संदेश

March, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

शशांक मिश्र भारती का आलेख - शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार समस्‍या एवं समाधान

चित्र
भ्रष्‍टाचार दो शब्‍दों से मिलकर बना है। भ्रष्‍ट+आचार। जिसका अर्थ हुआ भ्रष्‍ट आचरण। जिस तरह से आचरण से गिरा व्‍यक्‍ति पतित-दुराचारी कहलाता है। वैसे ही साफ-सुथरी से रिश्‍वत-कामचोरी की व्‍यवस्‍था अपना लेना भ्रष्‍टाचार है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो जब कोई कार्य नियमों का उल्‍लंघन कर अथवा गलत तरीके से किया जाय तो वही भ्रष्‍टाचार है। हमारे धर्मग्रन्‍थों में आचरण को बड़ा महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया गया है। धन से हीन व्‍यक्‍ति हीन नहीं माना जाता किन्‍तु आचरण से हीन व्‍यक्‍ति हीन(मरे हुए के समान) माना जाता है यथा- वृत्तं यत्‍नेन संरक्षेद वित्तमायाति याति च।अक्षीणेां वृत्ततः क्षीणों वृत्तत वस्‍तु हतोहतः॥हमारे देश में भ्रष्‍टाचार शब्‍द कोई नया नहीं है। आजादी के कई दशकों के बाद हमने किसी भी क्षेत्र में पर्याप्‍त प्रगति न की हो, लेकिन भ्रष्‍टाचार के क्षेत्र में हमारे लिए विश्‍व में एक-दो देशों को छोड़कर कोई चुनौती नहीं है। आजादी के बाद ही यद्यपि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू द्वारा कहा गया था कि भ्रष्‍टाचार करने वाले व्‍यक्‍ति को निकटतम खम्‍भे(पोल) पर लटका देना चाहिए। लेकिन इसके कुछ समय बा…

अमरीक सिंह कुंडा की लघुकथाएँ - लंगड़ा आम, बिजी डे

चित्र
कंडे का कंडा लंगड़ा आम ‘‘पंडित जी, हमारा काम नहीं चलता। यह हमारा टेवा देखिए और हम पर कृपा कीजिए।’’ लाला विष्णु प्रताप ने पंडित से कहा, ‘‘आपकी तो ग्रह चाल ही बुरी है। आप तो आज मरे या बस कल मरे ही समझो। आपका जानलेवा एक्सीडैंट हो सकता है।’’ लाला जी ने याचना भरे स्वर में कहा, ‘‘पंडित जी, कोई उपाय कीजिए।’’ पंडित जी ने कहा, ‘‘ठीक है। तुम आज रात को 11 किलो लंगड़ा आम लंगड़ाते हुए ठीक रात को 9 ११बजे हमारे दरवाजे पर रख जाना और पीछे मुड़ कर मत देखना। याद रखना तुमने लंगड़ा आम लंगड़ाते हुए देकर जाना है। मैं देवताओं को समझा लूंगा और तुम्हारा उपाय कर दूंगा। 9 बजे तक तुम्हारा हवन पूरा हो जाएगा। हवन सामग्री के लिए 2100 रुपए दे जाओ। यह बात किसी को मत बताना, नहीं तो हवन भंग हो सकता है। अब तुम जाओ और जाकर आम खरीद कर रख लो। याद रखना ठीक रात 9 ११बजे आना है।’’ बेचारा विष्णु प्रताप 40 रुपए किलो वाला लंगड़ा आम लेकर रात को 9 ११बजे लंगड़ाते हुए पंडित जी के दरवाजे पर रख कर मुड़ा ही था कि गली के कुत्तों ने लाला की धोती फाड़ दी और उसकी टांग पकड़ ली। इतने में पंडित जी अपने लड़कों के साथ शोर सुन कर बाहर निकले। ‘‘हरे…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - लो हट गई गरीबी!

चित्र
व्यंग्य लो हट गई गरीबी! डॉ. रामवृक्ष सिंह बचपन में एक नारा सुनते थे-गरीबी हटाओ। लेकिन आज चार दशक बाद भी, जब बुढ़ापा हमारे जिस्म और ज़हन, दोनों पर दस्तक देने पर आमादा हो रहा है, तब भी गरीबी जस की तस है। उसका हटना तो दूर, अलबत्ता वह बढ़ रही है। बल्कि हमें तो लगता है कि उसकी ज़द में अब बड़े-बड़े हाकिम-हुक्काम और नेता साहिबान भी आ गए हैं। यदि ऐसा न होता तो लोग अपनी इज्जत-आबरू दाँव पर लगाकर बस पैसा बनाने के चक्कर में इतने बड़े-बड़े गड़बड़- घोटाले क्यों करते? ज़रूर इन बेचारों पर ग़रीबी की बेतहाशा मार पड़ रही होगी, तभी तो कुछ और पैसे बनाने के लिए ऊल-जलूल कारनामे करने निकल पड़ते हैं। चाहे उसके लिए उनको अपनी इज्जत ही क्यों न गँवानी पड़े। ग़रीब न होते तो ऐसा करने की उन्हें क्या ज़रूरत थी! इसी को कहते हैं मरता, क्या न करता! पैसे कम पड़ रहे हों और ग़रीबी के मारे जान पर आ पड़ी हो तो आदमी कुछ भी कर गुजरता है- बुभुक्षितं किं न करोति पापम्! हमें तो लगता है कि देश से ग़रीबी हटाने का जो अभियान हमारे बचपन में चला था, यह ऊंचे लोगों द्वारा मचाई गई लूट-खसोट भी उसी अभियान का एक हिस्सा है। इस प्रक्रिया में द…

अतुल कुमार रस्तोगी की कविता - ओस, अब कहाँ!

चित्र
ओस, अब कहाँ !निशब्द अँधेरे में पिघलने का सुखतैरकर पत्तों पर फिसलने का सुखकिरणों में कण-कण चमकने का सुख अब कहाँ !आर-पार दिखने दिख जाने का सुखमोती-सा बन चमचमाने का सुखछोटी-सी छुअन पर मिट जाने का सुख अब कहाँ !मखमल-सा सुख देकर जाने का सुखमलमल-से तन पर बिछ जाने का सुखइक क्षण बस एक कण हर्षाने का सुख अब कहाँ !पत्तों के तन पर डगमगाने का सुखपंखुड़ियों के संग झूम जाने का सुखकिरणों पर लुटकर टिमटिमाने का सुख अब कहाँ !हवा से हिलकर खिलखिलाने का सुखधरती में घुलकर सरसाने का सुखनयनों में नीरज नज़राने का सुख अब कहाँ !रचनाकार - अतुल कुमार रस्तोगी(संक्षिप्त परिचय)जन्म तिथि : 01.11.1962जन्म स्थान : शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेशपिता का नाम : श्री राम किशोर रस्तोगीमाता का नाम : स्व. प्रभा रस्तोगीस्थायी पता : तेलीबाग़, रायबरेली रोड, लखनऊ (उत्तरप्रदेश) संप्रति : भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक में सेवारतसम्पर्क : बी-507, मीनाक्षी अपार्टमेन्ट, गोकुलधाम, गोरेगाँव (पूर्व), मुंबई – 400 063(महाराष्ट्र)मोबाईल : 09920565635ई-मेल : atulkumarrastogi@yahoo.inakrastogi@sidbi.in

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - सरकार के गरीब

चित्र
इधर सरकारी सँस्‍था योजना आयोग ने फिर गरीब की रेखा का जिक्र कर के सरकार की किरकिरी कराई है।सरकारी आक़डों के अनुसार शहरी गरीब अलग होता है और गांवों का गरीब अलग होता है। जो गरीब शहर से गांव जाता है वो गांव जाकर अमीर की श्रेणी में आ जाता है मेरी मान्‍यता ये है कि योजना आयोग को गरीबी रेखा के बजाय अमीरी रेखा खींचनी चाहिये और अमीरो की आय तय कर देनी चाहिये। शहर में छोटा मोटा भिखारी भी सो रुपया कमा लेता है और योजना आयोग के अनुसार ऐश कर रहा है, योजना आयोग उसकी जेब में पड़े अतिरिक्‍त पैसे को निकाल कर अपनी झोली भरना चाहता है। प्रति- भाशाली लोग योजना आयोग में घुसते है और ज्‍यादा प्रतिभाशाली लोग सरकार में विशेपज्ञ के रुप में घुसकर ये रिपोर्टे बनाते है। इन रिपोर्टों का एक ही उपयोग है कि इन्‍हे रद्‌दी की टोकरी में फेक दिया जाये। सरकार के अमीर लोग गरीब की रेखा, समकोण, त्रिभुज, आयत, वृत्‍त बनाते रहते है और गरीब का मजाक उड़ाते रहते है। गरीब का सबसे बड़ा सपना तो शायद ये होता है कि किसी स्‍लम क्षेत्र में उसकी भी एक झोपड़ी हो या उसे फुटपाथ पर रात गुजारने के पुलिस को पैसे न देने पड़े। मगर योजना आयोग को यह …

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएँ - सियासत, उधार की उम्र

चित्र
कंडे दा कंडासियासतभेड़ का मेमना नदी की ढलान पर पानी पी रहा था। अचानक उसकी नजर शेर पर पड़ी। शेर भी पानी पीने लगा। मेमने को अपने पड़दादा की कहानी याद आ गई। इसी तरह ही उसका पड़दादा भी एक बार पानी पीने लगा था तो शेर ने उसे यह कह कर कि तुम पानी जूठा कर रहे हो खा लिया था। यह कहानी मेमने की मां ने उसे कई बार सुनाई थी।मेमना थर-थर कांप रहा था। शेर मेमने के पास आया और कहने लगा,‘‘ बेटे क्या हाल है?’’‘‘ठीक है अंकल जी।’’ मेमने ने कांपते हुए कहा।‘‘तुम्हारे माता-पिता का क्या हाल है?’’‘‘सब ठीक-ठाक है अंकल जी।’’‘‘तुम अपनी सेहत का ध्यान रखा करो और अपने माता-पिता का भी। समझ गए न बेटे। मुझ तक कोई भी काम हो जब मर्जी चले आना। अभी तो मैं चलता हूं। कई काम पड़े हैं करने वाले।’’मेमना बहुत हैरान था। उसके माता-पिता तो कहते थे कि शेर अंकल से बच रहा करो परन्तु यह तो बहुत ही अच्छे अंकल हैं। मुझे बेवजह डराते रहे और मैं डरता रहा।यह सारा दृश्य शेरनी भी देख रही थी। उसने आते ही शेर को गुस्से में कहा,‘‘ मैंने तुम्हें शिकार करने को भेजा था और तुम मेमने के साथ बातें करके आ गए। मुझे कितनी भूख लगी है और तुम नरम-नरम मेमना छोड…

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा स्वार्थी

चित्र
स्वार्थी
रामू मोटरसाइकिल चला रहा था। राज पीछे बैठा था। राज ने अचानक कहा रोको-रोको। रामू ने गाड़ी रोक दिया और बोला क्या हुआ। राज बोला वह देखो उस दुकान में हमारे सर बैठे हुए हैं। जाकर मिल आऊँ। परीक्षा होने वाली है। प्रयोगात्मक परीक्षा की भी डेट आ गई है।
कुछ महीने बाद एक दिन फिर रामू गाड़ी चलाता हुआ जा रहा था। उस दिन भी राज पीछे बैठा था। रामू ने एकाएक गाड़ी रोक दिया। राज ने पूछा गाड़ी क्यों रोक दिया ? रामू बोला वहाँ तुम्हारे सर बैठे हैं। राज बोला चल यार। मैंने परीक्षा पास कर ली है।
रामू ने गाड़ी चला दिया। लेकिन अपने को यह कहने से नहीं रोक पाया कि राज तूँ बड़ा स्वार्थी है।
---------
डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
*********

प्रवासी साहित्य और साहित्यकार पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी

चित्र
संगोष्‍ठी समाचारदिनांक 27-28 फरवरी 2012 को खालसा कॉलेज फॉर विमेन, अमृतसर के हिन्‍दी विभाग द्वारा विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के सौजन्‍य से ‘प्रवासी साहित्‍य और साहित्‍यकार‘ विषय पर द्वि-दिवसीय अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्‍ठी में मुख्‍य अतिथि ब्रिटेन की प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍यकार डॉ. उषा राजे सक्‍सेना और सम्‍मान्‍य अतिथि डॉ. मधु सन्‍धु पूर्व प्रो. एवं अध्‍यक्ष हिन्‍दी विभाग, गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय, अमृतसर थी। संगोष्‍ठी में प्रवासी हिन्‍दी कविता, उपन्‍यास, कहानी, नाटक के साथ साथ वाचकों ने मारिशस से अभिमन्‍यु अनन्‍त, यूरोप से निर्मल वर्मा, अमेरिका से उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी, उमेश अग्‍निहोत्री, सुधा ओम ढींगरा, ब्रिटेन से तेजेन्‍द्र शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना, , दिव्‍या माथुर, अबू ढाबी से कृष्‍ण बिहारी, डेनमार्क से अर्चना पेन्‍यूली पर अपने प्रपत्रों में विचार व्‍यक्‍त किए। उषा राजे सक्‍सेना ने अपने भाषण में प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास पर विचार करते हुए इसका तीन चरणों में विभाजन किया- प्रथम सन्‌ 1930-50, द्वितीय 1950-90, तृतीय 1990-2010 तक । डॉ. मधु …

मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएं

चित्र
आकार भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी, जाग उठी नव स्वप्न का आकर लिए! जैसे बूँदे आ मिलती धरती से, मैं पिय-मिलन को आतुर वैसे ! जैसे सकुचाई, शरमाई खिलती कलियाँ, मैं पुलकित हो बँध जाऊ पिय आलिंगन में ! हर-सिंगार महकते हैं,रात को लुभाने को, मैं कर श्रृंगार पिय को लुभाऊं वैसे ! सुबह लाती है किरणें सजाकर उम्मीद की थाली, मै पिय का आंगन जगमगाऊं वैसे ! भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी अकेली मैं रात अकेली जागी ऐसे,  बिन सपनों की नींद जैसे ! मैं अकेली चली ऐसे,  बिन मंजिल की राहें जैसे ! मैं अकेली पगडंडी ऐसी,  बिना मुसाफिर सूनी जैसे ! मैं खड़ी चौराहे पर जैसे,  पाँव पड़ी जंजीरें जैसे ! मैं अकेली जीऊं ऐसे,  बिन मकसद का जीवन जैसे ! मैं रात अकेली जागी ऐसे -- समर्पण तब दोनों साथ चले थे हम अब पथ अलग हो गये अपनी आँखें ख़ाली कर ली सारे स्वप्न उसकी आँखों में भरे चेहरे का सारा आलोक मकरंद भरा सारा अल्हड़-पन जीवन की सारी ज्वाला यौवन की हर अभिलाषा उसको अर्पित कर दिए मैंने तब दोनों साथ चले थे हम अब पथ अलग हो गये अपने पांवों की धरा उसे देकर अंगारों पर चलना सहकर सौरभ सारे उसकी राहों मे…

प्रमोद भार्गव का आलेख - शीर्ष न्‍यायालय और गरीबी रेखा

चित्र
देश के गरीबी रेखा की खिल्‍ली उड़ाने के साथ योजना आयोग ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय की भी खिल्‍ली उड़ाई है। क्‍योंकि इसी न्‍यायालय ने दिशा-निर्देश दिए थे कि गरीबी रेखा इस तरह से तय की जाए कि वह यथार्थ के निकट हो। इसके बावजूद आयोग ने देश की शीर्ष न्‍यायालय को भी आईना दिखा दिया। गरीबी के जिन आंकड़ों को अनुचित ठहराते हुए न्‍यायालय ने आयोग को लताड़ा था, आयोग ने आमदनी के उन आंकड़ों को बढ़ाने की बजाए और घटाकर जैसे ईंट का जवाब पत्‍थर से देने की हरकत की है। राष्‍ट्र-बोध और सामाजिक सवालों से जुड़े मुद्‌दों को एक न्‍यायसंगत मुकाम तक पहुंचाने की उम्‍मीद देश की अवाम को सिर्फ सर्वोच्‍च न्‍यायालय से है, किंतु जब न्‍यायालय के हस्‍तक्षेप की भी आयोग हठपूर्वक अवहेलना करने लग जाए तो अच्‍छा है न्‍यायालय ही अपनी मर्यादा में रहकर मुट्‌ठी बंद रखे, जिससे आम आदमी को यह भ्रम तो रहे कि अन्‍याय के विरूद्ध न्‍याय की उम्‍मीद के लिए एक सर्वोच्‍च संस्‍थान वजूद में है ? हालांकि देश की गरीबी नापने के इस हैरतअंगेज पैमाने की फजीहत के बाद सरकार ने इसे फिलहाल खरिज कर दिया है और कोई नया सटीक पैमाना तलाशने का भरोसा जताया है। गरीब…

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथा - भगवान की मौत

चित्र
कंडे दा कंडा
-अमरीक सिंह कंडा भगवान की मौत
मैं अपनी बचपन की तस्वीरों वाली एलबम देख रहा था तो मेरी 7 वर्षीय पोती अपने पास आ गई और एलबम देखने लगी।
‘‘बड़े पापा, ये कौन हैं?’’
‘‘बेटा, ये मेरे मम्मी-डैडी हैं।’’
‘‘बड़े पापा, अपके मम्मी-डैडी कहां गए?’’
‘‘बेटे, वे भगवान के पास ऊपर चले गए।’’
‘‘बड़े पापा, वे भगवान के पास से कब वापस आएंगे?’’
‘‘यह देखो तुम्हापे मम्मी-डैडी की फोटो।’’ मैंने बात को टालते हुए कहा।
‘‘बड़े पापा, बड़े मम्मी कहां हैं?’’
‘‘बेटे, वह तो तेरे पैदा होने से एक वर्ष पहले ही भगवान के पास चले गए थे।’’ मैंने बड़ी मुश्किल से जवाब दिया।
‘‘बड़े पापा, सब लोग मर कर भगवान के पास चले जाते हैं?’’
‘‘हां बेटे, सब मर कर भगवान के पास चले जाते हैं।’’ मैंने एलबम बंद करते हुए कहा।
‘‘बड़े पापा इसका मतलब भगवान तो पहले से ही मरे हुए हैं।’’
... मुझे इसका जवाब नहीं सूझा और मैंने अपनी पोती को डांट कर भगा दिया।

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - इमर्जेंसी सूत्र

चित्र
(यह व्यंग्य सत्तर के दशक में लिखा गया था जब देश में इमर्जेंसी लगाया गया था. यूँ तो कहने को स्वतंत्रता हासिल है, मगर अपरोक्ष इमर्जेंसी तो हर ओर विद्यमान है इस लिहाज से यह व्यंग्य अभी भी सामयिक है.)इमरजेंसी-सूत्रयशवन्‍त कोठारीओम श्री डिक्‍टेटराय नमः।अथ श्री इमरजेन्‍सी सूत्र॥ 1टीका-हे डिक्‍टेटर महाराज आपको नमन करता हूं। अब मैं इमरजेंसी सूत्र का शुभारम्‍भ करता हूं। शंका-डिक्‍टेटर शब्‍द का भावार्थ समझाइये। निवारण-बालक ! जब कुर्सी जाने लगती है तब तानाशाही का उपयोग गोंद की तरह कुर्सी से चिपकाने के लिए किया जाता है। प्रतिशंका-ऐसी स्‍थिति में कुर्सी का मोह छूटता क्‍यों नहीं है ? प्रतिनिवारण-वत्‍स ! तुम बालक हो, कुर्सी तुमने देखी नहीं है, अतः तुम इसकी माया, मोह व ममता को नहीं समझ सकोंगे। त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव त्‍वमेव बंधुश्‍च सखा त्‍ममेव ॥ 2टीका-इमरजेन्‍सी में कुर्सी पर आसीन ही माता होता है, पिता होता है, बन्‍धु और मित्र होता है। शंका-ऐसा क्‍यों होता है ? निवारण-क्‍योंकि स्‍वाभिमानी व्‍यक्‍ति के अलावा सभी कई-कई मां-बाप रखते हैं। अतः उनके लिये कुर्सी ही मां-बाप है। आपातकाले सर्वत्र भयः व…

अमरीक सिंह कंडा की कहानी - कंडे दा कंडा

चित्र
कंडे दा कंडा-अमरीक सिंह कंडाआप जी....?आप जी का जन्म नहीं हो रहा था। समय दस महीने हो चुके थे। आप जी की माता ने ऊपर वाले के आगे अरदास की कि या तो मेरी जान निकाल लो या फिर ....। आप जी का जन्म 31 मार्च को पंजाब की धरती पर हुआ। उस दिन आप जी के बाप जी ने बहुत शराब पी हुई थी ज़्योंकि उस दिन ठेके टूटे हुए थे और शराब सस्ती मिल रही थी। जब आप जी के जन्म की बात आप जी के शराबी बाप को पता चली तो उन्होंने शराब की एक ढक्कन गुड़ती के रूप में आप जी के मुंह में डाल दिया। आपके बाप ने आपके जन्म की खुशी में सभी अड़ोसी-पड़ोसी टल्ली कर दिए। कईयों को तो दस्त और उल्टियां भी लगीं। कमजोर होने के कारण आप जी के बाप जी ने कई बार आपको अफीम भी चटाई। आप जी नशे में ही धीरे-धीरे बड़े हुए। नशे में जन्मे-पले होने के कारण आप जी नशे के बचपन से ही आदी थे। इस कारण नशा करने में आपको कोई दिक्कत नहीं आई। आप जी की प्रारम्भिक शिक्षा शुरू में ही खत्म हो गई परन्तु एक अफीम खाने वाले मास्टर ने आप जी को हिम्मत नहीं हारने दी। आप जी उसे कभी घर की निकाली शराब और कभी अफीम देते और वह हाजिरियां लगाता रहता। आप जी को पता ही नहीं चला कि कब आपन…

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के हाइकु नवगीत

चित्र
हाइकु नवगीतमेरा जीवनमेरा जीवन सुख - दुःख पूरित अंक गणित। और और की सघन कामना में जीवन बीता। आखिर मिला मुझे जीवन - घट रीता ही रीता किन्‍तु खड़ा था बड़ा अकड़कर मन - गर्वित। मैंने समझा मन - चौखट पर सुख बरसा। दुख ही मिला अचानक मुझसे, मन तरसा। सब नाते थे मतलब में रत , चंचल चित । खाली घटरहा खोजता मन अपनापन जीवन भर। मृग तृष्‍णा ने मरु-भूमि में खोजेसर, सागर। जिधर गया खाली ही घट था या टूटी गागर। मिले कुंज में घात लगाये बैठे कितने डर । कई बस्‍तियां छान छान करकेइतना पाया। उतर चुकी सब के ही भीतर भोगों की माया। जोड़ तोड़ में उलझे पाये सब बस्‍ती के घर। त्रिलोक सिंह ठकुरेला(संक्षिप्‍त परिचय) जन्‍म तिथि ः 01-10-1966 जन्‍म स्‍थान ः नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्‍तर प्रदेश पिता का नाम ः श्री खमानी सिंह माता का नाम ः श्रीमती देवी स्‍थायी पता ः ग्राम-नगला मिश्रिया, डाकघर-बसगोई, जिला-महामायानगर(उत्‍तरप्रदेश) साहित्‍य सृजन ः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्‍डलिया, बालगीत, लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित प्रकाशित कृति ः नया सवेरा (बालगीत संग्रह) प्रकाशक - राजस्‍थानी …

खलील जिब्रान की एक कविता

चित्र
अनुवाद - डॉ. पुनीत बिसारियाआपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं
वे स्वतः प्रवाहित जीवन में पुत्र और पुत्रियाँ हैं
वे आए हैं मगर आपसे होकर नहीं
आप उन पर अपना स्नेह तो थोप सकते हैं मगर विचार नहीं
क्योंकि वे स्वयं भी विचारवान हैं, विवेकशील हैं
आप उनकी देह को कैद कर सकते हैं, मगर आत्मा को नहीं
क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में विचरती है
जहाँ तक आप नहीं पहुँच सकते, सपने में भी नहीं .आप उन जैसा बन्ने का प्रयास तो कर सकते हैं
लेकिन उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते .
क्योंकि समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता
न वह अतीत से रूककर दो बातें करता है . आप वह धनुष हैं, जिस पर आपके बच्चे
तीर की भांति चढ़कर भविष्य की और जाते हैं
धनुर्धारी अनंत के पथ पर निशाना लगता है
और वह पूरी कोशिश करता है कि उसका तीर तेज़ी से
दूर और दूर और दूर तक जाये. धनुर्धारी के हाथों में कसे हुए अपने धनुष को
खुशियों के लिए कसा रहने दो
उस समय भी जब वह तीर को उड़ते देख प्रसन्न हो .
क्योंकि वह उस धनुष को भी उतना ही प्यार करता है
जो हिले डुले बगैर उसके पास रहता है (Dr. Puneet Bisaria)

देवेन्द्र कुमार पाठक की चैतहर कविताई

चित्र
नवगीत/चले चैतुए ~ - ~ - ~ अपने घर-गाँव छोड़ चले चैतुए ! कब तक भटकाएगी ? पगडण्डी पेट की , साँसोँ का कर्ज़भार छाती पर लादे : जाने किस ठौर-ठाँव करेँगे बसेरे ! बड़े भागवाले किस ख़ेतिहर के ख़ेत की फ़सल की कटाई की उम्मीदेँ बाँधे , खुले गगन तले कहीँ डालेँगे डेरे ; पुरखोँ की धरती की ममता के पिंजरोँ मेँ लगते चौमास लौट आएँगे ये सुए ! सोचेँगे जीने की और कोई नई जुगत , या बँधुआ हलवाही मेँ कस-फँस जाएँगे , दुर्गम दुर्दिन पर्वत लाँघेँगे जैसे-तैसे ; कड़वे मीठे कितने अनुभव पल भोग भुगत , नए सबक सिक्के मध मेँ गँठिये लाएँगे , बतियाएँगे बीते बंजारे दिन कैसे --

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की की कविताई/ बधाई ! नव विक्रम संवत्सर,चैती चाँद एवं गुड़ी पड़वा के अवसर पर एक ग़ज़ल

चित्र
ग़ज़ल/ अश्क-ए-ख़ून बहाकर ये गुज़र जाएगा | वो जो आएगा वो भी अश्के ख़ूं बहाएगा || अब कहीँ फेरो-बदल के कोई आसार नहीँ ; जलेगा रोम नीरो बाँसुरी बजाएगा || तरकशो-तीर वही होँगे पर शिकारी नए ; अधमरोँ का शिकार फिर से किया जाएगा || हम जिसे कह रहे हैँ आज अलविदा वो ही; ले नई शक्ल नये ज़ुल्म हम प ढाएगा || हादसा होगा नए ढंग से ' महरूम ' कोई ; घाव भरता हुआ फिर से हरा हो जाएगा | ---परिचय- देवेन्द्र कुमार पाठक (तख़ल्लुस 'महरूम') जन्म -02.03.1955;ग्राम-भुड़सा, ( बड़वारा )जिला-कटनी, म. प्र.में;शिक्षा-M.A.B.T.C.( हिंदी/अध्यापन)प्रकाशित पुस्तकेँ-'विधर्मी', 'अदना सा आदमी' (उपन्यास) 'मुहिम', 'मरी खाल:आखिरी ताल','चनसुरिया का सुख','धरम धरे को दण्ड' (कहानी संग्रह )'दिल का मामला है'( व्यंग्य संग्रह ) 'दुनिया नहीँ अँधेरी होगी' (गीत-नवगीत) व्यवसाय-अध्यापन; संपर्क- प्रेमनगर,खिरहनी.साइन्स कालेज डाकघर,कटनी 483501 म.प्र. ई मेल- devendra.mahroom@gmail.com

वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा की व्यंग्य एकांकी - जिन्दा ! मुर्दा !!

चित्र
व्‍यंग्‍य एकांकी -जिन्‍दा ! मुर्दा !!-वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रापात्र परिचयनर्स-बार्डबॉय-जमादारलेखक -संचालक -नेता -( पर्दा उठते ही मंच पर प्रकाश आने लगता है। मंच पर अस्‍पताल का बार्ड नजर आता है। पलंग पर एक मरीज लेटा हुआ है। उसके सिरहाने दीवान पर एक चार्ट टंगा हुआ है। एवं उसका झोला टंगा हुआ है। मरीज करवट बदलता है। इसी के साथ नर्स का प्रवेश तथा उसके साथ बार्ड बॉय भी मंच पर दिखाई देता है ) नर्स (बार्डबॉय से) - इस पलंग को जल्‍दी खाली करो। जमादार को बुलाओ। इस लाश को उठाकर इसके घरवालों को दे दो। पलंग पर दूसरे बिस्‍तर लगा दो आपरेशन थियेटर से मरीज आने वाला ही समझो। जल्‍दी करो। बार्ड बॉय - - अभी लो सिस्‍टर। जरा जमादार को बुला लाऊँ। ( मंव से पर्दै की ओर जाते हुये) जमादार! ओ जमादार भैया....अरे...ओ.....जमादार..... ( दूर मंच के पीछे से जमादार की आवाज आती है ) ”आ रहा हूँ भैया! आ रहा हूं। जरा गम तो खाया करो।“ ( जमादार मंच पर बार्ड बॉय के सामने आ जाता है ) बार्ड बॉय - तू लाश का नाम सुनते ही ऐसे खिसक जाता है जैसे आदमी के शरीर से उसका जीव। कम से कम बता-जता कर तो जाया कर। चल, जल्‍दी, एक पलंग को खाली करना …

गोविंद शर्मा के दो व्यंग्य - फरारी की सवारी, बंदरबांट

चित्र
फरारी की सवारीयह किसी फिल्म की कहानी नहीं है फिल्मों से प्रभावित होने वालों की कहानी है। पुलिस के अफसर, जो सरकार के समकक्ष होते हैं, फिल्मों के सिपाहियों की वर्दी से प्रभावित हो गये। उन्हें अपने सिपाहियों की खाकी वर्दी खाक लगने लगी। फैसला किया कि वर्दी का रंगढंग बदला जाना चाहिए। वह चुस्त दुरूस्त और वर्तमान से अलग भविष्य के किसी रंग की होनी चाहिए। मुजरिम पकड़ने या जुर्म की पड़ताल करने या जांच के तरीके सीखने के बहाने विदेश जाने की बजाय, इस बार वर्दी का डिजायन ढूंढने के लिये साहब लोगों ने अमरीका-इंग्लैड की यात्राएं सपरिवार की। एक डिजायन तय हो गया। एतराज आया कि यह ठंडे मुल्क की ड्रैस है। क्या अपने गर्म देश में भद्दी नहीं लगेगी? जवाब आया- आदमी गर्म-ठंडा होता है, मुल्क नहीं। वास्कोडिगामा ठंडे देश से इस मुल्क में आया था तब लंबे बूट और गर्म कपड़े का ओवर कोट पहन कर आया था, उसे तो गर्मी नहीं लगी। फिर कष्ट उठाकर जनता की सेवा करना तो हम पुलिस वालों का फर्ज है। एक सिपाही इस अनचाहे बोझ से परेशान हो गया। अपने नजदीकी साहब के पास गया। ’’साहब, मारे बोझ और गरमी के परेशान हो गया हूं। कोई बिना वर्दी की ड्…

प्रमोद भार्गव का आलेख - कथा-कविता समय के बहाने आकाशवाणी का ठसे और ठूंसों हुओं का साहित्‍य-सम्‍मेलन

चित्र
शिवपुरी/आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा आयोजित दो दिवसीय साहित्‍यिक आयोजन ने ठूंसे व ठसे गए साहित्‍यकारों के कारण गरिमा खो दी। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि देश के जिन जाने माने कथाकारों और कवियों को आयोजन में हिस्‍सा लेना था, ऐन वक्‍त पर एक-एक करके ज्‍यादातर ने शिवपुरी आने से इनकार कर दिया। इस कारण कार्यक्रम किसी तरह तरह से संपन्‍न हो जाए के नजरिए से आकाशवाणी ग्‍वालियर के आयोजनकर्ताओं को आयोजन की कमान सौंप दी गई। जिसका नतीजा यह निकला कि कुछ तो साहित्‍यकार ठूंस दिए गए, तो कुछ अपनी पहुंच और खुशामदी आचरण के चलते ठस भी गए। करीब दो दर्जन कवि, कथाकारों को अवसर दिया गया, लेकिन इस आयोजन का दुखद पहलू यह रहा कि पिछड़े और दलित वर्ग से एक भी साहित्‍यकार को आमंत्रित नहीं किया गया। नौकरशाही की मनमानी के चलते जिले के वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों को भी नकारा गया। दो दिनी इस आयोजन का एक सत्र कविता समय के नाम से समकालीन कविता के चुनिंदा कवियों के लिए समर्पित था तो कहानी सत्र समकालीन कहानी के लिए। आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा श्रोताओं को जो आमंत्रण दिया गया था, उसमें आमंत्रित कवियों में डॉ. परशुराम शुक्‍ल विरही शिवपुरी, कुमार अ…

असग़र वजाहत का नाटक - जिस लाहौर नइ वेख्या ओ जमया हि नइ - पीडीएफ ई बुक के रूप में पढ़ें या डाउनलोड करें

पिछले दिनों यह नाटक रचनाकार में धारावाहिक रूप से क्रमशः प्रकाशित किया गया था. यह पूरा नाटक आप यहाँ पर नीचे लिंक को क्लिक कर सीधे ही पढ़ सकते हैं या फिर पीडीएफ ई-बुक के रूप में निःशुल्क डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.--डायरेक्ट डाउनलोड लिंक से भी इसे डाउनलोड किया जा सकता है --Open publication - Free publishing - More asghar vajahat

मोतीलाल की कविता

चित्र
घरों में रात चढ़ गयी है और
अस्मिता की मद्धिम कराह
तीसरे पहर में भी रेलवे स्टेशन की तरह जाग रही है बेजान आँचल की हवा
नीले समुद्र से होकर नहीं बहती और अनवरत शोक गीत टीवी पर जारी है
नहीं यहाँ कोई आम नहीं बहुत ही खास
नहीं रहे है उनके बीच और
भाषा के अंतिम शब्द
प्याली में गिर चुके हैँ इस विकट शहर को अभी तक
ऊब ने नहीं छुआ है
रेत का लहराता टापू
प्रभु के मौन की तरह चुप है
इसी शहर में
जैसे जंगल घुस आया है चीटियों के घरों से होकर जो रास्ता
नींद के रास्ते से मिलता है
वह निवास आकृति कहीं नहीं मिलती है न कमीज के पाकेट में
न किताबों के अटारी में प्रक्रिया बदलाव की
सिमट गयी है टीवी पर
और ज्यामिति के कोण हमारे पांव में बदल गये हैँ और
हो गये हैं हम जरा से टेढ़े
इस टेढ़े समय में हमने पाल लिया है नीले पर्वतों की जगह देह मुक्त सुन्दरता को
और ड्राइंगरूम में बचा लिया गया है सीधे-साधे समय को
शैँपू किये गये बालों में प्रतीक्षा है रात कब उतरेगी
जैसे बिल्ली उतरती है पेड़ से ।* मोतीलाल/राउरकेला

अवधेश तिवारी की बुंदेली हास्य कविता - कँदर मँदर जी होवे...

कँदर मँदर जी होवे
       कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे
       पिया न लौटे अब तक बिन्नी मेरो मनुआ रोवे|      भुनसारे के निकरे कहखें चाँदामेटा जाहूँ
      आज फसनवारो है सट्टा चौउआ क्लोज़ लगा हूँ
      भुन्सारे सें संजा हो गई अब तक लौटो नईंयाँ
      मोहे लगत है ओपन क्लोज़ सुनई खे आहे सईंयाँ
      लड़का बच्चा सबरे जग रये मुन्ना बी न सोवे
      कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे|       इत्तो सुनखे मुन्ना बोलो बऊ तू मत कँदराये
      पक्कई चऊआ फँद गओ ओको जभई न दद्दा आये
      पहले वे सट्टा पट्टी वारे सें लेहें चुकारा
      फिर वे लेहें पोलका तोरो,मेरो मीठा खारा
      नईहाँ दम बऊ कोई की,दद्दा को रुपया डोबे
      कँदर मँदर मत होवे बऊरी कँदर मँदर मत‌ होवे|       बात चलत्ती कि इत्तई में दद्दई आत दिखाने
      मुहड़ो पूरो तुतरा गओ थो लग रये थे खिसयाने
     मुन्ना समझ गओ दद्दा ने ले लओ तगड़ो पऊआ
      दद्दा बोले दुक्की आ गई फिर नईं आओ चऊआ
      इत्तो सुनखे मुन्नी की बऊ धड़ने गिर गई आड़ी
      किस्मत की गबदस में फँस गई अब जिनगी की गाड़ी
      पर मुन्नी हँसखे बोली दद्दा‍..मती खेलियो सट्टा
      बिक जाहें रे…

राजा अवस्थी के दो नवगीत - घर कभी निर्मम नहीं होता

चित्र
घर-1घर कभी निर्मम नहीं होता
कहीं माँ से कम नहीं होता आँधियाँ कठिनाइयों की
जब चलें तो;
स्वार्थ प्रेरित छद्म  भी
जब-जब छलें तो;
पथ सभी अवरुद्ध -से
लगने लगें तो
उन क्षणों में भी कभी
बेदम नहीं होता.नेह, धीरज,शांति,
निष्ठा  पाठशाला ;
किलकते सम्बन्ध अविरल
घर उजाला;
समाया त्रासद जब हुआ
घर ने सम्भाला
घर कभी   घर से
कहीं भी कम नहीं होता.घर बनाने में हवन
होती रही माँ;
घर कभी  बिखरा
तो  फिर रोती रही माँ;
पिता की आँखों का घर
जब पुत्र  ने देखा
फिर  कभी नीचा
कोई परचम नहीं होता.
घर-२घर की आस लिए लौटा घर
कोई बरसों बाद.
उमग उठा उल्लास
मोहल्ले भर में बरसों  बाद.वही द्वार- दीवारें,छप्पर,
आँगन  पथरीला ;
गोबर लिपा महकता चौका
कुछ सीला-सीला ;कहाँ रहे,क्यों भूले ,
कैसे बीते इतने साल,
प्रश्न लिए नज़रें चहरे पर
झेलीं बरसों  बाद.परछी एक और दो कमरे
कितनी जगह लिए;
अपनों और अपिरिचित को भी
मन भर जगह दिए;कोई भूले तो भूले पर
घर को याद रहे
वही नेह मकरंद लिए
मिल जाता बरसों बाद.भाई और भतीजों के मन
बंटवारे का खटका;
नए बने पक्के कमरों में
भौजी का मन अटका;द्वार ताकती रहीं
प्रतीक्षा में जाने कब से,
जी भर कर अम्मा की आँखें 
बरसीं बरसों बाद.--(चित्र - नवसिद्…

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : कथन की वापसी

प्राचीन समय में ऐसे भी राजा होते थे जो अपने कथन की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दिया करते थे। और तो और स्वप्न में दिए गये कथनों तक की रक्षा में राज पाट व राज सुख भी त्याग देते थे। लेकिन आज के राजाओं के लिए अपना कथन वापस लेना बाँयें हाथ का खेल हो गया है। कुछ भी बोल दो। बात बन जाये तो ठीक है । यदि कोई बवाल दिखे तो कथन वापसी की घोषणा कर दो। कथित माफी माँग लो। क्या जुगत है। कोई प्रश्न कर सकता है कि आज राजा कहाँ हैं ?  यदि हैं भी तो उनके पास राज पाट नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है। पहले एक राज्य में सिर्फ एक राजा होता था। आज एक राज्य में हजारों राजा होते हैं । ऐसे ही एक राजा यानी राजनेता हैं चिरौंजीलाल जी। पहले ये भी आम आदमी थे। आदमी तो अब भी हैं लेकिन आम नहीं हैं। आज इनके पास दाम है। नाम है। कम से कम देश में ही सही। खैर काम क्या है ? सरकारें बनाते, चलाते और गिराते हैं। जनता को दिलासा देते हैं। हिन्दुस्तानी सहनशील व दार्शनिक प्रवृत का होता ही है। अतः नेता की बात उसे अच्छी तरह समझ में आती है कि- " तत्काल नहीं वर्षों में हल।आज नहीं तो होगा कल "।।आखिर करे भी तो क्या ? अपनी न्याय व्…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.