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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मनोहर चमोली ‘मनु' की विज्ञान कथा - मास्करोबोट

00 विज्ञान गल्‍प मास्‍करोबोट -मनोहर चमोली मनु'विज्ञान प्रसार से संबंधित खबरों की कतरनों में उलझे शिक्षक जलीस अहमद का मोबाइल लगातार घनघना रहा था। अनमने भाव से और लगभग झुंझलाते हुए उन्‍होंने मोबाइल पर कहा-‘‘हैलो। कहिए।'' मोबाइल से स्‍वर जलीस अहमद के कानों पर पड़ा। उन्‍होंने सुना-‘‘नमस्‍ते सर। मैं सुजाता। सर आज मैं बहुत खुश हूं।'' जलीस खुशी से चिल्‍ला ही पड़े-‘‘सुजाता! सुजाता पुरी न? अरे! भई तुम हो कहाँ। अचानक कहां गायब हो गई थी। इतने सालों बाद! कहाँ हो? कैसी हो?'' ‘‘दिल्‍ली में ही हूं। इण्‍डियन इनस्‍टिट्‌यूट्‌ ऑफ मिसाइल एंड टेक्‍नालॉजी में। बाकी बातें बाद में। फिलहाल आपके घर के बाहर काले रंग की एक कार खड़ी है। नंबर है, डी0एल0 2047. चालक आपको सीधे एयरपोर्ट ले आएगा। आपको विशेष विमान से यहां पहुंचना है। सर। अब हमारे देश के जवान सीमा की सुरक्षा करते हुए अकारण नहीं मारे जाएंगे। आप तो जानते ही हैं, मैंने पहले अपने पिता को और फिर दोनों भाइयों को खोया है। मैं सबसे पहले आपको ही इस नई खोज की परफॉरमेंस दिखाना चाहती हूं। आप....।'' जलीस अहमद प्रसन्‍न मुद्रा में ब…

श्याम गुप्त का आलेख - आधुनिक लिंग पुराण

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आधुनिक- लिंग पुराण... ( डा श्याम गुप्त...) विश्व की सबसे श्रेष्ठ व उन्नत भारतीय शास्त्र-परम्परा में --- पुराण साहित्य में मूलतः अवतारवाद की प्रतिष्ठा हैं निर्गुण निरा का र की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना का प्रतिपादन इन ग्रंथों का मूल विषय है । उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि आखिर मनुष्य और इस सृष्टि का आधार - सौंदर्य तथा इसकी मानवीय अर्थवत्ता में कही - न - कहीं सद्गुणों की प्रतिष्ठा होना ही चाहिए । उसका मूल उद्देश्य सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है। पौराणिक लिंग पुराण --- भारत में लिंग पूजा की परंपरा आदिकाल से ही है। पर लिंग-पूजा की परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं है , बल्कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आरंभ से ही इसका चलन यूनान में इस देवता को ' फल्लुस ' ( जिससे अन्ग्रेज़ी में फ़ैलस = शिश्न बना ) तथा रोम में ' प्रियेपस ' कहा जाता था । ' फल्लुस ' शब्द ( टाड का राजस्थान , खंड प्रथम , पृष्ठ 603) संस्कृत के ' फलेश ' शब्द का ही अपभ्रंश है , जिसका प्रयोग शीघ्र फल देने वाले ' शिव ' के लिए किया जाता है। मिस्र में' ओसिरिस &…

विष्णु प्रभाकर के पत्र सीताराम गुप्ता के नाम

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रचनाकार पर पोस्ट करने हेतु भेजने के लिए प्राप्त पुराने पत्रों को उलटते-पलटते हुए न केवल असंख्य पुरानी यादें ताज़ा हो गईं अपितु समय के साथ कितना कुछ बदल गया है इसका भी शिद्दत के साथ अहसास हुआ। हर पत्र बीती हुई घटनाओं का सबूत तथा इतिहास का दस्तावेज़ बनने के साथ-साथ पुनर्मूल्यांकन तथा नई गवेषणा अथवा अनुसंधान के लिए भी पर्याप्त आधार प्रस्तुत करने में सहायक बनता है। कभी-कभी हम जिस तथ्य को सामान्य समझने की भूल कर बैठते हैं वह विशिष्ट ही नहीं अति विशिष्ट होता है। विष्णु प्रभाकरजी के इस पत्र को ही लीजिए। दिनाँक 22:04:1986 को लिखे इस पत्र में विष्णु प्रभाकरजी लिखते हैं, ‘‘ भाई में कवि नहीं हूँ, इसलिए अपनी कोई कविता भेजना संभव नहीं होगा।’’ संयोग से कल ही (दिनाँक 28:05:2012 को) ‘‘आजकल’’ हिन्दी मासिक का जून 2012 अंक मिला। यह एक विशेषांक है जो विष्णु प्रभाकरजी पर ही केंद्रित है। विष्णु प्रभाकरजी का जन्म 21 जून सन् 1912 को हुआ था अतः ये उनका शताब्दी वर्ष है। ‘‘आजकल’’ हिन्दी मासिक के प्रस्तुत अंक में विशेष रूप से विष्णु प्रभाकरजी के कृतित्व तथा उनकी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है। उनकी कोई गद्य …

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बुंदेली लोक कथा - परिश्रम कौ फल

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परिश्रम कौ फल
बचपना बाकी बचो है अब भी  अपने पास में
                             कोई शायद फिर थमा दे झुनझुना,इस आस में
                             एक लोरी फिर सुना मां या सुना किस्सा कोई
                             जिंदगी प्यासी अभी तक सीखने की प्यास में।
               जे पंक्तियाँ हमईरी लिखीं आंयें और जब जब भी अम्मा की खबर आउत सो इनईं खों पढ़कें जी हल्को कर लेत। एक शायर सुदर्शन फाकिर साहब ने का खूब कई है बचपन के बारे में के "ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की किश्ती वो बारिश का पानी" फाकिर साहब की ई गज़ल खों लोग बाग जगजीत सींग की गज़ल केत हैं काये सें उनने जा गज़ल बड़े सुंदर ढंग सें गाकें खूब शोहरत बटोरी। सब कछू चलो जाये और बचपनों फिर मिल जाये तो का केने।पे ऐसो होत नईंयाँ। बचपन के बे दिना भूलत नईंयाँ जब दूसरों के बगीचा सें आम चुराउत पकड़े जातते और बागवान के हातन  पिटत हते। अंडा डावरी ,अब्बक दब्बक दांय दीन,अटकन चटकन दही चटाकन और पिट्टू की खबर आउत सों आंखन में खुसी के अंसुआ आ जात । मोखों तो लगत है के बुंदेल की भू…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कथा - समाचार - कथा की

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कथा-समाचार -कथा की वे तीन थे। अलग अलग जगहों पर काम करते थे। एक एक अखबार में था। दूसरा एक स्‍थानीय चेनल में था और तीसरा कला-साहित्‍य-संस्‍कृति का स्‍थायी समीक्षक और अस्‍थायी लेखक था। सवेरे से वे तीनों ताजा समाचार, या बासी बाइट की तलाश में घूम रहे थे। उन्‍हें बेहद गुस्‍सा आ रहा था। इस सड़ियल शहर पर जहां पर अखबार या चैनल का पेट भरने के लिए एक शानदार ना सही कमजोर सी समाचार कथा भी नहीं मिल रही थी। तीनों हैरान-परेशान थे। समाचार, सम्‍पादक या चैनल रुपी दैत्‍य का पेट भरने के लिए वे भटक रहे थे, अन्‍त में तीनो इस नतीजे पर पहुँचे कि सर्व प्रथम चैनल पर एक देह धर्मिता की वाइट दिखाई जाये फिर उस बाइट पर समीक्षक को विशेषज्ञ के रुप में दिखाया जाये और अन्‍त में चल कर संवाददाता इस पूरे प्रकरण पर एक सचित्र समाचार लगा देगा। देह-धर्मिता से चर्चा-धर्मिता और अन्‍त में रचना-धर्मिता का ऐसा घाल-माल हो जायेगा कि पाठक या दर्शक सब वाह वाह या आह आह कह उठेगा। योजना-अनुसार वे फिर बाइट की तलाश में सड़कों पर भटकने लगे। आखिर बाइट मिली। और कार्यवाही शुरु हुई। कैमरा मेन ने शाट लिया। और चल पड़े। इस पूरे मामले में एक गड़बड़…

मंजरी शुक्ल की कहानी - रिहाई

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डॉ. मंजरी शुक्ल उ.प्र. बहुत बचपना था उसमें मानो ओस की बूंद शरमाकर मिटटी की सोंधी खुशबू लेने के लिए गीली धरती पर चुपके से मोती बन गिरी और आसमान में उमड़ते हुए बादल उसे देखकर पकड़ने के लिए घुमड़ता हुआ चला आये। पर इन सब बातों से बेखबर वो अपनी इक छोटी सी दुनिया में मस्त रहती जहाँ पर एक दियासलाई और उसकी एकमात्र पुरानी लालटेन वक्त के अँधेरे को दूर करने के अथक प्रयास में लगे रहते पर कभी कामयाब न हो पाते। ज्योति हाँ, यहाँ नाम तो था उसका जीवन की अंधियारों में भटकने के लिए नाम के अनुरूप और कुछ न था उसके पास। जब पहली बार उसे देखा तो वह शायद अपनी माँ के साथ स्कूल जा रही थी , पर कहते है उसकी माँ की एक चट्टान से गिरकर मौत हो गई थीं। माँ के मरने के बाद मानो उसके सारे सपने और आकंशायें भी मरने चली गई और इस भरी दुनिया में वह अकेली रह गई। बहुत दिनों से सब देख रहे थे कि वह दिन भर उन के गोले बनाती रहती। उजली सुबह के साथ जब वह गुलाबी उन का गोला अपनी नाजुक पतली उँगलियों में लपेटती तो सामने से गुजरने वाले व्यस्त राहगीर भी एक बार रुक कर उन जादुई हाथों को मन ही मन जरूर सलाम करते और कम से कम एक स्वेटर खरीदने क…

प्रमोद कुमार चमोली की कहानी - जाल

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मरूस्‍थली इलाकों में वर्षा आधारित खेती। वर्षा क्‍या वर्षों में कभी-कभी। बरानी खेती का अंजाम ये कि चार-पाँच साल अकाल तो, फिर कभी मेहरबानी हो इन्‍द्रदेव की तो वर्षा। पिछले चार-पांच वर्षों से यह क्रम बदला। इन्‍द्रदेव ने मरूस्‍थल पर अपना प्‍यार लगातार बरसा दिया। बरानी फसलें लगातार चार पांच साल से अच्‍छी हो रही है। बुजुर्गों को अपनी जिन्‍दगी में पहली बार लगातार जमाना देखने को मिला। ‘वाह रे तेरी लीला।'' चार-पाँच साल मोठ-बाजरी की फसल बेच कर कुछ पैसा इकट्‌ठा कर लिया है राजाराम ने। राजाराम का सपना था कि वो अपने खेत पड़ौसी सांवरे की तरह एक दिन ट्‌यूबवैल खुदवा कर खेती करेगा। अब पैसा पास हो तो सपने पूरे करने की हिम्‍मत आ ही जाती है। राजाराम ने सोच लिया अब तो खेत में ट्‌यूबवैल की बोरिंग होकर ही रहेगी। पर पहली बाधा पिताजी को तैयार करना था। राजाराम ने अपना प्रस्‍ताव पिताजी के सामने रखा। जीवन के अस्‍सी बंसतों का अनुभव रखने वाले पिताजी ने मना कर दिया और कहा कि बेटा ‘हमारे पुरखे बरानी ख्‍ेाती करते आये हैं। इस धरती में पानी होता तो वो कुआं नहीं खोदते। यहाँ पानी पाताल तोड़कर आता है। पानी इतना ही …

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - जाँच की महामारी

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आजकल हर दिन सरकार की ओर से एक आश्‍वासन मिलता है- अगर कहीं गलत हुआ है तो जांच करायेंगे। जांचें जारी रहती हैं। परिणाम कभी नहीं आते। हर गलत काम की प्राम्‍भिक जांचें होती हैं और स्‍थायी परिणाम ये आता है कि जांच में कोई अनियमितता नहीं पाई गई। सरकारी धन का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ केवल कुछ सामान्‍य प्रक्रिया का उल्‍लघंन हुआ जो कि सरकार में एक सामान्‍य प्रक्रिया है। प्रक्रिया में भी सरकार की मंशा अच्‍छी थी। सम्‍बन्‍धित मंत्रियों, अफसरों के इरादे नेक थे। कार्यो को तेज गति से पूरा करने तथा बजट का शीघ्र व प्रोपर उपयोग करने में सब चलता है। जांच एजेन्‍सीज का काम है जांच करना और सरकार का काम है विकास के कार्यो को तेजी से पूरा करना। मार्च में तो करोड़ो अरबों रुपयों को सरकार अन्‍य संस्‍थाओं को देकर लेप्‍स होने से बचा लेती है और धीरे धीरे जांचें चलती रहती हैं। सरकार हर जांच के बाद कहती है दोषियों को बक्‍शा नहीं जायेगा। दोषियों को सजा मिलेगी। सरकारी धन वापस वसूल किया जायेगा। मगर होता कुछ नहीं है। कई बार जांच के बाद रिपोर्ट के बारे में अफसर या मंत्री कह देते है-मैं तो अभी आया हूं। अभी अभी जोईन किया है। म…

चाचा जी की चिट्ठी सीताराम गुप्ता के नाम

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अब उपरोक्त पत्र को ही लीजिए जो बहुत कम लोगों द्वारा समझी जाने वाली लिपि में लिखा गया है। भाषा तो स्वाभाविक है हिन्दी ही है लेकिन इस लिखावट को मुण्डी हिन्दी कहा जाता है। इसमें मात्राएँ न के बराबर हैं। केवल व्यंजनों से काम चलाना पड़ता है। किसी प्रकार के विराम चिह्नों का प्रयोग भी नहीं किया जाता। अत्यंत अवैज्ञानिक है ये लिपि अतः यदि पढ़नेवाला ग़लत पढ़ जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। आज कंप्यूटर के दौर में भी वैश्य समुदाय के अनेकानेक लोग और मुनीम वग़ैरा बही-खाता करने के लिए इस लिपि का इस्तेमाल करते हैं। इस लिपि को सीखना अत्यंत सरल है। मात्र एक-डेढ़ घण्टे के अभ्यास द्वारा इसे पढ़ना और लिखना सीखा जा सकता है। मैंने बचपन में इस लिपि को सीख लिया था लेकिन इस्तेमाल न होने के कारण भूल जाता था। कभी ज़रूरत पड़ती तो उसी वक़्त दस-पाँच मिनट में दोबारा सीख लेता और अपेक्षित कार्य सम्पन्न कर लेता। वही सिलसिला अद्यतन जारी है। उपरोक्त चिट्ठी को पढ़ने में आज भी मुझे आठ-दस मिनट लग ही गए। चाचाजी छत्तीसगढ़ के एक गाँव में रहते थे और हम दिल्ली में। हमारे बीच संपर्क का साधन ये चिट्ठियाँ ही होती थीं। चाचाजी की चिट्ठियाँ आती …

देवेन्द्र पाठक ' महरूम ' की कविताई - 2 मुक्तिकाएँ

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मुक्तिका - बिना समर्पण भक्ति नहीँ है । भक्ति नहीँ तो मुक्ति नहीँ है ॥ करुणाहीन हृदय हो यदि तो ; कुछ सार्थक अभिव्यक्ति नहीँ है॥ कथ्य- वाक्य हैँ अर्थहीन सब ; यदि उपयुक्त विभक्ति नहीँ हैँ ॥ परिचित स्वयं से हो जो पूर्णतः ; ऐसा कोई व्यक्ति नहीँ है ॥ स्वानुभूति 'महरूम' न हो तो ; प्रा माणिक कोई उक्ति नहीँ ॥ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ मुक्तिका कटु सत्यपान-भय से अस्वस्थ हो गए | अपदस्थ हो त्रिशंकु-से अधरस्थ हो गए ॥ दायित्वभार-वहन कर सके न इसलिए: पद त्याख कर सन्यास मेँ पदस्थ हो गए || अवसानासन्न पापतिमिर- यामिनी निरख ; बक के सदृश कूल पर ध्यानस्थ हो गए || चलते हैँ तांत्रिकोँ के तंत्र शक्ति से जिनकी ; वे बीजमंत्र उनको भी कंठस्थ हो गए ॥

मोतीलाल की कविताएँ - बादल की बहार, मैं लौटूंगा

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बादल की बहारखोई हुई प्रतिध्वनितैरने लगे हैँ तालाब मेँ बाढ़ मेँ बहते झाड़-झंकार छाती की जेब मेँ समा जाते हैँ और नीरव वेदना की वाणी सारे समुद्र का पानी सोखकर विस्मृति की परछाईयोँ मेँ बादल बन उड़ जाते हैँ कि है अभी भी बहुत कुछ अनजाने जिसे मेरे आकाश ने नहीँ जाने हैँ अंधेरे मेँ मैंने देखा सफेद बादल का टुकड़ा आकाश के सूने थाल पर आसानी से चला जाता है जैसे कोई नाव शांत समुद्र मेँ बही जा रही हो आसमान सील जाता है जैसे दरजिन चिड़िया सीती है अपने लिए घर और टांकोँ की जगह तारे मुस्काते हैँ बादलोँ से बने धागे मुझे बैठा देता है चाँद से बने टोपी पर कि आँखोँ की पुतलियोँ के कोर मेँ कोई स्वर अंधेरे मेँ फूट पड़े जैसे फूटते हैँ हमारे गुलाब सूर्य की किरणेँ पाकर मैँ नहीँ होता तब भी तारोँ भरा आकाश मौन रहता स्मृति और आशंका से लिपटे सपने तब भी टंगे होते आकाश मेँ और विशाल वेदना की पुतलियोँ मेँ मैँ होता उसी बादल के भीतर खोजता हुआ अपने आँचल के पानी को । -- मैं लौटूंगामैँ लौटूंगा जरुर एक दिन
नदी के तट पर बसे अपने गाँव मेँ हो सकता है मैँ आदमी न रहूँ
तब मेरे गाँव की नदी मुझमेँ उतर जाए और …

गिरिजा कुलश्रेष्ठ की बाल कहानी - सूराख वाला गुब्बारा

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सूराख वाला गुब्बारा ----------------------- बात बहुत पुरानी है। तब धरती और सूरज बच्चे ही थे। वे साथ-साथ खेलते थे। साथ-साथ खाते थे। और दूसरे बच्चों की तरह झगड़ते भी थे। सूरज जितना तेज-तर्रार था धरती उतनी ही शान्त और खुशमिजाज थी। सूरज अक्सर उसका टिफिन खा जाता था और पानी की बोतल खाली कर देता था। "जरूरत होगी तब मैं एक बोतल की चार बोतलें दूँगा।"---सूरज यह कह कर हँसते हुए धरती को समझा देता था। सूरज और धरती की एक नानी थी --नीहारिका। एक बार नानी ने धरती को उसके जन्मदिन पर उपहार में एक सुन्दर गुब्बारा दिया।वह एक अनोखा गुब्बारा था। एकदम फुटबाल सा गोल था। और रोहू मछली के पेट की तरह चमाचम चमकता था। "वाह ,इतना सुन्दर गुब्बारा....!" धरती खुशी से फूली न समाई। "यह चाँदी सा चमकता है इसलिये मैं इसे चाँद कहूँगी।" "जरूर कहना" --नानी मुस्कराई---"लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हवा भरी रहे। क्योंकि इसके चमकने के लिये जरूरी है कि यह फूला रहे। इसमें जितनी हवा भरी होगी यह उतना ही चमकेगा। हवा न रहने पर यह बिलकुल नहीं चमकेगा।" "अच्छा नानी माँ।"- कहती हुई धरती…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - आई पी एल का तमाशा

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आई․ पी․ एल․ का तमाशा तमाशा शुरु हो गया है। चार हजार करोड़ रुपये तो केवल टीवी प्रसारण से मिलेंगे। भ्रष्टाचार के तयशुदा मानकों के अनुसार लगभग बीस प्रतिशित राशि अफसरों की जेब में जायेगी। फिर जांचें होगी, कुछ छुट भैय्‌ये फंसेगें और खेल चलता रहेगा। अमिताभ बच्‍चन फिर प्रसून जोशी की कविता पढ़ेगें और शो जारी है कि आवाज आती रहेगी। कौन कहता है हमारे खिलाड़ी थक गये हैं। वे तो आई․ पी․ एल․ के लिए टेस्‍टमैचों व एक दिवसीय मैचों में विश्राम कर रहे थे, अब वे बिलकुल तरो ताजा है, पैसा दो रन लो। काश सचिन तेन्‍दुलकर एक ऐसा शतक भी लगाता जिससे भारत जीत जाता। मगर आम आदमी की कौन सुनता है। उन्‍हें तो तेल, साबुन, कोल्‍डडिक, क्रीम बेचने से ही फुरसत नहीं है। बचे हुए समय में वे अपने पैसों को और ज्‍यादा बढाने के लिए सी․ए․सी․एस․ कर सलाहकारों से बात-चीत में व्‍यस्‍त रहते हैं। राहुल द्रविड़ की विदाई पार्टी फीकी रहती है मगर मुकेश अम्‍बानी की पार्टी के चर्चे महीनों होते रहेंगे। वहाँ सब एक प्रभामण्‍डल वाले नव धनाठ्‌य वर्ग के लोग होते हैं। कामनवेल्‍थ के घोटालों से निपट कर जाचं एजेन्‍सीय आई․पी․एल․ की और ध्‍यान देगी, वैसे …

उर्दू शायर कृष्ण मोहन का खत सीताराम गुप्ता के नाम

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अंग्रेज़ी-उर्दू में लिखित इस खत में जो उर्दू ग़ज़ल कृष्‍ण मोहन साहब ने लिख भेजी है उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण भी संलग्‍न हैः ग़ज़लमैं क़तीले- सिनाने- अब्रू हूँ, शायरे - इश्‍क़बाज़े - उर्दू हूँ। नाच के बाद उतार फेंका हो, नर्तकी ने जिसे वो घुँघरू हूँ। खुश हूँ थोड़-सी रोशनी पाकर, मैं शबे-आरजू का जुगनू हूँ। मैं रिवायत के बंद कमरे में, बंद कैसे रहूँ कि खुशबू हूँ। हो कोई कितना ही सितेज़ाकेश, मैं हमेशा कुशादाबाजू हूँ। कब मिरा दिल लगा है दुनिया से, मैं गृहस्‍थ आश्रम का साधू हूँ, कृश्‍नमोहन उदास है जीवन, यास का यात्री हूँ, भिक्षु हूँ। -कृष्‍णमोहन शब्‍दार्थ ः क़तीले-सिनाने-अब्रू = प्रेयसी की भौंहों की नोक का मारा सितेज़ाकेश = युद्ध पसंद लड़ाई-झगड़े को तत्‍पर कुशादाबाजू = हाथ खोले हुए अर्थात्‌ स्‍वागतोत्‍सुक संकलन, लिप्‍यंतरण एवं प्रस्‍तुति ः सीताराम गुप्‍ताए․डी․-106-सी, पीतमपुरा, दिल्‍ली-110034 फोन नं․ 011-27313679/9555622323 srgupta54@yahoo.co.in

ज्ञानप्रकाश विवेक का पत्र

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संजीव ठाकुर का पत्र

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अनवर सलीम का पत्र

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अम्बिका दत्त का पत्र

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सोहन शर्मा का पत्र

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स्वयं प्रकाश का पत्र

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प्रवीण पंकज का पत्र

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सुभाष चन्द्र कुशवाहा का पत्र

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कमलेश्वर का सीताराम गुप्ता के नाम पत्र

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प्रस्तुति:सीताराम गुप्ता

शैलेश मरजी कदम का आलेख - पत्रकारिता में अनुवाद : विविध संदर्भं

प्रस्‍तावना ः-वर्तमान समय में मीडिया की अनुवाद आवश्‍यकता बन गई है। मीडिया सीमा विहीन है। इसलिएमीडिया को भौगोलिक सीमा को भूलकर अपने पाठाकों की भाषा में समाचारों को प्रस्‍तुत करना होता है। विश्‍व और भारत में भाषाई विविधता के कारण यह प्रस्‍तुतिकरण मात्र अनुवाद से संभव है। सामान्‍यतः देश विदेश के समाचार वहां के समाचार ऐजेंसियों द्वारा उस देश की अपनी मूल भाषा में विश्‍व के अन्‍य देशों के समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजे जाते हैं। विदेशी भाषा में प्राप्‍त इन समाचारों को अनूदित करके प्रत्‍येक देश के समाचार पत्र इसे अपनी भाषा या भाषाओं में प्रकाशित करते हैं। उदाहारण के लिए रूस, चीन, जापान, फ्रांस, अमेरिका अथवा इंग्‍लैण्‍ड से समस्‍त समाचार न तो अंग्रेजी भाषा में प्राप्‍त होते हैं, और न हिंदी और भारतीय भाषाओं में। यह उस देश की अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे होते हैं। इन सभी समाचारों को अनूदित करके देश विशेष की भाषा में वहां के समाचार पत्र प्रकाशित करते हैं। इसलिए पत्रकारिता और अनुवाद का अंतरसंबंध बहुत घनिष्‍ट और नजदीकी है। विश्‍वपटल और भारत में भाषाई विविधता होने के नाते पत्रकारिता में समाचार की …

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रवि रतलामी

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