यार कीजिए. औरत की इज्जत को यूँ खराब न कीजिए.”

सोच रही हूँ मैं खुद ये नौकरी छोड़ दूँ. फिर सोचती हूँ नया साब पता नहीं कैसा हो? इसने तो सिर्फ विडियो ही बनाया था. फिर डिलीट भी जरुर कर दिया होगा. क्यूंकि मैंने एक बार मोबाइल देखने की कोशिश की थी. तो इतना तो तय है कि बात बीत चुकी है लेकिन मैं क्या करूँ? कोई मुझे बताए...?

*************

कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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कविता

चंचल मन

यूं ही बैठे-बैठे मैं

खुद से बात करती हूं

की क्‍या सोचता

रहता है ये मन

क्‍या चाहता है

पर जवाब नहीं

मिलता।

वक्‍त वेवक्‍त

क्‍यों आंखों में नींद

आती है

जब आंखें बंद करो

तो चंचल मन चलने लगता है

दिमाग सोचने लगता है

और आंख बंद होकर भी

बेबस नजर आती है

--------------

 

अंधेरा

हम अंधेरे के हो गये

और अंधेरे में ही खो गये

क्‍या अंधेरे ही जीवन में

अब रह गये

उजाले थे कभी इस

जीवन में

उन उजालों की बात

कुछ ओर थी

अब तो अंधेरे ही अंधेरे

रह गये है

और हम अंधेरे के

हो गये।

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परिभाषा

प्‍यार क्‍या होता है

मैंने पढ़ा था प्‍यार में

समर्पण होता है

त्‍याग होता है

मान-सम्‍मान होता है

पर नहीं प्‍यार में

हकीकत में किताबों में पढ़ी

किताबी बातें ही होती है

प्‍यार में

लोग अपने स्‍वार्थ के बदले

अपने सम्‍मान की खातिर

दूसरे का अपमान करते है

प्‍यार में अपने

पराये का एहसास

कराया जाता है

क्‍या प्‍यार एक परछाई है

जो हाथ नहीं आती

आती है तो जिल्लत और

शर्मिंदगी!

हकीकत

एक रिश्‍ता जो बेमानी है

वो साथी एक छाया है

जो रोशनी में खो जाता है

अंधेरे में साथ दिखाई तो

देता है पर साथ नहीं होता

एक सपना जो मेरा भी

था और उसका भी

देखा तो साथ था पर

आंख सपना टूटा तो

मैं अकेली थी

मुझे अहसास कराया

जाता है तुम्‍हें समाज

आजादी नहीं देता

तुम्‍हें बंदिशें मिलनी चाहिए

तुम एक स्‍त्री हो

तुम पुरुष की बराबरी

नहीं कर सकती

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उम्‍मीद

हर उम्‍मीद ने साथ छोड़ दिया

जैसे दिल से दिमाग ने रिश्‍ता

ही तोड़ दिया

कोई हमें बताए कि क्‍या

करें और क्‍या न करे

इस वक्‍त

सोचा दौड़ कर लूट ले

उस कारवां को

जो बीच में

हमें इस तरह छोड़ गया

हिम्‍मत

उठ और चल

दूर तक

जहां तक आंखों

को दिखे राह

हिम्‍मत हारने

से कुछ नहीं होता

हौसले बुलंद कर

और आग बढ़ चल

मंजिल मिल ही जाती

है जब खुद पर हो

भरोसा।

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सारा जहान

सुना है कि

चाह में बड़ी ताकत होती है

विश्‍वास में

हिम्‍मत होती है

सब्र का फल मीठा

होता है

दुआ में बहुत

ताकत होती है लेकिन

मुझे तो लगता है

न प्‍यार न दुआ

है इस दुनिया में

जहां पैसा है

वहीं झुका है

सारा जहां

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आमदनी

यादों की

गहराई में

साल की दूरी तक

हर कही हर जगह

इमारतें नजर आती है

बाहर हर जगह दुकानें

नजर आती है

जहां हर चीज बेची

और खरीदी जाती है

महंगी जमीन है

घर के बाहर

छोटी-छोटी जगह

दिख जाती थी

कुछ समय पहले तक

कहीं कहीं नजर आ

जाती थी लेकिन अब

दुकानें बना दी गई है

यह सोचकर कर

कुछ पैसे की आमदनी

तो हो जाएगी।

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परिचय

नाम ः शिखा गुप्‍ता

जन्‍म तिथि ः 25-12-1976

शिक्षा ः बी.ए

लेखन-प्रकाशनः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं

में कविता प्रकाशित

संपर्क ः ई-468, गली नं-9

वेस्‍ट विनोद नगर

दिल्‍ली-110092

ईमेल shikha.puneet@gmail.com

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लगता है आग बुझ गई है जहन से हमारे,

थोड़ी हवा तो दो शायद दबा शोला कोई दहक जाए।

आँख नम होती नहीं हैं, क्‍यों हमारी मौत पर,

कोशिश तो करो शायद जिन्‍दगी किसी की महक जाए।

तुम जो चाहो तो खिला दो फूल रेगिस्‍तान में,

और तुम जो चाहो तो नखलिस्‍तान, रेगिस्‍तान में बदल जाए।

घोसले तो कई बसे है, पेडों की शाखों पे गर,

आहिस्‍ता से थामना, सम्‍हालना, कहीं नीड़ न किसी का उजड़ जाए।

बागबाँ बन के तो देखो, इन उजड़े हुए मजारों के,

दाबा है, जर्रा-जर्रा, बूटा-बूटा इनका जो न चहक जाए।

कब तलक समुन्‍दर के किनारे, हम यूँ ही प्‍यासे रहेगें तमाम उम्र,

तबीयत से ठोकर लगा दो, चश्‍मा फूटे और प्‍यास हमारी मिट जाए।

ख्‍वाहिशों को मारना अब मुनासिब नहीं, ए-दोस्‍तों,

न जाने कब जिन्‍दगी मौत की बाहों में पिघल जाए।

आबे-जमजम और गंगा के पानी में फर्क करना मुश्‍किल है मगर,

कुछ ऐसा करों कि दोनों आबे-गंगा में बदल जाए।

मिटा दो काशी-काबा को कि खण्‍डहर भी न रहे, नामों-निशा भी न रहे,

आओं करें जतन ऐसा कि काबा-काशी की जगह इन्‍सानियत की पाठशालाएँ खुल जाए।

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डॉ० दीपक कुमार पाठक

सहा० प्राध्‍यापक-संस्‍कृत

संस्‍कृत विभागा

नेहरू महाविद्यालय, ललितपुर (उ०प्र०)

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा , पटना की कलाकृति

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भूख .

"क्यों भाई...अच्छे खासे हट्टे- कट्टे नौजवान हो, कोई काम- धंधा क्यों नही करते.,भीख माँगते हुये तुम्हें शर्म आनी चाहिये"

"शर्म तो बहुत आती है साहब ,मगर कोई काम देता ही नहीं. चलिये आप ही मुझे कोई छोटा- मोटा काम दिला दीजिये. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे पूरी इमानदारी असुर पूरी निष्ठा के साथ पूरा करुँगा."

:" अच्छा ये तो बतलाओ कि घर और कौन कौन हैं ?"

"एक बूढी अपाहिज मां है,जो काफ़ी लंबे समय से बीमार पडी है. अभी वह तवे सी तप रही है,"

"तो उसका इलाज क्यों नहीं कराते. उसे अस्पताल- वस्पताल ले जाओ ,मुफ़्त में इलाज हो जायेगा. और उसे दवा भी मिल जायेगी."

" साहबजी, ठीक कहा आपने कि उसे अस्पताल ले जाऊँ तो वह ठीक हो जायेगी, लेकिन उसका इलाज कराने से भी कोई फ़ायदा नहीं है. अगर वह ठीक हो भी गई तो भूख में नाहक ही तडपेगी . जब मैं स्वयं का पेट नहीं भर पाता तो उसे क्या खिलाउंगा. उसका मर जाना ती ठीक रहेगा."

बडी ही बेबाकी एवं निष्ठुरता के साथ उसने अपने मन की बात कह दी थी, ऐसा कहते हुये न तो उसे कोई ग्लानि हो रही थी और न ही कोई शिकन उसके चेहरे पर दिख रही थी.

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गोवर्धन यादव 103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

07162-246651

 

मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ
 
क्यों कर रहे हो आज तुम उलटे तमाम काम
अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम
तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
कहलाओगे जहान में तब तक फ़कीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में  अमीर तुम
जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर तुम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
 
ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं
गिरवी  रखोगे  देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे  अपने  देश  की  इज़्ज़त  कभी नहीं
देखो , तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग  हो
अपने  वतन  के  वास्ते  सच्ची  उमंग  हो
मक़सद  तुम्हारा  सिर्फ़  बुराई  से जंग हो
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे  हूँ
 
जग में गँवार कौन बना सकता है तुम्हें
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हें
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हें
जो कौमें एक देश की आपस में लड़ती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगड़ती हैं
वे कौमें घास - फूस के जैसे ही  सड़ती  हैं
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ
 
उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हें
जो उल्टी - सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हें
नागिन की तरह चुपके से डस जाते हैं तुम्हें
चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियाँ
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ
 
सोचो , ज़रा विचारो कि तुमसे ही देश है
हर  गंदगी  बुहारो   कि  तुमसे ही देश है
तुम देश को सँवारो  कि  तुमसे ही देश है
मिल कर बजे तुम्हारी यूँ हाथों की तालियाँ
जैसे  कि झूमती  हैं  हवाओं  में  डालियाँ 
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों  में  बालियाँ
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ 

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मनोहर लाल हर्ष

पौराणिक संस्‍कृति से जुड़े प्रसंगों का श्रद्धा से चित्रणः संवित सोमगिरी जी

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बीकानेर/जयपुर। हास्‍य व्‍यंग्‍य रचनाकार एवं चित्रकार श्री मनोहरलाल हर्ष ‘कविहृदय की पुस्‍तक ‘मूषक पुराण‘ का विमोचन यहां मरूधर हैरिटेज होटल में आयोजित कार्यक्रम में हुआ। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए लालेश्‍वर महादेव मंदिर शिवबाड़ी के अधिष्‍ठाता संवित सोमगिरी जी महाराज ने कहा कि पुराणों में हमारा धर्म और संस्‍कृति समाहित है, कृति ‘मूषक पुराण‘ में हर्ष ने पुराण शब्‍द और पुराणों के प्रति श्रद्धा भाव का प्रदर्शन करते हुए पौराणिक प्रसंगों का बारीकी से चित्रण किया है, जो एक बेजोड़ मिसाल है।

उन्‍होंने कहा कि हर्ष की कविताओं में गहराई और सौम्‍यता है, इनके माध्‍यम से उनके चित को टटोले तो ऐसा लगता है कि कि मानो वे सागर में कुछ ढूंढ रहे है, कविताएं मोती के समान पिरोई हुई लगती है। महराज श्री ने कहा कि कवि ने पौराणिक और समसामयिक घटनाओं को मूषक पुराण में वर्णित करते हुए समाज का ध्‍यान आकर्षित किया है।

उन्‍होंने कहा कि मूषक भगवान श्री गणेश का वाहन है और यह अध्‍यात्‍म और बुद्धि का प्रतीक है, कवि ने नूतन तरीके से हास्‍य और व्‍यंग्‍य का समावेश किया है। पुस्‍तक लोकार्पण समारोह के मुख्‍य अतिथि बीकानेर के महापौर श्री भवानीशंकर शर्मा ने कहा कि पुस्‍तक में रिश्‍वतखोरों के प्रति रोष है तो आतंकवादियों को नेस्‍तनाबूद करने का हौसला भी है, इसमें संगीत की साधना और हास्‍य रस की फुहार का अनोखा संगम है। हर्ष की कविताओं में हास्‍य-व्‍यंग्‍य के साथ-साथ राष्‍ट्र प्रेम, परमार्थ और स्‍पष्‍टवादिता का अनूठा संगम है।

कार्यक्रम के विशिष्‍ट अतिथि राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य और संस्‍कृति अकादमी के अध्‍यक्ष श्री श्‍याम महर्षि ने कहा कि मूषक की हमारी पौराणिक संस्‍कृति में गणेश के वाहन के रूप में विशिष्‍ट पहचान है। उन्‍होंने कहा कि वर्तमान समाज में गंभीरता और भागमभाग के दौर में हास्‍य-व्‍यंग्‍य की यह पुस्‍तक सुखद अहसास कराएगी।

वरिष्‍ठ कवि और साहित्‍यकार श्री भवानीशंकर व्‍यास ‘विनोद‘ ने कहा कि हर्ष की कविताएं गुदगुदाने वाली है, इससे पाठक हंसने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर होंगे। उन्‍होंने छः तरीकों के व्‍यंग्‍यों का जिक्र करते हुए कहा कि कविहृदय ने मूषक पुराण में चूहों को माध्‍यम बनाकर समाज की असहनीय स्‍थितियों पर आक्रोश व्‍यक्‍त किया है। ‘विनोद‘ ने मूषक पुराण की भाषा को बोधगम्‍य और तारतम्‍यता लिए हुए बताते हुए कहा कि कथ्‍य अपने आप में पूर्ण है।

मूषक पुराण पर अपनी पाठकीय टीप में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार श्री सरल विशारद ने कहा कि पुस्‍तक में चूहों के माध्‍यम से सामाजिक बुराईयों पर कटाक्ष किए गए है। उन्‍होंने चूहे का मानवता के लिए उपयोगी जीव बताते हुए कहा कि जीवन रक्षक औषधियों का शोध चूहों पर ही किया जाता है। लोकार्पण समारोह में रचनाकार श्री मनोहर लाल हर्ष ने मूषक पुराण की चुनिंदा कविताओं का पाठ करते हुए मूषक पुराण बनाने का कारण, मूषक की किस्‍मों और पौराणिक कथाओं के बारे में बताया। समारोह के संरक्षक गीतकार एवं वरिष्‍ठ उद्‌घोषक श्री चंचल हर्ष ने अपने उद्‌बोधन में कहा कि मूषक की कथा अपने आप में अद्‌भुत है, उन्‍होंने कविता पाठ किया और सभी का आभार व्‍यक्‍त किया। समारोह का संचाचन प्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार श्री बुलाकी शर्मा ने किया। युवा साहित्‍यकार श्री संजय आचार्य ‘वरूण‘ ने पुस्‍तक पर पत्रवाचन किया। लोकार्पण समारोह में लेखक, कवि, साहित्‍यकार तथा गणमान्‍य नागरिक मौजूद थे।

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1

पड़ चुके थे वोट

पड़ चुके थे वोट

हो चुके थे चुनाव

चल रही थी कांउटिग

आ रहे थे नतीजे-

सजे हुए एक आलीशान ड्राइगंरूम में

अंग्रेजी शराब के पेग चढ़ाते

बड़ी सी टीवी के सामने

बैठे सफेद पोष लोग

कोस रहे थे

प्रजातंत्र को/नेताओं को/जाहिल गंवारों को

किन लोगों को जिता दिया

किसे सौंप दिया राज

रसातल में जा रहा है मुल्‍क,

आंखों में लाल डोरे डाले

लड़खडा़ती जुबान से

कभी गुस्‍से ,तो कभी दुख के साथ

देश के लिए अपने लाल ,मोटे ,चिकने मुंह से

कोरस में निकाल रहे थे

उवाच/एक स्‍वर से /

सब थे एकमत-

कुछ नहीं हो सकता इस देश का-

सब के चिकने हाथ

एक से थे

किसी के बाएं हाथ की तर्जनी

के नाखून पर

काला निशान नहीं था ़

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2

अरसे से...

अरसे से इधर कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ

एक गेंद के पीछे भागते-दौड़ते

लड़ते-झगड़ते रहे बच्‍चे

काले बुरकों के पीछे से झांकती

आलू और प्‍याज पर चिकचिक करती रही औरतें

हाथ में मटमैला कलावा बांधे सब्‍जी वाली से

माथे तक सिर ढंके

अपनी किशोरी चुलबुली ननदों के साथ

नई-नवेली बहुएं

मनिहार से चूड़ियां चढ़वाती रहीं

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ

अलस्‍सुबह से मंदिर की घंटियों और

अजान की जुगलबंदी होती रही

शफीक मिस्‍त्री मंदिर का फर्श बनाता रहा,

रजिया और गुलाबो इर्ंटें ढोती रहीं

टूटी कमानी का पुराना चश्‍मा चढ़ाये

बूढ़े जुम्‍मन मियां

रामलीला के लिए धनुषबाण और गदा बनाते रहे

रामरथ सजाते रहे

मांग में सिंदूर भरे उदास औरतें

अपने बीमार बच्‍चे के लिए दरगाह से ताबीज लेती रहीं

कुछ लोग कसमसाते रहे, पर

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

रात को अपनी दुकानें बंद करके लड़के

गली के पीछे ठेले पर

तंदूरी चिकन और कबाब खाते रहे

घर में बाप बड़बड़ाते रहे

नहीं, कुछ नहीं हुआ

अरसे से इधर कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

ईदगाह से लगी जमीन को

पीरजादे ने चुपके से बेच दिया

वहां बसे कबाड़ी बेघर हो गये

कॉलोनाइजर ने हनुमान मंदिर खड़ा कर दिया

पुजारी ने

संतोषी माता के मंदिर की जमीन

खाड़ी से लौटे रफीक कुरैशी के नाम कर दी

चाय के भगोने में

लोग झाग बनकर उफने

और आग पर गिर कर ठंडे हो गये

कुछ नहीं हुआ, लोगों ने कहा

यही क्‍या कम हुआ।

मस्‍जिदें टूटती रहीं

मंदिर बिकते रहे

श्र्‌द्धा और आस्‍था माल में बदलती रहीं

लोग वैसे ही ढलते रहे

लड़ते-झगड़ते

लूटते-लुटते

एक होते, बिखरते रहे

तवे से कच्‍ची-पक्‍की रोटियां उतरती रहीं

चूल्‍हे पर ज्‍यादा पानी में थोड़ी दाल खनकती रही

खेतों-खलिहानों से बेदखल लोग

शहर में रिक्‍शे खींचते रहे

अपनी बूटी अम्‍मा, बीमार बाप को छोड़

सपना देखते दिल्‍ली जाते रहे

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

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3

निशान

काला निशान

बांए हाथ की

तर्जनी के नाखून पर लगा

काला यह निशान

जनतंत्र का,

मेरे अधिकार, तो कभी आक्रोश का

कभी बेबसी, तो कभी बलात का प्रतीक

यह चिह्न

सजीव और निर्जीव के मिलन स्‍थन पर

यह निशान

नाखून के बढ़ने के साथ

खिसकता जाता है

ऊपर उठता जाता है

कटने की ओर आगे बढ़ता जाता है -

जब यह नहीं रहेगा

मैं सोचता हूं

क्‍या मैं भूल जाऊंगा

यथार्थ की कठोर और निर्मम

धरती को

और मोरपंखी सपनों को

जिनके चलते मैंने पहली बार

दबाया था वो बटन -

क्‍या चिह्न

दिला पायेगा थोड़ा सा सुकून

दासता से कुछ राहत

परवशता से कुछ निजात

कौन जाने -

पर मैं यह जानता हूं

मेरे बाएं हाथ की उंगली पर लगे निशान

को पाने, हथियाने या लूटने के लिए

लोग बार-बार आयेंगे।

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जन्‍म उत्‍तर प्रदेश के एक कस्‍बे, मैनपुरी में लगभग 66 साल पहले। पढ़ाई के दौरान और उसके बाद अठारह उन्‍नीस साल तक छात्र,युवा एवं मजदूर आंदोलनों में होलटाइम कार्यकर्ता के तौर पर काम। पिछले लगभग 25 साल के दौरान 200 से अधिक डाक्‍यूमिेंटयों का निर्माण, निर्देषन एवं पटकथा लेखन,, तीसेक पुस्‍तकों तथा सैकड़ों लेखों-दस्‍तावेज़ों आदि का अनुवाद तथा लेख-कविताओं और यदाकदा लघुकथा एवं व्‍यंग्‍य लेखन। सामाजिक विसंगतियों, विरूपताओं कविता स्‍थाई निवास-2सी/25 आशीर्वाद, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद, 201010, फोन. 0120-4131283

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गर्मी

ठंढक की तरफ बहती है

विद्युत धारा

कम विभव की ओर बहती है

पानी

नीचे की तरफ बहता है

ऊर्जा का हर स्वरूप

हमेशा बहता है

ज्यादा से कम की तरफ

ये प्रकृति का नियम है

मगर पैसा

उसी ओर बह रहा है जहाँ ज्यादा पैसा है

 

ये तभी संभव है

जब पैसे का नीचे की ओर बहाव

रोक दिया गया हो

आसमान तक ऊँचे एक बाँध से

और इस बाँध की दीवारों से टकराकर

मजबूरन पैसा बह रहा हो प्रकृति के खिलाफ़

बाँध के नीचे की तरफ बसने वाले

खुश हैं

कभी कभी छोड़े गए कुछ लीटर पैसों से

और माँगते हैं ईश्वर से

कि बना रहे बाँध

ताकि बनी रहें हमारी झोपड़ियाँ

कयामत तक चलता रहेगा ये क्रम

 

अगर छोड़ा न गया झोपड़ियों का मोह

और खत्म न हुआ बाँध टूटने का डर

बाँध टूटेगा

तो लेगा ही

कई झोपड़ियों और लोगों की बलि

पर जो कुछ बचा रहेगा

वह देखेगा

एक बार फिर

पैसे को बहते हुए

प्रकृति के नियमानुसार


--


धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत


शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
हाकिम पहुँचे चौपालों पर,
एक नया फ़रमान लिए,
ले लो यह नोटों की गड्डी,
अब ग्राम भूमि सरकारी है।


यहाँ बनेगी फ़ैक्टरी,
अस्पताल, स्कूल,
सबको काम मिलेगा भइया,
दुर्दिन जाओगे भूल।
खेती, खलिहानी सब छूटी,
फूले हाथ, पाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


भूपतियों से इतर गाँव में
ऐसे भी थे,
सरकारी खसरों में जिनके
नाम नहीं थे।
कहलाते मज़दूर,
गाँव में ही रहते थे,
खेतों में मज़दूरी करके
जीवन यापन करते थे।
कौन सुने अब उनकी पीड़ा,
कहाँ मिलेगी ठाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


उद्घाटन को मंत्री आये,
साथ में मेला ठेला था,
सरकारी वादे थे लेकिन,
गाँव का एक न धेला था।
उस पर, यह क्या, बनते दिखते,
फ्लैट, इमारत आलीशान,
मंहगे होटल, शॉपिंग मॉल,
जहाँ बसें शहरी धनवान।
जाने कब तक छला करेगा,
गाँवों को सरकारी दाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


सी ए. अनुराग तिवारी

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एक बार नास्तिकों ने ‘अखिल भारतीय नास्तिक सम्मेलन’ आयोजित करने की योजना बनाई। सभी नास्तिकों को बुलावा भेजा गया। नियत दिन, समय और जगह पर बड़े-बड़े नास्तिक आने लगे।

बड़े-बड़े का मतलब यह नहीं है कि उनका शरीर भारी-भरकम था। अर्थात वे देखने में कुम्भकर्ण जैसे नहीं थे। वे सामान्य आदमी की तरह ही दिखते थे।

लेकिन कुम्भकर्ण बहुत ज्यादा बुद्धि शून्य नहीं था। क्योंकि कुम्भकर्ण कुछ भी रहा हो पर नास्तिक नहीं था। उसे परासत्ता में भरोसा था। उसने तपस्या करके व्रह्मा जी से वरदान लिया था। और रावण को श्रीराम जी के परमात्म स्वरूप का उपदेश दिया था।

खैर नास्तिकों के अग्रज डैश पर बिराजमान हो गए। और बारी-बारी से ईश्वर विरोधी भाषण देने लगे। जैसे भारतीय नेताओं के भाषण बहुधा घिसे-पिटे ही होते हैं। हम जीतेंगे तो बेरोजगारी खत्म कर देंगे। रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था पर जोर देंगे। बिजली, सड़क और पानी की समस्या नहीं रहेगी। लेकिन कितनी बार जीतने पर ऐसा करेंगे। यह नेता भी नहीं जानते। इसके अलावा अपने विरोधियों को भला-बुरा कहना कोई भी नेता नहीं भूलता। यही नेता का भाषण है। बीस साल पहले भी यही था। आज भी यही है। और बीस साल बाद भी यही भाषण होगा।

ठीक ऐसे ही नास्तिक लोग भी घिसी-पिटी बातें ही कर रहे थे। जैसे ईश्वर कौन है? ईश्वर कहाँ रहता है? ईश्वर को किसने बनाया? ईश्वर यदि है तो दिखाई क्यों नहीं पड़ता? हम नास्तिकों के सामने क्यों नहीं आता? यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो हमारे सामने आने में क्यों डरता है? बस यही सब, मानों हिरण्यकश्यपु प्रहलाद से प्रश्न कर रहा हो। वह प्रहलाद से यही सब पूछता था। और प्रहलाद उसकी समझ पर केवल मुस्कराते रहते थे। आज के हिरण्यकश्यपुओं के उद्धार के लिए भी प्रहलाद जैसा पुत्र चाहिए। लेकिन कहाँ मिलेगा?

इनके अग्रजों में से एक बोला कि हम लोगो को हाईटेक हो जाना है। जो लोग अब तक इंटरनेट से नहीं जुड़े हैं। वे अति शीघ्र जुड़ जाएँ। सभी लोग अपना-अपना ब्लॉग बना लें। और मोटे-मोटे अक्षरों में ‘हू क्रीटेड गौड’ लिखना न भूलें।

सभी चिल्लाये हम यह पहले ही लिख डाले हैं।

अग्रज आगे बोला इससे कम से कम दो फायदा होगा। एक तो हमारी अंग्रेजी पर पकड़ जाहिर होगी। जो खुद में एक प्रभाव है। और दूसरे यह प्रश्न हमारी दूरदर्शिता को उजागर करेगा। जिससे प्रभावित होकर कई मानव यानी मानने वाले हमारी कौम में शामिल हो जायेंगे। और हमारा नास्तिक वाद दिन दूना और रात चौगुना बढ़ने लगेगा।

इतना ही नहीं ईश्वर विरोधी कुतर्को से इंटरनेट का कोई भी हिस्सा खाली मत रहने दो। ईश्वर की प्रचलित कथाओं को तोड़-मरोड़कर कुछ उल्टा-सीधा जोड़कर लिख डालो और प्रचारित करो। क्योंकि आज का युवा बहुत जल्दी विचलित हो जाता है।

सदग्रंथो को उपन्यासों जैसा ही बताओ। कहो सब कोरी कहानी है। युवा वर्ग इंटरनेट से सीधा जुड़ा है। अतः हमारे कुतर्कों के जाल में वह आसानी से फँस जायेगा। डरो मत क्योंकि ईश्वर नहीं है। हम ही ईश्वर हैं। और यदि ईश्वर हुआ भी तो बहुत होगा तो नर्क हो जायेगा। जो मरने के बाद कोई देखता नहीं है। वहाँ भी हम अपने वाद को नहीं छोड़ेगें। तो एक दिन ईश्वर को भी झुकना पड़ेगा।

हमारे नास्तिक भाई-बहनों की संख्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। मेरा मानना है कि हर कोने में, हर घर में अपने भाई–बहन हैं। हमें उनसे सम्वाद स्थापित करना है। और अगले सम्मेलन में हमें यह संख्या दुगुनी कर देना है।

जब आप लोग अपने कुतर्को का जाल यहाँ-वहाँ, घर, गाँव, शहर व इंटरनेट पर फैलायेंगे। तो दूसरे तो इसमें फँसेगे ही, अपने भाई-बहन अपने आप हमसे जुड़ जायेंगे। इंटरनेट पर लिखेंगे कि आप ने तो हमारे मुँह की बात छीन ली। हम भी आपके ही कौम के हैं। इन कदमों से अपनी कौम और सशक्त हो जायेगी।

इनके बाद दूसरे अग्रज बोले कि अभी निरीस जी ने बहुत अच्छा भाषण दिया है। इनके सुझाव बहुत ही मूल्यवान हैं। ध्यान रहे कि साधु-संत भगवान की लीला कथाओं का इंटरप्रिटेसन करते हैं। और हम लोगों को उसका मिसइंटरप्रिटेसन करना है। अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। इंटरनेट पर भी मिसइंटरप्रिटेसन का जमघट तैयार कर दो। इंटरप्रिटेसन अपने भेंजे में नहीं घुसेगा और मिसइंटरप्रिटेसन में हमें आनंद भी आएगा तथा हमारे साथी भी आनन्दित होकर हाथ मिलायेंगे। मिसइंटरप्रिटेसन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मानव यानी मानने वाले गुमराह होंगे। जिससे अपनी कौम को बल मिलेगा।

आप लोग सामान्य आस्तिकों से, धर्मात्माओं से और साधुओं आदि से उल्टा-सीधा प्रश्न करें। तरह-तरह के प्रश्न चाहे वे निराधार, असत्य, मूर्खतापूर्ण, अमर्यादित आदि कुछ भी हों अवसर मिलने पर जरूर करें। चूकें मत। इंटरनेट पर भी डाल दें। जैसे पूजा करने से क्या होता है? पशु पूजा क्यों नहीं करते? सिर पर एंटीना रखने से क्या होता है? गाय और बकरी में क्या अंतर है? अंडा शाकाहारी क्यों नहीं है? क्या दूध माँसाहारी नही है?

शाकाहारी होना पशुओं का गुण नहीं है क्या? मांस तो शेर खाता है, तो शेर बनने में देर क्यों?

भगवान क्या करते हैं? क्या खाते हैं? कब सोते हैं? कब जगते हैं? क्यों सोते हैं? क्यों जगते है? कहाँ रहते है? क्यों रहते हैं? क्यों डरते हैं? आदि।

इनके बाद हमीस बोले। कोई ईश्वर नहीं है। हम ही ईश्वर हैं। हम सब ईश्वर हैं। ईश्वर मानवों का रचा हुआ है। आखिर पशु मंदिर क्यों नहीं जाते? इससे जाहिर होता है कि पशु ईश्वर को नहीं मानते। कभी किसी ने किसी पशु को मंदिर में देखा क्या। कोई बोला कई बार गाय देखा है। हमीस बोले तुम नासमझ हो।

हमीस आगे बोले कि हमारे पुरुष साथी अपनी पत्नियों को और महिला साथी अपने पतियों को हमारे वाद को अपनाने के लिए प्रेरित करें। पुरुष जोर जबरदस्ती भी कर सकते हैं। पत्नी से कहें कि व्रत रखने से क्या होता है? तूँ किसके लिए रोज-रोज यह नाटक करती है? पूजा में समय क्यों बर्बाद करती है? भगवान कहाँ हैं? किसने देखा? तेरे माँ-बाप या भाई ने। तूँ नाहक भगवान के चक्कर में पड़ी है। इससे अच्छा किसी दूसरे के चक्कर में पड़ जा।

इसी तरह सभी मुख्य-मुख्य नास्तिकों ने अपने वक्तव्य दिए। उनमें से कोई वक्ता नहीं था। सब के सब बकता थे और जो जी में आता था बके जा रहे थे। बाद में एक नास्तिक जो पहले आस्तिक था, लेकिन इन लोगों के चक्कर में पड़कर नास्तिक बन गया था। उठ खड़ा हुआ और बोला कि आप लोगों ने नाहक में मुझे फंसा लिया। मैं भी न मानने वालों की श्रेणी में आ गया। पहले मैं भी मानने वोलों में था अर्थात पहले मैं भी मानव था। मुझे अब अपने आप पर लज्जा आती है।

आप लोगों ने कहा कि जो दिखाई नहीं पड़ता, उसका अस्तित्व कहीं हो सकता है क्या? लेकिन विज्ञान भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि न दिखने वाली चीजों का भी अस्तित्व होता है। विज्ञान प्रमाण देता है कि ऐसी कई चीजें हैं जो दिखती नहीं फिर भी वे अस्तित्व में हैं। रही बात कि ईश्वर को किसने बनाया? तो भला शुरुआत के पहले भी कुछ होता है क्या? आदि यानी शुरुआत की यही परिभाषा ही है कि जिसके पहले कुछ नहीं हो। तभी तो वह आदि होता है। प्रारंभ। शुरुआत। इकाई। जैसे कोई सड़क कन्याकुमारी से जम्बू तक बनी हो। तो कोई महा मूर्ख श्रेष्ठ ही पूछेगा कि कन्याकुमारी से पहले यह कहाँ से शुरू होती है। जबकि उसकी शुरुआत कन्याकुमारी ही है। अब यह सब मेरी समझ में आने लगा है।

अग्रज बोले तुम भी अपने ब्लॉग पर ईश्वर को बहुत गाली दे चुके हो। भगवान की लीला कथाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर चुके हो। अतः कुछ भी हो पर अब अपने कौम के वसूलों को ध्यान में रखते हुए इसके विपरीत कभी मत बोलो।

हमें नेताओं की राह पर चलना है। हमें, लोगों को यही बताना है कि केवल हम ही सही हैं। बाकी सब गलत हैं। हर नेता का ऐसा ही मत होता है। लेकिन ध्यान रहे कि नेताओं की तरह हम पार्टी नहीं बदलेंगे। यह हमारा वसूल है। हम दूसरे लोगों को अपनी पार्टी में लेते रहेंगे। लेकिन कभी अपनी पार्टी नहीं बदलेंगे। खुद भगवान सामने आ जाएँ तो भी हम नहीं मानेगें। हमें रावण और कंस से भी कुछ शिक्षा तो लेनी ही चाहिए।

यदि कोई कहता है कि विज्ञान से ईश्वर के अस्तित्व की पुष्टि होती है तो हम कहेंगे कि हम विज्ञान को नहीं मानते। लेकिन यदि कोई कहे कि विज्ञान कहता है कि ईश्वर नहीं है। तो हम फौरन अपना कथन बदल देंगे और कहेंगे कि हम लोगों की बातें वैज्ञानिक ही होती हैं। और विज्ञान भी हमारा समर्थन करता हैं।

कुलमिलाकर जैसे भी हों हमें अपने नास्तिक वाद को फैलाना है। और अगले सम्मेलन तक अपनी संख्या कम से कम दोगुनी तो कर ही लेना है। अगला सम्मेलन अखिल भारतीय नास्तिक महा सम्मेलन के नाम से आयोजित किया जायेगा। जिसकी सफलता के लिए हम जी-जान लगा देंगे और दुनिया से ईश्वर का नाम मिटा देंगे।

इसी संकल्प के साथ सभा विसर्जित हो गई।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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स्वस्थ थी अच्छी भली थी डाक्टरों ने मार डाला
डाक्टरों की ही चली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
लाख कोशिश की बचा लें हम किसी लाचार को
दाल उनकी ही गली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
रोज‌ स‌म‌झाया ह‌ज़ारों बार‌ त‌क‌ ताकीद‌ की
आज‌ रोटी फिर‌ ज‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
आज‌ जिस‌को रौंदक‌र‌ हंस‌ते हुये स‌ब‌ आ ग‌ये हैं
अध‌खिली ही व‌ह‌ क‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
एक‌ डाली पेड़‌ की जो आज‌ सूखी दिख‌ र‌ही है
व‌ह‌ क‌भी फूली फ‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
ये पसीना और बदबू और हम कितना चलें अब‌
धूप में भी खलबली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
कह रही थी चीखकर " मैं सत्य की परछाईं हूं "
राह में रोती डली थी डाक्टरों ने मार डाला।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह का कविता / गीत / नवगीत व ग़ज़ल संग्रह - ईबुक : अम्ल क्षार और गीत

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अब चुनावी धन काला हो या सफेद अपने राम को क्‍या ? धन पर थोड़े ही काला-सफेद लिखा होता है। उसकी महिमा तो राष्‍ट्रपिता की छपी तस्‍वीर से है। राष्‍ट्रपिता को तो अफ्रीका में काले होने के कारण ही गोरों का अपमान झेलना पड़ा। लेकिन वहां बात नस्‍ल की थी। नस्‍लीय सोच की थी। धन में नस्‍लीय भेद कैसा ? डॉलर-पौंड की तूती पूरी दुनिया मे बोलती है। फन्‍ने खां कॉमरेड भी अपनी संतानों को अमेरिका, ब्रिटेन में नौकरी कराकर गौरवा (गौरवान्‍वित) रहे हैं। विदेशी मुद्रा की आमद पर इतरा रहे हैं।

अब अपने राम (मतदाता) को पांच साल में तो महज एक बार काले धन की महिमा पर इतराने का मौका मिलता है। उस पर भी इस मुएं चुनाव आयोग ने इस्‍तेमाल पर रोक लगा दी। तुगलकी फरमान जारी कर दिया। एक लाख से ज्‍यादा का लेन-देन बही खातों में दर्ज किए बिना किया तो जब्‍ती होगी। लो जब्‍ती का सिलसिला भी शुरु भी हो गया। करोड़ों का धन ! अभी तक सेठों, नेताओं और माफियाओं की तहखानों में पड़ी जंग खाई तिजोरियों से सीधा निकलकर बेचारे लाचार मतदाताओं की जेबें गर्म करने चल पड़ा था। अपने राम जैसों की आर्थिक मंदी में तड़का लगाने वाला था। धत्‌ तेरी की बीच रास्‍ते में ही पकड़ा गया। जब्‍ती हो गई। सरकारी तिजोरियों में दीमकों के हवाले कर दिया। अब आयोग से पूछो, अरे निर्वाचन करैया...,सरकारी बैंको, बीमा कंपनियों और भविष्‍य निधि खातों में तो पचास हजार करोड़ से भी ज्‍यादा का लावारिस पड़ा धन पहले से ही देश की सकल घरेलू उत्‍पाद दर को पलीता लगा रहा है, इस काले धन को और क्‍यों जीडीपी घटाने की फेहरिश्‍त में शामिल करने में लगे हो ?

अपने राम को तो लगता है इस सूचना-युग में भी आयोग के ज्ञान-चक्षुओं पर पर्दा पड़ा है। इसीलिए तो वह पर्दा डालने के बेतुके फरमानों में लगा है। अब हाथी क्‍या पर्दे में ढंकने से हाथी नहीं रह गए ? आज सुबह ही तो अपने पोते को 'साइकिल' के केरियर पर बिठाकर ठिठुरते पंजों से हेंडिल कसकर पकड़े हुए ‘दलित स्‍मारक स्‍थल' सैर कराने ले गया था। स्‍थल के द्वार पर बैठे माली से एक रुपए का एक 'कमल' का फूल खरीदा। पोता ज्ञान गुण सागर गणेश को अपने अंग प्रत्‍यारोपित कर जीवन-दान देने वाले हाथी के चरणों में कमल डालकर आशीष जरुर लेता है। पोता, हैरानी से चहका, दादाजी हाथियों को भी ठंडी लग गई, जो चादर ओढ़ें है ? अब लो जब तीन-सवा तीन साल के बाल-मन से भी हाथियों की छवि विलुप्‍त नहीं हुई तो, वयस्‍क और जागरुक वोटर के स्‍मृति पटल से कैसे लुप्‍त होगी ? हे राम....! कहां है, इनमें आई क्‍यू ?

अब अपने राम तो अर्थशास्‍त्रियों की ज्‍यादा आंकड़ों की कला बाजी समझ-बूझते नहीं। अखबारों में जो थोड़ा-बहुत बांचा-पढ़ा है। उसमें भी जो थोड़ा बहुत याद रहा है, उसके मुताबिक काले धन के जन कल्‍याण से जुड़े सरोकार हैं। चुनाव में इसके लाभ समावेशी लक्ष्‍य को साधते हैं। बताते हैं, आयोग जरा आंख फेर ले तो दस हजार करोड़ की काली कमाई पांच राज्‍यों के चुनाव में बरसने को इतरा रही है। तिस पर भी करीब पांच हजार करोड़ की सफेद धन राशि सरकार खर्च होगी।

चुनाव की सबसे अच्‍छी ताकीद यह हैं कि काली कमाई निकलती तो पूंजीपति और भ्रष्‍टाचारियों की तिजोरियों से है, लेकिन जाती मध्‍यवर्गीय और आम-आदमियों के हाथों में है। परिवहन, उड्‌डयन, कागज, रंग-रोगन, ध्‍वनि विस्‍तारक यंत्र, मुद्रक, टेंट हाउस, फोटो व वीडियोग्राफर चाय - कॉफी और पूड़ी सब्‍जी बनाने के कारोबारों से जुड़े लोगों की बल्‍ले-बल्‍ले हो जाती है। अब तो पेड-न्‍यूज का भी चलन चल निकला है, सो भैया प्रिंट और इलेक्‍टोनिक मीडिया में लगे पत्रकारों-गैर पत्रकारों की भी पौ-बारह होने लगी है। इलेक्‍टोनिक वोटिंग मशीनों से वोटिंग का जब से सिलसिला हुआ है, तब से आईटी उद्योग की भी चकाचक है। मशीनें खराब तो होती ही हैं। पिछले चुनावों में बूथ कब्‍जाने के फेर में तोड़-फोड़ भी जाती हैं। तो कुछ में तोड़-फोड़ भी जाती है, तो कुछ निर्वाचन प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायत के चलते उच्‍च न्‍यायालयों से स्‍थगन मिल जाने की वजह से सरकारी कोषालयों में पड़ी-पड़ी दम तोड़ देती हैं। इन सब की पूर्ति के लिए नई ईवीएम खरीददारी होती हैं। अब मशीन है तो बिना पर्याप्‍त उर्जा मिले तो यह चलने वाली नहीं है, सो इनकी बैटरियां बदलने में भी करोड़ों खर्च होते हैं।

काला धन इफरात बह रहा हो तो भैया कुशल-अकुशल, शिक्षित-अशिक्षित बेरोजगार भी रोजगार की लेने पर कुछ समय के लिए चल पड़ते हैं। वाहन चालकों से लेकर आटो रिक्‍शा, सायकिल रिक्‍शा व चुनावी रथों पर प्रचार विशेषज्ञों की भी पूछ-परख बढ़ जाती है। प्रचार हेतु फिल्‍मी गीतों के आधार पर पैरोडी लिखने व नाट्‌य रुपांतरण करने वालों की भी बन आती है। लोक कलाकारों को मुंह मांगे दाम मिलते है। इन गीत व नाटकों की सीडी व टेप बनाने वाली कंपनियां भी बाग-बाग हो जाती हैं।

चुनाव में नुक्‍कड़ नाटक खेलने, स्‍वांग रचने व विरोधी उम्‍मीदवार अथवा प्रतिपक्ष की कमजोरी व करतूतों पर चुटीले कटाक्ष की कमजोरी व करतूतों पर चुटीले कटाक्ष करने वाले मर्मज्ञों की भी खूब पूछ बड़ जाती है। सड़कों पर चप्‍पल चटकाने वाले इन कला-पथिकों को इस दौरान लग्‍जरी गाड़ियां, पौष्‍टिक आहार, मनचाहा मानदेय और उम्‍दा ब्राण्‍ड की सुरा उपलब्‍ध कराने की जिम्‍मेदारी दल और उम्‍मीदवारों की होती हैं।

अब भैया इतने बड़े पैमाने पर जो काला धन रोजगार के अवसर पैदा करता है, उस पर प्रतिबंध तो बेजा ही कहलाएगा न ? अब तो वे मतदाता भी चिंतित हैं, जो अपना वोट बेचने के लिए बाजार में थे। बाजारवाद के इस युग में आवारा पूंजी के पंख काट दिए जाएंगे तो मनमोहन जी, प्रणव दा जी सोचिए बाजार में उपभोक्‍ता वस्‍तुओं का क्‍या हाल होगा ? जब माल बिकेगा नहीं तो औद्योगिक विकास और सकल घरेलू उत्‍पाद दरें तो गिरेंगी ही न ? इसलिए लोक कल्‍याण के लिए माननीय सुनिए..., आंख मूंद लीजिए और काले धन को उदारवादी खुले बाजार की तरह उनमुक्‍त विचरने दीजिए।''

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

 

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

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ज सुबह से उसे उदासी का दौरा पड़ा हुआ था। मायूस एक चेहरा लादे वह दफ्तर में कागजों को इधर-उधर करता रहा। कुछ भी करने में मन नहीं लग रहा था। एक तो इतनी गर्मी, बदन पसीने से तर मालूम होता, पर चमड़े पर हाथ रखता तो देखता कि केवल एक फिसलन सी है, पानी तो उड़ता जा रहा था। अजीब सा अकेलापन उसे देर से घेरे हुए था। यह एक ऐसी उदासी थी, जिसमें न तो किसी के साथ बैठने को मन कर रहा था, न ही अकेले पड़े रहने का।

किसी तरह समय काटते हुए जब उसे लगा कि शायद खाने का वक्त हो ही गया होगा, वह कमरे से निकल आया और हाल में लटकी दीवाल-घड़ी पर उसने देखा , कि अभी केवल बारह बजे थे। कायदे से उनका लंच- आवर साढे बारह से शुरू होता है, पर वह निकल ही पडा।

सड़क पर चलते हुए वह पूरी कोशिश करता रहा कि वह मकानों के बिलकुल करीब से चले, ताकि धूप कम से कम लगे। सूरज सिर के ऊपर था और वह धूप से बच नहीं पा रहा था। गली के मोड से निकल पार करते हुए वह शांति ढाबा की ओर बढ़ा। दूर से ही वंदना वाजपेयी की आवाज उसके कानों तक पहुंच रही थी। उसने कोशिश की कि गीत की कोई कड़ी वह भी गुनगुनाये, पर उसका दिमाग जैसे सुन्न सा था।

ढाबे में आकर एक टेबल पर वह बैठा ही था कि उसकी नजर सामने वाले टेबल पर बैठे किसी व्यक्ति की आँखों से टकरायी। वे लाल थीं। आँखों के नीचे काले गड्ढे थे, पर नाक तमतमा रही थी। दो-तीन दिनों से दाढ़ी नहीं बनायी गयी थी और होंठों के बीच दिखते दांत उसकी ओर कठोरता से ताक रहे थे। उसके तीन साथी धड़ाधड खाना जा रहे थे, जैसे किसी खजाने से धन उठाकर मुंह की जेब में डाल रहे हों। पता नहीं वह आदमी क्यों वैसा ही भुक्खड नहीं था। वह आदमी उसकी ओर कठोरता से देखता रहा। फिर धीरे- धीरे उसकी आँखों में शैतानी भरी एक मुस्कान तैर आयी। तभी ढाबे का वेटर मनोहर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसने दाल और सलाद कहा। मनोहर के जाते ही वह उठकर बगल की मेज पर से अखबार उठा लाया। पर अखबार पर नजर डालते ही उसे लगा कि वह कुछ भी पढ़ नहीं पायेगा। आजकल अखबारों में होता ही क्या है सिरदर्द के सिवा?... अगली टेबल वाला वह व्यक्ति चीखकर अपने साथियों से कह रहा था, '' लो बे भुक्खड़ों! मादर**! खा लो सालों - तुम लोग भी क्या कहोगे कि फत्तू ने खिलाया था - जाओ कितना खा सकते हो! अबे ओ छोकरे! ला इधर ला शाही पनीर और..'' उसकी नजरें फिर उनकी ओर उठीं। अब फत्तू नामक वह आदमी भी खाने लगा था। अचानक उसे अहसास हुआ कि वे सब पिये हुए हैं। वे देखने में गरीब लग रहे थे। कहां से मिल होंगे इतने पैसे उन्हें? कहीं से चोरी-वोरी करके लाये हैं क्या? वह सोचता रहा। इतना बढिया खाना तो वह भी कभी-कभी ही खा सकता है! और यह आदमी अकेला अपने खर्च से सबको खिला रहा है? कुछ गडबड जरूर है।

अचानक फत्तू उसकी ओर देखकर मुस्कराया। उसने सिर नीचा कर अखबार पढ़ने का बहाना किया पर फत्तू ने पतली सी आवाज में व्यंग्य से कहा, '' हल्लो! गुड मार्निंग!'' उसके मन में उत्तेजना की एक लहर दौड़ गयी। पर वह शांत रहा और न सुनने का बहाना करता रहा। वह आदमी अपने साथियों से कह रहा था, '' सालों! तुम लोगों को कैसा बढिया होटल में लाकर खाना खिलाया है - देखो भैनचो... कैसा साहब लोग आकर यहां खाता है। ''

उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे कोई उसके खाने में गंदी चीजें डाल रहा हो। बडी मुश्किल से वह अपने- आपको शांत रख पा रहा था। तभी फत्तू से उसके एक साथी ने कहा, '' अबे छोड! याद है तेरे को, जब बंबई में ईरानी होटल में मुर्गा खाया था अपुन! वो जब छिब्बू के घर में छिपे रहे सब जाकर! बाद में सब.. ? '' उसकी बात काटते हुए फत्तू बोला, '' अबे तेरे को मुर्गा ही खाने का था तो तू पहले क्यों नहीं बोला! चल अभी...'' कहकर वह उठ पड़ा। उसके साथी पहले जैसे खाते रहे। फिर फत्तू बोला, '' यार! तू इस साब के सामने मेरे को ऐसा बेइज्जत कर रहा है - साले, क्या समझा क्या है तू?''

वे लोग हंस रहे थे। उनमें से एक ने कहा, '' अबे बैठ!''

फत्तू बैठ गया। अचानक वह जोर से हंस पड़ा फिर आंखें नीची करते हुए बोला, '' साले उस बार बुरी तरह फंस गया था यार!''

'' क्या हुआ था बे?''

'' अरे! वो जो इक्कू सेठ है न?'' उसकी आंखें और अधिक लाल हो गयी थीं। '' साले को एक दिन मैं कच्चा चबा जाऊंगा, उस हरामी के घर मेरी मां काम करती थी यार। तो उसके यहां चोरी हो गयी और पुलिस आ गयी साली मेरे को पकड्ने। मां को भी पकड़कर पीटा। मैंने तो चाकू चला दिया होता, वो तो मां ने रो- धोकर मुझे बंबई भागने को मजबूर कर दिया। ''

उसके दूसरे साथी हंस रहे थे। ऐसी गंभीर बात पर भी लोग हंस रहे थे। अचानक उसकी ओर देखकर फत्तू बोला, '' ऐ पढा-लिखा बाबू बडा बोर हो रहा यार!... साला पढ़ा-लिखा आदमी दाल रोटी खा रहा है और तू भुक्खड़ लोग ऐश कर रहा है!''

उसे खुद पर गुस्सा आने लगा था। वह उनकी बातें सुनने में इस तरह खो गया था कि उसे पता भी न चला था कि मनोहर कब दाल की प्लेट और दो फुलके रख गया था। वह अब खाने लगा था। मन-ही-मन उसे लग रहा था कि इस साले फत्तू को जाकर दो थप्पड़ मारूं। पर न तो उसमें इतनी ताकत ही थी और न ही वैसी स्वाभाविकता। मन-ही-मन कुढते हुए वह खाता रहा। मनोहर ने अब सलाद भी: लाकर रख दिया था।

उनमें से एक अब कह रहा था, '' यार! अब खाने. के बाद चलके जरा और भी जाये - आज का दिन ऐश किया जाय। ''

उसकी तकलीफ बढती जा रही थी। उसने सोचा कि इन्हीं लोगों को वह सडक पर देखता तो उनके प्रति उसकी भावनाएं कितनी अलग होतीं। इनको भ्री वह अपनी दुनिया में एक जगह देता, जहां न्याय- अन्याय का द्वंद्व छिड़ा हुआ है। पर अब उनके मैले चेहरों, फटे-चिथड़े कपड़ों को देखकर भी उसे कोई सहानुभूति नहीं हो रही, थी।

देर तक उनकी बातें उसे सुननी पडी। जल्दी खा लेने की जैसे उसमें ताकत ही नहीं थी। वे लोग भद्दी- भद्दी आवाजें निकालते रहे, गालियां देते .रहे। उसको फत्तू ने और नहीं छेड़ा, पर उसका गुस्सा उन पर बरकरार था। अचानक फत्तू ने कहा, '' सालो, आज पांच सौ रुपयों का बिल देना है - खा, तू लोग - क्या चाहिए तेरे को.. .पानी? धत् तेरे की.. .अबे ओए! ला, पानी ला - एक घड़ा लाकर रख यहां पर - आज खूब जायेंगे-पियेंगे, देख लो सालो - हम भुक्खड लोग कितना खा-पी सकते हैं!'' उनका खाना हो गया था। फत्तू ने बिल लाने को कहा। मनोहर ने आकर बतलाया कि पैंतालीस रुपए हुए हैं। उसने फिर भी बिल मांगा। सामने मिठाई के काउंटर पर बैठे मालिक ने जोर से कहा, '' बिल-विल हम नहीं देते! पैंतालीस रुपए दे जाओ!'' फत्तू ने जेब से पैसे निकाले और नोटों को गिनते हुए वह बोला, '' साली अपनी बेटी के लिए ये पैसे रखे थे यार! वह भी बेवकूफ अजीब सपने देखती है; अभी स्कूल जाती है न - उसकी एक किताब में इंदरा गांधी के बारे में लिखा है. - तो उसकी भी जिद हो गयी है कि वह इंदरा गांधी बनेगी...''

उसका कौर मुंह में ही रुक गया। उसने नजरें उठाकर उनकी ओर देखा। फत्तू हंस रहा था, '' साली बेवकूफ है यार! उसको क्या मालूम - बच्ची है न...'' '' बड़ी होकर तो झाडु लगायेगी साली,'' उसकी एक साथी ने कहा। बाकी दो जैसे कहीं खोये हुए से शून्य में ताकने लगे थे।

फत्तू अब चीख पड़ा '' क्यों बे, झाडू क्यों लगायेगी? अपुन वहां गंदा काम क्या इसलिए करता कि मेरी बेटी बडी होकर तेरी मां की तरह झोपडी में रंडीगिरी करेगी?''

पर वह दूसरा साथी चुप था। उसे बड़ा अजीब लगा, उसने सोचा था कि अब इनकी लड़ाई होने वाली है पर कुछ नहीं हुआ। वे लोग उठकर जाने लगे थे.। फत्तू ने एक बार जोर से कहा, '' साली, बेवकूफ, अभी से इदरा गांधी बनने का खाब देखती है। हरामजादी ने दो किताबें क्या पढ़ लीं, अपनी औकात भूल गयी!'' जाते हुए फत्तू ने उसकी ओर देखा और हंसकर बोला, '' क्यों साब! हाउ आर चू!'' वह भी पता नहीं क्यों हंस पडा। वे लोग शोरगुल मचाते चले गये। उनके जाने के बाद ढाबे का मालिक उसके पास आया और बोला, '' साब! आपको बुरा लगा होगा, हमको पहले पता होता कि इतनी बदतमीजी करेंगे तो हम कभी खाने को नहीं बैठने देते, पर अब बैठ गये तो उठाने को अच्छा भी नहीं लगता। ''

उसने बड़ी शांति से पूछा, '' कौन हैं वे लोग? यहां के तो लगते नहीं। ''

मालिक ने कहा, '' नहीं, यहीं के हैं - ये जो पीछे कंजरों की बस्ती है न - वहीं से हैं!''

'' कंजर कोई जात है क्या?''

'' बस, ऐसा ही समझो आप तो - बदमाश हैं सब!''

'' इतना पैसा कहां से मिलता है इनको?''

'' शराब का धंधा करते हैं न साब! वैसे चोरी-चमारी भी करते है - लगता है आज बड़ा हाथ लगा होगा सालों के! स्मगलिंग वगैरह भी. करते हैं - कुछ तो बंबई-बुंबई भी धूम आये हैं। ''

लौटते वक्त वह उस बच्ची की बातें सोचता रहा, जो इस देश की प्रधानमंत्री बनना चाहती है। '' सचमुच, कितनी बेवकूफ है!'' उसके मन में भी एक ख्याल उभरा।

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hari bhatnagar 001 (Mobile)

अजन्मी माँ

जब भी
किसी माँ के पेट में
बेटी आती है,
माँ-बाप की मुस्कान
क्यों चली जाती है?
बेटी ही तो एक दिन
बनती है बहन,
बाँधती है रक्षा-सूत्र।


बेटी ही बनती है - माँ।
बेटा और बेटी
देन है विधाता की।
मत कीजिए खिलाफत,
वरन् समाज में
आ जाएगी आफत।
बेटियाँ अजन्मी रह जाएँगी,
नव वधुएँ कहाँ से आएँगी?
किसे कहोगे - माँ ...!
जो इन्सान की जन्मदात्री है।

और वह लोग
जो बेटियों की करते हैं भ्रूण हत्या
वह जानवरों से भी गए बीते हैं,
राक्षसी-संस्कृति में जीते हैं!
' बेटी ' रूपी की अस्थिरता के
भक्षक और तक्षक हैं।


शायद,
ऐसे हैवानों की
' माँ ' नहीं होती,
उनकी कोई
बहन, बेटी नहीं होती!
वे पैदा हुए होंगे क्या
बिना ' माँ ' के? '
अरे, भारत तो
देवियों का देश है।


यहाँ देवियों को
कहते हैं ' माँ '।
बनाए जाते हैं
' माँ ' के मंदिर।
' माँ ' भारत की संस्कृति है,
संस्कारों की पहचान है,
अस्थिरता है।
' माँ ' भारत में युग-युगों से
गौरव-गर्विता है।

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नियति उस नारी देह की

एक साँवली लड़की,
एक बावली लड़की,
थोड़ा शरमाती -सी,
थोड़ा सकुचाती -सी।


प्यारी -सी, भोली-सी,
लगता कुछ बोली -सी,
माँगती थी काम क भी
हाँ, वह मुँहबोली -सी।


किससे प्यार करती थी,
क भी न बताती सी,
प्रसव -काल में आ -
उपचार वह कराती थी।


डाँटा कई बार उसे,
प्यार से समझाया भी,
समय -काल है खराब
मैंने बतलाया भी।


वादा कर जाती थी
अब क भी न आऊँगी,
उस निष्ठुर प्रियतम से
नेह न लगाऊँगी।

लेकिन कुछ रोज बाद
फिर वैसी आ जाती,
कहती, '' वह आएगा,
मुझको ले जाएगा। ''


'' बहुत प्यार करता है,
कभी न झगड़ता है,
नौकरी लग जाने दो-
बस यही कहता है। ''


मगर मैं उस दिन को
आज तक न भूल पाई,
वह नारी-देह खड़ी
जब द्वार पर लजाई।


हाँ, कि उसकी वाणी में
अन्तहीन दर्द था,
छल गया उसे वह ही
मर्द जो बेदर्द था।


आज के इस दौर की
वह एक सच्चाई थी,
निस्पृह अनुराग में
मिली बेवफाई थी।


तन पर थे बेढंग के
कटे-फटे तंग वस्त्र,
अस्मिता की रक्षा को
पास थे न कोई शस्त्र।

पल रही थी पेट में
प्यार की निशानी थी,
छली हुई देह-दृष्टि,
लगती. पाषाणी थी।


गले में था मंगल -सूत्र,
विश्वास की डोर-सा,
घात-प्रतिघात का -
दर्द ओर-छोर था।


पर अब भी आशा थी
वह छलिया आएगा,
नौकरी के मिलते ही -
आकर अपनाएगा।


किन्तु प्रसव -काल में
दर काल गया जीत,
काल के कपाल पर-
गूँज उठा मृत्यु गीत।


फिर भी उसे देखने
आया न कोई गीत,
माटी में जा सोई,
मौत से न पाई जीत।


विश्वास गया हार
स्वप्न हुआ तार-तार,
बसने से पहले ही -
उजड़ गया ' संसार।

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(चित्र - हरि भटनागर की कलाकृति)

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धूं- धूं कर धधकती फैलती आग
भाइयों यहाँ तो पीने के पानी का अकाल है ।

मारकाट-चीख-पुकार- भगदड़
बहनों यह तो दूल्हाचार और बने गाने का मौसम है ।

दूध और गेहूँ के ईश्वर कौन है भइया?
आम और तरबूज का कौन-सा मजहब है?
पानी
आग
हवा की जात कौन-सी है भाई?

कोई जवाब नहीं देता
सिर्फ ठहरे आँसू
और होंठों पर कांटेदार कँपकँपी है ।

अंधेरे से निकल कर आते हैं वे
और घरों को सडकों पर
चकनाचूर कर देते हैं
मजहब की किताबों के पन्ने
फाडकर चबाकर आते हैं वे
और धड़कनों की फसलों को
आग चाकू फरसों की पाशविक हिंसा के
हवाले कर देते हैं ।

धुएँ के पहाड़ में
घबराए बच्चे माओं को
और बदहवास माएँ बच्चों को पुकारती हैं ।

इस पुकार को जो रौंदते हैं जूतों से
वे सिर्फ बिके हुए मजहब के दलाल हैं
कुर्सी-तिजोरी के सामने मस्तक नवाते शैतान
मुट्ठी दो मुट्ठी नोटों को जेबों में ठूंस
बोतल दो बोतल शराब के सहारे
कुर्सी-तिजोरी और शोषण-पाखंड के
गढ़ों की नीवों को पुख्ता करने के खातिर
फायदे का वक्त और मौका ढूंढकर
जीवन संघर्ष के सरोवर में ऐसा खतरनाक जहर
मिलाते हैं
कि अन्न और पानी और अक्षर के लिए
जूझते लोगों की दुनिया में
बेहोशी छा जाती है ।

मौत की बस्ती के अंधेरे में इतिहास फिर से लँगड़ाने
लगता है
टूटी हुई सीढ़ियों के नीचे
बिन होंठों के बच्चे
बिन स्तनों की माताएँ
अपाहिजों तक की मृत देहों के क्षत-विक्षत
टुकड़ों से टकराता इतिहास
जहाँ भी लकडी खटखटाता है
वहाँ खून का थक्का
या भाषा की राख का ढेर ही होता है ।

अफीम की सुरंग से निकलकर
फिर शुरू होता है सत्य के लिए
गहरी नई कब्र खोदने का खतरनाक तमाशा
धर्मों के ठेकेदार मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे के
आँगन में गहरे गड्ढे खुदवाने लगते हैं
फिर भाइचारे का नाटक और नेपथ्य में नशे के नए
ठेकों की नीलामी शुरू होती है ।

कोई नहीं सुनता माई की पुकार
जो छाती कूटती पूछती है बार-बार
कहाँ गई बेटी मेरी
कहाँ मेरा घर-दुआर

समुद्र को टुकड़ों में बाँटने वालों
मनुष्य की विपदा के मलबे को
अखबारों से ढाँपने वालों
जवाब दो माई के सवालों का
लहूलुहान माथे को नोंचती
पूछ रही माई –

आकाश की जात बता भइया?
धरती का धरम बता?
धुएँ के पहाड़ में पथराई आँखों की
चुप्पी के ईश्वर का नाम बता?

---

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा पटना की कलाकृति)

ऐ देश के युवाओं

ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।
अपने को एक करके,
स्‍वदेश को बचाओ।

कर्णधार हो तुम्‍हीं देश के,
तुम्‍हीं देश के माझी।
मझधार में है कश्‍ती,
कहीं आ न जाये आँधी।
डूबे कहीं न जाकर,
नेकी की ये नैया।
साहिल पे खींच लाना,
तुम ही रहे खिवैया।
मेरे वतन के प्‍यारों,
जागो तुम औ' जगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।

माना बहुत कठिन हैं,
जीवन की ये राहें।
लेकिन कदम तुम्‍हारे,
हर्गिज़ न डगमगायें।
धैर्य को चुनौती,
ये कौन दे रहा है।
रोड़ा तुम्‍हारी राह में,
यह कैसा आ अड़ा है।
दुनियाँ की सारी बंदिश,
तुम तोड़ कर दिखाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।

गोद में जिसकी खेल-खेल कर,
इतने बड़े हुए हो।
खाते हो अन्‍न तुम जिसका,
जल जिसका पीते हो।
उठो, सुनो, उस मातृभूमि की
करुणा भरी पुकार।
शीश दान कर दो तुम रण में,
यही वक्‍त की माँग।
गौरवमय इतिवृत्‍तों पर,
धब्‍बे न तुम लगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।
 
है कार्य कौन ऐसा,
जिसको न साध लो तुम।
मंज़िल है कौन ऐसी,
जिसको न पा सको तुम।
स्‍वदेश सेवा ही हो,
सच्‍चा धर्म तुम्‍हारा।
दीन रक्षा ही हो,
पुनीत कर्म प्‍यारा।
अपने हों या पराये,
सबको गले लगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।

                          -सी ए. अनुराग तिवारी
                             5-बी, कस्‍तूरबा नगर,
                             सिगरा, वाराणसी- 221010
                             मो. ः 9415694329

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र वन्दना

बाकी है

संभल जाओ ऐ दुश्मने जहाँ

अभी वीरों को जगाना बाकी है

किसी को सुभाष किसी को

भगत सिंह बनाना बाकी है

मेरी सर जमीन का एक-एक वीर

तेरे हजारों सैनिकों पर भारी है

क्या है हस्ती तेरी के तू

मेरा चमन उजाडेगा

हिंद की मिटटी से सामना

होना तेरा अभी बाकी है

धरती के कण-कण से

तूफ़ान देश भक्ति का भरा है

उस तूफान को बवंडर बनाना बाकी है

संभल--------------------------------

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बसंत पंचमी के अवसर पर

सरस्वती वन्दना

तुम हो शारदे,------

पावन पवित्र हंस वाहिनी

श्वेत वस्त्र धारणी

वीणा वादनी

शाश्वत हो साकार हो

तुम जीवन आधार हो

तुम हो शारदे----------

बुद्धि दो बल दो

दे दो हमको ज्ञान तुम

हम नादान संतान तुम्हारी

तुम माँ संसार की

खड़े हैं चरणों मैं

शीश झुकाए

दो विद्या दान हमें

तुम हो शारदे-----

२६ जनवरी के लिए

फहराये चहुं ओर तिरंगा

आज देखूं यदि देश की हालत

तो आता है रोना,

पर सत्‍ता स्‍वार्थ की जोंकों का

देख रहा हूं सोना,

एक नहीं असंख्‍य ही देखो

विसंगतियां पड़ी हैं,

भ्रष्‍टाचार, महंगाई की

नित श्रृंखलाएं नयी खड़ी हैं,

चाहता हूं समय की धारा को

स्‍वपौरुष से जोड़ दूं,

उत्‍साहित कर सत्‍साहस को

शैय्‍यायें स्‍वार्थ की तोड़ दूं,

मैं रहूं या न रहूं इस जग में

पर बहे स्‍वतंत्रता की गंगा

उन्‍नत हो शिखर हिमालय का,

फहराये चहुंओर तिरंगा।

--

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 9410985048

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       गणतंत्र दिवस

                          ~~~~~~ 

गणतंत्र दिवस,                        

गणतंत्र दिवस;                  

यूँ दर्द छुपाकर,                  

तू न विहँस ।   

सच क्या है ?                  

तुझे पता है सब,              

पाबन्दी है सच कहने पर; 

हालात बिगड़ते ही जाते,                

यूँ जनगण के                   

चुप रहने पर;  

चुप रहते बीते                               

बरस- बरस ।  

मौसेरे भाई चोर-चोर,           

इक थैली के चट्टे-बट्टे ; 

मेहनतकश हैँ दूबर लेकिन       

ओहदेवाले हट्टे-कट्टे ;    

हम लोकतंत्र को                               

रहे तरस ।   

अब तेरी छाया के नीचे,          

छल -छद्म घोटाले  हैँ होते ;       

सच्चे-सीधे भूखोँ मरते,    

ईमानखोर पूजित होते ; 

अब है शायद  तू भी बेबस ।             

**=**              

AATMPARICHAY          DEVENDRA KUMAR PATHAK [ TAKHLLUS 'MAHROOM' ] DATE OF BIRTH -02.03.1955 /    VILLEGE- 'BHUDSA' , (BADWARA)  DIST-KATNI (M.P.) EDUC.-M.A.B.T.C.(HINDI /TEACHING )HINDI TEACHER IN A MIDDLE SCHOOL / EDU.M.P. GOVT. /PBLSHD BOOKS - 'VIDHRMI', 'ADANA SA ADAMI' ;[NOVEL ] 'MUHIM', 'MARI KHAL: AKHIRI TAL', 'DHARAM DHARE KO DAND' , ' CHANSURIYA KA SUKH' [STORIES BOOKS] 'DIL KA MAMLA HAI'[SATIRES] 'DUNIYA NAHIN ANDERI HOGI' [ POEMS] 1981  SE PATR-PATRIKAON MEN  PRKASHAN /REDIO -T.V. SE PRSARAN/ PREMNAGAR,KHIRAHANI;POST SCINECE COLLEGE POST OFFICE-KATNI. 483501 M.P.

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मैं गुलाब हूँ
मैं गुलाब हूँ
मुझमें है बहुत खुशबू
यह किसको नहीं पता,
खुद दुख दर्द सहकर
दूसरों को खुशबू देता हूँ।


तोड़ लेते हैं मुझे
बड़ी बेदर्दी से
नहीं तरस आता है
मुझ पर उन्‍हें
जरा पूछो मेरे दिल से
क्‍या मेरे दिल पे
गुजरती है
आँसुओं के घूँट पीकर
खुद को सँभलता हूँ।


आँसुओं को पीकर
शूलों का साथ निभाता हूँ
हर घड़ी में सुख-दुख में
साथ देता हूँ
मैं गुलाब हूँ।
कोई तोड़ने आता है मुझे
मैं चिल्‍ला कर कहता हूँ
मुझे मत तोड़ो
मुझे दर्द होता है,
पर क्‍या करूँ।
इस दर्द को
कोई सुनता नहीं।


बनमाली आकर
मुझे तोड़ लेता है
सदन ले जाता
सदन ले जा करके
वहीं माला पिरोता,
वहीं मुझे
देवी-देवताओं पर चढा़ता
मुझे कहीं
बेदर्द होकर
बेंच देता !
मुझ पर उसे करूणा का
भाव ही नहीं आता

वह भी बिचारा क्‍या करे
उसकी भी लाचारी
और मजबूरी है
मुझसे मित्रता करेगा
तो पेट कैसे भरेगा
प्रेमी तोड़ लेते
प्रेमिका केशों में गूँधती है।
आखिर मैं तरह-तरह के
दुख सहकर
दुनिया को खुशबू
प्रदान करता हूँ,
आखिर मैं गुलाब हूँ।


नहीं छोड़ूँगा
साथ दुनिया का
जब तक साँसों में सांस है।
नहीं कष्‍ट है मुझे अपनी जिन्‍दगी के लिये।
मैं गुलाब हूँ
अर्पित कर दूँगा
तन मन से
जिन्‍दगी अपनी दूसरों के लिए
यही है मेरा ध्‍येय,
यही है आरजू मेरी।

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जो फूल नहीं जग में

जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम
जब खिल जाए
फूलों सा चमन
चमन में फैल जाय महकती
चारों दिशाए।
जब बहें पवन सुंगन्‍धित
मलय समीर चारों ओर से।
दुनिया में रहे
हिन्‍दू, मुस्‍लिम, सिक्‍ख और
इसाई रहे सदा प्रेम से।
न कोई करे
किसी की जग हँसाई
ओ फूल बनने का संदेश देगे।
टहनियों में काँटों की
लटक-लटककर वट की शाखाओं को
सौम्‍य सुशोभित करता हूँ।

दुखों का दर्द सहन कर
हम फूल बनेगें,
इस जग की शान बनने को,
उस डाली से हमें प्रीत मिले
जो फूल नहीं जग में,
ओ फूल बनेगें हम।

सूरज करता रोशनी जग में,
जिससे मिट जाता अन्‍धकार
विश्‍व वसुन्‍धरा के तन से,
अपने प्रकाश के शशि को
निशा में एक दीप सा
प्रज्वलित कर देता है।
और निशा बन जाती
स्‍वच्‍छ चाँदनी की अनमोल
धरोहर पूनम सी।

वैसे बनकर हम
इस जग में
फैलाएंगे महक को
इस संसार में,
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम ।

छा जाए गगन में
छा जाए मलय समीर में,
छा जाए इस मिट्‌टी के कण-कण में,
ओ सुंगन्‍धित फूल बनेगें डाली के,
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम।

चारों दिशा में होगी शान्‍ति- शान्‍ति,
दुख की टाटी टूटेगी,
सुख की लहर आयेगी,

जैसे -
गँगा, जमुना, सरस्‍वती
हर-हर करके निकलें
पर्वतराज की गोद से,
करे मुक्‍त अपवित्रता को,
हम बनकर फूल
उस डाली के
अपवित्रता को दूर करके
पवित्रता को जग में लाएगें,
बहेगी चारो दिशाओं में पावनता।

जैसे -
बहें हिमालय की पवन
चारों दिशाओं में
बहा ले जायेगी
अपने साथ ये
बेरस पवन और लायेगी
चहुँदिश मधुरस पवन सा झोंका॥

फूल बनकर उस डाली करेगें
एक नवयुग का नव निर्माण।
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम।

उस युग में नई चेतना विकसित होगी।
जैसे -फूलेगें फूल हर डाली में
न कोई नीरव नीरस होगी,
न कोई लता बिना पुष्‍प की होगी,
न कोई डाली सूखी होगी,
हरी और हरियाली हर डाल होगी,
खुशहाल होगी हर-हरी डाल,
जो फल नहीं जग में,
ओ फूल बनेगें हम।

नव युग की नई
चेतना का विकास होगा,
इस युग में न कोई
तोड़ेगा डाली के फूल।

डाली से अलग होने पर
मुरझा जाते हैं फूल,
नव युग की नई चेतना में
कोई फूल नहीं मुरझा पायेगा,
जब नहीं तोड़ पाएगें फूल,
तब क्‍यों मुरझाएगें फूल ?
उस नवयुग के नये
फूल होंगे ऐसे।
जैसे सर में खिले
जंगल का फूल।

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Dr.arvind kumar
Assistant Profeser
Government Girls Degree College Dhindui Patti-Pratapgarh
U.P.
Mo.9451143511
drdivyanshu.kumar6@gmail.com

   बच्चों के लिए:  महान भारत 

अपना भारत देश महान ।
दुनिया में इसकी पहचान ।।

धर्म अध्यात्म ज्ञान विज्ञान ।
अन-जन-धन की, है यह खान ।।

कर्मठ हर मजदूर किसान ।
रक्षा में सब निपुण जवान  ।।

सभी क्षेत्र में क्षमतावान ।
दुनिया जानें शक्ति महान ।।

बड़ी निराली इसकी शान ।
दुनिया देती इसको मान ।।

हुए यहाँ नाना गुणवान ।
जन्मे राम-कृष्ण भगवान ।।

गूँजे यहाँ गीता का ज्ञान ।
कण-कण में मुनियों का ध्यान ।।

आगम-निगम स्मृति, पुरान ।
सबपे है हमको अभिमान ।।

भारत माता कह सम्मान ।
देते हम समझें जिमि प्रान ।।

हम सब भारत की सन्तान ।
बढ़ायेंगे नित इसकी शान ।।

हर भारतवासी की जान  ।
अपना भारत देश महान ।।
------------
                            डॉ एस के पाण्डेय,
                                                         समशापुर (उ.प्र.) ।
            URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
                          ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

                               *********

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क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये
मिल जाये तू इक कतरा सही
बिन तेरे अब जिया नहीं जाये

दिल हुआ बेचैन है तेरे लिए
रस्ता देखे नैन हैं तेरे लिए
आ जाये कहीं अब छन से तू
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये

याद आती है तेरी हर बात
वो छोटी ही सही इक मुलाकात
हुआ दिल मेरा बेक़रार तेरे लिए
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये

वो तेरे आसपास की खुश्बू
तेरे मेरे अहसास की खुश्बू
दिल में मेरे बस गयी है तू
बिन तेरे अब जिया नहीं जाये
क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये
मिल जाये तू इक कतरा सही
बिन तेरे अब जिया नहीं जाये

कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com

Qais Jaunpuri

A factory of creative ideas...

Films I Ads I Literature

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सरदी के कठोर मौसम में

झूम रहा है

एक झाड़ी के मध्‍य

मग्‍न हुआ मेरा मन,

देख रहा हूं

हिम से ढके उस मैदान को।

 

मैं अकेला दुःखियों का प्रिय

शोक-सन्‍ताप से दूर

इस मैदान में

बहाता नहीं आंसू

व्‍यर्थ के,

न सोचता हूं

आगे की और-

न बीते अतीत की,

देख रहा हूं-

हिमावरण से निर्मित-

उस श्‍वेत चादर को।

--

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

नया साल आ चुका है चुनौतियां देता हुआ | प्रस्तुत हैं चार छोटी रचनायें

[1]

कूद कूद कर आ जाता है

साल और दर साल

आता है तो आने भी दो

इसका नहीं मलाल

सोच समझ कर इसी बात का

मंथन करना है

आकर हमें दिया क्या करता

नया साल हर साल

 

[2]

लूट डकैती मारामारी

होते हैं हर साल

दंगे होते डंडे चलते

होता रोज बवाल

नये साल में रोक लगेगी

कौन सोचता है

इस पर किसने किसी तरह के

कभी उठाये सवाल?

 

[ 3]

उनको कौन पकड़ सकता है

कौन माई का लाल

जिसको चाहे गेंद बना दें

जिसे चाहे फुटबाल

अफसर नेता धनवालों की

यह तिकड़ी ऐसी

ऊपर से नीचे तक इनका

फैला रहता जाल

 

[4]

स्वच्छ धुले कपड़ों में होता

इनका ऊंचा भाल

इसी आड़ में करते रहते

नित नित नये कमाल

इन्हें पकड़ना आसमान के

तारे जैसा है

इनके तार जुड़े रहते हैं

दिल्ली और भोपाल

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मैं रेल की पटरी हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
कुछ कहना चाहती हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
पड़ी रहती हूँ
अपनी जगह पर
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
थूकते भी हैं
गन्दगी भी करते हैं
मगर मैं, रेल की पटरी हूँ...


चुपचाप सब सहती हूँ
कभी बुरा नहीं मानती
बस चुप ही रहती हूँ
क्योंकि मैं बुरा मानूंगी तो
लोग बुरा मानेंगे
लोग बुरा मानेंगे तो
लोग नहीं आएँगे
लोग नहीं आएँगे
तो मैं बुरा मानूंगी
इसलिए मैं कभी
बुरा नहीं मानती
क्योंकि मैं रेल की पटरी हूँ...


बुरा मानना मेरा काम नहीं
लोग कहते हैं
अगर बुरा ही मानना था
तो यहाँ बिछी क्यों हो...
उठो, खड़ी हो जाओ
अगर बिना बिछे
जिन्दा रहने की
हिम्मत रखती हो तो
मैंने तो नहीं कहा था
यूँ बिछी रहने को
यूँ पड़ी रहने को
अब बिछी हो
और पड़ी हो
तो नखरे न दिखाओ
यूँ ही बिछी रहो
यूँ ही पड़ी रहो
हमें आने दो
हमें जाने दो

मैं रेल की पटरी हूँ...
कभी-कभी सोचती हूँ
उठ जाऊं, खड़ी हो जाऊं
मगर फिर डरती हूँ
मैं तो एक रास्ता हूँ
अगर खड़ी हो गई तो
रास्ता न रहूँगी
और अगर रास्ता न रही तो
लोग नहीं आएँगे
फिर मैं खड़ी-खड़ी
सड़ने लगूंगी
जंग लग जाएगी मुझमें
फिर किसी कोने में
फेंक दी जाउंगी
क्यूंकि मैं हूँ ही क्या
एक रेल की पटरी ही तो हूँ
मैं उठ जाउंगी
तो दूसरी बिछ जाएगी
या बिछा दी जाएगी
आखिर रास्ता तो चाहिए ही
अगर रास्ता न होगा
तो लोग किधर जाएंगे
लोग भटकने लगेंगे
इधर-उधर
रास्ते की खोज में
कुछ गलत रास्ते पकड़ लेंगे
फिर मेरा क्या फायदा

मैं रेल की पटरी हूँ...
सोचती हूँ
क्यूँ मेरे नसीब में
सिर्फ बिछना ही लिखा है...
क्यूँ बोझ सहना ही लिखा है...
क्यूँ जब गलती से ही कोई फूल
मुझ पर आ गिरता है
तब आने-जाने वालों के कदम
कुचल देते हैं उस नाजुक फूल को
क्यों लोग कोई पत्ता भी
टिकने नहीं देते मुझपर
क्यूँ मैं मजबूर हूँ
धूप में जलने को
ठंड में ठिठुरने को
क्यूँ मैं हर मौसम में
मजबूर हूँ एक सी रहने को
क्यूँ नहीं मेरे भी
पंख निकल आते
मैं भी उड़ती
लोगों की तरह
लोगों के साथ
क्यूँ सब मुझे
इतना मजबूत समझते हैं...?
क्यूँ सब मुझे
गले नहीं लगाते...?
क्यूँ सब मुझे
पैरों तले ही रखते हैं...?
क्या इसलिए कि
मैं सिर्फ एक रास्ता हूँ...?
और रास्ता सिर्फ गुजरने
के लिए होता है...?
क्यूंकि रास्ता हमेशा
पैरों तले ही होता है...?

मैं रेल की पटरी
सोचती हूँ
क्यूँ न ऐसी दुनिया हो
जहाँ मैं भी सबको
गले लगा के चलूँ

मैं रेल की पटरी
थक चुकी हूँ
अब उठना चाहती हूँ
खड़ी होना चाहती हूँ
क्या कोई मुझे अपनी
बाहों का सहारा देगा...?


कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com 

 

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इस आत्‍मस्‍वीकृति को दाद देनी होगी कि उन्‍होंने कुपोषण की हकीकत को स्‍वीकारते हुए ‘राष्‍ट्रीय शर्म' का दर्जा दिया। क्‍योंकि किसी भी बड़ी समस्‍या के निदान से पहले जरूरी है कि उसे शासन-प्रशासन के स्‍तर पर जिस हाल में भी है, मंजूर किया जाए। जबकि हम हकीकत को झुठलाने में ज्‍यादा ऊर्जा खपाते हैं। देश में कुल 16 करोड़ बच्‍चे हैं। इनमें से 42 प्रतिशत बच्‍चों का कुपोषण के दायरे में आना वाकई शर्मनाक है। इस समस्‍या से निजात के लिए फिलहाल देश में केवल ‘एकीकृत बाल विकास परियोजना' (आईसीडीएस) वजूद में है। प्रधानमंत्री ने कुपोषण की व्‍यापकता का आकलन करते हुए बिना किसी लाग-लपेट के कहा, कुपोषण जिस तादाद में है, उसके चलते अकेले आईसीडीएस औजार से इसे काबू में नहीं लिया जा सकता। नीति-निर्माताओं को जरूरी है कि वे शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, स्‍वच्‍छता, साफ पानी, और पोषण के बीच की कड़ियों को समझें और उनके मुताबिक अपनी गतिविधियों को आकार व अंजाम दें। ‘हंगामा' (भूख और कुपोषण) नामक इस रिपोर्ट को खुद प्रधानमंत्री ने जारी किया ।

भारत में कुपोषण का बड़े फलक पर सामने आना कोई नई बात नहीं है। अब तक जितने भी सर्वेक्षण और अध्‍ययन हुए हैं, सभी ने कुपोषण की भयावहता को उजागर किया है। खास बात है प्रधानमंत्री ने इसे मंजूर किया। इस स्‍थिति का निर्माण उस दौरान हुआ, जब हम विकास दर ऊंची बनाए हुए थे और अपनी उपलब्‍धियों का डंका देश-दुनिया में पीट रहे थे। अब साफ हो गया है कि न तो अर्थव्‍यवस्‍था की ऊंचाई समाज के समग्र विकास की गारंटी है और न ही समावेशी विकास का लक्षण ! क्‍योंकि गुजरात, कर्नाटक, तमिनाडू और महाराष्‍ट्र उन प्रदेशों में शुमार हैं, जिसकी राष्‍ट्रीय औसत आय अन्‍य प्रदेशों की तुलना में सबसे अधिक है। बावजूद कुपोषण इन प्रदेशों में भी उतरने ही पैर पसारे हुए, जितने पिछड़े और बीमारू माने जाने वाले प्रदेशों में।

यह सर्वे देश के 9 राज्‍यों के 112 जिलों के 73 हजार परिवारों को नमूने के तौर पर लेकर किया गया। हालांकि सर्वे की इस दलील पर थोड़ा संतोष किया जा सकता है कि बीते सात सालों में बालकों में घर कर गए कुपोषण में 20 फीसदी की कमी आई है। बावजूद उत्तरप्रदेश के 41 जिलों में कुपोषण का आंकड़ा 42 प्रतिशत से भी ज्‍यादा है। वर्तमान में वहां विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया चल रही है। मुस्‍लिमों का आरक्षण देने जैसा काल्‍पनिक और कमोबेश संकीर्ण मानसिकता का मुद्‌दा सभी प्रमुख दलों के केंद्र में है, किंतु कुपोषण, जिसकी व्‍यापक भयावहता सभी धर्म और समाजों में उपस्‍थित है, वह किसी भी राजनीतिक दल के घोषणा-पत्र में शामिल नहीं है। कुपोषण के निदान के लिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी बार-बार आगाह कर चुकी है कि जो पोषाहार अभी साल में केवल 126 दिन दिया जाता है, वह कम से कम साल में 300 दिन मुहैया कराया जाए।

उत्तरप्रदेश में भूख के हालात कितने बद्‌तर हैं, इसका पता इस बात से भी चलता है कि कुछ समय पहले ही यहां के माने गांव से एक खबर आई थी कि भूख से बेहाल बच्‍चे सिलीकॉनयुक्‍त मिट्‌टी के लौंदे (डेले) खाकर भूख मिटा रहे हैं। इलाहाबाद के पास स्‍थित इस खदान की मिट्‌टी का स्‍वाद सत्तू जैसा है। इस कारण बच्‍चे इसे आसानी से आहार बना लेते हैं। यह स्‍वादिष्‍ट मिट्‌टी कुपोषण और कुपोषण से पैदा होने वाली तमाम बीमारियों की वजह बन रही है। हर दूसरे बच्‍चे की आंखों में सूजन है और पेट फूले हैं। आंखों और पेट में दर्द भी बना रहता है। सुस्‍ती और कमजोरी इनके शरीर का स्‍थायी भाव बन गया है। बावजूद इन बच्‍चों के परिवार जब तक खबर नहीं बन गए तब तक बीपीएल की सूची में दर्ज नहीं हुए थे।

यह तो एक बानगी भर है। भूख मिटाने के लिए हमारे देश में लोग क्‍या-क्‍या धत्‌ कर्म नहीं करते। बिहार में तो चूहों को मारकर खाने वाले लोगों को ‘मूसाहार' जाति का ही दर्जा दे दिया गया है। देश की कई आदिवासी जातियां आज भी जंगली पेड़ों की छाल उबालकर खाते हैं। इन्‍हीं सब कारणों से मानव विकास रिपोर्ट में हम 95 वें स्‍थान पर हैं। यही नहीं सामाजिक विकास से जुड़े हर मुद्‌दे पर हम पिछड़े हुए हैं। साक्षरता, शिक्षा, जन-स्‍वास्‍थ्‍य, पोषाहार, स्‍वच्‍छ पेयजल उपलब्‍ध कराने के मानकों में भी हम फिसड्‌डी हैं। यही कारण है कि एक ओर हमारे देश में प्रति व्‍यक्‍ति आमदनी में साल दर साल इजाफा हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी अनुपात में भुखमरों की संख्‍या में बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। इन्‍हीं सब वजहों से कुपोषण के मामले में हम दुनिया में अग्रणी देश हैं। 2011 में आई ‘वैश्‍विक भूख सूचकांक' रिपोर्ट ने भी हमें भूख के माामले में 67 वां स्‍थान दिया है। यह रिपोर्ट उन 81 देशों की है, जिन्‍हें विकासशील होने के साथ पिछड़े देशों की सूची में दर्ज किय गया है। इस मामले में चीन, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, नेपाल, वियतनाम, रवांडा और सूडान हमसे बेहतर स्‍थिति में हैं। कुछ समय पहले ही योजना आयोग द्वारा जारी मानव विकास रिपोर्ट के सर्वे को सही मानें तो भारत में 50 फीसदी बच्‍चे कुपोषण के दायरे में हैं। चूंकि प्रधानमंत्री ने जो सर्वे जारी किया है, वह महज 112 जिलों का है। यदि समूचे देश का सर्वे कराया जाए तो कुपोषण के हालात 50 से 60 फीसदी के इर्द-गिर्द ही आएंगे। वैसे भी पूर्व के सर्वेक्षणों का आंकलन 47 फीसदी बच्‍चों को कुपोषण के दायरे में दर्शाने वाले रहे हैं।

एक तरफ कुपोषण की यह बद्‌तर तसवीर है, वहीं दूसरी ओर खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय के एक अध्‍ययन ने तय किया है कि हम शादी-ब्‍याह जैसे सामाजिक जलसों में 10 से 30 प्रतिशत तक भोजन खराब हो जाने की आशंका के चलते सड़कों या कूड़ादानों में फेंक देते हैं। जूठन के रूप में भी खाद्यान्‍न की बड़ी मात्रा में बरबादी होती है। यह अध्‍ययन खाद्य मंत्री के वी थॉमस की पहल पर राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में कराया गया था। अब इस अध्‍ययन को देश के दूसरे चुनिंदा शहरों में भी किए जाने का फैसला लिया गया है। इस अध्‍ययन की रिपोर्ट आ जाने के बाद मंत्रालय इस भोजन की बरबादी रोकने के उपाय तलाशेगा।

एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल 230 लाख टन अनाज, 120 लाख अन सब्‍जियां, रख रखाव के बेहतर इंतजाम न होने के कारण, ज्‍यादा पैदावार होने के बाद मुनासिब दाम न मिलने के कारण और यातायात में रूकावट आने के कारणों चलते बरबाद हो जाते हैं। इस खाद्य सामग्री का आकलन 58 हजार करोड़ रूपए का किया गया है। यह स्‍थिति अनाज फसलों को हतोत्‍साहित करने व अखाद्य (ईंधन) फसलों को प्रोत्‍साहित करने के कारण भी निर्मित हुई है। इन्‍हीं वजहों के कारण जहां 1990 से 2007 तक जनसंख्‍या की औसत वृद्धि दर 1.9 फीसद रही, वहीं खाद्यान्‍न उत्‍पादन में वृद्धि दर 1.2 फीस तक सिमट गई।

खाद्यान्‍न उत्‍पादन में अखाद्य फसलों की भागीदारी, मुनाफे की ज्‍यादा संभावनाओं की वजह से भी बढ़ रही है। 1983-84 में कुल खाद्यान्‍न उत्‍पादन में 37 फीसदी अखाद्य फसलें थीं, जो कि 2006-07 में बढ़कर 47 फीसदी हो गईं। नतीजतन अनाज का उपभोग कम होने लगा। 1990-91 में अनाज की प्रति व्‍यक्‍ति दैनिक खपत 468 ग्राम थी जो कि 2005-06 में घटकर 412 रह गई। ये हालात भूख और कुपोषण के जनक हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा है कि पोषण के साथ अन्‍य कड़ियों को भी जोड़ने की जरूरत है। यदि ये कड़ियां जुड़ती हैं और कुपोषण जैसी राष्‍ट्रीय शर्म से देश को निजात मिलती है तो यह एक अच्‍छी स्‍थिति होगी ?

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

pramod.bhargava15@gmail.com

पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीन, चार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरह, चौदह, पंद्रह, 16, 17

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

गर्भपात

मैं अनीता, मैं अपनी सरकार, अपने कानून से कुछ कहना चाहती हूँ. मैं कहना चाहती हूँ कि मेरा होने वाला बच्चा एक नॉर्मल बच्चा नहीं है. वो पेट से ही अपाहिज है. मुझे न चाहते हुए भी इस बच्चे को जन्म देना पड़ेगा. क्यूंकि हमारा कानून ऐसा है.

हमने क्या गलत किया था? हमने तो सही रास्ता अपनाया था. कानून से गर्भपात की इजाजत माँगने चले गए थे. वैसे तो पूरे हिन्दुस्तान में लोग सौ-दो सौ रूपये देके गर्भपात कराते रहते हैं. उन्हें कोई नहीं पूछता. मगर हम खुद को थोड़े पढ़े-लिखे, समझदार समझ बैठे थे. और अपने अन्धे-बहरे कानून से इजाजत माँगने चले गए थे. मगर हम ये भूल गए थे कि हमारे यहाँ कानून की कुर्सी पे बैठने वालों को कानून की जरा भी तमीज नहीं है.

कानून इन्सान की भलाई के लिए होना चाहिए. कानून की वजह से किसी को जानबूझ के जिन्दगी भर अपाहिज की जिन्दगी जीने के लिए पैदा करना, कैसा कानून है? ऐसे कानून को आग लगा देना चाहिए.

मगर हमारा कानून सिर्फ किताबों में लिखी हुई पाबन्दियाँ हैं. हकीकत तो ये है कि कानून की कुर्सी पर बैठने वाले लोग सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं. अपनी नौकरी बचाते हैं. कोई इन्हें कुछ ना कहे. इनकी नौकरी बची रहे. बाकी जानता जाए भाड़ में.

हमने सोचा था हम सही तरीके से गर्भपात की इजाजत लेकर एक स्वस्थ बच्चा पैदा करेंगे. और ऐसा हमने खुद तय नहीं किया था. वो तो हमारे डॉक्टर लोग थे जिन्होंने हमें बताया कि पेट में पल रहा बच्चा एक स्वस्थ बच्चा नहीं है. और हम अपने उस बच्चे की जिन्दगी भर की मुसीबतों से उसे ही बचाने की कोशिश में लगे थे. क्यूंकि हमने देखा है अपाहिज बच्चों को. कितनी मुश्किलों का सामना करता पड़ता है उन्हें.

अलग रखा जाता है उन्हें. इससे बड़ी सजा और क्या होगी? सरकार अपाहिजों के लिए दुनिया भर की योजनाएँ बना सकती है. ढेर सारा पैसा बर्बाद कर सकती है लेकिन अपाहिजों की संख्या कम नहीं करना चाहती. हकीकत तो ये है कि इन्हीं योजनाओं के बहाने हमारी सरकार में बैठे लोग अपने खजाने भरते हैं. उन्हें लोगों की मुश्किलों से क्या लेना-देना?

हमारा होने वाला बच्चा खुद को कितना बेचारा महसूस करेगा मेरा तो यही सोचके जी घबराता है. डॉक्टर का कहना है मेरा बच्चा कभी खुद के पैरों पे नहीं चल सकेगा. और भी कई बातें हैं जो मेरे बच्चे को बीमारी की शकल में झेलनी पड़ेंगी. दुनिया में आके वो जिन्दगी भर दवाओं के सहारे रहेगा.

यही सब न हो इसी कोशिश में हम अपने कानून के पास गए थे मगर हमारा कानून अन्धा-बहरा है. उसे किसी के दुःख से कोई लेना-देना नहीं. वो किसी को मारने की इजाजत नहीं दे सकता. मगर वो किसी को पूरी उम्र घुट-घुट कर जीते हुए देख सकता है.

इससे तो अच्छा होता हम चुपचाप किसी अस्पताल में जाते, कुछ पैसे खर्च करते और अपने बच्चे को इस मुसीबत भरी जिन्दगी से बचा लेते.

कुछ लोग कहते हैं हम अपने अपाहिज बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे इसलिए गर्भपात कराना चाहते थे. इन लोगों को कौन बताए कि एक बच्चा अपने पैरों पे खड़ा नहीं हो सकता ये बात सुनके माँ-बाप पे क्या बीतती है. ये तो वही जाने जिसके साथ हो रहा है ये सब.

मैं तो बस इतना कहना चाहती हूँ कि ये बच्चा मेरी किस्मत में है और हमारी जिन्दगी अब इस बच्चे के लिए कुर्बान है.

बस कहना ये है कि इन्सान अपाहिज हो तो उसकी देखभाल कोई न कोई कर सकता है. लेकिन अगर हमारा कानून इसी तरह अपाहिज रहेगा तो इस देश की देखभाल कौन करेगा???

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कैस जौनपुरी

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