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March 2012
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भ्रष्‍टाचार दो शब्‍दों से मिलकर बना है। भ्रष्‍ट+आचार। जिसका अर्थ हुआ भ्रष्‍ट आचरण। जिस तरह से आचरण से गिरा व्‍यक्‍ति पतित-दुराचारी कहलाता है। वैसे ही साफ-सुथरी से रिश्‍वत-कामचोरी की व्‍यवस्‍था अपना लेना भ्रष्‍टाचार है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो जब कोई कार्य नियमों का उल्‍लंघन कर अथवा गलत तरीके से किया जाय तो वही भ्रष्‍टाचार है। हमारे धर्मग्रन्‍थों में आचरण को बड़ा महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया गया है। धन से हीन व्‍यक्‍ति हीन नहीं माना जाता किन्‍तु आचरण से हीन व्‍यक्‍ति हीन(मरे हुए के समान) माना जाता है यथा-

वृत्तं यत्‍नेन संरक्षेद वित्तमायाति याति च।

अक्षीणेां वृत्ततः क्षीणों वृत्तत वस्‍तु हतोहतः॥

हमारे देश में भ्रष्‍टाचार शब्‍द कोई नया नहीं है। आजादी के कई दशकों के बाद हमने किसी भी क्षेत्र में पर्याप्‍त प्रगति न की हो, लेकिन भ्रष्‍टाचार के क्षेत्र में हमारे लिए विश्‍व में एक-दो देशों को छोड़कर कोई चुनौती नहीं है। आजादी के बाद ही यद्यपि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू द्वारा कहा गया था कि भ्रष्‍टाचार करने वाले व्‍यक्‍ति को निकटतम खम्‍भे(पोल) पर लटका देना चाहिए। लेकिन इसके कुछ समय बाद ही उनके मन्‍त्रिमण्‍डल के एक सहयोगी पर भ्रष्‍टाचार का आरोप लगा, सिद्ध हुआ तब भी वे कोई दण्‍ड न दे पाये थे। तब से पड़ा भ्रष्‍टाचार का बीज महाराष्‍ट्र में अंतुले से, शेयर, टेलीफोन, यूरिया, हवाला, बोफोर्स, चीनी,ताबूत, लाटरी, चारा, सांसद रिश्‍वत, तहलका, तेलगी, दूरसंचार, कामनवेल्‍थ, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्‍नपत्र लीक करने जैसे अनेकाने पड़ावों का सफर तय कर चुका है। परिणामतः प्रवासी भारतीयों को छोड़कर इतना पैसा स्‍विस जैसी विदेशी बैंकों में जमा है, जितने से भारत के प्रत्‍येक गरीब का जीवन खुशहाल बनाया जा सकता है। ट्रांसपेरेसी इंटरनेकशनल इंडिया के सर्वे के अनुसार भारत के लोग सार्वजनिक सेवा के बदले प्रतिवर्ष 26728 करोड़ रूपया नौकर शाहों की जेब में डालते हैं।

यह धनराशि हिन्‍दुस्‍तान के रक्षाबजट का करीब आधा है। वहीं सकल घरेलू उत्‍पाद का 1.5 प्रतिशत है। यही नहीं देश का प्रत्‍येक दसवां व्‍यक्‍ति भ्रष्‍टाचार से प्रभावित है। जहां तक विविध सेवा क्षेत्रों का प्रश्‍न है देश की दस शीर्ष सेवाओं (भ्रष्‍ट) में स्‍वास्‍थ्‍य सेवा नम्‍बर एक पर, ऊर्जा दो पर और शिक्षा नम्‍बर तीन पर है। यही नहीं देश की न्‍यायिक सेवा के आंकड़े भी चौकाने वाले हैं। जहां एक अनुमान के अनुसार 2510 करोड़ रूपये बतौर घूस के दे दिये जाते हैं। जिसके परिणाम स्‍वरूप ही देश के प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति के विरुद्ध वारंट जारी कर दिये जाते हैं जबकि अपराधियों, माफियों के विरुद्ध वारंट वर्षों तामील नहीं हो पाते हैं।

राष्‍ट्र की विविध सेवाओं में भ्रष्‍टाचार था। इस मामले में शिक्षा जगत काफी पीछे था। अपनी पारदर्शिता व लोकप्रियता के स्‍तर पर निरन्‍तर आगे बढ़ रहा था। लेकिन जब कतिपय शिक्षकों के द्वारा विद्यार्थियों को अपने यहां टयूशन पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया तो इस विभाग का नम्‍बर भी तीसरा हो गया। इसके साथ ही माध्‍यमिक स्‍तर से प्रशिक्षण काल, डिग्री लेने, नियुक्‍ति पत्र लेने, नियुक्‍ति पाने, व्‍यवसाय चयन, शिक्षण अवकाश, चिकित्‍सा अवकाश, विविध देयकों के भुगतान, बोनस, टी0 ए0, डी0 ए0 एरियर आदि के लिए अपेक्षा से अधिक बिलम्‍ब, सुविधा शुल्‍क की मांग, अनावश्‍यक कमियां निकालना आदि के कारण शैक्षिक जगत भ्रष्‍टाचार के चरमोत्‍कर्ष पर पहुंच गया। और इसमें आग में घी डालने का कार्य किया रमसा के अन्‍तर्गत आने वाले अगाध पैसे ने। ऊपर से आडिट की लचर व्‍यवस्‍था। कभी महामुनि भर्तृहरि द्वारा कही जाने वाली-किं किं न साधयति कल्‍पलतेव विद्या।‘ भ्रष्‍टाचार के मकड़जाल में उलझ गयी। सत्‍यमेव जयते का सिद्धान्‍त भ्रष्‍टाचार मेव जयते बन गया।

यदि हम शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार के संभावित कारणों पर विचार करें तो निजी, गैर सरकारी, संस्‍थाओं में प्रबन्‍ध तंत्र की भूमिका, शासकीय में अधिकारी वर्ग की अपने अधीनस्‍थों पर अधिक निर्भरता, निजी संस्‍थाओं में कम वेतन देना और अधिक पर हस्‍ताक्षर करवाना, सत्रारम्‍भ में छँटनी करना महिला शिक्षकों का शोषण, कहीं-कहीं पर प्रबन्‍धकों द्वारा शैक्षिक प्रमाणपत्र अपने पास रखकर मनमानी करना, प्रवेश प्रक्रिया, डिग्री प्राप्‍ति, साक्षात्‍कार, प्रवेश परीक्षाओं व नियुक्‍ति में खुला व्‍यापार, प्रायोगिक परीक्षाओं का धन-बल से अंकन किया जाना आदि माने जा सकते हैं। वहीं वर्तमान समय में बढ़ रही रिश्‍वत खोरी की प्रवृत्ति, स्‍वार्थपरता, जमाखोरी की भावना, जातिवादी धारणा, बढ़ती महंगाई, नैतिकता की कमी, श्रम के प्रति उदासीनता, कर्त्तव्‍यनिष्‍ठा में कमी, शिक्षा का राजनीतिकरण, शीघ्रातिशीघ्र नियुक्‍ति, पदोन्‍नति, कार्य की पूर्ति करवाने की ललक, द्वेष की भावना आदि कारण भी शैक्षिक जगत में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार के कारण है। वहीं कुकुरमुत्ते की तरह गैर पंजीकृत संस्‍थाओं, कोचिंगों का खुलना, मनमाने पाठय्‌क्रमों का प्रयोग, उनमें कम पढ़े लिखों के बिना अंकुश के बच्‍चों को सौंपना कहीं न कहीं भ्रष्‍टाचार को बढ़ाता है। दूसरी ओर कुशल अध्‍यापक के द्वारा मन्‍द बुद्धि बालक को घर पर बुलाकर अतिरिक्‍त सहायता देना टयूशन की श्रेणी में लाना भी शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार को बढ़ाता है। हालांकि पूरी कक्षा को टयूशन के लिए प्रेरित करना, न पढ़ने वालों को कम अंक देना या फेल करने की धमकी देना पाप ही नहीं अध्‍यापक के आचरण के प्रतिकूल है। उसका अपना कर्त्तव्‍य से पीछे हटना है। इसके अतिरिक्‍त कस्‍बों, शहरों से लेकर बड़े नगरों तक में अधिकांश अभिभावकों द्वारा अपने बच्‍चों की आवश्यकता के अनुसार नहीं आस-पड़ोसियों व नाते-रिश्‍तेदारों पर रौब डालने के लिए टयूशन अधिक पढ़वायी जा रही है। के0 जी0 नर्सरी वाले बच्‍चों के लिए टयूटर को 400-500 रुपये तक दिये जा रहे हैं।

प्राचीन काल में गुरु द्रोण को अभावों के चलते दूध के स्‍थान पर आटा घोलकर अपने पुत्र अश्‍वत्‍थामा को पिलाना पड़ा था। उन्‍होंने पद का दुरुपयोग करते हुए मोहवश एकलव्‍य का अंगूठा मांगा था जबकि आज ऐसी स्‍थिति नहीं है शिक्षकों को पर्याप्‍त वेतन, सुविधायें मिल रही हैं। उनको अधिक टयूशन की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। दबाब की राजनीति न कर स्‍वकर्त्तव्‍य का निर्वहन करना चाहिए। यदि कोई छात्र मन्‍द बुद्धि अथवा गरीब है तो उसका सहयोग करना कोई अपराध नहीं है।

शिक्षा-शिक्षण प्रभावित हो रहा है, बल्‍कि शिक्षकों में दायित्‍व निर्वहन की भावना कम हो रही है। वह सम्‍पूर्ण पाठ्‌य-शिक्षण- प्रशिक्षण पाठ्‌यक्रमों को न पढ़ाकर टाप टेन, महत्‍वपूर्ण जैसी पद्धतियों का सहयोग ले रहा है। शिक्षा-शिक्षण का स्‍तर गिर रहा है। शिक्षक की मानसिकता, व्‍यवहार व आचरण भी प्रभावित हो रहा है। उदाहरणार्थ-यदि किसी अध्‍यापक के चिकित्‍सा, बोनस, टी.ए., डी. ए. जी.पी. एफ. अग्रिम आदि के सभी देयक निश्‍चित प्रतिशत लेकर पास किये जा रहे हों तो क्‍या वह वैसा ही निष्‍ठापूर्वक अपनी कक्षा में शिक्षण कार्य करेगा जैसाकि इन सभी के बगैर प्रतिशत दिये पास होने पर करता था। मुझे तो नहीं लगता।

निजी संस्‍थाओं में कम वेतन वाले अध्‍यापकों की मनःस्‍थिति किसी से छिपी ही नहीं है। साथ ही गत कई वर्षों से उत्तरप्रदेश व उत्तराखण्‍ड में स्‍वकेन्‍द्र परीक्षाप्रणाली ने माध्‍यमिक शिक्षा को भ्रष्‍टाचार के और समीप कर दिया है जिससे ही कतिपय संस्‍थायें, संस्‍था प्रधान, शिक्षक अपना परीक्षाफल येन-केन प्रकारेण परीक्षाओं में नकल करवाकर साध रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षा गुणात्‍मक दृष्‍टि से रसातल में जा रही है। 35 प्रतिशत न ला पाने वाला छात्र 75-80 प्रतिशत ला रहा है। वहीं 75-80 वाला 55-60 पर सिमट रहा है। अध्‍यापक और बच्‍चे दोनों अपने कर्त्तव्‍य से भागने लगे हैं। फल बिना श्रम मिल रहा है।

मनुष्‍य यदि अपने आचरण को सुधार ले तो उसकी समस्‍त बुराईयां नष्‍ट हो जाती है। वैसे ही शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार की समस्‍या के समाधान के लिए हमें शिक्षाजगत के उच्‍चाधिकारियों से लेकर स्‍वच्‍छकार तक की गरिमा व आचरण को बदलने का प्रयास करना होगा। प्रत्‍येक पहलू, शिक्षक चपरासी, प्रशासन, प्रबन्‍धक, अभिभावक, छात्र, प्रधानाचार्य, अधिकारी वर्ग आदि में अपने कर्त्तव्‍य निर्वहन के प्रति जागरूकता लानी होगी। साथ ही ऊपर से नीचे तक शैक्षिक जगत की गतिविधियों पर एक मजबूत गोपनीय तंत्र विकसित करना होगा। जो इन सब पर तत्‍काल आवश्‍यक व कठोर समय बद्ध कार्यवाही कर सके। अभिभावकों की जागरूकता संस्‍थाओं को अधिक कल्‍याणकारी, बच्‍चों को लगनशील बनायेगी, वहीं शिक्षकों के हितों की रक्षा, छात्र कल्‍याण का मार्ग प्रशस्‍त करेगी। शिक्षण, प्रशिक्षण, नियुक्‍ति, पदोन्‍नति, स्‍थानान्‍तरण, पेंशन, भुगतान आदि प्रकरणों के लिए स्‍पष्‍ट पारदर्शी नीति बनानी पड़ेगी।

उपरोक्‍त के अतिरिक्‍त अन्‍य उपाय भी हो सकते हैं। शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त किये बिना स्‍वामी दयानन्‍द, विवेकानन्‍द, गाँधी, सुभाष, टैगोर, नेहरू, अम्‍बेडकर, शास्‍त्री, कलाम जैसे शिष्‍यों की कल्‍पना नहीं की जा सकती है और न ही गुरु संदीपन, रामानन्‍द, चाणक्‍य, राधाकृष्‍णन व जाकिर हुसैन जैसे गुरु प्राप्‍त हो सकते हैं।

सम्‍पर्कः- दुबौला-रामेश्‍वर-262529 पिथौरागढ़-उ.अखण्‍ड

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शशांक मिश्र भारती

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर&242401 m0iz0 9410985048

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कंडे का कंडा

लंगड़ा आम

‘‘पंडित जी, हमारा काम नहीं चलता। यह हमारा टेवा देखिए और हम पर कृपा कीजिए।’’ लाला विष्णु प्रताप ने पंडित से कहा, ‘‘आपकी तो ग्रह चाल ही बुरी है। आप तो आज मरे या बस कल मरे ही समझो। आपका जानलेवा एक्सीडैंट हो सकता है।’’ लाला जी ने याचना भरे स्वर में कहा, ‘‘पंडित जी, कोई उपाय कीजिए।’’

पंडित जी ने कहा, ‘‘ठीक है। तुम आज रात को 11 किलो लंगड़ा आम लंगड़ाते हुए ठीक रात को 9 ११बजे हमारे दरवाजे पर रख जाना और पीछे मुड़ कर मत देखना। याद रखना तुमने लंगड़ा आम लंगड़ाते हुए देकर जाना है। मैं देवताओं को समझा लूंगा और तुम्हारा उपाय कर दूंगा। 9 बजे तक तुम्हारा हवन पूरा हो जाएगा। हवन सामग्री के लिए 2100 रुपए दे जाओ। यह बात किसी को मत बताना, नहीं तो हवन भंग हो सकता है। अब तुम जाओ और जाकर आम खरीद कर रख लो। याद रखना ठीक रात 9 ११बजे आना है।’’ बेचारा विष्णु प्रताप 40 रुपए किलो वाला लंगड़ा आम लेकर रात को 9 ११बजे लंगड़ाते हुए पंडित जी के दरवाजे पर रख कर मुड़ा ही था कि गली के कुत्तों ने लाला की धोती फाड़ दी और उसकी टांग पकड़ ली। इतने में पंडित जी अपने लड़कों के साथ शोर सुन कर बाहर निकले। ‘‘हरे राम, हरे राम।’’ कहते हुए पंडित जी ने लाला जी को उठाया और उनके लड़कों ने कुत्तों को पत्थर मार कर भगा दिया। वे लाला जी को अंदर ले आए और पानी पिलाया। पंडित जी ने आम संभालते हुए कहा, ‘‘देखा लाला जी, आप बच गए। मैं आपका ही हवन करके आया था। चलिए धोती से ही काम बन गया। जाते हुए टैटनस का टीका लगवा लेना।’’ लाला जी ने कहा, ‘‘आप धन्य हो पंडित जी, आपने मेरी जान बचा ली। मेरे लायक कोई और सेवा हो तो बताएं।’’ पंडित जी ने कहा, ‘‘सेवा तो कोई नहीं बस सवा 2 किलो साबुत मांह लेकर महीने के हर पहले शनिवार हमें दे जाया करो। यदि कोई ग्रह बुरा होगा तो वह भी सीधा हो जाएगा।’’ लाला जी पंडित जी के पांव छू कर चले गए। पंडित जी का परिवार लंगड़े आम काट कर खा रहा था। पंडित जी आज लाई 2100 रुपए की रैड नाइट की पेटी में से बोतल निकाल कर पैग लगा रहे थे। 4 पैग पी कर सुरूर में आकर कहने लगे, ‘‘भाग्यवान तू कहा करती थी कि साबुत मांह हमेशा खत्म रहते हैं। मैंने इस का पक्का इलाज कर दिया है। अब लाला हर महीने की शुरूआत में मांह देकर जाएगा। इस तरह के 2-3 और मुर्गे फंस गए तो अपने तो वारे-न्यारे हो जाएंगे।’’

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बिजी डे

‘‘आज मेरा क्या प्रोग्राम है?’’ स्वास्थ्य मंत्री भाटिया ने अपने पी.ए. से पूछा।

‘‘सर, आज थोड़ी बिजी डे है। सब से पहले आपने सुबह की सैर करनी है और उसके बाद ताजे फलों का जूस पीना है। उसके बाद डाक्टर चोटानी के अनुसार घुटनों की दवाई लेनी है। ठीक एक घंटे बाद ब्रेकफास्ट करना है और उसके बाद डाक्टर कुलविन्द्र के पास अपना हार्ट चैक करवाने जाने है। उसके बाद डैंटल स्पैशलिस्ट डा. अमरजीत बिंदर को अपने दांत दिखाने जाना है। सर, उसके बाद आपने लंच लेना है। फिर दो घंटे आराम करना है। शाम को आपने ठेकेदार सैमी साहब के घर चाय पीने जाना है। उसके बाद समाचार पत्र झगड़ू एक्सप्रैस के रिपोर्टर को अपना इंटरव्यू देना है। इंटरव्यू का विषय है आप अपनी बिजी लाइफ से गरीबों के लिए कैसे टाइम निकाल पाते हो। सारी डिटेल मैंने लिख दी है। आप के कहे मुताबिक फोटोग्राफर को भी बुला लिया है। नकली लूले, लंगड़ों तथा कुछ गरीब औरतों को 20-20 रुपए दे कर बुला लिया है। आप ने ये सिलाई मशीनें तथा कुछ हैंडीकैप्ड लोगों को साइकिलें देनी हैं। उसके बाद आप ने होटल दिलरूबा में डिनर करने जाना है।’’ पी.ए. ने दिन की लिस्ट पढ़ कर मंत्री जी को सुना दी।

‘‘आज तो मेरा बहुत बिजी डे है।’’ मंत्री जी ने हंसते हुए कहा।

DR AMRIK SINGH KANDA

1764,GURU RAM DASS NAGAR

MOGA-142001 PB

INDIA

व्यंग्य

लो हट गई गरीबी!

डॉ. रामवृक्ष सिंह

बचपन में एक नारा सुनते थे-गरीबी हटाओ। लेकिन आज चार दशक बाद भी, जब बुढ़ापा हमारे जिस्म और ज़हन, दोनों पर दस्तक देने पर आमादा हो रहा है, तब भी गरीबी जस की तस है। उसका हटना तो दूर, अलबत्ता वह बढ़ रही है। बल्कि हमें तो लगता है कि उसकी ज़द में अब बड़े-बड़े हाकिम-हुक्काम और नेता साहिबान भी आ गए हैं। यदि ऐसा न होता तो लोग अपनी इज्जत-आबरू दाँव पर लगाकर बस पैसा बनाने के चक्कर में इतने बड़े-बड़े गड़बड़- घोटाले क्यों करते? ज़रूर इन बेचारों पर ग़रीबी की बेतहाशा मार पड़ रही होगी, तभी तो कुछ और पैसे बनाने के लिए ऊल-जलूल कारनामे करने निकल पड़ते हैं। चाहे उसके लिए उनको अपनी इज्जत ही क्यों न गँवानी पड़े। ग़रीब न होते तो ऐसा करने की उन्हें क्या ज़रूरत थी! इसी को कहते हैं मरता, क्या न करता! पैसे कम पड़ रहे हों और ग़रीबी के मारे जान पर आ पड़ी हो तो आदमी कुछ भी कर गुजरता है- बुभुक्षितं किं न करोति पापम्!

हमें तो लगता है कि देश से ग़रीबी हटाने का जो अभियान हमारे बचपन में चला था, यह ऊंचे लोगों द्वारा मचाई गई लूट-खसोट भी उसी अभियान का एक हिस्सा है। इस प्रक्रिया में देश का एक तबका इतना ऊपर पहुँच गया है कि वहाँ से उसे आम आदमी के दुःख-दर्द नज़र ही नहीं आते। अपने बैकुंठ धाम में बैठे भगवान को जैसे आज भी सवा रुपया ही बहुत बड़ी रकम प्रतीत होता है, वैसे ही मृत्यु-लोक में अपने पुरुषार्थ से स्वर्गिक सुख-साधन जुटाकर बैठे हमारे आकाओं को भी अब भी कुछ-कुछ ऐसे ही मुगालते हैं। हालांकि चवन्नी अब प्रचलन में नहीं रही, लेकिन सवा रुपये का माहात्म्य अब भी बरकरार है।

लिहाजा देश के जिस हिस्से और तबके में अपनी आमद-रफ्त और बसाहट है, वहाँ देखते हैं तो मन जार-जार रो उठता है। वहाँ से तो गरीबी हटने का नाम ही नहीं ले रही। इधर महँगाई है कि मुई गरीब की बेटी की तरह रात-दिन लगातार बढ़ती ही चली जाती है। सोना तीस हजारी हो चला। अब गरीब आदमी अपनी दुल्हन के लिए सोने की मुंदरी और मंगलसूत्र भी गढ़वाने की नहीं सोच सकता। दूध चालीस रुपये लीटर हो चला। दाल सत्तर पार और तेल अस्सी से ऊपर। आटा-चावल बीस-बाईस से कम नहीं। यानी हर चीज महँगी होती चली जा रही है। लेकिन चमत्कार देखिए कि अपने आका कह रहे हैं कि गरीबी घट रही है।

इस सोच के पीछे एक बहुत बड़ा राज़ है। हमारे होनहार मार्केटिंग महारथियों ने महँगाई को कमतर दिखाने का एक तोड़ निकाल लिया है। पहले जो चाय-पत्ती का पैकेट आपको पैँसठ रुपये में मिलता था, वह महँगाई बढ़ने के बाद भी पैंसठ में ही मिल रहा है। बस फर्क इतना आया है कि पहले उसमें पाव भर यानी टू फिफ्टी ग्राम चाय-पत्ती रहती थी, अब उससे लगभग पंद्रह प्रतिशत कम यानी टू फिफ्टीन ग्राम चाय रहती है। बेचने वाले से पूछो तो वह युधिष्ठिरी सत्य बोलता है- टू फिफ्टी(न) ग्राम है। न का उच्चारण वह वैसे ही खा जाता है, जैसे धर्मराज युधिष्ठिर ने- नरो वा कुंजरो वा- बोलते समय किया था। उपभोक्ता को जब तक इसका बोध होता है, वह सदमे की क्रिटिकल स्टेज से बाहर निकल चुका है और संतोष कर लेता है-दुनिया में जो आए हैं तो जीना ही पड़ेगा।

कुछ-कुछ इसी तर्ज़ पर अपने अर्थशास्त्री लोगों ने एक झटके में देश की ग़रीबी घटाने का उपाय खोज निकाला है। अंतरराष्ट्रीय रूप से यदि किसी व्यक्ति की क्रय-शक्ति प्रति दिन सवा डॉलर से कम है तो वह गरीब है। इस लिहाज से अपने देश के लगभग 40 प्रतिशत लोग अत्यधिक गरीब हैं। इस दृष्टिकोण में केवल भोजन को आधार बनाया गया है और स्वास्थ्य, शिक्षा आदि पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है। इसीलिए कभी-कभी गरीबी रेखा को भुखमरी रेखा का नाम भी दिया जाता है। वस्तुओं के दाम बढ़ने के कारण एक ओर इस मानदंड को बढ़ाकर सवा डॉलर के बजाय दो डॉलर करने की बात हो रही है, वहीं दूसरी और हमारे देश में इसे घटाकर लगभग साढ़े अट्ठाईस रुपये कर दिया गया है।

सच कहें तो अपने देश के अर्थशास्त्रियों को यह बिलकुल नहीं सुहाता कि सोने की चिड़िया कहलानेवाले इस भारत में कोई ग़रीब रहे। इसलिए उन्होंने तय किया कि शहरों में अट्ठाईस रुपये और गाँवों में बाईस रुपये प्रतिदिन उपभोग करनेवाले लोग गरीब नहीं, बल्कि उसके उलट, यानी सम्पन्न कहलाने के पात्र हैं।

इस एक उपाय के करने मात्र से देश की ग़रीबी अचानक गायब हो गई है। अब अपने देश में ग़रीब आदमी ढूंढ़े से भी नहीं मिलेगा, क्योंकि शहरों में अट्ठाईस और गाँवों में बाईस रुपये दैनिक का व्यय तो हर कोई करता है, आबाल-वृद्ध। बल्कि हमें तो लगता है कि गरीब आदमी को अब अपने देश की लुप्त-प्राय प्रजाति घोषित करके उसके संरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी। ताकि आनेवाली पीढ़ियों को बताया और दिखाया जा सके कि देखो गरीब इसे कहते हैं। हमें बड़ा डर लग रहा है कि यह गुरुतर दायित्व कैसे पूरा होगा। अब अपने यहाँ गरीब तो रहे नहीं।

अपने देश में अमीरों की संख्या अचानक बढ़ गई, यह तो वाकई बड़ी खुशी की बात है। लेकिन हमारी चिन्ता का एक सबब और है। कई दशक से हमें विदेशों से बहुत सारी इमदाद इसी मद पर मिलती थी। गरीब थे तो इमदाद थी। कई-कई सौ करोड़ रुपये इधर से उधर हो जाते थे। बड़े-बड़े लोगों, गैर सरकारी संगठनों और विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों की ग़रीबी और भूख उससे दूर होती थी। अब उसकी कोई जरूरत ही नहीं बची। न बचे ग़रीब, न रही इमदाद। अब विश्व बैंक और यूरोप की ढेरों संस्थाओं से मदद पाने का हमारा हक जाता रहा। हाँ, यह जरूर है कि अब चूंकि अपना देश अमीरों का देश हो चला, तो दुनिया के जो गरीब लोग हैं, उनके लिए हमें कुछ सोचना चाहिए। वैसे यह काम हम पहले भी चोरी छिपे कर रहे थे और स्विटजरलैंड के बैंकों की गरीबी दूर करते चले आ रहे थे। लेकिन अब हम खुलकर दुनिया के ग़रीब देशों की मदद कर सकते हैं।

अब देश के दहकान और मजूर सब अमीर हो गए। इस नाते अब पूर्ववर्ती अमीरों तथा परवर्ती अमीरों के बीच रोटी-बेटी का नाता करने में कोई अड़चन नहीं रहनी चाहिए। अब किसी अमीरजादी का बाप किसी पूर्ववर्ती गरीब बाप के बेटे को यह कहकर ताना नहीं दे पाएगा कि पहले अपनी औकात देखो। यदि भूल से उसके मुँह से ऐसी कोई बात निकल गई तो लड़का चट से कह सकता है कि अंकल अब मैं भी गरीब नहीं हूँ। अट्ठाईस रुपये का गुटका और पान मसाला चबाकर थूक देता हूँ हर रोज। पचास रुपये का पउवा ऊपर से चढ़ाता हूँ हर शाम। रिक्शे खींचनेवाले और बीएमडब्ल्यू में चलनेवाले, दोनों की कैटेगरी अब एक हो गई। वाह! यह तो समाजशास्त्रीय दृष्टि से बड़ी प्यारी बात हो गई।

मार्क्स चचा आज यदि जिन्दा होते तो हमारे अर्थ-शास्त्रियों की कदमबोसी करते। अर्थशास्त्रियों ने ऐसा उपाय खोज निकाला है कि देखते ही देखते भारत का सर्वहारा भी मर्दुआ बुर्जुआ हो गया। वल्लाह! एक आँकड़ा इधर से उधर करते ही कितना बड़ा काया-कल्प हो चला।

बात तो खुश होने की है। लेकिन अपना दिल बैठा जा रहा है। पता नहीं हर खुश होनेवाली बात पर ये मर्दुआ दिल हर बार ऐसी हरकत क्यों करने लगता है? देश के करोड़ों लोगों की तरह हमें भी शक करने की बुरी आदत है। इसलिए उनके साथ-साथ हमें भी इस अट्ठाईस-बाईस फार्मूले पर यकीन नहीं हो रहा। कारण साफ है। हम सुनते आए हैं कि आँकड़ों और सच्चाई में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। यानी आँकड़े अलग होते हैं और सच्चाई अलग। इसलिए बहुत मुमकिन है कि महज अट्ठाईस रुपये रोज खर्च करनेवाला कोई शहरी और केवल बाईस रुपये रोज पर जिन्दा रहनेवाला ग्रामीण व्यक्ति भी खुद को वाकई बहुत ही ज्यादा अमीर समझता हो और ईमानदारी से संतोष की जिन्दगी जीता हो, और उसके विपरीत लाखों रुपये की पगार पानेवाला अफसर तथा करोड़ों पीट चुकने के बाद भी कुछ और रुपयों के पीछे लार टपकाते, दौड़नेवाला नेता भी खुद को अभी और ज़रूरतमंद गरीब समझता रहे। तब तो बड़ी गड़बड़ होगी मेरे मौला। आँकड़ेबाजी के चक्कर में सब गड्ड-मड्ड हो जाएगा। अब तो बस उन्हीं लोगों का आसरा है, जिन्होंने ये आग लगाई है। तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना। हो सकता है इसके बारे में भी हमारे उन गुरु-घंटाल लोगों ने अपने ए.सी. कमरों में बैठकर महँगी शराब पीने और दर्जनों मुर्गे-बकरे तोड़ने के बाद उपजी अपनी नवीन चेतना के जौम में कुछ युगांतरकारी मौलिक उद्भावनाएं की हों, या करने की सोच रहे हों। तब तक आइए अपनी इस नई-नई प्राप्त हुई समृद्धि और उच्च सामाजिक हैसियत के मजे लें, चटखारे ले-लेकर।

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ओस, अब कहाँ !
निशब्द अँधेरे में पिघलने का सुख
तैरकर पत्तों पर फिसलने का सुख
किरणों में कण-कण चमकने का सुख
 अब कहाँ !
आर-पार दिखने दिख जाने का सुख
मोती-सा बन चमचमाने का सुख
छोटी-सी छुअन पर मिट जाने का सुख
 अब कहाँ !
मखमल-सा सुख देकर जाने का सुख
मलमल-से तन पर बिछ जाने का सुख
इक क्षण बस एक कण हर्षाने का सुख
 अब कहाँ !
पत्तों के तन पर डगमगाने का सुख
पंखुड़ियों के संग झूम जाने का सुख
किरणों पर लुटकर टिमटिमाने का सुख
 अब कहाँ !
हवा से हिलकर खिलखिलाने का सुख
धरती में घुलकर सरसाने का सुख
नयनों में नीरज नज़राने का सुख
 अब कहाँ !
रचनाकार - अतुल कुमार रस्तोगी
(संक्षिप्त परिचय)
जन्म तिथि : 01.11.1962
जन्म स्थान : शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश
पिता का नाम : श्री राम किशोर रस्तोगी
माता का नाम : स्व. प्रभा रस्तोगी
स्थायी पता : तेलीबाग़, रायबरेली रोड, लखनऊ (उत्तरप्रदेश) 
संप्रति : भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक में सेवारत
सम्पर्क : बी-507, मीनाक्षी अपार्टमेन्ट, गोकुलधाम, गोरेगाँव (पूर्व), मुंबई – 400 063
(महाराष्ट्र)
मोबाईल : 09920565635
ई-मेल : atulkumarrastogi@yahoo.in
 akrastogi@sidbi.in

इधर सरकारी सँस्‍था योजना आयोग ने फिर गरीब की रेखा का जिक्र कर के सरकार की किरकिरी कराई है।सरकारी आक़डों के अनुसार शहरी गरीब अलग होता है और गांवों का गरीब अलग होता है। जो गरीब शहर से गांव जाता है वो गांव जाकर अमीर की श्रेणी में आ जाता है मेरी मान्‍यता ये है कि योजना आयोग को गरीबी रेखा के बजाय अमीरी रेखा खींचनी चाहिये और अमीरो की आय तय कर देनी चाहिये।

शहर में छोटा मोटा भिखारी भी सो रुपया कमा लेता है और योजना आयोग के अनुसार ऐश कर रहा है, योजना आयोग उसकी जेब में पड़े अतिरिक्‍त पैसे को निकाल कर अपनी झोली भरना चाहता है। प्रति- भाशाली लोग योजना आयोग में घुसते है और ज्‍यादा प्रतिभाशाली लोग सरकार में विशेपज्ञ के रुप में घुसकर ये रिपोर्टे बनाते है। इन रिपोर्टों का एक ही उपयोग है कि इन्‍हे रद्‌दी की टोकरी में फेक दिया जाये।

सरकार के अमीर लोग गरीब की रेखा, समकोण, त्रिभुज, आयत, वृत्‍त बनाते रहते है और गरीब का मजाक उड़ाते रहते है। गरीब का सबसे बड़ा सपना तो शायद ये होता है कि किसी स्‍लम क्षेत्र में उसकी भी एक झोपड़ी हो या उसे फुटपाथ पर रात गुजारने के पुलिस को पैसे न देने पड़े। मगर योजना आयोग को यह सब नहीं दिखता। वो तो आंखें, कान, बन्‍द करके नई-नई महंगी रिपोर्टे बनाने में व्‍यस्‍त हो जाता है सरकार इन रिपोर्टो के आधार पर योजनाएँ बनाती है और ये योजनाएँ और इनका पैसा गरीब तक भी कभी भी नहीं पहुँचता क्‍योंकि आकंडो़ की कहानी गरीब की जुबानी नहीं सुनी जाती। वो तो अमीर की जुबानी सुनी और समझी जाती है। एक सर्वेकार का कहना है कि सरकार तेरह पैसे का विकास करने के लिए सत्‍तासी पैसे का प्रशासनिक व्‍यय कर देती है। इस तैरह पैसे के विकास में भी दुनिया भर के गपले, घोटाले, भ्रप्‍टाचार होते ही रहते है।

प्रतिभाशाली अमीर लोग जानते है उनका कुछ नहीं बनने-बिगड़ने वाला। सरकार भी गरीब गरीब चिल्‍ला कर गरीबों का मजाक उड़ाती रहती है। अक्‍सर हम लोग भी यही सुनते-कहते है,बेचारा गरीब है, या बेचारी गरीब है और गरीब की जोरु सबकी भाभी। हर कोई उसका मजाक उड़ाने के लिए अधिकृत। अस्‍पताल हो या शिक्षा के मन्‍दिर या बसस्‍टेण्‍ड या रेलवेस्‍टेशन योजना आयोग के अनुसार सब जगह अमीर ही अमीर है। सरकारी गरीबों को जीने की जरुरत ही क्‍या है, मगर जीना जरुरी है क्‍योकि ये गरीब ही तो वोट देकर अमीर सरकार बनाते हे। योजना आयोग के लोग तो वोट देने तक नहीं जा पाते।

प्रतिभाशाली अमीरों से बात चीत करना मुश्‍किल है, मगर योजना आयोग की गरीबी रेखा से उपर वाले अमीर हर जगह हर समय उपलब्‍ध है, ये खाई कभी भी नहीं भर सकती। योजना बनाने वालों सुनो। क्‍या इन गरीब अमीरो की आवाज तुम तक पहँचती है? आवाज को गौर से सुनो! बेचारा गरीब-नंगा क्‍या नहाये और क्‍या निचोड़े, मगर नंगी सरकार सुने तब ना।

सरकार के पास आंकड़ो की खेती करने वाले विशेपज्ञों की फौज होती है जो सरकारी झूठ को सच में बदलने की ताकत रखते है वे सरकार को बताते है कि हजूर सरकार-अब हमारे मुल्‍क में गरीबी खतम हो गई है। गरीब गरीबी रेखा से उपर उठ गया है हमने नई रेखा खीच दी है अब इस रेखा के नीचे कोई नहीं है। हजूर सरकार। आपके राज में सब अमन चैन है। सरकार मान लेती है। विशेपज्ञ को राज्‍यसभा में भेजने का आश्‍वासन दे देती है और सरकारी आंकड़ों में गरीबी मिटती रहती है। गरीब रोटी मांगता है और यही गलती करता है। बार-बार करता है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

कंडे दा कंडा

सियासत

भेड़ का मेमना नदी की ढलान पर पानी पी रहा था। अचानक उसकी नजर शेर पर पड़ी। शेर भी पानी पीने लगा। मेमने को अपने पड़दादा की कहानी याद आ गई। इसी तरह ही उसका पड़दादा भी एक बार पानी पीने लगा था तो शेर ने उसे यह कह कर कि तुम पानी जूठा कर रहे हो खा लिया था। यह कहानी मेमने की मां ने उसे कई बार सुनाई थी।

मेमना थर-थर कांप रहा था। शेर मेमने के पास आया और कहने लगा,‘‘ बेटे क्या हाल है?’’

‘‘ठीक है अंकल जी।’’ मेमने ने कांपते हुए कहा।

‘‘तुम्हारे माता-पिता का क्या हाल है?’’

‘‘सब ठीक-ठाक है अंकल जी।’’

‘‘तुम अपनी सेहत का ध्यान रखा करो और अपने माता-पिता का भी। समझ गए न बेटे। मुझ तक कोई भी काम हो जब मर्जी चले आना। अभी तो मैं चलता हूं। कई काम पड़े हैं करने वाले।’’

मेमना बहुत हैरान था। उसके माता-पिता तो कहते थे कि शेर अंकल से बच रहा करो परन्तु यह तो बहुत ही अच्छे अंकल हैं। मुझे बेवजह डराते रहे और मैं डरता रहा।

यह सारा दृश्य शेरनी भी देख रही थी। उसने आते ही शेर को गुस्से में कहा,‘‘ मैंने तुम्हें शिकार करने को भेजा था और तुम मेमने के साथ बातें करके आ गए। मुझे कितनी भूख लगी है और तुम नरम-नरम मेमना छोड़ आए?’’

‘‘भाग्यवान, तुम तो पागल हो। अगले सप्ताह जंगल के चुनाव हैं। चुनाव जीत कर हमने जनता को ही तो खाना है।’’ यह सुन कर शेरनी भी मुस्कुराने लगी।

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उधार की उम्र

जब भगवान दुनिया बसाने लगा तो उनहोंने सभी जानवरों, कीड़े-मकौड़ों, पक्षियों तथा मनुष्यों का एक-एक पीस तैयार कर लिया। सब में जान डाल दी। सब को उम्र बांटने लगे। सबसे पहले मनुष्य को भगवान ने कहा, ‘‘ले भई, तेरी उम्र 40 वर्ष।’’ मनुष्य शुरू से ही लालची था। उसने भगवान से कहा, ‘‘बस 40 साल ही भगवन, थोड़ी-सी और उम्र दे दो।’’ भगवान ने कहा, ‘‘भई, मेरे पास तो 40 साल से अधिक कोटा नहीं है। यदि कोई जानवर या पक्षी अपनी मर्जी से तुम्हें अपनी अतिरिक्त उम्र दे दे तो तुम ले लेना। वहां कोने में जाकर बैठ जाओ।’’ भगवान उम्र बांटते जा रहे थे और जानवर तथा पक्षी उम्रें लेकर जा रहे थे।

गधे की बारी आई। भगवान ने कहा, ‘‘भई, तेरी उम्र 40 साल है।’’ गधे ने कहा, ‘‘भगवन, मैंने 40 वर्ष की उम्र का क्या करना है? मैंने कौन-सा अफसर बन जाना है,बोझा ही तो ढोना है। 40 साल बोझा ढो-ढो कर तो मैं मर ही जाऊंगा। मेरी उम्र थोड़ी कम कर दो।’’ भगवान ने कहा, ‘‘भई, मेरे पास जो कोटा है उसमें मैं कुछ नहीं कर सकता, यदि तुमने उम्र देनी है तो इस मनुष्य को दे दो।’’ गधा अपनी उम्र के 20 साल मनुष्य को देकर चला गया लेकिन लालची  मनुष्य वहीं बैठा रहा।

उसके बाद कुत्ते की बारी आई। भगवान ने उसे भी 40 वर्ष की उम्र दे दी परन्तु कुत्ते ने कहा, ‘‘भगवन, मैं 40 साल लेकर क्या करूंगा? मैंने कौन-सा नेता बनना है। मुझे तो आपने भौंकने की ड्यूटी दी है। मैं तो भौंक-भौंक कर मर जाऊंगा। कृपया मेरी उम्र कुछ कम कर दें।’’ भगवान ने कहा, ‘‘भई, मैं कुछ नहीं कर सकता। तुम उस मनुष्य से बात कर लो।’’ कुत्ते ने उपनी उम्र में से 20 साल मनुष्य को दे दिए परन्तु मनुष्य का पेट फिर भी नहीं भरा और वह बैठा रहा। भगवान ने लगभग सभी को उम्रें बांट दी थीं।

अंत में उल्लू की बारी आई। भगवान ने उल्लू को भी 40 साल दे दिए परन्तु उल्लू ने भी कहा, ‘‘भगवन, एक तो मेरी नस्ल ही अलग है। मुझे दिन की बजाय रात को दिखता है। मैंने अधिक उम्र लेकर क्या करना है। मेरी उम्र में से आधी उम्र किसी अन्य को दे दो।’’ भगवान ने कहा, ‘‘भई, अपनी मर्जी से मनुष्य को दे दो। मैं कुछ नहीं कर सकता।’’ मनुष्य वहीं पर बैठा था। भगवान ने कहा, ‘‘भई, अब तो किसी ने नहीं आना है। मैंने सब को उम्रें बांट दी हैं। तुम अब चले जाओ। मेरी एक बात सुनते जाओ, तुमने इन जानवरों की उम्रें ली हैं। तुम्हें काफी मुश्किल उठानी पड़ेगी। ये उम्रें तुम्हें काफी महंगी पड़ेंगी।’’

आज मनुष्य की सही उम्र 40 साल है। उसके बाद वह गधे की तरह अपने बच्चों के लिए काम करता है। वह सोचता है मैं यह भी कर लूं, वह भी कर लूं। वह बोझा ढोता रहता है। जब वह 60 साल का हो जाता है तो उसका शरीर वृद्ध हो जाता है। वह काम करने योग्य नहीं रहता। वह अपने बच्चों को अच्छी सलाह देता है तो उसके बच्चे उसे कहते हैं, ‘‘क्यों कुत्तों की तरह भौंक रहे हैं?’’ जब वह भौंक-भौंक कर थक- हार जाता है तो कोई भी उसकी बात नहीं सुनता। 80 साल के बाद वह चारपाई पकड़ लेता है, घुटने जवाब दे जाते हैं, वह अपने बहू-बेटों को लड़ते-झगड़ते देखता है। वह बोल नहीं सकता, उठ कर उन्हें छुड़ा नहीं सकता। कोई गलत काम हो रहा हो तो वह टोक नहीं सकता। उसे रात को नींद नहीं आती, वह उल्लू की तरह देखता ही रहता है, बस देखता ही रहता है।... और एक दिन देखना भी बंद हो जाता है।

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स्वार्थी
रामू मोटरसाइकिल चला रहा था। राज पीछे बैठा था। राज ने अचानक कहा रोको-रोको। रामू ने गाड़ी रोक दिया और बोला क्या हुआ। राज बोला वह देखो उस दुकान में हमारे सर बैठे हुए हैं। जाकर मिल आऊँ। परीक्षा होने वाली है। प्रयोगात्मक परीक्षा की भी डेट आ गई है।
कुछ महीने बाद एक दिन फिर रामू गाड़ी चलाता हुआ जा रहा था। उस दिन भी राज पीछे बैठा था। रामू ने एकाएक गाड़ी रोक दिया। राज ने पूछा गाड़ी क्यों रोक दिया ? रामू बोला वहाँ तुम्हारे सर बैठे हैं। राज बोला चल यार। मैंने परीक्षा पास कर ली है।
रामू ने गाड़ी चला दिया। लेकिन अपने को यह कहने से नहीं रोक पाया कि राज तूँ बड़ा स्वार्थी है।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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संगोष्‍ठी समाचार

दिनांक 27-28 फरवरी 2012 को खालसा कॉलेज फॉर विमेन, अमृतसर के हिन्‍दी विभाग द्वारा विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के सौजन्‍य से ‘प्रवासी साहित्‍य और साहित्‍यकार‘ विषय पर द्वि-दिवसीय अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

 

इस संगोष्‍ठी में मुख्‍य अतिथि ब्रिटेन की प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍यकार डॉ. उषा राजे सक्‍सेना और सम्‍मान्‍य अतिथि डॉ. मधु सन्‍धु पूर्व प्रो. एवं अध्‍यक्ष हिन्‍दी विभाग, गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय, अमृतसर थी। संगोष्‍ठी में प्रवासी हिन्‍दी कविता, उपन्‍यास, कहानी, नाटक के साथ साथ वाचकों ने मारिशस से अभिमन्‍यु अनन्‍त, यूरोप से निर्मल वर्मा, अमेरिका से उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी, उमेश अग्‍निहोत्री, सुधा ओम ढींगरा, ब्रिटेन से तेजेन्‍द्र शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना, , दिव्‍या माथुर, अबू ढाबी से कृष्‍ण बिहारी, डेनमार्क से अर्चना पेन्‍यूली पर अपने प्रपत्रों में विचार व्‍यक्‍त किए। उषा राजे सक्‍सेना ने अपने भाषण में प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास पर विचार करते हुए इसका तीन चरणों में विभाजन किया- प्रथम सन्‌ 1930-50, द्वितीय 1950-90, तृतीय 1990-2010 तक । डॉ. मधु सन्‍धु ने अपने वक्‍तव्‍य में प्रवासी साहित्‍य का सामान्‍य परिचय, मुख्‍य चिन्‍ताएं और ‘वेयर डू आई विलांग‘ की दुविधा पर विचार रखे।

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प्रसिद्ध विद्वान एवं आलोचक डॉ. ओम अवस्‍थी ने बीज भाषण में प्रवासी साहित्‍य के जन्‍म का संदर्भ लेते कहा कि मॉरीशस में भी हिन्‍दी में बहुत कार्य हुआ है क्‍योंकि प्रवासियों की 2-3 पीढ़ियां वहाँ बस और बन चुकी है। फिजी में फिजियन हिन्‍दी भाषा ने जन्‍म ले लिया है। कैरेबियन सूरीनाम आदि तक हिन्‍दी का विस्‍तृत फलक है। इस सत्र की अध्‍यक्षता डॉ. नीलम सराफ प्रो. एवं. अध्‍यक्ष, हिन्‍दी विभाग, जम्‍मू विश्‍वविद्यालय ने की। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि भारतीय लोगों ने प्रवास में भी भारतीयता को जीवित रखा है। भारतीय विदेशों में रहकर भारत की महिमा के चित्रण का महत्‌ कार्य कर रहे हैं। कॉलेज प्राचार्या डॉ. सुखबीर कौर माहल ने अतिथियों, विद्वानों एवं विभिन्‍न शिक्षण संस्‍थाओं से आये प्रतिभागियों का स्‍वागत किया। अपने स्‍वागत भाषण में प्राचार्या ने प्रवासी साहित्‍यकारों के संवेदनशील तन्‍तुओं जैसे - जड़ो से कटना, नई पीढ़ी का अन्‍तर्द्वन्‍द्व, दोनों संस्‍कृतियों का प्रभाव, नसलवाद, बेरोजगारी आदि समस्‍याओं पर दृष्‍टि डाली। खालसा कॉलेज गर्वेनिंग कौंसिल के माननीय सचिव सरदार राजिन्‍दर मोहन सिंह छीना जी ने अपने उद्‌घाटन भाषण में कहा कि विभिन्‍न देशों में प्रवास इतना बढ़ गया है कि प्रत्‍येक देश विभिन्‍न देशों के लोगों से मिल कर बन रहा है। अंग्रेजी बोलना हमारी विवशता है लेकिन निज भाषा हमारी अस्‍मिता की पहचान है।

प्रथम अकादमिक सत्र में डॉ. मधु सन्‍धु की अध्‍यक्षता में ब्रिटेन से आई डॉ. उषा राजे सक्‍सेना, जम्‍मू विश्‍वविद्यालय से डॉ. अंजू थापा, बी.बी.के. डी.ए.वी. कॉलेज फार विमेन अमृतसर से डॉ. शैली जग्‍गी, आर्य कॉलेज पठानकोट से डॉ. सुनीता डोगरा, गुरु नानक कॉलेज आफ एजुकेशन लुधियाना से मिस अनुराधा शर्मा ने अपने प्रपत्र पढ़े। डॉ. मधु संधु ने कहा कि लाखों की संख्‍या में विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय वहां की औसत जनसंख्‍या का प्रतिनिधित्‍व भी करते हैं और उन देशों की आर्थिक राजनैतिक नीतियों को दशा और दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहे हैं। उन्‍होंने सर्वत्र मिनी भारत का निर्माण किया हुआ है। प्रवासी साहित्‍यकारों की देन अप्रतिम है।

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द्वितीय अकादमिक सत्र की अध्‍यक्षता गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय की हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. सुधा जितेन्‍द्र ने की। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में प्रवासियों के विस्‍थापन के दर्द को अपने शब्‍द दिये कि जड़ों से उखड़कर कहीं और जा कर बसना और जा कर हरे भरे हो जाना आसान नहीं। इस सत्र में डॉ. सुनीता शर्मा, डॉ. सुनील, ( हिन्‍दी विभाग, गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय), डॉ. अनीता (एस. एस. एम. कॉलेज, दीनानगर), डॉ. विनोद कुमार (लायलपुर खालसा कॉलेज, जालन्‍धर) तथा डॉ. रिम्‍पल (माता गंगा कॉलेज, तरनतारन) ने अपने प्रपत्र पढ़े।

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28 फरवरी, 2012 द्वितीय दिवस और संगोष्‍ठी की तृतीय अकादमिक सत्र की अध्‍यक्षता पंजाब विश्‍वविद्यालय, चण्‍डीगढ़ से हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष डॉ. सत्‍यपाल सहगल ने की। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि प्रवासी साहित्‍य के केन्‍द्र में अमेरिका और यूरोपियन क्षेत्रों और उसमें भी ब्रिटेन को ही अधिक रखा गया है जब कि साहित्‍य कैरेबियन क्षेत्रों में पहले लिखा गया और यह साहित्‍य किसी दृष्‍टि से पीछे नहीं। इस सत्र में .बी.के. डी.ए.वी. कॉलेज फार विमेन, अमृतसर से डॉ. अनीता नरेन्‍द्र, हिन्‍दू कन्‍या महाविद्यालय, धारीवाल से डॉ. बौस्‍की, डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर से डॉ. किरण खन्‍ना, पंजाब विश्‍वविद्यालय, चण्‍डीगढ़ से सुश्री नवनीत कौर, पंजाबी विश्‍वविद्यालय, पटियाला से सुश्री रजनी ने अपने प्रपत्र प्रस्‍तुत किए।

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संगोष्‍ठी के चतुर्थ एवं समापन सत्र में खालसा कॉलेज अॉफ एजुकेशन, अमृतसर से डॉ. इन्‍दु सुधीर और डॉ. सुरजीत कौर, रजनी शर्मा, डॉ. सपना शर्मा ने अपने शोध पत्र पढ़े।

संगोष्‍ठी के पाँचों सत्रों का मंच संचालन खालसा कॉलेज फॉर विमेन की हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष डॉ. चंचल बाला ने किया। उन्‍होंने संगोष्‍ठी में वक्‍तव्‍य देने वाले 30 विद्वानों की साहित्‍यिक प्रतिभा से श्रोताओं को परिचित कराया और उन्‍हें पुष्‍पगुच्‍छों से सम्‍मानित कराया। प्राचार्या डॉ. सुखबीर कौर माहल की कार्यक्रम में उपस्‍थिति आघान्‍त बनी रही। संगोष्‍ठी कॉलेज के बौद्धिक स्‍तर, कार्यविधि अनुशासन का सशक्‍त प्रमाण रही।

 

डॉ. चंचल बाला, ऐसोसिऐट प्रो. हिन्‍दी विभाग,खालसा कॉलेज फॉर विमेन, अमृतसर।

आकार

भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी,

जाग उठी नव स्वप्न का आकर लिए!

जैसे बूँदे आ मिलती धरती से,

मैं पिय-मिलन को आतुर वैसे !

जैसे सकुचाई, शरमाई खिलती कलियाँ,

मैं पुलकित हो बँध जाऊ पिय आलिंगन में !

हर-सिंगार महकते हैं,रात को लुभाने को,

मैं कर श्रृंगार पिय को लुभाऊं वैसे !

सुबह लाती है किरणें सजाकर उम्मीद की थाली,

मै पिय का आंगन जगमगाऊं वैसे !

भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी

 

अकेली

मैं रात अकेली जागी ऐसे, 

बिन सपनों की नींद जैसे !

मैं अकेली चली ऐसे, 

बिन मंजिल की राहें जैसे !

मैं अकेली पगडंडी ऐसी, 

बिना मुसाफिर सूनी जैसे !

मैं खड़ी चौराहे पर जैसे, 

पाँव पड़ी जंजीरें जैसे !

मैं अकेली जीऊं ऐसे, 

बिन मकसद का जीवन जैसे !

मैं रात अकेली जागी ऐसे

--

 

समर्पण

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

अपनी आँखें ख़ाली कर ली

सारे स्वप्न उसकी आँखों में भरे

चेहरे का सारा आलोक

मकरंद भरा सारा अल्हड़-पन

जीवन की सारी ज्वाला

यौवन की हर अभिलाषा

उसको अर्पित कर दिए मैंने

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

अपने पांवों की धरा उसे देकर

अंगारों पर चलना सहकर

सौरभ सारे उसकी राहों में

कांटे सारे अपने लिए चुने मैंने

ढलता रहा मेरा रंग-रूप

उसकी आभा कायम रखी

मेरी उम्मीदें बुझा दी मैंने

उसकी आशा-ज्योत जलाई मैंने

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

 

कुछ पल

कुछ मुरझाये पल मैंने

बंद किताबों में कर दिए

कुछ अलसाये पल मैंने

बिस्तर की सलवटों में छोड़ दिए

कुछ तमन्नाएं मैंने

दरवाजे की झिरियों में केद किये

खोल नहीं पाए आज तक

बंद पड़े उस लिफाफे को

जिसमे सपनों की उड़ानों

की कहानी लिपटी हुए है

कुछ उम्मीदों से नाता तोड़ लिया

इधर-उधर सर मारती रही दीवारों से

कुछ कर पाने के हौसले तोड़ दिए

सहमी-सहमी आखे मूंदे बैठी रही मैं

आज खोल दी मैंने आशाओं की

उस पोटली को जिसमे न जाने कब से

पांवो में पड़ी बेड़ियाँ पड़ी थी

खुरच-खुरच कर निकाल दिया

जंग लगे नाकामी के निशानों को

आज उड़ान भरना है स्वछन्द

नीले आकाश को छूने के लिए

और सारे पलों को अपने लिए रख लिए  

---

देश के गरीबी रेखा की खिल्‍ली उड़ाने के साथ योजना आयोग ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय की भी खिल्‍ली उड़ाई है। क्‍योंकि इसी न्‍यायालय ने दिशा-निर्देश दिए थे कि गरीबी रेखा इस तरह से तय की जाए कि वह यथार्थ के निकट हो। इसके बावजूद आयोग ने देश की शीर्ष न्‍यायालय को भी आईना दिखा दिया। गरीबी के जिन आंकड़ों को अनुचित ठहराते हुए न्‍यायालय ने आयोग को लताड़ा था, आयोग ने आमदनी के उन आंकड़ों को बढ़ाने की बजाए और घटाकर जैसे ईंट का जवाब पत्‍थर से देने की हरकत की है। राष्‍ट्र-बोध और सामाजिक सवालों से जुड़े मुद्‌दों को एक न्‍यायसंगत मुकाम तक पहुंचाने की उम्‍मीद देश की अवाम को सिर्फ सर्वोच्‍च न्‍यायालय से है, किंतु जब न्‍यायालय के हस्‍तक्षेप की भी आयोग हठपूर्वक अवहेलना करने लग जाए तो अच्‍छा है न्‍यायालय ही अपनी मर्यादा में रहकर मुट्‌ठी बंद रखे, जिससे आम आदमी को यह भ्रम तो रहे कि अन्‍याय के विरूद्ध न्‍याय की उम्‍मीद के लिए एक सर्वोच्‍च संस्‍थान वजूद में है ? हालांकि देश की गरीबी नापने के इस हैरतअंगेज पैमाने की फजीहत के बाद सरकार ने इसे फिलहाल खरिज कर दिया है और कोई नया सटीक पैमाना तलाशने का भरोसा जताया है।

गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे लोगों की संख्‍या में कमी के सरकार और योजना आयोग के दावों को लगातार नकारे जाने के बावजूद भी हठधर्मिता अपनाई जा रही है। आयोग ने कुछ समय पहले सर्वोच्‍च न्‍यायालय में शपथ-पत्र देकर दावा किया था कि शहरी व्‍यक्‍ति की आमदनी प्रतिदिन 32 रूपए (965 रूपए प्रतिमाह) और ग्रामीण क्षेत्र के रहवासी की आय प्रतिदिन 26 रूपए (781 रूपए प्रतिमाह) होने पर गरीब माना जाएगा। गरीबी का मजाक बनाए जाने वाली इस रेखा को न्‍यायालय ने वास्‍तविकता से दूर होने के कारण गलत ठहराया था और आयोग को नई गरीबी रेखा तय करने का निर्देश दिया था। लेकिन आयोग ने जो नई गरीबी रेखा तय की, उसमें उद्‌दण्‍डता का आचरण बरतते हुए देश के शीर्ष न्‍यायालय के दिशा निर्देशों को भी मजाक का हिस्‍सा बना दिया गया। ऐसा उसने गरीबों की आय का दायरा और घटाकर न्‍यायालय को जता दिया कि आयोग न तो न्‍यायालय के मातहत है और न ही उसके निर्देश मानने के लिए बाध्‍यकारी। इसी अंहकार के चलते आयोग ने गरीबी रेखा की जो नई परिभाषा दी है, उसके अनुसार अब शहरी क्षेत्रों के लिए 29 रूपए प्रतिदिन और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 22 रूपए प्रतिदिन आय की सीमा रेखा में आने वाले लोगों को गरीब माना जाएगा। जबकि आयोग को अदालत की मर्यादा का हरहाल मे ंपालन करना था, जिससे जनता में यह विश्‍वास बना रहे कि वाकई न्‍यायालय सर्वोच्‍च है।

संसद में आयोग की दलील को खारिज करने के बाद सोनिया गांधी की अध्‍यक्षता वाली राष्‍ट्रीय सलाहकर समिति के प्रमुख सदस्‍य एनसी सक्‍सेना ने मुंह खोलते हुए कहा है कि ‘‘सरकार का यह कहना कि गरीबी घटी है, सही नहीं है।'' गरीबी के बहुमुखी मूल्‍यांकन की जरूरत है क्‍योंकि देश की 70 फीसदी आबादी गरीब है। बहुमुखी अथवा बहुस्‍तरीय गरीबी के मूलयांकन से मकसद है कि केवल आहार के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण न किया जाए। उसमें पोषक आहार, स्‍वच्‍छता, पेयजल, स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, शैक्षाणिक सुविधाओं के साथ वस्‍त्र और जूते-चप्‍पल जैसी बुनियादी जरूरतों को भी अनिवार्य बनाया जाए। क्‍योंकि 66 वें घरेलू उपभोक्‍ता खर्च सर्वेक्षण (जिस पर ताजा आंकड़े आधारित हैं) के अलावा 2011 की जनगणना और 2011 के ही राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षणों ने यह तो माना है कि देश प्रगति तो कर रहा है, लेकिन अनुपातहीन विषमता के साथ। जहिर है वंचितों के अधिकारों पर लगातार कुठाराघात हो रहा है। दलित, आदिवासी और मुस्‍लिम विभिन्‍न अंचलों में सवर्ण और पिछड़ों की तुलना में बेेहद गरीब हैं। किसान और खेतिहर मजदूर गरीबी से उबर ही नहीं पा रहे हैं। इसी सामाजिक यथार्थ को समझते हुए एशियाई विकास बैंक कि ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई इसी तरह से छलांगे लगाती रही तो भारत में तीन करोड़ से ज्‍यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे आ जाएंगे।

दरअसल गरीबी के आकलन के जो भी सर्वेक्षण हुए वे उस गलत पद्धति पर चल रहे हैं, जिसे योजना आयोग ने 33 साल पहले अपनाने की भूल की थी। हैरानी इस बात पर भी है कि जातिगत जनगणना भी इसी लीक पर कराई जा रही है। असल में आयोग ने कुटिलता करतते हुए गरीबी रेखा की परिभाषा बदल दी थी। इसे केवल पेट भरने लायक भोजन तक सीमित रखते हुए पोषण के मानकों से तो अलग किया ही गया, भोजन से इतर अन्‍य बुनियादी जरूरतों से भी काट दिया गया था। इसी बिना पर 1979 से भोजन के खर्च को गरीबी रेखा का आधार बनाया गया। जबकि इससे पहले पौष्‍टिक आहार प्रणाली अमल में लाई जा रही थी। इसके चलते 1973-74 में आहारजन्‍य मूल्‍यों का ख्‍याल रखते हुए जो गरीबी रेखा तय की गई थी, उसमें शहरी क्षेत्र में 56 रूपए और ग्रामीण क्षेत्र में 49 रूपए प्रतिदिन आमदनी वाले व्‍यक्‍ति को गरीब माना गया था। इस राशि से 2200 व 2100 किलो कैलोरी पोषक आहार हासिल किया जा सकता था।

लेकिन आगे चलकर आयोग ने इस परिभाषा को भी अनजान कारणों से बदलते हुए इसमें गरीबी रेखा के उपलब्‍ध आंकड़ों को मुद्रास्फीति और मूल्‍य सूचकांक की जटिलता से जोड़ दिया। मसलन गरीबी रेखा के आंकड़ों को मुद्रास्फीति के आधार पर समायोजित करके, मूल्‍य सूचकांक के आधार पर नया आंकड़ा निकाल लिया जाएगा। पिछले 30-35 साल से मूल्‍य सूचकांक आधारित समायोजन की बाजीगरी के चलते गरीबों की आय नापी जा रही है। इसी पैमाने का नतीजा 29 और 22 रूपए प्रतिदिन प्रतिव्‍यक्‍ति आय को गरीबी रेखा का आधार बनाया गया है, जो असंगत और हास्‍यास्‍पद है। देश का दुर्भाग्‍य है कि हमारे योजनाकार विश्‍व बैंक, अंतराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष और उद्योग जगत से निर्देशित हो रहे हैं, इसलिए वे शीर्ष न्‍यायालय की फटकार के बावजूद गरीबी पर पर्दा डालने की अव्‍यावहारिक कोशिशों से बाज नहीं आ रहे। अच्‍छा है न्‍यायालय ही अपनी मर्यादा में रहकर मुट्‌ठी बंद रखे।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

 

ई-पता ः pramodsvp997@rediffmail.com

ई-पता ः pramod.bhargava15@gmail.com

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

कंडे दा कंडा
-अमरीक सिंह कंडा

भगवान की मौत
मैं अपनी बचपन की तस्वीरों वाली एलबम देख रहा था तो मेरी 7 वर्षीय पोती अपने पास आ गई और एलबम देखने लगी।


‘‘बड़े पापा, ये कौन हैं?’’
‘‘बेटा, ये मेरे मम्मी-डैडी हैं।’’
‘‘बड़े पापा, अपके मम्मी-डैडी कहां गए?’’
‘‘बेटे, वे भगवान के पास ऊपर चले गए।’’
‘‘बड़े पापा, वे भगवान के पास से कब वापस आएंगे?’’
‘‘यह देखो तुम्हापे मम्मी-डैडी की फोटो।’’ मैंने बात को टालते हुए कहा।
‘‘बड़े पापा, बड़े मम्मी कहां हैं?’’
‘‘बेटे, वह तो तेरे पैदा होने से एक वर्ष पहले ही भगवान के पास चले गए थे।’’ मैंने बड़ी मुश्किल से जवाब दिया।
‘‘बड़े पापा, सब लोग मर कर भगवान के पास चले जाते हैं?’’


‘‘हां बेटे, सब मर कर भगवान के पास चले जाते हैं।’’ मैंने एलबम बंद करते हुए कहा।
‘‘बड़े पापा इसका मतलब भगवान तो पहले से ही मरे हुए हैं।’’


... मुझे इसका जवाब नहीं सूझा और मैंने अपनी पोती को डांट कर भगा दिया।

(यह व्यंग्य सत्तर के दशक में लिखा गया था जब देश में इमर्जेंसी लगाया गया था. यूँ तो कहने को स्वतंत्रता हासिल है, मगर अपरोक्ष इमर्जेंसी तो हर ओर विद्यमान है इस लिहाज से यह व्यंग्य अभी भी सामयिक है.)

इमरजेंसी-सूत्र

 यशवन्‍त कोठारी

ओम श्री डिक्‍टेटराय नमः।

अथ श्री इमरजेन्‍सी सूत्र॥ 1

टीका-हे डिक्‍टेटर महाराज आपको नमन करता हूं।

अब मैं इमरजेंसी सूत्र का शुभारम्‍भ करता हूं।

शंका-डिक्‍टेटर शब्‍द का भावार्थ समझाइये।

निवारण-बालक ! जब कुर्सी जाने लगती है तब तानाशाही का उपयोग गोंद की तरह कुर्सी से चिपकाने के लिए किया जाता है।

प्रतिशंका-ऐसी स्‍थिति में कुर्सी का मोह छूटता क्‍यों नहीं है ?

प्रतिनिवारण-वत्‍स ! तुम बालक हो, कुर्सी तुमने देखी नहीं है, अतः तुम इसकी माया, मोह व ममता को नहीं समझ सकोंगे।

त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव त्‍वमेव बंधुश्‍च सखा त्‍ममेव ॥ 2

टीका-इमरजेन्‍सी में कुर्सी पर आसीन ही माता होता है, पिता होता है, बन्‍धु और मित्र होता है।

शंका-ऐसा क्‍यों होता है ?

निवारण-क्‍योंकि स्‍वाभिमानी व्‍यक्‍ति के अलावा सभी कई-कई मां-बाप रखते हैं। अतः उनके लिये कुर्सी ही मां-बाप है।

आपातकाले सर्वत्र भयः व्‍यापते ॥ 3

टीका-आपातकाल में सर्वत्र भय और आतंक का साम्राज्‍य छा जाता है।

शंका-भय कैसे आता है।

निवारण-बन्‍दूक की नली से भय का जन्‍म होता है। फौजी बूटों की आवाजें व्‍यक्‍तियों को केंचुओं की तरह मसल देती हैं ताकि बचे हुए केचुए पलटे और बूटों को चूमें।

संजय शरणम्‌ गच्‍छामि,

शरणम गच्‍छामि,

विद्याचरण शरणम्‌ गच्‍छामि॥ 4

टीका-संजय, बंसीलाल और विद्याचरण की शरण में जाना ही आपातकाल है।

शंका-ये प्रभुता सम्‍पन्‍न व्‍यक्‍ति कौन है ?

निवारण-तुम्‍हारी यह शंका बेकार है। ये सर्वज्ञात विद्यमान प्रतीकात्‍मक नाम है।

प्रतिशंका-अविद्या के चरण ने शुक्‍ल पक्ष को अमावस की रात क्‍यों कर दिया ?

प्रतिनिवारण-ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आवे।

पंच सूत्री च बीस सूत्री च इमरजेन्‍सी ॥ 5

टीका-पांच सूत्रीय व बीस सूत्रीय कार्यक्रम ही इमरजेन्‍सी है।

शंका-है गुरूवर। इन सूत्री कार्यक्रमों को विस्‍तार से समझाइये।

निवारण-हे वत्‍स इन पच्‍चीस सूत्रों को समझने-समझाने के लिये पच्‍चीस पुस्‍तकों की रचना करनी होगी जो असम्‍भव है।

आपातकाल सर्व अधिकार हनने ॥ 6

टीका-आपातकाल में सभी अधिकारों का हनन कर दिया जाता है।

शंका-अधिकारों का हनन कैसे हुआ ?

निवारण-रोटी के बदले हमारी स्‍वतन्‍त्रता का मुंह बन्‍द कर दिया गया। रेलों को समय पर चलाने हेतु हमने अस्‍मत बेच दी अतः अधिकार समाप्‍त हो गये।

दूर दृष्‍टि कड़ी मेहनत अनुशासन आपातकाले शस्‍त्रम्‌ 11 7

टीका-अनुशासन, दूर दृष्‍टि व कडी मेहनत आपातकाल के शस्‍त्र थे।

शंका-ये वस्‍तुएं शस्‍त्र कैसे बनी ?

निवारण-वत्‍स ! प्रधानमंत्री घर का ही हो। यह दूरदृष्‍टि थी। अनुशासन मानों वरना जेलों में मर जाओ। यह अनुशासन था और विरोधी समाप्‍त हो जाये यह कड़ी मेहनता का काम था। अतः शस्‍त्रों के रूप में ये शब्‍द प्रयुक्त हुए।

प्रेस सेन्‍सरम्‌ च नसबन्‍दी आपातकाले उपलब्‍धियम्‌ ॥ 8

टीका-सिये हुए होठों की प्रेस और नसबन्‍दी आपातकाल की उपलब्‍धियां है।

शंका-नसबन्‍दी का कार्य जबरन क्‍यों हुआ ?

निवारण-ताकि कोटा पूरा हो और देश प्रगति करे।

प्रतिशंका-प्रेस सेन्‍सर से क्‍या लाभ हुआ ?

प्रति निवारण-सर्वत्र चारणीय चाटुकारों और जय-जयकारों का साम्राज्‍य छा गया।

विनाशकाले विपरीत बुद्धि आपातकाले कुबुद्धि ॥ 9

टीका-विनाशकाल में विपरीत बुद्धि आती है और आपातकाल में कुबुद्धि आती है।

शंका-आपातकाल में कुबुद्धि ने क्‍या किया ?

निवारण-वत्‍स ये पूछो कि क्‍या नहीं किया। कश्‍मीर से कन्‍या कुमारी तक देश को एक गैस चैम्‍बर बना दिया गया। अटक से कटक तक देश के चारों और भय आतंक और जबरदस्‍ती का अन्‍धकार फैला दिया गया।

तमसो मां ज्‍योतिगर्मय ॥ 10

टीका-अन्‍धकार से प्रकाश की और चलो।

शंका-अन्‍धकार से प्रकाश कब आयेगा ?

निवारण-हर रात्रि के बाद सुबह सुहानी आती है। यही सृष्‍टि का नियम है। जिस पर मानव का बस नहीं चलता है। अतः अन्‍धकार में ही प्रकाश आता है।

सुफलम्‌ प्राप्‍नुवन्‍ति, प्रातः भजन्‍तिए अभिलाषादात्रम्‌ डिक्‍टेटराय नमः॥ 11

टीका-सुबह उठकर इस सूत्र को नियमित पारायण करने से सुफल और अभिलाषा प्राप्‍त होती है तथा डिक्‍टेटर प्रसन्‍न होता है।

इति श्री इमजेन्‍सी सूत्रस्‍य प्रथमोध्‍याय ः ॥ 12

टीका-अब मैं इस इमरजेन्‍सी सूत्र के प्रथम अध्‍याय का समापन करता हूं।

पुनश्‍च-जो सम्‍पादक इस सूत्र को प्रकाशित करेंगे वे इसके प्रभाव से मुक्‍त रह विचरण कर सकेंगे।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

e_mail: ykkothari3@yahoo़com

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कंडे दा कंडा

-अमरीक सिंह कंडा

आप जी....?

आप जी का जन्म नहीं हो रहा था। समय दस महीने हो चुके थे। आप जी की माता ने ऊपर वाले के आगे अरदास की कि या तो मेरी जान निकाल लो या फिर ....। आप जी का जन्म 31 मार्च को पंजाब की धरती पर हुआ। उस दिन आप जी के बाप जी ने बहुत शराब पी हुई थी ज़्योंकि उस दिन ठेके टूटे हुए थे और शराब सस्ती मिल रही थी। जब आप जी के जन्म की बात आप जी के शराबी बाप को पता चली तो उन्होंने शराब की एक ढक्कन गुड़ती के रूप में आप जी के मुंह में डाल दिया।

आपके बाप ने आपके जन्म की खुशी में सभी अड़ोसी-पड़ोसी टल्ली कर दिए। कईयों को तो दस्त और उल्टियां भी लगीं। कमजोर होने के कारण आप जी के बाप जी ने कई बार आपको अफीम भी चटाई। आप जी नशे में ही धीरे-धीरे बड़े हुए। नशे में जन्मे-पले होने के कारण आप जी नशे के बचपन से ही आदी थे। इस कारण नशा करने में आपको कोई दिक्कत नहीं आई। आप जी की प्रारम्भिक शिक्षा शुरू में ही खत्म हो गई परन्तु एक अफीम खाने वाले मास्टर ने आप जी को हिम्मत नहीं हारने दी। आप जी उसे कभी घर की निकाली शराब और कभी अफीम देते और वह हाजिरियां लगाता रहता। आप जी को पता ही नहीं चला कि कब आपने पांच जमातें पढ़ लीं। उसके बाद भगवान की दया से मास्टर जी पूरे हो गए और आप जी की पढ़ाई बीच में ही छूट गई।

वैसे तो आप जी पर जवानी आई ही नहीं पर कहने को तो कहना ही पड़ेगा। आप जी कई बार छोटे-मोटे केसों में, जैसे शराब के ट्रक का पकड़े जाना, भुक्की का कैंटर, अफीम का कैंटर पकड़ा जाना आदि परन्तु आप जी अपनी पैसे की बुद्धि के कारण बचने में हर बार सफल रहे। आप जी ने जवानी के दिनों में कई बार जेल यात्राएं भी कीं परन्तु आप जी ने अपना नशे का कारोबार जेल से भी जारी रखा।

जेल जाने के बाद जो बहुत थोड़ी बहुत झिझक थी वह भी खुल गई। आप जी अब पूरी तरह पके हो गए थे और आप जी ने वर्तमान सरकार से सम्पर्क किया हुआ था। आपने राज्य के सी.एम. साहब को खालिस दूध (असली अफीम) खिलाकर निहाल किया हुआ था। अब आप जी को राज्य में नशा बेचने का लाइसैंस मिल गया था (सी.एम. की ओर से हरी झंडी)। आप जी पहले पहल सरपंची, एम.सी., एम.एल.ए. और एम.पी. के इलैक्शनों के दौरान खूब नशा बेचते रहे। इलैक्शनों के दौरान आप जी की अग्नि परीक्षा हुई। उस वक्त आप बचने में सफल रहे ज़्योंकि आप जी ने यूथ के लिए फैंसीड्रिल, कोरैक्स, दस नम्बर की गोलियां, प्रोक्सीवन, लोमोटैल, आयोडैक्स तथा एलप्रैक्स की गोलियों का खूब लंगर लगाया और यूथ के दिलों में जगह बनाई।

आप जी अब लाखों-करोड़ों नहीं बल्कि अरबों में खेल रहे हैं। सरकार कोई भी आए परन्तु आप जी का कारोबार बहुत बढ़िया चल रहा है और चलता जाएगा ज़्योंकि आप जी को समझ आ चुकी है। आप जी ने अब अपनी इतनी शाखाएं बना ली हैं कि आपको कहीं जाने की जरूरत ही नहीं। आप जी दिन चौगुनी रात अठोगनी तरक्की कर रहे हैं। आप जी कभी मर नहीं सकते। आप अमर हो चुके हैं। यदि आप जी नरक वासी हो गए तो आप जी की बहुत सारी नाजायज औलादें, आप जी के नशेड़ी चेले-चपाटे आप जी का कमाया हुआ नाम खत्म नहीं होने देंगे। चाहे पूरा राज्य खत्म हो जाए।

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हाइकु नवगीत

मेरा जीवन

 

मेरा जीवन

सुख - दुःख पूरित

अंक गणित।

 

और और की

सघन कामना में

जीवन बीता।

 

आखिर मिला

मुझे जीवन - घट

रीता ही रीता

 

किन्‍तु खड़ा था

बड़ा अकड़कर

मन - गर्वित।

 

मैंने समझा

मन - चौखट पर

सुख बरसा।

 

दुख ही मिला

अचानक मुझसे,

मन तरसा।

 

सब नाते थे

मतलब में रत ,

चंचल चित ।

 

 

खाली घट

 

रहा खोजता

मन अपनापन

जीवन भर।

 

मृग तृष्‍णा ने

मरु-भूमि में खोजे

सर, सागर।

 

जिधर गया

खाली ही घट था या

टूटी गागर।

 

मिले कुंज में

घात लगाये बैठे

कितने डर ।

 

कई बस्‍तियां

छान छान करके

इतना पाया।

 

उतर चुकी

सब के ही भीतर

भोगों की माया।

 

जोड़ तोड़ में

उलझे पाये सब

बस्‍ती के घर।

 

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

(संक्षिप्‍त परिचय)

जन्‍म तिथि ः 01-10-1966

जन्‍म स्‍थान ः नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्‍तर प्रदेश

पिता का नाम ः श्री खमानी सिंह

माता का नाम ः श्रीमती देवी

स्‍थायी पता ः ग्राम-नगला मिश्रिया, डाकघर-बसगोई,

जिला-महामायानगर(उत्‍तरप्रदेश)

साहित्‍य सृजन ः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में, कविता, दोहे,

गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्‍डलिया, बालगीत,

लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित

प्रकाशित कृति ः नया सवेरा (बालगीत संग्रह)

प्रकाशक - राजस्‍थानी ग्रंथागार, जोधपुर

संकलन ः सृजन संगी, निर्झर, कारवां, फूल खिलते रहेंगे,

देशभक्‍ति की कविताएं (काव्‍य संकलन)

नवगीत ः नई दस्‍तकें (नवगीत संकलन)

हाइकु-2009 (हाइकु संकलन)

राजस्‍थान के लघुकथाकार, चमत्‍कारवाद,

देश विदेश की लघुकथाएं,

लघुकथा संसार ः मां के आस-पास

(लघुकथा संकलन)

जतन से ओढ़ी चदरिया (विशिष्‍ट संकलन)

भारतीय लघुकथा संसार (संदर्भ ग्रंथ)

सम्‍मान ः 1) आबू समाचार के दशाब्‍दि समारोह पर

राजस्‍थान के माननीय शिक्षा मंत्री द्वारा

सम्‍मानित

2) हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन प्रयाग द्वारा

वाग्‍विदांवर सम्‍मान

3) पंजाब कला साहित्‍य अकादमी, जालंधर

द्वारा विशेष अकादमी सम्‍मान,

4) विक्रमशिला हिन्‍दी विद्यापीठ भागलपुर

(बिहार) द्वारा विद्या वाचस्‍पति

संप्रति ः उत्‍तर पश्‍चिम रेलवे में इंजीनियर

सम्‍पर्क ः बंगला संख्‍या - एल - 99

रेलवे चिकित्‍सालय के सामने,

आबूरोड -307026 (राजस्‍थान)

मोबाईल ः 09460714267

ई-मेल % trilokthakurela@gmail.com

trilokthakurela@yahoo.com

बच्चे खलील जिब्रान पुनीत बिसारिया 

अनुवाद - डॉ. पुनीत बिसारिया

आपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं
वे स्वतः प्रवाहित जीवन में पुत्र और पुत्रियाँ हैं
वे आए हैं मगर आपसे होकर नहीं
आप उन पर अपना स्नेह तो थोप सकते हैं मगर विचार नहीं
क्योंकि वे स्वयं भी विचारवान हैं, विवेकशील हैं
आप उनकी देह को कैद कर सकते हैं, मगर आत्मा को नहीं
क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में विचरती है
जहाँ तक आप नहीं पहुँच सकते, सपने में भी नहीं .

आप उन जैसा बन्ने का प्रयास तो कर सकते हैं
लेकिन उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते .
क्योंकि समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता
न वह अतीत से रूककर दो बातें करता है .

आप वह धनुष हैं, जिस पर आपके बच्चे
तीर की भांति चढ़कर भविष्य की और जाते हैं
धनुर्धारी अनंत के पथ पर निशाना लगता है
और वह पूरी कोशिश करता है कि उसका तीर तेज़ी से
दूर और दूर और दूर तक जाये.

धनुर्धारी के हाथों में कसे हुए अपने धनुष को
खुशियों के लिए कसा रहने दो
उस समय भी जब वह तीर को उड़ते देख प्रसन्न हो .
क्योंकि वह उस धनुष को भी उतना ही प्यार करता है
जो हिले डुले बगैर उसके पास रहता है

(Dr. Puneet Bisaria) 

नवगीत/चले चैतुए

~ - ~ - ~

अपने घर-गाँव छोड़ चले चैतुए !

कब तक भटकाएगी ? पगडण्डी पेट की ,

साँसोँ का कर्ज़भार छाती पर लादे :

जाने किस ठौर-ठाँव करेँगे बसेरे !

 

बड़े भागवाले किस ख़ेतिहर के ख़ेत की

फ़सल की कटाई की उम्मीदेँ बाँधे ,

खुले गगन तले कहीँ डालेँगे डेरे ;

पुरखोँ की धरती की ममता के पिंजरोँ मेँ

लगते चौमास लौट आएँगे ये सुए !

 

सोचेँगे जीने की और कोई नई जुगत ,

या बँधुआ हलवाही मेँ कस-फँस जाएँगे ,

दुर्गम दुर्दिन पर्वत लाँघेँगे जैसे-तैसे ;

कड़वे मीठे कितने अनुभव पल भोग भुगत ,

नए सबक सिक्के मध मेँ गँठिये लाएँगे ,

बतियाएँगे बीते बंजारे दिन कैसे

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ग़ज़ल/

अश्क-ए-ख़ून बहाकर ये गुज़र जाएगा |

वो जो आएगा वो भी अश्के ख़ूं बहाएगा ||

 

अब कहीँ फेरो-बदल के कोई आसार नहीँ ;

जलेगा रोम नीरो बाँसुरी बजाएगा ||

 

तरकशो-तीर वही होँगे पर शिकारी नए ;

अधमरोँ का शिकार फिर से किया जाएगा ||

 

हम जिसे कह रहे हैँ आज अलविदा वो ही;

ले नई शक्ल नये ज़ुल्म हम प ढाएगा ||

 

हादसा होगा नए ढंग से ' महरूम ' कोई ;

घाव भरता हुआ फिर से हरा हो जाएगा |

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परिचय-                 देवेन्द्र कुमार पाठक (तख़ल्लुस 'महरूम')          जन्म -02.03.1955;ग्राम-भुड़सा,  ( बड़वारा )जिला-कटनी, म. प्र.में;शिक्षा-M.A.B.T.C.( हिंदी/अध्यापन)प्रकाशित पुस्तकेँ-'विधर्मी', 'अदना सा आदमी' (उपन्यास) 'मुहिम', 'मरी खाल:आखिरी ताल','चनसुरिया का सुख','धरम धरे को दण्ड' (कहानी संग्रह )'दिल का मामला है'( व्यंग्य संग्रह ) 'दुनिया नहीँ अँधेरी होगी' (गीत-नवगीत) व्यवसाय-अध्यापन; संपर्क- प्रेमनगर,खिरहनी.साइन्स कालेज डाकघर,कटनी 483501 म.प्र. ई मेल- devendra.mahroom@gmail.com 

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व्‍यंग्‍य एकांकी -

जिन्‍दा ! मुर्दा !!

-वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा

पात्र परिचय

नर्स-

बार्डबॉय-

जमादार

लेखक -

संचालक -

नेता -

( पर्दा उठते ही मंच पर प्रकाश आने लगता है। मंच पर अस्‍पताल का बार्ड नजर आता है। पलंग पर एक मरीज लेटा हुआ है। उसके सिरहाने दीवान पर एक चार्ट टंगा हुआ है। एवं उसका झोला टंगा हुआ है। मरीज करवट बदलता है। इसी के साथ नर्स का प्रवेश तथा उसके साथ बार्ड बॉय भी मंच पर दिखाई देता है )

नर्स (बार्डबॉय से) - इस पलंग को जल्‍दी खाली करो। जमादार को बुलाओ। इस लाश को उठाकर इसके घरवालों को दे दो। पलंग पर दूसरे बिस्‍तर लगा दो आपरेशन थियेटर से मरीज आने वाला ही समझो। जल्‍दी करो।

बार्ड बॉय - - अभी लो सिस्‍टर। जरा जमादार को बुला लाऊँ। ( मंव से पर्दै की ओर जाते हुये) जमादार! ओ जमादार भैया....अरे...ओ.....जमादार.....

( दूर मंच के पीछे से जमादार की आवाज आती है )

”आ रहा हूँ भैया! आ रहा हूं। जरा गम तो खाया करो।“

( जमादार मंच पर बार्ड बॉय के सामने आ जाता है )

बार्ड बॉय - तू लाश का नाम सुनते ही ऐसे खिसक जाता है जैसे आदमी के शरीर से उसका जीव। कम से कम बता-जता कर तो जाया कर। चल, जल्‍दी, एक पलंग को खाली करना है।

( बार्ड बॉय तथा जमादार पलंग के पास आकर ठहर जाते हैं। बार्ड बॉय सिरहाने तथा जमादार मरीज के पैताने खड़े होते हैं। तथा उसे उठाने के लिए झुकते हैं उसी समय मरीज करवट बदल लेता है दोनों घबड़ाकर सीधे खड़े हो जाते हैं। और फिर दबे पांव वहां से हटकर नर्स की ओर जाते हैं। )

बार्ड बॉय :- (हांफते हुये) सिस्‍टर! ...सिस्‍टर !! वह तो जिन्‍दा आदमी है। अभी अभी उसने करवट बदली है। लाश नहीं है।

जमादार :- हां ! सिस्‍टर... अब क्‍या होगा ? वह आदमी तो बहुत बड़ा लेखक है। आपने यह क्‍या करवा डाला ? (पलंग की ओर इशारा करते हुये) वह जरूर हमारे खिलाफ लिखेगा। हमारे विभाग पर भ्रष्‍टाचार का आरोप लगायेगा। (नर्स की ओर देखते हुये ) आपने बिना देखे कैसे हुकुम दे दिया ?

नर्स :- बन्‍द करो यह बकवास।

बार्डबॉय :- बकवास नहीं सिस्‍टर। सच है। चलो खुद ही चलकर देख लो।

जमादार :- (नर्स की ओर देखते हुये) हम कोई उसके रिश्‍तेदार नहीं हैं जो उसे उठाकर बैठायें या उसकी सेवा करें। हमारा काम तो केवल लाश को उठाकर रखने का है, जिन्‍दा मरीज से अपना कोई सरोकार नहीं। ऐसे तो हमारी नौकरी ही खतरे में पड़ जायेगी एक दिन।

नर्स :- (चिल्‍लाकर) अगर इसे उठाकर लाशगाड़ी में नहीं रखा तो तुम्‍हारी नौकरी जरूर खतरे में पड़ जायेगी, समझे ! जो कहा है, वही करो,इन बातों से कुछ नहीं होगा।

(समझाते हुये) देखो। मेरे पास विभाग का लिखित प्रमाण पत्र है। चलो मैं चलती हूं। (तीनों पलंग के पास आते हैं ) उठाओ इसे। (दोनों एक दूसरे का मुंह देखते हैं) (चीखकर) अरे! उठाओ न। कितनी बार कहना पड़ेगा ?

( इसी के साथ मरीज स्‍वयं उठकर बैठ जाता है। )

लेखक :- (नर्स की ओर देेखते हुए कमजोर आबाज में) लीजिये मैं खुद ही उठकर बैठ गया।

कहिए क्‍या बात है ?

नर्स :- कहना क्‍या है ! आप बिस्‍तर छोड़ दीजिए। यह पलंग दूसरे मरीज के नाम एलाट हो गया है।

लेखक :- (आश्‍चर्य से) यह कैसे हो सकता है ? अभी तो मैं पूरी तरह ठीक भी नहीं हुआ हूँ। मैं कहां जाऊँ ? अभी तो मेरा इलाज चल रहा है। आप शायद भूल से यह पलंग खाली करवा रही हैं। पहिले कन्‍फर्म कर लीजिए। क्‍यों बिना बजह परेशान कर रहीं हैं।

नर्स :- देखिये साहब ! हम विवश हैं। हमें आपसे पूरी सहानुभूति है। लेकिन यदि हमने आप पर दया की तो हम खुद भी दया के पात्र बन जायेंगे, जो कि हम बनना नहीं चाहते। इसलिए आप पलंग खाली कर दीजिये। क्‍योंकि आप......(हकलाकर) मर चुके हैं।

लेखक :- (चौंकता है तथा आश्‍चर्य से देखते हुये) क्‍या? क्‍या कहा आपने ? मैं मर चुका हूं।

आप देखिये मैं खड़ा हो सकता हूं , चल फिर सकता हूं। हां! (नाम पर हथेली लगा कर देखता है ) अभी तो सांस भी चल रही है। और आप कहती हैं कि मैं मर चुका हूँ।

नर्स :- हां, आप मर चुके हैं। (विनम्र स्‍वर में) बस आप फिर से मत लेटिये। आपको श्मशान पहुंचाने के लिए सरकारी गाड़ी तैयार खड़ी है। हां...और आप स्‍टोर से अपना कफन का कपड़ा भी इश्‍यू करा लीजिए। (बार्ड बॉय की ओर देखकर) तुम खड़े खड़े मुंह क्‍या देख रहे हो। जल्‍दी से पलंग के बिस्‍तर बदलो। (लेखक नर्स की ओर आश्‍चर्य से देखते हुये जमीन पर खड़ा हो जाता है।)

बार्ड बॉय :- (बिस्‍तर उठाते हुए ) अभी दूसरे बिछाता हूं। कैसे-कैसे लोग हैं ? मर जाने के बाद भी बिस्तर नहीं छोड़ते। (बार्ड बॉय बिस्तर सिर पर रखकर मंच से बाहर निकल जाता है। )

लेखक :- ( नर्स की ओर याचना भरी दृष्‍टि से देखता है ) आप कुछ नहीं कर सकतीं तो अपने वरिष्‍ठ अधिकारियों से कहिए। मैं जिन्‍दा हूँ। मरा नहीं। आप इतना तो कर ही सकती हैं। आप चाहें तो मुझे फिर से चेक कर लें। मेरा टेम्‍प्रेचर, ब्‍लेडप्रेशर सब कुछ नॉर्मल मिलेगा। मरने जैसा आप कुछ भी नहीं पायेंगीं। चाहें तो वे भी आकर मुझे चैक कर लें।

नर्स :- देखिए अमर साहब ! आप बहुत बड़े लेखक हैं। समझने की कोशिश कीजिए। आपके निधन की घोषणा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर की गयी है। मंत्रालय द्वारा जारी की गयी घोषणा कहीं झूठ होती है।

लेखक :- (आश्‍चर्य से) लेकिन यह कैसे हो सकता है ? जबकि मै जिन्‍दा हूं।

नर्स :- आपके निधन पर राष्‍ट्रीय शोक मनाया जा रहा है। देश के कोने-कोने से शोक संदेश प्राप्‍त हो रहे हैं जिनका प्रसारण हो रहा है। मैं खुद बहुत बोर हो रही हूं। किसी भी स्‍टेशन से फिल्‍मी गाने नहीं आ रहे हैं।

लेखक :- (झुंझलाते हुये) आपकी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं। मेरे जीवित रहते हुए यह सब कैसे हो सकता है ?

नर्स :- (खाकी रंग का एक कागज उसे दिखाते हुये) यह देखिये आपका डैथ सर्टीफिकेट हमारे लिए तो यही प्रमाण काफी है। जिसके आधार पर हम आपको ..... अब आप कृपया चले जाईये।

लेखक :- (सोचते हुए) ठीक है। अब मैं ही देखता हूं। आपके हाथ की बात नहीं है।

नर्स :- आपके ही जाने से समस्‍या निबटेगी। (हाथ में लिया प्रमाण पत्र उसकी ओर बढ़ाती है। )इसे साथ ले जाइये और स्‍टोर से कफन का कपड़ा इश्‍यू करा लीजिए। बिना सर्टीफिकेट दिखाए कफ़न नहीं मिलेगा।

(लेखक कागज अपने हाथ में ले लेता है तथा उसे आश्‍चर्यजनक मुद्रा में बार बार देखता है। साथ ही उसे मोड़ लेता है अलमारी से अपना झोला उठा कर कंधे पर टांगता है तथा चश्‍मा उठाकर आखों पर चढ़ा लेता है तथा चलने को होता है। )

( पर्दा गिर जाता है। )

(पर्दा उठते ही मंच पर प्रकाश फैलता है। सामने एक सभ्‍य देखने भालने ओैर आकर्षक पक्‍की उम्र का आदमी बैठा नजर आता है। जिसके सामने एक टेबिल है, टेबिल के दूसरी ओर तीन कुर्सियां रखी हैं तथा टेबिल पर कुछ फायलें। मंच पर इसकी कुर्सी के पीछे मोटे मोटे अक्षरों में ”संचालक“ लिखा है। आदमी चश्‍मा लगाये है तथा कोट पेंट एवं टाई तथा अफसरी मुद्रा में बैठा है। तभी लेखक प्रवेश करता है। संचालक उसे आश्‍चर्य से देखता है। )

संचालक :- आइए, आइए इधर ऐसे बैठिये।

(लेखक उसके सामने कुर्सी पर बैठ जाता है। तथा हाथ में लिया कागज उसकी ओर बढ़ा देता है। संचालक वह कागज देखकर फाइल के ऊपर रख देता है।)

लेखक :- (प्रश्‍नवाचक मुद्रा में ) यह प्रमाण पत्र आपके यहाँ जारी किया गया है?

संचालक :- जी हाँ प्रमाण पत्र तो हमारे ही विभाग का है। लेकिन ”ऊपर वालों“ के निर्देश पर ही जारी किया गया है।

लेखक :- मेरे जीेवित रहते मेरे मरने की घोषणा किस आधार पर की गयी। आप जैसे वरिष्‍ठ अधिकारी ऐसी ही गलतियाँ करते हैं। कितनी चिन्‍ताजनक बात है ?

संचालक :- निश्‍चित ही विचारणीय स्‍थिति है। मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ।

लेखक :- आप मेरी परेशानी क्‍या समझेंगे ? अभी आपके स्‍टोरकीपर ने जरा से कफन के लिये कितना परेशान कर दिया। कफन देने की जबरदस्‍ती भी कर रहा था और कह रहा था। आपके हस्‍ताक्षरों से आपको कफन नहीं मिल सकता। क्‍योंकि आप मर चुके हैं। मुझसे किसी और के हस्‍ताक्षर करवा लिये यह सरासर बेइमानी है या नहीं बताइये आप।

संचालक :- यह कोई बेइमानी नहीं है। यह तो सरकारी कागज की खानापूरी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आडिट में सिर्फ यह देखा जाता है कि कहीं मुर्दे ने स्‍वयं के हस्‍ताक्षरों से तो अपना कफन इश्‍यू नहीं करा लिया। कफन उसके वारिस या अभिभावक को दिया जाता है।

लेखक :- मेरा तो कोई भी नहीं है न वारिस और न अभिभावक ही। मैं तो नितान्‍त अकेला आदमी हूँ।

संचालक :- खानापूरी के लिये यह सब आवश्‍यक होता है। उस से आपको नुकसान नहीं है। आप इन बातों को छोड़िये।

लेखक :- उसने मुझे मरा समझ लिया। केवल सर्टीफिकेट के आधार पर, और आप कहते हैं छोड़िये इन बातों को।

संचालक :- (सोचने की मुद्रा में) देखिय अमर साहब ”आप लेखक होने के नाते जानते होंगे कि आज का आम आदमी अपनी जिंदगी बोझ की तरह जी रहा है। अपने को चलती फिरती लाश महसूस करता है। लेकिन वे सब बिना सर्टीफिकेट के जी रहे हैं और जीते रहेंगे। (प्रश्‍नवाचक मुद्रा में) क्‍या प्रमाण पत्र रखते हुये आम आदमी की तरह जीने में और कोई भी परेशानी है ?

लेखक :- देखिये, आप आम और खास आदमी की बात चलाकर मुद्‌दे की बात टालने की कोशिश न कीजिये। सीधी सी बात बताइये।

संचालकः- हाँ, हाँ जरूर पूछिये। शौक से पूछिये।

लेखक :- आपके विभाग की घोषणाएँ किस आधार पर की जाती हैं। इसके कोई नियम या नीतियाँ हैं अथवा नहीं। या बिना सोचे समझे ही कर दी जाती हैं जैसे मेरे बारे में?

संचालक :- हमारा विभाग प्रत्‍येक घोषणा को जारी करने से पूर्व उससे सम्‍बन्‍धित पूरी जाँच पड़ताल कर लेता है। इसी के बाद घोषणा जारी करता है। (रूककर) लेकिन जहाँ तक आपके बारे में हुयी घोषणा का प्रश्‍न है। (थोड़ा रूककर) हाँ एक बात और है जो बताना जरूरी समझता हूँ। वह यह है कि कभी-कभी सरकार विभाग की नीतियों से संतुष्‍ट नहीं होती या कुछ और भी कारण होते है, जिससे शासन उसमें हस्‍तक्षेप करके प्रकरण अपने नियंत्रण में कर लेती है। बाद में जो उचित समझती है निर्णय कर घोषणा कर देती है। (समझाने की मुद्रा में) लगता है आपके प्रकरण में भी शायद यही हुआ है। आपके बारे में शासन ने ही घोषणा की है। विभाग ने नहीं। हमारे पास तो ऊपर से आदेश आये थे। इसमें हमारा क्‍या दोष।

लेखक :- (खीझते हुये) लेकिन क्‍या यह आपका दायित्‍व नहीं है कि सरकार को उसकी गलत घोषणा के बारे में बतलावें। घोषणा को वापिस लिया जावे यह आप नहीं लिख सकते। आखिर नैतिकता का भी कोई तकाजा होता है।

संचालक :- नैतिकता का प्रश्‍न अपनी जगह है। लेकिन! सरकार की बात को कौन चैलेन्‍ज कर सकता है? आप लेखक हैं, राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आपकी ख्‍याति है। आप सरकार के खिलाफ लिख सकते हैं। बोल सकते हैं। आप सरकारी नौकरी में होते तो पता चलता। सी.आर.प्रमोशन, ट्रांसफर इंक्‍वायरी की कितनी तलवार हमेशा गर्दन पर तनी रहती है। अफसर की निगाह बदली और गए काम से। हम सरकारी नौकर हैं। सरकारी सूचनाओं को ज्‍यों की त्‍यों आप तक पहुँचा देते हैं। यह आपके और सरकार के बीच की बात है। इसमें बीच के विभाग कहीं आड़े नहीं आते। (खड़े होते हुये) अच्‍छा अब चलूँ कुछ और तो नहीं पूछना?

लेखक :- (चौंककर, आश्‍चर्य से देखते हुये) आप क्‍यों? मैं ही चला जाता हूँ।

संचालक :- नहीं ऐसी बात नहीं है। दरअसल बात यह है कि मुझे एक शोकसभा में शामिल होना है। मेरा पहुँचना बहुत जरूरी है।

लेखक :- (चौंकते हुये) शोकसभा ? किसकी शोकसभा है ?

संचालक :- देखिये! अब और शर्मिन्‍दा मत कीजिये। पूरी स्‍थिति आपके सामने स्‍पष्ट है। अच्‍छा नमस्‍कार (कहते हुये चला जाता है। )

लेखक :- (स्‍वतः) अब मुझे भी चलना चाहिये। (खड़ा हो जाता है) अब सरकार से ही बात करनी होगी। आखिर यह सब है क्‍या ? मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आता।

(पर्दा गिरता है)

(पर्दा उठते ही मंच पर प्रकाश आता है। मंच पर एक नेता बैठा हुआ है जिसके सामने कुछ फाइलें आदि रखी हुयी है। उसकी कुर्सी के पीछे एक कागज पर मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। ”मंत्रालय“ उसके सामने दो कुर्सियाँ और रखी हुयी हैं। तभी लेखक मंच पर प्रवेश करता है।

नेता :- (लेखक की ओर देखते हुये) आइये....आइये.....अमर साहब (कुर्सी की ओर इशारा करते हुये) ऐसे बैठिये। कहिये कैसे आना हुआ ? मैं अभी आपके ही बारे में सोच रहा था।

लेखक :- (बैठते हुये) देखिये मंन्‍त्री जी, मैं बेहद परेशान हूँ आपकी सरकार ने मेरे जीवित होते हुये भी मेरे मरने की घोषणा कर दी और आराम से शोक सभाएँ आयोजित कर रहीं है। बताइये यह सब कैसे हुआ ?

नेता :- (गम्‍भीर मुद्रा में ) इस सम्‍बन्‍ध में मुझे ज्‍यादा जानकारी नहीं है। अभी शोक सभा से वापिस आने पर पता लगा कि आप जिन्‍दा हैं। तभी से आपके बारे में सोच रहा हूँ। इस दुर्घटना का हमें बहुत दुख है। लेकिन अब किया ही क्‍या जा सकता है ?

लेखक :- आप कुछ भी कीजिये। इससे मेरा बड़ा नुकसान हो रहा है। मेरे मकान मालिक ने मेरा सारा सामान अपने कब्‍जे में कर लिया है। देने से इंकार करता है। वह मुझे मरा हुआ मानता है। जिन्‍दा मानने से इंकार करता है। यही हाल मेरे प्रकाशक का है। उसने तो उल्‍टे मुझे ही धमकी दे डाली। ”यदि स्‍वयं को इस नाम का लेखक बताने की कोशिश की तो पुलिस को सौंप दूँगा“ आप ही बताइये मैं किस तरह दिन गुजारूंगा। आप कुछ नहीं कर सकते है। तो इस घोषणा को निरस्‍त तो कर सकते हैं। इससे मैं अपनी पूर्व स्‍थिति में आ जाऊँगा।

नेता :- (भाषण की मुद्रा में) कहने में यह बात जितनी आसान है, व्‍यवहारिक रूप में उतनी ही कठिन है। सरकार को हर कार्य बड़ी सावधानी एवं जिम्‍मेदारी से करना होता है। घोषणा किस आधार पर वापिस ली जाऐ ? इसके लिये हमें प्रथक से आयोग बैठाना पड़ेगा। आयोग जब अपनी रिपोर्ट प्रस्‍तुत करेगा,तब कहीं सरकार उस पर अपना विचार कर निर्णय कर पायेगी।

लेखक :- आप मेरी परेशानी समझिये। मुझे रास्‍ता बताइये।

नेता :- क्‍या रास्‍ता हो सकता है ? यदि सरकार आयोग बैठाने पर विचार भी करे, तो जानते हो सरकार पर कितना खर्च आयोग बिठाने का पड़ेगा। फिर इस राशि की पूर्ति कहाँ से होगी ? (कुछ रूककर) देखिये आप बहुत अच्‍छे लेखक हैं। जनता की हालत आपसे छिपी नही है। नागरिक किस तरह अपनी जिन्‍दगी गुजार रहा है ? इसलिये आप आयोग बिठाने को मत कहिये। क्‍योंकि हमने पहले से ही सैंकड़ों आयोग बिठा रखे हैं।

लेखकः- तो फिर मेरी समस्‍या के लिये आप ही कोई समाधान निर्धारित कीजिये।

नेता :- देखिये आप इस देश के नागरिक हैं, तथा शासन के निर्णयों का आपको स्‍वागत करना चाहिये। यदि सरकार ने कोई गलत सूचना जारी कर भी दी तो आपका क्‍या यह दायित्‍व नहीं कि सरकार का सहयोग करें ?

लेखक :- आपकी बातें मेरी समझ में नहीं आ रहीं, और कुछ नहीं कर सकते तो मेरी पेंशन ही मंजूर करा दीजिये। कम से कम गुजारा तो चलेगा, देखिये मैं अभी पूरी तरह से स्‍वस्‍थ भी नहीं हूँ, मुझे इलाज कराना है।

नेता :- (आश्‍चर्य से) पेंशन! असंभव! पेंशन लेने के लिये ट्रेझरी में जीवित होने का प्रमाण पत्र देना पड़ता है। जबकि आपके पास डेथ सर्टीफिकेट है, इसलिये आप भुगतान किस आधार पर ले पायेंगें। रहा आपके अस्‍वस्‍थ होने का सवाल उसके लिये मैं पत्र लिखे देता हूँ। आप अपना इलाज करवा लीजिये, (पत्र लिखता है तथा लिखकर उसकी ओर बढ़ा देता है) यह डाँक्‍टर मेरी जान पहचान का है, आपका अच्‍छा इलाज हो जाएगा। अब कृपा करके जाइये।

लेखक :- (हाथ बढ़ाकर पत्र लेते हुये उसे गौर से देखता है) अरे, (चौंककर) यह तो वही अस्‍पताल है जहाँ से अभी-अभी मेरी छुट्टी हुयी है। यह कैसा मजाक है ?

नेता :- यह मजाक नहीं हकीकत है। आप इसे लेकर जाइये और देखिये कितना अच्‍छा इलाज होता है।

लेखक :- (कुर्सी से उठते हुये) अच्‍छा जाता हूँ (पत्र थैले में डाल लेता है)

नेता :- (लेखक को जाते हुये देखता है तथा उसके मंच के पीछे चले जाने पर) कैसे-कैसे लोग हैं ? मरने के बाद भी सरकार का पीछा नहीं छोड़ते।

(पर्दा गिरता है)

(पर्दा उठते ही मंच पर प्रकाश दिखाई देता है। कोने में एक पलंग पर सफेद चादर पर कोई आदमी सोया हुआ है, मुँह ढांक कर , तथा उसी के पास एक बुढ़िया घुटनों में सिर दिये धीमे-धीमे सिसकियाँ भर रही है, मंच पर लेखक प्रवेश करता है, जिसे देखते ही वह बुढ़िया जोर-जोर से रोने लगती है।)

लेखक :- अरे (बुढ़िया की ओर बढ़ते हुये) क्‍यों रो रही हो माँ, क्‍या बात है ?

बुढ़िया :- (रोते हुये) क्‍या बताऊँ बेटा ? (पलंग की ओर इशारा करते हुये) मेरा बेटा कल शाम को दम तोड़ गया है। लेकिन इसकी लाश मुझे नहीं दे रहे, कहते हैं अभी मरा नहीं।

लेखक :- (पलंग पर लेटे आदमी को छूकर) अरे यह तो बिल्‍कुल ठंडा पड़ गया है। वाकई मर चुका है। चलो मेरे साथ आओ (बुढ़िया को हाथ पकड़कर उठाता है) मैं इनसे बात करूँगा।

(बुढ़िया खड़ी हो जाती है, दोनों साथ साथ चलते हैं)तभी एक डाँक्‍टर मंच पर प्रवेश करता है)

लेखक :- (डॉक्‍टर को रोकते हुये) इसका बेटा कल शाम दम तोड़ गया है। आपकी उसकी लाश इसे क्‍यों नहीं सौंपते। (बुढ़िया जोर से रोती है) जब तक लाश इसके सामने रहेगी तब तक यह रोती रहेगी। अब इसे और न रूलाइये इस पर महरबानी कीजिये।

डाँक्‍टर :- देखिये साहब, यह अस्‍पताल है। यहाँ हर काम सरकारी नियमों के अन्‍तर्गत होता है। आप सरकार के काम में अपनी टांग मत अड़ाइये।

लेखक :- मरना , जीना भी कोई सरकारी काम है ? इसका भी कोई नियम है ?

डाँक्‍टर :- जी हाँ, यहाँ हर काम नियम से होता है, हम जल्‍दबाजी करके नियम नहीं तोड़ना चाहते। पिछले दिनों इसी चक्‍कर में एक गड़बड़ी हो गयी। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं करना चाहते।

लेखक :- (लाश की तरफ इशारा करते हुए) इसका निबटारा आज हो पायेगा, या नहीं।

डाँक्‍टर :- कुछ नहीं कहा जा सकता (बुढ़िया जोर से पुनः रोती है)

लेखक :- आप एक बार मेरे कहने से इसे चैक कर लीजिये। यह बिल्‍कुल ठंडा हो चुका है। जीवित होने की गुंजाइश है ही नहीं आप इसे लाश दे दीजिये।

डाँक्‍टर :- (बौखलाकर) आप अपनी बकबास बन्‍द कीजिये, हमको अपनी नौकरी से हाथ नहीं धोना, समझे। जब तक हम अपनी जांच से पूरी तरह संतुष्‍ट नहीं हो जाते, इसे मरा घोषित नहीं कर सकते। आप जब तक बैठिये।

(बुढ़िया और जोर-जोर से रोने लगती है। लेखक मंच के सामने दर्शकों की ओर बढ़ता है)

लेखक :- (स्‍वतः) (अपना दायां हाथ सीने पर रखता है) यह कैसा अन्‍धेर है ? जिन्‍दा, मुर्दा है, (बाये हाथ से पीछे रखी लाश की तरफ इशारा करते हुये) मुर्दा जिन्‍दा है।

(पर्दा गिरता है)

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वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा

रिछरा फाटक, दतिया (म0प्र0)

पिन - 475-661

vkudhra3@gmail.com

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फरारी की सवारी

यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है फिल्मों से प्रभावित होने वालों की कहानी है। पुलिस के अफसर, जो सरकार के समकक्ष होते हैं, फिल्मों के सिपाहियों की वर्दी से प्रभावित हो गये। उन्हें अपने सिपाहियों की खाकी वर्दी खाक लगने लगी। फैसला किया कि वर्दी का रंगढंग बदला जाना चाहिए। वह चुस्त दुरूस्त और वर्तमान से अलग भविष्य के किसी रंग की होनी चाहिए। मुजरिम पकड़ने या जुर्म की पड़ताल करने या जांच के तरीके सीखने के बहाने विदेश जाने की बजाय, इस बार वर्दी का डिजायन ढूंढने के लिये साहब लोगों ने अमरीका-इंग्लैड की यात्राएं सपरिवार की। एक डिजायन तय हो गया। एतराज आया कि यह ठंडे मुल्क की ड्रैस है। क्या अपने गर्म देश में भद्दी नहीं लगेगी? जवाब आया- आदमी गर्म-ठंडा होता है, मुल्क नहीं। वास्कोडिगामा ठंडे देश से इस मुल्क में आया था तब लंबे बूट और गर्म कपड़े का ओवर कोट पहन कर आया था, उसे तो गर्मी नहीं लगी। फिर कष्ट उठाकर जनता की सेवा करना तो हम पुलिस वालों का फर्ज है।

एक सिपाही इस अनचाहे बोझ से परेशान हो गया। अपने नजदीकी साहब के पास गया।

’’साहब, मारे बोझ और गरमी के परेशान हो गया हूं। कोई बिना वर्दी की ड्यूटी लगवा दीजिए।’’

’’बड़े साहब के यहां पौंछा लगाने को तैयार हो?’’

’’साहब, यह तो लदे हुए पर और लादना हुआ।’’

’’तो, तुम्हें आराम वाली, कुछ पाने वाली ड्यूटी चाहिए। इसके लिए कुछ करना होगा।’’

’’कितना करना होगा , साहब?’’

’’क्या समझा तूने? जबसे लोकपाल आने को हुआ है, हमारे राजनीतिक आका तक डरने लगे हैं। हमारी तो बिसात ही क्या है....।’’ इतने में बाहर कुछ खटका हुआ। साहब चौंका तो सिपाही ने कहा-डरिये मत, लोकपाल नहीं है, डाकपुरूष है। ’’

’’क्या कहा? डाकू पुरूष है? आत्मसमर्पण करने आया है?’’

’जी, डाकपुरूष यानि पोस्टमैन।’

’’सीधे सीधे पोस्टमैन क्यों नहीं बोलता। अब तो सरकार ने भी कह दिया है कि जिस शब्द की हिन्दी नहीं कर सकते, उसकी अंग्रेजी कर दो।’’

’’साहब, अपनी डिक्शनरी में हिन्दी-अंग्रेजी की बजाय ’देसी-अंग्रेजी’ होती है। खैर, साहब आपको क्या, चाहिए?’’

’’कोई इनामी फरारी पकड़वा कर दे।’’

’’साहब, यह तो मेरे बांए हाथ का काम है। क्योंकि मेरे घर के दांई तरफ एक फरारी का पच्चीस साल पुराना ठिकाना है?’’

’’पच्चीस साल से उसका ठिकाना है? वह आज तक पकड़ा क्यों नहीं गया?’’

’’पच्चीस साल पहले उस पर इनाम घोषित हुआ था, आज वह मामूली लगता है। फिर वह किसी को दिखाई नहीं दिया। क्योंकि वह कभी दुबई चला गया तो कभी बंगलादेश। कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में। चुनाव लड़ने का भी शौकीन है। आजकल गोल्डन चांस है। उसके सिर पर कोई मजबूत वरदहस्त नहीं है।’’

’’उसका नाम और ठिकाना बता।’’

’’अभी? पहले आप उस पर घोषित इनाम का भाव तो बढवाइए।’’

’’वाह़। तूने अपना भाव अभी से बढा दिया। अच्छा जा, सात दिन के लिये स्टेशन के बाहर बिना वर्दी की ड्यूटी करले।’’

’’ नहीं साहब वहां नहीं, वहां लड़कियों को छेड़ने वाले शोहदे, उठाईगीर, सट्टे का नंबर लिखने वाले सब मुझे पहचानते हैं। मुझे ’गुरू-गुरू’ कहकर मेरी इज्जत करने लगेंगे। कोई और जगह बताए।’’

’’ अच्छा तो जा, हमारे मंत्री जी की विरोधी पार्टी के दफ्तर की निगरानी कर। कौन आता जाता है, यह नोट करते रहना। सिर्फ सात दिन के लिये। सातवें दिन उस पच्चीस साल पुराने फरारी को पकड़वाने आ जाना। एक फरारी की सवारी मिल जाये तो महकमे में कुछ नाम होगा।’

सात दिन? वह सिपाही आज तक वापस नहीं आया। क्यों आए? उसे उस राजनीतिक पार्टी के नेता ने चुनाव लड़ने का टिकट जो दे दिया। वह जीत गया तो महंगी गाड़ी फरारी पर सवार होकर ही आयेगा। वरना अपनी ’फरारी ’ की सफाई देगा कि उसे बंधक बनाकर अज्ञात जनता के सामने फेंक दिया गया था।

गोविंद शर्मा, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया-335063

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बंदरबांट

यह नाम कहां से आया? कुछ का कहना है कि दो बिल्लियों की उस कहानी से आया है, जिसमें एक रोटी के लिये बिल्लियां आपस में लड़ पड़ी थीं और बंदर से फैसला करवाने पहुंच गर्ई थी। बंदर ने उनमें आधी आधी रोटी बांटने के बहाने सारी ही चट कर डाली थी। ऐसा था तो शब्द बंदरबांट की बजाय बिल्लीबांट होना चाहिए था। शायद इसलिए नहीं हुआ कि योग को योगा और भीम-अर्जुन को भीमा-अर्जुना बोलने वालों के देश में लोग बिल्लीबांट की बजाय बिली ब्रांट बोलते। इससे भ्रम हो जाता कि कहानी बिली-ब्रांट नामक बिल्लियों की है या कहानी लेखक बिलीब्रांट है। कुछ भी होता, कोई इंग्लैंड अमरीका का रहने वाला बिलीब्रांट मालिक बन जाता। वहां ऐसा ही होता है। बंदरबांट की तरह अमरीका बांट भी तो मशहूर है। मिस्र हो या लीबिया, इराक हो या सीरिया, वर्षों से कुर्सी हथियाने की लाइन में लगे विपक्ष की सहायता के लिए अमरीका प्रायः कूद पड़ता है। सत्ता का बंटवारा या हस्तांतरण हो जाता है। लोग उसे खुले में अमरीकी बांट नहीं कहते ताकि उसे क्रांति कहा जा सके ।

वैसे बंटदरबांट वहां कहा जाना चाहिए जहां बंदरों का बंटवारा होता है। जैसे एक कुर्सीं विहीन ने कहा है- प्रदेशों में कांग्रेस-भाजपा ने कर रखी है सत्ता की बंदरबांट। इसका मतलब हुआ कि सत्ता के बंदर कभी कांग्रेस तो तो कभी भाजपा वाले बन जाते हैं। या सत्ता के चाहवान बंदर की तरह कभी इस गठबंधन की झोली में तो कभी उस गठबंधन की झोली में कूद जाते हैं। इसलिए लगता यही है कि रोटी पर झगड़ने वाली बिल्लियों की बजाय सत्ता के लिए झगडने वाले बंदरों ने ही निर्मित किया है-बंदरबांट।

पार्टियों के अध्यक्षों ने अपने अपने बंदर बांट रखे हैं। उनके बंदर इधर उधर खौं-खौं करते रहते हैं। अध्यक्ष है कि उनकी जबान बंदी करने में ही अपना वक्त गंवाते रहते हैं। न तो उनकी जबानबंदी हो पाती है न नसबंदी। हर रोज आऊ बाऊ बोलने वाले बंदरों की नई नई नस्ल पैदा होती रहती है। लोक तंत्र में बोलने की आजादी का लुत्फ यही लोग उठाते हैं। यही बात साबित करती है कि आदमी आदमी के रूप में आने से पहले चार्ल्स डार्विन का बंदर था। बंदरों ने केवल शक्ल बदलने कर कष्ट किया ।

इनका यह रोग जनता को भी लग गया है। मतदाता भी बांटने के मामले में पूरी बंदरबांट करता है। कभी काभी ही एक तरफ अपने बंदर बैठाता है मतदाता। वरना मतदाता ऐसी बंदरबांट करता है कि कुछ यहां, कुछ वहां तो कुछ कहां। इस बंदरबांट का नतीजा होता कि बंदर डाल-बदल करते हैं। इसे गठबंधन, मोर्चा, ध्रुवीकरण, धर्मनिरपेक्ष दलों का एकीकरण, सांप्रदायिकता को रोकने का प्रयास आदि पवित्र शब्दों से पुकारा जाता है। आप चाहे उसे मतदाता की बंदरबांट पर कुर्सी की बंदरबांट कह सकते हैं।

जहां बंदरबांट ज्यादा हो जाती है, वहां बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। एक प्रदेश में तो बड़ी पार्टी ने छोटी पार्टी को उदरस्थ करके अपनी सरकार बनाई। एक में छोटी पार्टी के एक विधायक को अलग कर बाकी सबको अपनी तरफ बांट कर सरकार बनाई। इस ’बंदर विलीनीकरण’ (यह बंदरबांट का वैज्ञानिक नाम है या शास्त्रीय नाम, मेरा बेज्ञान नहीं बता सकता।) पर लड़ते झगड़ते सरकारें आधी से ज्यादा उम्र तक जी चुकी हैं अर्थात् खेल खत्म नहीं हुआ है। हमारी रोटी पर जो बिल्लियों की तरह लड़ते हैं, वे ही फैसला यानी बंदरबांट करते हैं।

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परिचय:

गत 40 वर्ष से व्यंग्य एवं बाल साहित्य का सृजन दो व्यंग्य संग्रह, ’कुछ नहीं बदला और जहाज के नये पंछीप्रकाशित। बाल साहित्य की तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशन विभाग, भारत सरकार का भारतेन्दु पुरस्कारऔर राजस्थान साहित्य अकादमी के शंभूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कारसहित अनेक सरकारी गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित। पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य एवं बालकथाएं नियमित रूप से प्रकाशित। संपर्क सूत्र -09414482280

गोविंद शर्मा ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया 335063

my mo.no.09414482280

 

शिवपुरी/आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा आयोजित दो दिवसीय साहित्‍यिक आयोजन ने ठूंसे व ठसे गए साहित्‍यकारों के कारण गरिमा खो दी। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि देश के जिन जाने माने कथाकारों और कवियों को आयोजन में हिस्‍सा लेना था, ऐन वक्‍त पर एक-एक करके ज्‍यादातर ने शिवपुरी आने से इनकार कर दिया। इस कारण कार्यक्रम किसी तरह तरह से संपन्‍न हो जाए के नजरिए से आकाशवाणी ग्‍वालियर के आयोजनकर्ताओं को आयोजन की कमान सौंप दी गई। जिसका नतीजा यह निकला कि कुछ तो साहित्‍यकार ठूंस दिए गए, तो कुछ अपनी पहुंच और खुशामदी आचरण के चलते ठस भी गए। करीब दो दर्जन कवि, कथाकारों को अवसर दिया गया, लेकिन इस आयोजन का दुखद पहलू यह रहा कि पिछड़े और दलित वर्ग से एक भी साहित्‍यकार को आमंत्रित नहीं किया गया। नौकरशाही की मनमानी के चलते जिले के वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों को भी नकारा गया।

दो दिनी इस आयोजन का एक सत्र कविता समय के नाम से समकालीन कविता के चुनिंदा कवियों के लिए समर्पित था तो कहानी सत्र समकालीन कहानी के लिए। आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा श्रोताओं को जो आमंत्रण दिया गया था, उसमें आमंत्रित कवियों में डॉ. परशुराम शुक्‍ल विरही शिवपुरी, कुमार अम्‍बुज भोपाल, निरंजन श्रोत्रिय गुना, हरिओम राजौरिया अशोकनगर, पवन करण ग्‍वालियर, नासिर अहमद सिंकदर दुर्ग, पंकज राग भोपाल, और बृज श्रीवास्‍तव विदिशा शामिल थे। कविता पाठ का समय निकट आया तो इनमें से कुमार अम्‍बुज, पवन करण और पंकज राग ने न आने की लाचारी जता दी।

चूंकि आकाशवाणी के पास धनराशि बडी मात्रा उपलब्‍ध थी और इसे हर हाल में 31 मार्च तक ठिकाने लगाना था। इसलिए राशि समर्पित (लेप्‍स) न करनी पड़े इसके लिए जरूरी था कि किसी भी तरह खानापूर्ति कर आवंटन खत्‍म किया जाए। इस लिहाज से किसी भी तरह कवियों को बुलाने की जबावदारी ग्‍वालियर के एक ऐसे कार्यक्रम अधिकारी को सौंपी गई, जो शेर-शायरी रचने के शौकीन हैं और मंचीय आयोजनों के जोड़तोड़ में माहिर माने जाते हैं। लिहाजा मत चूको चौहान की तर्ज पर उन कवियों और गजलकारों को आमंत्रित किया गया जो परस्‍पर एक दूसरे पर मेहरबानी बरतते हैं। मुंह देखी के लिए शिवपुरी के वरिष्‍ठ और प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार डॉ. परशुराम शुक्‍ल विरही से भी सलाह मशिबरा किया गया, लेकिन उनकी राय को तवज्‍जो नहीं दी गई। नगर के ही नवगीत विधा क्षेत्र में ख्‍यातिनाम विद्यानंदन राजीव को जानबूझकर नकारा गया। बाद में इस मनमानी की शिकायत हुई तो आकाशवाणी-दूरदर्शन के केंन्‍द्रीय निदेशक लीलाधर मण्‍डलोई ने खुद राजीव से बात करके कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। बाद में राजीव जी से ग्‍वालियर और शिवपुरी के अधिकारियों ने क्षमा याचना भी की।

राजीव की ही तरह डॉ. हरिप्रकाश जैन,डॉ. महेन्‍द्र अग्रवाल और अरूण अपेक्षित को भी नकार दिया गया था। हालांकि बाद में महेन्‍द्र को बुला लिया गया। भरपाई की दृष्‍टि से बाद में अन्‍य कवियों को बुलाया गया उनमें रश्‍मि शर्मा, कादम्‍बरी आर्य, ब्रज श्रीवास्‍तव, निरंजन श्रोत्रिय, बैजू कानूनगो, जहीर कुर्रेशी और नासिर अहमद सिकंदर शामिल हैं। रश्‍मि और कादम्‍बरी मंचीय शोभा रहीं। उनकी रचनाओं ने महज हलकी रूमानियत का माहौल रचा।

बैजू कानूनगो की गजलें तो मर्म को छूने वाली थीं, लेकिन जिस सूक्‍ति वाक्‍य ‘‘कविता आनंद से शुरू होती है और बुद्धिमता पर समाप्‍त'' के आदर्श को आकाशवाणी के अधिकारियों के चरणों में समर्पित करके उन्‍होंने साहित्‍यिक स्‍वाभिमान को पलीता तो लगाया ही, अपनी लाचारी भी जता दी। चाटूकारिता के इस चरम ने श्रोताओं को हैरान किया।

कथा समय आयोजन के अंतर्गत प्रकाश दीक्षित ग्‍वालियर, महेश कटारे ग्‍वालियर, राजेन्‍द्र दानी जबलपुर, सुश्री उर्मिला शिरीष भोपाल और वन्‍दना राग भोपाल को बुलाया गया था। ऐन वक्‍त पर उर्मिला और वन्‍दना ने तबियत खराब हो जाने का बहाना करके आने से पिंड छुड़ा लिया। बुजुर्ग साहित्‍यकार प्रकाश दीक्षित को बमुश्‍किल महेश कटारे लाए। आकाशवाणी की गरिमा बनी रहे इसलिए महेश को यह जिम्‍मेदारी दी गई थी कि वे प्रकाश जी को लादकर भी लाना पड़े तो लाएं। पहले इस आयोजन में स्‍थानीय किसी भी कथाकार को नहीं लिया गया किंतु एकाएक पदमा शर्मा को बुला लिया गया। जबकि नगर के अन्‍य वरिष्‍ठ कथाकारों को छोड़ दिया गया।

कई साल बाद संपन्‍न इस साहित्‍यिक आयोजन के निजी स्‍वार्थों और मनमानियों के चलते शिवपुरी की आकाशवाणी की उस गरिमा को दरका दिया, जिसकी बुनियाद हरिनारायण नवरंग और सुरेश पांडे जैसे केन्‍द्र निदेशकों ने रखी थी। वैसे भी आकाशवाणी लेन देन, खुशामद और चिरौरी की परिपाटी मौजूदा समय में इतनी पुख्‍ता है कि जो नगर के गंभीर और राष्‍ट्रीय पहचान वाले साहित्‍यकार हैं, उन्‍हें तो सालों से बुलाया ही नहीं जा रहा है जबकि आकाशवाणी से बतौर पारिश्रमिक मिलने वाले पत्रम्‌ पुष्‍पम्‌ के एक भाग जो कथित और नवोदित लेखक आकाशवाणी की देहरी पर ही अर्पित कर देते हैं, उनका सिलसिला जारी रहता है। ठूंसे और ठसे लेखकों के चरित्र की यही तो बानगी है ?

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

मो. 09425488224 फोन 07492-232007, 233882

पिछले दिनों यह नाटक रचनाकार में धारावाहिक रूप से क्रमशः प्रकाशित किया गया था. यह पूरा नाटक आप यहाँ पर नीचे लिंक को क्लिक कर सीधे ही पढ़ सकते हैं या फिर पीडीएफ ई-बुक के रूप में निःशुल्क डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.

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डायरेक्ट डाउनलोड लिंक से भी इसे डाउनलोड किया जा सकता है

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घरों में रात चढ़ गयी है और
अस्मिता की मद्धिम कराह
तीसरे पहर में भी रेलवे स्टेशन की तरह जाग रही है

बेजान आँचल की हवा
नीले समुद्र से होकर नहीं बहती और अनवरत शोक गीत टीवी पर जारी है
नहीं यहाँ कोई आम नहीं बहुत ही खास
नहीं रहे है उनके बीच और
भाषा के अंतिम शब्द
प्याली में गिर चुके हैँ

इस विकट शहर को अभी तक
ऊब ने नहीं छुआ है
रेत का लहराता टापू
प्रभु के मौन की तरह चुप है
इसी शहर में
जैसे जंगल घुस आया है

चीटियों के घरों से होकर जो रास्ता
नींद के रास्ते से मिलता है
वह निवास आकृति कहीं नहीं मिलती है न कमीज के पाकेट में
न किताबों के अटारी में

प्रक्रिया बदलाव की
सिमट गयी है टीवी पर
और ज्यामिति के कोण हमारे पांव में बदल गये हैँ और
हो गये हैं हम जरा से टेढ़े
इस टेढ़े समय में

हमने पाल लिया है नीले पर्वतों की जगह देह मुक्त सुन्दरता को
और ड्राइंगरूम में बचा लिया गया है सीधे-साधे समय को
शैँपू किये गये बालों में

प्रतीक्षा है रात कब उतरेगी
जैसे बिल्ली उतरती है पेड़ से ।

* मोतीलाल/राउरकेला 

  कँदर मँदर जी होवे
       कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे
       पिया न लौटे अब तक बिन्नी मेरो मनुआ रोवे|

     भुनसारे के निकरे कहखें चाँदामेटा जाहूँ
      आज फसनवारो है सट्टा चौउआ क्लोज़ लगा हूँ
      भुन्सारे सें संजा हो गई अब तक लौटो नईंयाँ
      मोहे लगत है ओपन क्लोज़ सुनई खे आहे सईंयाँ
      लड़का बच्चा सबरे जग रये मुन्ना बी न सोवे
      कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे|

      इत्तो सुनखे मुन्ना बोलो बऊ तू मत कँदराये
      पक्कई चऊआ फँद गओ ओको जभई न दद्दा आये
      पहले वे सट्टा पट्टी वारे सें लेहें चुकारा
      फिर वे लेहें पोलका तोरो,मेरो मीठा खारा
      नईहाँ दम बऊ कोई की,दद्दा को रुपया डोबे
      कँदर मँदर मत होवे बऊरी कँदर मँदर मत‌ होवे|

      बात चलत्ती कि इत्तई में दद्दई आत दिखाने
      मुहड़ो पूरो तुतरा गओ थो लग रये थे खिसयाने
     मुन्ना समझ गओ दद्दा ने ले लओ तगड़ो पऊआ
      दद्दा बोले दुक्की आ गई फिर नईं आओ चऊआ
      इत्तो सुनखे मुन्नी की बऊ धड़ने गिर गई आड़ी
      किस्मत की गबदस में फँस गई अब जिनगी की गाड़ी
      पर मुन्नी हँसखे बोली दद्दा‍..मती खेलियो सट्टा
      बिक जाहें रे बैल बछेरू उड़ जाहे रे फट्टा
      दुग्गी के पीछे दद्दा मत घर की इज्जत धोवे
      कँदर मँदर सबको जी होवे कँदर मँदर जी होवे|

         Awdhesh Tiwari chhindwada M P

                                                                  
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घर-1

घर कभी निर्मम नहीं होता
कहीं माँ से कम नहीं होता

आँधियाँ कठिनाइयों की
जब चलें तो;
स्वार्थ प्रेरित छद्म  भी
जब-जब छलें तो;
पथ सभी अवरुद्ध -से
लगने लगें तो
उन क्षणों में भी कभी
बेदम नहीं होता.

नेह, धीरज,शांति,
निष्ठा  पाठशाला ;
किलकते सम्बन्ध अविरल
घर उजाला;
समाया त्रासद जब हुआ
घर ने सम्भाला
घर कभी   घर से
कहीं भी कम नहीं होता.

घर बनाने में हवन
होती रही माँ;
घर कभी  बिखरा
तो  फिर रोती रही माँ;
पिता की आँखों का घर
जब पुत्र  ने देखा
फिर  कभी नीचा
कोई परचम नहीं होता.


घर-२

घर की आस लिए लौटा घर
कोई बरसों बाद.
उमग उठा उल्लास
मोहल्ले भर में बरसों  बाद.

वही द्वार- दीवारें,छप्पर,
आँगन  पथरीला ;
गोबर लिपा महकता चौका
कुछ सीला-सीला ;

कहाँ रहे,क्यों भूले ,
कैसे बीते इतने साल,
प्रश्न लिए नज़रें चहरे पर
झेलीं बरसों  बाद.

परछी एक और दो कमरे
कितनी जगह लिए;
अपनों और अपिरिचित को भी
मन भर जगह दिए;

कोई भूले तो भूले पर
घर को याद रहे
वही नेह मकरंद लिए
मिल जाता बरसों बाद.

भाई और भतीजों के मन
बंटवारे का खटका;
नए बने पक्के कमरों में
भौजी का मन अटका;

द्वार ताकती रहीं
प्रतीक्षा में जाने कब से,
जी भर कर अम्मा की आँखें 
बरसीं बरसों बाद.

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(चित्र - नवसिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की कलाकृति)

प्राचीन समय में ऐसे भी राजा होते थे जो अपने कथन की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दिया करते थे। और तो और स्वप्न में दिए गये कथनों तक की रक्षा में राज पाट व राज सुख भी त्याग देते थे। लेकिन आज के राजाओं के लिए अपना कथन वापस लेना बाँयें हाथ का खेल हो गया है। कुछ भी बोल दो। बात बन जाये तो ठीक है । यदि कोई बवाल दिखे तो कथन वापसी की घोषणा कर दो। कथित माफी माँग लो। क्या जुगत है। कोई प्रश्न कर सकता है कि आज राजा कहाँ हैं ?  यदि हैं भी तो उनके पास राज पाट नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है। पहले एक राज्य में सिर्फ एक राजा होता था। आज एक राज्य में हजारों राजा होते हैं ।

ऐसे ही एक राजा यानी राजनेता हैं चिरौंजीलाल जी। पहले ये भी आम आदमी थे। आदमी तो अब भी हैं लेकिन आम नहीं हैं। आज इनके पास दाम है। नाम है। कम से कम देश में ही सही। खैर काम क्या है ? सरकारें बनाते, चलाते और गिराते हैं। जनता को दिलासा देते हैं। हिन्दुस्तानी सहनशील व दार्शनिक प्रवृत का होता ही है। अतः नेता की बात उसे अच्छी तरह समझ में आती है कि-

" तत्काल नहीं वर्षों में हल।

आज नहीं तो होगा कल "।।

आखिर करे भी तो क्या ? अपनी न्याय व्यस्था भी इसी सिद्धांत पर चलती है। नेताओं के राज सुख को देखकर ही बर्षों पहले इनके मन में राजनेता बनने की इच्छा हुई थी। कोई भी अपने पार्टी से इन्हे टिकट देने को तैयार ही नहीं था। भला आम आदमी को टिकट देकर कौन अपनी एक सीट जान-बूझ कर गवाँने की जहमत मोल लेगा। जनता आम आदमी को वोट ही नहीं देती। नेता बनने लायक प्रोफाइल होनी चाहिए। नहीं तो जमानत जप्त होना तय। आम आदमी ही आम आदमी को नहीं देखना चाहता तो नेता क्या करे  ?

पिछले रिकार्ड के रूप में जन-सेवा लायक कोई निशानी इनके नाम में दर्ज ही नहीं थी। वैसे कॉलेज के नेताओं के साथ कॉलेज बंद करवाने, लड़कियों को छेड़ने, दुकानें बंद कराने, लूटने व चंदा वसूलने, कमजोर छात्रों व शिक्षकों को पीटने जैसी जन सेवा में इन्होंने बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। लेकिन इसका श्रेय साथी छात्र नेता जिसे किसी पार्टी का समर्थन प्राप्त था ले उड़ा। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर तथा उसे जन-सेवा के बिल्कुल योग्य जानकर उस पार्टी ने उसे पार्टी में शामिल होने का ऑफर दिया। अब वह सरकार में है। बेचारे चिरौंजीलाल क्या करते ?

खैर अनुभवी तो थे ही। राजनीत के सारे गुर जानते ही थे। इसलिए एक नई पार्टी बनाने का बिचार किया। सोचा देश अपना है। सो जनता अपनी है। पार्टी भी अपनी होगी। अतः सबसे उपयुक्त नाम होगा ' सब कुछ अपना पार्टी '। यानी ' एसकेएपी '। पार्टी भी बन गई तो मुद्दों की बात आई। देश के सामने समस्याएं कम तो हैं नहीं। अतः मुद्दे ही मुद्दे हैं। लेकिन ये कुछ नये तरीके से शुरुआत करके सबको छका देना चाहते थे। ताकि विरोधी जान सके कि चिरौंजीलाल भी क्या चीज है  ?   धर्म, जाति व साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दे तो बहुतों के हथियार बने ही हुए हैं। कुछ तो सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़कर बनाने में महारत हाशिल कर चुके हैं। गरीबी, बेकारी,  बिजली, पानी, सड़क,  व रोजी-रोटी के मुद्दे तो आजादी से ही कायम है। लेकिन ये क्या करें ?  कैसे अपनी बात रखें की जनता विरोधियों के पैर उखाड़ दे।

आखिर एक जुगुत सूझ ही गयी। इन्होने  बिल्कुल ही अलग तरीके से जनता के बीच जाने का निर्णय लिया। ये जहाँ भी जाते बिकुल नंगे पाँव जाते। जूता पैर में न पहनकर सिर पर रखते थे। मानों जूता न हो मुकुट हो। संतुलित विकास का नारा दिया। यानी देश के हर कोने व हर तबके का विकास । जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाईं ख़त्म हो जाये। जनता में जाकर कहते कि गरीबों तथा पिछडों को उठाना ही अपना लक्ष्य है। आजतक सभी ने सिर्फ अपना उल्लू सीधा किया है। जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, गरीबी व पिछड़ेपन के नाम पे आप से वोट लेकर सभी ने अपना तथा अपनों का घर नोट से भरा है। लेकिन आप देख ही रहे हैं। मैंने जूते को भी पाँव से निकालकर सिर के ऊपर रखा है। ठीक इसी तरीके से जब तक गरीबों व पिछड़ों को उठा नहीं दूँगा जूते नहीं पहनूँगा। इनकी इस अनूठी घोषणा का अनूठा असर हुआ । क्षेत्र की जनता ' एसकेएपी ' मय हो गई। जूते से मुकुट पा ही लिया। सच में अब इन्हे भारतीय जूतों की दरकार नहीं है। विद्वान बताते हैं की जैसे पानी, पानी में जाता है। ठीक वैसे ही धन, धन में। इसलिए ही धनी और धनी तथा गरीब और गरीब होता जाता है। अतः गरीबी उठती ही जाती है। लेकिन देश से नहीं बल्कि देश में। समस्याएं भी उठती ही रहती हैं। बैठती कहाँ है ?  गरीब भी उठता ही रहता है। बचे तो अपनी बला से। नहीं तो भूँख-प्यास, सूखा, बाढ़ , सर्दी, गर्मी सब गरीबों को ही उठाते हैं। नेता भी यही चाहते हैं कि गरीब उठे।

एक बार चुनाव प्रचार के दौरान इनके एक दबंग साथी ने कुछ ऐसा बोल दिया कि मीडिया में काफी हो-हल्ला उठा। चिरौंजीलाल जी बोले कि हमारे सहयोगी के जिस कथन को हमारे बिरोधी इतना तूल दे रहे हैं तथा मीडिया भी बढा -चढ़ा कर पेश कर रही है। उसपर वे अपनी स्थित पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं। लेकिन मीडिया और हमारे बिरोधियों की मिली भगत है। जिससे इस पर विराम नहीं लग पा रहा है। कथन को तोड़-मरोड़ कर इस प्रकार पेश किया जा रहा है -

                        '' जीतेंगे तो रम चलेगा।

हारेंगे तो बम चलेगा। ।

जनता हमारे साथ चलेगी।

एसकेएपी राज करेगी। ।  "

         ' गम ' को ' बम ' बनाया जा रहा है। फिर भी हमने सलाह दिया और उन्होंने सिर्फ 'कथित माफी' ही नहीं माँगा। बल्कि यह भी घोषणा किया कि " मैं अपना कथन वापस लेता हूँ "। सारी कारिस्तानी विरोधियों की है। जनता तो सहिष्णु हैं। फिर भी कथन की वापसी के बाद कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए।

हमने भी एक बार इस फोर्मूले को ट्राई करने की जुगुत भिडाई। लेकिन सफलता नहीं मिली। मेरा छोटा भाई मनी प्लांट का पौधा लगाकर घर के सामने शीशम के पेड़ पर चढ़ा रहा था। मैंने कहा कि इसकी पत्तियाँ बहुत छोटी हैं। चौड़ी पत्तियों वाला लगाना चाहिए। काफी दिन से वह वैसा ही दिख रहा था। वह बोला इसी को मैं बड़ी पत्तियों वाला बना दूँगा। यदि आप पॉँच सो रुपए की शर्त रखें । मैंने सोचा इसी बहाने गर्मी में पानी डालता रहेगा। अन्यथा इसका सूखना तय है। मैंने एक तरफा शर्त लगा दिया। उसने छ महीने का समय लिया। छ महीने बाद जब मैं घर गया तो नीम के पेड़ पर चौड़ी पत्तियों वाला मनी प्लांट लहरा रहा था। शर्तानुसार भाई पैसा मांगने लगा। मैंने कहा यह शीशम के पास वाला पौधा नहीं है। उसने बताया यह वही पौधा है। वहाँ बढ़ नहीं रहा था। सो मैंने यहाँ लगा दिया। मैंने कहा पत्तियाँ चौड़ी हो गयी तो अच्छी बात है । लेकिन अपनों के बीच में शर्त का कोई अर्थ नहीं होता । शर्त-वर्त तो गैरों से रखी जाती है। कोई अपने भाई से वह भी बड़े भाई से शर्त रखकर पैसा थोड़े मांगता है । वह मान ही नहीं रहा था। मैंने कहा कि तुम छोटे हो और मैं बड़ा । फिर भी मैं कथित माफी माँग रहा हूँ। अब देना नहीं रहेगा तो शर्त नहीं लगाऊँगा। वह बोला सिर्फ पॉँच सो रूपये के लिए बड़े होकर माफी मांगते शर्म नहीं आती।

आज पैसे के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते ? लोग ऐसे ही शर्माने लगें तो इक्कीसवीं सदी किस नाम की। आज लड़कियाँ भी तो नहीं शर्माती। लड़कों के हाथ में हाथ और गले में बाँहे डालकर चलती हैं। महिला संगठन का कहना है कि पुरुषों के कंधे से कंधे मिलाकर चलना है । लेकिन यहाँ तो दिल से दिल मिल जाते हैं। कितनों के खोते भी हैं। इसी चक्कर में कितनों की आँखे गम से नम होती हैं। कितने ही पतियों व पत्नियों को हाथ मल कर रह जाना पड़ता है। पार्कों-उद्यानों को सार्थक किया जाता हैं। लेकिन पार्कों-उद्यानों को और अधिक सफल बनाने के लिए कुछ और जरूरी कदम उठाये जाने की जरूरत है। जिससे लड़के-लड़कियाँ सबकी, कम से कम सगे सम्बन्धियों की नजरें बचाकर नयन-बयन की सीमा से और अधिक आगे बढ़ सकें ।  ' हास्य-रस के नये आयाम ' को पूर्णतया जीवंत रूप देकर मन-मोद की पूर्णता प्राप्त कर सकें ।

        ' कथित माफी ' वाला दांव फेल हो जाने पर मैंने ' कथन वापसी ' वाली ट्रिक इस्तेमाल किया। मैंने कहा जो हुआ सो हुआ। आज मैं अपना शर्त वाला कथन वापस लेता हूँ। भाई   तपाक से बोला आप कथन वापस कैसे ले सकते हैं ?  आप नेता थोड़े ही हैं। मैंने उसे समझाया कि नेताओं ने कथन वापसी का अधिकार पेटेंट तो करा नहीं रखा है। देश में जनतंत्र है। सबको समान अधिकार प्राप्त है। दीगर है कुछ लोग लूटते हैं और कुछ लुटते हैं। कुछ लोग सिर्फ खाते हैं और कुछ भूँखे ही रहते हैं। कुछ लोगों के अधिकार में पीने का पानी व दो जून की रोटी के भी लाले ही हैं।

सारी जुगत फेल हो गई। वह बिना पॉँच सौ लिए नहीं माना। वैसे हर बार उसे मैं कम से कम पॉँच सौ रूपए देता ही था। लेकिन नेताओं वाली चाल मेरे लिए कामयाब नहीं हुई। किसी ने सच ही कहा है

" जिसका काम उसी को साजे।

और करे तो डंडा बाजे "।।

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एस. के. पाण्डेय, समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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