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February 2012
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कहानी

अंधेरे रास्‍ते

राकेश भ्रमर

रात घनी अंधेरी थी, तिस पर वह पिए हुए था․ गिरता-पड़ता और दारू पिलाने वालों की जय-जयकार करता हुआ अकेला चला जा रहा था․ पैर धूल से अंट गए थे․ कपड़े चीकट हो गए थे, परन्‍तु उसे अपने शरीर की कोई चिन्‍ता नहीं थी․ वह तो लाल परी के उड़नखटोले में बैठा सातवें आसमान पर उड़ रहा था․

कर्म से वह मजदूर था, परन्‍तु आजकल काम पर नहीं जाता था․ मनरेगा का काम बंद था․ खेतों में भी कोई काम नहीं था․ केवल ईंट के भट्‌ठों में काम मिलता था, परन्‍तु वहां भी उसे जाने की जरूरत नहीं थी․ चुनाव आ गए थे․ अलग-अलग दलों के लोग गांव में प्रचार के लिए आते थे․ वोटरों को लुभाने के लिए उनको दारू की बोतल पकड़ाते थे․ सौ-पचास अलग से चुपके से दे देते थे․ उसकी ही नहीं, गांव में उसकी तरह के दूसरे निठल्‍ले लोगों की चांदी हो रही थी․ दारूबाज तो दिन रात दारू के नशे में झूमते रहते थे, परन्‍तु उनके घरों में फांकों की नौबत आ गई थी․ जिनकी घरवालियां खेत-मेड़ में काम करती थीं, वह तो घर के लोगों का किसी तरह पेट भर लेती थीं, परन्‍तु जिनके घरों में कमाने वाले केवल पुरुड्ढ थे, उनके घरों में चूहे भी भूखों मर रहे थे․ दारूबाज कहते थे, सरकार हर महीने चुनाव क्‍यों नहीं करवाती? और उनके घरों की औरतें अपने भाग्‍य को कोसती हुई कहती थीं कि आग लगे ऐसी सरकार को, जो चुनाव करवाती है और दारू देकर लोगों की सेहत खराब करती है और उनके मर्दाें को निठल्‍ला बना देती है․

वह घर पहुंचा तो घर में पूरी तरह सन्‍नाटा छाया हुआ था․ आसपास के घरों में भी कोई सुगबुगाहट नहीं थी․ जाड़ा अपनी पूरी जवानी पर था․ ऐसे में कौन जागता․ पूरी तरह से सोता पड़ गया था․ दिन भर के थके मांदे लोग गहरी नींद के आगोश में समा चुके थे, परन्‍तु रामजियावन जाग रहा था, उसके पेट में भूख भी जाग रही थी․ कच्‍ची दारू का नशा अब हल्‍का होने लगा था․ उसने जोर से दरवाजा भड़भड़ाया, ‘‘शीलू की मां, दरवाजा खोल!'' उसके स्‍वर में अनुरोध कम क्रोध भरा अधिकार ज्‍यादा था․ शीलू उसकी दूसरी बेटी थी․ बड़ी बेटी का नाम नीतू था․ उसी के नाम पर वह अपनी घरवाली को बुलाता था, परन्‍तु जब से वह बाहर चली गयी थी, अपनी पत्‍नी को दूसरी बेटी के नाम से बुलाने लगा था․

‘‘दरवाजा खोल, दरवाजा खोल'' की रट के साथ-साथ वह दरवाजे को पीटता भी जा रहा था․ अंदर से कुछ बडबड़ाने जैसी आवाजें आने लगीं तो वह और जोर से बोला, ‘‘हरामजादी, कुतिया, क्‍या अर्थी पर लेटी है, जो उठ नहीं सकती․ खोल जल्‍दी, नहीं तो तेरी․․․'' उसने अपनी सास के नाम पर घरवाली को एक भद्दी गाली दी․ तभी भड़ाक से दरवाजा खुल गया․ उसने अपने शरीर का भार दरवाजे पर डाल रखा था․ दरवाजा खुलते ही वह अन्‍दर की तरफ गिरते-गिरते बचा․

‘‘आ गया कमाकर․․․ खाएगा क्‍या․․․․ का? मरदुआ, सारा दिन पता नहीं कहां बैठकर दारू पीता रहता है, अब मरने के लिए घर आया है․ यहां तो तुझे जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं है, पेट में क्‍या ठूंसेगा? अपने बाप का․․․․?'' उसकी घरवाली ने उसे एक तरफ ठेलकर दरवाजा बंद कर लिया और रुआंसी आवाज में बड़बड़ाती आंगन की तरफ चली गई․ सर्दी बेतरह थी․ ऐसा लगता था, आदमी खड़े-खड़े ही जम जाएगा․ शाम को आग जलाकर शरीर को थोड़ी गर्मी पहुंचाई थी․ दिन को भात बनाया था, आलू की सब्‍जी थी․ वही खाकर उसने और बच्‍चों का पेट भरा था․ घर में और कुछ था ही नहीं․ क्‍या बनाती और क्‍या खाती? खसम के लिए भी थोड़ा भात और सब्‍जी बचाकर रख दी थी․

गीता तो फटाफट खटिया में रजाई लपेटकर घुस गयी․ ठण्‍डी हवा शरीर को तीर की तरह छेद रही थी․ हाथ-पैर जैसे सुन्न हो गए थे․ नाक और मुंह से भाप निकल रही थी․ बगल की खटिया पर बड़ी बेटी और दूसरे बच्‍चे एक दूसरे से चिपककर सोए हुए थे․ लगता था, पाला पडने़ लगा था, क्‍या होगा फसल का? अरहर तो पूरी तरह से सूख जाएगी․

इतनी ठंड के बावजूद रामजियावन को ठण्‍ड महसूस नहीं हो रही थी․ वह कच्‍ची जमीन पर धम्‍म से बैठता हुआ बोला- ‘‘ला खाना․''

‘‘हां, छप्‍पन भोग बनाकर रखे हैं, अभी देती हूं․'' गीता ने रजाई के अंदर से जवाब दिया और करवट बदलकर लेट गयी․

‘‘ला वही दे दे․'' वह बड़बड़ाया․

‘‘पतीली में भात रखा है और कटोरी में सब्‍जी․․․ चुपचाप खा ले․ ज्‍यादा बड़बड़ मत कर! चुनाव वाले आते हैं, तुझे दारू पिलाते हैं, तो क्‍या हजार-पांच सौ घर के लिए नहीं दे सकते कि हमारे पेट में भी अन्न का एक दाना जाए?''

‘‘देंगे, देंगे․ इस बार सरकार हमें सब कुछ देगी․ हमारे दिन भी फिरेंगे․ हम न भूखों मरेंगे, न नंगे रहेंगे․ हमारा कच्‍चा घर भी पक्‍का हो जाएगा․''

‘‘हां, हां, बड़े आए! जब से होश संभाला है, यही तो देख रही हूं․ हर दूसरे-तीसरे साल चुनाव होते रहते हैं, कभी परधानी के, कभी एमेले के, कभी एमपी के․․․ हमें क्‍या मिला? घर में न जमीन है, न आमदनी का कोई जरिया․ एक राशन कार्ड तो बना नहीं․ ऊपर से तेरे जैसा निठल्‍ला पति․․․ तीन-चार पिल्‍ले․․․ कहां से इनका पेट भरूं?'' और वह रुआंसी सी हो गई․

रामजियावन चाहे दारू पी के पत्‍नी को गाली दे, परंतु जब वह रुआंसी हो जाती और ऐसी कलेजा फाड़ देने वाली बातें करती, तो उसका नशा हिरन हो जाता․ वह शान्‍त होकर बोला, ‘‘क्‍या करूं शीलू की मां․ मैं भी जानता हूं, न तो कोई सरकार, न कोई एमेले एमपी या परधान हमारा भला कर सकता है․ मैं भी तो बूढ़ा हो गया ऐसे वादे सुनते-सुनते․․․ इसलिए जब भी प्रचार वाले आते हैं, तो जो कुछ देते हैं, ले लेते हैं․''

‘‘तो कोई अच्‍छी चीज क्‍यों नहीं देते․ आदमियों को केवल दारू क्‍यों पिलाते हैं․ रुपया-पैसा भी तो दे सकते हैं?''

‘‘कभी-कभी देते हैं, कपड़ा लत्त्‍ाा देते हैं, परंतु आजकल टी․वी․ वालों की नजर उन पर रहती है․ उनके डर से कोई पार्टी जनता को खुलेआम कुछ नहीं देती․ चुपके से दारू का पाउच पकड़ा देती है․''

‘‘हुंह, सब कहने की बातें हैं․'' वह कसमसा कर बोली, ‘‘अगर चुपके से दारू दे सकते हैं, तो चुपके से साड़ी-कंबल, रुपया-पैसा भी दे सकते हैं․ परन्‍तु नहीं, उनको तो बस हमारा वोट चाहिए․ जीतकर लखनऊ चले जाएंगे और फिर पांच साल तक हमारा खून चूसकर अपना पेट भरेंगे․ कोठी-बंगला बनवाएंगे और हमें क्‍या मिलेगा․․․? वही सूखा भात और कभी-कभी आलू की सब्‍जी․․․ अरहर की दाल कभी नसीब नहीं होती․ रोटी खाने को तरस जाते हैं․․․हुंह․ अब चुपचाप खाना खाकर सो जाओ․ आधी रात बीत चुकी है․ रात की तरह हमारे जीवन में भी अन्‍धेरा है․ इन रास्‍तों में दिया जलाकर कोई नेता नहीं रखेगा कि बिना ठोकर खाए हम आगे बढ़ जाएं․''

अगर गीता दुःखी थी, तो उसके जैसे देश के अन्‍य लाखों लोग भी दुःखी थे․ रामजियावन और गीता की उमर पचास-चालीस के बीच थी․ इतनी उमर में उन्‍होंने चालीस नहीं तो कम से कम 25 चुनाव अवश्‍य देखे होंगे․․․ परधानी का, विधायक का और सांसद का․ कभी-कभी मध्‍यावधि चुनाव भी हो जाते थे․ इतने सालों में कितने नेता आए, कितने वायदे किये गए, किसी को याद नहीं होगा․ कई सरकारें बदल गयीं, देश-विदेश में बहुत सारे परिवर्तन हुए, परंतु उनके जैसे लाखों लोगों के जीवन में क्‍या परिवर्तन आया? उनके मां-बाप मजदूर थे, ये भी मजदूर हैं और इनके बच्‍चे भी मजदूर होंगे․

राजजियावन और गीता के जीवन में अगर कोई परिवर्तन आया था, तो वह था कि उनके चार बच्‍चे हो गए थे- तीन बेटियां और एक बेटा․ भगवान जिनको धन-संपत्त्‍ाि और विद्याधन नहीं देता, उनको बच्‍चे भरपूर देता है․

रामजियावन मजदूर था, परंतु हमेशा मेहनत से जी चुराता था․ एक दिन काम करता, तो दो दिन आराम․ लिहाजा घर में हमेशा अभाव का टोटा लगा रहता․ गीता भी काम पर जाती थी, पर एक औरत की कमाई से छः व्‍यक्‍तियों का पेट कैसे भरता? अब तो खैर, पांच ही लोग बचे थे घर में․ बड़ी बेटी․․․ भगवान किसी को ऐसा दिन न दिखाये, जब किसी मां-बाप की जवान बेटी किसी के साथ मुंह काला करे और एक दिन गांव से भाग जाए․ रामजियावन और गीता के लिए तो बड़ी बेटी मर चुकी थी․

अब दूसरी बेटी भी जवान हो चुकी थी․ उसको लेकर गीता चिंताग्रस्‍त रहती, परंतु रामजियावन को न तो काम की चिन्‍ता थी, न लड़कियों के जवान होने की, न उनके शादी-ब्‍याह की․ उसके लिए न तो घर की कोई समस्‍या थी, न बाहर की․ दारू पीने के लिए दो-चार दिन काम कर लेता, फिर ढाक के वही तीन पात․․․

जीवन के बेरहम थपेड़ों की मार सहते-सहते गीता बुद्धिमान न सही, समझदार अवश्‍य हो गयी थी․ बड़ी बेटी के पैर फिसले तो उसकी आंखें खुली थीं और जब वह भाग गई तो पता चला कि गरीब के घर में केवल भूख और अभाव ही नहीं होते हैं, बल्‍कि दूसरे प्रकार के अभिशाप भी उसे पीडि़त करते रहते हैं․ गरीब की बेटी आवारा कुतिया की तरह होती है, जिसके पीछे गांव-गली के आवारा, छिछोरे और निठल्‍ले लोग पड़े ही रहते हैं․ बिना किसी शरम-लिहाज के कुत्त्‍ाों की तरह उसे घेरे ही रहते हैं․

गरीब की बेटी की इज्‍जत जाड़े की धूप की तरह होती है, जिसमें हर कोई अपना बदन सेंकना चाहता है․ उसकी इज्‍जत रोज तार-तार होती है और मां-बाप के पास टुकुर-टुकुर ताकते रहने के सिवा कोई चारा नहीं होता․ वह न अपनी बेटी को इधर-उधर जाने से रोक पाते हैं, न बेटी की इज्‍जत लूटने वाले पुरुड्ढों से लड़ाई कर सकते हैं․

परंतु अब गीता सावधान हो गई थी․ दूसरी बेटी ने चौदहवें साल में कदम रखा था और उसके शरीर में जवानी के उभार परिलक्षित होने लगे थे․ इन परिवर्तनों के साथ-साथ शीलू की आंखों और शरीर में चंचलता भी आती जा रही थी․ गीता ने ठान लिया था कि इस बेटी पर वह पूरी नजर रखेगी और उसके कदमों को बहकने न देगी․

वह अच्‍छी तरह जानती थी कि रामजियावन के किए कुछ नहीं होगा, उसे ही कुछ करना होगा․ परंतु क्‍या․․․ इसके आगे उसकी सोच बंद हो जाती․ कोई रास्‍ता उसे नजर न आता․ हर तरफ तो अन्‍धेरा छाया हुआ था․ परंतु जहां अन्‍धेरा होता है, वहीं सवेरे का आभास भी होता है․

चुनाव खत्‍म हो गये थे․ लोगों की मुफ्‍तखोरी और नशाखोरी को लगाम लग चुकी थी․ समझदार लोग अपने-अपने काम धंधे में लग गये थे․ प्रदेश में नई सरकार बन चुकी थी․ नेता गांव की गलियों से गरीब के जीवन में सुख की तरह गायब हो चुके थे․ अब पांच साल तक जनता सुकून की नींद सो सकती थी, भूखे पेट ही सही․ जीवन पहले की तरह पटरी पर दौड़ने लगा था․․․ एकरस․

रामजियावन गांव की एकमात्र दुकान पर खैनी लेने गया था․ उस दिन दुकान पर सहुआइन बैठी थीं․ लाल साड़ी और चेहरे पर लाली पाउडर पोते दमक रही थीं․ माथे पर चौड़ी बिन्‍दी थी और होंठों पर गहरी लिपस्‍टिक․․․ पहली नजर में वह किसी को भी नई नवेली दुल्‍हन नजर आ सकती थी․ सहुआइन को देखते ही रामजियावन के दिल में तरंगें हिलोरें मारने लगीं․ रिश्‍ते में भौजी लगती थीं, किलकता हुआ बोला, ‘‘राम-राम भौजी! आप कब आईं?''

सहुआइन ज्‍यादातर दिल्‍ली में रहती थीं․ गांव में सबको बता रखा था कि दिल्‍ली में वह अपनी बेटी-दामाद के साथ रहती थीं․ उनका मानना था कि बेटी नासमझ और अकेली थी․ दामाद काम-धंधे में व्‍यस्‍त रहता था․ अतः बेटी का घर संभालने चली जाती थीं․ हर दूसरे-तीसरे महीने गांव आती रहती थीं․ जब लौटकर आतीं तो रिश्‍तेदारी के गांवों में भी खूब चक्‍कर लगातीं․ लोगों का कहना था कि गांव के गरीब घरों की छोकरियों को दिल्‍ली ले जाकर वह अमीर लोगों के घरों में घरेलू काम दिलवाती थीं․ इस तरह गरीबों का भला करके पुण्‍य कमाती थीं, परंतु लोगों के मुंह से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती थीं जो सहुआइन के एक अन्‍य प्रकार के चरित्र के पहलू को उजागर करती थीं․ सत्‍य क्‍या था, यह तो सहुआइन ही जानती थीं, या वे लड़कियां जो दिल्‍ली जाकर दुबारा अपने गांव वापस नहीं आ पाई थीं․

‘‘कल ही शाम को तो आई हूं․'' उन्‍होंने बातों में मिसरी घोलते हुए नैन मटकाते हुए कहा, ‘‘बड़ी भाग-दौड़ करनी पड़ती है․ दिल्‍ली में बेटी का घर संभालो और यहां अपना․''

‘‘क्‍यों करती हो इतनी भागदौड़? बिटिया की शादी हो गयी․ बेटा शहर में पढ़ रहा है․ साहूजी अपनी दुकान चला रहे हैं․ सूद का पैसा लगातार आ ही रहा है․ कमी क्‍या है, जो आप गांव से शहर और शहर से गांव अलटी-पलटी मारती रहती हो․'' रामजियावन ने सीधे भाव से कह दिया․ हालांकि लोगों का कहना था कि इनके घर में जो सोना-चांदी और रुपये-पैसे का भंडार है, वह अकेले साहूजी की दुकान की कमाई का नहीं है․ उसमें सहुआइन का भी काफी योगदान है․

‘‘अरे तुम नहीं समझोगे देवरजी․ जीवन के छक्‍के-पंजे तुम क्‍या जानो, गंवार जो ठहरे․․․ दस पैसे कमाने के लिए बीस तरह की तिकड़म लड़ानी पड़ती है, तब जाकर कहीं धन-दौलत जुड़ती है․''

‘‘हां सो तो है․ भौजी हमें भी शहर ले चलो न! कहीं चौकीदारी का काम दिलवा दो, जिसमें मेहनत न करनी पड़े․ बैठे-बैठे नौकरी चलती रहे और दो पैसे हाथ में आ जाएं․''

‘‘इस उमर में तुम शहर जाकर क्‍या नौकरी करोगे? बूढे़ ठाठ में सांस लेने की जगह तो बची नहीं․ हां कोई छोटी लड़की हो तो बात बन सकती है․ दिल्‍ली में सेठों और अफसरों की कोठियों में काम करने वाली लड़कियों की बड़ी मांग है․ खाना-कपड़ा और रहना मुफ्‍त और चार-पांच हजार महीना तनख्‍वाह․ असम, बंगाल और बिहार की न जाने कितनी लड़कियां उनके घरों में काम करती हैं और इज्‍जत से रहती हैं․ हम यूपी वाले तो बहुत पिछड़े हैं, तभी तो इतने गरीब हैं․ काम ही नहीं करना चाहते․'' फिर सहुआइन फुसफुसाती हुई बोलीं- ‘‘मैंने तो एक बार पहले भी कहा था कि अपनी बड़ी लड़की को मेरे साथ भेज दो․ अब तक हजारों रुपये तुम्‍हारे हाथ में होते․ परंतु तुम न माने․ मेरी बात पर ध्‍यान ही नहीं दिया․ आखिर क्‍या हुआ, बेटी ने गांव में गदंगी फैलाई और तुम्‍हारी नाक कटाकर चली गई․ न पैसा मिला, न इज्‍जत बची․ मैं तो अपनी रिश्‍तेदारी की कई गरीब लड़कियों को दिल्‍ली में काम पर लगा चुकी हूं․ तुम कहो तो तुम्‍हारी दूसरी बेटी को काम दिला दूं․ अब तो जवान और समझदार हो गई है․ कहो तो उसे इस बार साथ लेती जाऊं․ दो महीने की तनख्‍वाह एडवान्‍स में मिलेगी, पूरे दस हजार․․․ ?'' सहुआइन ने मुस्‍कराते हुए चारा फेंका․

रामजियावन का दिल धड़क उठा․ लगा किसी ने उसके दिल को मरोड़ दिया हो․ लाख शराबी सही, परंतु गैरत से महरूम नहीं था․ सहुआइन हंसमुख थीं, मीठी बातें करती थीं․ किसी के भद्दे मजाक का भी बुरा नहीं मानती थी․ परंतु गांव में उनके बारे में तरह-तरह की बातें चर्चित थीं․ मसलन उनका अवैध सम्‍बन्‍ध अपने दामाद से था, इसीलिए भाग-भाग कर दिल्‍ली जाती थीं․ उनका दामाद वहां परचून की दूकान करता था․ इसके अलावा लोग यह भी कहते थे कि गरीब औरतों को बहला फुसलाकर उनकी जवान हो रही बेटियों को दिल्‍ली में काम दिलाने के बहाने कोठे में बेच देती थीं या कुछ अधेड़ उम्र के लोगों को बेच देती थीं, जिनकी शादी नहीं हो पाती थी․ ये लोग अच्‍छा खासा रुपया देकर कमसिन लड़कियों को खरीद लेते थे और शादी करके या सीधे रखैल बनाकर घर में रख लेते थे․ तभी तो साहूजी गांव में मालामाल हो रहे थे․

रामजियावन चिन्‍ता में डूब गया था․ अच्‍छा क्‍या है, बुरा क्‍या․․․ यह उसकी समझ से परे था․ सहुआइन ने आगे चारा फेंका, ‘‘ज्‍यादा मत सोचो देवर जी․ गरीब के जीवन में ज्‍यादा सोचने के लिए कुछ नहीं होता․ बस, फटाफट तय कर लो․ दस हजार अभी रख लो, बाकी जब-जब मैं आऊंगी, बेटी की तनख्‍वाह तुम्‍हें लाकर देती रहूंगी․ या कहोगे तो अगली बार आकर एक साल की पूरी तनख्‍वाह तुम्‍हारे हाथ में धर दूंगी․ पूरे पचास हजार रुपये!'' इतना लुभावना चारा तो कोई भी हजम कर सकता था․

रामजियावन की आंखों में चमक आई, फिर अचानक ही बुझ गई․ इतने पैसे क्‍या वह एक साथ अपने जीवन में देख सकेगा? क्‍या करेगा इन पैसों का, अगर उसे एक साथ मिल गये? बैंक में जमा कर देगा, तीसरी बेटी का ब्‍याह करेगा? बेटे को पढ़ायेगा? या दारू पीकर उड़ा देगा? उसकी कुछ समझ में न आया․ इतने पैसे के बारे में सोचकर ही उसका दिमाग चकराने लगा․ जब हाथ में आएंगे तो कहीं पागल न हो जाए․ परंतु गीता․․․उसकी घरवाली․․․ क्‍या वह बेटी को दिल्‍ली भेजेगी?

‘‘जाओ देवर जी घर जाओ․ घरवाली से एक बार पूछ लो․ ऐसा मौका बार बार नहीं आएगा․ जवान बेटी का ब्‍याह तो कर नहीं पाओगे, फिर वह भी कहीं नाक कटा बैठी तो? काम करेगी तो तुम्‍हारे घर की हालत भी सुधर जाएगी․ सुख से दो रोटी तो खाओगे? बाद में कहीं उसकी शादी कर देना, तब तक तीसरी बेटी काम करने लायक हो जाएगी?'' सहुआइन ने मुस्‍कराते हुए रामजियावन के विचारों को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया․ रामजियावन ने घूरकर सहुआइन को देखा उनकी आंखों में अनोखी चमक थी․ क्‍या वह उनकी जीत की चमक थी, या रामजियावन के जीवन में आने वाले अंधेरे के पहले की रोशनी․

जवान होती बेटी․․․ दस हजार रुपये․․․ पचास हजार रुपये․ तीनों चीजें आपस में गड्ड-मड्ड हो रही थीं․ उनके बीच में रामजियावन उलझ गया․ रातभर ऊहा-पोह में पड़ा रहा․ सोच-सोचकर सांसें फूलतीं, परन्‍तु कुछ तय नहीं कर पाया․ इसी दुविधा में पत्‍नी को कुछ नहीं बताया․

परंतु सहुआइन चुप कहां बैठने वाली थीं․ उसने चारा फेंका था․ उसे तो देखना ही था कि मछली कितना चारा खाती है और कितना कांटा निगलती है․ चारा खाएगी तो कांटा उसके मुंह में फंसना ही था, फिर मछली को पकड़ने और मारने में कितना समय लगता है․ गरीब तो वैसे भी जमीन पर पड़ी हुई मछली के समान होता है, जिसकी अन्‍तिम सांसें कभी भी निकल सकती हैं․ कोई भी उसे मारकर खा सकता है․

दूसरी सुबह सहुआइन सुबह-सवेरे रामजियावन के घर आ गयीं․ इधर-उधर की बातों के बाद चुपके से पूछा- ‘‘देवर ने तुम्‍हें कुछ बताया या नहीं․''

गीता चौंककर बोली- ‘‘क्‍या․․․ क्‍या? नहीं तो․''

‘‘अच्‍छा․'' सहुआइन ने चौंकने का अभियन किया, फिर धीरे-धीरे उसे भी शीशे में उतारने लगीं․ चालाकी से ऐसी-ऐसी मीठी बातें कीं कि लगने लगा कि उसके घर में लक्ष्‍मी की बरसात होने वाली है, बस शीलू को दिल्‍ली भेजने की देर है․ सहुआइन की बातें उसे लुभा रही थीं, परंतु उनके बारे में गांव में जो चर्चा थी, उसके कारण मन में डर भी था कि कहीं बेटी को उनके साथ भेजकर किसी मुसीबत में तो नहीं डाल देगी? ․

परंतु रुपयों का लालच बहुत बड़ा होता है․ मन लालच और शंका के बीच में झूलता रहा․

‘‘जवान हो रही बेटी को अकेले कैसे भेज दें? दिल्‍ली में किसके यहां रहेगी, कैसे रहेगी? किसका आसरा करेगी? मां-बाप, भाई-बहिन कोई नहीं․․․ सब पराये आदमी․․․ उनके बीच कैसे रहेगी?'' लालच के बीच से गीता के मन में शंका के साये ने मुंह उठाया․

सहुआइन ने उसकी शंका को एक झटके में मार दिया, ‘‘मैं हूं न, क्‍या तुमको मेरे ऊपर भरोसा नहीं? और वह काम भी उसी घर में करेगी, जिसमें पूरा परिवार․․․ मां-बाप, भाई-बहन, बहू-बेटे, बच्‍चे․․․ सभी होंगे․'' फिर सहुआइन ने बात को घुमाते हुए कहा, ‘‘देखो बहन अपने घर की हालत देखो․ दीवारें गिर रही हैं․ जाड़े में भी बच्‍चों के बदन पर कपड़े नहीं․ जो हैं, वो भी फटे हुए․․․ सोचो एक बार बेटी काम पर लगी तो सब के दिन फिर जाएंगे․'' फिर उन्‍होंने शीलू को अपनी तरफ बुलाते हुए कहा, ‘‘यहां आओ! देखो तो कितनी जवान हो गई है, परन्‍तु सारा बदन उघड़ा हुआ है․ गांव के लोगों को तो तुम जानती हो․ क्‍या हुआ तुम्‍हारी बड़ी बेटी के साथ? गंदे लोगों की निगाहों और हाथों से कहां बच पायी? अब क्‍या चाहती हो कि छोटी बेटी भी उसी रास्‍ते पर चले, जिस पर चलकर तुम्‍हारी बड़ी बेटी तुम्‍हें बदनामी का कभी न छूटने वाला दाग दे गयी․ सोचो मत! दिल्‍ली में इसकी इज्‍जत भी सुरक्षित रहेगी और कमाकर तुम्‍हें दो पैसे का सुख भी देगी․''

सहुआइन ने गीता को कुछ सोचने-समझने का मौका नहीं दिया और सौ-सौ रुपये की एक गड्‌ड़ी गीता के हाथों में पकड़ाकर बोली, ‘‘ये रख लो․ काम आयेंगे․ अगली बार आऊंगी तो पूरे साल की तनख्‍वाह तुम्‍हारे हाथ में होगी․'' फिर शीलू के सिर पर हाथ रखकर बोली, ‘‘मेरे साथ दिल्‍ली चलोगी? वहां थोड़ा काम तो करना पड़ेगा, परंतु खाने-पीने, रहने और पहनने का सुख होगा․ मौज करोगी, हां, जाने के पहले मैं तुम्‍हारे लिये एक जोड़ी कपड़े भिजवा दूंगी․ परसों ही चले चलेंगे․ शुभ काम में देरी नहीं․'' उनकी बातों से लग रहा था, वह बहुत जल्‍दी में है․ किसी को सोचने समझने का मौका नहीं दे रही थीं․ सब कुछ जैसे पहले से तय करके आयी थीं․

शीलू ने एक बार मां की तरफ देखा․ मां नोटों की गड्‌डी को देख रही थी․ उसकी आंखों में कुछ ऐसे भाव थे, जैसे बेटी को बेच रही थी․ शीलू इस तरह सहमी खड़ी थी जैसे कबूतरी ने बाज को देख लिया था․ वह किसी कोने में दुबकना तो चाहती थी, परंतु बाज से बचने का कोई उपाय उसे नजर नहीं आ रहा था․ सबके मन में अलग-अलग विचार थे, परंतु उन विचारों पर वक्‍त की काली छाया पड़ी हुई थी और वह कुछ देखने-समझने में असमर्थ थे․ किसी भी घटना को चाहकर भी वह रोक नहीं सकते थे, क्‍योंकि वह तो निमित्त्‍ा मात्र थे․ साधने वाला कोई और था․

सहुआइन की मीठी-मीठी बातों और दस हजार की गड्डी ने सारी अच्‍छी-बुरी बातों पर मोटा पर्दा डाल दिया था․

सहुआइन के जाने के बाद गीता ने पति से पूछा, तो वह तपाक से बोला, ‘‘मैंने भी रात भर इस बात पर विचार किया है․ घर में पांच प्राणी हैं․ हम दो कमाने वाले․ बेटी भी कमाने लगेगी, तो घर की हालत सुधर जाएगी․ छोटी बेटी और बेटे को स्‍कूल में डाल देंगे․''

‘‘परंतु सहुआइन दीदी के बारे में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं, कहीं शीलू को दिल्‍ली ले जाकर बेच न दें?'' गीता के मन में शंका के पैर काफी दूर तक फैले हुए थे․

रामजियावन सहम गया, फिर जी कड़ा करके बोला, ‘‘वैसे तो सहुआइन गांव की इज्‍जतदार औरत हैं․ इतना बड़ा अपराध नहीं करेंगी․ वरना जब गांव लौटकर आयेंगी तो क्‍या जवाब देंगी हमें?'' उसने पत्‍नी को समझाना चाहा․

‘‘हम क्‍या जवाब लेंगे उससे? अगर बेटी को बेच भी देंगी तो हम उनका क्‍या बिगाड़ लेंगे? क्‍या थाना-कचहरी करेंगे? कोई हमारी सुनेगा? नहीं․․․ वह रुपये-पैसे वाली हैं․ पैसे से सबका मुंह बंदकर देंगी․''

‘‘बेटी के भाग्‍य में क्‍या है, यह तो कोई नहीं जानता, परंतु सोचो, उसको दिल्‍ली भेजने से कितना पैसा हमें मिल रहा है? आगे भी मिलेगा․ फिर आगा-पीछा छोड़ो․ सोचने से हमारा भला नहीं होने वाला․ मैं तो समझता हूं, शीलू हमारे लिए लक्ष्‍मी बनकर आई है, वरना गरीब की बेटी अपने मां-बाप को दुःख, लांछन और कर्ज के सिवा क्‍या देती है? सोचो, बड़ी बेटी ने हमें क्‍या दिया?''

रामजियावन की बातों में दम था․ गीता ने भी अपने जीवन में इतने दुःख सहे थे कि उसने भाग्‍य के भरोसे सब कुछ छोड़ दिया․ घर आई लक्ष्‍मी को कौन लात मारता है? जो मारते हैं, वे सदा गरीबी और कर्ज के सागर में डूबे रहते हैं․ अंततः सब कुछ भाग्‍य के भरोसे छोड़कर राजजियावन और गीता ने वहीं करने का निर्णय लिया, जो नियति उनसे करवा रही थी․

वह लोग समय से काफी पहले स्‍टेशन पहुंच गये थे․ गीता भी साथ में आई थी उन्‍हें स्‍टेशन छोड़ने․ सहुआइन ने मना किया था, परंतु उसका दिल न माना․ बेटी इतनी दूर पहली बार घर से बाहर जा रही थी․ पता नहीं कब मुलाकात हो? उसका दिल बैठा जा रहा था․ इसीलिए स्‍टेशन तक आ गयी थी․

गाड़ी आने में अभी आधा घंटा था․ सहुआइन खुश थीं․ गीता का दिल दहल रहा था․ शीलू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसके जीवन में क्‍या होने वाला था․ वह नए कपड़ों में काफी सुन्‍दर दिख रही थी, परन्‍तु नए कपड़े पहनकर भी वह खुश नहीं दिख रही थी․ उसके विचार उसे पीछे गांव की तरफ खींच रहे थे और वह मां से कहना चाह रही थी, ‘अम्‍मा मुझे अपने से दूर क्‍यों कर रही हो? मैं तुम्‍हारे बिना वहां कैसे रहूंगी?' परन्‍तु उसकी जुबान तालू से चिपक कर रह गयी थी․

जैसे-जैसे समय आगे सरक रहा था, गीता को लग रहा था, कहीं कुछ गलत तो नहीं कर रही थी․ बेटी को कुएं में तो नहीं धकेल रही थी? सोच-सोचकर उसका दिल छोटा होता जा रहा था, परंतु इसके साथ ही गांव का एक अलग चित्र भी उसकी आंखों के आगे उभरने लगता था․ लम्‍पट और निठल्‍ले लोग उसकी बेटी को घेरे हुए हैं․ सब उसके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं․ उसे लुभा और बरगला रहे हैं, उसके शरीर को नोच रहे हैं, खेत के भीतर ले जाकर उसकी इज्‍जत लूट रहे हैं․ यह दृश्‍य मन में आते ही उसको थोड़ी सान्‍त्‍वना मिली कि कुछ भी हो, शहर में उसकी बेटी के साथ कोई जबरदस्‍ती तो नहीं करेगा․

मन को ऐसी सान्‍त्‍वना देने के बावजूद भी उसे लग रहा था कि वह अपनी बेटी से सदा के लिए बिछड़ने जा रही थी․ उसकी बेटी के भविष्‍य में क्‍या है, वह नहीं जानती थी․ सहुआइन दीदी ने जो बताया था, वह पूरा सच नहीं हो सकता था․ अगर सच हो तो कितनी अच्‍छी बात है․ वह अपने मन को समझाने की कोशिश करती कि सहुआइन दीदी सचमुच उसकी बेटी को किसी अच्‍छे घर में काम करने के लिए ले जा रही हों․ दिल्‍ली में वह ढेर सारे पैसे कमायेगी और एक दिन जब वह ढेर सारे पैसे लेकर गांव आयेगी, तो धूमधाम से उसकी शादी कर देगी․

वह अपने मन को तसल्‍ली देती और सोचती कि यह तसल्‍ली झूठी न हो․

प्‍लेटफार्म पर भीड़ बढ़ गई थी, गाड़ी बस आने ही वाली थी․ चारों तरफ चीख-चिल्‍लाहट और शोर-शराबा था․ जैसे ही ‘‘गाड़ी आ रही है'' का शोर तेज हुआ, गीता ने बेटी को अपने सीने से लगा लिया और रोती हुई बोली, ‘‘बेटी चिंता न करना, दीदी को बोलूंगी कि तुमको जल्‍दी लेकर गांव आ जाएं․ वहां ठीक से रहना और अपने काम से काम रखना, इधर-उधर घूमना मत, जमाना बहुत खराब है․'' और फिर वह तेजी से रोने लग गई․ शब्‍द जैसे चुक गये थे․ बेटी को विदा करते समय माताएं केवल रोती हैं, वह कुछ कह नहीं पाती․ यही स्‍थिति उस समय गीता की थी․

सहुआइन ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं साल-छः महीने में उसे लेकर गांव आती रहूंगी․''

शीलू अपनी मां के सीने से लगकर बोली, ‘‘मां मुन्ने का ख्‍याल रखना, उसे खुला मत छोड़ना, वरना बिल्‍ली उसे खा जायेगी․ अगली बार जब मैं गांव आऊंगी तब वह बड़ा हो चुका होगा और क्‍या वह मुझे पहचान पायेगा?'' उसके मुंह से सिसकी फूट पड़ी․

गीता ने इसी साल एक बकरी पाली थी․ उसने दस दिन पहले ही एक बच्‍चा जन्‍मा था, उसी बच्‍चे को शीलू मुन्ना कहती थी․ उसे इतना प्‍यार करती कि हर वक्‍त अपनी गोदी में लिये घूमती फिरती थी․ रात को भी अपने बिस्‍तर पर सुलाती․ कहीं बाहर जाती तो उसे झौवे के अन्‍दर छिपाकर उसके ऊपर दरेती का पत्‍थर रख देती, जिससे कोई कुत्ता या बिल्‍ली उसे पकड़ न सके․

शीलू की बात सुनकर उसकी मां बोली, ‘‘हां बेटी, हां, मैं उसका ख्‍याल रखूंगी, तुम अपना ख्‍याल रखना, रोना मत!'' और तभी धड़धड़ाती हुई ट्रेन प्‍लेटफार्म पर आ रुकी․ लोग इधर-उधर भागने लगे․ सहुआइन ने अपना झोला उठाया और शीलू को पकड़कर खींचते हुए बोलीं, ‘‘चलो, चलो, जल्‍दी करो, डिब्‍बा पीछे है․'' और वह उसे खींचते हुए पीछे की तरफ भागीं․ उन्‍हें पता था कि जनरल डिब्‍बा किस तरफ लगता था․ गीता भी उनके पीछे लपकी․ उसे लगा जैसे उसकी बेटी को कोई उससे छीने ले जा रहा था․

उसने ध्‍यान से देखा तो पीछे से सहुआइन उसे डायन जैसी लगीं․ वह उसकी बेटी को उससे छीनकर भगाए ले जा रही थीं․ उसने अपने कदमों को तेज किया कि डायन के हाथों से अपनी बेटी को छुड़ा ले, परंतु सहुआइन रूपी डायन के कदम सधे हुए थे और तेज गति से आगे की तरफ बढ़ रहे थे․ गीता को प्‍लेटफार्म पर दौड़ने का अभ्‍यास नहीं था․ वह बार-बार लोगों से टकरा जाती और रुककर अपनी बेटी की तरफ देखने लगती․ भीड़ में उसकी आंखें भटक जातीं․ जब तक उसे डायन नजर आती, तब तक वह उसकी बेटी को लेकर काफी आगे निकल चुकी होती․

पलक झपकते ही सहुआइन शीलू का हाथ पकड़े डिब्‍बे में चढ़ गईं․ गीता जब तक डिब्‍बे के पास पहुंची, तब तक सहुआइन और शीलू डिब्‍बे के अन्‍दर प्रवेश कर चुकी थी․ चढ़ने वाले लोगों ने उन दोनों को और ज्‍यादा अन्‍दर कर दिया था․ उसने बहुत कोशिश की, परंतु डिब्‍बे के अन्‍दर शीलू उसे कहीं दिखाई नहीं दी․ भीड़ बहुत ज्‍यादा थी और भीड़ के कारण डिब्‍बे के अन्‍दर उन दोनों को देखना गीता के लिए संभव नहीं था․ वह धम्‍म से जमीन पर बैठ गई․ उसे लगा, डायन उसकी बेटी को जिन्‍दा निगल गयी थी․

रेलगाड़ी ने जोर से सीटी दी और धीरे-धीरे पटरी पर सरकने लगी․ धीरे-धीरे गाड़ी की गति में तेजी आती गई और उसी तेजी से गाड़ी के पहियों के चलने की आवाजें भी ऊंची होती जा रही थीं․ गीता की सूनी आंखों के सामने रेलगाड़ी के पहिए धड़धड़ाते हुए आगे बढ़ते गये․ उसे लगा जैसे ये रेल के पहिए पटरी पर नहीं उसके सीने पर चल रहे थे․

वह संज्ञाशून्‍य होकर प्‍लेटफार्म पर लेट गई․

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(राकेश भ्रमर)

7, श्री होम्‍स, कंचन विहार,

बचपन स्‍कूल के पास, विजय नगर,

जबलपुर-482002 (म․प्र)

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(चित्र - नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की मुखौटा कलाकृति)

नमन दत्त संगीत का जीवन में महत्व

मानव सभ्यता के विकास के साथ ही साथ ललित कलाओं के अस्तित्व की अवधारणा भी समानान्तर रूप से पुष्ट होती गई। आदिकालीन मानव ने जब जीवन में एक सुव्यवस्था की आवश्यकता महसूस करना शुरू की, तभी से सम्भवतः ललित कलाओं संबंधी मंतव्यों की परिकल्पना भी उसके अन्तस् के किसी कोने में एक सूक्ष्म अपुष्ट रूप में अवश्य जन्मी होगी, ऐसा मेरा मानना है। ललित कलाओं का विकास क्रमशः मानवीय सभ्यता के विकास के सापेक्ष हुआ। पाँचों ललित कलाएँ – चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, काव्यकला और संगीत मानव जीवन से उसके विकासक्रम में ही गहरे अन्तर्सम्बन्ध के साथ प्रौढ़ होती हुई पुष्टि प्राप्त करती दिखती हैं, इसके अनेक प्रमाण इतिहास में उपलब्ध हैं।

समाज में ललित कलाओं की जड़ें बेहद गहरे तक समाई हुई हैं। दरअसल मानव स्वभाव को कलाओं से निरपेक्ष कर पाना लगभग असम्भव ही है, यह एक निर्विवाद सत्य है। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि समस्त कलाएँ मानवीय भावाभिव्यक्ति की परिकल्पना का एक तरह से प्रत्यक्ष प्रदर्शनात्मक स्वरूप माना जा सकता है। अतएव कलाओं में सदैव मनुष्य के अंतर्मन की दमित वासनाओं, इच्छाओं और काल्पनिक अभिलाषाओं का ही प्रस्फुटन हमारे सामने बार-बार कला प्रदर्शन के रूप में प्रकट होता आया है। इन पाँचों ललित कलाओं में संगीत को छोड़कर शेष चारों कलाएँ ऐसी हैं, जिन्हें मानव ने पृथ्वी पर आकर अपनी योग्यता, संवेदनशीलता, योजना और आवश्यकता के वशीभूत हो सिद्ध किया और उन्हें निरंतर परिपुष्ट किया, परन्तु संगीत एक ऐसी ललित कला है जो प्रकृति प्रदत्त है। संगीत एक महत्वपूर्ण ललित कला है, जो कि नैसर्गिक रूप से प्रकृति द्वारा मानव समाज को दी गई एक अप्रतिम देन है। प्रत्येक मनुष्य में संगीत के तीनों घटक तत्व – स्वर, लय और नृत्त नैसर्गिक रूप से विद्यमान रहते हैं।

अतः मेरा मानना है कि संगीत कला की सिद्धि हेतु मनुष्य को अपने भीतर प्राकृतिक रूप से संस्कारित इन तीनों मूल अवयवों को ही परिष्कृत करते हुए इनका बाह्य जगत में विद्यमान संगीत कला से सामंजस्य स्थापित करना होता है। और जो भी मनुष्य इसमें जितनी सक्षमता, जितनी स्पष्टता से इसे कार्य रूप में परिणित करने में सफल होता है, वह कला के क्षेत्र में उतना ही सिद्धहस्त कलाकार बनकर उभरता है। यह कला मनुष्य को पृथ्वी पर उसके आगमन के साथ ही, या कहें कि जन्मपूर्व से ही मिली हुई होती है। परन्तु मनुष्य उसका आभास सहजता से नहीं कर पाता। फलस्वरूप वह इसके तकनीकी तत्वों को बाह्य जगत में खोजता हुआ उन्हें पाने के प्रयासों में भटकता रहता है।

प्रकृति ने मुक्तहस्त से और समभाव के साथ हर मनुष्य के अन्तस् में इन प्रमुख तीनों सांगीतिक तत्वों का संचार किया है। परन्तु मानसिक क्षुद्रता के कारण अनेक बार हम इसका आभास नहीं कर पाते और अपने आस-पास इन्हें प्रत्यक्ष स्वरूप में खोजते रहते हैं। फलस्वरूप हमारी आन्तरिक संगीत संवेदना का बाह्य सांगीतिक तत्वों से सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता। और यही असंतुलन इस कला में विकार उत्पन्न करने लगता है। आइये हम इन तीनों तत्वों पर सूक्ष्मता से दृष्टिपात करें। लय तत्व हमारे ह्रदय की धड़कन में, हमारी नब्ज़ की गति में, हमारे पलक झपकाने में, हमारी श्वांस-प्रश्वांस की गति आदि सभी में सहज रूप में उपस्थित है। यहाँ तक कि हमारे बोलने-चालने, चलने-फिरने आदि हर क्रिया-प्रतिक्रिया में भी एक संतुलित गति का विद्यमान होना हमारे जीवन में निहित लय तत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, परन्तु शायद हम इसका एहसास सहज तौर पर नहीं कर पाते। और इसी दुविधा के वशीभूत अनेक लोग बाह्य जगत में लय तत्व को खोजने, उसका अभ्यास करने और प्रकट माध्यमों से उसे समझने-साधने में लगे रहते हैं। जबकि वह तो उनके अंदर उनके धरती पर आने के साथ ही आ गई होती है। अतः आवश्यकता बहिर्लय एवं अन्तर्लय में सामंजस्य स्थापित करने की है।

इसी तरह संगीत का एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व है – स्वर। इसका प्रमाण हमें वाक्स्फुटन से ही मिलना प्रारम्भ हो जाता है, मगर जनसामान्य इसका भी आभास सहजता से नहीं कर पाता। हमारे वार्तालाप में जो स्वरों के उतार-चढ़ाव, खींच-तान और विविध अनुप्रयोग प्रगट होते हैं, वे स्वर तत्व की हमारे भीतर उपस्थिति को सहज दर्शाते हैं। हमारे बातचीत करने के दौरान हम कभी भी एक स्वर में अपनी बात नहीं कहते। कभी हम स्वर को ऊँचा करते हैं, कभी नीचा करते हैं, कभी हम किसी स्वर को ज़ोर का आघात करते हुए उच्चारित करते हैं, तो कभी हम किसी जगह अत्यंत हल्का बनाकर अपने शब्द कह देते हैं। ये सभी प्रयोग क्या हैं ? दरअसल ये भी किसी गीत की स्वर रचना की ही भांति स्वर सम्पादन की प्रक्रिया ही तो है। बस इसके साथ किसी संगीत की अवधारणा ही नहीं जुड़ी होती है, वरना ये सारे प्रयोग किसी संगीत निर्मिति और निष्पादन से भिन्न नहीं हैं। यदि किसी मशीन के द्वारा हम किसी मनुष्य के वार्तालाप का स्वरग्राफ़ बनाएँ तो हम पायेंगे कि वह किसी गीत के आलापों के स्वरग्राफ़ से अलग नहीं होगा। यह बात हमारे अन्दर प्रकृति द्वारा दिए गये स्वर तत्व को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है।

इसी प्रकार भावाभिव्यक्ति के लिये किये जाने वाले अंग-उपांगों के संचालन क्या नृत्त तत्व का मूल नहीं हैं ? हम कभी भी अपने वार्तालाप के दौरान भावहीन होकर अपनी बात नहीं कहते। अपने वक्तव्य सम्प्रेषण के दौरान हम विभिन्न मुखाकृतियों के द्वारा, हाथ-पैर आदि अंगों के संचालन द्वारा और कभी-कभी तो पूरे शरीर के ही मुद्राप्रदर्शन और गति संचालन द्वारा अपनी बात के मर्म को श्रोता तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, क्या ये भाव-भंगिमाएं किसी नृत्य प्रस्तुति के साथ प्रस्तुत होने वाले भाव प्रदर्शन के समान ही प्रतीत नहीं होती हैं ? हमें मानना ही होगा कि ये सभी भाव-मुद्राएँ किसी नृत्य प्रस्तुति से अलग नहीं हैं, मगर इनके प्रति हमारा दृष्टिकोण विवेचनात्मक न होने के कारण हम इनके गूढ़ सन्दर्भों का तादात्म्य अन्य चिंतनीय-माननीय तत्वों से नहीं कर पाते। हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि अवश्य ये सभी सांगीतिक घटक हमारे भीतर ही हैं, परन्तु हम नासमझी में इनकी ओर ध्यान ही नहीं देते। इस विवेचन के आधार पर हमें यह मानना ही होगा कि प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक रूप से एक जन्मजात संगीतकार होता है, बस वह इन बातों का एहसास नहीं कर पाता। यदि हम इन सूक्ष्म तत्वों पर मनन करें तो संगीत कला को समझने और सीखने में ये हमें काफ़ी मददगार ही साबित होंगे, और हमारे जीवन को सांगीतिक रूप से परिष्कृत करने में सहायक सिद्ध होंगे।

संगीत कला को हम यदि केवल एक कला ही ना मानकर उसे एक जीवनशैली का आधार बनाने की दिशा में विचार करें तो हम पायेंगे कि इस कला में और इससे जुड़े तथ्यों में बहुत कुछ ऐसा है जो सामजिक और व्यक्तिगत जीवन दर्शन को एक दिशा देने के लिये बहुपयोगी है। अगर हम आध्यात्मिक आंकलन के आधार पर देखें तो हमें मानना होगा कि हर धर्म में - चाहे वह हिंदुओं के भजन कीर्तन हों, मुस्लिमों की अज़ान, नात, मनक़बत, सलाम आदि हों, सिक्खों का शबद-कीर्तन और गुरबानी का पाठ हो अथवा ईसाईयों द्वारा चर्च में गाये जाने वाले कोरल हों, इन सभी में संगीत कला को जोड़ने के पीछे अवश्य ही इस कला की कुछ विशिष्टताएँ रही होंगी, वरना इसकी आवश्यकता क्या थी ? कहने का तात्पर्य यह कि नाद्ब्रम्होपासना को, उसकी महत्ता को, उसके गुणों को लगभग हर धर्म में आदरपूर्ण स्थान मिला है। परन्तु मनुष्य फिर भी इस ओर सजग नहीं दिखाई पड़ता। वह सतही तौर पर संगीत को केवल एक मनोरंजन की ही वस्तु समझता रहा है। केवल इतना ही नहीं संगीत के साधक-समाज और सांगीतिक तकनीकी तत्वों पर यदि सकारात्मक चिंतन-मनन किया जावे, तो हम पायेंगे कि इसमें बहुत कुछ ऐसा ग्रहण करने योग्य है, जो मनु समाज को सन्मार्ग पर अभिप्रेरित करने हेतु दिशानिर्देशक का कार्य कर सकता है।

संगीत के साधक समाज में जाति-धर्म, ऊँच-नीच, आदि भावनाओं के लिये कोई स्थान नहीं होता। गुरु चाहे किसी भी जाति या धर्म का हो वह सदैव पूज्यनीय होता है। गुरु की अमीरी-ग़रीबी भी उसके महत्व की राह में बाधक नहीं होती। इसीलिये मुस्लिम गुरुओं के हिंदू शिष्य भी उनकी ईश्वरतुल्य आराधना करते हैं। और इसके उलट हिन्दू गुरुओं के मुस्लिम शिष्य भी उन्हें आराध्य की भांति पूजते हैं। यह हमारे उस मानव समाज के लिये मिसाल हो सकती है जो कि निरर्थक धर्म-सम्प्रदाय के तुच्छ झगड़ों में उलझकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ कर रहा है, जबकि इन सब से परे हटकर जीवन का सदुपयोग बहुत कुछ सकारात्मक करने में किया जा सकता है। जो शायद सारे समाज के लिये और आगामी पीढ़ियों के लिये भी हितकारी ही सिद्ध होगा। इसी तरह संगीत के पुजारी किसी भी धर्म की सीमा में बंधकर नहीं रहते, वरन् वे इन सभी से ऊपर उठकर नादब्रम्ह की उपासना करते हैं। इसीलिये मोहम्मद रफ़ी साहब और अहमद-मोहम्मद हुसैन के भजनों में हर हिंदू एक आत्मिक सुख पाता है, और ठीक इसी तरह शंकर-शम्भू क़व्वाल के नातिया क़लामों में भी हर मुस्लिम अपने पीर के दर्शन करता है। ये बातें गम्भीरतापूर्वक चिंतन योग्य हैं।

हम संगीत को उसके प्रायोगिक स्वरूप के कारण अधिक पहचानते हैं। सामान्य अवस्था में हम लोग गाने-बजाने को संगीत मानते हैं और तकनीकी पक्ष से यह उचित भी है। परंतु इस प्रायोगिक विद्या के पीछे छिपे गहन दर्शन की ओर मानव मात्र का ध्यान शीघ्र नहीं जा पाता जबकि आज के इस अराजकता भरे संक्रमण काल में इसके गंभीर दर्शन को समझकर उसे अपनाने की नितान्त आवश्यकता प्रतीत होती है। संगीत के घटक तत्व भी हमें अपने दर्शन अपनाकर एक आदर्श जीवनयापन के लिये इंगित करते हैं। बस आवश्यकता उन्हें समझकर उनके गहन दर्शन को अपने जीवन में उतारने की है। यदि हम मानवीय जीवनदर्शन और संगीतदर्शन की तुलनात्मक विवेचना करें तो हमें अपने जीवन के अनेक विषाद भरे प्रश्नों का सरलतम् हल सहज ही प्राप्त हो सकता है। आवश्यकता केवल दृष्टिकोण की सूक्ष्मता की है। आइये हम इस ओर कुछ दृष्टिपात करें। सर्वप्रथम संगीत का शाब्दिक अर्थ ही अतिमहत्वपूर्ण है। संगीत का अर्थ है - सम्यक गीत। अर्थात् ऐसा गीत जो अन्य के साथ-सहयोग के साथ हो। यदि व्यापक रूप से देखें तो हम पायेंगे जिस प्रकार संगीत में गान, वाद्य और नृत् की त्रिवेणी के परस्पर मिलन के द्वारा ही एक सुफलदायी रागरंजना संभव हो पाती है, ठीक उसी प्रकार हमारे जीवन में भी सर्वांग संतुलन से ही जीवन का आनंददायी रसपान संभाव्य है। जीवन के सामाजिक, पारिवारिक, व्यवहारिक, सांस्कृतिक आदि अनेक पक्षों के बीच असंतुलन हमारे जीवन में नकारात्मक संचार के साथ क्लेश उत्पन्न करते हैं। अतः यदि संगीत की भांति इस दर्शन को हम अपने जीवन में उतार पाने में संभव हो पाते हैं तो जीवन का मधुर रसपान कोई दुष्कर कार्य नहीं है। संगीत में राग का अर्थ रंजकता से लिया जाता है, ठीक इसी प्रकार हमारे जीवन में भी राग को इन्हीं अनुभूतियों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। सामान्य सांसारिक जीवन को सकारात्मक ढंग से यापन करने हेतु इस राग तत्व का भी एक महत्वपूर्ण स्थान अनादि काल से बताया गया है, क्योंकि संतुलित राग चेतना हमारे जीवनानन्द को परिमार्जित कर सकती है। परंतु इसके विपरीत अतिरागानुराग भी संसार की अन्य क्रियाओं में अवरोध पैदा करता है।

यहाँ हम यदि सांगीतिक रागों का चिन्तन करें तो हम पायेंगे की इनके कुछ अपने विशिष्ट नियम हैं, यथा - किसी राग में क्या स्वर प्रयुक्त होंगे ? किस परिमाण में प्रयुक्त होंगे ? राग किस समय गाया-बजाया जाएगा ? किन विशेष स्वर-संगतियों के प्रयोग होंगे और किस प्रकार किये जाऐंगे ? इत्यादि। यह सभी बातें पूर्वनियोजित होती हैं और इनके सफल अनुपालन के द्वारा ही किसी राग की सुस्पष्ट अवतारणा संभव हो पाती है, और उस राग के द्वारा उत्पन्न रस तथा आनन्द का पान सुधिजन कर पाते हैं। यदि हम इसी मन्तव्य को अपने सांसारिक जीवनदर्शन से जोड़कर देखें तो हमें इन दोनों रागों (सांगीतिक तथा सांसारिक) में बहुल साम्यता प्रतीत होगी। जिस प्रकार सांगीतिक राग अपने नियमों के बंधनों के कारण ही अवतरित होकर भावाभिव्यंजित कर पाने में सफल होता है, ठीक उसी प्रकार सांसारिक राग भी यदि नियम और मर्यादा के दायरे में हो तभी वह परमानंदित कर सकता है। नियम और मर्यादा से परे उच्छृंखल रागाभिव्यक्ति अरुचिकर और क्षोभ को जन्म देने वाली हो जाती है। अतएव संगीत का यह एक सरल सा राग दर्शन हमें अपने जीवन में राग के संयमित प्रयोगों हेतु अभिप्रेरित करता है। सूक्ष्म विचार मंथन द्वारा इस दर्शन को अपनाकर हम सुखमय जीवन लक्ष्य की ओर सहजता से अग्रसर हो सकते हैं। संगीत में एक और अतिमहत्वपूर्ण तत्व होता है, वह है लय। लय एक गति का प्रदर्शक है। संगीत का यह गतिदर्शन हमें अपने जीवन में भी निरंतरता बनाये रखने के लिये उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है। इस दुनिया में जो गतिमान है, वह जीवन्त है- यह एक सहज स्वीकार्य तथ्य है। अर्थात् हमें जीवन के सुख का भलीभाँति उपभोग करने के लिये स्वयं को क्षण-प्रतिक्षण क्रियाशील बनाए रखना नितांत आवश्यक है अन्यथा जीवन का ठहराव या अवरोध उसे विषादयुक्त बनाते हुए निरर्थक तक बना सकता है। अतः एक सार्थक सुखद जीवन के लिए लय रूपी सांगीतिक तत्व का क्रियात्मक दर्शन हमें अपने जीवन में अपनाना ही होगा।

संगीत में लय के उपरांत ताल नामक तत्व प्रकट होता है। संगीत में ताल एक विशुद्ध व्यवस्था का नाम है। सूक्ष्मावलोकन से हम पायेंगे कि इसके पीछे जो दार्शनिक चिंतन है, वह रागप्रयोगों पर अंकुश लगाने हेतु एक निश्चित व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें कसना है। राग की सांगीतिक प्रस्तुति के दौरान ताल की यह जकड़न, यह बंदिश उसे अवरूद्ध न कर उसके आनन्द को कई गुना बढ़ाने में सहायक होती है। ठीक उसी प्रकार हमारे लोक व्यवहार में जीवन राग के उपभोग में यदि हम किसी ताल रूपी (यहाँ ताल को गूढ़ार्थ में लेते हुए जीवन मर्यादा अथवा किसी एक निश्चित अनुक्रम व्यवस्था के सन्दर्भ में कथन है) अंकुश व्यवस्था को अपनाते हैं तो वह हमारे जीवन के आनन्दवर्धन में सहायक सिद्ध होगा।

अंततः मेरा मानना है कि संगीत को केवल एक मनोरंजक प्रक्रिया न मानते हुए उसके पीछे छिपे गहन गंभीर दार्शनिक मन्तव्यों पर भी विचार किया जाना चाहिये। इस गंभीर दिशाप्रदर्शक दर्शन के साथ हमें एक तर्कसंगत, सार्थक और सुखमय जीवन शैली को सरलतापूर्वक प्राप्त करने के सहज संदेश मिल सकते हैं, बशर्ते हम इनका सूक्ष्म चिंतन कर इन्हें अपनाने की दिशा में प्रयास कर सकें। इस प्रकार हम अपने जीवन को उसी प्रकार स्वयं के लिये संतुष्टिपरक तथा अन्य के लिये अनुकरणीय बना सकते हैं, जिस प्रकार सांगीतिक प्रस्तुति के दौरान एक कलाकार उपरिवर्णित नियमों, चिन्तनों तथा व्यवस्थाओं में बंधकर एक आदर्श राग प्रदर्शन के द्वारा स्वयं तो उसका आनंद पाता ही है, श्रोताओं को भी अपने मनोभावों से एकाकार कर उनके अंतस् में भी सुख और रंजकता का संचार कर उन्हें उत्प्रेरित करने में सफल होता है।

इसलिए यदि हम संगीत के विभिन्न तकनीकी तत्वों से प्रेरणा ले अपने जीवन में एक व्यवस्था का संचार करें, तो यह न केवल अपने लिये बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिये अतिलाभकारी साबित हो सकता है। और विशेष बात ये है कि संगीत और संगीत-समाज के ये सभी अमूल्य व्यवहार - कहें तो हमारे भीतर ही हैं, या कहीं हमारे आस-पास ही हैं। इसलिए इस हेतु न किसी अतिरिक्त परिश्रम की आवश्यकता है, न ही किन्हीं विशिष्ट अनुप्रयोगों की। आवश्यकता केवल अपनी मानसिकता को, अपनी सोच को बदलने की है और साथ ही सार्थक एवं सूक्ष्म चिंतन-मनन की है।

अस्तु ।।

 

आलेख प्रस्तुति :

डॉ. नमन दत्त

वरिष्ठ व्याख्याता

कंठ संगीत विभाग

इ. क. सं. वि. वि.

खैरागढ़ (छग.)

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दुनिया में जीना है तो प्‍यार कर प्‍यारे लगता है ये बात कुछ पुरानी पड़ चुकी है। अब खालिश प्‍यार से काम नहीं चलता है। विवाद बगैर जीना भी कोई जीना है लल्‍लू। पर लल्‍लू बेचारा क्‍या करे उसे तो शाम की रोटी का जुगाड़ जो करना है। खैर ये तो बेचारा लल्‍लू था पर हम कोई लल्‍लू नहीं। हमका तो कुछ जुगाड़ करना ही पड़ी। अब का करें बिना विवाद रोटी कइसे हजम करें। यानि भइया हम तो कहते हैं की दुनिया में जीना है तो विवाद कर प्‍यारे।

आप अच्‍छा काम कर रहें हैं कोई पहचान नहीं बना पाएँगें पर आपने कोई विवाद कर दिया तो समझो रातों रात आपकी ख्‍याति का परचम लहर लहर लहराने लगेगा। साधारण आदमी से सेलिब्रेटी बनने के लिए मात्र एक शानदार विवाद की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि ये मात्र ख्‍याति प्राप्‍त करने की ही विधा है विद्वानों इसके कई नये लाभ भी ढूढ़ लिए है। बाजार भी इस नायाब नुस्‍खे का प्रयोग कर अपना माल बेचने लगा है। प्रकाशक को पुस्‍तक बेस्‍ट सेलर बनानी है तो विवाद पैदा करवाना जरूरी, फिल्‍म हिट करवानी है तो विवाद करवाओ मुकदमें करवाओ, चैनलों की चिक चिक में टी.आर.पी. चकाचक करवानी है तो विवाद करवाओ। कुल मिलाकर कुछ भी करना हो विवाद करवाओ। दरअसल बाजार की व्‍यवस्‍थाओं में प्रचार के कुछ इस तरह के एन्‍टी तरीके अपनाए जाते हैं।

यानि आपने अगर बाल की खाल निकालने का गुर सीख लिया तो समझो आप में विवाद पैदा करने का गुण स्‍वतः ही विकसित हो जाएगा। इस के लिए आपको ज्‍यादा कुछ नहीं करना बस हर बात को अपने ढंग से व्‍याख्‍या कर नकरात्‍मकता का छमका लगा कर निंदा करनी है। ऐसा करके बहुत से लोग ख्‍याति की वैतरणी में तैर रहे हैं। राजनेता, समाज नेता, विद्यार्थी नेता कर्मचारी नेता और जो भी प्रकार के नेता हैं वे सब इस फार्मूले का प्रयोग कर अपनी नेतागिरी को चमका रहे हैं। साहित्‍यकारों और कलाकारों सहित समस्‍त बौद्धिक जगत में भी आजकल इस विधा का प्रयोग धड़ल्‍ले से किया जा रहा है।

अब हमारे एक कलाकार मित्र रामभरोसे को ही लीजिए। बेचारे मंच पर अभिनय किया करते थे। अच्‍छे कलाकार थे। उम्रदराज होने लगे तो रंगनिर्देशकों ने उनकी तरफ ध्‍यान देना कम कर दिया। उन्‍हें लगा कि उनकी वैल्‍यू रंगजगत में कम होने लगी है ।बस फिर क्‍या उन्‍होंने भी यही नुस्‍खा अपनाया। आप साहब ने हर नाटक की समीक्षा अखबार में ईमानदारी से करनी शुरू कर दी। शहर के स्‍वयंभू अच्‍छे नाटकों की नाटकीयता सामने आने लगी। रामभरोसे भाई का सत्‍य उद्‌घाटन करने का विवाद रंगजगत के लिए तब और अधिक दुखदायी हो गया जब उन्‍होंने नाटकों के लिए इमदाद के बारे में भी सही सही कहना शुरू कर दिया। उन्‍होंने नाटकों पर इस तरह की तीखी प्रतिक्रिया करनी शुरू क्‍या की कि सारे रंगनिर्देशक उनसे डरने लगे। अब कोई भी नाटक हो उनसे विवाद पैदा नहीं करने की मान मनोव्‍वल की जाती है। उनके विवादी तेवर से बचने के लिए उन्‍हें अब शहर के हर नाटक में बतौर अतिथि बुलाया जाता है। विवादों के कारण रंगजगत में अब जनाब की पूछ बढ़ गयी है।

हमारे एक मित्र हैं पेशे से अध्‍यापक पर काम करना उनके बस की बात विद्यालय में पूरे समय रूकना उनकी शान के खिलाफ उनका काम चल रहा था। अचानक प्रधानाध्‍यापक का तबादला हो गया। नये प्रधानाध्‍यापक कुछ सख्‍त किस्‍म के थे सो उनकी मस्‍ती बंद हो गयी। बेचारे बड़े परेशान थे आखिर उनको भी विवाद का सहारा लेना पड़ा। उन्‍होंने उनके सख्‍त अनुशासन से नाराज विद्यार्थियों को बरगलाया और विवाद खड़ा कर दिया। नतीजा बेचारे प्रधानाध्‍यापक जी अकेले पड़ गये उन्‍होंने समस्‍या की तह में जाकर पता किया तो हमारे मित्र के चरित्र का पता चल गया बेचारों को स्‍कूल चलानी थी सो उन्‍होंने भी हमारे मित्र को छूट देनी शुरू कर दी। अब हमारे मित्र को मांगी मुराद मिल गयी विवाद कर के उन्‍हें सुविधा प्राप्‍त हो गयी अब वो खुश हैं।

विवाद करना वर्तमान समय में रातों रात प्रसिद्धि पाने के अचूक हथियार के रूप में प्रयोग में आने लगा है।इस अमोघ अस्‍त्र का प्रयोग कर बहुतो ने ख्‍याति के शिखर को चूमा है। कुछ दिनों पूर्व हमारे एक साहित्‍यकार साथी ने भी इसका सफल प्रयोग किया।वे किसी भी साहित्‍यिक कार्यक्रम में जाते तो वहाँ कुछ न कुछ लीक से हटकर बोल देते। लोगों ने उन्‍हें बुलाना बंद कर दिया पर जनाब कहाँ मानने वाले थे वे बिन बुलाए ही पहुँच जाते और जबरदस्‍ती मंच पर जाकर भाषण देने लग जाते और किसी न किसी बात पर विवाद कर ही डालते। नतीजा आप साहब केा अब ससम्‍मान बुलाया जाता है शुरू में ही आपके तारीफ में कसीदे काढ दिए जाते हैं। अभी यह भी सुनने में आया है कि वे विवाद नहीं करने के एवज में अध्‍यक्ष या मुख्‍य अतिथी बनने की माँग करने लगे हैं। सुनने में यह भी आ रहा है कि जनाब तारीफ करने के लिए पत्रम पुष्‍पम की भेंट भी स्‍वीकार करने लगे हैं। यानि अब उनकी साहित्‍य जगत में तूती बोलने लगी है।

आजकल राजनीति में भी विवाद पर सभी दल निर्विवाद रूप से एकमत हैै। जनता का ध्‍यान हटाने के लिए इसका उपयोग काफी फलदायक रहा है। मंहगाइ बढ रही जनता हो हल्‍ला न करने लगे इसलिए कोई विवाद की छुरछुरी चला दो। जनता विवाद का आनंद लेने लगेगी मंहगाइ का मुद्‌दा गौण हो जाएगा। सुना है आजकल राजनैतिक दलों ने बकायदा आदमी रख लिए हैं जिनका काम विवाद ढूंढना है।

अब ही हाल ही में हमारे एक मित्र को कहीं जाना था गाड़ी लेट थी सो वे न्‍यूजस्‍टेण्‍ड पर समय बिताने के उद्‌देश्‍य से पहुँच कर किताबे टटोलने लगे तो वहाँ एक किताब देखी जिसका शीर्षक था ‘विवाद करने केे 101 तरीके'। अब भैया विवाद तो विवाद है भला उसके भी तरीके। उनसे रहा न गया उन्‍होंने न्‍यूजस्‍टेण्‍ड वाले से इस किताब के बारे में पूछा तो उसने बताया कि आजकल यही किताब सबसे ज्‍यादा बिक रही है। उनका दिल बैठ गया। उन्‍होंन पास में पड़े कहानी संग्रह को देखा उस पर धुल की एक इंच मोटी परत चढ़ी थी। उन्‍होंने तुरंत अपना कहानी संग्रह निकालने का विचार त्‍याग दिया और निर्णय लिया की इस किताब को खरीदा जाय। किताब को क्‍या पढ़ा उनके ज्ञान चक्षु खुल गए। उनकी बुद्धि में यह बात आयी कि इस विषय पर तो डिप्‍लोमा और डिग्री कोर्स खोले जाने चाहिए। फिलहाल जब तक ये डिप्‍लोमा और डिग्री कोर्स विश्‍वविद्यालयों में खुलें तब तक वे ही क्‍यों न चांदी कूट लें। तो भैया अब वे विवाद करना सिखाने के लिए कोचिंग खोलने जा रहे हैं। आप सभी गुणी जनों से उन्‍हें सहयोग की उम्‍मीद है। उन्‍होंने हमारे दिमाग में यह बात फिट कर दी है कि विवाद करने में फायदे ही फायदे हैं।

अब हम भी इस बारे में सीरियस हैं। हम भी इस विषय का अध्‍ययन कर रहें हैं। अध्‍ययन से ज्ञात हुआ कि विवाद के विषय विद्वानों के दो मत हैं कुछ इसे कला तो कुछ विज्ञान मानते हैं। एक दिन विवाद विषय पर चल रही संगोष्‍ठी में हमने कह दिया कि ‘न तो यह कला है और न ही विज्ञान ये तो व्‍यक्‍ति के दिमागी फितूर है और यह एक मानसिक बीमारी है जिस का समय पर इलाज करवाया जाना चाहिए' हमारे इतना बोलते ही विवादप्रिय लोगों ने हो हल्‍ला मचा दिया। दूसरे दिन अखबारों में हमारे वक्‍तव्‍य की हेडलाइन बन गयी। कुछ ने हमें सच कहने का साहस करने पर बधाई दी पर इस कारण कुछ विवादप्रिय मित्रों की नाराजगी झेलनी पड़ी। हमने पाया कि कुल मिलाकर हम फायदे में ही हैं। इस विवाद ने शहर में हमारी इज्‍जत बढायी है।

हमने इस विषय पर अपने गहन अध्‍ययन से पता लगाया कि कई वाद अभी भी निर्विवाद हैं जैसे जातिवाद निर्विवाद, वंशवाद निर्विवाद, क्षेत्रीयवाद निर्विवाद, भाई-भतीजावाद निर्विवाद। सो हमारी समझदानी में यह बात आ गयी कि इन खतरनाक वादों से बचने का एकमात्र उपाय विवाद करना ही है। हमने तो इस उक्‍ति 'दुनिया में जीना है तो विवाद कर प्‍यारे' को मंत्र की तरह जीवन में उतार लिया है। विवाद कर के अब हम हिट हैं, जो हिट है वो ही फिट है हमारी तंदुरस्‍ती का राज भी यही है।

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सम्पर्क:

राधास्‍वामी सत्‍संग भवन के सामने

गली नं.-2,

अम्‍बेडकर कॉलौनी

पुरानी शिवबाड़ी रोड

बीकानेर 334003

मोबाइल-9414031050

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(चित्र - नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की मुखौटा कलाकृति)

सगाई कहानी पारुल भार्गव

सगाई

पारुल भार्गव

शाम के 4 बज चुके थे मैं अपने कमरे में बैठी टी.वी. देख रही थी तभी मेरी जेठानी मेरे कमरे में आई और मुझे टी.वी. के सामने पाकर तुनक कर बोल पड़ी- क्‍या रिया तुम अभी तक तैयार नही हुई, तुम्‍हें पता है न हमें रमा की सगाई के लिए जाना है, मैंने घड़ी की तरफ देखते हुए कहां क्‍या भाभी अभी तो सिर्फ 4 बजे है अभी से क्‍या तैयार होना, तभी भाभी बोली तुम्‍हें पता है रमा का रिश्‍ता बहुत उंचे घराने में तय हुआ है सब ‘हाई-प्रोफाइल' वाले लोग है। मैंने अलसाते हुए कहा- ‘तो क्‍या हुआ'। मेरा असाधारण - सा रवैया देख वे एक बार फिर मुझमें जोश भरने के लिए बोल पड़ी - सुना है एक-से-एक लोगों का आना होगा, बुआ जी के तो आज तेवर ही नहीं मिलेंगे, हमें भी अच्‍छे से बन-ठन के जाना होगा। मैंने कहां - हां तो चलेंगे न, हम क्‍या किन्‍हीं रहिशों से कम है ! मेरे यह सुनते ही वे अपने आपको हाई-फाई महसूस करने लगी और जल्‍दी तैयार होने का बोलकर अपने कमरे में चली गई।

मैं थोड़ी देर और टी.वी. के सामने पड़ी रही, फिर जाने के लिए तैयार होने लगी, तैयार होने के बाद कुछ पल के लिए मैं आइने के सामने बैठ कर अपने आप को देखती रही और सोचने लगी कि आज रमा कितनी खुश होगी, इस दिन का इंतजार हर लड़की और उसके परिवार को रहता है, आज बुआजी भी कितनी खुश होंगी कि आज उनकी बेटी का रिश्‍ता उनसे भी उंचे खानदान में और उनकी मर्जी से तय हुआ है आज रिश्‍तेदारों और समाज के सामने बुआजी अपने आपको किसी सिंहासन पर बैठी महारानी से कम महसूस नहीं करेंगी। यह सब सोचने में मैं इतनी खो गई कि मुझे होश ही नहीं रहा कि मेरे मोबाईल की रिंगटोन से पूरा घर गूंज रहा था जैसे ही मेरा ध्‍यान मोबाईल पर गया उसमें अरमान के नाम का मिसड्‌ कॉल अंकित हो रहा था मैंने फोन हाथ में लिया तो वह पुनः बज उठा, मेरे हैलो कहते ही अरमान बोलने लगे ‘रिया तुम अभी तक तैयार नहीं हुई जल्‍दी करो यहां कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला है तुम्‍हारा और भाभी का सब इंतजार कर रहे है जल्‍दी आ जाओ। मैंने कहां - हां बस हम आ ही रहे है, मेरे ये कहते ही वे बोले- जल्‍दी आ जाओ और हां वो, वो गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर आना जो मैं पिछले ही महीने अपनी शादी की सालगिराह पर लेकर आया था, यह सुनते ही मुझे हंसी आ गयी और मैंने कहां - इतनी जल्‍दी - जल्‍दी में भी तुम्‍हें यह कहना याद रहा, मेरे ये कहने पर वे बोले- ‘अरे उसमें क्‍या हैं तुम्‍हारा ख्‍याल तो मुझे हर पल रहता है , फिर मैंने कहां- जिस तरह तुम्‍हें मेरा ख्‍याल रहता है उसी तरह मुझे भी हर पल तुम्‍हारी पंसद का ही ख्‍याल रहता है और मैंने पहले से ही वही साड़ी पहनी हुई है, ये सुनते ही हम दोनों हंस पड़े।

इतने में भाभी भी तैयार होकर आ गई और मुझे देखकर बोली ‘क्‍या बात है रिया तुम तो आज इतनी सुंदर लग रही हो कि वहां देवर जी का तुम्‍हें देखकर किसी और काम में दिल ही नहीं लगेगा- मैंने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपाते हुए कहा- क्‍या भाभी आप भी न कोई मौका नहीं छोड़ती और हम दोनों ही उस लम्‍हें का मजा लेते हुए रमा की सगाई के लिए निकल गये, घर के ब़ाकी लोग पहले ही समारोह की तैयारियों में हांथ बंटाने के लिए चले गये थे।

वहां पहुंचते ही वहां की चमक-दमक देखकर भाभी इस तरह खुश हो रही थी मानो उन्‍हीं की सगाई का आयोजन किया गया हो। सभी रिश्‍तेदारों का अभिनंदन कर हम एक जगह जाकर बैठ गये, सारी तैयारियां हो चुकी थी और सब कार्यक्रम प्रारंभ होने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन मेरी नजरे तो अरमान को ढूंढ़ रही थी, इतना वक्‍त गुजर जाने के बाद भी जब मैं शादी से पहले किसी भी रास्‍ते से होकर गुजरा करती थी तब भी मेरी नजरों को हरतरफ अरमान का ही इंतजार रहता था और आज भी उस इंतजार में कोई कमी न थी। तभी सगाई का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया लेकिन जब तक अरमान मुझे देखकर मेरी तारीफ न कर दें तब तक मेरा मन कहां लगने वाला था। सब कार्यक्रम को देखने में मग्‍न थे, मैं भी रमा को देखकर अपना समय याद कर रही थी कि तभी अरमान एकदम से सामने आकर भाभी से बोले- भाभी रिया को देखकर ऐसी इच्‍छा हो रही है कि एक बार फिर शादी कर लूं। यह सुनते ही मुझे राहत महसूस हुई और मैंने कहां- कहां थे तुम इतनी देर से मैं तुम्‍हें ही देख रही थी। अरमान बोले ‘और मैं तुम्‍हें ही देख रहा था कि तुम्‍हारी नजरें मुझे किस तरह हर तरफ ढुढ़ रही है।

देखते ही देखते सगाई का कार्यक्रम समाप्‍ति की ओर बढ़ने लगा, पूरे कार्यक्रम के दौरान जहां सब लोग वहां कि चकाचौंध और भव्‍यता में खोए हुए थे वही दूसरी तरफ रमा का दिल खुश नहीं लग रहा था, उसके चेहरे पर वो खुशी और आंखो में वो चमक दिख ही नहीं रही थी जो हर लड़की के चेहरे पर इस दिन होती है। वो चुपचाप-सी अपनी नजरें नीची किए खड़ी हुई थी। वहां एकत्रित लोग बारी-बारी से अपनी तस्‍वीरें निकलवा रहे थे। मैं और अरमान भी तस्‍वीर निकलवाने गये तभी मैंने रमा को अपने गले से लगा लिया उसने दो पल के लिए मेरी आंखो में देखा जैसे कि मुझसे कुछ कहना चाह रही हो, मैंने भी उसकी आंखों की नमी को पढ़ लिया था लेकिन वक्‍त और माहौल देख न वो कुछ मुझसे कह पायी और न ही मैं।

पता नहीं क्‍यूं जब से मैंने रमा की आंखो की नमी को महसूस किया था मेरे मन में बैचेनी-सी होने लगी थी और उस बैचेनी को दबाए मैं घर वापस आ गयी, घर आकर जहां सब कार्यक्रम की व्‍यवस्‍था, लड़के वालों के रुतबे आदि बातों में मशगुल थे वही मेरे सामने रमा का वो चेहरा था जिस पर इन सब चीजों के होने के बाद भी खुशी नहीं थीं। मैं वहां से उठकर अपने कमरे में चली गयी, तभी अरमान भी आ गये और कार्यक्रम की ही बाते करने लगे लेकिन मेरा ध्‍यान न पाकर वे समझ गये कि मैं परेशान हूं, तभी मेरे चेहरे पर अपने हाथ रख बोले कि ‘क्‍या हुआ रिया मैं देख रहा हूं तुम वहां भी परेशान थी और अब घर पर भी बात क्‍या है ? यह सुनते ही मैं अरमान के गले से लग गयी और बोली- आज भी तुम मेरी परेशानी को कितनी जल्‍दी पढ़ लेते हो, तभी अरमान बोले- पढ़ कैसे नहीं पाउंगा आखिर मैंने आज तक अपने आप से ज्‍यादा तुम्‍हें जीया है बताओ क्‍या परेशानी हैं। तभी मैंने सबकुछ उन्‍हें बता दिया- थोड़ा सोचने के बाद वे बोले कि अगर तुम्‍हें ऐसा कुछ महसूस हुआ है तो कुछ न कुछ बात जरुर होगी लेकिन हम क्‍या कर सकते है, रमा की अब सगाई हो चुकी हैं तुम ये सब नहीं सोचो सब ठीक होगा !

अगले दिन सुबह से ही मेरा किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था, रह-रह कर मेरी आंखो के सामने रमा का वो चेहरा आ रहा था जो मुझसे कुछ कहना चाहता था, सारे काम छोड़ में मेरे कमरे की खिड़की के पास आकर बैठ गयी, मन में ऐसा तूफान उठ रहा था जो शांत होना ही नहीं चाह रहा था, दिल को महसूस हो रहा था कि कहीं कुछ गलत हो रहा हैं। कहीं न कहीं रमा के रुप में मैं अपने आप को खड़ा पा रही थी, आज मेरी आंखों के सामने वहीं दिन आ गया था जिसके बारे में मैं कभी सोचना भी पसंद नहीं करती, धीरे-धीरे मेरी आंखों के सामने मेरे बीते हुए कल की परते खुलती चली जा रही थी-

मेरी सगाई का दिन करीब आता जा रहा था मेरा रिश्‍ता एक उच्‍च वर्गीय परिवार में तय हुआ था, घर के सभी लोग इस रिश्‍ते से बेहद खुश थे। सब बढ़-चढ़ कर तैयारियों में लगे हुए थे लेकिन मेरे मन में अपनी सगाई और शादी को लेकर कोई खुशी नहीं थी, मेरी खुशियां तो उसी दिन खत्‍म हो गयी थी जिस दिन मेरे परिवार ने मेरे और अरमान के पवित्र प्‍यार के रिश्‍ते को यह कहकर बेइज्‍जत किया था कि अरमान और उसका परिवार हमारे घर से रिश्‍ता जोड़ने के काबिल नहीं है। एक पल में ही मेरी सारी दुनिया बदल गयी थी, मैं यह सोच ही नहीं पा रही थी कि आखिर लोगों के मन में यह क्‍यूं है कि ज्‍यादा हाई - प्रोफाइल के लोग ही सुखी जीवन जीते हैं। मैं हार गई थी मम्‍मी को समझाते-समझाते कि मेरी खुशी सिर्फ अरमान में है वो मुझे समझता है मेरी हर खुशी का ख्‍याल पहले रखता है और उसका परिवार भी मुझे अपनाने के लिए राजी है लेकिन मेरे घरवालों ने जिन्‍होने आज तक मेरी छोटी-से-छोटी खुशी का ख्‍याल रखा था वे आज मुझसे मेरी जिन्‍दगी की सबसे बड़ी खुशी छीन रहे थे। कहीं न कहीं मम्‍मी-पापा के मन में अपनी बिरादरी से अलग जाकर रिश्‍ता जोड़ने पर समाज के तानों का डर समाया हुआ था लेकिन क्‍या किसी कि खुशी इन तानों से बढ़कर होती हैं ?

मैंने भी अपने घरवालों की इज्‍जत की खातिर अपने 6 सालों के प्‍यार की तिलांजलि दे दीं थी। अरमान ने भी मेरे फैसले को स्‍वीकार करते हुए हमेशा खुश रहने का वादा कर मुझसे दूर हो गया, लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हम एक-दूसरे के बिना खुश रह ही नहीं सकते थे। कई-कई रातें मैंने बैठे-बैठे आंसूओं के समन्‍दर में काट दी थी, मुझमें अरमान से जुदा होकर जीने की शक्‍ति तो थी लेकिन किसी और के साथ जिन्‍दगी के सफर को तय करने की शक्‍ति मुझमें नहीं थी। लेकिन कोई भी ये समझने को तैयार ही नहीं था उन्‍हें मेरी खुशी से प्‍यारी समाज की खुशी की परवाह थी।

देखते-ही देखते सगाई का दिन भी आ गया, मेरे हाथों में मेंहदी लगायी जा रही थी जिस पर रंग चढा़ने के लिए नए-नए तरह के उपाय किये जा रहे थे पर जब मेंहदी का रंग सामने आया तो उसमें उस रंग जैसी कोई रंगत थी ही नहीं जो हमेशा बिना किसी उपाय के मेरे हाथों पर अपने आप ही आ जाया करती थी, मैं जानती थी अरमान से ज्‍यादा प्‍यार करने वाला मुझे मिल ही नहीं सकता।

मैं सगाई के कार्यक्रम में होकर भी वहां नहीं थी, मेरे मन में यही सवाल आ रहे थे कि मैं इस इंसान को जो मेरा पति बनने वाला है, अरमान को जिसने मुझे जीया है या फिर अपने आप को, किसको धोखा दे रही हूं ? किस समाज के लिए अपने सच्‍चे रिश्‍ते को जिसने हमेशा मुझे खुशी दी उसे खोने जा रही हूं। क्‍या इससे मैं खुश रह पाउंगी, अरमान खुश रह पाएगा, वह इंसान खुश रह पाएगा जिसकी होकर भी मैं जिसकी कभी नहीं हो सकती। यही सब सोचते-सोचते मैंने सगाई की सारी रश्‍में पूरी कर ली। शरीर से तो मैं उन सारी रश्‍मों में शामिल थी लेकिन आत्‍मा से नहीं। सारा कार्यक्रम समाप्‍त हो गया, लड़के वाले अपने शहर लौट गये, हम भी कार्यक्रम स्‍थल से वापस अपने घर आ गये। मैं जानती थी कि इस चकाचौंध में किसी को भी यह अहसास नहीं रहेगा कि क्‍या मेरा दिल खुश हैं या नहीं ?

रात के समय जहां सब थकान से चूर होकर नींद की गहराईयों में डूबे हुए थे वही मेरी आंखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी। मेरी आंखों के सामने तो सिर्फ अरमान का वो निस्‍वार्थ प्रेम झलक रहा था जिसके सपने मैंने अपनी आंखों में संजोए थे। मुझे यह सब गलत लग रहा था मैं उठकर खड़ी हो गयी और सोचने लगी कि झूठे रिश्‍तों के चलते मैं अपनी खुशियों को नहीं खो सकती, रही बात मम्‍मी-पापा की तो वे मेरे अपने है मुझे जरुर समझेंगे और मैंने अरमान को फोन लगा दिया, शायद वह मेरे ही फोन का इंतजार कर रहा था जो उसने एक ही घण्‍टी पर फोन उठा लिया। उसके रिया कहते ही मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और कहने लगी कि वह मुझे अपने साथ ले जाये लेकिन वो मुझे लगातार समझा रहा था कि यह गलत है, मैंने कहा कि प्‍यार में कुछ गलत नहीं होता अगर तुमने मुझसे सच्‍चा प्‍यार किया है तो मुझे ले जाए। यह सुनकर अरमान मेरे सामने झुक गया और उस रात हम दोनों दूसरे शहर भाग गये। मुझे मेरी सहेलियों के द्वारा पता चला कि लोगों ने बहुत बातें की, तरह-तरह से जलील करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। मुझे लोगों के तानों और उनकी बकवास का कोई डर नहीं था, चिंता थी तो सिर्फ अपने मम्‍मी-पापा की, बार-बार उनका चेहरा मेरे सामने आ रहा था।

कुछ दिनों बाद ही पता चला कि जिस लड़के से मेरी सगाई हुई थी वह भी अपने घरवालों के दबाव में आकर मुझसे शादी कर रहा था और वह भी किसी लड़की के साथ भाग गया है।

कुछ समय बाद मैंने खुद पापा को फोन किया और मांफी मांगते हुए रोने लगी कि तभी मुझे चुप कराते हुए पापा बोले, नहीं रिया इसमें तुम्‍हारी कोई गलती नहीं है तुमने जो किया बिल्‍कुल सही किया, बच्‍चों के गलत कदम उठाने के पीछे कहीं न कहीं हम मां-बाप भी जिम्‍मेदार होते हैं। झूठी शान के चलते हम भूल जाते है कि हमारे बच्‍चों की खुशी किसमें है। बस तुम अब वापस आ जाओ मैं खुद तुम्‍हारी शादी अरमान से करवांउगा। यह सुनकर मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। अरमान के घरवालों ने हमारे भाग जाने पर थोड़ी नाराजगी जताई लेकिन फिर वे भी हमारी खुशी में शामिल हो गये।

मैं अपनी शादी के पलों में खोई हुई थी कि तभी भाभी बाहर से दौड़ती हुई मेरे सामने हैरान-परेशान सी आकर खड़ी हो गयीं। मेरे पूछने पर कि क्‍या हुआ, इतनी परेशान क्‍यूं हो- तब उन्‍होंने बताया, कि रमा कल रात को किसी लड़के के साथ भाग गई। यह सुनकर मेरे मन में उठ रहा तूफान अपने आप शांत हो गया और मेरी रमा के प्रति बैचेनी भी खत्‍म हो गई और साथ में मेरे होठों पर एक मीठी-सी मुस्‍कान दे गयी।

पारुल भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

parulbhargava16@gmail.com

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भूमि और पौधे बनाम माँ और सन्तानें

( मदर्स डे पर विशेष )

और बीजों की तरह

भूमि के भीतर से

उग आया था, एक बीज !

भूमि की छाती पर ।

जो बीज अभी फूटा था

अंकुर बनकर,

इससे पहले पैदा हुए पौधों से

वह कहीं अधिक छोटा था ।

 

भूमि के भीतर से एक ही नस्ल के

पैदा हुए थे सभी पौधे,

लेकिन कुछ कांटेदार हुए,

कुछ हरे तो रहे, केवल ऊपर से

रहे रसहीन, गन्धहीन !

 

उन सबने सींचा था बहुत

भूमि की छाती का रक्त

और वह लहराये भी तो अपनी मस्ती में,

पर कभी नहीं फैंकी उनकी टहनियों ने

भूमि की सूखती, झुलसती छाती के लिये

एक भी पत्र की सुख भरी छांह !

 

भूमि के ने कभी न मीचा था

अपने नेत्रों को उनके लिये

और न ही मुख फेरा था उनसे कभी ।

अपनी छाती पर, उनकी जड़ों को

मज़बूती से पकड़कर

उनको सदेव गाडे़ रखा !

 

उन कंटिले हरे, केवल ऊपर से

सूखे, रसहीन, गन्धहीन पौधों को ।

भूमि ने किया था वर्षों उत्सर्ग उनके लिये

कितना ही शीतल और तरल रस

उनके भीतर भरती रही

और सहती रही आशाओं की अग्नि

अभिलाशाओं के धुंए ।

 

उस नए बीज ने देखा था सब कुछ

और भूमि की झुलसती छाती को,

जो हरे, केवल ऊपर से कंटिले सूखे,

रसहीन, गन्धहीन थे ।

 

उन पौधों से भूमि की कुचली मृतिका ने

दम तोडा़ था,

गहरी छांव देने को, मीठे फल देने को ।

पौधे विकृत हो गये थे

भूमि पर गडे़-गडे़ !

 

और रह गये बौने,

कूबड़ और विकलांग से

भूमि ने उस नए अंकुर से भी

नहीं की थी कोई आशा

और उसे वैसे ही उगने दिया,

जैसे सब उग गये थे,

वैसे ही सींचा

जैसे सबको सींचा था ।

 

जो हो गये थे ऊपर से हरे, पर सूखे,

रसहीन, गन्धहीन और कंटिले ।

समय के साथ सब पौधे

एक-एक करके मुड़ गये

अपनी ही जडो़ं की और

भूमि ने अपने में ही समा लिया

अपने ही अंगों को ।

 

फिर समय के साथ नया अंकुर

बन गया पौधा !

अकेले ही वह खोजता रहा

कई प्रहरों, कई वर्षों, कोई उपाए

ताकि एक क्षण झूलसती भूमि को

चैन की छांह दे सके ।

 

वह भी गडा़ रहा भूमि की छाती पर

लेकिन बडी़ ही आस्था के साथ

उसने अपनी गम्भीर साधना से

कई टहनियों को दूर तक फैलाया

और कई हरे-हरे पत्र समेटे अपने में ।

 

सधना हुई पूर्ण

और सफलता का आया मौसम

तो खोल दिये अपने पत्रों के

अगणित हरे-हरे पंखों को

और बहा दिया शीतल पवन

देने को राहत

जलती, झुलसती भूमि को,

जो वर्षों से तप रही थी अपनों के लिये ।

 

आज वह अंकुर तना है बनकर वृक्ष सबल

भूमि की छाति पर

स्वयं वहन कर धूप को

नहीं झुलसने, तपने देता है

भूमि को एक क्षण के लिये भी

जब भी धूप झुलसाती है

भूमि का कोई कोना

तो फैला देता है

अपने हरे-हरे छोटे पंख ।

 

भूमि अब प्रसन्न है

उसकी चैन की छांह पाकर

उसे देखकर वृक्ष प्रतिदिन

उस पर पुष्प बरसा देता है

और भूमि भूल जाती है

वर्षों की तपन,जलन, झुलसन

पाकर उसका हरापन, रसीलापन और गन्ध

भूमि होती जाती है

शीतल, शांत और नम्र !

---

डॉ॰ मोहसिन ख़ान

सहायक प्राध्यापक हिन्दी

जे. एस. एम. महाविद्यालय,

आलीबाग- जिला-रायगड़

( महाराष्ट्र ) 402201

 शिरडी साईं बाबा

शिरडी साईं बाबा

सांई नाम जप लेना

कष्‍टों को मिटाना हो, दुख दूर भगाना हो

तो साई नाम जप लेना-2 के साई नाम जप लेना-2

हॉ साई नाम जप लेना

1- संतों ने कहा है, महन्‍तों ने कहा है

साई की महिम तो सब से जुदा है

तुम्‍हें शिरडी जाना हो साई दर्शन पाना हो

तो साई नाम जप लेना

2- बाबा का भंण्‍डारा जो कोई भी करवाये

सुख सम्‍पत्‍ति उसके घर में आ जाये

फरियाद लगाना हों बुझे दीप जलाना हो

तो साई नाम जप लेना

3- बाबा का दर से कोई खाली नहीं जाता।

रोता हुआ आता है, और हंसता हुआ जाता॥

तुझे बिगड़ी बनाना हो, किस्‍मत चमकाना हो।

तो साई नाम जप लेना

 

 

2

मैंने ओड़ लिया है चोला

मैंने ओढ़ लिया है, चोला देखो साईं नाम का ।

ये दुनिया है जंजाल, न तेरे मेरे काम का॥

मैंने ओढ़ लिया है, चोला देखो साईं नाम का।

1. बाबा के दीवानों पर कष्‍ट कभी न आता है।

ये इक ऐसा दर है यहां से खाली कोई न जाता है॥

हो मैंने आज ही खाता खोला देखो साईं नाम का ।

2. शिरड़ी में साईं तूने सबको कैसा करिश्‍मा दिखाया है।

राम, रहीम, शिव, मानक, यीशु तुझ में सबकी छाया है॥

हो मेरा मन है अब तो डोला, देखो साईं नाम का ॥

3. साई शरण में आके प्राणी, काहे को घबराता है।

साईं तो है सबका बाबा, तेरा भी उनसे नाता है।

हो मैंने मन में अमृत घोला, देखो साईं नाम का ॥

--

रचियता

नारायणसिंह कोरी

सुरईघाट कॉलोनी

ललितपुर (उ0प्र0)

ग़ज़ल

झूठ से डरकर रहता हूँ ,

कड़वा सच पर कहता हूँ.

 

बूढ़ी माँ की आँखोँ से ;

आँसू बनकर बहता हूँ .

 

बाहर सर्द सुबह हूँ पर ;

भीतर दुपहर दहता हूँ .

 

सुख-दुख हैँ 'महरूम' अपने ;

दोनोँ से ही निबहता हूँ .

 

= = * =

ग़ज़ल

ख़ाक हैँ जो कल आग रहे हैँ .

ज़द्दोज़हद का राग रहे हैँ .

 

राह जहाँ, मंज़िल भी वहाँ पर ;

मील के पत्थर भाग रहे हैँ .

 

होँगे जोड़-गुणा अब हम क्या

आजीवन ऋण-भाग रहे हैँ.

 

सोकर क्या नायाब खो दिया

क्या पाया जो जाग रहे हैँ ?

 

हैँ 'महरूम' दाग़दामन हम ;

पर दिर से बेदाग़ रहे हैँ .

 

= = * = =

ग़ज़ल

गूँगी-बहरी तेरी ख़ुदाई .

अंधी-पंगु हुई प्रभुताई .

 

इन्सां बने नहीँ बन बैठे ;

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई .

 

क़द मेँ कमतर है जनमत से;

सत्ता-सियासत की ऊँचाई .

 

कामचोर, ठलुए सदनोँ मेँ ;

ओहदोँ पर काबिज़ हैँ कसाई.

 

हक़ की बात कही जो 'महरूम, ;

तो पानी मेँ आग लगाई .

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ज्योति सिंह, शोध छात्रा,
    हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ,
    निवाई, टोंक   
   
    संगीत मनुष्य की आरम्भिक अवस्था से जुड़ा हुआ है। प्रकृति में होने वाली समस्त क्रियाओं व बदलावों ने मानव को आश्चर्य चकित किया। मस्तिष्क ने अपनी स्वाभाविक जैविक क्रिया की और मनुष्य अनजाने में ही जिज्ञासा के मोहपाश में फंसता चला गया (मस्तिष्क मनन) का कार्य ही सोच व शंका को जन्म देता है और यही सोच व शंका प्रगति व परिवर्तन की आधारभूत भूमि है।


    ब्रह्मण्ड में उपस्थित समस्त ध्वनियों ने मनुष्य को अलग-अलग वातावरण व प्रतिक्रियाओं में बांटा। हर ध्वनि पर उसकी प्रतिक्रिया उसके भीतर एक अलग भाव व उत्तेजना को जन्म देती है। यहाँ भी उसे संगीत द्वारा अपने मनोविज्ञान पर होने वाले प्रभाव का पता नहीं था। किन्तु यह क्रिया स्वाभाविक व प्राकृतिक थी। इन्हीं अलग-अलग भावों ने अलग-अलग ध्वनियों की (अमूर्त) श्रेणी व उनकी (मूर्त) पहचान बनाई जो बाद में एक निरंतर खोज व जिज्ञासा के कारण स्वर, राग व संगीत के शुद्ध रूप में सामने आई। संगीत शास्त्रों में स्वरों का जीव-जन्तुओं की बोलियों से सम्बन्ध इसी बात का प्रमाण है।


    कला वह प्रतिक्रिया है जो मनुष्य के अनुभवों से उत्पन्न होती है, संगीत में यह प्रतिक्रिया सबसे तीव्र होती है। संगीत में सर्वप्रथम कला का प्रस्तुतकर्ता अर्थात् संवेग एवं संवेदनाओं का प्रथम उपभोक्ता ही इसके सम्मोहन में आता है। संगीत पर शोध व अभ्यास करने वाला व्यक्ति स्वयं भी एक सम्मोहन के मनोविज्ञान के प्रभाव में समस्त भावनाओं के साथ संगीत को जोड़ता है, अथवा संगीत को समर्पित करता है। इसलिए संगीत मानव के सर्वाधिक निकट है।


    ''संगीत मानव के भीतर उपस्थित समस्त तत्वों को गति देने के साथ-साथ तारतम्य भी प्रदान करता है। संगीत से विचारों व चिंतन की धाराओं को प्रभावित किया जा सकता है। शरीर में उपस्थित करोड़ों कोशिकाओं व नाड़ी तंत्र को तरंगीय अनुभूति और फिर गति देने में संगीत महत्वपूर्ण है। संगीत या ध्वनि को ही मानव ने सर्वप्रथम अपने शरीर के वाह्य व भीतरी तंत्रिका तंत्र में भोगा, इसके पश्चात् उसने कभी स्वतः तो कभी विचार के पश्चात् प्रतिक्रिया प्रकट की। मनुष्य में भाव (जो एक निश्चित रासायनिक क्रिया का प्रतिफल है। संगीत या ध्वनि के माध्यम से प्रभावित व तरंगित किया जा सकता है। संगीत मनोविज्ञान को जन्म भले ही न दे किन्तु उसे नव काया व नव रूप अवश्य दे सकता है। इसी प्रकार मनोविज्ञान भी संगीत का उपयोग करने के पश्चात् संगीत को जन्म न देते हुए भी नए-नए रूप व भाव अवश्य दे सकता है। अतीत से लेकर वर्तमान तक संगीत व मनोविज्ञान यूँ ही एक दूसरे के सहायक व कभी-कभी पूरक भी बनते रहे हैं।)''1


बिस्मिल्लाह खाँ साहिब की यह उक्ति संगीतज्ञ के कुलबुलाते मनोविज्ञान का ही परिचायक है-''हमें सुबह-सुबह गंगा के किनारे-बजरे पर बैठकर शहनाई बजाने में जो आनन्द आता है वो और कहीं नहीं आता।''2


    यहाँ संगीतज्ञ की स्वच्छन्दता, स्वाधीनता, स्वरों को भोगने का सुख तथा ध्वनि को बिना किसी आशय व लोभ के उपभोग करने का सुख सामने आया है।


    इन्हीं मानसिक अवस्थाओं में संगीत ने सदैव ही मानव को एक सकारात्मक सहयोग दिया है। मानव के मन पर पड़े दुष्प्रभाव व संवेग तथा संवेदनाओं की तीव्रता को संगीत से संतुलित किया जा सकता है। युगो-युगों से मानव के प्रत्येक सुख व दुख की परिस्थिति हेतु विशेष गीतों व संगीत का प्रयोग होता रहा है। विवाह, जन्म, मृत्यु, प्रेम, विरह, युद्ध, असफलता, संघर्ष, दरिद्रता, जैसी स्थितियों में सात्वनां, उत्साह, प्रेम, परीक्षा व वीरता से भरे गीतों व रागों का गायन अथवा वादन भारतीय जीवन की परम्परा रही है।

 
    संगीत  मनुष्य के जन्म के साथ ही उससे जुड़ गया था, मानव अपनी कठिनाइयों एवं जिज्ञासाओं को इसी के माध्यम से हल किया करता था। संगीत एक ऐसा माध्यम है जो पूर्णतः प्राकृतिक है। केवल संगीत ही बिना किसी सहायक यंत्र या कारक के अपने माधुर्य, अर्थ व अपनी सार्थकता को बनाए रख सकता है। संगीत की ध्वनियाँ किसी भी मानसिक रोगी के मानस-पटल के लिए उद्दीपक का कार्य प्रदान करती है। संगीत जब भी प्रफुष्ठित होता है तो वह सभी अंगों, कारकों व प्रवृत्तियों को संतुष्ट करता है। संगीत में युद्ध, करूणा, व्यथा, क्रोध, काम, तृष्णा, मृत्यु, आघात, विरह इत्यादि पक्षों में भी स्वयं की सुन्दरता व प्रभाव बनाएं रखने की क्षमता है। संगीत सम्पूर्ण जगत के सुन्दर व सजीव पक्ष को गतिशील बनाने का गुण रखता है।

 
    ''विलियम ब्राउन'' ने भी सुन्दर व सजीव प्रकृति के इस पक्ष को उद्धत करते हुए कहा है-"Clearly it should be the universe as a perfected system as the full realization of the good, Beautiful and the Truth.**3
    मनोविज्ञान के क्षेत्र में संगीत द्वारा दी जाने वाली उपचार से अत्यधिक सकारात्मक निष्कर्ष सामने आए हैं।
    ''अल्ट शुगर'' जैसे मनोवैज्ञानिक ने कहा है-''संगीत में रोगी के संवेगात्मक एवं बौद्धिक पहलुओं को जागृत करने की शक्ति होती है। इसे सुनते ही रोगी की मनःस्थिति परिवर्तित हो जाती है।''4


    ''सन् 1933 की बात है। इटली के तानाशाह मुसोलिनी को अनिद्रा रोग हो गया। काफी चिकित्सा की गई मगर लम्बे समय तक उसे नींद नहीं आयी। किसी ने सुझाव दिया कि 'संगीत चिकित्सा' का सहारा ले। उन्हीं दिनों पं. ओंकार नाथ ठाकुर यूरोप की यात्रा पर थे। उनसे अनुरोध किया कि मुसोलिनी को संगीत सुनाएँ। पंडित जी ने राग पूरिया का आलाप किया। लगभग आधा घण्टा ही हुआ था कि मुसोलिनी को नींद आ गई। जब मुसोलिनी जागा तो बहुत प्रभावित हुआ। उसने पं. ओंकार नाथ ठाकुर को सम्मानित किया।''5


    इतिहासकार उमेश जोशी कहते हैं- ''द्रविड़ों को संगीत के वैज्ञानिक रूप का भी पता था। इसीलिए उन्होंने संगीत का चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोग किया।''6 उन्होंने मंत्र उच्चारण व ऋचाओं के स्वरों का ध्वनि से कई प्रकार के मानसिक तनावों व रोगों का उपयोग किया।


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सदैव ही अपना व अपने आश्रम का चित्त शांत व स्थिर रखने के लिए ''रघुपति राघव राजा राम'' का भजन सुना करते थे। गाँधी जी संगीत चिकित्सा को विशेष महत्व देते थे, एक बार जब वह बीमार पड़ गए थे तो उनकी चिकित्सा में महान संगीतज्ञ 'मनहर बर्वे' ने सहायता की थी, जिसका उन्होंने प्रमाण पत्र भी दिया था।7


    संगीत से वृद्धों और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को सिद्ध करते हुए 'सोसाइटी फॉर जीरोनटोलॉजीकल रिसर्च' के अध्यक्ष डॉ. कल्याणी बागची ने बताया कि इस क्षेत्र में किए जा रहे शोध के आधार पर 'संगीत थेरेपी' से अब मृत्यु शैय्या पर पड़े व्यक्ति के खौफ को तो दूर किया ही जा सकता है। 70 और 80 साल से ऊपर की आयु के एक वृद्ध को सुर और लय के रस में डुबोकर उसमें जीवन जीने की आशाएँ भी जगाई जा सकती हैं। यह प्रयोग श्रोताओं पर किया गया  और इसके अनुकूल परिणाम देखे गये।8


    आज के समय में कई चिकित्सक संगीत के माध्यम से रोगियों का उपयोग कर रहे हैं। कई जेलों में भी संगीत के माध्यम से जघन्य अपराध में लिप्त कठोर अपराधियों को भी सरल व्यवहार का बनाया गया है। जहाँ संगीत की मधुर स्वर लहरियों से दुनिया को मंत्र-मुग्ध करने का काम महान कलाकारों ने किया है। वही अब संगीत चिकित्सा अपने चमत्कार दिखाने को तैयार है।


''संगीत है शक्ति ईश्वर की, हर स्वर में बसे हैं राम।
रागी जो सुनाए रागिनी, रोगों को मिले आराम।।''


संदर्भ ग्रंथ :
1.    डॉ. किरन तिवारी, संगीत एवं मनोविज्ञान, कनिष्क पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2008, पृ.सं.-151 
2.    वही, पृ.सं.-217
3.    By William Brown, Science and Personality, Humphrey Milford, 1929, p.-59
4.    डॉ. किरन तिवारी, संगीत एवं मनोविज्ञान, कनिष्क पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2008, पृ.सं.-264
5.    नवभारत टाइम्स(1.06.1998), एकदा
6.    उमेश चन्द्र जोशी, भारतीय संगीत का इतिहास, मानसरोवर पब्लिकेशन, फिरोजाबाद,1969, पृ.सं.-50
7.    वही, पृ.सं.-397
8.    डॉ. किरन तिवारी, संगीत एवं मनोविज्ञान, कनिष्क पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2008,  पृ.सं.-271

ये चुनाव जुल्मी

ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

जीतने के नाम पर इतने नाटक करवाता है

की पूरा माहौल फिल्मिया नजर आता है

जनता को रिझाकर वोट पाने के लिए

राजनेता ऐसा संजीदा अभिनय दिखाता है

जिसके सामने हॉलीवुड का सिनेमा भी

फीका नजर आता है

 

कोई एंग्री यंग मैन बनकर

हीरो की तरह स्टेज से कागज फाड़ जाता है

जिस किसी को टिकट नहीं मिलपाता है

वो पाला बदलकर विलेन का रोल निभाता है

कोई कोमेडियन की तरह

चुटकियाँ लेकर पब्लिक का मनोरंजन कराता है

कोई पुराने फ़िल्मी ठाकुर की तरह

रोटी कपड़ा और मकान का लालच दिखाकर

वोट पर अंगूठे लगवा लेना चाहता है

कोई महलों को छोड़ कर

धूल भरी सड़कों पर चक्कर लगता है

कोई बीबी बच्चों के नाम पर

वोट के लिए झोली फैलाता है

 

कोई कोई तो खुद के साथ – साथ

अभिनेताओं से भी अभिनय करवाता है

मगर फिर भी बात नहीं बनती है

क्योंकि अभिनेता जनता के सामने

रोल ठीक से अदा नहीं कर पाता है

क्योंकि बिना रीटेक के सीन करने का

वो आदि नहीं होता है

ये सब देखकर लगता है

ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

और बेबस नेता इसके सामने नाटक दिखता है

क्योंकि कोई भी नेता

इस जुल्मी को जेल में बंद नहीं कर पाता है

और ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

- शंकर लाल, इंदौर मध्यप्रदेश

बाल-मनोविज्ञान को समझना भी एक बडी तपस्या है.-बचपन में लडना-झगडना-उधम मचाना चलता ही रहता है. मुझे अपने बचपन की हर छोटी-बडी घटनाएं याद है.
बचपन की भूल-भुलैया आज भी चमत्कृत करती है. यदि आज के बच्चे से उसके बचपन को लेकर बत करें तो वह उसे कैदखाना ही बतलाएगा. आज के बच्चों को लगता है के कब बचपना खत्म हो और वे बडे बन जाएं. बच्चे ऐसा क्यों सोचते हैं? कभी आपने इस विषय की गंभीरता से विचार नहीं किया होगा. जानते हैं, ऐसा क्यों होता है? हम बचपन पर अनुशासन लादते जा रहे हैं. बात-बात में कहते हैं, तुम्हें ये करना चाहिए.. वह करना चाहिए. ये नहीं करना चाहिए. इस टोकाटोकी में बचपना मुरझा जाता है. बच्चे आखिर चाहते क्या हैं,? यह कोई नहीं पूछता. दरअसल बच्चों के बाल-मन को समझना एक विज्ञान है और दूसरी भाषा में कहा जाए तो यह किसी तपस्या से कम नहीं है.


श्रीराम बचपन में गुमसुम रहते थे. गंभीर तो वे थे ही. राजा दशरथ को लगने लगा कि राम राजकुमार हैं और उनके भीतर बालपन में ही वैराग्य भाव जाग आया है, यह ठीक नहीं है. दशरथ ने बाल राम को गुरु वशिष्ठ के पास भेजा. उन्होंने बाल मनोविज्ञान को समझते हुए ज्ञान दिया. उसे योग –विशिष्ठ नाम से जाना जाता है.


श्रीकृष्ण ने जब इंद्र की पूजा का विरोध किया, तब सभी ने उसे बालहठ समझा, लेकिन माँ यशोदा ने उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया और वे श्रीकृष्ण के पक्ष में जा खडी हुई. वे जानती थीं कि बच्चों का मनोबल कभी-कभी सत्य के अत्यधिक निकट पहुँच जाता है. बचपन ईसा मसीह का हो, या मोहम्मद का, या ध्रुव का,इनके पालक यह समझ गए थे कि जीवन हमेशा विरोधाभास से ही उजागर होता है. जैसे बच्चे को ब्लैकबोर्ड पर सफ़ेद चाक से लिखकर पढाया जाता है, ये पूरे जीवन का प्रतीक है. काला है तो सफ़ेद दिखेगा ही. ऐसे ही आत्मा प्रकट होगी. शुन्य से ही संगीत आएगा. अंधेरे से ही प्रकाश का आना होता है. जितनी घनी अंधेरी रात होगी, सुबह उतनी ही उजली होगी. इस तरह बचपन से ही पूरी जिन्दगी की तैयारी निकल कर आएगी. समय के सदुपयोग की मह्त्ता समझें

-समय की बर्बादी का अर्थ है, अपने जीवन कॊ बरबाद करना. जीवन के जो क्षण मनुष्य यों ही आलस्य अथवा उन्माद में खो देता है ,वे फ़िर वापिस लौटकर कभी नहीं आते. जीवन के प्याले से क्षणों की जितनी बुंदे गिर जाती है, प्याला उतना ही खाली हो जाता है. प्याले की यह रिक्तता फ़िर किसी भी प्रकार से भरी नहीं जा सकती. मनुष्य जीवन के जितने क्षणों को बरबाद कर देता है, उतने क्षणों में वह जितना काम कर सकता था, उसकी कभी वह किसी भी प्रकार से भरपाई नहीं कर सकता.


जीवन का हर क्षण एक उज्जवल भविष्य की संभावना लेकर आता है . हर घडी एक महान मोड का समय हो सकती है. मनुष्य यह निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता कि जिस समय, जिस क्षण और जिस पल को वह यों ही व्यर्थ खो रहा है,वही समय उसके भाग्योदय का समय हो सकता है ! क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं, वही समय हमारे लिए अपनी झोली में सुंदर सौभाग्य की सफ़लता लाया हो. समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है. जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालॊं को चाहिए कि वे अपने किसी भी ऎसे कर्तव्य को भूलकर भी कल पर न टालें..जो आज किया जाना चाहिए, आज ही कर लें. आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है. अतः समय के सदुपयोग की महत्ता को गंभीरता से समझें.


मानव जीवन में संस्कारों का महत्व.
-हिन्दू संस्कृति बहुत ही विलक्षण है. इसके सभी सिद्धांत पूर्णतः वैज्ञानिक है और सभी सिध्दांतों का एकमात्र उद्देश्य है- मनुष्य का कल्याण करना. मानव का कल्याण सुगमता एवं शीघ्रता से कैसे हो, इसके लिए जितना गंभीर विचार और चिन्तन भारतीय संस्कृति में किया गया है उतना अन्य किसी धर्म या संप्रदाय में नहीं, जन्म से मृत्यु पर्यन्त मानव जिन-जिन वस्तुओं से संपर्क मे आता है और जो-जो क्रियाएँ करता है, उन सबको हमारे देवतुल्य मनीषियों ने बडे ही परिश्रम और बडे ही वैज्ञानिक ढंग से सुनियोजित, मर्यादित एवं सुसंस्कृत किया है, ताकि सभी मनुष्य परम श्रेय की प्राप्ति कर सकें.


मानव जीवन में संस्कारों का बडा महत्व है. संस्कार संपन्न संतान ही गृहस्थाश्रम की
सफ़लता और समृद्धि का रहस्य है. प्रत्येक गृहस्थ अर्थात माता-पिता का परम कर्तव्य बनता है कि वे अपने बालकों को नौतिक बनायें और कुसंस्कारों से बचाकर बचपन से ही उनमें अच्छे आदर्श तथा संस्कारों का ही बीजारोपण करें. घर संस्कारों की जन्मस्थलि है. अतः संस्कारित करने का कार्य हमें अपने घर से प्रारम्भ करना होगा. संस्कारों का प्रवाह बडॊं से छोटों की ओर होता है. बच्चे उपदेश से नहीं ,अनुसरण से सीखते हैं. बालक की प्रथम गुरु माता अपने बालक में आदर,स्नेह एवं अनुशासन-जैसे गुणों का सिंचन अनायास ही कर देती है परिवाररुपी पाठशाला मे बच्चा अच्छे और बुरे का अन्तर समझाने का प्रयास करता है. जब इस पाठशाला के अध्यापक अर्थात माता-पिता, दादा-दादी संस्कारी होंगे, तभी बच्चों के लिए आदर्श उपस्थित कर सकते है. आजकल माता-पिता दोनों ही व्यस्तता के कारण बच्चों मे धैर्यपूरक सुसंस्कारों के सिंचन जैसा महत्वपूर्ण कार्य उपेक्षित हो रहा है.

आज अर्थ की प्रधानता बढ रही है. कदाचित माता-पिता भौतिक सुख-साधन उपलब्ध कराकर बच्चों को सुखी और खुश रखने की परिकल्प्ना करने लगे हैं. इस भ्रांतिमूलक तथ्य को जानना होगा. अच्छा संस्काररुपी धन ही बच्चों के पास छोडने का मानस बनाना होगा एवं इसके लिए माता- पिता स्वय़ं को योग्य एवं सुसंस्कृत बनावें. उनकी विवेकवती बुद्धि को जाग्रत कर आध्यात्म-पथ पर आरुढ होना होगा. आनुवांशिकता और माँ के अतिरिक्त संस्कार का तीसरा स्त्रोत बालक का वह प्राकृतिक तथा सामाजिक परिवेश है, जिसमें वह जन्म लेता है, पलता है और बढता है. प्राकृतिक परिवेश उसके आहार-व्यवहार, शरीर के रंग-रुप का निर्णायक होता है, आदतें बनाता है. .

सामाजिक परिवेश के अन्तर्गत परिवार ,मुहल्ला,गांव और विद्यालय के साथी, सहपाठी, मित्र, पडोसी तथा अध्यापकगण आते हैं. बालक समाज में जैसे आचरण और स्वभाव की संगति मे आता है, वैसे ही संस्कार उसके मन पर बद्धमूल हो जाते हैं प्रत्येक समाज की संगति की एक जीवन-पद्धति होती है, जिसके पीछे उस समाज की परम्परा और इतिहास होते हैं. यह समाज रीति-रिवाज बनाता है, सांस्कृतिक प्रशिक्षण देता है , स्थायीभाव जगाता है, अन्तश्चेतना तथा पाप-पुण्य की अवधारणा की रचना करता है. उसी क्रम में भारतवर्ष में सोलह संस्कारों की परम्परा है जो मनुष्य और मनुष्य के बीच, मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्धसूत्र बुनते है. प्रत्येक धर्म-संस्कृति मे विवाह आदि के विधान के पीछे धार्मिक आस्था जुडी हुई होती है. पवित्र भावों और आस्था का सूत्र अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और पूज्यभाव से प्रेरित होता है. यह सूत्र सामाजिक आचरण का नियमन करता है.


गोवर्धन यादव
103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

अंतर

फूला काकी अपने पोते को गो माता का महत्व बताती रहती थीं । लेकिन वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता था । एक दिन काकी ने देखा कि गौ माता बैठी हुई हैं और उनका पोता लात मार-मारकर उन्हें उठाने का प्रयास कर रहा है ।

काकी से नहीं रहा गया । बोलीं “नासपीटे तूँ गौ माता को लात मार रहा है । तुझे कहीं बैठारी नहीं मिलेगी” ।

पोता बोला “तुम चुप रहो बस । बताओ गाय और बकरी में क्या अंतर है” ?

काकी उसे गाली देने लगीं और बोलीं “देश और समाज का यही दुर्भाग्य है कि आज तुझ जैसे हजारों लोग हो गए हैं । जिनके मन-मस्तिक में मल की बास भरी रहती है वे गुबरौले भला फूल के मकरंद और मल की गंदगी में क्या अंतर समझेंगे ? गंगाजी और नाले का अंतर गंदी नाली के कीड़े क्या समझेगें” ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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सभ्यता के झीने आवरण से दूर
वे करते हैं विचरण
अपनी दुनिया में
जंगली सूअरों और गोह का
शिकार कर खाते लोग
कभी सीपियों का माँस, तो कभी
मछली-कछुए मार खाते लोग
डरते हैं जंगली जानवर
इनके तीखे भालों-बाणों से
पर वो डरते हैं
सभ्यता के शिकारियों से
सभ्यता की आड़ में
उनकी आस्मिता का शिकार करती
उनकी संपदा को ललचाई
निगाहों से घूरती
विकास के खोखले नारों के बीच
जंगल और जमीन कब्जाते लोग
छीन रहे हैं उनका सुकून।

हर कोई देखना चाहता है
छूना चाहता है उन्हें
पर नहीं चाहता उन्हें समझना।
वे एक उत्पाद-भर रह गए हैं
उनके चेहरे, उनकी भाव-भंगिमायें
कैद करके कैमरों में
लौट जाते हैं लोग
अपनी सभ्य दुनिया में
और भूल जाते हैं
इन आदि मानवों को।

कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101

 


मौसम मस्ताना, दिल दीवाना
तुझको पुकारे आ जा
मौसम का सितम है मेरे सनम
अब सह न सकूँगी आ जा।

तेरी बाँहों के झूले में खो लूँ
इतनी सी इजाजत तो दे दे
अब और न तड़पा मुझको
बस मेरा जहां मुझको दे दे।

तेरे सिवा कुछ और नहीं
आता है नजर इन आँखों को
तेरी साँसों का उठना-गिरना
संगीत है मेरे जीवन का।

कह दे तू बस मेरा ही है
जीने का बहाना बन जाये
अब आ भी जा ऐ मेरे सनम
कहीं साँसें ही न थम जायें।

-आकांक्षा यादव
द्वारा - श्री कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
kk_akanksha@yahoo.com

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान

(अंतिम भाग)

पिछले अंक से जारी...

इसी बीच फू दोरजी ने काफी तैयार कर ली जिसे पीकर हम आगे चलने के लिए तैयार हो गए। जब हमने अगली चढ़ाई आरंभ की, सुबह के ५-३० बजे थे। पहले मैं और फू दोरजी चले, कुछ मिनट बाद हमारे पीछे रावत और बोगी ने चढना शुरू कर किया। हम सब सामान से बुरी तरह लदे थे जो प्रतिव्यक्ति साठ पौण्ड के लगभग था। इसमें आक्सीजन के सिलेण्डर कैमरे व इनकी फिल्में तथा और दूसरी चीजें थीं। इस शिविर से आगे पांच सौ गज लम्बी एक पहाड़ी थी। इस पहाड़ी के बारे में मैंने पहले बहुत कुछ पढ़ रखा था। और अब मैं खुद इसके ऊपर चढ़ रहा था। यह पहाड़ी बहुत संकरी और तीखी है और इसके दोनों ओर गहरे ढाल हैं। इसलिए इसे 'रेजर्स एज' कहते हैं। इसके दाहिनी तरफ बर्फ का एक बड़ा-सा टुकड़ा निकला हुआ है, क्योंकि यहां हवा हर वक्त चलती रहती है। हमें इस बर्फ से सतर्क रहना होता है, क्योंकि इस पर पैर पड़ते ही यह टूट कर गिर सकती है। मैंने एक या दो कदम ही आगे रखे होंगे कि मैं भीतर से मानो जम ही गया। हवा बहुत तेज चल रही थी। आक्सीजन लेते रहने पर भी सांस लेना बहुत मुश्किल हो गया और मुझे लगा कि फेफड़े फट जाएंगे। फू दोरजी मुझसे १५ फुट आगे था। बैल- गाड़ी में बंधे हुए बैल की तरह मैं वहीं रुक गया। मेरे पैर जड़ हो गए। फू दोरजी मेरी कठिनाई को समझ गया और उसने मुझे इशारा करके बताया कि मैं बर्फ में जितनी भी जोर से पैर मार सकूं मारूं। लेकिन यह करना बहुत कठिन सिद्ध हुआ। तभी मुझे अपने भीतर गर्मी और रक्त फिर से नसों में दौड़ता महसूस हुआ और मैं आगे बढ़ने लगा। थोड़ो ही देर में हमने रेजर्स एज को आधा पार कर लिया।

हवा बहुत तेज चल रही थी। कई बार उसके कारण खड़े रहना भी कठिन हो जाता था। हमने अपनी कुल्हाड़ियां बर्फ में जमा दीं और रस्सों को एक बार फिर से कस लिया। हवा मानों बड़ी निर्दयता से हमारे ऊपर वार कर रही थी और हड्डियों के भीतर तक घुसी चली जाती थी। कई बार मुझे लगता कि अब रुकना पड़ेगा।

मुख्य पहाड़ी अब समाप्त हो गई थी और हम बायीं ओर मुड़े। अब हमारे सामने इससे भी कठिन कार्य था-स्लेट की चट्टानों की एक विशाल दीवार को पार करना। इस पर हाथ या पैर टिकाने की कोई जगह नहीं थी। एक बार फिसलने का अर्थ होता १५,००० फुट नीचे तिब्बत में जा गिरना। इन चट्टानों पर हम धीरे-धीरे चढते रहे।

आखिरकार ये काली चट्टानें खत्म हुई और हमने 'येलो बैण्ड' क्षेत्र में प्रवेश किया। इन पर चढना अपेक्षाकृत सरल था। इन्हें पार कर हम दक्षिणी शिखर के आधार तक पहुंचे जहां से बिलकुल सीधी चढ़ाई शुरू हो जाती है।

मेरे सिलेण्डर को आक्सीजन कहीं से निकल रही थी इसलिए मुझे सांस लेने में कठिनाई होने लगी। यह जानकर मैं बहुत चिंतित हुआ। मैंने देखा कि सिलेण्डर से मुंह तक आक्सीजन ले जानेवाली नली में छेद हो गया है। यह छेद मेरे बूटों की एक कील से हुआ था। आसपास कहीं बैठने की कोई जगह नहीं थी, इसलिए लू दोरजी ने बर्फ काटकर एक छोटासा प्लेटफार्म बनाया। यहां बैठकर मैंने टेप और थोड़ी सी फिल्म की सहायता से यह छेद बंद किया। अब हम खुश होकर आगे बढ़ने ही वाले थे कि मुझे लगा कोई आदमी हमारी ओर हाथ हिलाता 'तौर हांफता हुआ बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहा है। कुछ देर बाद जब वह पास पहुंचा तो पता लगा कि वह रावत था। उसके साथ जो घटना हुई उसे मैं उसीके शब्दों में बयान कर रहा हूं :

'' आहलू और फू दोरजी चल पड़े थे। हम भी उनके पीछे निकले। बोगी को कुछ तकलीफ होने लगी और 'रेजर्स एज' पर चढना उसे बहुत कठिन जान पड़ने लगा। वह शिविर से कुछ ही फुट आगे बढ़ा ओगा कि वह नीचे बैठ गया और बिलकुल रुक गया। पछली रात उसे पित्ती उभर आई थी और वह सारी रात अपना बदन खुजाता रहा था। इसलिए वह बलकुल शिथिल हो गया था और आगे बढ़ने लायक

नहीं रहा था। बोगी ने मुझसे आग्रह किया कि मैं अकेला ही आगे बढ़।

'' बोगी ने कहा कि अंतिम कैम्प पर वे हमारे लौटने का इंतजार करेंगे। निर्णय जल्दी ही लेना था। मेरी कठिनाई यह थी कि मैं आहलू और दोरजी से नहीं मिला तो मैं क्या करूंगा? लेकिन मैं जानता था कि मैं अंतिम शिविर पर हमेशा वापस लौट सकता हूं। मैं यह बात भली भांति जानता था कि अभी तक इतनी ऊंचाई पर कोई भी अकेला नहीं चढा है, लेकिन मैं यह खतरा मोल लेने के लिए तैयार था। मैंने आगे बढ़ने का निश्चय किया और अनमने मन से बोगी को अपने रस्से से खोलकर विदा कर दिया। ''

हवा तेजी से चल रही थी। मैं बहुत भयभीत था लेकिन फिर भी 'रेजर्स एज' का आधा हिस्सा मैंने पार कर लिया। मैं सोचता रहा कि मैं आहलू और फू दोरजी से मिल सकूंगा या नहीं? मैं जरा-सा भी फिसल जाता तो मौत के गड्ढ़े में जा गिरता। हवा के तेज थपेड़ों के कारण मेरे पैर डगमगा रहे थे। अपना संतुलन बनाये रखने के लिए मैं कुल्हाड़ी को बर्फ में जमा देता, लेकिन 'रेजर्स एज' पर सीधे खड़े रहना संभव नहीं था। इन सब कठिनाइयों के बावजूद मैं हिम्मत बांधे धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। कई जगह मैं घुटनों के बल चला क्योंकि मैंने सोचा कि इसी तरह हवा के थपेड़ों से बचा जा सकता है। पीठ पर थैले में लटकते सिलेण्डर का वजन मुझे और भी तकलीफ दे रहा था। मैं सांस ठीक से नहीं ले पाता था और मुझे लगता था कि मेरे फेफड़े फट जाएंगे। एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं आगे बिलकुल ही नहीं बढ़ सकूंगा, न पीछे ही जा सकूंगा। मेरा हर अगला कदम आखिरी कदम लगता था। मैं अपनी घड़ी भी नहीं देख पा रहा था। मैं नहीं जानता था कि यह सब कितनी देर तक और चलेगा। मुझे विश्वास था आहलू फू दोरजी शिखर पर पहुंच रहे होंगे। अब मेरे सामने इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं किसी छोटी-सी चट्टान को ढूंढ़ लूं और उस पर बैठकर फू दोरजी और आहलू का इंतजार करूं। इसके लिए मैंने 'येलो बैण्ड' की चट्टानें पार कीं और तभी मैंने ऊपर देखा तो पाया कि दक्षिण शिखर के आधार पर आहलू और फू दोरजी बैठे हुए हैं। मैं अपनी आंखों पर विश्वास, नहीं कर सका। यह एक चमत्कार के समान दीखा। ''

रावत हमारे पास पहुंच गया तो मुझे कुछ ढाढस हुआ। समय कम था। रावत को हमने अपनी रस्सी के बीच में जगह दे दी और जो रस्सा केवल दो व्यक्तियों के लिए था, उसी पर हम तीन दक्षिण शिखर पर चढ़ने लगे। अभी तक कभी भी एक रस्से पर तीन व्यक्तियों ने एवरेस्ट की चढ़ाई नहीं की थी। दो व्यक्तियों के साथ एक रस्से पर चढ़ना तीन व्यक्तियों की अपेक्षा कहीं सरल होता है। इसलिए हमारी आगे बढ़ने की रफ्तार काफी कम हो गई। हम पर चारों तरफ से हवा के थपेड़े पड रहे थे। कई दफा हवा के साथ दक्षिण शिखर से बहुत-सी बर्फ आकर हमारे चेहरों से टकराती, लेकिन चूंकि हमारे चेहरे आक्सीजन के मुखपटों से और आंखें चश्मों से विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा था। हम धीरेधीरे ऊपर चढते चले गए। हम मशीन की तरह एकएक कदम आगे बढ़ रहे थे। दो कदम चढ़ने के बाद हम दो या तीन मिनट रुककर आराम करते। हमारे भीतर कोई आवाज मानों बार-बार यह कह रही थी-''तुम हट नहीं सकते, तुम्हें चढना ही है, तुम्हें सफल होना ही है! '' धीरे-धीरे बहुत सतर्कतापूर्वक हमने दक्षिण शिखर के बड़े-बड़े पत्थर पार किए। हम एकदम सीधे शिखर पर नहीं पहुंचे और शिखर से ७० फुट नीचे बायीं ओर मुड़ गए। इसमें बहुत वक्त लगा क्योंकि एक बार में एक ही व्यक्ति चल सकता था। जब एक चलता तो अन्य दोनों सम्भालकर रस्से को थामे रहते। अब हम एक संकरी गली में पहुंच गए जिसे मैंने 'इडियाज डेन' नाम दिया। यह गली दक्षिण कोल से 'हिलेरी की चिमनी' के बीच है। यहां पहुंचकर हम बहुत प्रसन्न हुए। यह स्थान हवा की ओट में था। जगह इतनी ही थी कि हम तीनों खड़े हो सकें। फू दोरजी ने एक बोतल निकाली जिसमें फलों का रस था। इसे हम सबने पिया। रस पहुंचते ही शरीर में मानो नवजीवन कासंचार होने लगा। यहीं हमने आक्सीजन की बोतल खोलकर देखी तो पाया कि आधी बोतल अभी भरी हुई थी। लेकिन अब हमने तक नईबोतल से आक्सीजन लेना शुरू कर दिया जिससे हम शिखर तक पहुंचकर यहां तक लौट भी सकते थे। ईश्वर न करे, अगर इससे पहले ही आक्सीजन खत्म हो जाय तो बचने का कोई रास्ता नहीं था। हमने फलों के रस की बोतल यहीं छोड़ दी। जिससे बेकार वजन न ढोना पड़े। हम बिलकुल हलके होकर ही आगे बढना चाहते थे। अब मुझे सबसे बड़ी चिन्ता 'हिलेरी की चिमनी' की थी क्योंकि पहले के विवरणों के अनुसार शिखर के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा थी। लगभग '३० फीट एक सीध में नीचे उतरकर हम कुछ चट्टानों तक पहुंचे। यहां से एक संकरा-सा रास्ता चिमनी तक जाता था। दक्षिण की ओर बर्फ के बड़े-बड़े ढेर थे और हमें बड़ी कुशलता से उन पर कदम रखे बिना आगे बढ़ जाना था। उन्हें देखकर डर लगता था। बीच में चल रहे रावत ने जिम्मा लिया कि हम दक्षिण की ओर न जाएं और हमारे कदम चट्टानी हिस्से पर ही पड़ते रहें। यहां कुछ बहुत बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं जो नीचे से ढीली भी थीं। कई बार हमें कूदकर एक से दूसरी चट्टान पर जाना पड़ता। इन चट्टानों के बीच से नीचे की ओर नजर डालते ही हम थर्रा उठते-नीचे आठ से दस हजार फुट तक गहरे गार थे। अब हम 'हिलेरी की चिमनी' के ठीक नीचे पहुंच गए। इसी बाधा का मुझे सबसे अधिक डर था। हर पर्वतारोही इस चिमनी से परिचित है, जो चट्टान और बर्फ के ढेर के बीच चालीस फुट ऊंची खड़ी है। चट्टान पर हाथ या पैर जमाने की कोई जगह नहीं है और बहुत ज्यादा चिकनी होने के कारण यह बहुत बड़ी समस्या है।

मैंने कोशिश की कि हाथ रखने की कोई जरा-सी भी जगह पा जाऊं, पर मुझे कुछ नहीं मिला। बर्फ के ढेरों के कारण दक्षिण की ओर से इसे पार करना बहुत खतरनाक था। बाई ओर और भी ढलवां चट्टानें थीं, जिन्हें पार करना लगभग असंभव था। फू दोरजी ने इस पर चढ़ने की कुछ कोशिश की पर वह बार-बार फिसलता ही रहा। तब उसने चट्टान में बर्फ की कुल्हाड़ी की मदद से छेद करने की कोशिश की और उसके सहारे ऊपर चढा। वह जमी हुई बर्फ में अपने जूतों की कीलें गाड़ देता और कुल्हाड़ी की मदद से शरीर का वजन संतुलित करते हुए अचानक कुल्हाड़ी को घुमाकर ऊपर दीवार में गाड़ देता और इस तरह ऊपर चढ जाता। रावत उसे सहारा दिए था। फू दोरजी तनिक-सा भी फिसलता तो हम तीनों नीचे आ रहते, क्योंकि तीनों एक ही रस्से से बंधे हुए थे। आखिरकार फू दोरजी बिलकुल ऊपर पहुंच गया और हमें दिखाई देना बंद हो गया। वह चिमनी की चोटी पर पहुंच गया था। रावत चट्टान पर फिसल रहा था और उसे तथा उसके बाद मुझे फू दोरजी ने ऊपर खींच लिया। यहां भी बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं और जैसे ही हमने उन पर पैर रखा, वे हिलने लगीं। इस बाधा को पार करने में हमें बीस से तीस मिनट लगे होंगे। अब हम बर्फ के एक चबूतरे पर थे और वहां हम कुछ देर सुस्ताने के लिए रुके। यहां से आगे ढलान कुछ कम होते गए और पहले की ही तरह बायीं ओर चट्टान और दाईं ओर बर्फ थी। पहाड़ी अभी खत्म नहीं हुई थी। इस पर चट्टान या बर्फ के या दोनों के मिले-जुले बड़े-बड़े टुकड़े थे। ये टुकड़े एक के बाद एक सामने आते चले जाते। हम एक टुकडे से गुजरते कि दूसरा उस से भी बड़ा सामने आ जाता। चिमनी पार करके हम यह सोचकर खुश हो रहे थे कि अब हम शिखर के बिलकुल पास आ गए हैं लेकिन पहाड़ी का यह टुकड़ा खत्म होने में ही नहीं आ रहा था और हमारा संघर्ष अधिक कठिन होता जा रहा था। सांस लेना भी पहले से अधिक मुश्किल हो गया था। मैं गहरी सांस लेने की कोशिश करता लेकिन वह हिचकी बनकर टूट जाती। चढ़ाई क्या कभी खत्म नहीं होगी? अब हर कदम बहुत ही थका देने वाला साबित हो रहा था। बर्फ और चट्टानों के टुकड़े एक के बाद एक आते जा रहे थे। मैंने सोचा हमें कब तक और चढते रहना पड़ेगा। स्थिति यह थी कि मेरे मन और शरीर ने जवाब दे दिया था। लेकिन भीतर कहीं से यह भी आवाज उठ रही थी कि हमें आगे बढ़कर चढ़ाई पूरी करनी ही है। शिखर अब अधिक से अधिक 50 फुट और रहा होगा। लेकिन ढाल खत्म होने में ही नहीं आ रहा था। लग रहा था जैसे इसका कभी अंत ही नहीं होगा। पर तभी, अचानक, अंत सामने आ गया। अब बर्फ के ढेर सामने नहीं थे-हम से जरा ही ऊपर एक छोटी सफेद घुमावदार मेहराब-सी थी-और यही एवरेस्ट का शिखर था।

हम चोटी तक पहुंच रहे थे। परस्पर बांहें डालकर हम कुछ फुट और ऊपर चढ़कर शिखर के बिलकुल अंतिम भाग तक पहुंच गए। अब हमें और चढना नहीं था। आक्सीजन के मुखपटों और बर्फ के टुकड़ों से चेहरे बिलकुल ढके होने पर भी हम एक-दूसरे से अपनी प्रसन्नता छिपा नहीं सके। हमने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और गले मिले-तथा एक दूसरे की पीठ जोर-जोर से ठोंकी। पिछले दल द्वारा गाड़ा हुआ तिरंगा झंडा हालांकि फट गया था, लेकिन गर्व से अभी तक लहरा रहा था। इधर-उधर पिछले अन्य दलों के झण्डे तथा निशानियां भी पड़ी हुई थीं। कड़ाके की सर्दी थी। अचानक हवा रुक गई। हमने इसे धरती मां का विशेष उपहार माना। हमने

घूमकर चारों ओर लम्बी नजर डाली। हमें मकालू, ल्होत्से तथा नुप्त्से के शिखर दिखाई दिए और दूर क्षितिज पर छोटो-मोटी चोटियों के अतिरिक्त कंचनचंगा का शिखर भी दिखाई दिया। यह सब चोटियां हमसे नीचे ही थीं। चारों ओर पहाड़ियां, चट्टानें, ग्लेशियर, हिमपात और घाटियां दिखाई दे रहे थे। हमने उत्तर की ओर तिब्बती पठार पर एक नजर डाली और फिर दक्षिण की ओर भारत के मैदानों की तरफ देखा। कुछ दूर पर आइने की तरह चमकता और सबेरे की धुंध में तैरता व्यांगबोचे मठ दिखाई दिया। यह दृश्य अविस्मणीय था। संसार की इस छत पर खड़े होकर और अपने नीचे मीलों दूर तक देखते हुए मेरे मन में जो भावनाएं उठीं उनमें सबसे प्रमुख भावना विनय की थी। मेरा रोम-रोम यह कह रहा था-ईश्वर की कृपा है कि चढ़ाई समाप्त हो गई। मुझे एवरेस्ट की चढ़ाई करने वाले उन सब आरोहियों की याद आयी जो मुझ से पहले यहां आ चुके थे और मेरे बाद यहां आएंगे। मैं शिखर छूने वाले ब्रिटिश, स्विस, अमेरिकी और अपने ही देशवासी आरोहियों के बारे में सोचने लगा। मुझे उन कुछ लोगों की याद आई जो इस शिखर तक पहुंचने में सफल रहे, और उन बहुत से लोगों को भी याद आई जिन्होंने प्रयत्न तो किया परन्तु सफल नहीं हो सके। रावत ने झुककर शिखर पर दुर्गा की एक मूर्ति रखी और उसके सामने जरा-सी धूप जलाई। मैंने गुरु नानक का एक फोटो और माला रखी। फ दोरजी ने चांदी का एक लाकेट रखा जिसमें दलाई लामा का फोटो लगा हुआ था। उसने भेंट स्वरूप चाकलेट, बिस्किट, मिठाइयां आदि भी रखे। मैं ठीक दस बजे शिखर पर पहुंच गया था। आक्सीजन खत्म हो रही थी, इसलिए मैंने बिना समय नष्ट किए फोटो खींचने शुरू कर दिए। मूवी कैमरा निकाला तो पता लगा कि वह काम ही नहीं कर रहा है। इससे हमें बड़ी निराशा हुई। फिर मैंने दूसरे निकन कैमरे से चारों ओर के बहुत-से फोटो खींचे। इनमें सबसे प्रमुख फोटो तिब्बत में रंगबुक ग्लेशियर का था। मैंने उत्तरी पहाड़ी और उत्तरकोल की ओर दृष्टि डाली। इसी रास्ते से १९२० तथा १९३० के बाद के आरंभिक अभियान दल चढ़े थे। फिल्म शीघ्र हो खत्म हो गई। फौरन कुछ फीट नीचे की ओर हटकर और झुककर मैंने दूसरी फिल्म चढ़ाई। फिल्म चढाने में मुझे बड़ी कठिनाई हुई और मेरी उंगलियां सुन्न पड़ गयीं।

फिल्म चढाकर मैं फिर ऊपर आया, तब तक फू दोरजी ने थैले से गर्म काफी निकाल ली थी। अकेले उसी ने यहां तक काफी का फ्लास्क लाने का जिम्मा लिया था जिसकी यहां हमें बहुत जरूरत थी। अपने इस सरल और निस्वार्थ साथी के प्रति मेरा मन उमड़ उठा।

शिखर पर हमारा समय सपने की तरह बीत रहा था। अब तक हमें यहां आधे घण्ठे से ज्यादा गुजर चुका था और अब धरती माता को प्रणाम करके वापस लौटना था। यह सोचते ही मैं बहुत उदास हो गया। मेरी उदासी का क्या यह कारण था कि चढ़ाई की जो सबसे बड़ी ऊंचाई है, उसे मैंने छू लिया था और इससे बड़ी कोई ऊंचाई चढ़ने को नहीं रह गई थी?

हमने उतरना शुरू किया तो मुझे याद आया कि आज 29 मई है'। आज से बारह साल पहले १९५३ में आज के ही दिन और लगभग इसी समय हिलेरी और तेनजिंग पहली बार यहां चढ़ पाने में सफल हुए थे। शिखर की पहाड़ी और 'हिलेरी की चिमनी' होकर हम नीचे उतरने लगे। अब तीस फीट की चढ़ाई सामने आई। हमने दक्षिण शिखर पार किया। 'इंडियाज डेन' पहुंचकर हमने आक्सीजन की बोतलें बदलीं। अचानक मुझे ज्ञात हुआ कि मेरी बोतल में बहुत ही कम दबाव आक्सीजन है। यह चिंता की बात थी क्योंकि आखिरी कैम्प तक पहुंचने से पहले बोतल की आक्सीजन खत्म हो जानी थी। इस वक्त दोपहर के सवा बजे थे और हम येलो बैण्ड की डगमगाती चट्टानों को पार कर रहे थे। मेरी आक्सीजन खत्म हो रही थी और सांस लेना मुश्किल होता जा रहा था। मेरे कदम धीमे होते जा रहे थे। मैं हांफने लगा। हवा की गरज भी बढ़ती चली जा रही थी। 'रेजर्स एज' पर आकर मेरी आक्सी- जन बिलकुल खत्म होगई। मैं बुरी तरह हांफने लगा। मेरे चश्मे पर बर्फ जम गई थी। पैर सीसे की तरह भारी हो गए थे। धीरे-धीरे हाथ भी सुन्न पड़ते चले गए। मुझे बहुत भय भी लगा ।सांस लेने के लिए मैं तड़प रहा था और मुझे लग रहा था कि मेरे फेफड़े फट जाएंगे। 'रेजर्स एज' को घुटनों के बल और कभी-कभी बिलकुल पेट के बल गिरकर रेंगते हुए मैंने पार किया। यहां से अंतिम कैम्प के तम्बू दिखाई देने लगे। हमने सहायता के लिए बोगी को आवाजें दीं लेकिन कोई जवाब नहीं आया। बोगी पहले ही नीचे जा चुका था। रेंगते हुए किसी प्रकार हम अंतिम कैम्प पर पहुंचे।

दोपहर बाद 3.30 बजे हम वहां पहुंच गए। बोगी यहां आक्सीजन के दो सिलेण्डर छोड़ गया था। यह उसकी ओर से एक बहुत ही निस्वार्थ कार्य था क्योंकि उसने अपने हिस्से की आक्सीजन का हमारे लिए त्याग किया था। मैं नहीं जानता कि आक्सीजन के बिना और बिलकुल अकेले उसने अपने नीचे की यात्रा किस प्रकार पूरी की होगी। पहाड़ों पर सहयोग और मित्रता ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तुएं हैं। आप उस व्यक्ति को नहीं भूल सकते जो चढ़ने में आपके साथ रहा। पर्वत हमें यही शिक्षा देते हैं।

फू दोरजी ने स्टोव जलाया और फलों का रस ' गर्म किया। यह रस हमने पिया। हमारे पास चूंकि आक्सीजन की बड़ी कमी थी, इसलिए हमने तुरन्त नीचे के लिए चल पड़ने का फैसला कर लिया। अंतिम कैम्प छोड़ते हुए हम अपने साथ कुछ भी नहीं ले गए। खाने-पीने की सब चीजें हमने यहीं छोड़ दीं। इस कैम्प ने हमारा बड़ा साथ दिया था। हमने उस की ओर आखिरी नजर डाली और नीचे की ओर चल पड़े।

हम करीब घण्टे भर चले होंगे कि मेरी आक्सीजन ने लीक करना शुरू कर दिया। मुझे रेग्युलेटर से उसके निकलने की आवाज भी सुनाई देने लगी। पन्द्रह मिनट में सिलेण्डर बिलकुल खाली हो गया और उसे फेंक देना पड़ा। इसके बाद मेरी रपतार इतनी कम हो गई कि मुझे लगने लगा कि मैं दक्षिण कोल कभी नहीं पहुंच सकूंगा। मेरे सामने बर्फ का विशाल पठार था जिस पर डूबते सूर्य की किरणें गिरकर चारों ओर बिखर रही थीं। मेरे पैरों ने चलने से इन्कार कर दिया। मैं आगे बढ़ने की कोशिश करता था लेकिन पैर हिल ही नहीं रहे थे। फू दोरजी और रावत भी, जो मेरी बाजुएं पकड़कर कुछ दूर तक मुझे ले आए, अब थक गए थे। लकड़ी, के कुन्दों की तरह हम तीनों नीचे गिर पडे।

हवा बढ़ रही थी और अंधेरा होता जा रहा था। बर्फ में गड्ढा कर के रात वहीं बिताने के अलावा हमारे सामने कोई चारा नहीं था। बच पाने का यही उपाय था। हवा बहुत तेज थी। हमारे पैर सुन्न पड़ चुके थे। सांस लेने के लिए हमारे पास आक्सीजन बिलकुल भी नहीं बची थी। बर्फ में गड्ढ़ा करने लायक ताकत भी नहीं रही थी। अंधेरा हो चुका था। हम बारह से तेरह घण्टे तक बिना आराम किए लगातार चलते रहे थे। हमारे पास कोई आधा कप काफी और आधा कप फलों का रस था। पानी बिलकुल भी नहीं था। हम थक तो चुके ही थे, हमारे शरीर का जल भी समाप्त हो चुका था।

नीचे बैठकर हमने गड्ढा खोदना शुरू किया। मै कुल्हाड़ी से बर्फ पर चोट करता लेकिन एक खरोंच से ज्यादा खुदाई न होती। हमारी शक्ति बिलकुल खत्म हो गयी थी। हम मूर्च्छित होकर गिरने ही वाले थे कि मैंने किसी को टार्च हाथ में लिए अपनी ओर आते देखा। यह मानो एक चमत्कार था। यह पेम सुन्दर शेरपा था जो गर्म फलों के रस का एक बड़ा थर्मस लिये चला आ रहा था। उसे देखते ही हम सब में जान पड़ गयी।

आठ बजे हम तम्बू के भीतर घुसे। मुझमें इतनी ताकत भी नहीं थी कि अपने सोने के थैले में घुस पाता। सारी रात तम्बू के चारों ओर हवा गरजती रही। मैं चूंकि बिलकुल बहुत थक चुका था और मेरे शरीर का जल समाप्त हो चुका था, इसलिए मुझे बहुत अजीब सपने दिखाई दिए। मुझे लगा जैसे रावत मेरी हत्या किए डाल रहा है। मैं तम्बू फाड़ डालता हूं और लड़खड़ाता हुआ बाहर निकलकर आक्सीजन को पुरानी बोतलें इकट्ठा करता फिर रहा हूं। मैं सारी रात पागल को तरह बोतलें इकट्ठा करता रहा और उनकी बची-खुची आक्सीजन पीता रहा।

दूसरे दिन सबेरे कुछ शेरपा दक्षिण कोल का यह कैम्प बंद करने आए तो उन्होंने मुझे जगाया। मेरे भीतर चूंकि बिलकुल भी शक्ति नहीं रह गई थी, इसलिए वे ही मेरे बूट और दूसरी चीजें पहनाकर मुझे ले चले। पौने दस बजे हम कैम्प-4 पहुंचे। यहां मैंने फलों का रस, काफी और सूखे मेवों का नाश्ता किया। रावत और फू दोरजी मुझसे आगे चल रहे थे। दोपहर बाद साढ़े तीन बजे के लगभग हम अगले बेस कैम्प के समीप पहुंचे। सब लोग तंबुओं से बाहर निकल आए। वे सब खुशी से चिल्लाए और हमें गले लगाने लगे। रसोई घर का तंबू खाने-पीने की सामग्री से भरा-पूरा था। मोहन ने मुझे कुछ ब्राण्डी दी। शाम को जब हम भोजन के लिए बैठे, हमारी सफलता का समाचार आकाशवाणी द्वारा प्रसारित किया जा रहा था। उस घटना के बारे में, जो अब स्वप्न सी लग रही थी, समाचार सुनकर हम बहुत रोमांचित हुए। हमारी सफलता के कारण तम्बू का हर व्यक्ति संतुष्ट और प्रसन्न दिखाई दे रहा था। इससे हमारे देश की प्रतिष्ठा तो बढ़ी ही थी, इसने पर्वतारोहण के मानचित्र पर हमें संसार के अन्य देशों से बहुत आगे खड़ा कर दिया था। शिखर पर एक के बाद एक कई व्यक्ति भेजकर हमने विश्व का रिकार्ड तोड़ दिया था। इसके अलावा तीन व्यक्तियों को एक साथ शिखर पर भेजकर भी नया रिकार्ड स्थापित किया था। किसी देश को यह कर पाने में अभी बहुत समय लगेगा।

अब जब मैं इस महान सफलता की ओर नजर ' डालता हूं तो ' मुझे लगता है कि इसमें दल के सदस्यों की सहयोग भावना तथा कठिन श्रम के अलावा सौभाग्य का भी कुछ योग था। हमारे शेरपा बहुत ही अच्छे थे। जिन उपकरणों का हमने इस्तेमाल किया, वे भी प्रथम श्रेणी के थे। एवरेस्ट की चढ़ाई केवल शारीरिक चढ़ाई नहीं होती, इसमें अन्य बातों का भी योग होता है। जो व्यक्ति चढ़ाई पूरी कर आता है, वह लौटकर एक दूसरा ही व्यक्ति बन जाता है। पहाड़ी से उसे बहुत कुछ प्राप्त होता है। इस विशाल संसार में उसे अपनी लघुता का भान होने लगता है। मनुष्य का मन भी एवरेस्ट के समान ही है। इसमें चोटियां और बहुत गहरे गड्ढे दोनों ही हैं।

हममें से हर एक को अपने इस एवरेस्ट पर चढना पड़ता है। अगर हमें अपने भीतर और जो काम हम कर रहे हैं, उस पर पूरी आस्था हो तो अपने दैनिक जीवन में इस एवरेस्ट पर चढना हमारे लिए कठिन नहीं होता।

समाप्त

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान

(भाग - 3)

पिछले अंक से जारी...

थ्यांगबोचे में हम पांच दिन रुके। इस बीच हम पहाड़ों पर चढ़ने का अभ्यास करते रहे और अगल- बगल की छोटी चोटियों पर चढे। इन अभ्यासों से हमारे

शरीर बहुत सुदृढ हो गए और 18 मार्च को सुबह हम अपने बेस कैम्प के लिए चल पड़े। रास्ते में पांगबोचे नामक एक और गांव आया। इस गांव में एक गुंबा है। गुंबा का अर्थ मंदिर होता है। इस गुंबा में हमने येटी के हाथ और खोपड़ी रखे देखे। येटी उस हिम- मानव को कहते हैं, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि वह बर्फ में रहता है, परंतु जिसे अभी तक किसी ने देखा नहीं है। रात को हम फेरिचे में ठहरे। यह उस क्षेत्र का नाम है, जहां गर्मी के दिनों में खेती की जाती है। यहां आलू और जौ बोये जाते हैं। आलू बहुत मीठे होते हैं और उन्हें उबालकर बहुत-सी मिर्च के साथ खाया जाता है। दूसरे दिन हम कुछ मुलायम- सी बर्फ पर चलते हुए लोबुजे पहुंचे जो 16450 फीट की ऊंचाई पर है। यह शायद दुनिया का सबसे ज्यादा ऊंचा चरागाह है।

दूसरे दिन हम गोरक शेप पहुंचे जहां एक बड़ी झील है। झील सूखी हुई थी और हम उस पर चले। कुछ दूर चलने के बाद हम खुम्बू ग्लेशियर के नीचे पहुंचे। दो घण्टे और चलने के बाद हमने एक छोटी- सी घाटी में प्रवेश किया। इस घाटी में जगह-जगह नीली बर्फ के इतने ऊंचे स्तूप थे मानो कई मंजिली इमारतें हों। इसे 'फैन्टम ऐली' ( भूतों की गली ) कहा जाता है।

बाइस मार्च को हम एक समतल जगह पर पहुंचे, जहां बहुत-सी चट्टानें भी थीं। यही हमारा बेस कैम्प था और इसकी ऊंचाई 17800 फीट थी। अगले दो दिन हम कैम्प व्यवस्थित करने के काम में लगे रहे। अधिकांश तंबू पत्थरों पर ही गाड़ने पड़े क्योंकि समतल जगह बिलकुल भी नहीं थी। यहां बहुत सख्त सर्दी थी और तेज हवा चल रही थी। कैम्प के एक ओर रसोई घर बनाया गया और दूसरी ओर सदस्यों के लिए तथा सामान के लिए तंबू गाडे गए। कैम्प में बहुत शोर- शराबा था। रात दिन ऐवेलांश आते रहते थे। यहां से ऊपर चढ़ाई का रास्ता निश्चित करने की योजनाएं बनाई गईं। सदस्यों को तीन दलों में बांटा गया। पहला दल 25 मार्च को बेस कैम्प से निकला और खुंबू क्षेत्र में रास्ता बनाने के काम में जुट गया। यहां बर्फ गिरती रहती है और ऐसे क्षेत्र में रास्ता बनाने के काम में एक से तीन हपते तक लग जाते हैं। एवरेस्ट के मार्ग पर यह पहली बड़ी बाधा है। चढ़ाई दल क्रैम्पन प्वाइंट नामक स्थान तक जाता है। यहां से आरोही क्रैम्पन ( बूटों के नीचे लोहे का कीलदार तला ) पहन लेते हैं, जिनके बिना बर्फ पर चढना संभव नहीं होता। इस जगह से आगे सर्वत्र बर्फ पड़ी होती है। क्रैम्पन पहने बिना आदमी फिसलकर बर्फ के बीच बनी बड़ी-बड़ी दरारों में गिर जा सकता है। ये दरारें पचास से पांच हजार फीट तक गहरी होती हैं। कई दरारें चालीस फीट तक चौड़ी होती हैं।

हमारे साथ सुनहरे रंग का एक छोटा-सा कुत्ता था। इसे हम 'टाइगर' कहते थे। यह कुत्ता एक गांव से हमारे साथ हो गया था। यह क्रैम्पन प्वाइंट पर हमें आगे जाने के लिए विदा करता और जब हम यहां लौटते तो हमारा स्वागत करता। शुरू में उसने क्रैम्पन प्वाइंट से आगे भी हमारे साथ जाने की कोशिश की परंतु वह फिसल-फिसल जाता था, इसलिए वह यही ठहर गया और उसने आगे बढ़ने का प्रयत्न छोड़ दिया। लेकिन यह कुत्ता बड़ा सख्त था और खुले में सोता था। बर्फ से उसे कोई परेशानी नहीं होती था। किसी गांव से अगर कोई कुत्ता आपके साथ हो जाय और बेस कैम्प पर ठहरा रहे तो अभियान दल के लिए यह भाग्यसूचक चिह्न माना जाता है।

इससे पहले आइसफोल को पार करना असंभव' माना जाता था। इसलिए इसे 'एटम बम क्षेत्र' 'हिलेरीज टेरर' आदि डरावने नामों से पुकारते थे। आइसफोल में चलना बहुत खतरनाक होता है। आपके ऊपर बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े गिर सकते हैं और आपके सामने अचानक बड़ी-बड़ी दरारें खुल या बंद हो सकती हैं। १९६३ के अमेरिकी अभियान में जान ब्रीटेनबॉक नामक आरोही एक दरार में गिरकर मर गया था। एक जापानी अभियान दल के छ: सदस्य इसमें काम आ गए। हमारे अपने अभियान में एवरेस्ट तक हमारे साथ जाने वाला सदस्य फू दोरजी कुछ समय बाद एक जापानी अभियान दल के साथ जाता हुआ यहीं दुर्घटना- ग्रस्त होकर मर गया।

दल के दो-दो सदस्य दो या तीन रस्सों के साथ बंधकर चलते हैं। ये रस्से को कमर से बांध लेते हैं। इससे उन्हें सुरक्षा प्राप्त होती है। एक रस्से में बंधे हुए दो या कभी-कभी तीन सदस्य मिलकर 'रस्सी' ही कहलाते हैं। ये रस्से बारी-बारी से हिमपात पर रास्ता बनाते हैं। हम दस दिन के भीतर आइसफोल पर रास्ता बना सके,यह हमारे लिए सौभाग्य की बात थी। उसके दूसरे सिरे पर, जो २०,००० फीट की ऊंचाई पर था, कैम्प-१ स्थापित किया गया। अगले हफ़्ते हम इस कैम्प-१ तक सामान पहुंचाने का काम करते रहे। यह जगह बहुत सुरक्षित नहीं थी, और यहां हम ज्यादा नहीं ठहरना चाहते थे। हालांकि जगह काफी समतल थी, पर यहां एवेलांश बहुत तेजी से आते थे और दरारें भी बहुत तेजी से बनती-बिगड़ती थीं। मुझे याद है-एक तम्बू के नीचे की बर्फ अचानक बैठ गई और सदस्य उसमें फट से गिर पड़े।

कैम्प-१ के आगे का रास्ता ज्यादा साफ और समतल था और हमें कैम्प-२ लगाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। २१,३०० फीट की ऊंचाई पर स्थापित यह कैम्प बहुत ही सुरक्षित था। यहां चारों तरफ निस्तब्धता थी। इस कैम्प को बाद में अगले बेस कैम्प का नाम दिया गया और हमारा सारा काम-काज यहीं से संचालित होने लगा।

यहां से हमारे दल और भी आगे चले। 6 अप्रैल को 22300 फीट की ऊंचाई पर कैम्प-3 स्थापित किया गया। इतनी ऊंचाई पर बराबर काम करते रहना बहुत कठिन होता है। इस क्षेत्र में आक्सीजन की बड़ी कमी होती है। आप जितना ऊंचे चढते जाएंगे, आक्सीजन की कमी उतनी ही अधिक होती जायेगा। इस क्षेत्र में हमने आठ-दस दिन तक लगातार काम किया था, इसलिए अब हम आराम करने लगे। कैम्प-३ के आगे रास्ता बनाने का काम दूसरे दल ने आरंभ किया। इस बीच सभी कैम्पों में खाने-पीने का सामान तथा जरूरी चीजें इकट्टी की जाती रहीं।

यहां से 'ल्होत्से फेस' नामक क्षेत्र आरंभ होता है जो एवरेस्ट चढ़ाई की दूसरी प्रमुख बाधा मानी जाती है। ल्होत्से का दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में चौथा स्थान है। इस पहाड़ के ग्लेशियर पर रास्ता बनाना पड़ता है। पहाड़ बिलकुल सीधा खड़ा है। बर्फ नीली और बहुत ही सख्त है, जिससे उसमें पैर रखने का स्थान काटना कठिन होता है। २५,००० फीट ऊंचे ल्होत्से पहाड़ की चोटी की ओर न जाकर हम बायीं ओर मुड़ गए। यहां हमने कैम्प-4 बनाने का विचार किया। तेज हवाओं के बावजूद गोम्बू और उसका दल मेहनत से काम करते रहे। यह दल आक्सीजन का प्रयोग करते हुए चार दिन में रास्ता बना पाने में सफल हो गया। इसके बाद ग्यात्सो और उसके दल ने जेनेवा स्पर' तक रास्ता बनाने का कार्य आरंभ किया। 20 अप्रैल तक साउथ कोल का अगला कैम्प स्थापित हो गया और सामान भी यहां पहुंच गया। साउथ' कोल दो पहाड़ों के बीच को निकली जगह का नामे है। इसके एक ओर ल्होत्से और दूसरी ओर एवरेस्ट शिखर हैं। इस जगह हवाएं बहुत ही तेज रपतार से निरंतर चलती रहती हैं। हवा इतनी तेज होती है कि वे आदमी को उड़ाकर कहीं का कहीं ले जा सकती है। यहां रात को सोना तो कठिन होता ही है, सांस लेना और खाना भी कठिन होता है।

अपनी प्रगति से हम बड़े संतुष्ट थे। साउथ कोल तक इतने कम समय में अब तक किसी भी अभियान दल ने रास्ता नहीं बनाया था। अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक हमने यह काम कर लिया। 27 अप्रैल को शिखर पर चढ़ाई करने वाले दल अगले बेस कैम्प से चले। कैम्प3 पर उन्होंने पड़ाव नहीं किया। कैम्प पर पहुंच कर वे रात को सोए और 28 अप्रैल को दक्षिण कोल पहुंच गए। 29 अप्रैल को ये शिखर दल आखिरी कैम्प की यात्रा करने को तैयार थे, परंतु मौसम खराब हो जाने के कारण वे दो दिन तक वहीं रुके रहे। उन्हें आशा थी कि मौसम ठीक हो जाएगा, परंतु आकाशवाणी ने दोपहर बाद यह सूचना हमें दे दी कि आगे का मौसम बहुत खराब रहेगा। समय बिलकुल नहीं था। यह कैम्प बंद करना पड़ा और सदस्यों से कहा गया कि वे जल्दी से जल्दी बेस कैम्प पर वापस लौट जाएं। आकाशवाणी की सूचना सही निकली। वापस लौटते हुए दल के सदस्य मौसम के शिकार हो गए और बड़ी कठिनाई से बिलकुल थके-मांदे किसी प्रकार वहां तक पहुंचने में सफल हुए।

१ मई तक अभियान दल के सभी सदस्य बेस कैम्प पर इकट्ठे हो गए। पहले प्रयास में असफल हो जाने पर भी हम उदास नहीं थे क्योंकि हम जानते थे कि मौसम ज्यादा दिन बुरा नहीं रहेगा और हम फिर एवरेस्ट पर चढ़ने का एक और प्रयत्न कर सकेंगे। ज्यादा ऊंचाई पर यद्यपि मौसम खराब था, परंतु बेस कैम्प पर मौसम काफी अच्छा था। लेकिन हमने ढील नहीं बरती और काम करते रहकर अपना स्वास्थ्य ठीक बनाए रखा। कुछ सदस्य पड़ोस की चोटियों पर चढ़ने का अभ्यास करते रहे।

चौदह दिन बाद मौसम कुछ सुधरा। आकाशवाणी ने मौसम के संबंध में जो सूचनाएं दीं उनसे हमें बड़ा उत्साह मिला। हमें लगा कि शिखर पर चढ़ने का फिर से प्रयत्न करने का समय आ गया है।

१६ मई को पहले चढ़ाई दल ने ऊपर चढ़ना शुरू किया। इसमें चीमा और गोम्बू थे। उन्हें खुंबू आइसफोल पार करने में काफी कठिनाई हुई, क्योंकि हमारे बनाए रास्ते का बहुत-सा भाग इस बीच बिलकुल टूट गया था। लेकिन आगे के रास्ते पर हमें कोई कठिनाई नहीं हुई और ये १८ मई को साउथ कोल पहुंच गए। 19 मई को आक्सीजन लगाकर ये लोग आखिरी कैम्प के लिए निकले। फू दोरजी और दूसरे

शेरपा इस दल की सहायता कर रहे थे। ये लोग आखिरी शिविर पर सामान पहुंचाकर लौट आए। यह २८,००० हजार फुट तक गोम्बू और चीमा के साथ रहे, इसके आगे अंतिम चढ़ाई का पूरा प्रयत्न उन्हें खुद करना था। 28 मई के सबेरे पांच बजे गोंबू और चीमा शिखर के लिए चले।

चढ़ाई-अभियान को ठीक से संचालित करने के लिए कुछ निरीक्षण चौकियां भी स्थापित की गई थीं। एक चौकी बेस कैम्प पर थी, दूसरी अगले बेस कैम्प पर और तोसरी कैम्प-4 पर थी। मौसम अच्छा होने के कारण इन चौकियों से शिखर की ओर बढ़ रहे दोनों सदस्यों का अच्छी प्रकार निरीक्षण किया जा सकता था। गोंबू और चीमा निरंतर आगे बढ़ते हुए 9-30 बजे के लगभग शिखर पर जा पहुंचे। भारतीय एवरेस्ट अभियान दल के लिए यह एक महान विजय थी। यह समाचार तुरंत दिल्ली भेज दिया गया क्योंकि बेतार के तार द्वारा हमारा उनसे सम्पर्क स्थापित था। रात को ९ बजे जब आकाशवाणी से यह समाचार प्रसारित किया गया, तो सभी भारतवासी रोमांचित हो उठे। इसी बीच सोनम ग्यात्सो और सोनम वांग्याल का दूसरा दल शिखर छूने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन वे १४० किलोमीटर फी घण्ठै की रपतार से चल रही तेज हवा में फंस गए। हवा ने उन्हें इस बुरी तरह झक- झोर दिया कि वे कैम्प की वापसी का रास्ता ही भूल गए। लेकिन वे संघर्ष करते रहे और बिलकुल शाम होने पर थकान से चूर कैम्प पर पहुंचे। कैम्प के बाहर ही वे अचेत होकर गिर पड़े। सोनम ग्यात्सो अल्ट्रा- वायलट किरणों से बुरी तरह जल गया था। लेकिन यह सब तकलीफ सहन करने के बाद भी दोनों सोनम बाईस मई को शिखर छूने के लिए फिर चले। आज भी हवाएं बड़ी तेज थीं लेकिन दोपहर बाद वे शिखर पर जा पहुंचे और छ: बजे शाम तक आखिरी कैम्प में वापस भी लौट आए।

वोहरा और अंग कामी का तीसरा दल २४ मई को सबेरे पांचे ग्यारह बजे शिखर पर पहुंच गया। वोहरा ने शिखर पर पहुंच कर कुछ बहुत अच्छे फोटो भी खींचे।

अब चौथा दल शिखर पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ, जिसमें मैं भी था। इस समय तक हमारे पास आक्सीजन का भण्डार बहुत 'कम रह गया था इसलिए, हमें डर था कि यह अंतिम दल शायद शिखर तक पहुचने में सफल न हो सके। अगले अध्याय में मैं अपनी शिखर-यात्रा का वर्णन विस्तार से कर रहा हूं।

शिखर पर मैं

एवरेस्ट पर्वत संसार का सबसे ऊंचा पर्वत-शिखर है। यह समुद्र से 29028 फुट-लगभग 5-1/2 मील ' ऊंचाहै। यह हिमालय पर्वतमाला के बायें भाग में स्थित है। इसके उत्तर में तिब्बत है तथा दक्षिण में नेपाल। ' पहले इस पर्वत के संबंध में लोगों को अधिक 'जानकारी नहीं थी। इसके अडोस-पडोस में रहने वाले तिब्बती और नेपाली ही जानते थे कि यह एक बड़ा विशाल पर्वत है। तिब्बती इसे' चोमोलुंगमा अर्थात् संसार की माता नाम से पुकारते थे। १८४९ में एक सर्वेक्षण दल को पहली बार यह पता चला कि यह संसार का सर्वोच्च पर्वत-शिखर है। उस समय इसे 'शिखर-15' नाम दिया गया। बाद में इसे एवरेस्ट कहा जाने लगा। इसे यह नाम भारतीय सर्वे विभाग के प्रमुख सर जार्ज एवरेस्ट के सम्मान में प्रदान किया गया। तिब्बत के दलाई लामा एवरेस्ट-क्षेत्र में किसी यात्री को प्रदेश नहीं करने देते थे। सबसे पहले 1921 में ब्रिटिश पर्वतारोहियों के एक दल को इस क्षेत्र में जाने की अनुमति दी गई। इस दल ने दार्जिलिंग से अपनी यात्रा आरंभ की। वे घूमते-फिरते तिब्बत जा पहुंचे। परंतु दक्षिण तिब्बत में इन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे तिब्बत के एक प्रमुख मठ, रांगबुक तक पहुंच गये थे। तीन महीने तक संसार के इस अज्ञात भाग की यात्रा करने के बाद वे इंग्लैण्ड वापस लौट गए।

इसके दूसरे साल एवरेस्ट की चढ़ाई करने के लिए पहला ब्रिटिश दल संगठित किया गया। ये लोग 27300 फुट की ऊंचाई तक जा पहुंचे परन्तु शिखर को नहीं छू सके। इसके बाद तो अनेक दलों ने शिखर की चढ़ाई की और पहली बार १९५३ में हंट और हिलेरी के नेतृत्व में शिखर को छूने में सफलता मिली।

इसके बाद भी प्रति वर्ष कोई न कोई अभियान दल एवरेस्ट की चढ़ाई पर जाता रहा। भारतीय दल ने दो बार पराजय का मुख देखने के पश्चात् ९६५ में पहली बार एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की।

हमारे दल ने तीन बार शिखर छूने में सफलता प्राप्त की। चौथी बार 25 मई को जो दल चला उसमें मैं भी था।

संसार में कई घटनाएं ऐसी होती हैं, जब कोई चमत्कार होता है और निश्चित पराजय के स्थान पर विजय प्राप्त होती है। एवरेस्ट की अपनी चढ़ाई में मैंने भी इसी चमत्कार का अनुभव किया। 25 मई की प्रभात बहुत सुहावनी परन्तु सर्द थी। दोरजी शेरपा हमारी सवेरे की चाय लेकर तम्बू में आया और बोला, ''साहब, कल रात कैम्प-3 में बड़ा जबर्दस्त एवेलांश आया है।'' यह सुनकर मुझे याद आया कि रात में सोते-सोते मैंने गड़गड़ाहट की आवाज सुनी थी। चाय पीना भूल-भालकर मैं बाहर निकल पड़ा। भयंकर दृश्य था-शिविर का कहीं कोई चिन्ह दिखायी नहीं देता था और सब कुछ बर्फ से दब गया था। हम इस कैम्प में रात को ठहरना चाहते थे परन्तु हमने आखिरी क्षण नीचे आने का निश्चय कर लिया था। यद्यपि किसी की मृत्यु नहीं हुई थी परन्तु जीवन के ही समान एक बहुमूल्य वस्तु नष्ट हो गई थी। ये थे आक्सीजन के सिलेण्डर। बर्फ में आक्सीजन के सिलेण्डर दब जाने से शिखर-यात्रा की हमारी आकांक्षा भी मानो बर्फ के नीचे दब गई। कोई चारा न देखकर दल के नेता ने शिखर-यात्रा का प्रयत्न समाप्त घोषित कर दिया। हमने कहा, क्या सिलेण्डरों की खोज की जाए? यह खोज वास्तव में बेकार ही थी, क्योंकि हजारों टन बर्फ के नीचे से उन्हें निकाल पाना असंभव के ही समान था। लेकिन हमने वापस न लौटकर सिलेण्डरों की खोज करना ही निश्चय किया।

दो घण्टे की कड़ी मेहनत के बाद हम कैम्प-३ में पहुंचे। चारों तरफ बर्फ थी और कैम्प का कहीं कोई पता न था। मेरे: साथ चार शेरपा और नेपाली सम्पर्क अधिकारी थे। ये चार शेरपा मेरे साथ अन्तिम शिविर तक जाने वाले थे। कई मिनट सोच-विचार करने के बाद हमने आखिरकार खुदाई करने का निश्चय किया। चारों तरफ सर्द हवाऐ गरज रहीं थीं और हमारे चेहरों से बार-बार टकरा रही थीं लेकिन! हम खुदाई में लगे रहे। काफी खुदाई करने पर भी न तो कोई सिलेण्डर दिखाई दिया और न कोई दूसरी चीज। शाम हो गई और हम थककर चूर हो गए। समय बीत रहा था। परन्तु हम खुदाई करते रहे। हर मिनट एक साल के बराबर लगता था।

हम कब तक खुदाई करते रह सकते थे? मैंने शेरपाओं की ओर एक नजर डाली। वे प्रार्थना कर रहे थे और ऐसा प्रतीत हुआ मानो ईश्वर समीप आ गया '। मैं भी प्रार्थना करने लगा-हे ईश्वर, आपके अतिरिक्त कौन हमारी सहायता कर सकता है! -और हम फिर खोदने में लग गए। अचानक मेरी कुल्हाड़ी आक्सीजन के सिलेण्डर से जा टकराई। प्रार्थना का फल मिल गया था। कुछ और कुल्हाड़ियां मारते ही हमें दो सिलेण्डर और मिल गए। यह महान् प्रसन्नता का क्षण था। हम हंसकर एक-दूसरे को देखने लगे और एक के बाद एक करके हमने सभी सिलेण्डर निकाल लिए। यह एक चमत्कार ही था।

लेकिन एवरेस्ट को चढ़ाई के मार्ग में यह बाधा अन्तिम नहीं थी। मैं जानता था कि और भी अनेक बाधाएं हैं। और मैंने स्वयं को उनके लिए तैयार कर लिया था।

शिविर वापस लौटकर 'मोहन ' ( दल के नेता मोहन सिंह कोहली ) को जब मैंने यह सब बताया तो उसने विश्वास ही नहीं किया। वह कैम्प समाप्त करने की

योजना पर काम कर रहा था। परन्तु हमने उसकी योजना को समाप्त कर दिया और अब यह निश्चित किया गया कि दूसरे दिन हम शिखर की यात्रा परं जाएंगे। २६ मई को सवेरे बोगी, रावत, बी० पी० और मैं अगले बेस कैम्प से शिखर के लिए चले। आसमान में बादल नहीं थे और मौसम अच्छा था। बोगी और रावत एक रस्से में बंधे थे, बी० पी० और मैं दूसरे रस्से में। हमारे साथ सहायता के लिए बारह शेरपा थे। कल हमने जिस जगह खुदाई की थी उसे पार कर के हम ल्होत्से फेस ' पर चढ़ने लगे। बर्फ बहुत सख्त होने के कारण चढ़ाई बहुत मुश्किल थी। हवायें बिना रुके गरज रही थीं। जब हम ल्होत्से की चढाई एक तिहाई पूरी कर गए, बी० पी० ने कहा, ''मेरे सीने में दर्द हो रहा है। '' इसलिए हम थोड़ी देर रुक गए और मैंने बी० पी० को गर्म काफी निकाल कर पीने को दी। लेकिन इससे उसे कोई लाभ नहीं हुआ। उसका दर्द बढ़ता ही जा रहा था, और उसने कहा, मैं आगे नहीं जाऊंगा। मुझे बहुत देर हो गई और जब हम कैम्प-4 पर पहुंचे, सूरज डूब रहा था। मैं बहुत ज्यादा थक गया था। चावल और पनीर खाकर मैं अपने स्लीपिंग बैग में सोने के लिए घुस गया। इस कैम्प से आक्सीजन का इस्तेमाल किया जाना था। मैंने बहुत थोड़े परिमाण में आक्सीजन लेना शुरू किया। सोते समय या जब आप कुछ न कर रहे हों, बहुत कम आक्सीजन की जरूरत होती है। आक्सीजन ' सिलेण्डर पर लगे रेग्युलेटर को घुमाकर कम या ज्यादा आक्सीजन ली जा सकती है। एक मिनट में आधे लीटर से लेकर चार लीटर तक आक्सीजन ली जा सकती है। मैंने फी मिनट आधा लीटर आक्सीजन लेना शुरू किया। अगर फी मिनट चार लीटर लें तो एक सिलेण्डर चार घण्टे चलता है, दो लीटर लें तो आठ घण्टे और एक लीटर लें तो सोलह घण्टे।

सिलेण्डर में कुल आक्सीजन 13-1/2 पौण्ड के लगभग होती है। मैं सारी रात करीब-करीब जागता ही रहा क्यों कि मैं जानता था कि सोते समय अगर मैंने करवट ली तो तम्बू लुढककर तीन हजार फुट नीचे जा गिरेगा। चूंकि कैम्प पर ज्यादा स्थान नहीं था, इसलिए सभी तम्बू एक लाइन में लगाए गए थे। दो आदमियों वाले मेरे तम्बू का आधा भाग नीचे कुछ न होने के कारण हवा में लटक रहा था। कुछ समय बाद मुझे थोड़ी-सी नींद आ ही गई। रात को बर्फ पड़ी और जब मैं जागा तो तम्बू की छत मेरे चेहरे पर आ गिरी थी। मैं एकदम उठकर बैठ गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। लेकिन तेज हवाओं के गर्जन में मेरी आवाज कौन सुन सकता था। मैं तम्बू के भीतर सर्दी से जम गया। दूसरे दिन सवेरे मुझे तम्बू के भीतर से खींचकर बाहर निकाला गया।

कड़ाके की सर्दी थी। हम आक्सीजन लगाए सवा दस बजे निकले। हमारे रुकसैक( झोलों ) में आक्सीजन के दो-दो सिलेण्डर थे और हम फी मिनट एक लीटर के हिसाब से आक्सीजन ले रहे थे। मेरे साथ मूवी और साधारण दोनों ही प्रकार के कैमरे थे। साधारण कैमरे को मैंने गर्दन में इस तरह लटका रखा था कि जब चाहूं फोटो खींच सकूं। चट्टानें काले रंग की थीं और उनपर पीली धारियां पड़ी हुई थीं। वे बहुत सख्त थीं। इस समूचे क्षेत्र को 'यैलो-बैण्ड' कहते हैं। दोपहर बाद हम 'जेनेवा स्पर' पार कर के साउथ कोल पहुंच गए। कोल में कैम्प तक पहुंचने में हमें काफी दूर चलना पड़ा। वहां पर बर्फ नहीं थी। सख्त काली चट्टानें थीं या पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े थे। उनपर चलना बहुत मुश्किल और थकाने वाला था। ठण्डी हवाएं हमारे बदन से टकरा रही थीं।

जब हमें अपने तम्बू दूर से फहराते हुए दिखे तो हमारी जान में जान आयी। शाम होने तक हम वहां पहुंच गए। यहीं स्विस,ब्रिटिश और अमेरिकी अभियानों के पुराने तम्बू भी लगे थे और उन पर तभी का कूड़ा- कचरा भी जमा दिखाई दे रहा था। हम इन तंबुओं को आसानी से पहचान गए। हमारी आक्सीजन खत्म होती आ रही थी, इसलिए मैं इन तंबुओं में घुस गया और रात में उपयोग करने के लिए उनके कुछ आक्सीजन सिलेण्डर निकाल लाया। यहीं फू दोरजी भी हमारे साथ आकर शामिल हो गया क्योंकि शिखर की चढ़ाई के लिए उसका भी चुनाव किया गया था। उसके देर से आने का कारण यह था कि जब उससे कहा

गया कि शिखर पर चढ़ने के लिए उसे भी चुन लिया गया है तो वह खुद अपने जाने के बारे में निश्चय नहीं कर सके। वह बार-बार तम्बू के भीतर जाता और लौटकर कहता, मैं नहीं जाऊंगा। तब उससे कहा जाता कि शिखर पर चढ़ने से उसका बड़ा नाम होगा। वह फिर तम्बू के भीतर जाता और लौटकर 'नहीं' दोहरा देता। दरअसल बात यह थी कि तम्बू के भीतर उसने दो पत्थर रख छोड़े थे जिनमें से एक 'नहीं' का था और एक'हा' का। पत्थरों को जमीन पर डालकर वह देखता कि कौन-सा पत्थर ऊपर है। हमेशा 'नहीं' का पत्थर ऊपर होता और उसे तम्बू से बाहर आकर 'नहीं' कहना पड़ता। पत्थर की 'नहीं' का अर्थ वह यह लेता था कि देवी-देवता उसके चढ़ने के पक्ष में नहीं हैं।

लेकिन अंत में उसने हमारे साथ जाने का निश्चय कर ही लिया। हमने आक्सीजन का अपना स्टाक देखा और पाया कि हमें शिखर तक ले जाने और वापस लाने तक के लिए वह पर्याप्त नहीं है। लेकिन हमें इसकी कतई चिन्ता नहीं थी। हमने टमाटर का गरम सूप पिया, चावल और मुर्गा खाया और तंबुओं में सोने चले गए। तंबुओं के चारों तरफ हवाएं सारी रात गरजती रहीं। कई दफा ऐसा लगा कि हमारे तंबू गुब्बारों की तरह उड़ जाएंगे। यहां मैं यह बता दूं कि

इस अंतिम कैम्प से आगे हमें रात-दिन आक्सीजन का इस्तेमाल करना था।

दूसरे दिन साढ़े सात बजे सुबह हम आखिरी कैम्प के लिए चले।

अब मेरे साथ मेरे रस्से में फू दोरजी बंधा हुआ था। हमारे पीछे रावत, बोगी और सात शेरपा थे। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते थे, हवाएं तेज होती जाती थीं। एक ओर हमें मकालू शिखर दिखाई पड़ रहा था और दूसरी ओर तिब्बत के ढलान। सख्त बर्फ काटते हुए, हम बड़ी कठिनाई से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। हम बहुत जल्द थक जाते और आराम करने के लिए रुक जाते थे। आगे की प्रगति बहुत ही धीमी थी। बर्फ काटने में बहुत समय लगता था। ९-१५ बजे के लगभग हम १९६२ के भारतीय अभियान दल के शिविर की जगह पर पहुंचे। घण्टे-भर बाद २७,४५० फुट की ऊंचाई पर अमेरिकी शिविर का स्थल मिला। तम्बुओं के बाहरी खोल बिलकुल नष्ट हो गए थे और भीतर के लाल-नीले चिथड़े दिखाई दे रहे थे। मैंने निशानी के तौर पर रखने के लिए ये कुछ रंग-बिरंगे टुकड़े साथ ले लिए। हवा तेज थी लेकिन आसमान साफ था। हमारे नीचे की दुनिया बड़ी विलक्षण दिखाई दे रही थी। साउथ कोल का शिविर बहुत छोटा-सा दिख रहा था। यहां कुछ देर आराम

करने के बाद हमने फिर चढ़ना शुरू कर दिया। ११-३० बजे के लगभग हम इस पहाड़ी के उस हिस्से पर पहुंच गए जहां ढाल जरा कम था। 27930 फुट की ऊंचाई पर यह हमारा अंतिम कैम्प था। चूंकि हम चार लोगों को यहां रात बितानी थी इसलिए पिछले दलों द्वारा लगाया गया एक तम्बू पर्याप्त नहीं था। दूसरा तम्बू लगाने की जगह नहीं थी लेकिन किसी तरह जमीन समतल करके हमने तम्बू लगाया। हवा तूफान की तरह चल रही थी। इससे तम्बू गाड़ने में बहुत कठिनाई हुई। रस्साकसी के खेल की तरह हवा तम्बू को एक ओर खींचती और हम दूसरी ओर खींचते। नये तम्बू में फू दोरजी और मैं सोये। हवा का दबाव और नमी होने के कारण हमारे शरीर का करीब एक प्याला जल हर घण्टे कम हो जाता था। इस कमी को पूरा करने के लिए हमें हर घण्टे चाय, काफी या फलों का रस लेना पड़ता। चाय या काफी बनाने के लिए हमें पहले जमी बर्फ को पिघलाना पड़ता। हमारे पास कुछ उबला हुआ चिकिन भी था, जिसे गर्म करने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी।

चिकिन को चबाना भी आसान नहीं था। सर्दी के कारण हमारे जबड़े बहुत धीरे चलते और कुछ टुकड़े खाने में करीब घण्टा भर लग जाता था। मैंने अपने स्लीपिंग

बैग में अपने रेण्डियर के चमड़े से बने हुए बूट, बूटों के खोल, मूवी कैमरा और उसके लेन्स भी इसलिए रख लिए थे कि वे दूसरे दिन उपयोग के लिए गर्म बने रहे। इन्हीं के साथ आक्सीजन के सिलेण्डर भी लेकर सोना बड़ा मुश्किल हो जाता था। सारी रात तम्बुओं के चारों ओर हवाएं चीखती-चिल्लाती रहीं। मैं डरता रहा कि तम्बू कहीं उड़ न जाएं। इस सबके बावजूद मैं थोड़ी-सी नींद लेने में सफल हुआ और 3 बजते ही जाग गया। फू दोरजी रात-भर मजे से खर्राटा लेते हुए सोता रहा था। मैंने तम्बू से बाहर एक नजर डाली। आसमान गहरा नीला और बादलों से हीन था। दूर क्षितिज पर सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। पहाड़ों पर गिरती सूरज की किरणें ऐसी लग रही थीं मानो वे सोने से नहा रहे हों। मैंने तुरंत कैमरा निकाला और तम्बू की इस छोटी-सी खिड़की से बाहर के फोटो खींचने लगा।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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