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May 2012
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विज्ञान गल्‍प

मास्‍करोबोट

-मनोहर चमोली मनु'

विज्ञान प्रसार से संबंधित खबरों की कतरनों में उलझे शिक्षक जलीस अहमद का मोबाइल लगातार घनघना रहा था। अनमने भाव से और लगभग झुंझलाते हुए उन्‍होंने मोबाइल पर कहा-‘‘हैलो। कहिए।'' मोबाइल से स्‍वर जलीस अहमद के कानों पर पड़ा। उन्‍होंने सुना-‘‘नमस्‍ते सर। मैं सुजाता। सर आज मैं बहुत खुश हूं।'' जलीस खुशी से चिल्‍ला ही पड़े-‘‘सुजाता! सुजाता पुरी न? अरे! भई तुम हो कहाँ। अचानक कहां गायब हो गई थी। इतने सालों बाद! कहाँ हो? कैसी हो?''

‘‘दिल्‍ली में ही हूं। इण्‍डियन इनस्‍टिट्‌यूट्‌ ऑफ मिसाइल एंड टेक्‍नालॉजी में। बाकी बातें बाद में। फिलहाल आपके घर के बाहर काले रंग की एक कार खड़ी है। नंबर है, डी0एल0 2047. चालक आपको सीधे एयरपोर्ट ले आएगा। आपको विशेष विमान से यहां पहुंचना है। सर। अब हमारे देश के जवान सीमा की सुरक्षा करते हुए अकारण नहीं मारे जाएंगे। आप तो जानते ही हैं, मैंने पहले अपने पिता को और फिर दोनों भाइयों को खोया है। मैं सबसे पहले आपको ही इस नई खोज की परफॉरमेंस दिखाना चाहती हूं। आप....।''

जलीस अहमद प्रसन्‍न मुद्रा में बोले-‘‘ वेलडन! मेरी बच्‍ची। वेलडन। बस। फोन पर कुछ नहीं। मैं आ रहा हूं।'' विशेष विमान से जलीस इण्‍डियन इनस्‍टिट्‌यूट्‌ ऑफ मिसाइल एंड टेक्‍नालॉजी पहुँच गए। द्वार पर ही सुजाता खड़ी थी। जलीस अहमद के चरण छूते हुए बोली-‘‘आइए सर। बस आपकी ही कमी थी। मैं आपसे कहती थी न कि युद्ध में अकारण ही कई इंसान मारे जाते हैं। अब ऐसा नहीं होगा। लक्ष्‍य को छोड़कर जान-माल की हानि न होगी।''

जलीस मुस्‍कराते हुए कहने लगे-‘‘ओह! तो हमारी सुजाता ने भूमिगत रहकर इतिहास रचने वाला काम कर ही दिया। खैर। लैब में ले चलो। जरा हम भी तो देखे कि आखिर इतने सालों तक तुमने क्‍या किया।'' वे दोनों अब अत्‍याधुनिक प्रयोगशाला के भीतर थे। तभी जलीस अहमद बोले-‘‘लैब के अंदर इतने सारे मच्‍छर। ये देखो। एक तो मेरी कलाई पर ही आ बैठा है।'' उन्‍होंने अपना हाथ हवा में घुमाया। सुजाता ने संयत भाव से कहा-‘‘सर ये मच्‍छर नहीं है। हमारा ‘मास्‍करोबोट' है।''

जलीस चौंके-‘‘मास्‍करोबोट! यू मीन बनावटी मच्‍छर हैं ये, जो हवा में घूम रहे हैं। अद्‌भुत।''

सुजाता ने जवाब दिया-‘‘जी हाँ। वो देखिये सर। उस विशालकाय स्‍क्रीन पर। जिसे आप मच्‍छर समझ रहे हैं। वो हमारा मास्‍करोबोट है। इसने आपके शरीर का एक्‍सरे कर सारी सूचनाएं हमारे कम्‍प्‍यूटर को दे दी है। आपके पास दो रूमाल, घर की तीन चाबियों से जुड़ा एक गुच्‍छा। पर्स में तीन हजार पॉच सो तीस रूपये, आपका स्‍कूल का पहचान पत्र, पैन कार्ड, एक बेल्‍ट और दो पेन हैं। गले में हाँलमार्कयुक्‍त तीस ग्राम सोने की चेन है। ये देखिए। आपके शरीर के भीतर सुबह किया हुआ नाश्‍ता जिसमें चाय और ब्रेड थी। इसकी जानकारी तक इस मास्‍करोबोट ने हमें दे दी है। इसने ये भी बता दिया कि पिछले 24 घंटे में आप 5 घंटे 45 मिनट और 51 सेकण्‍ड की ही निद्रा ले पाए हैं। अभी आप प्रसन्‍न मुद्रा में हैं। दो घंटे पहले आप मेरे प्रति बेहद चिंतित थे। ये सब सूचनाएं उसी मास्‍करोबोट ने हमें उपलब्‍ध करायी है, जो आपकी कलाई पर जा बैठा था। दिलचस्‍प बात ये है कि से सामान्‍य मच्‍छर से पॉच सो गुना फुर्तीला है। हम आपके बारे में और अधिक जानकारी इस मास्‍करोबोट से ले सकते हैं।''

जलीस के चेहरे पर कभी आश्‍चर्य,कभी प्रसन्‍नता, तो कभी अति उत्‍साह के मिले-जुले भाव आ-जा रहे थे। सुजाता ने कहा-‘‘आइए सर। हमारी टीम ने ऐसे 100 मास्‍करोबोट तैयार कर लिए हैं। हर एक का अपना कोड है। ये सब मेरे एक ही निर्देश पर अनूठा काम करने को तत्‍पर हैं।''

जलीस बोले-‘‘मैं समझ गया। ये मच्‍छर से दिखने वाले रोबोट सौ शक्‍तिशाली मिसाइल की तरह काम करेंगे। है न?''

सुजाता मुस्‍कराई-‘‘बिल्‍कुल सर। आप जब हमें पढ़ाते थे, तो अक्‍सर जैव विविधता की सुरक्षा की बात करते थे। आप कहा करते थे कि इस धरती में एक-एक जीव का महत्‍व है। युद्ध और देश की सीमा सुरक्षा में की गई कार्यवाही में सैकड़ों जवान हताहत होते हैं। बमबारी से कई अनमोल संपदा नष्‍ट हो जाती है। लेकिन सर अब ऐसा नहीं होगा। कम से कम हमारा देश जैव विविधता को बचाये और बनाये रखने में महती भूमिका निभा सकेगा। निर्दोष जनता भी युद्ध की भयावह त्रासदी का हिस्‍सा नहीं बनेगी। ये मास्‍करोबोट अब हिंदुस्‍तान की सरजमीं पर कहीं भी लक्ष्‍य तक पहुंच सकते हैं। दुश्‍मन को पहचान कर कृत्रिम रूप से काटने भर से मौत की नींद सुला सकते हैं। या गहरी नींद में सुला सकते हैं। ऐसी नींद जो फिर तभी खुलेगी, जब हम चाहेंगे। न कोई गोलाबारी, न कोई शोर-शराबा। हमने उच्‍च तकनीकी से समूचे भारत के भूभाग का मानचित्र भी विकसित कर लिया है। पलक झपकते ही ये कहीं भी जा सकते हैं। ये सेकण्‍ड के दसवें हिस्‍से के अंतराल पर वांछित सूचनाएं हमें उपलब्‍ध करा सकते हैं।''

जलीस ने बीच में ही कहा-‘‘एक मिनट। जरा मेरे स्‍कूल में तो भेजिए कुछ मास्‍करोबोट। मैं भी तो देखूं कि मेरे स्‍कूल में क्‍या हो रहा है।'' यह कहकर जलीस ने कागज पर स्‍कूल का पता लिखकर सुजाता को दे दिया। सुजाता की अंगुलियां कंप्‍यूटर के की-बोर्ड पर नाचने लगी। उसने कहा-‘‘एक मास्‍करोबोट ही काफी है।'' सुजाता ने टाइप किया, ‘प्राथमिक स्‍कूल नीतिरासा, जनपद देहरादून'। स्‍क्रीन पर तत्‍काल जलीस का स्‍कूल उभर आया।

सुजाता ने कहा-‘‘ये लीजिए सर। अब आप एक-एक कक्षा में हो रही गतिविधियां देख सकते हैं। मास्‍करोबोट ने वहां पहुंचकर आपको सीधा प्रसारण दिखाना शुरू कर दिया है। लेकिन हमारा मास्‍करोबोट सिर्फ इतना करने के लिए नहीं बना है। ये आपको बता सकेगा कि आपके स्‍कूल के शिक्षक इस समय बच्‍चों को जो कुछ भी पढ़ा रहे हैं उसका बच्‍चों के मन-मस्‍तिष्‍क में क्‍या असर पड़ रहा है। वह ये संकेत भी देगा कि एक-एक बच्‍चा इस समय क्‍या सोच रहा है। हमें यह भी पता चल जाएगा कि बच्‍चों के बैग में कौन-कौन सी किताबें हैं। उनकी कॉपियों में क्‍या-क्‍या लिखा गया है?''

सुजाता की अंगुलिया की-बोर्ड से कुछ संकेत टाइप कर रही थी और मास्‍कोरोबोट उनका पालन कर रहा था। कुछ ही समय में मास्‍कोरोबोट ने समूचे स्‍कूल की रिपोर्ट कंप्‍यूटर में भेजनी शुरू कर दी। जलीस अहमद उन रिपोर्टों को पढ़कर कभी हैरान हो रहे थे तो कभी हौले से मुस्‍करा देते।

सुजाता का उत्‍साह देखते ही बनता था। वह बोली-‘‘सर। माफ कीजिएगा। यदि आप कहें तो एक क्‍लिक से आपके स्‍कूल के 188 बच्‍चे और 7 लोगों का विद्यालयी स्‍टॉफ तब तक सोता रहेगा, जब तक मास्‍करोबोट नहीं चाहेगा। यही नहीं ये मास्‍करोबोट किसी भी व्‍यक्‍ति को स्‍कूल के भीतर आने से पहले ही अचेत कर देगा। यदि आप चाहें तो सिर्फ चालीस सेकंड के लिए सभी कक्षाओं के बच्‍चों को सुला दिया जाए?''

जलीस ने जोर से ठहाका लगाया। कुछ देर सोचा और कहा-‘‘ठीक है। अनुमति है। पर जरा सावधानी से।'' सुजाता ने की बोर्ड पर 40 सेकंड टाईप किया। वहीं पलक झपकते ही सारे बच्‍चे और स्‍कूल स्‍टाफ ने पलकें मूंद लीं। ठीक चालीस सेकंड बाद वे स्‍वतः ही जाग गए। उन्‍हें आभास तक न हुआ कि वे चालीस सेकंड के लिए निद्रा भी ले चुके हैं। जलीस अहमद आगे बढ़े और सुजाता के सर पर हाथ रखकर बोले-‘‘शाबास बेटी। ये तो ऐतिहासिक और अकल्‍पनीय आविष्‍कार है। विज्ञान प्रगति की अचूक और बेमिसाल तकनीक। हमारी सरहद तक तो ठीक है। लेकिन विश्‍व स्‍तर पर भी क्‍या ये मास्‍करोबोट.....?''

सुजाता ने लंबी सांस लेते हुए कहा-‘‘तभी तो आपको याद किया है मैंने सर। अभी आपने देखा न। आपके स्‍कूल के बच्‍चों को मैंने पल भर के लिए सुला दिया। मैं चाहूं तो हिंदुस्‍तान के किसी भी संस्‍थान, गांव, शहर को लक्ष्‍य बनाकर वहां के जीवित मनुष्‍यों को सुला सकती हूं। उन्‍हें मार भी सकती हूं। ये सौ मास्‍करोबोट एक क्षण में सौ शहरों की पांच कि.मी. में रहने वाली समूची मानव आबादी को हमेशा के लिए सुला सकते हैं। विज्ञान चमत्‍कार भी है तो अभिशाप भी। मैं और मेरी टीम के 11 साथियों ने अथक मेहनत कर इन्‍हें विकसित किया है। संस्‍थान का करोड़ों रुपया इस तकनीक को विकसित करने में लग चुका है। अब देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ये अचूक रोबोट तैयार हैं। सौ से एक हजार मास्‍करोबोट बनाने के लिए सरकार की अनुमति और विश्‍वास भी तो चाहिए। गांधी जयंती पर मुझे ये तकनीक देश को समर्पित करनी है। आपकी सहमति चाहिए और आशीर्वाद भी।''

जलीस अहमद चौंक उठे। कहने लगे-‘‘तुम आशंकित क्‍यों हो? हमारे देश का एक-एक नागरिक देश हित में जान देने को तैयार है। हमारी सरकारें देश की अस्‍मिता और अखण्‍डता के लिए तुम्‍हें भरपूर सहयोग करेगी। रही बात इसके दुरुपयोग की तो। ऐसी नादानी किसी भी देश का नेतृत्‍व नहीं कर सकता। हिरोशिमा और नागासाकी का उदाहरण हमारे सामने है। तुम चिंता मत करो। ये बताओ कि विश्‍व स्‍तर पर इन मास्‍करोबोट के लिए क्‍या-क्‍या चुनौतियां हैं?''

सुजाता गंभीर हो गई। कहने लगी-‘‘एशियाई मित्र देशों के ई-नक्‍श्‍ो तो हम तैयार कर चुके हैं। बस परीक्षण बाकी है। समूचे विश्‍व के ई-नक्‍शों को एकत्र करने से अच्‍छा होगा कि हम उन देशों की सरहदों को रेखांकित करें जिनसे भविष्‍य में टकराव की संभावना है। इसके लिए विदेश विभाग के सहयोग की आवश्‍यकता है। दूसरा ये मास्‍करोबोट अभी लक्ष्‍य क्षेत्र के पांच किलोमीटर की परिधि में ही काम कर पाएंगे। इनकी शक्‍ति बढ़ाने के लिए हमें अति नेनो तकनीक और नेनो सुपर कंप्‍यूटरों की आवश्‍यकता है। इस संदर्भ में सरकार के साथ मध्‍यस्‍थता के लिए आपसे अधिक विश्‍वस्‍त मेरे लिए कौन हो सकता है। तीसरा भारत के कोने-कोने में सौ नकली मानवों पर मास्‍करोबोट का परीक्षण किया जाना है। ताकि हम दावे के साथ कह सके कि हम असंदिग्‍ध और पहचाने जा चुके शत्रु को अपने देश में कहीं भी ढेर कर सकते हैं।''

जलीस एकदम बोल पड़े-‘‘ये सब तुम मुझ पर छोड़ दो। जहां तक मैं समझ पाया हूं तो ये तकनीक हमारे देश के लिए बेहद काम की है। कितने लोग जानते हैं कि परमाणु बम के विस्‍फोट के प्रभाव से नागासाकी में 9 अगस्‍त 1945 से सन्‌ 2010 तक डेढ़ लाख से अधिक इंसान मर चुके हैं। हिरोशिमा में लगभग दो लाख सत्‍तर हजार लोगों की मौत हो चुकी है। यह सामान्‍य बात नहीं है। सामान्‍य बम हो या परमाणु बम। उनके विस्‍फोट से जो ऊर्जा निकलती है, वो बेहद विनाशकारी होती है। हम सभी जानते हैं कि विस्‍फोट के साथ रेडियोधर्मी विकिरण बड़े पैमाने में निकलता है। मानव शरीर के लिए ये बहुत हानिकारक होता है। हिरोशिमा में परमाणु बम गिरने के बाद तीन सेकंड तक वहां का तापमान लगभग चार हजार डिग्री सेल्‍सियस तक रहा। लोहा डेढ़ हजार सेल्‍सियस पर गलता है। परमाणु बम के विस्‍फोट स्‍थल से कई किलोमीटर दूर तक बसे सैकड़ों लोगों पर भी रेडियोधर्मी विकिरण का दुष्‍प्रभाव पड़ा था, ये किसी से छिपा नहीं है। यह प्रभाव सालों तक बना रहता है। मानव शरीर की बात करें तो खून बनाने का तंत्र ही नहीं कोशिकाओं सहित कई अंगों का कार्य प्रभावित हो जाता है। परिणाम साल दर साल मौत है। मास्‍करोबोट सिर्फ और सिर्फ लक्ष्‍य जीवों पर केंद्रित रहेंगे। तुम्‍हें और तुम्‍हारी समूची टीम को बधाई।''

सुजाता की आंखों में चमक थी। वह कहने लगी,‘‘सर अभी काम अधूरा है। देश को बाह्‌य शक्‍तियों से भी तो बचाना विज्ञान का दायित्‍व है।‘‘

जलीस ने तत्‍काल जवाब दिया,‘‘हम सभी का दायित्‍व है सुजाता। तुम भी तो प्रयोगशाला में ही सारी उम्र गुजार सकती हो। फिर क्‍यों नई तकनीक विकसित करने में उलझी हो? मैं क्‍यों तुम्‍हारे आग्रह पर आ गया? आपकी टीम के सभी साथी क्‍यों इतने संवेदनशील हैं? ये दायित्‍व हर संवेदनशील प्राणी का है। अरे! हाँ। ये मास्‍करोबोट तो केवल मनुष्‍य को ही काटेंगे न। आखिर ये हैं तो मानवनिर्मित ही। तो फिर क्‍या इन्‍हें मनुष्‍य को पहचानने में धोखा नहीं हो सकेगा? क्‍या ये लक्ष्‍य से नहीं भटक सकते?'' जलीस अहमद ने पूछा।

सुजाता ने विनम्रता से कहा-‘‘आप से क्‍या छिपाना सर। आम तौर पर मनुष्‍य कहीं भी हो। उसके शरीर का तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्‍सियस होता है। हमने मास्‍करोबोट को 35 से 40 डिग्री पर नियंत्रित किया हुआ है। मानव के शरीर का तापमान उसके आसपास के हवा के तापमान से थोड़ा ज्‍यादा होता ही है। बस इसी अंतर को ये पहचान लेंगे और सीधे सांस लेने वाले प्राणी के पास चले जायेंगे। अब दूसरा सवाल यह हो सकता है कि ये प्राणी मनुष्‍य से इतर कोई और भी हो सकता है। हमने मानव के पसीने के घोल को कई श्रेणियों में विभाजित किया है। ये मानव के शरीर में आने वाले पसीने की गंध को पहचानते हुए ही उस तक पहुंचेगे। जैसा आपके साथ हुआ और अभी आपके स्‍कूल में भी। ये भी संभव है कि कोई मनुष्‍य ऐसे वस्‍त्रों और कवच से ढका हो, जहां मास्‍करोबोट पसीने या उसके शरीर के तापमान को न खोज पाए। इस स्‍थिति में हमने मानव श्‍वास की पहचान इन्‍हें कराई है। मानव कहीं भी रहेगा, श्‍वास तो लेगा ही। श्‍वास में नाइट्रोजन, ऑक्‍सीजन और कार्बनडाइऑक्‍साइड के मिश्रण को ये मास्‍करोबोट त्‍वरित पहचान लेता है, सो ये गलती कर ही नहीं सकता। हमने मानव गंध के न्‍यूनतम स्‍तर की पहचान की शक्‍ति अपने मास्‍करोबोट को दी है। कृत्रिम मानव में हमें कृत्रिम मानव सांस भरनी होगी, ताकि मास्‍करोबोट उन्‍हें बेध सके। एक परीक्षण असल मानव पर भी करना होगा, लेकिन वो परीक्षण तो सरहद के पार से निकट भविष्‍य में कभी होने वाले घोषित या अघोषित युद्ध के समय में ही हो सकेगा।''

जलीस अहमद ने स्‍नेह से सुजाता की ओर देखा-‘'गुड। बाकी मुझ पर छोड़ दो। गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में भी मेरे कई शिष्‍य हैं। वे कब काम आएंगे। देश की सुरक्षा के साथ-साथ मानव हित में ये तकनीक विश्‍व पटल पर हमारे देश को ओर सशक्‍त करेगी। सुजाता। तुम अपने काम पर जुटी रहो। मैं अभी से शेष काम मे लग जाता हूं। कल नहीं, आज नहीं मुझे अभी से तुम्‍हारे इस मिशन में हिस्‍सेदार बनना है। मैं सबसे पहले उच्‍च स्‍तर पर इसके परीक्षण की अनुमति की पूर्व तैयारी करता हूं। बेस्‍ट ऑफ लक।‘' यह कहकर जलीस तेजी से प्रयोगशाला से बाहर चले गए। सुजाता आदर भाव से उन्‍हें देखती रह गई। उसके सहयोगी फिर से काम पर जुट गए।

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-मनोहर चमोली ‘मनु'. राजकीय हाई स्‍कूल भितांईं, पौड़ी, पोस्‍ट बॉक्‍स-23. पौड़ी गढ़वाल. पिन-246001. मोबाइल-09412158688./09897439791.

आधुनिक- लिंग पुराण... ( डा श्याम गुप्त...)

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विश्व की सबसे श्रेष्ठ व उन्नत भारतीय शास्त्र-परम्परा में --- पुराण साहित्य में मूलतः अवतारवाद की प्रतिष्ठा हैं निर्गुण निरा का र की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना का प्रतिपादन इन ग्रंथों का मूल विषय है । उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि आखिर मनुष्य और इस सृष्टि का आधार - सौंदर्य तथा इसकी मानवीय अर्थवत्ता में कही - न - कहीं सद्गुणों की प्रतिष्ठा होना ही चाहिए । उसका मूल उद्देश्य सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है।

पौराणिक लिंग पुराण --- भारत में लिंग पूजा की परंपरा आदिकाल से ही है। पर लिंग-पूजा की परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं है , बल्कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आरंभ से ही इसका चलन यूनान में इस देवता को ' फल्लुस ' ( जिससे अन्ग्रेज़ी में फ़ैलस = शिश्न बना ) तथा रोम में ' प्रियेपस ' कहा जाता था । ' फल्लुस ' शब्द ( टाड का राजस्थान , खंड प्रथम , पृष्ठ 603) संस्कृत के ' फलेश ' शब्द का ही अपभ्रंश है , जिसका प्रयोग शीघ्र फल देने वाले ' शिव ' के लिए किया जाता है। मिस्र में ' ओसिरिस ' , चीन में ' हुवेड् हिफुह ' था। सीरिया तथा बेबीलोन में भी शिवलिंगों के होने का उल्लेख मिलता  है।

' लिंग ' का सामान्य अर्थ ' चिन्ह ' होता है। इस अर्थ में लिंग पूजन , शिव के चिन्ह या प्रतीक के रूप में होता है। सवाल उठता है कि लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है , अन्य देवताओं का क्यों नहीं ? कारण यह है कि शिव को आदि शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है , जिसकी कोई आकृति नहीं। इस रूप में शिव निराकार है। लिंग का अर्थ ओंकार ( ॐ ) बताया गया है.... "प्रणव तस्य लिंग ” उस ब्रह्म का चिन्ह प्रणव , ओंकार है .. .अतः ' लिंग ' का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय से नहीं अपितु उनके ' पहचान चिह्न ' से है , जो अज्ञात तत्त्व का परिचय देता है। यह पुराण प्रधान प्रकृति को ही लिंग रूप मानता है |  

प्रधानं प्रकृतिश्चैति यदाहुर्लिंगयुत्तमम्।

गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्द स्पर्शादिवर्जितम् ॥ ( लिंग पुराण 1/2/2)

अर्थात् प्रधान प्रकृति उत्तम लिंग कही गई है जो गन्ध , वर्ण , रस , शब्द और स्पर्श से तटस्थ या वर्जित है।

शिवलिंग की आकृति --- -भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मूल रूप में एक अंडाकार ज्योतिपुंज ( बिगबेन्ग का महापिन्ड - नीहारिका के स्वरुप की भांति - – विज्ञान ) के रूप में था। इसी ज्योतिपुंज को आदिशक्ति ( या शिव ) भी कहा जा सकता है , जो बाद में बिखरकर

अनेक ग्रहों और उपग्रहों में बदल गई।( विज्ञान के अनुसार - - समस्त सौरमंडल महा-नेब्यूला के

बिगबैंग द्वारा बिखरने से बना है | ) वैदिक विज्ञान -- ' एकोहम् बहुस्यामि ' का भी यही साकार रूप और प्रमाण है। इस स्थिति में मूल अंडाकार ज्योतिपुंज ( दीपक की लौ या अग्निशिखा भी अंडाकार रूप होती है अतः ज्योतिर्लिंग कहा गया ) का प्रतीक सहज रूप में वही आकृति बनती है , जिसकी हम लिंग रूप में पूजा करते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की आकृति निश्चित ही शिवलिंग की आकृति से मिलती - जुलती है इस तरह शिवलिंग का पूजन , वस्तुत : आदिशक्ति का और वर्तमान ब्रह्मांड का पूजन है ।

शिव के ' अर्द्धनारीश्वर ' स्वरूप से जिस मैथुनी - सृष्टि का जन्म हुआ, जो तत्व-विज्ञान के अर्थ में विश्व संतुलन व्यवस्था में ( जो हमें सर्वत्र दिखाई देती है ) -शिव तत्व के भी संतुलन हेतु योनि-तत्व की कल्पना की गयी जो बाद में भौतिक जगत में लिंग-योनि पूजा का आधार बनी | उसे ही जनसाधारण को समझाने के लिए लिंग और योनि के इस प्रतीक चिह्न को सृष्टि के प्रारम्भ में प्रचारित किया गया |

परन्तु इस आलेख में हम पौराणिक लिंग या लिंग पुराण नहीं अपितु लिंग की आधुनिक व्याख्या पर विस्तृत प्रकाश डालेंगे | जिसमें लिंग का तात्विक अर्थ --आत्मतत्व,आध्यात्मिक, जैविक, भौतिक व साहित्यक व भाषायी आधार पर व्याख्यायित किया जाएगा |

लिंग का मूल अर्थ किसी भी वास्तु..जीव ,जड़, जंगम ...भाव आदि का चिन्ह या पहचान होता है | जो लिन्ग पूजन का कारण-मूल है...

१- आध्यात्मिक-वैदिक आधार में -

  -- ब्र ह्म अलिंगी है| 

  ----उससे व्यक्त ईश्वर व माया भी अलिंगी हैं |

  ---जो ब्रह्मा , विष्णु, महेश व ...रमा, उमा, सावित्री ..के आविर्भाव के पश्चात ----विष्णु व रमा के संयोग से ....व विखंडन से असंख्य चिद्बीज अर्थात “एकोहं बहुस्याम” के अनुसार विश्वकण बने जो समस्त सृष्टि के मूल कण थे | यह सब संकल्प सृष्टि ( या अलिंगी-अमैथुनी ASEXUAL— विज्ञान ) सृष्टि थी | लिंग का कोइ अर्थ नहीं था |  

  -- प्रथमबार लिंग-भिन्नता ...रूद्र-महेश्वर के अर्ध नारीश्वर रूप की आविर्भाव से हुई,   

  ----जो स्त्री व पुरुष के भागों में भाव-रूप से विभाजित होकर प्रत्येक जड़, जंगम व जीव के चिद्बीज या विश्वकण में प्रविष्ट हुए | 

  ----मानव-सृष्टि में ब्रह्मा ने स्वयं को पुरुष व स्त्री रूप ----मनु-शतरूपा में विभाजित किया और लिंग –अर्थात पहचान की व्यवस्था स्थापित हुई | क्योंकि शम्भु -महेश्वर लिंगीय प्रथा के जनक हैं अतः –इसे माहेश्वरी प्रजा व लिंग के चिन्ह को शिव का प्रतीक लिंग माना गया |

२- जैविक-विज्ञान ( बायोलोजिकल ) आधार पर - ---सर्वप्रथम व्यक्त जीवन एक कोशीय बेक्टीरिया के रूप में आया जो अलिंगी ( एसेक्सुअल .. ) था ..समस्त जीवन का मूल आधार - ---> जो एक कोशीय प्राणी प्रोटोजोआ ( व बनस्पति—प्रोटो-फाइट्स--यूरोगायरा आदि ) बना| ये सब विखंडन (फिजन) से प्रजनन करते थे |

द्विलिंगी पुष्प

-----> बहुकोशीय जीव  ...हाईड्रा आदि हुए जो विखंडन –संयोग ,बडिंग, स्पोरुलेशन से प्रजनन करते थे |---. वाल्वाक्स आदि पहले कन्जूगेशन( युग्मन ) फिर विखंडन से असंख्य प्राणी उत्पन्न करते थे |  इस समय सेक्स –भिन्नता अर्थात लिंग –पहचान नहीं थी |

-----> पुनः द्विलिंगीय जीव( अर्धनारीश्वर –भाव ) ...केंचुआ, जोंक..या द्विलिंगी पुष्प वाले पौधे .. अदि के साथ लिंग-पहचान प्रारम्भ हुई | एक ही जीव में दोनों स्त्री-पुरुष लिंग होते थे |

------> तत्पश्चात एकलिंगी जीव ...उन्नत प्राणी ..व वनस्पति आये जो ..स्त्री-पुरुष अलग अलग होते हैं ... मानव तक जिसमें अति उन्नत भाव—प्रेम स्नेह, संवेदना आदि उत्पन्न हुए| तथा विशिष्ट लिंग पहचान आरम्भ हुई---यथा....

..स्त्री में पुरुष में

१-बाह्य पहचान----        -- योनि, भग               -- लिंग (शिश्न)

२-आतंरिक लिंग...         --अंडाशय, यूटरस           --वृषण (टेस्टिज)

३-बाह्य-उपांग ....         --स्तन                     --दाड़ी, मूंछ

४-आकारिकी(मोर्फोलोजी) ... --नरम व चिकनी त्वचा       --पंख, रंग , कलँगी ,सींग

५-भाव-लिंग ...           --धैर्य, माधुर्य, सौम्यता,       --कठोरता, प्रभुत्व ज़माना,  

नम्रता, मातृत्व की इच्छा       आक्रमण- क्षमता

--वनस्पति में –लिंग-पहचान---- पुष्पों का सुगंध, रंग, भडकीलापन...एकलिंगी-द्विलिंगी पुष्प ..पुरुषांग –स्टेमेन ..स्त्री अंग ...जायांग ...पराग-कण आदि|

- तत्व-भौतिकी आधार पर लिंग ... मूल कणों को विविध लिंग रूप में -----ऋणात्मक (नारी रूप) इलेक्ट्रोन ...धनात्मक ( पुरुष रूप ) पोजीत्रोन.. के आपस में क्रिया करने पर ही सृष्टि ...न्यूट्रोन..का निर्माण होता है| शक्ति रूप ऋणात्मक –इलेक्ट्रोन....मूल कण –प्रोटोन के चारों और चक्कर लगाता रहता है| रासायनिकी में ...लिंगानुसार ...ऋणात्मक आयन व धनात्मक आयन समस्त क्रियाओं के आधार होते हैं |

- आयुर्वेद में भी .... लिंग -- निदान ...अर्थात रोग की पहचान, डायग्नोसिस को..... (अर्थात पहचान )... कहते हैं |

- साहित्य व भाषाई जगत में.... लिंग .... कर्ता व क्रियाओं की पहचान को कहते हैं | प्रत्येक कर्ता या क्रिया ...स्त्रीलिंग, पुल्लिंग या नपुंसक लिंग होता है ।

६ -आत्म-तत्व की लिंग-व्यवस्था ....

आत्मा न नर है न नारी । वह एक दिव्य सत्ता भर है, समयानुसार, आवश्यकतानुसार वह तरह-तरह के रंग बिरंगे परिधान पहनती बदलती रहती है । यही लिंग व्यवस्था है । संस्कृत में 'आत्मा' शब्द नपुंसक लिंग है, इसका कारण यही है-आत्मा वस्तुतः लिंगातीत है । वह न स्त्री है, और न पुरुष ।

अब प्रश्न उठता है कि आत्मा जब न स्त्री है,और न पुरुष तो फिर स्त्री या पुरुष के रूप में जन्म लेने का आधार क्या है?

इस अन्तर का आधार जीव की स्वयं की अपने प्रति मान्यताएँ हैं । जीव चेतना भीतर से जैसी मान्यता दृड होजाती है वही अन्तःकरण में स्थिर होजाती है | । अन्तःकरण के मुख्य अंग -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में अहंकार वह अस्मिता-भाव है जिसके सहारे व्यक्ति सत्ता का समष्टि सत्ता से पार्थ्क्य टिका है । इसी अहं-भाव में जो मान्यताएँ अंकित-संचित हो जाती हैं वे ही व्यक्ति की विशेषताओं का आधार बनती हैं । आधुनिक मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अहंकार को अचेतन की अति गहन पर्त कह सकते हैं । इन विशेषताओं में लिंग-निर्धारण भी सम्मिलित है । जीवात्मा में जैसी इच्छा उमड़ेगी जैसी मान्यताएँ जड़ जमा लेंगी, वैसा जीवात्मा का वही लिंग बन जाता है|   

पुराणों में इस प्रकार के अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें व्यक्तियों ने अपने संकल्प बल एवं साधना उपक्रम के द्वारा लिंग परिवर्तन में सफलता प्राप्त की है--यथा ..शिखंडी..

निम्न प्राणी ऊस्टर.. जन्तुओं में अग्रणी हैं जो मादा की तरह अण्ड़े देने के बाद एक मास बाद ही नर बन जाते हैं और उभयपक्षीय लिंग में रहने वाली विभिन्नताओं का आनन्द लूटते हैं ।

अतः लिंग के आधार पर नर-नारी, कन्या-पुत्र का विभेद

क्यों ?-- यह सर्वथा अर्थहीन है...

----प्रत्येक मनुष्य के भीतर उभयलिंगों का अस्तित्व विद्यमान रहता है । नारी के भीतर एक नर सत्ता भी होती हैं, जिसे ऐनिमस कहते हैं । इसी प्रकार हर नर के भीतर नारी की सूक्ष्म सत्ता विद्यमान होती है, जिसे ऐनिमेसिस कहते हैं । प्रजनन अगों के गह्वर में विपरीत लिंग का अस्तित्व भी होता है । नारी के स्तन विकसित रहते हैं, परन्तु नर में भी उनका अस्तित्व होता है ।

अतः यह आवरण सामयिक है आत्मा का कोई लिंग नहीं होता । एक ही जीवात्मा अपने संस्कारों और इच्छा के अनुसार पुरुष या नारी, किसी भी रूप में वैसी ही कुशलता के जीवन जी सकता है । नर नारी के भेद, प्रवृत्तियों की प्रधानता के परिणामस्वरूप शरीर मन में हुए परिवर्तनों में भेंद हैं । उनमें से कोई भी रूप श्रेष्ठ या निष्कृष्ट नहीं, अपने व्यक्तित्व यानी गुण क्षमताओं और विशेषताओं के आधार पर ही कोई व्यक्ति उत्कृष्ट या निष्कृष्ट कहा जा सकता है,लिंग के आधार पर नहीं ।

------अतः कन्या-भ्रूण ह्त्या पूर्णतः अतात्विक, अतार्किक, 

अवैज्ञानिक, अधार्मिक व असामाजिक, अमानवीय कर्म है एवं

राष्ट्रीय अपराध  |

--

(चित्र - साभार गूगल)

डॉ. श्याम गुप्त

drgupta04@gmail.com

रचनाकार पर पोस्ट करने हेतु भेजने के लिए प्राप्त पुराने पत्रों को उलटते-पलटते हुए न केवल असंख्य पुरानी यादें ताज़ा हो गईं अपितु समय के साथ कितना कुछ बदल गया है इसका भी शिद्दत के साथ अहसास हुआ। हर पत्र बीती हुई घटनाओं का सबूत तथा इतिहास का दस्तावेज़ बनने के साथ-साथ पुनर्मूल्यांकन तथा नई गवेषणा अथवा अनुसंधान के लिए भी पर्याप्त आधार प्रस्तुत करने में सहायक बनता है। कभी-कभी हम जिस तथ्य को सामान्य समझने की भूल कर बैठते हैं वह विशिष्ट ही नहीं अति विशिष्ट होता है।

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विष्णु प्रभाकरजी के इस पत्र को ही लीजिए। दिनाँक 22:04:1986 को लिखे इस पत्र में विष्णु प्रभाकरजी लिखते हैं, ‘‘ भाई में कवि नहीं हूँ, इसलिए अपनी कोई कविता भेजना संभव नहीं होगा।’’ संयोग से कल ही (दिनाँक 28:05:2012 को) ‘‘आजकल’’ हिन्दी मासिक का जून 2012 अंक मिला। यह एक विशेषांक है जो विष्णु प्रभाकरजी पर ही केंद्रित है। विष्णु प्रभाकरजी का जन्म 21 जून सन् 1912 को हुआ था अतः ये उनका शताब्दी वर्ष है। ‘‘आजकल’’ हिन्दी मासिक के प्रस्तुत अंक में विशेष रूप से विष्णु प्रभाकरजी के कृतित्व तथा उनकी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है। उनकी कोई गद्य रचना इसमें सम्मिलित नहीं है लेकिन कुछ कविताएँ अवश्य दी गई हैं।

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इससे पहले मैंने भी उनकी कोई काव्य रचना नहीं देखी और विष्णु प्रभाकरजी ने उपरोक्त पत्र में स्वयं स्वीकार किया है कि वे कवि नहीं हैं अतः इस विषय में मेरी जिज्ञासा बढ़ना स्वाभाविक है। वर्ष 2002 में ‘‘आजकल’’ हिन्दी मासिक में ही उनकी एक कहानी ‘‘ईश्वर का चेहरा’’ पढ़कर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी थी और उसके उत्तर में विष्णु प्रभाकरजी ने ऐसी ही कहानियों का संग्रह भेजने की पेशकश भी की थी। फिर पहले पत्र में विष्णु प्रभाकरजी ने ऐसा क्यों कहा कि वो कवि नहीं हैं। उन्होंने हमेशा मेरे हर पत्र का उत्तर दिया, कहानियों का संग्रह भेजने की पेशकश की लेकिन कविता क्यों नहीं भेजी?

विष्णु प्रभाकरजी एक अत्यंत प्रतिष्ठित गद्यकार हैं इसमें संदेह नहीं। कभी-कभार कविता लिखने का मन हो गया तो कविता भी लिख डाली लेकिन संभव है इसके बावजूद विष्णु प्रभाकरजी ने स्वयं को कवि मानने में संकोच अनुभव किया हो। इसे उनकी अतिशय विनम्रता ही कहा जा सकता है और कुछ नहीं।

विनम्र लेखक ही नहीं एक महान योद्धा भी थे विष्णु प्रभाकरजी

मैं विष्णु प्रभाकरजी एक विनम्र गाँधीवादी लेखक ही नहीं एक महान योद्धा भी मानता हूँ। विष्णु प्रभाकरजी का शुमार क्रांतिकारी अथवा प्रगतिशील लेखकों में भी नहीं होता और न ही उन्होंने कभी कोई झंडा विशेष ही उठाया अथवा किसी आंदोलन का ही नेतृत्व किया। कुछ लोग तो उन्हें लेखक मानने को भी तैयार नहीं हुए फिर कैसे महान योद्धा हुए विष्णु प्रभाकरजी?

विष्णु प्रभाकरजी का लेखन सदैव मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित रहा इसमें संदेह नहीं। उनके जीवन और लेखन दोनों में अत्यंत सादगी रही और यही सादगी उन्हें विशिष्ट बना देती है। लेकिन इससे कोई व्यक्ति महान योद्धाओं की श्रेणी में कैसे आ सकता है? विष्णु प्रभाकर एक ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने आम आदमी की पीड़ा को पहचानकर सही रास्ता सुझाया। जीवनपर्यंत लोगों की मदद भी करते ही रहे। जितनी सादगी से जिये उतनी ही सादगी से चुपचाप चले भी गए लेकिन जाने से पहले वो काम कर गए जो बड़े-बड़े योद्धाओं के लिए भी असंभव है।

मृत्यु के बाद भी हमें अपने शरीर से बेहद लगाव होता है। कई लोग तो जीते जी अपना श्राद्ध करने तथा अपनी मूर्तियाँ स्थापित करवाने से भी परहेज़ नहीं करते। पाश्चात्य देशें में अनेक लोग मृत्यु से पहले ही अपने कफ़न-दफ़न का चुनाव कर लेते हैं। अपनी देख-रेख में महँगी से महँगी डिज़ायनर शव-पेटिका बनवाकर रख लेते हैं। मृत्यु के बाद कुछ लोग शव का दाह-संस्कार करते हैं (जलाते हैं) तो कुछ उसे सुपुर्दे-ख़ाक कर देते हैं (ज़मीन में गाड़ते हैं) लेकिन पारसी लोग मृत शरीर को किसी ऐसे ऊँचे स्थान पर रख देते हैं जहाँ दूसरे जीव-जंतु उसे खाकर अपनी भूख मिटा सकें।

मरने के बाद भी हमारा शारीर दूसरों के काम आ सके हमारे यहाँ तो यह भी कम क्रांतिकारी विचार नहीं और इस प्रकार का निर्णय कोई बहादुर व्यक्ति ही ले सकता है। आज हमारे देश में न जाने कितने लोग दृष्टिदोष के कारण देख नहीं पाते। किसी के गुर्दे खराब हैं तो किसी के फेफड़े। अनेक लोग अस्थिदोषों से पीड़ित हैं। यदि हम मरने के बाद अपनी आँखों को दान में दे सकें तो असंख्य लोग जो देख नहीं पाते इस सुंदर संसार को देखने में सक्षम हो सकें, बिना किसी के सहारे के सामान्य जीवन जी सकें।

विष्णु प्रभाकर की शवयात्र नहीं निकली, अंत्येष्टि पर साहित्यकारों की भीड़ जमा नहीं हुई क्योंकि उन्होंने अपना पूरा शरीर ही दान करने की घोषणा कर दी थी ताकि उनके पार्थिव शरीर से दूसरों को जीवनदान मिल सके। विष्णु प्रभाकर का आदर्श काल्पनिक आदर्श नहीं था। मन, वचन और कर्म तीनों से ही वे आदर्शवादी थे इसीलिए जाते-जाते जीवन के आदर्श को यथार्थ में बदल गए। उनका देहदान करने का संकल्प एक बार फिर हमें दधीचि ऋषि की याद दिला देता है। उन्होंने जाते-जाते जीवन के जो अक्षर लिखे वही अक्षर जीवन का वास्तविक संदेश हैं तथा उन्हें महान योद्धा बनाने के लिए पर्याप्त भी।

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सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

फोन नं. 011-27313679/9555622323

Email: srgupta54@yahoo.co.in

परिश्रम कौ फल
                              बचपना बाकी बचो है अब भी  अपने पास में
                             कोई शायद फिर थमा दे झुनझुना,इस आस में
                             एक लोरी फिर सुना मां या सुना किस्सा कोई
                             जिंदगी प्यासी अभी तक सीखने की प्यास में।
               जे पंक्तियाँ हमईरी लिखीं आंयें और जब जब भी अम्मा की खबर आउत सो इनईं खों पढ़कें जी हल्को कर लेत। एक शायर सुदर्शन फाकिर साहब ने का खूब कई है बचपन के बारे में के "ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की किश्ती वो बारिश का पानी" फाकिर साहब की ई गज़ल खों लोग बाग जगजीत सींग की गज़ल केत हैं काये सें उनने जा गज़ल बड़े सुंदर ढंग सें गाकें खूब शोहरत बटोरी। सब कछू चलो जाये और बचपनों फिर मिल जाये तो का केने।पे ऐसो होत नईंयाँ। बचपन के बे दिना भूलत नईंयाँ जब दूसरों के बगीचा सें आम चुराउत पकड़े जातते और बागवान के हातन  पिटत हते। अंडा डावरी ,अब्बक दब्बक दांय दीन,अटकन चटकन दही चटाकन और पिट्टू की खबर आउत सों आंखन में खुसी के अंसुआ आ जात । मोखों तो लगत है के बुंदेल की भूमि पे तो देवता लो बच्चा बनकें बच्चों में मिलकें खेल जात हों और कौनौउं खों पता तक ने लग पाउत हो। ऐसई हमें अपनी अम्मा की खरर‌ आ जात ।कित्ती कहानी किस्सा सुनाउत तीं ,समय के संगे सब बिसरतजा रईं।अम्मा के संगे सबरे भैया  बेन पर रेत ते "अम्मा एक किस्सा सुनाओ " सबरे उनके पीछें पर जातते ।एक किस्सा, दूसरी किस्सा , तीसरी किस्सा चौथी किस्सा.....कबौउं खतम ने होत तीं जब तक हम ओरें सो ने न जाबें।पहले तो मुतकॆ भैया बेन रेतते चार पांच तो कम सें कम हर घर में होत ते।कहूं कहूं तो दस बारह तक। अब तो बड़ी मुश्किल सें एकाधई किस्सा याद आ पा रई।पुरानी धरोहरें आंयें सो इनखों सहेज कें धरबो जरूरीहैंसो जा किस्सा दिमाग पे ज़ोर डारकें याद कर पाये और फिर लिख रये है।
                 एक गांव में एक डुकरिया रेत ती,रोज को चार टिक्कड़ सेंक लेतती और नोन मिरचा कें संगे खा लेत ती।  एक दिना चूले में गीलीं लकड़ियां लगायें बा चूलो फूंक रईती, खूब धुआँ हो रओ तो सो ओई घर में रेबे बारी एक चुखरिया दम घुटबे सें अपने बिल में सें बायरे निकर आई और केन लगी काये डुक्को माता काय इत्तॊ धुआं कर रईं हम तो दम घुटबे सें मरई जेहें।डुक्कॊ केन लगीं हम का करें लकडियां गीलीं हैं सो आय धुआँ हो रओ। चुखरिया गई और अपने बिल में सें सूखीं लकडियां उठा ले आई"जे लिओ बौ चूले में लगा लो और रोटी बना लो। "डुक्को ने चूलो जलाओ और रोटो बना लई। अब काहे ,चुक्खो रानी ई रोटी पे कूंदें कबऊं ऊ रोटी पे कूंदें। डुक्को केन लगीं अब तुम जो काये करतीं काये कूंद‌ कूंद के हमाईं रोटीं खराब कर रईं। चुक्खो केन लगीं....
                                  "अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                   बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                   लकड़ी मैंने तोय दीनी
                                   का तें मोय एक रोटी न देहे।"

डुक्को ने ऊखों एक रोटी दे दई।चुक्खो बाई रोटी लेकें आगे खों बड़ीं सो  आगे उनें एक कुम्हार मिल गओ ।ऊको  मौड़ा बड़ी जोर जोर सें रो रओ तो। चुक्खो ने कई" काये भैया काय मोड़ा खों रोआ रये। "कुम्हार केन लगो के मोड़ा खों भूंख लगी है और ईकी मताई अबे लो रोटो नईं ले आई।"
"ईमें का बड़ी बात जा ले लो रोटो और मौड़ाये खुआ दो।" कुम्हार ने रोटी लेकें मौड़ा खों खुआ दई।मौड़ा चुप हो गओ।अब चुक्खो रानी कुम्हार के मटकन पे कूंदन लगीं कबऊँ ई मटका पे कूंदें कबऊं ऊ मटका पे कूंदें। कुम्हार ने कई जो काय कर रईं काय हमायॆ मटका खराब कर रईं। चुखरिया केन लगी
                                "  अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                  बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                   लकड़ी मैंने डुक्को दीनी
                                   डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                   रोटी मैंनें तोय दीनी      
                                    तें का मोय मटका ने देहे।"

  कुम्हार ने ऊखों एक मटका दे दओ। अब काहे चुक्खो रानी मटका लेकें आगे बड़ीं। रस्ता में ऊखों एक अहीर मिल गओ।मूड़ पे हाथ धरे बैठो तो बाजू में भैंसें बधीं थीं।चुखरिया केन लगी..
  "काये दद्दा काये मूड़ पकरें बैठे का भैंसें नईं लगाउने। "
    " का बतायें तोखों मोरे लिंगां ने मटका आये ने बाल्टी आये काय में दूध लगायें।"
    "जो लेलो मटका,काये परेसान होत ईमें लगाओ दूध और बेंच आओ।" चुखरिया ने ऊखों मटका दे दओ   ।
    जब अहीर ने भैंसें लगा लईं सो चुक्खो बाई भैंसन पे कूंदन लगीं कबऊं ई भैंस पे कूदें कबऊं ऊ भैंस पे कूंदें।
    "काये अब तुम काये खों ऊधम कर‌ रईं हमाई भैंसों पे काये कूंद रईं  ।" अहीर नेऊखों रोकबो चाहो।
                                 अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने तोय दीनों
                                 तें का एक भैंस‌ ने देहे।

      अहीर ने ऊखों  एक भैंस दे दई ।अब चुखरी बाई आगे बढ़ीं कछू दूर चलीं सो राजमहल दिखान लगो। राजा बायरेई बैठो मिल गओ।
चुखरिया ने "काये राजा साब  बाहर कायखों बैठे भीतरे रानी कि लिंगां जाकें आराम करो।"
  "आराम कैसें करें हमाओ दूधबारो नाईं आओ हमें दूध रोटी खाने।" राजा  ने जबाब‌ दओ।
  "अरे तो कायखों घबड़ात हमाई जा भैंस लेलो और दूध लगालो और मजे सें रोटी खालो।" ऐसी केकें ऊनें भैंस राजा खों दे दई।
   राजा भीतर गये , दूध निकरवाओ और रोटी खान लगे। अब काहे चुखरिया तो चकरिया बन  गई बा रानियों पे कूंदन लगी कहूं ई रानी पे
   कूंदे कहूं ऊ रानी पे कूंदे।राजा की तो मुतकी रानी हतीं। राजा ने  कई "जो तुम का तमासो कर रईं।काये हमाई रानियन खों परेसान कर रईं?
  चुखरिया केन लगी अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने  अहीर दीनों
                                 अहीर मोय भैंस दीनी
                                   भैंस मैंने तोये दीनी
                                 तें का  एक रानी ने देहे।

  राजा ने ऊखों एक रानी दे दई। रानी खों लेकें बा आगे बढी सो एक ढपला बारो मिल गऒ निठल्लो बैठो हतो सो चुहिया  बोलीकाये रे निठल्लो काये बैठो, काम काये नईं करत।"
हमाई‍ तो आज काम बारी नईं  आई, काम को करत।"
  "तुमा ई बे कां हैं?"
  "बे कौन?,हमाओ तो ब्याओ  लो नईं भओ।"
"अरे तो जा रानी ले लो एईसें काम करवाओ।" ढपला वारे ने रानी ले लई और ऊसें काम करवाऊन लगो।
अब चुक्खो ई ढपला पे कूंदें ऊ ढपला पे कूंदे।
  "जो काय‌ कर ऱैईं? कायखों दोंदरा दयें,अब जाओ"
  चुक्खो केन लगीं     अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने  अहीर दीनों
                                 अहीर मोय भैंस दीनी
                                   भैंस मैंने  राजा दीनी
                                   राजा की रानी मैंने लीनी
                                   रानी मैंनें तोखों दीनी
                                  का मोखों ढपला ने देहे

       ऊसें ढपला लेकें बा बजाऊत भई आगे चली।रात हो गई ती सो बा चुहिया एक पेड़ पे जाकें आराम करन लगी। रातखों दोक बजे पेड़ के नेंचें दो चोर आये और चोरी के माल को बटवारो करन लगे। चुहिया ने जोर सें ढपला बजाबो चालू कर दऒ।चोर डरा गये जो का हो रऒ का भूत हैं इते कऊँ  गाज तो नईं गिरी पर रही।सबरो लूट को माल छोड़कें बे भग गये। चुक्खो बाई आराम सें पेड़ सें उतरीं सबरो सामान सोनो चांदी उठाकें अपने बिल में ले गईं और आराम सें रेन लगीं । अब उनके पास कछु कमी नईया,ठाठ से रे रईं।
     कथा को सार जो भओ के महनत करो और सबकी मदद करो  सो फल सोई मिलत जैसो ऊ तनक सी चुखरिया खो मिलो।

कथा-समाचार -कथा की

वे तीन थे। अलग अलग जगहों पर काम करते थे। एक एक अखबार में था। दूसरा एक स्‍थानीय चेनल में था और तीसरा कला-साहित्‍य-संस्‍कृति का स्‍थायी समीक्षक और अस्‍थायी लेखक था। सवेरे से वे तीनों ताजा समाचार, या बासी बाइट की तलाश में घूम रहे थे। उन्‍हें बेहद गुस्‍सा आ रहा था। इस सड़ियल शहर पर जहां पर अखबार या चैनल का पेट भरने के लिए एक शानदार ना सही कमजोर सी समाचार कथा भी नहीं मिल रही थी।

तीनों हैरान-परेशान थे। समाचार, सम्‍पादक या चैनल रुपी दैत्‍य का पेट भरने के लिए वे भटक रहे थे, अन्‍त में तीनो इस नतीजे पर पहुँचे कि सर्व प्रथम चैनल पर एक देह धर्मिता की वाइट दिखाई जाये फिर उस बाइट पर समीक्षक को विशेषज्ञ के रुप में दिखाया जाये और अन्‍त में चल कर संवाददाता इस पूरे प्रकरण पर एक सचित्र समाचार लगा देगा। देह-धर्मिता से चर्चा-धर्मिता और अन्‍त में रचना-धर्मिता का ऐसा घाल-माल हो जायेगा कि पाठक या दर्शक सब वाह वाह या आह आह कह उठेगा। योजना-अनुसार वे फिर बाइट की तलाश में सड़कों पर भटकने लगे। आखिर बाइट मिली। और कार्यवाही शुरु हुई। कैमरा मेन ने शाट लिया। और चल पड़े। इस पूरे मामले में एक गड़बड़ हो गई। जिस बाइट को दिखा या जा रहा था उसकी हिरोईन ने देह धर्मिता के बजाय चर्चा धर्मिता का राग अलापना शुरु कर दिया। बोल पड़ी-समाचारों के इस अकाल में देह की मण्‍डी क्‍यों लगाते हो ?

विशेपज्ञ महोदय जो मामले को पिकासो और एम․एफ․ हुसैन तक खींचना चाहते थे, चुप्‍पी साध गये। मगर एक चैनल से निकला ये शगूफा कई चैनलों की चार दिवारी से टकरा गया। संवाददाता के सचित्र समाचारों पर महिला संगठनों, नारी वादियों और विमेन-लिब वालों ने धमाल मचा दी ।

चैनल पीछे रह गये चरित्र आगे आ गया। महिला आयोगो ने भी आग में घी डाला और चरित्र की चटनी अचार, सॉस आदि बनाने में मशगूल हो गये।

चैनल-समाचार पत्र-संवाददाता सब व्‍यस्‍त हो गये। वे बार बार रचना धर्मिता के नाम पर देह धर्मिता परोसने में लग गये। चर्चा-धर्मिता का निर्वहन अपने आप में हो रहा था। चर्चा, देह, रचना के इस चक्रव्‍यूह में चैनल रुपी दैव्‍य का पेट भी भर रहा था। तीनों खुश थे कि चलो अब कुछ समय के लिए सब ठीक ठाक रहेगा। वे फिर श्‍शामको इकठ्‌ठा हुए, आचमन के पश्‍चात किसी नई स्‍टोरी की तलाश में भटकने लगे। समाचार -कथा की तलाश कभी खतम नहीं होती।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

म․उंपस प्‍क्‍ ․ लाावजींतप3/हउंपसण्‍बवउ

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डॉ. मंजरी शुक्ल

उ.प्र.

बहुत बचपना था उसमें मानो ओस की बूंद शरमाकर मिटटी की सोंधी खुशबू लेने के लिए गीली धरती पर चुपके से मोती बन गिरी और आसमान में उमड़ते हुए बादल उसे देखकर पकड़ने के लिए घुमड़ता हुआ चला आये। पर इन सब बातों से बेखबर वो अपनी इक छोटी सी दुनिया में मस्त रहती जहाँ पर एक दियासलाई और उसकी एकमात्र पुरानी लालटेन वक्त के अँधेरे को दूर करने के अथक प्रयास में लगे रहते पर कभी कामयाब न हो पाते। ज्योति हाँ, यहाँ नाम तो था उसका जीवन की अंधियारों में भटकने के लिए नाम के अनुरूप और कुछ न था उसके पास।

जब पहली बार उसे देखा तो वह शायद अपनी माँ के साथ स्कूल जा रही थी , पर कहते है उसकी माँ की एक चट्टान से गिरकर मौत हो गई थीं। माँ के मरने के बाद मानो उसके सारे सपने और आकंशायें भी मरने चली गई और इस भरी दुनिया में वह अकेली रह गई। बहुत दिनों से सब देख रहे थे कि वह दिन भर उन के गोले बनाती रहती। उजली सुबह के साथ जब वह गुलाबी उन का गोला अपनी नाजुक पतली उँगलियों में लपेटती तो सामने से गुजरने वाले व्यस्त राहगीर भी एक बार रुक कर उन जादुई हाथों को मन ही मन जरूर सलाम करते और कम से कम एक स्वेटर खरीदने का अपने आप से वादा करते। पर उसे तो जैसे इस दुनिया से कोई सरोकार ही नहीं था। वह तो बस अपने आप में खोई रहती। कभी पेड़ से निकलकर जब कोई नन्ही गिलहरी उसके धागे से लिपट जाती तो बच्चों सी निश्छल मुस्कान लिए वह सावधानी से उन हटा लेती और उसे दूर तक जाते देखती।

पर दिन बीतने के साथ ही लोगों की आँखों में कौतूहल साफ नजर आने लगा। अब उन के गोले का आकार तो घटता जा रहा था पर उसके पेट का उभरा हुआ गोला साफ़ नजर आ रहा था। तमाम बातें होने लगी केवल बातें ही बातें। जैसे जुबान मुहँ में न होकर सारे शरीर ,आत्मा और ब्रह्माण्ड में लग गई हों। केवल तालू से चिपकी जबान तो एक ही की थी जो अपनी हिरनी जैसी आँखों से चुपचाप ताका करती और खामोश सर्द रात जैसी अँधेरे में गुम हो जाती। पर उसकी इस ख़ामोशी को देखकर कोई चुप न हुआ उनका बस चलता तो परिंदों से यह संदेशा दूर सदूर के देशों और प्रान्तों में भिजवा देते कि किस तरह एक कुंवारी लड़की माँ बनने जा रही हैं।

सारे पाप नगण्य हो चले थे। चोरी ,हत्या जालसाज़ी और मारपीट को चरित्र का संवैधानिक हक़ मान लिया गया था जिसे कोई भी वक्त जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकता था। पर यह तो ऐसा अक्षम्य अपराध था जिसके लिए अगर मंदिरों में आठों प्रहर प्राथनाएं की जाती तो भी उसका एक अंश भी कम न होता। आखिर जब सब्र का प्याला टूट गया तो सब उसके घर जा पहुंचे। वह टूटी चारपाई के पास बेबस सी जमीं पर पड़ी हुई थी।

चेहरे पर एक अजीब सी मुर्दनी छाई हुई थी। आँखों के नीचे काले स्याह घेरे ऐसे लग रहे थे मानो कोई काजल पोतकर गया हो। होंठ जैसे पपड़ी हो रहे थे। इस भीड़ में तमाम लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कभी उन सुर्ख गुलाब से रसीले होठों की कल्पना में ना जाने कितने कागज काले कर दिए थे। पर आज उन्हें यह एहसास हो रहा था कि व्यर्थ ही इतना अमूल्य समय उन्होंने यूँ ही गंवा दिया। अगर रत्ती भर भी पता होता तो कभी ऐसा बेवकूफी भरा काम न करते। मन ही मन उन्होंने भगवान से माफ़ी मांगी और अपनी आँखें दूसरी और खड़ी एक सुन्दर युवती पर गड़ा दी। कुछ औरतों को दया आई पर अपने पतियों की नजरों में पतिव्रता बनने का वो सुनहरा मौका किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी इसलिए पल्लू ठीक करके वे ज्योति को बस्ती से बाहर खदेड़ने के लिए आगे बड़ी एक दबंग किस्म की महिला जो लड़कियों की दलाली का काम करती थी ,आगे बढ़ी और उसके बाल पकड़कर उसे जोर से घसीटा क्योंकि वह चिढ़ी बैठी थी कि ज्योति को फुसला नहीं पाई।

पतली दुबली लड़की तिनके की तरह घिसट गई। दर्द और वेदना आखों के कोरो से बहने लगे जैसे सारी सृष्टि को प्रलय में अपने साथ बहा ले जानेंगे। भीड़ तो यह मौका कब से तलाश रही थी। नौकरी की परेशानियां ,बॉस की गालियां,पैसो की तंगी और न जाने कितनी कुंठाओं को बाहर निकालने का एक आसान जरिया आज एक अकेली लड़की को लातों से मारकर निकालने का मौका मिला था। उसका गोरा शरीर लाते और घूसे खाकर नीला पड़ गया था। अचानक उसने रोना बंद कर दिया और ठहाका मारकर हँसने लगी और चीख मारकर बेहोश हो गई ।

भीड़ को जैसे सांप सूंघ गया। तभी कोई चिल्लाया अरे कही मर तो नहीं गई। जेल का नाम सुनते ही सबका शरीर पसीने से भीग गया। तभी भीड़ को चीरती हुईं एक औरत आगे आई और बोली अरे ,मै अपने साथ दाई को लेकर आई हूँ जरा देखे तो कितने महीने का पाप हैं। बूढी दाई की अनुभवी आँखें उसे देखकर चौंकी ,फिर उसने पास जाकर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और पेट पर हाथ फेरने लगी। अचानक वह जोर से चिल्लाई और भागते हुए बोली -"यह माँ नहीं बनने वाली है इसके पेट मे कोई गोला हैं। " यह सुनते ही भीड़ हाड़ - मांस के लोथड़ों में तब्दील हो गई और धीरे धीरे वहां से खिसकने लगी।

रह गई ज्योति और पुरानी लालटेन जिसकी रौशनी मे बूढ़ा कमरा अपनी गरीबी के साथ जार-जार रो रहा था।

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मरूस्‍थली इलाकों में वर्षा आधारित खेती। वर्षा क्‍या वर्षों में कभी-कभी। बरानी खेती का अंजाम ये कि चार-पाँच साल अकाल तो, फिर कभी मेहरबानी हो इन्‍द्रदेव की तो वर्षा। पिछले चार-पांच वर्षों से यह क्रम बदला। इन्‍द्रदेव ने मरूस्‍थल पर अपना प्‍यार लगातार बरसा दिया। बरानी फसलें लगातार चार पांच साल से अच्‍छी हो रही है। बुजुर्गों को अपनी जिन्‍दगी में पहली बार लगातार जमाना देखने को मिला। ‘वाह रे तेरी लीला।'' चार-पाँच साल मोठ-बाजरी की फसल बेच कर कुछ पैसा इकट्‌ठा कर लिया है राजाराम ने।

राजाराम का सपना था कि वो अपने खेत पड़ौसी सांवरे की तरह एक दिन ट्‌यूबवैल खुदवा कर खेती करेगा। अब पैसा पास हो तो सपने पूरे करने की हिम्‍मत आ ही जाती है। राजाराम ने सोच लिया अब तो खेत में ट्‌यूबवैल की बोरिंग होकर ही रहेगी। पर पहली बाधा पिताजी को तैयार करना था। राजाराम ने अपना प्रस्‍ताव पिताजी के सामने रखा। जीवन के अस्‍सी बंसतों का अनुभव रखने वाले पिताजी ने मना कर दिया और कहा कि बेटा ‘हमारे पुरखे बरानी ख्‍ेाती करते आये हैं। इस धरती में पानी होता तो वो कुआं नहीं खोदते। यहाँ पानी पाताल तोड़कर आता है। पानी इतना ही इस धरती में है कि हम पी सके।' राजाराम कहाँ मानने वाला था उसने पड़ौसी सांवरे का हवाला देकर बोरिंग करने के फायदे बताता रहा और अंत में बूढ़ी और कमजोर हेाती ज़िन्‍दगी ने यह समझ लिया कि अब उसकी ना का असर होने वाला नहीं है। समझदारी ‘हाँ' करने में है। ना चाहते हुए भी पिताजी ने राजाराम को हाँ भर दी। पर ये समझाते हुए कि जितना पैसा हमारे पास है उससे कुआ नहीं खुदेगा। राजाराम पूरी तरह तैयार था। पैसा ब्‍याज पर देने वालों की कमी नहीं है। सो बस उसे इन्‍तज़ार था तो पिताजी की हाँ मिलने का। हाँ मिल गयी राजाराम के पँख लग गये। एक दिन में पैसे का इन्‍तज़ाम हो गया और दूसरे दिन धड़धड़ाती मशीनें राजाराम के खेत की जमीन पर घाव कर के एक के बाद एक पाईप जमीन में डालती जा रही थी। पाईपों का अन्‍दर जाना ही खर्चों को इंगित करता है। पर मीटर की दर से होने वाली खुदाई ने राजाराम की बचत के पैसे दस पाईप जमीन में समाकर खा चुके थे। जानकारों के मुताबिक अभी लगभग दस पाईप की और जरूरत थी। राजाराम के साहुकार पैसा दे रहे थे। तीसरे दिन पच्‍चीस पाईप जमीन में समा चुके थे। बोरिंग पूरी हो गयी। पास मन्‍दिर भी बन गया। जोड़ तोड़ जुगाड़ से बिजली का कनेक्‍शन भी हो गया। बटन दबाते ही पानी की मोटी धार, स्‍प्रिंकलरों की फुहारों में बदलकर खेतों में बरसात करने लगी।

मूंगफली की बुवाई का समय भी था। पर जेब में पैसा देखने को नहीं फिर साहुकार के पास और बीज, खाद सब चाहिए। खेती भी कब बिना पैसे होती है। पैसे का जुगाड़ बनाना था। पैसे का जुगाड़ हो गया। राजाराम अपना सभी दांव पर लगा चुका था। जमीन, मकान के कागज और पत्‍नी गहने साहूकारों की तिजोरी में उसकी गारण्‍टी दे रहे थे। राजाराम जी तोड़ मेहनत कर रहा था धरती सोना उगल रही थी। मौसम भी राजाराम के साथ। कुल मिला मूंगफली की अच्‍छी फसल हुई। राजाराम फूला नहीं समा रहा था। मण्‍डी जाकर उसने फसल को बेचा अच्‍छा दाम मिला। एक फसल में सारा कर्जा चुकता। साथ में शान से जीने के लिए मोटी रकम भी जेब में। राजाराम के हौसलों को पंख लग गये।

पिताजी के पास बैठकर राजाराम ने नोटों की गडि्‌डयों उनके हाथ में रख दी। धूंधली आंखों से उन्‍होंने नोटों को देखा और राजाराम को देकर कहा कि ‘देख राजा ये पैसे बैंक में रख दें। मुसीबत में काम आयेंगे।' राजाराम के मन में कुछ और ही था वो धीरे से बोला कि ‘पिताजी अभी पैसे बैंक में रखने का समय नहीं आया है। पैसे को पैसा खींचता है। मैं अभी ट्रैक्‍टर लूंगा।'' पिताजी को उसकी ये उड़ान अच्‍छी नहीं लग रही थी। पर उन्‍होंने इतना ही कहा जो करे सोच समझकर करना जोश में होश रखना जरूरी।'

बड़ी अजीब बात है, जोश में होश! या तो जोश ही होता है, या होश ही। खैर राजाराम जोश में था। बैंक से कर्जा लिया ट्रैक्‍टर ले लिया। बड़ा जमींदार कहलाने लगा। अपनी रोबीली मुच्‍छों को ऐंठ देकर जब ट्रेक्‍टर में बैठता तो लगता जैसे फिल्‍म का हीरो हो। खैर समय चलता रहा। बेटियों का घर था। शादियां करनी थी। अब भई! बड़ा जमींदार तो रिश्‍ते ऊंचे घरों में होने थे। दो-तीन साल की फसलों ने सारी तस्‍वीर बदल दी थी। अब घर के आगे डीजल खाने वाला एक और हाथी बोलेरों गाड़ी के रूप में खड़ा था। वक्‍त की मेहरबानी हो तो हर किसी को पहलवानी आ ही जाती है।

राजाराम ने लड़कियों की शादियां हुई। इतनी शानदार की पूरा गांव क्‍या पूरी तहसील में लोग कहने लगे ‘वाह भई राजाराम'। मगर वक्‍त हमेशा एक सा नहीं रहता। अकाल दर अकाल, रेगिस्‍तान अपनी असली नियति पर आ चुका था।

बोरिंग का पानी कम होने लगा। फसल का क्षेत्र घटने लगा। बोरिंग और करवानी पड़ी फिर उधार, फिर ब्‍याज। पर ये क्‍या इस बोरिंग से भी एक ही साल पानी। मौसम ने अपना मुंह फेर लिया मूंगफली पर भी बीमारी लग गई। फसल चौपट हुई, बाजार भी क्रूर हो गया। जितनी फसल हुई उसके भाव भी नीचे। ओने पौने दामों में बिकी फसल से खेती का खर्चा ही नहीं निकला जमा पूंजी धीरे-धीरे अन्‍त की ओर पहुँचने लगी। साहुकार मुँह मोड़ने लगे। चढ़ते सूरज को ही सब सलाम करते हैं,डूबती नांव से सब कूद कर भागने लगते हैं। बैंकों से लिये ऋण के लिये रिकवरी वाले तंग करने लगे। ट्रैक्‍टर, जीप घर के आगे खड़ी रखना मजबूरी। इन लोहे के हाथियों का खर्चा उठाना मुश्‍किल हो रहा था। मजबूरी ऐसी की बाहर निकाल नहीं सकते रिकवरी वाले चील की तरह झपट्‌टा मारने के लिए घात लगाये बैठे थे।

राजाराम अनमना रहने लगा। सारा दिन घर पर पड़ा रहता। पिताजी से हालत छिपी नहीं की उन्‍होंने पूछा तो कुछ बताया नहीं उम्र के कारण उन्‍हें आंखों से धुंधला दिखाई देता था। पर उनका अनुभव सारे वाक्‌ये को समझ चुका था। मजबूर थे खुद के पास जो था वो राजाराम को दे दिया। वो इतना ही था कि ऊँठ के मुँह में जीरा। सारी शानों शौकत, होशियारी मिट्‌टी में मिल चुकी थी। वो अपने बनाये जाल में फंस चुका था। साहुकार घर पर आकर रहन रखी जमीन को बेचने की धमकी दे रहे थे। वक्‍त की एक करवट से राजाराम अर्श से फर्श पर आ चुका था। उसके पास करने को कुछ नहीं था। बोरिंग और पाईप मांग रहा था। अब पाईप की तो बात दूर खाने का खर्चा चलाना मुश्‍किल था। बोरिंग से आने वाली पानी की पंकिल धार से घर के लिये अनाज तो उगाना ही था।

आज रात को बारह बजे से बिजली आनी थी। पाईप बदलने थे। राजाराम की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वो खाट पर लेटा आसमान में तारों को देख रहा था। पत्‍नी और बच्‍चे उसके मन की हलचल से बेखबर सो रहे थे। अचानक उसके दिमाग में कुछ आया वो उठा और खूंटी पर टंगी मजबूत रस्‍सी को उसने धीरे से निकाला। बिजली आने का समय हो रहा था। अंधेरा घना था। ठण्‍डी हवाएं नींदों को और गहरापन दे रही थी। राजाराम धीरे से उठकर हाथ में रस्‍सी लिये खेत के किनारे पर लगे पेड़ की ओर बढ़ रहा था। वहाँ पहुँचकर उसने पेड़ पर चढ़कर रस्‍सी को मजबूती से बाँधा। एक छोर पर फंदा बनाया जिसे वो गले का हार बनाने वाला था। राजाराम पेड़ पर बैठा उस फंदे को हाथ में लिये कुछ सोच रहा था कि अचानक खेत की बाड़ के पास कुत्तों के भौंकने की आवाज और तेज सड़सड़ाहट की आवाज सुनाई दी। अंधेरे के कारण साफ दिखायी नहीं दे रहाथा। जितना दिख रहा था उससे यह अनुमान लगा कि दो कुत्ते एक हिरण के पीछे भाग रहे हैं। हिरण पूरी ताकत से भाग रहा है। कुत्ते हिरण को पकड़ने वाले ही थे कि हिरण ने ऊँची बाड़ पर छलांग लगाकर उनके खेत में घुस गया। कुत्ते उसके पीछे छलांग लगाते उससे पहले राजाराम छलांग लगाकर घायल हिरण को पकड़ चुका था। राजाराम ने शोर किया और कुत्तों को पत्‍थर फैंक कर भगाया। बारह बज चुके थे। बिजली भी आ गयी। तेज आवाजें ओर शोरगुल सुनकर उसकी पत्‍नी, बच्‍चे और पिताजी भी वहाँ पहुँच चुके थे। उन्‍हें सब समझ आ गया था। उन्‍हें गुस्‍सा भी आ रहा था। पर वो सब पी गये उन्‍हें लग गया कि ये हिरण काल को टाल गया है। राजाराम हिरण पर हाथ फेरकर पुचकार रहा था। पिताजी कभी उसे और कभी पेड़ पर हिल रहे फंदे को देख रहे थे। उन्‍होंने जाकर फंदा निकाला और राजाराम से कहा राजया इस हिरण को पुचकारता रहेगा। इसे शहर ले जाकर डॉक्‍टर को दिखा नहीं तो ये मर जायेगा। राजाराम नजर नीची किये जड़वत बैठा पिताजी के हाथ में फंदे को देख रहा था। अचानक वो तेजी से उठा और हिरण को जीप में डालकर शहर की ओर ले गया। जीप तेज गति से चल रही थी। घायल अचेत हिरण को जीवन दिलवाना था। राजाराम जीप चलाते हुए असहाय घायल हिरण के पूरी ताकत लगाकर बाड़ कूदने का दृश्‍य बार-बार ध्‍यान में आ रहा था।

राधास्‍वामी सत्‍संग भवन के सामने,

गली नं. 2, अम्‍बेडकर कॉलोनी,

पुरानी शिवबाड़ी रोड़, बीकानेर

मोबाइल.09414031050

आजकल हर दिन सरकार की ओर से एक आश्‍वासन मिलता है- अगर कहीं गलत हुआ है तो जांच करायेंगे। जांचें जारी रहती हैं। परिणाम कभी नहीं आते। हर गलत काम की प्राम्‍भिक जांचें होती हैं और स्‍थायी परिणाम ये आता है कि जांच में कोई अनियमितता नहीं पाई गई। सरकारी धन का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ केवल कुछ सामान्‍य प्रक्रिया का उल्‍लघंन हुआ जो कि सरकार में एक सामान्‍य प्रक्रिया है। प्रक्रिया में भी सरकार की मंशा अच्‍छी थी। सम्‍बन्‍धित मंत्रियों, अफसरों के इरादे नेक थे। कार्यो को तेज गति से पूरा करने तथा बजट का शीघ्र व प्रोपर उपयोग करने में सब चलता है। जांच एजेन्‍सीज का काम है जांच करना और सरकार का काम है विकास के कार्यो को तेजी से पूरा करना। मार्च में तो करोड़ो अरबों रुपयों को सरकार अन्‍य संस्‍थाओं को देकर लेप्‍स होने से बचा लेती है और धीरे धीरे जांचें चलती रहती हैं।

सरकार हर जांच के बाद कहती है दोषियों को बक्‍शा नहीं जायेगा। दोषियों को सजा मिलेगी। सरकारी धन वापस वसूल किया जायेगा। मगर होता कुछ नहीं है। कई बार जांच के बाद रिपोर्ट के बारे में अफसर या मंत्री कह देते है-मैं तो अभी आया हूं। अभी अभी जोईन किया है। मेरे आने से पहले का मामला है। ज्‍यादा होशियार मंत्री-अफसर कहते है-मामले को दिखवायेंगे। हमें तो पता ही नहीं था आपने बताया तो पता चला। अभी चेक कराता हूं। दोषी बचेगे नहीं। मगर दोषी बच जाते हैं। जो ज्‍यादा खुर्राट होते हैं वे पूर्ववर्ती सरकार पर दोपारोपण कर देते हैं और जनता को धन्‍यवाद दे देते हैं कि ऐसी नाकारा सरकार को उसने उखाड़ फेंका। जांचें चलती रहती हैं। सरकारें भी चलती रहती हैं। घपले, घोटाले, भ्रप्‍टाचार भी चलते रहते हैं। सरकार कड़े कदम उठाने की घोषणा करती है। कठोर निर्णय लेने की कसमें खाती है। ज्‍यादा छेडने पर सरकारें विदेशी हाथ होने का राग अलापने लग जाती हैं। सरकार कहती है कुछ देश में अस्‍थिरता पैदा करना चाहती है, हम इन ताकतों को सफल नहीं होने देंगे।

जांचो से जांच एजेन्‍सीज व मीडिया को फायदा होता है। जांच रिपोर्ट लीक कर मीडिया टी आर पी व पत्रिका की बिक्री बढ़ा लेता है। सम्‍पादक राज्‍यसभा में चला जाता है या मंत्री के साथ विदेश चला जाता है।

जांच कराते रहो ओर रिपोर्ट को धूल खाने के लिए पटकते रहो। कभी कदा कोई काम की जांच रिपोर्ट हो तो मण्‍डल-कमीशन की तरह काम में ले लो बस। सरकार संसद या विधानसभा में जांच की घोपणा करते ही विपक्षी चुप हो जाते हैं। रिपोर्ट आने तक चुनाव आ जाते हैं। नई सरकार जांच रिपोर्ट को बर्फ में लगा देती है। ठण्‍डे बस्‍ते में डाल देती है। जांच समिति का यही उपयोग है कि किसी सेवा निवृत्‍त जज को काम मिल जाता है।

जांच जारी है और भ्रष्टाचार भी जारी है। घोटाले भी जारी है और घपले भी जारी है। ये एक महामारी है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

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CHACHAJI KI CHITTHI SITA RAM GUPTA KE NAAM-1 (Custom)

CHACHAJI KI CHITTHI SITA RAM GUPTA KE NAAM-2 (Custom)

अब उपरोक्त पत्र को ही लीजिए जो बहुत कम लोगों द्वारा समझी जाने वाली लिपि में लिखा गया है। भाषा तो स्वाभाविक है हिन्दी ही है लेकिन इस लिखावट को मुण्डी हिन्दी कहा जाता है। इसमें मात्राएँ न के बराबर हैं। केवल व्यंजनों से काम चलाना पड़ता है। किसी प्रकार के विराम चिह्नों का प्रयोग भी नहीं किया जाता। अत्यंत अवैज्ञानिक है ये लिपि अतः यदि पढ़नेवाला ग़लत पढ़ जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। आज कंप्यूटर के दौर में भी वैश्य समुदाय के अनेकानेक लोग और मुनीम वग़ैरा बही-खाता करने के लिए इस लिपि का इस्तेमाल करते हैं। इस लिपि को सीखना अत्यंत सरल है। मात्र एक-डेढ़ घण्टे के अभ्यास द्वारा इसे पढ़ना और लिखना सीखा जा सकता है। मैंने बचपन में इस लिपि को सीख लिया था लेकिन इस्तेमाल न होने के कारण भूल जाता था। कभी ज़रूरत पड़ती तो उसी वक़्त दस-पाँच मिनट में दोबारा सीख लेता और अपेक्षित कार्य सम्पन्न कर लेता। वही सिलसिला अद्यतन जारी है। उपरोक्त चिट्ठी को पढ़ने में आज भी मुझे आठ-दस मिनट लग ही गए। चाचाजी छत्तीसगढ़ के एक गाँव में रहते थे और हम दिल्ली में। हमारे बीच संपर्क का साधन ये चिट्ठियाँ ही होती थीं। चाचाजी की चिट्ठियाँ आती तो इसी मुण्डी हिन्दी में थीं लेकिन मैं जवाब प्रायः देवनागरी में लिखता था जिसे वो बच्चों से पढ़वा लेते थे। कभी-कभार मैं भी मुण्डी हिन्दी में जवाब दे देता था। चाचाजी और मेरे दरमियान इस अनूठे ख़तो-किताबत का सिलसिला पूरे अड़तीस साल तक जारी रहा। यही कारण है कि मैं आज भी इस सरल लेकिन अव्यवहृत लिपि को पढ़ पाता हूँ। चाचाजी बिना नागा चिट्ठी लिखकर हालचाल पूछते रहते थे और मुझे भी बराबर चिट्ठी लिखते रहने की हिदायत देते रहते थे। उनकी सभी चिट्ठियाँ प्रायः एक जैसी होती थीं। उपरोक्त चिट्ठी को मैं देवनागरी में प्रस्तुत कर रहा हूँ। कोई ख़ास बात नहीं लिखी है इस चिट्ठी में लेकिन इसमें उनकी आत्मीयता और उनका निश्छल-निस्स्वार्थ प्रेम नहीं तो और क्या है?


     9-9-1992                             श्रीगणेशजी
श्रीपत्री चिरंजीव सीताराम प्रेम नारायण जोग लिखी बघौद सेती रामचंद्र श्यामलाल की राम-राम बंचना घने मान सेती आगे यहाँ पर सब राजी-खुशी हैंगे आपकी राजी-खुशी श्रीभगवान सेती हमेशा नेक चाहते हैंगे आगे चिट्ठी आपकी आई नहीं सोई देना ज़रूर चिट्ठी लिखने में आप देर कर देते हैं सोई चिट्ठी ज़रूर देना हमारे लायक सेवा हो सो लिखना चिरंजीव बच्चों को हमारी तरफ सेती प्यार करना आशीर्वाद देना चिट्ठी ज़रूर देना और ज्यादा क्या लिखें आप ख़ुद समझदार हैंगे बाकी सबको हाथ जोड़कर राम-राम बच्चों को प्यार करना सबकी राजी-खुशी लिखना
भादवा सुदी 13 संवत 2049

प्रस्तुति :

सीताराम गुप्ता
ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 011-27313679/9555622323

srgupta54@yahoo.co.in

मुक्तिका -

बिना समर्पण भक्ति नहीँ है ।

भक्ति नहीँ तो मुक्ति नहीँ है ॥

 

करुणाहीन हृदय हो यदि तो ;

कुछ सार्थक अभिव्यक्ति नहीँ है॥

 

कथ्य- वाक्य हैँ अर्थहीन सब ;

यदि उपयुक्त विभक्ति नहीँ हैँ ॥

 

परिचित स्वयं से हो जो पूर्णतः ;

ऐसा कोई व्यक्ति नहीँ है ॥

 

स्वानुभूति 'महरूम' न हो तो ; प्रा

माणिक कोई उक्ति नहीँ ॥

 

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मुक्तिका

कटु सत्यपान-भय से

अस्वस्थ हो गए |

अपदस्थ हो त्रिशंकु-से

अधरस्थ हो गए ॥

 

दायित्वभार-वहन

कर सके न इसलिए:

पद त्याख कर सन्यास मेँ

पदस्थ हो गए ||

 

अवसानासन्न पापतिमिर-

यामिनी निरख ;

बक के सदृश कूल पर

ध्यानस्थ हो गए ||

 

चलते हैँ तांत्रिकोँ के तंत्र

शक्ति से जिनकी ;

वे बीजमंत्र उनको भी

कंठस्थ हो गए ॥

image

बादल की बहार

खोई हुई प्रतिध्वनि

तैरने लगे हैँ तालाब मेँ

बाढ़ मेँ बहते झाड़-झंकार

छाती की जेब मेँ समा जाते हैँ

और नीरव वेदना की वाणी

सारे समुद्र का पानी सोखकर

विस्मृति की परछाईयोँ मेँ

बादल बन उड़ जाते हैँ

कि है अभी भी

बहुत कुछ अनजाने

जिसे मेरे आकाश ने नहीँ जाने हैँ

 

अंधेरे मेँ मैंने देखा

सफेद बादल का टुकड़ा

आकाश के सूने थाल पर

आसानी से चला जाता है

जैसे कोई नाव

शांत समुद्र मेँ बही जा रही हो

आसमान सील जाता है

जैसे दरजिन चिड़िया

सीती है अपने लिए घर

और टांकोँ की जगह

तारे मुस्काते हैँ

 

बादलोँ से बने धागे

मुझे बैठा देता है

चाँद से बने टोपी पर

कि आँखोँ की पुतलियोँ के कोर मेँ

कोई स्वर अंधेरे मेँ फूट पड़े

जैसे फूटते हैँ हमारे गुलाब

सूर्य की किरणेँ पाकर

मैँ नहीँ होता

तब भी तारोँ भरा आकाश मौन रहता स्मृति और आशंका से लिपटे सपने

तब भी टंगे होते आकाश मेँ

और विशाल वेदना की पुतलियोँ मेँ

मैँ होता

उसी बादल के भीतर

खोजता हुआ अपने आँचल के पानी को ।

--

मैं लौटूंगा

मैँ लौटूंगा जरुर एक दिन
नदी के तट पर बसे अपने गाँव मेँ

हो सकता है मैँ आदमी न रहूँ
तब मेरे गाँव की नदी मुझमेँ उतर जाए और संभव है मैँ आदमी मेँ लौट आऊँ
हो सकता है कुहासे के किसी सुबह
उठती लहर के जल से मैँ तिक्त होकर सफेद बगुले सा उड़ता हुआ आ पहुँचू अपने पीपल के छाँव मेँ
और हो सकता है चुपचाप अंधकार मेँ डायन की हाथ की तरह कोई भुतहा पेड़ रोक देँ मेरे पांवोँ को जो जाना चाहते हैँ गाँव की रसमयी पगडंडी को

पर जरुरी है
मेरे लिए लौटना अपने गाँव

चमकती दुनिया के इस बाँस चढ़े शहर मेँ कम नहीँ हैँ डायनोँ की चीखेँ
कम नहीँ हैँ भूतहोँ से डूबेँ कराहेँ
एक-एक ईँट मेरे अंदर धँसकर
न जाने कहाँ खो गया है
और मानवीयता की मोटी रस्सी
मेरे मन के बेडरुम से गायब हो गयी है

मुझे दिखता है
छप्पर की छाती चूमकर उठता धुँआ
पक्षी लौटते संध्या की हवाओँ को चूमते कलमी के गंध भरे जल मेँ तैरते बत्तखेँ घाट पर जाती इठलाती वधुएँ
आम की छाँह मेँ सुस्ताते चरवाहे
खेतोँ के गद्दोँ मेँ लोटते बच्चे
और आँगन मेँ रंभाती गायेँ

मुझे लौटना ही होगा
उन हवाओँ मेँ
जहाँ मानव बसते हैँ ।

 

--

 

* मोतीलाल/राउरकेला

* 9931346271

100_6321 (Mobile)

सूराख वाला गुब्बारा

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बात बहुत पुरानी है। तब धरती और सूरज बच्चे ही थे। वे साथ-साथ खेलते थे। साथ-साथ खाते थे। और दूसरे बच्चों की तरह झगड़ते भी थे। सूरज जितना तेज-तर्रार था धरती उतनी ही शान्त और खुशमिजाज थी। सूरज अक्सर उसका टिफिन खा जाता था और पानी की बोतल खाली कर देता था।

"जरूरत होगी तब मैं एक बोतल की चार बोतलें दूँगा।"---सूरज यह कह कर हँसते हुए धरती को समझा देता था।

सूरज और धरती की एक नानी थी --नीहारिका। एक बार नानी ने धरती को उसके जन्मदिन पर उपहार में एक सुन्दर गुब्बारा दिया।वह एक अनोखा गुब्बारा था। एकदम फुटबाल सा गोल था। और रोहू मछली के पेट की तरह चमाचम चमकता था।

"वाह ,इतना सुन्दर गुब्बारा....!" धरती खुशी से फूली न समाई।

"यह चाँदी सा चमकता है इसलिये मैं इसे चाँद कहूँगी।"

"जरूर कहना" --नानी मुस्कराई---"लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हवा भरी रहे। क्योंकि इसके चमकने के लिये जरूरी है कि यह फूला रहे। इसमें जितनी हवा भरी होगी यह उतना ही चमकेगा। हवा न रहने पर यह बिलकुल नहीं चमकेगा।"

"अच्छा नानी माँ।"- कहती हुई धरती सूरज को अपना गुब्बारा दिखाने गई।

"इतना खूबसूरत उपहार नानी ने मुझे तो कभी नही दिया "----सूरज ने कुछ उदास होकर कहा तो धरती ने गुब्बारा सूरज को थमाते हुए कहा---"इसे तुम अपना ही समझो। और चाहो तब तक खेलो।"

"अच्छा !"--सूरज ने लपक कर गुब्बारा अपने हाथ में ले लिया।

"लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हवा भरी रहे ,वरना इसके चमकने की उम्मीद करना बेकार होगा।"--धरती ने नानी वाले अन्दाज में कहा।

"ठीक है ,ठीक है"--सूरज लापरवाही से बोला और गुब्बारे को लहराता हुआ दूर चला गया।

कई दिनों तक जब सूरज ने धरती का चाँद गुब्बारा नहीं लौटाया तो धरती खुद सूरज के पास गई और गुब्बारे की याद दिलाई।

"अर्.रे ...बाप रे "---सूरज ने माथा पीटा। दरअसल जबसे उसे इमली की टहनियों में अटकी एक सतरंगी पतंग मिल गई थी,वह गुब्बारे को तो भूल ही गया था। धरती की बात सुनकर वह एकदम  हडबडा कर गुब्बारे को ढूँढने चल पड़ा। उसने आकाश देखा पाताल देखा।नदिया देखी ,ताल देखा। पर चाँद गुबेबारे का कोई अता-पता नहीं।

अचानक धरती की नजर बेरी की झाडियों में जुगनू की तरह टिमटिमाती कोई चीज देखी।वह धरती का प्यारा चाँद गुब्बारा ही था। हवा निकल जाने के कारण उसका यह हाल हो गया था।

"देखो , तुमने मेरे गुब्बारे का क्या कर दिया !"---धरती बुरी तरह रोने लगी तो सूरज घबराया।

"ना..ना तुम रोओ मत। मैं अभी हवा भर कर तुम्हारे गुब्बारे को पहले जैसा ही गोल और चमकीला बना दूँगा।"

यह कह कर सूरज गुब्बारे में हवा भरने लगा। जैसे-जैसे गुब्बारा फूलता जाए वैसे-वैसे  ही चमकता भी जाए। अन्त में जब पूरा फूल गया तो फुटबाल जैसा गोल हो गया और चमचमाने भी लगा। चाँदी से भी ज्यादा उजला।

"देखा !!"---सूरज ने गर्व के साथ धरती को देखा। धरती मुस्कराई और लपक कर सूरज के हाथ से अपना गुब्बारा ले लिया।

पर यह क्या ..। गुब्बारा तो फिर सिकुडने लगा। धरती रुआँसी सी हुई गुब्बारे को लेकर सूरज के पास गई--- "देखो , यह तो फिर से सिकुडने लगा।"  

"अरे, अभी तो हवा भरी थी। तुमने निकाल भी दी। खैर मैं फिर हवा भर देता हूँ "--सूरज ने कहा।

और फिर उसने गुब्बारे को फुला दिया। लेकिन कुछ ही समय बाद वह चाँद गुब्बारा छोटा होने लगा। छोटा और तिरछा। धरती फिर रुआँसी होकर सूरज के पास आई और सूरज ने फिर धीरे-धीरे हवा भर कर उसे गोल बना दिया।

तब से लगातार यही सिलसिला चला आ रहा है। मजे की बात यह कि धरती व सूरज दोनों को ही नहीं पता कि झाडियों में अटके रहने के दौरान गुब्बारे में एक सूराख हो गया है।

--
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

आई․ पी․ एल․ का तमाशा

तमाशा शुरु हो गया है। चार हजार करोड़ रुपये तो केवल टीवी प्रसारण से मिलेंगे। भ्रष्टाचार के तयशुदा मानकों के अनुसार लगभग बीस प्रतिशित राशि अफसरों की जेब में जायेगी। फिर जांचें होगी, कुछ छुट भैय्‌ये फंसेगें और खेल चलता रहेगा। अमिताभ बच्‍चन फिर प्रसून जोशी की कविता पढ़ेगें और शो जारी है कि आवाज आती रहेगी। कौन कहता है हमारे खिलाड़ी थक गये हैं। वे तो आई․ पी․ एल․ के लिए टेस्‍टमैचों व एक दिवसीय मैचों में विश्राम कर रहे थे, अब वे बिलकुल तरो ताजा है, पैसा दो रन लो। काश सचिन तेन्‍दुलकर एक ऐसा शतक भी लगाता जिससे भारत जीत जाता। मगर आम आदमी की कौन सुनता है। उन्‍हें तो तेल, साबुन, कोल्‍डडिक, क्रीम बेचने से ही फुरसत नहीं है। बचे हुए समय में वे अपने पैसों को और ज्‍यादा बढाने के लिए सी․ए․सी․एस․ कर सलाहकारों से बात-चीत में व्‍यस्‍त रहते हैं। राहुल द्रविड़ की विदाई पार्टी फीकी रहती है मगर मुकेश अम्‍बानी की पार्टी के चर्चे महीनों होते रहेंगे। वहाँ सब एक प्रभामण्‍डल वाले नव धनाठ्‌य वर्ग के लोग होते हैं।

कामनवेल्‍थ के घोटालों से निपट कर जाचं एजेन्‍सीय आई․पी․एल․ की और ध्‍यान देगी, वैसे भी आई․पी․एल․ के तथाकथित जनक लन्‍दन में दिवालिए घोषित हो गये हैं। वैसे भी वे आई․पी․एल․ को विदेश ले जाने जैसा जघन्‍य अपराध कर चुके हैं।

आई․पी․एल․ यदि खेल है तो उसे खेल भावना से खेला जाना चाहिये पैसे की भावना से नहीं। शुद्ध मनोरंजन से खेलें। राजनीति से नहीं। वैसे भी खिलाडि़यों को चौकटी से नीलामी में खरीदा और बेचा जा रहा है पूरी की पूरी टीम या कम्‍पनी खरीदी और बेची जा रही है। मध्‍ययुग में गुलामों और औरतों की खरीद-फरोख्‍त होती थी आज कल खिलाडि़यों की हो रही है। चीयर बालाओं के क्‍या कहने। वे सब मिल कर अश्‍लीलता की एक नई परिभाषा गढ़ रही है। वैसे मेरा अन्‍तिम सुझाव तो ये है कि एक आई․पी․एल․ बिकिनी-धारी महिला खिलाडि़यों का भी शुरु किया जाये। पैसा नहीं सोना चांदी हीरे मोती बरसेगें। खुदा खैर करे।

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

․․09414461207

URDU SHAYAR KRISHAN MOHAN KA KHAT SITA RAM GUPTA KE NAAM-1

URDU SHAYAR KRISHAN MOHAN KA KHAT SITA RAM GUPTA KE NAAM-2

अंग्रेज़ी-उर्दू में लिखित इस खत में जो उर्दू ग़ज़ल कृष्‍ण मोहन साहब ने लिख भेजी है उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण भी संलग्‍न हैः

ग़ज़ल

मैं क़तीले- सिनाने- अब्रू हूँ,

शायरे - इश्‍क़बाज़े - उर्दू हूँ।

 

नाच के बाद उतार फेंका हो,

नर्तकी ने जिसे वो घुँघरू हूँ।

 

खुश हूँ थोड़-सी रोशनी पाकर,

मैं शबे-आरजू का जुगनू हूँ।

 

मैं रिवायत के बंद कमरे में,

बंद कैसे रहूँ कि खुशबू हूँ।

 

हो कोई कितना ही सितेज़ाकेश,

मैं हमेशा कुशादाबाजू हूँ।

 

कब मिरा दिल लगा है दुनिया से,

मैं गृहस्‍थ आश्रम का साधू हूँ,

 

कृश्‍नमोहन उदास है जीवन,

यास का यात्री हूँ, भिक्षु हूँ।

 

-कृष्‍णमोहन

 

शब्‍दार्थ ः

क़तीले-सिनाने-अब्रू = प्रेयसी की भौंहों की नोक का मारा

सितेज़ाकेश = युद्ध पसंद लड़ाई-झगड़े को तत्‍पर

कुशादाबाजू = हाथ खोले हुए अर्थात्‌ स्‍वागतोत्‍सुक

 

संकलन, लिप्‍यंतरण एवं प्रस्‍तुति ः

सीताराम गुप्‍ता

ए․डी․-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

फोन नं․ 011-27313679/9555622323

srgupta54@yahoo.co.in

 

प्रस्‍तावना ः-

वर्तमान समय में मीडिया की अनुवाद आवश्‍यकता बन गई है। मीडिया सीमा विहीन है। इसलिएमीडिया को भौगोलिक सीमा को भूलकर अपने पाठाकों की भाषा में समाचारों को प्रस्‍तुत करना होता है। विश्‍व और भारत में भाषाई विविधता के कारण यह प्रस्‍तुतिकरण मात्र अनुवाद से संभव है। सामान्‍यतः देश विदेश के समाचार वहां के समाचार ऐजेंसियों द्वारा उस देश की अपनी मूल भाषा में विश्‍व के अन्‍य देशों के समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजे जाते हैं। विदेशी भाषा में प्राप्‍त इन समाचारों को अनूदित करके प्रत्‍येक देश के समाचार पत्र इसे अपनी भाषा या भाषाओं में प्रकाशित करते हैं।

उदाहारण के लिए रूस, चीन, जापान, फ्रांस, अमेरिका अथवा इंग्‍लैण्‍ड से समस्‍त समाचार न तो अंग्रेजी भाषा में प्राप्‍त होते हैं, और न हिंदी और भारतीय भाषाओं में। यह उस देश की अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे होते हैं। इन सभी समाचारों को अनूदित करके देश विशेष की भाषा में वहां के समाचार पत्र प्रकाशित करते हैं। इसलिए पत्रकारिता और अनुवाद का अंतरसंबंध बहुत घनिष्‍ट और नजदीकी है। विश्‍वपटल और भारत में भाषाई विविधता होने के नाते पत्रकारिता में समाचार की सत्‍यता के लिए अनुवाद का सहारा लेना अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण हो जाता है। खासकर हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में ‘‘सभी हिंदी में प्रकाशित होनेवाले अखबारों को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य के निरन्‍तर अद्य़तन और सही ढंग से अंकन के लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की सहायता लेनी ही होती है।‘‘

वर्तमान समय तकनीक और प्रौद्योगिकी का समय होने के नाते संचार माध्‍यमों में काफी बदलाव आया है। पत्रकारिता का चेहरा पूर्ण रुप से बदल गया है। इंटरनेट के माध्‍यम से आम जनता प्रत्येक समाचार को बहुत ही जल्‍दी जान रही है। कसी एक खब़र को जानने के लिए प्रिंट मीडि़या के प्रकाशित समाचार पत्र,टेलीविजन के 7ः00 बजे या 9ः00 बजे वाले समाचार और रेडियो द्वारा प्रसारित विशिष्‍ट समय के समाचार पर निर्भर होने की आज आवश्‍यकता नहीं है। आज आप घटना के कुछ ही घन्‍टों में तस्‍वीर के साथ इंटरनेट के माध्‍यम से एक क्‍लिक पर सब कुछ देख और जान सकते हैं। ब्‍लॉग, सोशल नेटवर्किग और ई-पेपर के माध्‍यम से पत्रकारिता का विस्‍तार हुआ है। ये सारे विस्‍तार और बदलाव सकारात्‍मक है किन्‍तु सत्‍यता और प्रामाणिकता के लिए भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले अख़बारों को अंग्रेजी तथा अन्‍य भाषाओं के अखबारों की सहायता लेनी पड़ती है। भारतीय संदर्भ में अग्रेजी तथा अन्‍य भाषाओं के अख़बारों में प्रकाशित समाचारों को प्रामाणिक मानते हैं तब भारतीय भाषाओं में प्रकाशित अखबारों के लिए अनुवाद की सहायता महत्‍वपूर्ण बन जाती है।

यह कड़वी सच्‍चाई है कि, भारतीय भाषाओं में किए गए शोधों की गुणवत्‍ता अन्‍य विदेशी भाषाओं में किए गए शोधों की गुणवत्‍ता से तुलनात्‍मक रुप से निम्‍न स्‍तर की है। भारत के शोधार्थियों में अपने विषय के तह तक जाने की प्रवृत्‍ती नहीं दिखाई देती। इसलिए समाचार पत्रों के लेखों और सं पादीत लेखों के लिए संपादक महोदय को ही नहीं, तो किसी भी विषय के अध्‍ययन कर्ताओं को अधिकतर अंग्रेजी और अन्‍य भाषाओं के अध्‍ययन सामग्री पर निर्भर होना पड़ता है। भारतीय भाषाओं में प्रमाणिक संदर्भ पुस्‍तकें कम होने के कारण अन्‍य भाषाओं के संदर्भ पुस्‍तकों का अनुवाद करना आवश्‍यकता बन जाती है। अनुवाद के कारण ही भारतीय पत्रकारिता में विचारों का परस्‍पर आदान प्रदान संभव हुआ है। इसी माध्‍यम से अलग-अलग संस्‍कृतियों की जानकारी एवं राज्‍यों-राज्‍यों में आपसी तालमेल स्‍थापित होगा। ऐसे कई संदर्भो में अनुवाद का महत्‍व बढ़ जाता है।

हर देश में, समय और कालानुरूप अनुवाद होते गए है, खासकर धर्मं प्रसार के साहित्‍य के संदर्भ में अनुवाद की भूमिका महत्‍वपूर्ण रही है। दूसरी और अनुवाद के संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि, ‘‘अनुवाद एक ऐसा माध्‍यम है जो परस्‍पर अपरिचित भाषाओं के संसार को एक-दूसरे के समीप लाता है और एक नई पहचान की सृष्‍टि करता है। इससे अपरिचित ज्ञान के विविध द्वार खुलते हैं। मनुष्‍य नई सम्‍भावनाओं, नई अभिव्‍यक्‍तियों और नई दक्षताओं से सम्‍पन्‍न होता है।‘‘

उपरोक्‍त कथन पत्रकारिता में अनुवाद की अनिवार्य भूमिका को स्‍पष्‍ट करता है। तो दूसरी और यह कहना उचित होगा कि, पत्रकारिता में अनुवाद के कारण ज्ञान का विस्‍तार होता है। लोगों को नई-नई सूचनाओं से अवगत करना, अनुवाद के कारण सम्‍भव हुआ है। इसलिए ‘‘हिन्‍दी तथा अन्‍य भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का बड़ा हिस्‍सा अनुवाद पर आधारित रहा है।‘‘

यह बात सच है कि वर्तमान समय में हिंदी में मौलिक सोच और लेखन करने वाले पत्रकार, सम्‍पादकों की संख्‍या बढ़ी है किन्‍तु अन्‍तर्रा ष्‍ट्रीय समाचारों, पुस्‍तक समीक्षा, तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे विषय के लिए आज भी अनुवाद ही सहायक बना हुआ है। क्‍योंकि ज्‍यादातर विज्ञान का साहित्‍य अंग्रेजी भाषा में लिखा जाता है, यह सच्‍चाई है। तो दूसरी और वर्तमान समय और आग़े भी भाषाई विविधता जब-तक होगी तब-तक भारतीय भाषायी अखबारों में अंग्रेजी समाचार एजेंसियों से खबरों को हिन्‍दी या अन्‍य भारतीय प्रादेशिक भाषाओं में अनुवाद करना अनिवार्यं होगा और भविष्‍य में इसका महत्त्‍व कम होने की बजाए बढ़ता जाएगा।

पत्रकारिता के क्षेत्र में आज यह आवश्‍यक है कि, भारतीय भाषायी पत्रकारों की अंग्रेजी पर भी अच्‍छी पकड़ होनी चाहिए। उन्‍हें अंग्रेजी से अपनी भाषाओं में खबर या लेख का अनुवाद करना आना चाहिए।इससे यह सिद्ध होता है कि, पत्रकार को अनुवाद के ज्ञान की अनि वार्यता है। तभी वह भाषायी विविधता वाले देश में अपने पाठकों को न्‍याय दे सकता है।

किसी एक भाषा के ज्ञान की अपनी मर्यादांए होती है। सोच का एक दायरा होता है। पत्रकारों को इस दायरे से बाहर निकालकर सोचना आवश्‍यक है। किसी व्‍यक्‍ति विशेष के विचारों को अपनी भाषा के समाचार पत्र के माध्‍यम से प्रेषित करने के लिए अंग्रेजी भाषा पढ़ना तथा उससे अनुवाद करना पत्रकार के लिए आवश्‍यक है। तभी वह अपने पाठकों कुछ नया विचार, दर्शन दे सकता है। जो सुधी पाठकों की अपेक्षाएं होती हैं।

वर्तमान समय में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का काफी बोलबाला है। कुछ चैनल चोबीसो घण्‍टे समाचारतथा उसका विश्‍लेषण देते हैं। ‘‘इन न्‍यूज चैनलों के विस्‍फोट से अनुवाद की भूमिका में एक नया आयाम जुड़ा है।'‘

जैसे- प्रत्‍येक चैनल हिंदी और अंग्रेजी में समाचार देता है तब उसे अनुवाद की जरुरत होती है। तो कुछ अंग्रेजी के चैनल अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए हिंदी भाषा में भी अपने अंग्रेजी समाचारों का संक्षेप में हिंदी लिखित रुप प्रसारित करते हैं । तो दूसरी और हिंदी चैनल भी विशिष्‍ट समय अंग्रेजी में समाचार प्रसारित करते हैं। यह दोनों प्रसारण अनुवाद के मध्‍यम से ही संभव होते हैं।उपर्युक्‍त विश्‍लेषण से यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का भी काम अनुवाद के बगैर नहीं चलता। बल्‍कि उसे तो प्रसारण की समय सीमा ज्‍यादा होने के नाते ज्‍यादा अनुवाद करना पड़ता है। जाहिर है ज्‍यादा कार्यक्रम का प्रसारण याने ज्‍यादा अनुवाद का कार्य।

सामाचार चैनलों को विदेश से प्राप्‍त खबरें अंग्रेजी तथा अन्‍य भाषाओं में होती हैं। इसका हिंदी या अन्‍य भारतीय भाषाओं में तत्‍काल अनुवाद कर समाचार प्रेषित करना होता है। इसलिए पत्रकार महोदय दुभाषी तथा अंगे ्रजी से भारतीय भाषा में अनुवाद करने के लिए सक्षम होना आवश्‍यक है।जनसंचार का क्षेत्र विस्‍तार बहुत बड़ा है। इसमें सिनेमा, वृत्‍तचित्र टेलीविजन धारावाहिक, और विभिन्‍न मनोरंजन कार्यक्रम आते हैं। इन सभी में अनुवाद की अपनी विशिष्‍ट भूमिका होती है। भाषाई विविधता के कारण मनोरंजनात्‍मक, शौक्षिक और अन्‍य कार्यक्रमों को भारत के संदर्भ में भारतीय भाषाओं तथा अन्‍य देशों तथा राज्‍यों के संदर्भ में वहां की मातृभाषा में प्रेषित किया जाता है।मनोरंजनात्‍मक कार्यक्रम प्रसारण के कारण मीडिया एक उदयोग बन चुका है। विश्‍व प्रसिद्ध चैनल और उत्‍पाद भारत और अन्‍य देशों में अपना व्‍यापार करने हेतु अनुवाद के सहारे उस देश की भाषा में कार्यक्रमों तथा उत्‍पादों की जानकारी अनूदित करके ही अपने उद्‌देश्‍य में सफल होते हैं। उदाहारण के लिए विश्‍व का प्रसिद्ध डिस्‍कवरी चैनल आज भी अपने सभी कार्यक्रमों को भारत में हिदी भाषा में प्रसारित करता है। इसी तरह कई अंग्रेजी फिल्‍मों को ‘हिन्‍दी सब टाइटलिंग' तथा प्रोदशिक फिल्‍मों को ‘अंग्रेजी सबटाइटलिंग' के साथ प्रदर्शत किया जाता है। उपर्युक्‍त सभी कार्य अनुवाद के माध्‍यम से ही किए जाते हैं ।

पत्रकार एक भाषा के माध्‍यम से अपनी बात जनता के बीच रखता है। जनता भी उसे एक भाषा के माध्‍यम से ग्रहण करती है। इसलिए यहा यह कहना उचित होगा की भाषा का अनुवाद से गहरा सम्‍बन्‍ध है। तो दूसरी और प्रत्‍येक भाषा की अपनी व्‍यवस्‍था होती हैं तथा सामाजिक और सांस्‍कृतिक सन्‍दर्भ होते हैं।जिनको अन्‍य भाषाओं में व्‍यक्‍त करने के लिए समानार्थी शब्‍द नहीं होते या दोनों भाषाओं की सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि समान नहीं होती । इसलिए अनुवाद कार्य कठिन हो जाता है। और पत्रकारों को भावानुवाद या अन्‍य अनुवाद प्रकार का सहारा लेना पड़ता है। क्‍योंकि पत्रकार महोदय को समाचार को बहुत जल्‍द प्रकाशन हेतु देना होता है। कई सारे समाचारों के अनुवाद की लम्‍बीं सूची उसके पास होती हैं। कम समय के चलते वह भावानुवाद और सारानुवाद ही कर पाता है। किन्‍तु यह अनुवाद कार्य कभी-कभी समाचार पत्र में उपलब्‍ध जगह पर निर्भर करता है।

प्रत्‍येक विधा की अपनी एक अलग भाषा होती है। जनसंचार माध्‍यम भी इससे अछूता नहीं है। उसकी भी अपनी एक विशिष्‍ट भाषा है। यह भाषा सूचना परक और सरल है क्‍योंकि इसे सामान्‍य जनों के बीच व्‍यावहार करना होता है। इसलिए इसके अनुवाद में भी सरलता, सहजता और पठनीयता चाहिए । न की साहित्‍य की तरह शैली का विशिष्‍ट आग्रह। किन्‍तु हर पत्रकार की अपनी एक अनुवाद करने की शैली जरूर होती है। इसके बावजूद अनूदित समाचार में भी आपको एक लय दिखाई देती है। विशिष्‍ट भाषा और पदों का सुघड़ संयोजन दिखाई देता है। जो अनुवाद होकर भी अनुवाद नहीं लगता। यह पत्रकार के अनुवाद कार्य के लम्‍बे अनुभव से सम्‍भव होता है।

पत्रकारिता और अनुवाद ः परस्‍पर सम्‍बन्‍ध

पत्रकारिता और अनुवाद का परस्‍पर सम्‍बन्‍ध घनिष्‍ट है, क्‍योंकि देश दुनिया की खबरों के लिए पत्रकार को अनुवाद का सहारा लेना ही पड़ता है। इसका कारण देश दुनिया कि भाषाएं अलग-अलग है।हम सब यह जानते है कि, ‘ ‘पत्रकारिता का पहला उद्‌देश्‍य है पाठकों को उनके चारों और घट रही घटनाओं, पनप रही प्रवृत्‍तियों, हो रहे शोधकार्यों, वैज्ञानिक प्रगति और आसन्‍न खतरों से अवगत कराना है। इसी के साथ घटनाओं, प्रवृत्तियों और मानव को प्रभावित करनेवाले मुद्‌दों का अर्थ बताना भी उसका कर्तव्‍य है। संक्षेप में, जो जानने योग्‍य है उसे प्रस्‍तुत करना उसका लक्ष्‍य है।''

उपर्युक्‍त सभी चीजों से अवगत कराने के लिए पत्रकार को अनुवाद की आवश्‍यकता पड़ती है, क्‍योंकि वैज्ञानिक प्रगति तथा शोधकार्य जैसे विषयों की जानकारी अंग्रेजी या अन्‍य-अन्‍य भाषाओं में उपलब्‍ध होती रहती हैं।

समाचार पत्र को मुख्‍य उद्‌देश्‍य जनता कों देश विदेश में घटित घटनाओं से अवगत कराना है। जनता को अवगत करने के लिए पत्रकार की भाषा सरल, सुलभ, सूचनापरक, प्रवाही होनी चाहिए। इसलिए पत्रकार को अनुवाद करते समय ‘‘सटीक और सहज अनुवाद करने के लिए अर्थ विज्ञान और दोनों भाषाओं की विषमताओं की जानकारी होनी चाहिए।''इसके न होने से अनायास ही अनुवाद अटपटा लगता है।

निम्‍नलिखित उदाहरणों से हम इसे समझ सकते हैं।

राजधानी से एक दैनिक पत्र के प्रथम पृष्‍ठ में छपे कुछ वाक्‍य इस प्रकार है। जैसे- यह वाक्‍य (1) गोर्बाचोव स्‍वास्‍थ्‍य कारणों' से अपना कार्य संचालन करने में असमर्थ है। इस वाक्‍य में स्‍वास्‍थ्‍य कारणों से' ‘रिजंस आफ हेल्‍थ' का शाब्‍दिक अनुवाद है। इसका उचित अनुवाद है अस्‍वस्‍थता के कारण' । दूसरा वाक्‍य है- (2) प्रवक्‍ता ने कहा गोर्बाचोव अपने सरकारी निवास पर गिरफ्‍तारी की अवस्‍था' में हैं। इस वाक्‍य में गिरफ्‍तारी की अवस्‍था' का कहीं पर भी अर्थ नहीं लग रहा है। गिरफ्‍तारी की अवस्‍था' यह वाक्‍य संरचना ही अपने आप में इस वाक्‍य में ठीक नहीं बैठती। इसका अनुवाद होना चाहिए नरजबन्‍द' है। इस तरह पत्रकारिता के अनुवाद की गड़बडिया पत्रकार को अर्थ विज्ञान और व्‍यतिरेकी भाषाविज्ञान के ज्ञान के अभाव के कारण होती है। अनुवाद के लिए इन दोनों का ज्ञान होना पत्रकार के लिए आवश्‍यक है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुवाद करने वाले सभी पत्रकार तथा अनुवादकों को स्‍थान भेद की जानकारी होना भी आवश्‍यक होता है। क्‍योंकि एक ही तरह के काम करने वाले व्‍यक्‍तियों को अलग-अलग देशों में अलग-अलग नाम हैं। जैसे - (1) भारत में ‘वित्‍तमन्‍त्री' जो काम करते हैं वह काम ब्रिटेन में ‘चांसलर और एक्‍सचेकर' करता है। (2) अमेरिकी राष्‍ट्रपति द्वारा मनोनीत मंत्रियों को ‘ सेक्रेटरी' कहा जाता है उसे भारत में हम मंत्री ही कहेंगे, ‘सचिव' नहीं।

पत्रकारिता के अनुवाद का व्‍याकरण ः-

पत्रकारिता के अनुवाद में व्‍याकरणिक कोटियों का बड़ा महत्‍व है। जैसे- वचन का ज्ञान होनाआवश्‍यक है। हिन्‍दी और अंग्रेजी में दो वचन है। एकवचन और बहुवचन किन्‍तु प्रयोग और वर्तनी के कारण कई असंगतियाँ दिखाई देती है। जैसे - सम्‍मान देने के लिए क्रिया का बहुवचन रुप प्रयोग किया जाता है।उदा․- (1) पिता आए हैं। (2) कल गोर्बाचोव भारत से रवाना हो रहे हैं आदि। दूसरी और कभी-कभी बहुवचन की जगह एकवचन अच्‍छा लगता है। उदा․ - (1)भारतीय विदेश में भी अपने देश को नहीं भूलता । इस वाक्‍य में ‘ भारतीय ' समस्‍त देशवासियों के लिए है। इसी के समान कारक चिन्‍ह और उपपद को भी अनुवाद करते समय ध्‍यान में रखना आवश्‍यक है। दूसरी और कभी-कभी अनुवाद करते समय कुछ छोड़ना पड़ता है तो कुछ अपनी और से जोड़ना पड़ता है। जैसे- अंग्रेजी का यह वाक्‍य ‘राइट नाउ, आई कान्‍टप्रामिज एनी थिंग'- का हिन्‍दी अनुवाद - ‘अभी मैं कुछ नहीं कह सकता' है। इसमें अनुवादक को कुछ छोड़ना पड़ा है। तो दूसरा अंग्रेजी का वाक्‍य- ‘ ही लेट-आउट हिज हाऊस' का हिन्‍दी अनुवाद हैं। ‘उसने अपना मकान किराए पर दिया'। इसमें अपनी और से अनुवादक ने कुछ जोड़ा है।

अनुवाद में विशेषण का भी विशेष ध्‍यान देना होता है। जैसे - अमेरिका का विशेषण अमेरिकी होगा। इसी तरह इटली का इलातवी और यूनान का यूनानी। और उदाहरणों में गुलाब का गुलाबी, मामा का ममेरा, साल का सालाना और रंग का रंगीन आदि।

मुहावरे और लोकोक्‍तियां ः-

मुहावरे और लोकोक्‍तियों कें संदर्भ में अनुवादक को विशेष सावधानी बरतनी होती है। क्‍योंकि स्‍थान और सांस्‍कृतिक विविधता के कारण एक भाषा के मुहावरों और लोकोक्‍तियों का वैसे ही अर्थ देनेवाले मुहावरें और लोकोक्‍तियाँ दूसरी भाषा में हो यह जरूरी नहीं है। खासकर अंग्रेजी से अनुवाद करते समय इसके मुहावरों के भाषिक इकाईयों की पहचान सही ढँग से होना आवश्‍यक है। वरना गलत अनुवाद की पूर्ण सम्‍भावना होती है। अंग्रेजी मुहावरों के अर्थ के समान भारतीय भाषाओं में समान मुहावरें न मिले यह सम्‍भव है। ऐसी स्‍थिति में अनुवादक सरल भावानुवाद करके काम चला सकता है। जैसे- ‘ऑल इज वेल दैट एंड़स वेल' - का अनुवादक ‘अन्‍त भला तो सब भला' या ‘नेसेसिटी इज द मदर ऑफ इनवेशन' का सरल अनुवाद ‘आवश्‍यकता अविष्‍कार की जननी है'। इस तरह से करना उचित है। तो ‘ए ड्राप इन द ओशन' का ‘उँट के मुँह में जीरा' सही अनुवाद है।

वाक्‍य रचना ः-

अनुवाद में वाक्‍य रचना या पठनीयता का अनुवादक को ज्‍यादा ध्‍यान रखना होता है। किसी भी एक भाषा के शब्‍दों और पदों की समानार्थी और निकटार्थी अभिव्‍यक्‍तियों की सरंचना मिलने पर कभी-कभीस्‍त्रोत भाषा के वाक्‍य की बनावट अनुवादक को संकट में डालती है। तो दूसरी और स्‍त्रोत भाषा की वाक्‍य रचना अनुवादक पर इतनी हावी हो जाती है कि उस वाक्‍य में निहित अर्थभेद के व्‍यतिरेक की और उसका ध्‍यान ही नहीं जाता। जैसे- अंग्रेजी का यह वाक्‍य लीजिए- ‘‘प्रेजिडेंट जिया कैननॉट फील सिक्‍योर इन इस्‍लामाबाद इफ ए सेकुलर रेजीम रूल्‍स इन काबूल।''इसका सही अनुवाद है ‘यदि काबुल में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनती है तो इस्‍लामाबाद में राष्‍ट्रपति जनरल जिया सुरक्षित अनुभव नहीं करेंगे।' यह नहीं की प्रेजिडेंट जिया ‘अस्‍वस्‍थ होगें'। दूसरा वाक्‍य अंग्रेजी वाक्‍यरचना के अनुसार अनूदित है। जैसे ‘‘ आज यहाँ बीस आदमी मारे गए जबकि रेलगाड़ी पटरी से उतर गई।'' सही अनुवाद है- ‘रेलगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर आज यहाँ बीस आदमी मारे गए।'

इससे यह स्‍पष्‍ट होता है कि, अनुवादक को स्‍त्रोत भाषा के वाक्‍य रचना को बहुत सूक्ष्‍मता से समझकर लक्ष्‍य भाषा में वाक्‍य रचना हो सकती है या नहीं इसपर ध्‍यान देना आवश्‍यक होता है। अन्‍यथा अर्थ का अनर्थ होता है तथा अनुवाद अटपटा लगता है।

पत्रकारिता के अनुवाद में यह ध्‍यान रखना अतिआवश्‍यक है कि, लक्ष्‍य भाषा की प्रकृति क्‍या है ?लक्ष्‍य भाषा के अनुवाद में भी सहज प्रवाह और लोच आना चाहिए। इस लोच और प्रवाह के लिए अनुवादक को विशिष्‍ट जगहों पर शब्‍दों और पदों के चयन पर ध्‍यान देने की जरूरत होती है। तो कहीं लक्ष्‍य भाषा के व्‍याकरण और उसकी प्रकृति पर। किंतु पत्रकार अनुवादक समय और व्‍यस्‍तता के कारण ध्‍यान नहीं दे पाते।कुछ जगहों पर स्‍त्रोत भाषा के कुछ शब्‍द लक्ष्‍य भाषा में ज्‍यों के त्‍यों रख सकते हैं, खास कर अंग्रेजी, हिंदी, मराठी अनुवाद के संदर्भ में। जैसे - अंग्रेजी के ये शब्‍द रेल, स्‍कूल, पुलिस, सीमेंट, बस साईकिल, मोटार, पेट्रोल, डीज़ल आदि। इनका अनुवाद हिंदी, मराठी में वैसा ही होगा क्‍योंकि जनमानस मेंयहीं शब्‍द दोनों भाषा में वैसे के वैसे रूढ़ हो गए हैं।

वर्तनी ः-

पत्रकारों के सामने अनुवाद करते समय ज्‍यादातर समस्‍या व्‍यक्‍तिवाचक संज्ञाओं के वर्तनी की अ ातीहै। खासकर अंग्रेजी से अनुवाद करते समय। क्‍योंकि अंग्रेजी के नामों के अनुवाद के समय गलती की गुंजाइश बनती है। ये गड़बड़ अंग्रेजी वर्तनी के कारण हिंदी और मराठी अनुवाद में होती है। जैसे - अंग्रेजी Kamal Hasan का हिंदी, मराठी में कमाल हासन बनता है, तो Mithun Chakravarti का मिठुन चक्रवर्ती । किन्‍तु सही अनुवाद कमल हसन और मिथुन चक्रवर्ती है।

पत्रकारिता के अनुवाद ने अपनी समस्‍या को कम करने के लिए अंग्रेजी के ढेरों शब्‍दों को हिन्‍दी में वैसे-के-वैसे लाया और ये सभी शब्‍द जनमानस ने स्‍वीकार किए है। जैसे- टेलीफोन, कूलर, अपार्टमेंट, पेन, टेबल, रोड आदि। ये शब्‍द हिंदी भाषा के आम प्रचलन में आने से हिंदी के लगने लगे है। तो दूसरी और अंग्रेजी में भी हिंदी के शब्‍द चल रहे हैं। और इनको शब्‍दकोश में प्रवेश भी मिला है। जैसे- लाठीचार्ज, आचार, चटणी, घेराव आदि। यह सब पत्रकारिता के अनुवाद के कारण ही हुआ है। अब अंग्रेजी अंग्रेजी न रहकर हिंगलिश या हिंग्रेजी बन गई है।

हम अखबारी भाषा पर नज़र डालने से यह समझते हैं, कि इसकी भाषा सरल होती है। इसलिए जब इसका अनुवाद होगा तो वह भी सरल होना चाहिए। इसलिए ‘‘अखबारी अनुवाद में तो सरलता एक अपरिहार्य तत्‍व है।''

इस तत्‍व के पालन में अखबारी अनुवाद सरल है। क्‍योंकि अखबारों में सीमित संख्‍या में शब्‍दों का प्रयोग होता है। ज्‍यादातर पत्रकार अनुवाद करते समय इन्‍हीं सीमित शब्‍दों के साथ अनुवाद में नए-नए प्रयोग करते हैं। जो अपने पाठकों की पढ़ने की रूची को बढ़ाते हैं। क्‍योंकि आज के समय में अनुवाद शाब्‍दिक अनुवाद न रहकर उससे काफी आगे जा चुका है। इतना की उसमें सम्‍पादन-विवेक आ गया है। ज्‍यादा तर अखबार अनुवाद से निकल रहे हैं - किन्‍तु लग रहे हैं जैसे मूल लेखन है। यह सब संभव होने के पीछे अनुवादक को आज उपलब्‍ध सुविधाओं में अच्‍छे शब्‍दकोश सहज सुलभ हो गए हैं। तो दूसरी और इंटरनेट पर उपलब्‍ध परिभाषा कोश, थिसारस आदि से सहायता मिल रही है। ये सभी उपकरण अनुवाद को मददगार सिद्ध हो रहे हैं।

निष्‍कर्ष ः-

समाचारों के अनुवाद के समय कथ्‍य के अलावा भाषा की सरलता और शैली की रोचकता परविशेष ध्‍यान दिया जाना चाहिए। पत्रकार स्‍त्रोत भाषा और लक्ष्‍य भाषा के मर्म से अच्‍छी तरह से परिचित हो, तथा उसे दोनों भाषाओं के मुहावरों, लोकोक्‍तियों को समझने की शक्‍ति हो। तथा उ से दोनों भाषाओं की व्‍याकरणिक, सांस्‍कृतिक और अर्थगत भिन्‍नताओं का ज्ञान अवश्‍य हो तभी वह सरल, स्‍वाभाविक और मूल केकरीब याने सूचनापरक अनुवाद कर सकता है। जो पत्रकारिता के अनुवाद की अनिवार्य आवश्‍यकता है।

संदर्भ

1) डॉ․ वर्मा, सुजाता, पत्रकारिता ः प्रशिक्षण एवं प्रेस विधि, आशिश प्रकाशन, कानपूर, 2005, पृष्‍ठ- 172

2) गुप्‍त, जिन्‍तेन्‍द्र, पियदर्शन और प्रकाश अरूण, सं․ रामशरण जोशी, पत्रकारिता में अनुवाद, राधा कृष्‍ण प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2006, सम्‍पादकीय

3) वही․ सम्‍पादकीय पृ․ ग्‍प्‍ट4) वही․ सम्‍पादकीय पृ․ ग्‍प्‍ट

5) वही․ पृ․ 29-30

6) वही․ पृ․ 42

7) वही․ पृ․ 48

8) वही․ पृ․ 91

सहायक ग्रंथ

1) अनुवाद पत्रिका, अप्रैल-जून 2011, अंक ः 147, भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्‍ली

2) अनुवाद पत्रिका, जुलाई-सितम्‍बर 2011, अंक ः 148, भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्‍ली

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शैलेश मरजी कदम

सहायक प्रोफेसर,

म. गा. दूरस्‍थ शिक्षा केन्‍द्र,

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