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February, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राकेश भ्रमर की कहानी - अंधेरे रास्ते

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कहानी अंधेरे रास्‍तेराकेश भ्रमर रात घनी अंधेरी थी, तिस पर वह पिए हुए था․ गिरता-पड़ता और दारू पिलाने वालों की जय-जयकार करता हुआ अकेला चला जा रहा था․ पैर धूल से अंट गए थे․ कपड़े चीकट हो गए थे, परन्‍तु उसे अपने शरीर की कोई चिन्‍ता नहीं थी․ वह तो लाल परी के उड़नखटोले में बैठा सातवें आसमान पर उड़ रहा था․ कर्म से वह मजदूर था, परन्‍तु आजकल काम पर नहीं जाता था․ मनरेगा का काम बंद था․ खेतों में भी कोई काम नहीं था․ केवल ईंट के भट्‌ठों में काम मिलता था, परन्‍तु वहां भी उसे जाने की जरूरत नहीं थी․ चुनाव आ गए थे․ अलग-अलग दलों के लोग गांव में प्रचार के लिए आते थे․ वोटरों को लुभाने के लिए उनको दारू की बोतल पकड़ाते थे․ सौ-पचास अलग से चुपके से दे देते थे․ उसकी ही नहीं, गांव में उसकी तरह के दूसरे निठल्‍ले लोगों की चांदी हो रही थी․ दारूबाज तो दिन रात दारू के नशे में झूमते रहते थे, परन्‍तु उनके घरों में फांकों की नौबत आ गई थी․ जिनकी घरवालियां खेत-मेड़ में काम करती थीं, वह तो घर के लोगों का किसी तरह पेट भर लेती थीं, परन्‍तु जिनके घरों में कमाने वाले केवल पुरुड्ढ थे, उनके घरों में चूहे भी भूखों मर रहे थे․ दा…

नमन दत्त का आलेख : सामाजिक लोकपल्लवन में सांगीतिक प्रतिबिम्ब और उसकी महत्ता

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मानव सभ्यता के विकास के साथ ही साथ ललित कलाओं के अस्तित्व की अवधारणा भी समानान्तर रूप से पुष्ट होती गई। आदिकालीन मानव ने जब जीवन में एक सुव्यवस्था की आवश्यकता महसूस करना शुरू की, तभी से सम्भवतः ललित कलाओं संबंधी मंतव्यों की परिकल्पना भी उसके अन्तस् के किसी कोने में एक सूक्ष्म अपुष्ट रूप में अवश्य जन्मी होगी, ऐसा मेरा मानना है। ललित कलाओं का विकास क्रमशः मानवीय सभ्यता के विकास के सापेक्ष हुआ। पाँचों ललित कलाएँ – चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, काव्यकला और संगीत मानव जीवन से उसके विकासक्रम में ही गहरे अन्तर्सम्बन्ध के साथ प्रौढ़ होती हुई पुष्टि प्राप्त करती दिखती हैं, इसके अनेक प्रमाण इतिहास में उपलब्ध हैं। समाज में ललित कलाओं की जड़ें बेहद गहरे तक समाई हुई हैं। दरअसल मानव स्वभाव को कलाओं से निरपेक्ष कर पाना लगभग असम्भव ही है, यह एक निर्विवाद सत्य है। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि समस्त कलाएँ मानवीय भावाभिव्यक्ति की परिकल्पना का एक तरह से प्रत्यक्ष प्रदर्शनात्मक स्वरूप माना जा सकता है। अतएव कलाओं में सदैव मनुष्य के अंतर्मन की दमित वासनाओं, इच्छाओं और काल्पनिक अभिलाषाओं का ही प्रस्फुटन…

प्रमोद कुमार चमोली का व्‍यंग्‍य - दुनिया में जीना है तो विवाद कर प्‍यारे

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दुनिया में जीना है तो प्‍यार कर प्‍यारे लगता है ये बात कुछ पुरानी पड़ चुकी है। अब खालिश प्‍यार से काम नहीं चलता है। विवाद बगैर जीना भी कोई जीना है लल्‍लू। पर लल्‍लू बेचारा क्‍या करे उसे तो शाम की रोटी का जुगाड़ जो करना है। खैर ये तो बेचारा लल्‍लू था पर हम कोई लल्‍लू नहीं। हमका तो कुछ जुगाड़ करना ही पड़ी। अब का करें बिना विवाद रोटी कइसे हजम करें। यानि भइया हम तो कहते हैं की दुनिया में जीना है तो विवाद कर प्‍यारे। आप अच्‍छा काम कर रहें हैं कोई पहचान नहीं बना पाएँगें पर आपने कोई विवाद कर दिया तो समझो रातों रात आपकी ख्‍याति का परचम लहर लहर लहराने लगेगा। साधारण आदमी से सेलिब्रेटी बनने के लिए मात्र एक शानदार विवाद की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि ये मात्र ख्‍याति प्राप्‍त करने की ही विधा है विद्वानों इसके कई नये लाभ भी ढूढ़ लिए है। बाजार भी इस नायाब नुस्‍खे का प्रयोग कर अपना माल बेचने लगा है। प्रकाशक को पुस्‍तक बेस्‍ट सेलर बनानी है तो विवाद पैदा करवाना जरूरी, फिल्‍म हिट करवानी है तो विवाद करवाओ मुकदमें करवाओ, चैनलों की चिक चिक में टी.आर.पी. चकाचक करवानी है तो विवाद करवाओ। कुल मिलाकर कुछ भी करना…

पारुल भार्गव की कहानी - सगाई

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सगाईपारुल भार्गव शाम के 4 बज चुके थे मैं अपने कमरे में बैठी टी.वी. देख रही थी तभी मेरी जेठानी मेरे कमरे में आई और मुझे टी.वी. के सामने पाकर तुनक कर बोल पड़ी- क्‍या रिया तुम अभी तक तैयार नही हुई, तुम्‍हें पता है न हमें रमा की सगाई के लिए जाना है, मैंने घड़ी की तरफ देखते हुए कहां क्‍या भाभी अभी तो सिर्फ 4 बजे है अभी से क्‍या तैयार होना, तभी भाभी बोली तुम्‍हें पता है रमा का रिश्‍ता बहुत उंचे घराने में तय हुआ है सब ‘हाई-प्रोफाइल' वाले लोग है। मैंने अलसाते हुए कहा- ‘तो क्‍या हुआ'। मेरा असाधारण - सा रवैया देख वे एक बार फिर मुझमें जोश भरने के लिए बोल पड़ी - सुना है एक-से-एक लोगों का आना होगा, बुआ जी के तो आज तेवर ही नहीं मिलेंगे, हमें भी अच्‍छे से बन-ठन के जाना होगा। मैंने कहां - हां तो चलेंगे न, हम क्‍या किन्‍हीं रहिशों से कम है ! मेरे यह सुनते ही वे अपने आपको हाई-फाई महसूस करने लगी और जल्‍दी तैयार होने का बोलकर अपने कमरे में चली गई। मैं थोड़ी देर और टी.वी. के सामने पड़ी रही, फिर जाने के लिए तैयार होने लगी, तैयार होने के बाद कुछ पल के लिए मैं आइने के सामने बैठ कर अपने आप को देखती र…

मोहसिन खान की कविता : भूमि और पौधे बनाम माँ और सन्तानें

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भूमि और पौधे बनाम माँ और सन्तानें( मदर्स डे पर विशेष )और बीजों की तरह भूमि के भीतर से उग आया था, एक बीज ! भूमि की छाती पर । जो बीज अभी फूटा था अंकुर बनकर, इससे पहले पैदा हुए पौधों से वह कहीं अधिक छोटा था । भूमि के भीतर से एक ही नस्ल के पैदा हुए थे सभी पौधे, लेकिन कुछ कांटेदार हुए, कुछ हरे तो रहे, केवल ऊपर से रहे रसहीन, गन्धहीन ! उन सबने सींचा था बहुत भूमि की छाती का रक्त और वह लहराये भी तो अपनी मस्ती में, पर कभी नहीं फैंकी उनकी टहनियों ने भूमि की सूखती, झुलसती छाती के लिये एक भी पत्र की सुख भरी छांह ! भूमि के ने कभी न मीचा था अपने नेत्रों को उनके लिये और न ही मुख फेरा था उनसे कभी । अपनी छाती पर, उनकी जड़ों को मज़बूती से पकड़कर उनको सदेव गाडे़ रखा ! उन कंटिले हरे, केवल ऊपर से सूखे, रसहीन, गन्धहीन पौधों को । भूमि ने किया था वर्षों उत्सर्ग उनके लिये कितना ही शीतल और तरल रस उनके भीतर भरती रही और सहती रही आशाओं की अग्नि अभिलाशाओं के धुंए । उस नए बीज ने देखा था सब कुछ और भूमि की झुलसती छाती को, जो हरे, केवल ऊपर से कंटिले सूखे, रसहीन, गन्धहीन थे । उन पौधों से भूमि की कुचली मृतिका ने दम तोडा़…

नारायणसिंह कोरी के भजन

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शिरडी साईं बाबा सांई नाम जप लेनाकष्‍टों को मिटाना हो, दुख दूर भगाना हो तो साई नाम जप लेना-2 के साई नाम जप लेना-2 हॉ साई नाम जप लेना 1- संतों ने कहा है, महन्‍तों ने कहा है साई की महिम तो सब से जुदा है तुम्‍हें शिरडी जाना हो साई दर्शन पाना हो तो साई नाम जप लेना 2- बाबा का भंण्‍डारा जो कोई भी करवाये सुख सम्‍पत्‍ति उसके घर में आ जाये फरियाद लगाना हों बुझे दीप जलाना हो तो साई नाम जप लेना 3- बाबा का दर से कोई खाली नहीं जाता। रोता हुआ आता है, और हंसता हुआ जाता॥ तुझे बिगड़ी बनाना हो, किस्‍मत चमकाना हो। तो साई नाम जप लेना2मैंने ओड़ लिया है चोलामैंने ओढ़ लिया है, चोला देखो साईं नाम का । ये दुनिया है जंजाल, न तेरे मेरे काम का॥ मैंने ओढ़ लिया है, चोला देखो साईं नाम का। 1. बाबा के दीवानों पर कष्‍ट कभी न आता है। ये इक ऐसा दर है यहां से खाली कोई न जाता है॥ हो मैंने आज ही खाता खोला देखो साईं नाम का । 2. शिरड़ी में साईं तूने सबको कैसा करिश्‍मा दिखाया है। राम, रहीम, शिव, मानक, यीशु तुझ में सबकी छाया है॥ हो मेरा मन है अब तो डोला, देखो साईं नाम का ॥ 3. साई शरण में आके प्राणी, काहे …

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की ग़ज़लें - बाहर सर्द सुबह हूँ पर भीतर दुपहर दहता हूं...

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ग़ज़लझूठ से डरकर रहता हूँ , कड़वा सच पर कहता हूँ. बूढ़ी माँ की आँखोँ से ; आँसू बनकर बहता हूँ . बाहर सर्द सुबह हूँ पर ; भीतर दुपहर दहता हूँ . सुख-दुख हैँ 'महरूम' अपने ; दोनोँ से ही निबहता हूँ . = = * = ग़ज़लख़ाक हैँ जो कल आग रहे हैँ . ज़द्दोज़हद का राग रहे हैँ . राह जहाँ, मंज़िल भी वहाँ पर ; मील के पत्थर भाग रहे हैँ . होँगे जोड़-गुणा अब हम क्या आजीवन ऋण-भाग रहे हैँ. सोकर क्या नायाब खो दिया क्या पाया जो जाग रहे हैँ ? हैँ 'महरूम' दाग़दामन हम ; पर दिर से बेदाग़ रहे हैँ . = = * = = ग़ज़लगूँगी-बहरी तेरी ख़ुदाई . अंधी-पंगु हुई प्रभुताई . इन्सां बने नहीँ बन बैठे ; हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई . क़द मेँ कमतर है जनमत से; सत्ता-सियासत की ऊँचाई . कामचोर, ठलुए सदनोँ मेँ ; ओहदोँ पर काबिज़ हैँ कसाई. हक़ की बात कही जो 'महरूम, ; तो पानी मेँ आग लगाई .

ज्योति सिंह का आलेख - संगीत चिकित्सा : एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

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ज्योति सिंह, शोध छात्रा,
    हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ,
    निवाई, टोंक   

    संगीत मनुष्य की आरम्भिक अवस्था से जुड़ा हुआ है। प्रकृति में होने वाली समस्त क्रियाओं व बदलावों ने मानव को आश्चर्य चकित किया। मस्तिष्क ने अपनी स्वाभाविक जैविक क्रिया की और मनुष्य अनजाने में ही जिज्ञासा के मोहपाश में फंसता चला गया (मस्तिष्क मनन) का कार्य ही सोच व शंका को जन्म देता है और यही सोच व शंका प्रगति व परिवर्तन की आधारभूत भूमि है।
    ब्रह्मण्ड में उपस्थित समस्त ध्वनियों ने मनुष्य को अलग-अलग वातावरण व प्रतिक्रियाओं में बांटा। हर ध्वनि पर उसकी प्रतिक्रिया उसके भीतर एक अलग भाव व उत्तेजना को जन्म देती है। यहाँ भी उसे संगीत द्वारा अपने मनोविज्ञान पर होने वाले प्रभाव का पता नहीं था। किन्तु यह क्रिया स्वाभाविक व प्राकृतिक थी। इन्हीं अलग-अलग भावों ने अलग-अलग ध्वनियों की (अमूर्त) श्रेणी व उनकी (मूर्त) पहचान बनाई जो बाद में एक निरंतर खोज व जिज्ञासा के कारण स्वर, राग व संगीत के शुद्ध रूप में सामने आई। संगीत शास्त्रों में स्वरों का जीव-जन्तुओं की बोलियों से सम्बन्ध इसी बात का प्रमाण है।
    कला वह प्रतिक्रि…

शंकर लाल कुमावत की व्यंग्य कविता - ये चुनाव जुल्मी

ये चुनाव जुल्मी ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है जीतने के नाम पर इतने नाटक करवाता है की पूरा माहौल फिल्मिया नजर आता है जनता को रिझाकर वोट पाने के लिए राजनेता ऐसा संजीदा अभिनय दिखाता है जिसके सामने हॉलीवुड का सिनेमा भी फीका नजर आता है कोई एंग्री यंग मैन बनकर हीरो की तरह स्टेज से कागज फाड़ जाता है जिस किसी को टिकट नहीं मिलपाता है वो पाला बदलकर विलेन का रोल निभाता है कोई कोमेडियन की तरह चुटकियाँ लेकर पब्लिक का मनोरंजन कराता है कोई पुराने फ़िल्मी ठाकुर की तरह रोटी कपड़ा और मकान का लालच दिखाकर वोट पर अंगूठे लगवा लेना चाहता है कोई महलों को छोड़ कर धूल भरी सड़कों पर चक्कर लगता है कोई बीबी बच्चों के नाम पर वोट के लिए झोली फैलाता है कोई कोई तो खुद के साथ – साथ अभिनेताओं से भी अभिनय करवाता है मगर फिर भी बात नहीं बनती है क्योंकि अभिनेता जनता के सामने रोल ठीक से अदा नहीं कर पाता है क्योंकि बिना रीटेक के सीन करने का वो आदि नहीं होता है ये सब देखकर लगता है ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है और बेबस नेता इसके सामने नाटक दिखता है क्य…

गोवर्धन यादव का आलेख - बाल मनोविज्ञान

बाल-मनोविज्ञान को समझना भी एक बडी तपस्या है.-बचपन में लडना-झगडना-उधम मचाना चलता ही रहता है. मुझे अपने बचपन की हर छोटी-बडी घटनाएं याद है.
बचपन की भूल-भुलैया आज भी चमत्कृत करती है. यदि आज के बच्चे से उसके बचपन को लेकर बत करें तो वह उसे कैदखाना ही बतलाएगा. आज के बच्चों को लगता है के कब बचपना खत्म हो और वे बडे बन जाएं. बच्चे ऐसा क्यों सोचते हैं? कभी आपने इस विषय की गंभीरता से विचार नहीं किया होगा. जानते हैं, ऐसा क्यों होता है? हम बचपन पर अनुशासन लादते जा रहे हैं. बात-बात में कहते हैं, तुम्हें ये करना चाहिए.. वह करना चाहिए. ये नहीं करना चाहिए. इस टोकाटोकी में बचपना मुरझा जाता है. बच्चे आखिर चाहते क्या हैं,? यह कोई नहीं पूछता. दरअसल बच्चों के बाल-मन को समझना एक विज्ञान है और दूसरी भाषा में कहा जाए तो यह किसी तपस्या से कम नहीं है.
श्रीराम बचपन में गुमसुम रहते थे. गंभीर तो वे थे ही. राजा दशरथ को लगने लगा कि राम राजकुमार हैं और उनके भीतर बालपन में ही वैराग्य भाव जाग आया है, यह ठीक नहीं है. दशरथ ने बाल राम को गुरु वशिष्ठ के पास भेजा. उन्होंने बाल मनोविज्ञान को समझते हुए ज्ञान दिया. उसे योग –विशिष…

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - अंतर

अंतर फूला काकी अपने पोते को गो माता का महत्व बताती रहती थीं । लेकिन वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता था । एक दिन काकी ने देखा कि गौ माता बैठी हुई हैं और उनका पोता लात मार-मारकर उन्हें उठाने का प्रयास कर रहा है । काकी से नहीं रहा गया । बोलीं “नासपीटे तूँ गौ माता को लात मार रहा है । तुझे कहीं बैठारी नहीं मिलेगी” । पोता बोला “तुम चुप रहो बस । बताओ गाय और बकरी में क्या अंतर है” ? काकी उसे गाली देने लगीं और बोलीं “देश और समाज का यही दुर्भाग्य है कि आज तुझ जैसे हजारों लोग हो गए हैं । जिनके मन-मस्तिक में मल की बास भरी रहती है वे गुबरौले भला फूल के मकरंद और मल की गंदगी में क्या अंतर समझेंगे ? गंगाजी और नाले का अंतर गंदी नाली के कीड़े क्या समझेगें” ? --------- डॉ. एस. के. पाण्डेय, समशापुर (उ.प्र.) । URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/*********

कृष्ण कुमार यादव की कविता : सभ्यता की आड़ में

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सभ्यता के झीने आवरण से दूर
वे करते हैं विचरण
अपनी दुनिया में
जंगली सूअरों और गोह का
शिकार कर खाते लोग
कभी सीपियों का माँस, तो कभी
मछली-कछुए मार खाते लोग
डरते हैं जंगली जानवर
इनके तीखे भालों-बाणों से
पर वो डरते हैं
सभ्यता के शिकारियों से
सभ्यता की आड़ में
उनकी आस्मिता का शिकार करती
उनकी संपदा को ललचाई
निगाहों से घूरती
विकास के खोखले नारों के बीच
जंगल और जमीन कब्जाते लोग
छीन रहे हैं उनका सुकून।हर कोई देखना चाहता है
छूना चाहता है उन्हें
पर नहीं चाहता उन्हें समझना।
वे एक उत्पाद-भर रह गए हैं
उनके चेहरे, उनकी भाव-भंगिमायें
कैद करके कैमरों में
लौट जाते हैं लोग
अपनी सभ्य दुनिया में
और भूल जाते हैं
इन आदि मानवों को।कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101

आकांक्षा यादव की कविता : साँसें ही न थम जायें

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मौसम मस्ताना, दिल दीवाना
तुझको पुकारे आ जा
मौसम का सितम है मेरे सनम
अब सह न सकूँगी आ जा।तेरी बाँहों के झूले में खो लूँ
इतनी सी इजाजत तो दे दे
अब और न तड़पा मुझको
बस मेरा जहां मुझको दे दे।तेरे सिवा कुछ और नहीं
आता है नजर इन आँखों को
तेरी साँसों का उठना-गिरना
संगीत है मेरे जीवन का।कह दे तू बस मेरा ही है
जीने का बहाना बन जाये
अब आ भी जा ऐ मेरे सनम
कहीं साँसें ही न थम जायें।-आकांक्षा यादव
द्वारा - श्री कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
kk_akanksha@yahoo.com

मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : अंतिम भाग 4

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान(अंतिम भाग)पिछले अंक से जारी...इसी बीच फू दोरजी ने काफी तैयार कर ली जिसे पीकर हम आगे चलने के लिए तैयार हो गए। जब हमने अगली चढ़ाई आरंभ की, सुबह के ५-३० बजे थे। पहले मैं और फू दोरजी चले, कुछ मिनट बाद हमारे पीछे रावत और बोगी ने चढना शुरू कर किया। हम सब सामान से बुरी तरह लदे थे जो प्रतिव्यक्ति साठ पौण्ड के लगभग था। इसमें आक्सीजन के सिलेण्डर कैमरे व इनकी फिल्में तथा और दूसरी चीजें थीं। इस शिविर से आगे पांच सौ गज लम्बी एक पहाड़ी थी। इस पहाड़ी के बारे में मैंने पहले बहुत कुछ पढ़ रखा था। और अब मैं खुद इसके ऊपर चढ़ रहा था। यह पहाड़ी बहुत संकरी और तीखी है और इसके दोनों ओर गहरे ढाल हैं। इसलिए इसे 'रेजर्स एज' कहते हैं। इसके दाहिनी तरफ बर्फ का एक बड़ा-सा टुकड़ा निकला हुआ है, क्योंकि यहां हवा हर वक्त चलती रहती है। हमें इस बर्फ से सतर्क रहना होता है, क्योंकि इस पर पैर पड़ते ही यह टूट कर गिर सकती है। मैंने एक या दो कदम ही आगे रखे होंगे कि मैं भीतर से मानो जम ही गया। हवा बहुत तेज चल रही थी। आक्सीजन लेते रहने पर भी सांस लेना बहुत मुश्किल हो गया और मुझे लगा …

मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 3

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान(भाग - 3)पिछले अंक से जारी...थ्यांगबोचे में हम पांच दिन रुके। इस बीच हम पहाड़ों पर चढ़ने का अभ्यास करते रहे और अगल- बगल की छोटी चोटियों पर चढे। इन अभ्यासों से हमारे शरीर बहुत सुदृढ हो गए और 18 मार्च को सुबह हम अपने बेस कैम्प के लिए चल पड़े। रास्ते में पांगबोचे नामक एक और गांव आया। इस गांव में एक गुंबा है। गुंबा का अर्थ मंदिर होता है। इस गुंबा में हमने येटी के हाथ और खोपड़ी रखे देखे। येटी उस हिम- मानव को कहते हैं, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि वह बर्फ में रहता है, परंतु जिसे अभी तक किसी ने देखा नहीं है। रात को हम फेरिचे में ठहरे। यह उस क्षेत्र का नाम है, जहां गर्मी के दिनों में खेती की जाती है। यहां आलू और जौ बोये जाते हैं। आलू बहुत मीठे होते हैं और उन्हें उबालकर बहुत-सी मिर्च के साथ खाया जाता है। दूसरे दिन हम कुछ मुलायम- सी बर्फ पर चलते हुए लोबुजे पहुंचे जो 16450 फीट की ऊंचाई पर है। यह शायद दुनिया का सबसे ज्यादा ऊंचा चरागाह है। दूसरे दिन हम गोरक शेप पहुंचे जहां एक बड़ी झील है। झील सूखी हुई थी और हम उस पर चले। कुछ दूर चलने के बाद हम …

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रवि रतलामी

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