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दिलीप कुमार का शशांक मिश्र भारती के नाम पत्र

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सूरजपुरी की कविताएँ और गीत

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याद के बादल.(गीत) हृदय-आकाश पर मेरे,छितरकर छा गए बादल, तुम्हारी याद के बादल. ! लरज के,साथ गरजन के,बदरिया छा गई उर पे, कि जैसे याद के पाहुन,भटककर आ गए घर पे, कि भूलों की सगाई, याद से करवा गए बादल, तुम्हारी याद के बादल ! घहरकर छा रही बदरी,मिलन को कर रही इंगित, तडपकर टूटती बिजुरी,धडक कर मिल गए दो दिल, कि बिजली की तडप से दिल जुडाते आ गए बादल, तुम्हारी याद के बादल ! घटा ने थाम ली ढपली,कि बूंदे गा रही कजली, “बिदेसिया पी नहीं आए”-कोयलिया दर्द से बोली तुम्हारे दर्द से रिश्ता,बंधाते आ गए बादल, तुम्हारी याद के बादल ! तुम्हारी याद, बीते पल सजाकर इस तरह बैठी, कि जैसे कोई बिरहन रात में दियना जला बैठी, तुम्हारी याद को बांधे,उतारे जा रहे बादल, तुम्हारी याद के बादल ! प्रीत के छन्दअधर पर खिले प्रीत के छन्द मुस्कान बनकर सजन अब कौन सी व्यथा मन की बेचैन हो रह गई मौन पलकों की सेज पर महक उठे सपने एक याद बनकर सजन अब कौन टीस रह गई गलहार बनकर घटायें सावन की पलकॊं मे सिमट रह गई मूक बनकर सजन अब कौन सी व्यथा रह गई प्यास बनकर अलकॊं मे बांधकर मलयज हौले से शुन्य अब संसार हुआ सजन अब कौन हार हार…

मुल्ला नसरूद्दीन के चुटकुले : 11-20

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चुटकुले 1 - 10 यहाँ पढ़ें11भरपूर युवा और खूबसूरत युवती ने मुल्ला से कहा कि वो मुल्ला से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है.मुल्ला ने उसका कोमल हाथ उतनी ही कोमलता से अपने हाथों में लिया और पूछा - प्रिये! क्या तुमने अपने मम्मी पापा को मेरे बारे में बता दिया है कि मैं एक 'ब्लॉगर-कवि' हूँ?'अभी तो नहीं बताया है प्रिये', उसने प्यार उंडेलते हुए कहा - 'अभी तो मैंने तुम्हारे जुआ खेलने और दारूबाजी की आदतों के बारे में ही बताया है. वो क्या है ना, सभी चीजें एक साथ बता देने में खतरा थोड़ा खतरा है'--12मुल्ला नसरूद्दीन ग्रीटिंग कार्ड की दुकान पर पहुँचा और कार्ड देखने लगा.सेल्सगर्ल पास आई और बोली सर, किसके लिए चाहिए कार्ड?अपनी प्रेमिका के लिए - नसरूद्दीन ने कहा.सेल्सगर्ल ने एक कार्ड निकाला और मुल्ला को दिखाते हुए कहा - ये देखिये, इसमें कितना सुंदर लिखा है - मेरी एकमात्र प्रेमिका के लिए जिसे मैं जी जान से चाहता हूँ...! वाह! ये तो बढ़िया है - एक दर्जन दे दो - मुल्ला ने कहा.--13"तुम आज फिर मुल्ला से झगड़ा कर रही थी...""हाँ, उसने आज फिर से मुझे प्रपोज़ किया था…

गोवर्धन यादव का आलेख - कहानी पोस्टकार्ड की

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डाक का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है. उस समय एक राजा दूसरे राज्य के राजा तक अपना संदेश एक विशेष व्यक्ति जिसे दूत कहा जाता था, के माध्यम से भेजते थे. उन दूतों को राज्य की ओर से सुरक्षा तथा सम्मान प्रदान किया जाता था. महाकाव्य रामायण तथा महाभारत में कई प्रसंगों में संदेश भेजे जाने का उल्लेख प्राप्त होता है. राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता और राम के विवाह होने का संदेश राम के पिता दशरथ को भिजवाया था. रावण की राजसभा में श्रीराम का सन्देश लेकर अंगद का जाना, इस बात का प्रमाण है.. महाभारत में श्रीकृष्ण का कौरवों के लिए पांच गांव मांगने जाना तथा अनेक राज्यों में पांडवों तथा कौरवॊं के पक्ष में, युद्ध में भाग लेने के लिए संदेश पहुँचाना, जैसी कोई डाक व्यवस्था उस समय काम कर रही होगी. अन्य प्रसंगों में राजा नल द्वारा दमयन्ती के बीच सन्देशों का आदान-प्रदान हंस द्वारा होने का वर्णण आता है. महाकवि कालीदास के मेघदूत में दक्ष अपनी प्रेमिका के पास मेघों के माध्यम से सन्देश पहुँचाते थे. एक प्रेमी राजकुमार अपनी प्रेमिका को कबूतरों द्वारा पत्र पहुँचाते थे. खुदाई के दौरान कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली है…

गोवर्धन यादव का आलेख - जल प्रदूषण को रोकने के उपाय

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वर्तमान युग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव इस युग में मानव को आश्चर्यजनक साधन उपलब्ध कराने में सफ़ल रहा है. लेकिन मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का इस ढंग से इसका उपयोग किया है,जिससे पारिस्थितिकी संतुलन गडबडा गया,जिसके फ़लस्वरुप भौतिकवाद एवं प्रकृतिवाद के बीच समन्वय तथा सहयोग का संबंध प्रायः समाप्त हो गया है.. इस कृत्य के लिए प्रौद्योगिकी दोषी नहीं है. विज्ञान एवं टेक्नोलाजी मानव की इच्छानुसार सुविधा प्रदान करने को तैयार है. परन्तु मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थ पूर्ति हेतु विज्ञान एवं टेक्नोलाजी द्वारा आर्थिक लाभ हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करने का प्रयास किया है. आज की भौतिकतावादी संस्कृति के पोषक मानव ने विलासिता और व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति हेतु इनका दुरुपयोग करते हुए पर्यावरण का विध्वंस कर दिया है. आज हम पंचमहाभूत, आकाश, पृथ्वी, जल,वायु और अग्नि को नमन करने की बजाय प्रदूषित कर अपने जीवन दर्शन एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिरोध कर रहे हैं. वेद और इतिहास साक्षी है कि हमने सदैव प्राकृतिक संसाधनों की पूजा की है. वेदों में कहा गया है कि जो अग्नि, जल, आकाश, प…

गोवर्धन यादव का आलेख - कूट संकेतों की दुनिया

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कूट संकेतों की दुनिया. आइये, मैं आपको कूट संकेतों की रहस्यमय दुनियां में ले चलूं . एक यन्त्र जिसने लगभग समूची दुनिया में एक- छत्र राज्य किया. उस यंत्र से डैश-डाट, डैश-डाट लगातार बजता रहता था ,और उन संकेतों का जानकार, उसे अपनी भाषा में लिपिबद्ध करता चलता था. उस यंत्र का नाम था “मोर्स साउन्डर” और जिससे उसे संचालित किया जाता था, का नाम” मोर्स की” कहलाया. एक समय वह भी था,जब आदमी को अपने दूर-दराज में बैठे किसी व्यक्ति को कोई जरुरी खबर देनी होती थी, तो उसके पास कोई साधन नहीं थे. आम साधारण आदमी बाजार-हाट में, अपने किसी परिचित को पाकर,उसके हाथ मौखिक अथवा लिखित समाचार दे देता था,और कहता था कि अमुक आदमी तक इसे पहुँचा देना. वह यह नहीं जानता था कि वह पत्र उस आदमी तक पहुँचाया गया अथवा नहीं. वह यह भी नहीं जान पाता था कि उसकी बात गुप्त भी रह पाती है,अथवा नहीं. हाँ, राजा-महाराजाओं के समय में उन्होंने अपने तरीके इजाद कर लिए थे और वे कुछ हद तक उसमें सफ़ल भी रहे थे. लेकिन बावजूद इसके उसमें समय ज्यादा नष्ट होता था. अमेरिका के चार्ल्स टाउन( मेसाच्सेट्स) में 27 अप्रैल 1791 में एक बालक ने जन्म लिया,जिसका ना…

कामिनी कामायनी की कविताएँ

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1 बदलते समय का एहसास
यह सहज था
कि तुम्हारे आँसू देख
मेरी आँखें रो पड़ती
तुम्हारे बहते खून से
मेरा जिगर लहूलुहान हो जाता
तुम्हारी यातनाएं
मेरे गृह त्याग का कारण बन जाता
पर
ऐसा कुछ नहीं हुआ
होता भी कैसे
नए और पुराने संबंधों का
अंतराल
टकराकर
इतने शुष्क हो गए हैं कि
तुम तुम न रहे
मैं मैं  नहीं
एक नकारे अस्तित्व के लिए
छटपटाते
हम
तुच्छ मकोड़े रह गए हैं।     2 धूलकण
हवा में तैरते
धूलकणों की तरह
भटक रहे हैं निरर्थक
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ
फंस गए किसी रेशे में
जम गए किसी घर
आँगन
गलीचे पर
बुहार दिए गए
फिर तैरते हैं
कहीं न कहीं
स्थाई होने के लिए
कोई तो कहे
आखिर नियति क्या है हमारी
स्थायित्व पाना
या
यूं ही व्यर्थ उड़ना।    3.गौरैया और आदमी
चोंच में दबाए
खर
पतवार
सींक झाडू के टुकड़े
खिड़की
दरवाजों पर मॅडराती चिड़िया
आलमारी
तस्वीरों के पीछे
बंद पड़े पंखे
या रोशनदान में ही
डाल देती है
अपनी नीड़ की नींव
एक मौसम में घर बनाने की लालसा
गौरैया के अदम्य उत्साह सी
फूट पड़ती है हर किसी के अंदर
पर
घास फूस तिनके डालने से ही
घर नहीं बन जाती
यह जानते हैं पाखी और आदमी भी
इसलिए
हर सुबह जब
बुहार कर फेंक दिए जाते हैं तिनके
गौरैया के साथ उदास तब
होता है आदमी भी ।।

गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण : यात्रा अमरनाथ की

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आपने अब तक अपने जीवन में अनगिनत यात्राएं की होगी,लेकिन किन्हीं कारणवश आप अमरनाथ की यात्रा नहीं कर पाएं है, तो आपको एक बार बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों के लिए अवश्य जाना चाहिए. दम निकाल देने वाली खडी चढाइयां, आसमान से बातें करती, बर्फ़ की चादर में लिपटी-ढंकी पर्वत श्रेणियां, शोर मचाते झरने, बर्फ़ की ठंडी आग को अपने में दबाये उद्द्ण्ड हवाएं,जो आपके जिस्म को ठिठुरा देने का माद्दा रखती हैं,कभी बारिश आपका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है,तो कहीं नियति नटि अपने पूरे यौवन के साथ आपको सम्मोहन में उलझा कर आपका रास्ता भ्रमित कर देती है, वहीं असंख्य शिव-भक्त बाबा अमरनाथ के जयघोष के साथ,पूरे जोश एवं उत्साह के साथ आगे बढते दिखाई देते हैं और आपको अपने साथ भक्ति की चाशनी में सराबोर करते हुए आगे,निरन्तर आगे बढ़ते रहने का मंत्र आपके कानों में फ़ूंक देते हैं. कुछ थोड़े से लोग जो शारीरिक रुप से अपने आपको इस यात्रा के लिए अक्षम पाते हैं, घोड़े की पीठ पर सवार होकर बाबा का जयघोष करते हुए खुली प्रकृति का आनन्द उठाते हुए,अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं. सारी कठिनाइयों के बावजूद न तो वे हिम्मत हारते हैं और न ही जिनका मनोबल…

गरिमा जोशी पंत तथा मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

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गरिमा जोशी पंत की कविताएँगुलदाऊदी लगाऊंगीइस बार मैं भी गुलदाऊदी लगाऊंगी। हां मैं भी मेरा घर बहुत छोटा है उसमें कोई बगीचा नहीं तो क्या गमले में लगाऊंगी हां इस बार मैं भी गुलदाऊदी लगाऊंगी। बड़े बड़े गुंदे फूल लगेंगे सफ़ेद पीले अलग से लाल सफेद से झांकते गुलाबी भी इस आशा से गुलदाऊदी लगाऊंगी कैसे कब लगती है पौध खांचेदार पत्तियां कब बड़ी हो जाती हैं खब कलियां आती हैं कब कब पानी से सीचूंगी इधर उधर से पूछूंगी पर मैं अवश्य ही गुलदाऊदी लगाऊंगी। कीटों से बचाने उन्हें नीम की पत्तियों का काढ़ा पिलाऊंगी। धूप आंधी से बचाने अपनी तन्मय देखभाल का आंचल फैलाऊंगी हंा मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी। और फिर एक दिन कलियां आएंगी रंगबिरंगे फूल खिलेंगे और फिर मैं भी अमीर आधुनिकाऔं की तरह ञ्ल्के फुल्के कपद़े पहने अपनी सखियों को उन्हें दिखाने बुलाऊंगी जब मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी और कुछ ना सही उन्हें पकौड़ों के संग चाय पिलाऊंगी जश्न होगा नकली ही सही पर कहकहे लगेंगे उस हंसी को खोजने और बंाटने के लिए मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी। मुस्कुराने का बहाना ढूंढना है मुस्कुराते फूलों में मिल जाएगा कड़ी मेहनत के बाद मुस्कुराते फूलों में मिल जाएगा इसलिए…

सन्तोष कुमार सिंह की बाल कविताएँ - बादल, धूप

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1․बादल
रोज निहारूँ नभ में तुझको,
काले बादल भैया।
गरमी से सब प्राणी व्‍याकुल,
रँभा रही घर गैया॥पारे जैसा गिरे रोज ही,
भू के अन्‍दर पानी।
तल-तलैया पोखर सूखे,
बता रही थी नानी॥तापमान छू रहा आसमां,
प्राणी व्‍याकुल भू के।
बिजली खेले आँख मिचोली,
झुलस रहे तन लू से॥जल का दोहन बढ़ा नित्‍य है,   
कूँए सूख गए हैं।
तुम भी छुपकर बैठे बादल,
लगता रूठ गए हैं॥गुस्‍सा त्‍यागो, कहना मानो,
नभ में अब छा जाओ।
प्‍यासी नदियाँ भरें लबालव,
इतना जल बरसाओ॥छप-छप, छप-छप बच्‍चे नाचें,
अगर मेह बरसायें।
हर प्राणी का मन हुलसेगा,
देंगे तुम्‍हें दुआयें॥
------------------
(2) धूप
जाने कब घुसती खिड़की से,
कमरे में ये प्‍यारी धूप।सुबह को मीठी आती नींद।
मुझे बहुत ही भाती नींद॥सोती रहती, सोती रहती,
मुँह को चूमे न्‍यारी धूप।देख रही में अपना पिटना।
समझ रही मैं देखूँ सपना॥पीट रही माँ कहती अब उठ,
लगी लौटने सारी धूप।जाड़े में लगती है प्‍यारी।
धूप सेकना है हितकारी॥पर सरदी में ये हो जाती,
बहुत बड़ी नखरारी धूप।मन को कभी सुहाती धूप।
तन को कभी जलाती धूप॥बिना कहे संध्‍या को जाती,
ऐसी है बजमारी धूप।
---------
सन्‍तोश कुमार सिंह
कवि एवं बाल साहित्‍यकार
मथुरा।
मोबाइल 94568…

हीरालाल प्रजापति की कविताएँ व ग़ज़लें

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ग़ज़ल 21क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के , जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ II ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी , उनका दिल तक कर हसीनाओं को न धड़के यहाँ II कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ , अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ II कुछ कुसूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो , रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ II उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें , जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ II पहले थर्राते थे दरवाज़ो शज़र तूफाँ से सच , खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ II  कविताएँ(1) अगर तुझे कवि बनना हैकविता के लिए विषय ढूंढना / निशानी नहीं है/  कवि होने की/ कविता तो परिभाषित है/  कवि कर्म रूप में / फिर क्यों इतनी परवाह विषय की / प्रेरणाओं के तत्वों की / कविता लिखने का संकल्प मात्र / कविता को जन देगा / तू लिख .....और सुन....... गोल पत्थर को छील काट कर / फ़ुटबाल बना देना / लम्बोतरे को  डंडा या खम्भा / या टेढ़े मेढ़े को  सांप बना देना / म…

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - छल

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मोहनी राधिका से कह रही थी ‘देख बेटी परिवार के बुजुर्ग तुम्हें कॉलेज भेजने के खिलाफ थे। लेकिन मैंने सबको समझा-बुझाकर मना लिया कि मोहल्ले की किसी एक लड़की की गलती की सजा सभी लड़कियों को देना कहाँ का न्याय है ? कुछ भी हो अपनी राधिका वैसी नहीं है। उसको हमने अच्छे संस्कार दिए हैं। वह हम लोगों का नाम रोशन करेगी। अतः बेटी हमारी लाज रखना। सुमन की तरह कुछ मत करना कि समाज में हम लोगों की नाक नीची हो’। राधिका बोली ‘क्या आपको मुझपे विश्वास नहीं है ? माँ जी मैं कसम लेती हूँ कि कभी भी और कुछ भी आप से नहीं छुपाऊँगी। और न ही कुछ ऐसा करूँगी जिससे आपको अपने निर्णय पर पछताना पड़े’। राधिका कॉलेज जाने लगी। फर्स्ट ईयर पास भी कर लिया। छुट्टी चल रही थी। और छाया नामकी उसकी किसी सहेली का फोन अक्सर आया करता था। एक दिन मम्मी को समझा-बुझाकर और छाया का जन्मदिन बताकर वह छाया के घर भी गई थी। एक दिन उसकी माँ एक रेस्तरां में बैठी हुई थी। वहाँ पर दो लड़के आपसे में झगड़ सा रहे थे। बीच-बीच में वे राधिका नामकी किसी लड़की का नाम ले रहे थे। इसलिए मोहनी उनकी बात ध्यान से सुनने लगी। उनमें से एक बोला ‘मोहन तुमने आज कमसे कम दो सो…

कविताएँ और ग़ज़लें

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मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ व गीत :वो सागर पीकर भी, प्यासा ही रहा ! मै बूंद से गला , तर करती गयी !  --- जब मेरा जिक्र आया तो तेरी आँखों में नमी क्यों खामोश रही  जुबान जो बरसों, आज बोलने को बेताब क्यों जख्मों को छिपाए रहते थे आज हर एक को दिखते क्यों -- आज सूरज को मैंने , अँधेरी कोठरी में, उतरते देखा ! अँधेरे- उजालों को , लिपट कर एक साथ सोते देखा  ! -- सफेद बालों के झुरमुट से !एक अकेला काला बाल,झाँक रहा था !और मगरूर हो रहा था ,उस पर वक्त का बुरा असर नहीं पड़ा !पर कितना नादान था ,उसे नहीं मालूम था !सफेद बालों ने, अनुभवों का कितना स्वाद चखा था !खोखली होकर भी, मधुर धुन छेडती बांसुरी ! भरी होकर भी बन्दूक ,  आग उगलती है ! --- मेरी नन्ही परी की तेजस्वी आँखों में, मैंने भविष्य का सूरज उगते देखा है किरणें जैसे उसके पांव पखारे सुबह उसी के लिए होती है धरती अपना आंचल बिछाए भूले से भी उसे ठोकर ना लग जाये पर्वत जिसके आगे झुक जाए नदियाँ जैसे खुद थम जाये तूफान की क्या मजाल जो उसका रास्ता रोके -- मैं गौरव गाथा गाऊंगी, हर समय हर हाल में , तिरंगा लहराऊंगी ! मैं शहीदों की चिताओं पर , हर शाम, हर मौसम में ,…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - जंगल आदमी और समाज

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पिछले दिनों राजस्‍थान के रणथम्‍भोर अभयारण्‍य में मवेशी घुस गये। अभी इसकी आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक अन्‍य अभयारण्‍य में आग लगने की खबर मिली। आखिर हम अपने जंगलों, पशु, पक्षियों के प्रति कब सुधरेंगे। यह अरण्‍य रोदन कब तक। प्रसंगतः पर्यावरण का आयोजन अभी तक कुछ स्‍वैच्‍छिक संस्‍थाओं और कुछ जागरूक नागरिकों की निजी निष्‍क्रियता क्‍यों बन गया है। अब तक का अनुभव बताता है कि हम विकास की सड़क पर नाक की सीध में जाने में विश्‍वास रखते हैं। हम यह नहीं देखते कि विकास के रथ के पीछे की सड़क क्‍यों टूट-फूट रही है, उड़ती हुई धूल और उद्योगों की चिमनियों से उठता हुआ धुआं हमारे आकाश को कितना और क्‍यों विषैला बना रहा है। लेकिन कौन सुनता है, जब पृथ्‍वी पर पेड़-पौधे जंगल, वन, पशु, पक्षी नहीं होंगे तो मनुष्‍य क्‍या बच पायेगा ? कैसे बच पायेगा ? तब चारों तरफ मौत का सन्‍नाटा होगा और इसके जिम्‍मेदार होंगे हम ․․․ केवल हम। आवश्‍यकता इस बात की है कि सरकार भाषण और घोषणाओं से आगे बढ़कर कुछ करे। परिसंवाद, गोष्‍ठियों का आयोजन तो होता रहता है कुछ बुद्धिजीवी विशेषज्ञ मिल-जुलकर अपने गुबार निकालते हैं और संयोजक खुश होते ह…

हीरालाल प्रजापति का व्यंग्य - शीर्षक में क्या धरा है?

व्यंग्य शीर्षक में क्या धरा है ?                                                  [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ] शीर्षक ! शीर्षक ! शीर्षक ! आख़िर क्या धरा है शीर्षक में ? अरे जनाब शीर्षक में ही तो सब कुछ धरा है। मुखड़ा ही सुन्दर न होगा तो अंतरा कौन सुनेगा ?चेहरा ही सुन्दर न होगा तो जुगराफिया कौन निहारेगा ? भैये , चेहरे में दम हो तो चक्कू सी लड़की गोली सी घल जाती है ; हथिनी सी काया हिरनी सी चल जाती है। जिस तरह इंसान कि पहचान उसके चेहरे से होती है -लेख की पहचान उसके शीर्षक से लगाई जाती है। ये अलग बात है कि चेहरे पर मुखौटा हो अथवा शीर्षक हो झूठा। शीर्षक का तो इतना महत्व है कि लोग गुड़ के घोल पर शहद का लेबल देखकर चाट जाते हैं , करेले के रस की बोतल पर खास का शरबत लिखा देखकर गटागट करके पी जाते हैं और तो और दवा के नाम पर लोग ज़हर तक स्वाद से खा जाते हैं उस पर तुर्रा यह कि अनंत काल तक जीवित भी रहते हैं। शीर्षक का महत्व और प्रभाव देखकर यदि आगे चलकर इस टी. वी. बाबाई चैनली भक्ति युग देखकर धार्मिक सीरियलों अथवा फिल्मों को इंटरनेट कनेक्टेड मोबाइल धारक ; कैशौर्य छोड़कर यौवन में पदार्पण कर रहे युवाओं में हि…

हीरालाल प्रजापति का व्यंग्य - इसे पढ़ना सख्त मना है!

व्यंग्य
इसे पढ़ना सख्त मना है !                            [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]     क्योंकि आजकल सभी बचपन से ही ' जाकी ' के जांगिये पहनने लगे हैं ( और अब तो  पहलवान भी लंगोटी कि जगह सपोर्टर पहनकर डंड पेलते हैं ) अतः मस्तराम को मैं अपना लंगोटिया  यार नहीं बल्कि जांगिया दोस्त कहूँगा। वो मेरा  बेस्ट फ्रैंड है और अपने नाम 'मस्तराम ' की तरह इकदम मस्त मस्त। आजकल तो सर्च लाईट लेकर ढूँढने पर भी ऐसे यथा नाम तथा गुण ,गुण संपन्न व्यक्ति म्यूजियम में भी नहीं मिलेंगे। अब हमारे पड़ोसी को ही ले लीजिये . पेशे से बीमा कम्पनी के एजेंट हैं .नाम तो अपना रखे है 'बुद्धूराम' किन्तु यकीन जानिए अपनी चतुर -चालाक-चतुराई भरी लच्छेदार बातों से घाघ से घाघ लोमड दिमाग लोगों को भी उनके लाख न चाहने पर भी एक न एक बीमा पॉलिसी खरीदने को मजबूर कर ही देते हैं। वहीँ उनकी विकराल काली कलूटी खूबसूरत बीवी जिनका नाम उनके माँ बाप ने न जाने क्या सोचकर 'शांति' रख दिया था अपने नाम के विरुद्ध घर तो घर सारे मोहल्ले में अपनी कर्कश काक वाणी से मौका बेमौका तहलका ओ कोलाहल मचाये रहती हैं। खैर। इधर पिछले …

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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