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June 2012
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 याद के बादल.

(गीत)

हृदय-आकाश पर मेरे,

छितरकर छा गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल. !

 

लरज के,साथ गरजन के,

बदरिया छा गई उर पे,

कि जैसे याद के पाहुन,

भटककर आ गए घर पे,

कि भूलों की सगाई,

याद से करवा गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

घहरकर छा रही बदरी,

मिलन को कर रही इंगित,

तडपकर टूटती बिजुरी,

धडक कर मिल गए दो दिल,

कि बिजली की तडप से

दिल जुडाते आ गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

घटा ने थाम ली ढपली,

कि बूंदे गा रही कजली,

“बिदेसिया पी नहीं आए”-

कोयलिया दर्द से बोली

तुम्हारे दर्द से रिश्ता,

बंधाते आ गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

तुम्हारी याद, बीते पल

सजाकर इस तरह बैठी,

कि जैसे कोई बिरहन रात में

दियना जला बैठी,

तुम्हारी याद को बांधे,

उतारे जा रहे बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

 

प्रीत के छन्द

अधर पर खिले

प्रीत के छन्द

मुस्कान बनकर

सजन अब कौन सी

व्यथा मन की

बेचैन हो रह गई मौन

पलकों की सेज पर

महक उठे सपने

एक याद बनकर

सजन अब कौन

टीस रह गई

गलहार बनकर

घटायें सावन की

पलकॊं मे सिमट रह गई

मूक बनकर

सजन अब कौन सी

व्यथा रह गई

प्यास बनकर

अलकॊं मे बांधकर

मलयज हौले से

शुन्य अब संसार हुआ

सजन अब कौन हार

हार कर रह गई

कण्ठहार बनकर

 

१७ कपसीले बादल

कांधो पर विवशताओं का बोझ

हथेली से चिपकी-

बेहिसाब बदनाम डिग्रियां

दिल पर आशंकाओं-कुशंकाओं के-

रेंगते जहरीले नाग

निस्तेज निगाहें

पीले पके आम की तरह लटकी सूरतें

और सूखी हड्डियों के ढाचों के-

गमलों मे बोई गईं

आशाओं की नयी-नयी कलमें

और पाँच हाथ के

कच्चे धागे मे लटके-झूलते -

कपसीले बादल

जो आश्वासनों की बौझार कर

तालियों की गडगडाहट के बाद

फिर एक लंबे अरसे के लिये

गायब हो जाते हैं

और कल्पनाओं का कल्पतरु

फ़लने-फ़ूलने के पहले ही

ठूंठ होकर रह जाता है

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गीतकार-सूरजपुरी मु.मुलताई(बैतुल)म.प्र

प्रस्तुति : गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

चुटकुले 1 - 10 यहाँ पढ़ें

हास परिहास हास्य व्यंग्य चुटकुला मुल्ला नसरूद्दीन के चुटकुले लतीफे लतीफा

11

भरपूर युवा और खूबसूरत युवती ने मुल्ला से कहा कि वो मुल्ला से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है.

मुल्ला ने उसका कोमल हाथ उतनी ही कोमलता से अपने हाथों में लिया और पूछा - प्रिये! क्या तुमने अपने मम्मी पापा को मेरे बारे में बता दिया है कि मैं एक 'ब्लॉगर-कवि' हूँ?

'अभी तो नहीं बताया है प्रिये', उसने प्यार उंडेलते हुए कहा - 'अभी तो मैंने तुम्हारे जुआ खेलने और दारूबाजी की आदतों के बारे में ही बताया है. वो क्या है ना, सभी चीजें एक साथ बता देने में खतरा थोड़ा खतरा है'

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12

मुल्ला नसरूद्दीन ग्रीटिंग कार्ड की दुकान पर पहुँचा और कार्ड देखने लगा.

सेल्सगर्ल पास आई और बोली सर, किसके लिए चाहिए कार्ड?

अपनी प्रेमिका के लिए - नसरूद्दीन ने कहा.

सेल्सगर्ल ने एक कार्ड निकाला और मुल्ला को दिखाते हुए कहा - ये देखिये, इसमें कितना सुंदर लिखा है - मेरी एकमात्र प्रेमिका के लिए जिसे मैं जी जान से चाहता हूँ...!

वाह! ये तो बढ़िया है - एक दर्जन दे दो - मुल्ला ने कहा.

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13

"तुम आज फिर मुल्ला से झगड़ा कर रही थी..."

"हाँ, उसने आज फिर से मुझे प्रपोज़ किया था..."

"अरे! तो इसमें आखिर समस्या क्या है..."

"मैंने उसका प्रपोजल तीन दिन पहले ही स्वीकार कर लिया था..."

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14

"तुम अपने पुराने प्रेमपत्रों को वापस लेकर आखिर करोगे क्या?" मुल्ला नसरूद्दीन की भूतपूर्व प्रेमिका ने आगे पूछा - "मैंने पहले ही हीरे की अंगूठी और महंगे उपहार तुम्हें वापस कर दिए हैं. क्या तुम सोचते हो कि मैं इन पत्रों से भविष्य में तुम्हें ब्लैकमेल करने का नीच काम करूंगी?"

"नहीं नहीं," मुल्ला ने प्रतिवाद किया - "ये बात नहीं है. मैं ऐसा कैसे सोच सकता हूँ. दरअसल मैंने इन पत्रों को एक अच्छे लेखक से लिखवाने में अच्छे खासे पैसे खर्च किये हैं, तो मैं इनका पुनर्प्रयोग करना चाहता हूँ."

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15

"क्यों न आज कुछ अलग सा करें?" बगीचे में हाथों में  हाथ डाले मुल्ला ने अपनी प्रेमिका से पूछा.

"ठीक है," प्रेमिका ने कहा - "तुम्हीं बताओ."

"तुम मुझे किस करने की कोशिश करो, " मुल्ला ने आगे कहा - "और मैं तुम्हें झापड़ मारता हूँ!"

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16

"इस बेदर्द दुनिया में तो न्याय जैसी चीज कहीं नहीं है" मुल्ला ने अपने मित्र से अपना दुखड़ा रोया.

"तुम ऐसा कैसे कह सकते हो" - मित्र ने प्रतिवाद किया.

"एक समय मैं 70 किलो का सींकिया पहलवान हुआ करता था तो जब मैं बीच पर जाता था तो 120 किलो का एक पहलवान मेरे चेहरे पर रेत उड़ा कर मेरा मजाक उड़ाता था. तो मैंने जिम ज्वाइन किया, वेट लिफ़्टिंग की और देखते ही देखते 130 किलो का पहलवान बन गया."

"अरे वाह, फिर क्या बात हुई?" मित्र ने पूछा.

"बात हुई क्या खाक, अब जब मैं अपनी प्रेमिका के साथ बीच पर जाता हूँ तो 170 किलो का पहलवान मेरे चेहरे पर रेत फेंक कर मेरा मजाक उड़ाता है"

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17

"डोरोथी, तुम्हारा प्रेमी मुल्ला नसरूद्दीन तो बड़ा शर्मीला है..." माँ ने अपनी बेटी से कहा.

"शर्मीला? शायद आपको गलतफहमी हो गई है. मेरा अनुभव तो इसके ठीक विपरीत है माँ" - बेटी ने जवाब दिया.

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18

"तुम सबको पता है कि मैं हीरो हूँ", मुल्ला ने अपने दोस्तों के सामने डींग मारी.

"तुम ऐसा कैसे बोल सकते हो कि तुम हीरो हो" - एक ने पूछा.

"कल मेरी प्रेमिका का जन्मदिन था",  मुल्ला ने बताया - "उसने मुझसे पहले कहा था कि यदि मैं उसके जन्मदिन पर कोई तोहफा लेकर दूंगा तो वो खुशी के मारे मर ही जाएगी."

"तो?" - एक मित्र ने पूछा.

"तो क्या, मैंने उसे कोई तोहफा नहीं देकर उसका अनमोल जीवन बचा लिया." मुल्ला ने स्पष्ट किया.

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19

"हालांकि यह मात्र औपचारिकता है, मगर फिर भी शादी करने के लिए मैं आपसे आपकी पुत्री का हाथ मांगने आया हूँ" मुल्ला ने अपनी प्रेमिका के पिता से कहा.

"अच्छा, और तुम्हें यह आइडिया कहाँ से मिला कि मेरी परमीशन सिर्फ औपचारिकता मात्र है?" - प्रेमिका के पिता ने पूछा.

"आपकी पत्नी से सर!" - मुल्ला ने खुलासा किया.

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20

मृत्यु शैय्या पर पड़े अपने पिता के पास मुल्ला नसरूद्दीन खड़ा था. पिता ने मरते स्वरों में मुल्ला को ज्ञान देना चाहा - "बेटे, हमेशा ध्यान रखना कि धन से सुख नहीं मिलता है.."

"जी पिता जी मैं ध्यान रखूंगा", मुल्ला ने सहमति दर्शाई - "परंतु धन से दुख की मात्रा अपने अनुरूप की जा सकती है"

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डाक का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है. उस समय एक राजा दूसरे राज्य के राजा तक अपना संदेश एक विशेष व्यक्ति जिसे दूत कहा जाता था, के माध्यम से भेजते थे. उन दूतों को राज्य की ओर से सुरक्षा तथा सम्मान प्रदान किया जाता था. महाकाव्य रामायण तथा महाभारत में कई प्रसंगों में संदेश भेजे जाने का उल्लेख प्राप्त होता है. राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता और राम के विवाह होने का संदेश राम के पिता दशरथ को भिजवाया था. रावण की राजसभा में श्रीराम का सन्देश लेकर अंगद का जाना, इस बात का प्रमाण है.. महाभारत में श्रीकृष्ण का कौरवों के लिए पांच गांव मांगने जाना तथा अनेक राज्यों में पांडवों तथा कौरवॊं के पक्ष में, युद्ध में भाग लेने के लिए संदेश पहुँचाना, जैसी कोई डाक व्यवस्था उस समय काम कर रही होगी.

अन्य प्रसंगों में राजा नल द्वारा दमयन्ती के बीच सन्देशों का आदान-प्रदान हंस द्वारा होने का वर्णण आता है. महाकवि कालीदास के मेघदूत में दक्ष अपनी प्रेमिका के पास मेघों के माध्यम से सन्देश पहुँचाते थे. एक प्रेमी राजकुमार अपनी प्रेमिका को कबूतरों द्वारा पत्र पहुँचाते थे. खुदाई के दौरान कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं कि मिस्र, यूनान एवं चीन में डाक व्यवस्था थी. सिकन्दर महान ने भारत से यूनान तक संचार व्यवस्था बनाई थी, जिससे उसका संपर्क यूनान तक रहता था. अनेक राजा-महाराजा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुंचाने के लिए द्रुतगति से दौडने वाले घोडॊं का प्रयोग किया करते थे.

यह सब कालान्तर की बातें तो है ही, साथ ही रोचक भी है. इसका प्रयोग केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित था. साधारण जन इससे कोसों दूर था. बाद मे कई प्रयास किए गए और डाक व्यवस्था में निरन्तर सुधार आता गया और आज यह व्यवस्था आम हो गई है. १ अक्टूबर सन १८५४ को पहला भारतीय डाक टिकिट जारी किया गया था. उस समय तक पोस्टकार्ड की कल्पना भी नहीं की गई थी. सन १८६९ में आस्ट्रिया के डाक्टर इमानुएल हरमान ने पत्राचार के एक सस्ते साधन के रुप में पोस्टकार्ड की कल्पना की थी. भारत में पहली बार १ जुलाई १८७९ को पोस्टकार्ड जारी किए गये. जिसकी डिजाइन और छपाई का कार्य मेसर्स थामस डी.ला.रयू. एण्ड कंपनी लंदन ने किया था. उसके दो मूल्य वर्ग थे. एक पैसा( उस समय एक आने में चार पैसे हुआ करते थे) मुल्य का कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए था और देढ-आना वाला कार्ड ,उन देशों के लिए था जो “अंतरराष्ट्रीय डाक संघ” से संबद्ध थे.

पहले पोस्टकार्ड मध्यम हलके भूरे से रंग में छपे थे. एक पैसे वाले कार्ड पर “ ईस्ट इण्डिया पोस्टकार्ड” छपा था. बीच में ग्रेट ब्रिटेन का राज चिन्ह मुद्रित था और ऊपर की तरफ़ दाएं कोने मे लाल-भूरे रंग में छपी ताज पहने साम्राज्ञी विक्टोरिया” की मुखाकृति थी. विदेशी पोस्टकार्ड में ऊपर अंग्रेजी और फ़्रेंच भाषाओं में” यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन” अंकित था. इसके नीचे दो पंक्तियों में अंग्रेजी में क्रमशः “ब्रिटिश इण्डिया” और” पोस्टकार्ड” और इसका फ़्रेंच रुपान्तर तथा इन दोनों के बीच में ब्रिटेन का राजचिन्ह मुद्रित था एवं ऊपर दाहिने कोने पर टिकिट होता था. टिकिट और लेख नीले रंग में थे. दोनों ही प्रकार के कार्डॊ में अंग्रेजी में” दि एड्रेस ओनली टु बी रिटेन दिस साईड” छपा था. पोस्टकार्ड में कई परिवर्तन हुए. १८९९ में “ईस्ट” शब्द हटा दिया गया और उसके स्थान पर “ इण्डिया पोस्ट कार्ड” मुद्रित होने लगा.

दिल्ली के सम्राट जार्ज पंचम के राज्याभिषॆक की स्मृति में सन १९११ में केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सरकारी प्रयोग के लिए विशेष पोस्टकार्ड जारी किए थे. इन पर “ पोस्टकार्ड” शब्द मुद्रित था,परन्तु टिकिट का कोई चिन्ह अंकित नहीं था. इन पर “ताज” और “ जी.आर.आई” मोनोग्राम सुनहरे रंग में और दिल्ली तथा विभिन्न प्रांतों के बीच के प्रतीक-चिन्ह ,भिन्न-भिन्न रंगों से इम्बासिंग पद्धति से मुद्रित थे.

स्वतंत्रता के बाद चटकीले हरे रंग में “त्रिमूर्ति” की नयी डिजाइन के टिकिट वाला प्रथम पोस्टकार्ड ७ दिसम्बर १९४९ को जारी किया गया था. सन १९५० में कम डाक दर( ६ पाई) के स्थानीय़ पोस्टकार्ड जारी किए गए, जिन पर कोणार्क के घोडॆ की प्रतिमा पर आधारित टिकिट की डिजाइन चाकलेट रंग में छपी थी. २ अक्टूबर १९५१ को तीन चित्र पोस्ट्कार्डॊं की एक श्र्रृंखला जारी की गई,जिसमें एक पर बच्चे को लिए हुए गांधीजी, दूसरे पर चर्खा चलाते हुए गांधीजी और तीसरे पर कस्तूरबा गांधी के साथ गांधीजी का चित्र अंकन था. २ अक्टूबर १९६९ को गांधी शताब्दी के उपलक्ष में तीन पोस्टकार्डॊं की दूसरी श्रृंखला निकाली गई, जिसमें गांधीजी और गांधीजी की मुखाकृति अंकित थी.

जबसे पोस्टकार्डॊं का प्रचलन हुआ है, तभी से जनता के पत्र-व्यवहार का माध्यम ये पोस्ट्कार्ड रहे हैं. हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ये काफ़ी लोकप्रिय है. इस समय प्रतिवर्ष अरबों की संख्या में पोस्टकार्ड देश के एक छोर से दूसरे छोर तक, देशवासियों को भातृत्व के बंधन में बांधने का कार्य करते हैं.

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वर्तमान युग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव इस युग में मानव को आश्चर्यजनक साधन उपलब्ध कराने में सफ़ल रहा है. लेकिन मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का इस ढंग से इसका उपयोग किया है,जिससे पारिस्थितिकी संतुलन गडबडा गया,जिसके फ़लस्वरुप भौतिकवाद एवं प्रकृतिवाद के बीच समन्वय तथा सहयोग का संबंध प्रायः समाप्त हो गया है.. इस कृत्य के लिए प्रौद्योगिकी दोषी नहीं है. विज्ञान एवं टेक्नोलाजी मानव की इच्छानुसार सुविधा प्रदान करने को तैयार है. परन्तु मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थ पूर्ति हेतु विज्ञान एवं टेक्नोलाजी द्वारा आर्थिक लाभ हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करने का प्रयास किया है. आज की भौतिकतावादी संस्कृति के पोषक मानव ने विलासिता और व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति हेतु इनका दुरुपयोग करते हुए पर्यावरण का विध्वंस कर दिया है. आज हम पंचमहाभूत, आकाश, पृथ्वी, जल,वायु और अग्नि को नमन करने की बजाय प्रदूषित कर अपने जीवन दर्शन एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिरोध कर रहे हैं. वेद और इतिहास साक्षी है कि हमने सदैव प्राकृतिक संसाधनों की पूजा की है. वेदों में कहा गया है कि जो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी एवं वायु से आच्छादित है तथा जो औषधियों और वनस्पति में भी विद्यमान है, उस देव अर्थात पर्यावरण को नमस्कार करते हैं..

उपनिषदों और धर्मशास्त्रों में भी ऐसी शिक्षा दी गई है. महाभारत में आयुर्वेद की शिक्षा आश्रमॊं मे क्षत्रियों को देने का वर्णन है अर्थात औषधि, वनस्पति का संरक्षण क्षत्री का धर्म होता था. हमने सदैव जल-स्रोतों – गंगा, यमुना,नर्मदा, ताप्ती आदि नदियों की पूजा-अर्चना की. पीपल, नीम,,तुलसी आदि की अर्चना की. सूर्य,चन्द्र को नमन किया. पृथ्वी माता को प्रणाम किया तथा आकाश में आच्छादित वायुदेव का आह्वान किया है क्योंकि हृदय की यह भावना-वृत्ति हमें सरस, प्रकृति प्रेमी और प्राकृतिक साधनों में अधिक आस्थावान बनाते हैं. फ़िर भला आज हम प्रकृति के प्रति इतने क्रूर-इतने निर्दयी क्यों हो गए हैं?. प्रदूषण पर चर्चा करने से पहले हम यह जन लें कि पर्यावरण किसे कहते हैं. पर्यावरण:- वे समस्त भौतिक व जैविकीय तत्व जो मानव की अनुक्रियाओं के प्रभावित करते हैं पर्यावरण कहलाते हैं प्रदूषण:-पर्यावरण के घटकों में बाह्य अवांछित पदार्थों का प्रवेश जिसके कारण उनकी गुणवत्ता में अवन्नति हो जाए प्रदूषण कहलाता है. प्रदूषण मुख्य रुप से चार प्रकार के होते हैं. पांचवें श्रेणी में हम उनको शामिल कर लेते है, जो इनमें से छूट सकते हैं.

1. जल प्रदूषण ( water pollution)

2. वायु प्रदूषण( air pollution.)

3 ध्वनि प्रदूषण( noise pollution)

4.मृदा प्रदूषण( soil pollution)

5.अन्य प्रदूषण( other pollution) 

जल प्रदूषण:-

हम जानते हैं कि जल के बगैर जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. मनुष्य के शरीर में लगभग 70% जल का होता है. इसी तरह सभी जीवधारियों ,पेडॊं, पौधों की भौगोलिक एवं नैसर्गिक आवश्यकता है, जो जल के बिना संभव नहीं है. इसीलिए तो कहा जाता है कि” जल ही जीवन है”. जल जीवधारियों के जैव कार्यों को प्रभावित करता है. जल भूमि में उपस्थित खनिज पदार्थों को घुलनशील बनाकर उन्हें पौधों को उपलब्ध कराता है. जल के स्रोतों को मुख्य रुप से दो भागों में बांटा जा सकता है. 1. धरातलीय स्रोत 2. भूमिगत स्रोत. 1.धरातलीय स्रोत:- पानी के स्रोत जो जमीन के ऊपर होते हैं,वह धरातलीय स्रोत कहलाते हैं. जैसे:- समुद्र, नदी, तालाब, झील आदि का जल. 2. भूमिगत स्रोत:- पानी के वे स्रोत जहां जल की प्राप्ति भूमि के धरातल से न होकर भूमि के गर्भ से होती है,उन्हें भूमिगत स्रोत माना जाता है. जैसे:- कुंए, ट्यूबवेल आदि भूमिगत जल प्राप्ति के प्रमुख स्रोत हैं. उपरोक्त दोनों प्रकार के स्रोतों से अत्यधिक मात्रा में जल प्राप्त तो होता है लेकिन सभी जल पीने योग्य नहीं होता. इनमें अनेक प्रदूषक मिले रहते है. भारत में लगभग 20% लोगों को शुद्ध जल प्राप्त होता है, शेष 80% लोग आज भी प्रदूषित जल का उपयोग कर रहे हैं.

जल प्रदूषण को मुख्य दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला:- भौतिक जल प्रदूषण (दूसरा) रासायनिक प्रदूषण .भौतिक जलप्रदूषण को भी हम पांच केटेगरी में रख सकते है. इसी तरह रासायनिक जल प्रदूषण को भी तीन मुख्य केटेगरी में रख सकते हैं. आइये इन पर क्रम से अध्ययन करते चलें. 1. भौतिक जल प्रदूषण:- भौतिक जल प्रदूषण में जल में भौतिक क्रियायों के द्वारा प्रदूषण होता है जो निम्नानुसार है.

(i) तापीय प्रदूषण:- औद्योगिक संयंत्रों एवं एवं बिजली घरों को ठंडा करने के पानी का उपयोग किया जाता है,जो गरम जल बाहर आता है उसमें आक्सीजन कि कमी हो जाती है,जिसके कारण वन मछली और अन्य जन्तुओं के लिए उपयोगी नहीं होता.

(ii) स्वाद एवं गंध प्रदूषण;-जिस पानी में बदबू आ रही हो अथव जिसका स्वाद ठीक न हो ऐसे प्रदूषित जल उपयोग में नहीं आता है.

(iii)रंग प्रदूषण;- शुद्ध पेय जल का प्राकृतिक रंग हल्का भूरा होता है किन्तु उद्योगों, कारखानों से निकलने वाला रंगीन जल, दूषित होता है.

(iv) घरेलू बहिस्राव-प्रदूषण:-घरेलू उपयोग में जैसे नहाना, घोना, आदि में जो जल प्रयोग में लाया जाता है, नालियों के माध्यम से नदियों तालाब आदि में चला जाता है जो अपने साथ अन्य खतरनाक पदार्थों को साथ बहा ले जाता है, अनियंत्रित जनसंख्या के दबाव के कारण भी स्थिति गंभीर बनी है. कल कारखानों से निकलने वाले जहरीले तत्व समूची नदी/तालाब आदि को प्रदूषित कर देता है.

2., रासायनिक प्रदूषण:-

जल के विभिन्न स्रोतों में अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ मिल जाते हैं, जो जल को प्रदूषित करते है. प्रदूषित जल पेड-पौधों,जीव-जंतुओं के साथ मनुष्य पर भी गहरा प्रभाव छोड़ता है. इसके प्रयोग से हैजा, तपेदिक्, पीलिया, टायफ़ाइड, पक्षाघात, पोलियो आदि घातक बीमारियाँ घेर लेती है. अतः हमें प्रदूषित जल को भूलकर भी उपयोग में नहीं लाना चाहिए. और प्रदूषित जल की रोकथाम के लिए उचित उपाय करने चाहिए.

जल प्रदूषण की रोकथाम के कुछ उपाय.

1/- घरों, उद्योगों आदि से निकलने वाले अपमार्जक पदार्थों तथा विषैले पदार्थों को नदियों, तालाबों, आदि में डालने से पूर्व उसे शुद्ध करना चाहिए.

(2) जल में पेट्रोलियम पदार्थों को नहीं मिलाना चाहिए.

(3)शैवाल तथा जल के पौधे ऐसे भी हैं जो कि जल को शुद्ध रखने में सहायक होते हैं, उन्हें जल में बढ़ने देना चाहिए.

(3-1) नगरों एवं शहरों से निकलने वाला मल-कूडा- करकट आदि जल में नहीं डालना चाहिए. इन्हें शहर के बाहर गड्ढॊं में डालना चाहिए. जो बाद में कम्पोस्ट खाद में बदल जाते हैं, जिसका उपयोग खेतों में किया जा सकता है.

(4) कुछ इस प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग होने चाहिए जो प्रदूषकों को उपयोगी वस्तुओं में प्ररिवर्तित किया जा सके. उदाहरण के लिए- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुडकी ने तापीय बिजली घरों से प्राप्त राख की ईंट में परिवर्तित करने का सफ़ल प्रयास किया है.

(5) मृत जीव-जंतुओं को नदी में नहीं बहाना चाहिए.

(6) घरों में जल को कीटाणु रहित करने के लिए क्लोरीन टेबलेट, आयोडीन आदि का प्रयोग होना चाहिए. आजकल अच्छे प्रकार के फ़िल्टर बाजार में उपलब्ध हैं ,को प्रयोग में लाना चाहिए.

(7) सभी शहरों एवं कस्बों में सीवर की सुबिधा होनी चाहिए.

(8) जल का न तो दुरुपयोग करना चाहिए और न ही उसे लापरवाही से व्यर्थ बहाना चाहिए.

सार्वजनिक उपयोग हेतु जाल का शुद्धिकरण:-

नगर तथा कस्बॊं की जल आपूर्ति बनाए रखने के लिए जल का शुद्धिकरण किया जाता है. यह प्रक्रिया अनेकों चरणॊं में की जाती है.

(i) निस्यंदन- जल को छानने के लिए निचली सतह पर पत्थर के टुकडे, उसके ऊपर कंकड़ और सबसे ऊपर रेत बिछायी जाती है. जब जल उपरोक्त सतहों से छन कर आता है तो वह स्वच्छ जल होता है.

(ii) वातन:-स्वाद एवं गंध को दूर करने के लिए इस पद्धति को प्रयोग में लाया जाता है. इस प्रक्रम में जल को फ़व्वारे के रुप में कोक के ऊपर से गुजारते हैं या जल को सक्रिय चारकोल से भरी ट्रे के ऊपर गिराया जाता है. ऐसा किया जाकर जल में घुली हुई कार्बन डाइआक्साइड एवं हाइड्रोजन सल्फ़ाइड गैसें वायु से मुक्त हो जाती है एवं कुछ पदार्थों का अवक्षेपण हो जाता है,जिन्हें छानकर पृथक कर दिया जाता है.

(3) शैवाल का पृथक्करण:- जल में नीला थोथा मिलाने से शैवाल नष्ट हो जाते हैं. सूर्य के प्रकाश किरणॊं के अभाव में भी शैवाल की वृद्धि रुक जाती है. अतः छोटे जलाशयों को ढांककर रखा जाता है.

(4) सूक्षमजीवी राहित जल बनाना:-

इस विधि में टैंकों में क्लोरीन गैस या ब्लीचिंग पाउडर का चूर्ण मिलाया जाता है.

(i) ओजोनीकरण_ इस पद्धति से जल में सूक्ष्म जीवी समाप्त हो जाते हैं.

(ii) परावैंगनी किरणॊं का प्रयोग- यदै जल पर प्रावैंगनी किरणें डाली जाएं तो भी जल जीवाणु राहित हो जाता है.

(iii) काक दवा( पोटेशियम परमैंगनेट)- इसे कुओं,ट्युब्चेल;ओं आदि मे डालकर कीटाणु नष्ट किए जा सकते है.

(5.) स्क्न्दन-

जल को स्कन्दन टैंक में ले जाते है,जिसमे फ़िटकरी, फ़ैरिक सल्फ़ेट, फ़ैरिक क्लोराइड या चूना आदि रहता है, जिससे शुद्ध जल प्राप्त किया जा सकता है.

(6) पूर्व निथारन जलाशय में जल का एकत्रीकरण- जल से शैवाल को अलग करने के बाद जल को पूर्व निथारन जलाशय में डाला जाता है. जलाशय में जल को उसके गंदलेपन के अनुसार 4-24 घंटॊं तक रखा जाता है,जिससे रेत तथा सिल्ट नीचे बैठ जाता है, फ़िर जल को एक महीन जाली में से प्रवाहित किया जाता है. इस तरह स्वच्छ जल की प्राप्ति होती है.

(7) जल का एकत्रीकरण-नदी,तालाब आदि से जल को पंपों के माध्यम से बडॆ-बडे जलाशयों में भरा जाता है, कुछ दिन बाद प्रदूषक नीचे बैठ जाते है, इस तरह जल को शुद्ध किया जा सकता है.

(8) क्लोरिकरण जलाशय में उपस्थित कीटाणुओं तथा कार्बन पदार्थों जैसे मृत पत्तियों,शैवाल कोशिकाएं,वाहित मल आदि को नष्ट करने के लिए जल में क्लोरीन गैस प्रवाहित की जाती है.

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कूट संकेतों की दुनिया.

आइये, मैं आपको कूट संकेतों की रहस्यमय दुनियां में ले चलूं . एक यन्त्र जिसने लगभग समूची दुनिया में एक- छत्र राज्य किया. उस यंत्र से डैश-डाट, डैश-डाट लगातार बजता रहता था ,और उन संकेतों का जानकार, उसे अपनी भाषा में लिपिबद्ध करता चलता था. उस यंत्र का नाम था “मोर्स साउन्डर” और जिससे उसे संचालित किया जाता था, का नाम” मोर्स की” कहलाया. एक समय वह भी था,जब आदमी को अपने दूर-दराज में बैठे किसी व्यक्ति को कोई जरुरी खबर देनी होती थी, तो उसके पास कोई साधन नहीं थे. आम साधारण आदमी बाजार-हाट में, अपने किसी परिचित को पाकर,उसके हाथ मौखिक अथवा लिखित समाचार दे देता था,और कहता था कि अमुक आदमी तक इसे पहुँचा देना. वह यह नहीं जानता था कि वह पत्र उस आदमी तक पहुँचाया गया अथवा नहीं. वह यह भी नहीं जान पाता था कि उसकी बात गुप्त भी रह पाती है,अथवा नहीं. हाँ, राजा-महाराजाओं के समय में उन्होंने अपने तरीके इजाद कर लिए थे और वे कुछ हद तक उसमें सफ़ल भी रहे थे. लेकिन बावजूद इसके उसमें समय ज्यादा नष्ट होता था.

अमेरिका के चार्ल्स टाउन( मेसाच्सेट्स) में 27 अप्रैल 1791 में एक बालक ने जन्म लिया,जिसका नाम सेमुअल एफ़.बी.मोर्स रखा गया. आगे चलकर इसी व्यक्ति ने एकल तार टेलीग्राफ़ी प्रणाली और मोर्स कोड का आविष्कार किया, जो चंद मिनटॊं में समाचार, एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचा देता था. इसमें सबसे बडी खास बात तो यह होती थी कि, उसे जानकार व्यक्ति के अलावा ,न तो कोई समझ पाता था और न ही कूट संकेतों को अपनी भाषा में लिख ही पाता था. इस तरह उस व्यक्ति ने समूचे संसार में तहलका मचा दिया.

यह बालक जन्मजात चित्रकार था. वह बेहद ही सुन्दर चित्र बनाया करता था. बडा होकर उसने, उस जमाने के सम्राटॊं के पोट्रेट बनाए और बेशुमार धन कमाया.

अपने शहर से दूर , न्युयार्क शहर के वाशिंगटन मे चित्रकारी कर रहा था. उसके पिता जेविडिया मोर्स ने एक घुडसवार के हाथों एक दुखद समाचार भिजवाया कि उसकी पत्नि का निधन हो गया है. अपनी पत्नि के असमय निधन से उसे बेहद दुख हुआ और उसने अपनी चित्रकारी से मोह भंग हो गया. समाचार उसे मिला तो लेकिन तब तक काफ़ी समय बीत चुका था और वह चाहकर भी वहाँ शीघ्रता से पहुँच नहीं सकता था. उसने निर्णय लिया कि वह कोई ऐसा कारगर उपाय खोज निकालेगा,जिससे समाचार तेज गति से एक स्थान से दूसस्रे स्थान को भेजा जा सके.

सन 1832 में जब वह समुद्रीक यात्रा कर रहा था. संयोग से उसकी मुलाकात, बोस्टन के चार्ल्स थामस जैक्सन नामक एक व्यक्ति से हुई,जिसने विद्धुत चुंबक पर अनेकों प्रयोग किए थे. मोर्स ने उसके सिद्धांत पर आधारित एक ऐसे यंत्र को विकसित किया जो एकल-तार टेलीग्राफ़ी की अवधारणा पर आधारित था. जन्मजात बैज्ञानिक न होते हुए भी उसने यह कारनामा कर दिखाया.

टेलीग्राफ़ी के इस प्रयोग में सफ़लता प्राप्त होते ही इसे सरकारी उपक्रम डाकघर से जोड दिया गया जो उस समय तक पूरे देश में सक्रीयता के साथ अपनी सेवाएं दे रहा था. इस तरह एक नया विभाग “ भारतीय पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ़ डिपार्टमेन्ट” अस्तित्व मे आया. देश के सभी जिलों की तहसीलों को उनके जिला मुख्यालय के प्रधान डाकघरॊं के बीच टेलीग्राफ़ लाइने बिछायी गई और उसे प्रदेश के मुख्यालय मे खोले गए केन्द्रीय तार घरों से जोड दिया गया. इस तरह समूचा देश टेलीग्राफ सिस्टम से जुड गया

स्व, राजीव गांधीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश ने आई.टी युग में प्रवेश किया. देखते-ही देखते समूचे देश में कंप्युटर, मोबाईल फ़ोन और टीवी घरों-घर पहुँच गए. पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ दो हिस्सों में बंट गया और वह भारत संचार निगम लिमी. बन,एक स्वतंत्र इकाई के रुप में काम करने लगा.यह घटना २००० की है. विश्व में नयी टेक्नोलाजी के आने के बाद, टेलीग्राफ़ी , जो पूरे विश्व में प्रयोग में लायी जा रही थी , की व्यवस्था समाप्त हो गई . टेलीग्राफ़ के कोड को डिकोड करना आमजन के लिए असंभव था. इसीलिए यह सबसे विश्वसनीय बना रहा. टेलीग्राफ़ की भाषा को सीखने के लिए कठिन परिश्रम और प्रशिक्षण की जरुरत होती है. डाक विभाग में कार्य करते हुए मैंने अंग्रेजी तथा हिन्दी में तार भेजने की दक्षता हासिल की थी. अब भी मुझे वे संकेत याद हैं,जिनका उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ.हालांकि आज यह किसी काम के नहीं है,लेकिन इसका अपना इतिहास है और आज वह स्वयं एक इतिहास का विषय बन कर रह गया है,अतः इसका मूल्य और भी बढ जाता है.

किसी भी शब्द के लिए टेलीग्राफ़िक कोड चार अथवा उससे कम की संख्यां में बनाए गए, तथा अंकों को पांच की संख्या में, इस तरह अंग्रेजी भाषा के प्रत्येक शब्द के लिए प्रथक-प्रथक कोड बने,जो किसी अन्य से मेल नहीं खाते थे. कुछ अलग से संकेत देने पर, अंग्रेजी भाषा का वह शब्द ,हिन्दी में लिखा जाता था

A . - B - . . . C - . - . D - . . E .

F . . - . G - - . H . . . . I . . J . - - -

K - . - L . - . . M - - N - . O - - -

P . - - . Q - - . - R . - . S . . . T -

U . . - V. . . - W . - - X - . . - Y - . - - Z - - . .

अंकों के लिए पांच चिन्हों का प्रयोग किया जाता है. जैसे

1 . . . . - 2 . . . - - 3 . . - - - 4 . - - - - 5 . . . . . 6 - . . . . 7 - - . . . 8 - - - . . 9 - - - - . 10 - - - - -

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1 बदलते समय का एहसास
यह सहज था
कि तुम्हारे आँसू देख
मेरी आँखें रो पड़ती
तुम्हारे बहते खून से
मेरा जिगर लहूलुहान हो जाता
तुम्हारी यातनाएं
मेरे गृह त्याग का कारण बन जाता
पर
ऐसा कुछ नहीं हुआ
होता भी कैसे
नए और पुराने संबंधों का
अंतराल
टकराकर
इतने शुष्क हो गए हैं कि
तुम तुम न रहे
मैं मैं  नहीं
एक नकारे अस्तित्व के लिए
छटपटाते
हम
तुच्छ मकोड़े रह गए हैं।

     2 धूलकण
हवा में तैरते
धूलकणों की तरह
भटक रहे हैं निरर्थक
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ
फंस गए किसी रेशे में
जम गए किसी घर
आँगन
गलीचे पर
बुहार दिए गए
फिर तैरते हैं
कहीं न कहीं
स्थाई होने के लिए
कोई तो कहे
आखिर नियति क्या है हमारी
स्थायित्व पाना
या
यूं ही व्यर्थ उड़ना।

    3.गौरैया और आदमी
चोंच में दबाए
खर
पतवार
सींक झाडू के टुकड़े
खिड़की
दरवाजों पर मॅडराती चिड़िया
आलमारी
तस्वीरों के पीछे
बंद पड़े पंखे
या रोशनदान में ही
डाल देती है
अपनी नीड़ की नींव
एक मौसम में घर बनाने की लालसा
गौरैया के अदम्य उत्साह सी
फूट पड़ती है हर किसी के अंदर
पर
घास फूस तिनके डालने से ही
घर नहीं बन जाती
यह जानते हैं पाखी और आदमी भी
इसलिए
हर सुबह जब
बुहार कर फेंक दिए जाते हैं तिनके
गौरैया के साथ उदास तब
होता है आदमी भी ।।
 
          4 ऊँचा घर
आसमान में घर बनाने
हम चले थे
साथ में तूफान तक आया नहीं
जो साथ देता
वादे किए थे सैकड़ों तरूवर शिखा
एक तिनका भी कोई लाया नहीं
किसके सहारे हम बढ़ें
चांद भी तैयार था देने को कुछ
उस रात अपनी चांदनी लाया नहीं
जो मुस्कुराती
हम उड़ चले
हम मुड़ चले
धरती की ओर
पर धरा भी कुछ नहीं सौगात भेजी
क्या बुरा था
हमने कोई ख्वाब देखा
व्योम में .एक घर बनाने हम गए थे
मानते हैं यह हमारी भूल ही थी
क्यों धरा को छोड़
ऊपर पग बढ़ाया ।।

    5  कर्णधार
कितनी नावों में
कितनी बार
होकर सवार
उतरोगे पार
लेकर जनाधार
या जनता का आभार
हे... राष्ट्र के कर्णधार
बतलाने का कष्ट करेंगे
या यॅू ही
अपनी झेाली आप भरते रहेंगे
और
दीन हीन हम
रोटी
कपड़ा
और मकान के सपने   लिए
तरसते
तड़पते
यूं ही घुट घुट कर
जन्म जन्मांतर तक
भटकते रहेंगे ।

      6 मुक्ति
बट के बड़े पत्तों पर
रखे कुछ पुष्प
दीए और बाती संग
समेट रखे हैं उसने
अपने अंजुरि में
आगे आगे पैंट शर्ट धारी
आधुनिक युवा पुजारी
पीछे पीछे मुक्ति की आकांक्षा लिए
विश्व नारी पुष्कर का शांत
बाबन घाट वला
मत्स्यपूर्ण तालाब
हवा ने बताया था
कुछ अद्भुत सुनाया था
ये फिरंगी भी करते हैं
अपने ज्ञात अज्ञात
पूर्वजों का तर्पण
डरते हैं मगर
पंडितों के वेश से
ठग न ले कहीं
हुआ होगा किसी न किसी के साथ
कोई न कोई वाकया
हादसा
इसलिए तज कर
धोत़ी, चंदऩ, तिलक
सीख कर आंग्ल भाषा
दिखाकर अपना ज्ञान
बढ़ा कर अपनी आभा
भूल नहीं पाते हैं ये भी
पच्छिम के जजमानों को
करते हैं वही कर्म
चाहिए उन्हें भी तो जीने का आधार
यानी धन.
और जजमानों को मोक्ष 
चंद रूपये के एवज में
धोकर अपना कोटि कोटि पाप
इस चोली दामन के संबंध में
लोग कितना भी रूप बदले
पंडित उससे ज्यादा बदल
पकड़ ही लेते हैं एक दूसरे को ।

     7 खुशी की तलाश में
महल के ऊपर एक महल और
कर लिया था उसने
इस तरह कई भवन खड़ा
इसी जोड़ तोड़ में
जिन्दगी के मधुर
धूप छांव
होने लगे स्वाहा
तब उसका मन चाहा
ये गाड़ियाँ
ये दौलत
ये हस्ती
ये पार्टी
ये पब
आखिर देंगी
उसे आत्मिक खुशी कब
घर सूना है
दीवार सूनी
गली
लॉन
स्विमिंग पूल सूनी
कितना गहरा सन्नाटा
कोई आहट
कोई शोर दिल में भी तो हो
तभी दिया था किसी ने सलाह
और उसने किराए पर
एक कोख ले लिया था

     8 समय
लाचार बूढ़ा शेर
चलता है धीरे धीरे
पर निर्धारित
सीमित दायरे में
उठते हैं खून में अब भी उबाल
तोड़ सकता है अब भी यह सीमा
दहाड़ता है पूरा मुंह खोल कर
तो दहल जाता है अभी भी यह जंगल
मगर अब अँगड़ाई लेने वाला
वो  प्रबल समय कहां
जगह जगह पहरे
बेडियां
उपर से उम्र की मार
कितना बेबस
कितना लाचार
डरते नहीं लोग उससे
वह केवल बूढ़ा और बीमार ही नहीं
पिंजरे में कैद भी है ।

     9 आधुनिक शिष्य
बड़े युगों के बाद द्रोण
आए थे उस शहर में
देखा एकलव्य को चलाते
एक साथ अनेक शस्त्र
मुग्ध हुए बोले
अहो वत्स
कलिकाल में ऐसा निशाने बाज
चिड़िया की सिर्फ आँख नहीं
वृक्ष भी कर दिया साफ
बालक
कौन है तुम्हारा गुरु
किस गुरुकुल के तुम हो छात्र
व्यतीत को प्रत्यक्ष पा
हिल गया एकलव्य
इन्हीं के चरणों में लगाई कभी थी निष्ठा
मगर परिणाम कितना दुखद
बार बार उसकी ही  परीक्षा
लौट आया अतीत से
कौन सी नैतिकता
इसी ने उसका अंगूठा कटवा कर
अर्जुन को दिया महानता का दीक्षा
नफरत सी उसकी आँखों ने दिखाई
फिर नाज से उसने तीर चलाई
तटस्थ भाव से अपनी शेखी बघारी
खुद को ही खुद का गुरु मानता हूँ
मैं और कहां किसी को जानता हूँ
कहां गुरु कैसी उनकी दक्षिणा
इन ढकोसलों को मैं अब नहीं मानता हूँ
सहम कर गुरु द्रोण पीछे हट गए थे
कलियुग के हिम्मत पर दंग रह गए थे
सोचा गुरु ने बदलनी होगी नीति
तभी शिष्य उनसे बढायेंगे प्रीति ।

    10 मगर नहीं..
कुंज वही ह़ै छांव वही है
वही है गलियां गांव वही है
वही नदी ह़ै वही है पनघट
वही ठिकाना़ ठांव वही है
वही है मानस़ वही ह्रदय है
वही नेह की धार  प्रबल है
हरित पीत का प्रेम वही है
नर नारी का ध्येय वही है
अनेक मोहन अनेक राधा
अनेक बंधन अनेक बाधा
मगर नहीं फिर रची वो रातें
मगर नहीं फिर वो मस्ती छाई
न उस बंसुरी संग महारास लीला
किसी कृष्ण ने फिर कभी थी मचाई

      ।।  कामिनी कामायनी ।।
          27 ।6।2012

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आपने अब तक अपने जीवन में अनगिनत यात्राएं की होगी,लेकिन किन्हीं कारणवश आप अमरनाथ की यात्रा नहीं कर पाएं है, तो आपको एक बार बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों के लिए अवश्य जाना चाहिए. दम निकाल देने वाली खडी चढाइयां, आसमान से बातें करती, बर्फ़ की चादर में लिपटी-ढंकी पर्वत श्रेणियां, शोर मचाते झरने, बर्फ़ की ठंडी आग को अपने में दबाये उद्द्ण्ड हवाएं,जो आपके जिस्म को ठिठुरा देने का माद्दा रखती हैं,कभी बारिश आपका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है,तो कहीं नियति नटि अपने पूरे यौवन के साथ आपको सम्मोहन में उलझा कर आपका रास्ता भ्रमित कर देती है, वहीं असंख्य शिव-भक्त बाबा अमरनाथ के जयघोष के साथ,पूरे जोश एवं उत्साह के साथ आगे बढते दिखाई देते हैं और आपको अपने साथ भक्ति की चाशनी में सराबोर करते हुए आगे,निरन्तर आगे बढ़ते रहने का मंत्र आपके कानों में फ़ूंक देते हैं. कुछ थोड़े से लोग जो शारीरिक रुप से अपने आपको इस यात्रा के लिए अक्षम पाते हैं, घोड़े की पीठ पर सवार होकर बाबा का जयघोष करते हुए खुली प्रकृति का आनन्द उठाते हुए,अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं. सारी कठिनाइयों के बावजूद न तो वे हिम्मत हारते हैं और न ही जिनका मनोबल डिगता है, आपको निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करते हैं. रास्ते में जगह-जगह भंडारे वाले आपका रास्ता, बडी मनुहार के साथ रोकते हुए,हाथ जोडकर विनती करते है कि बाबा की प्रसादी खाकर ही जाईये. भंडारे में आपको आपके मन पसंद चीजें खाने को मिलेगीं. कहीं कड़ाहे में केसर डला दूध औट रहा है, तो कहीं अमरती सिंक रही होती है,बरफ़ी, पेड़ा, बूंदी, कचौडियां, न जाने कितने ही व्यंजन आपको खाने को मिलेगें, वो भी बिना कोई रकम चुकाए.

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ऐसा नहीं है कि यह नजारा आपकॊ एकाध जगह देखने को मिले,आप अपनी यात्रा के प्रथम बिन्दु से चलते हुए अन्तिम पडाव तक, शिवभक्तों की इस निष्काम सेवा को अपनी आँखों से देख सकते है. हमारी बस को जब एक भंडारे वाले( अब नाम याद नहीं आ रहा है) ने रोकते हुए हमसे प्रसादी ग्रहण करने हेतु विनती की,तो भला हममे इतनी हिम्मत कहां थी कि हम उनका अनुरोध ठुकरा सकते थे. काफ़ी आतिथ्य-सतकार एवं सुसुवादू प्रसाद ग्रहण कर ही हम आगे बढ पाए थे. मन की आदत बात- बात में शंका करने की तो होती है. मेरे मन में एक शंका बलवती होने लगी थी कि ये भंडारे वाले,अगम्य ऊँचाइयों पर जहाँ आदमी का पैदल चलना दूभर हो जाता है,यात्रा के शुरुआत से पहले अपने लोगों को साथ लेकर अपने-अपने पंडाल तान देते है. रसॊई पकाने में क्या कुछ नहीं लगता, वे हर छोटी-बडी सामग्री ले कर इन ऊँचाइयों पर अपने पंडाल डाले यात्रियों की राह तकते हैं और पूरी निष्ठा और श्रद्धाके साथ सभी की खातिरदारी करते हैं. वे इस यात्रा के दौरान लाखों रुपया खर्च करते हैं,भला इन्हें क्या हासिल होता होगा? क्यों ये अपना परिवार छोडकर, काम-धंधा छोडकर यात्रा की समाप्ति तक यहाँ रुकते हैं? भगवन भोले नाथ इन्हें भला क्या देते होंगे?

मन में उठ रहे प्रश्न का उत्तर जानना मेरे लिए आवश्यक था. मैंने एक भक्त से इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहा तो वह चुप्पी लगा गया. शायद वह अपने आपको अन्दर ही अन्दर तौल रहा था कि क्या कहे. काफ़ी देर तक चुप रहने के बाद उसने हौले से मुँह खोला और बतलाया कि वह एक अत्यन्त ही गरीब परिवार से है.रोजॊ-रोटी की तलाश में दिल्ली आ गया. छोटा-मोटा काम शुरु किया. सफ़लता रुठी बैठी रही. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? किसी शिव-भक्त ने मुझसे कहा-भोले भंडारी से मांगो. वो सभी को मनचाही वस्तु प्रदान करते हैं. बस, उसके प्रति सच्ची लगन और श्रद्धा होनी चाहिए. मैंने अपने व्यापार को फ़लने-फ़ूलने का वरदान मांगा और कहा कि उससे होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा वह शिव-भक्तों के बीच खर्च करेगा. बस क्या था,देखते-देखते मेरी किस्मत चमक उठी और मैं यहां आने लगा. मेरी कोई संतान नहीं थी. मैंने शिव जी से प्रार्थना की और आने वाले साल पर मेरी मनोकामना पूरी हुई. इतना बतलाते हुए उसके शरीर में रोमांच हो आया था और उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली थी.

इससे ज्ञात होता है कि यहाँ आने वाले सभी शिव भक्तों को भोलेभंडारी खाली हाथ नहीं लौटाते. शायद यह एक प्रमुख वजह है कि यहाँ प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में शिवभक्त आते है. यह संख्या निरन्तर बढ़ती ही जा रही है. दूसरा कारण तो यह भी है कि बर्फ़ का शिवलिंग केवल इन्हीं दिनों बनता है और हर कोई इस अद्भुत लिंग के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ करना चाहता है. और तीसरी खास वजह यह भी है कि लोग अपने नंगी आँखों से प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य देखना चाहते है. जो शिवभक्त हिम से बने शिवलिंग के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बनाना चाहते हैं, उन्हें जम्मू पहुँचना होता है. जम्मू रेलमार्ग-सड़कमार्ग तथा हवाई मार्ग से देश के हर हिस्से से जुड़ा हुआ है.

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1-जम्मु से पहलगाम( २९७ कि.मी ) _

जम्मु से पहला पडाव पहलगाम है. यात्री टैक्सी द्वारा नगरोटा-दोमल-उधमपुर-कुद-पटनीटाप-बटॊट-रामबन-बनिहाल-तीथर-तथा जवाहर सुरंग होते हुए पहलगाम पहुँच है. पहलगाम नूनवन के नाम से भी जाना जाता है. यह एक अतयन्त सुन्दर –रमणीय स्थान है. जनश्रुति के अनुसार भगवाअन शिव ने माँ पारवती को अमरकथा का रहस्य सुनाने के लिए एक ऐसे स्थान का चयन करना चाहते थे,जहाँ अन्य कोई प्राणी उसे न सुन सके. ऐसे स्थान की तलाश करते-करते श्स्सिव पहलगाम पहुँचे थे. यह वह स्थान है,जहाँ उन्होंने अपने वाहन नंदी का परित्याग किया था. इस स्थान प्राचीन नाम बैलगाम था,जो क्षेत्रीय भाषा में बदलकर पहलगाम हो गया. यात्री यहाँ भण्डारे में भोजन कर रात्री विश्राम करते हैं

2-पहलगाम से चन्दनवाडी-(16कि.मी.)

यात्री सुबह चाय-पानी का टैक्सी द्वारा चन्दनवाडी पहुँचता है. चन्दनवाडी के बारे में मान्यता है कि भोलेनाथ ने अपने माथे का चन्दन यहां छोडा था. यहाँ से कुछ दूरि पर प्रकृति द्वारा निर्मित 100मीटर लंबा पुल है,जो लिद्दर नदी के ऊपर बना है. पर्वत श्रृंखलाएं यहां अपना रुप-रंग बदलती जाती है. आगे की यात्रा थोडी कठिन है,जिसे घोड़े द्वारा तय की जा सकती है. clip_image008

3- चन्दनवाडी से शेषनाग-(13कि.मी.)

चन्दनवाडी से शेशनाग के लिए यह रास्ता काफ़ी कठिन तथा सीधी चढाई वाला है. पिस्सु घाटी होते हुए लिद्दर नदी के किनारे-किनारे मनोहर दृष्यों को निहरते हुए यात्री शेषनाग पहुँचता है. यह स्थल झेलम नदी का उदगम स्थल है,जिसे शेषनाग सरोवर भी कहते हैं. पहली झलक में यूं प्रतीत होता है कि कोई विशाल फ़णीधर(शेषनाग) कुण्डली मारे बैठा हो. झील के पार्श्व में खडी ब्रह्मा-विष्णु-महेश नाम की तीन चोटियां प्रकृति का एक महान चमत्कार ही है. इस झील का पानी नीला है. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने गले का शेषनाग का यहां परित्याग किया था. इसी कारण इसका नाम शेषनाग झील पडा. चारों ओर बर्फ़ से ढंकी पहाडियॊं को निहार कर यात्री धन्य हो जाता है. झील से थोड़ा आगे यात्रियों को रात्रि विश्राम करना होता है. यहां जगह-जगह भण्डारे लगे होते हैं,जहां यात्री अपनी पसंद के सुस्वादु भोजन से तृप्त हो जाता है.

4- शेषनाग से पंचतरणी-(12.6कि.मी.)-

सुबह होते ही यात्री चाय-पानी-नाश्ता कर पंचतरणी की ओर प्रस्थान करता है. मार्ग में महागुनस पर्वत है जिसकी ऊँचाई 14500फ़ीट है. महागुनस पर्वत अपने आप में एक आश्चर्य है. हरे-भूरे,कभी-कभी सिन्दुरी रंग में दिखाई देने वाले इस विशाल पर्वत तथा उस पर जमी बर्फ़ की परतों से सूरज की किरणें परावर्तित होकर लौटती है तो यह किसी बड़े हीरे की तरह जगमगाता दिखता है. ऊँचाई पर होने की वजह से आक्सीजन की मात्रा मे कमी होने लगती है,जिससे यात्री को सांस लेने में कठिनाई होती है. एक कदम आगे बढ़ाना भी दुष्वार सा लगाने लगता है. अतः यात्री को चाहिए कि वह यहां बैठकर थोडा सुस्ता ले और अपने आप को सामान्य स्थिति में ले आए. कपूर की डली भी उसे पास में रखनी चाहिए. उसे सूंधने में राहत मिलती है. यहां जोर आजमाइश करने की जरुरत नहीं है.

भगवान भोलेनाथ ने यहां अपने पुत्र श्री गणेश को छोड दिया था. तभी से इसका नाम महागणेश जो कालान्तर में महगुनस हो गया. थोडा आगे चलने पर पंचतरणी नामक स्थान आता है. ऐसा कहा जाता है कि जब शिव मां पार्वती को अमरकथा सुनाने के लिए यहां से गुजर रहे थे, तब उन्होंने नटराज का रुप धारण कर नृत्य किया था. नृत्य करते समय उनकी जटा खुल गई थी जिसामें से गंगा प्रवाहित होते हुए पांच दिशाओं में बह निकली. ऐसी मान्यता है कि भोले ने यहां पंच महाभूतों का यहां परित्याग कर दिया था. यात्री यहां रात्रि विश्राम करता है तथा जगह-जगह लगे भण्डारों मे भोजन करता है

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5-पंचतरणी से पवित्र गुफ़ा( 6 कि.मी)

पंचतरणी से 3कि.मी सर्पाकार पहाडियां चढकर 3कि.मी बरफ़ीली चट्टानॊं पर चलकर यात्री बर्फ़ से अठखेलियां करता, उत्साह के के साथ आगे बढता है, क्योंकि यहीं से वह दिव्य गुफ़ा के दर्शन होने लगते हैं. गुफ़ा को देखते ही यात्री की अब तक की सारी थकान काफ़ुर हो जाती है.

समुद्र सतह से 12730 फ़ीट की ऊँचाईं पर 60फ़ीट चौडी,25फ़ीट लंबी तथा15फ़ीट ऊँची गुफ़ा में यात्री की आँखें प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग को निहारकर धन्य हो उठती हैं. यहीं हिम से निर्मित मां पारवती के भी दर्शन होते हैं. गुफ़ा के ऊपर रामकुण्ड है, जिसका अमृत समान जल गुफ़ा मे प्रवेश करने वाले यात्रियों पर बूंद-बूंद टपकता है.

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हजारों फ़ीट ऊपर से प्रकृति का अद्भुत नजारा देखकर काफ़ी प्रसन्नता का अनुभव होता है. गुफ़ा के पास ही हैलीपैड भी बना हुआ है,जहां से आप हेलिकाप्टर को पास से उतरता तथा आसमान में उडान भरते देख सकते हैं. वे यात्री जिनके पास समय कम है अथवा वे शारीरिक रुप से कमजोर हैं,इस सेवा का लाभ उठा सकते हैं. आपकी यात्रा के शुरुआती बिन्दु से लेकर यात्रा के अन्तिम पड़ाव तक भारतीय फ़ौज के जवान दिन-रात आपकी सुरक्षा में तल्लीन रहते हैं. कभी-कभॊ घुसपैठिये इस यात्रा में विध्न उतपन्न करने से बाज नहीं आते. फ़ौज के रहने से आपको चिन्ता करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है.

भगवान अमरनाथ के दर्शन-पूजा-पाठ आदि के बाद यात्री अपनी यात्रा से वापिस लौटने लगता है. यहाँ से एक छोटा रास्ता नीचे उतरने के लिए बालटाल होकर भी जाता है.यदि आप इस काफ़ी उतार वाले रास्ते का चयन करते हैं तो आपको रास्ते मेंलेह-लद्दाख-कारगिल-सोनमर्ग-गुलमर्ग होते हुए श्रीनगर आया जा सकता है. यहां आकर आप शिकारे का आनन्द उठा सकते हैं. कश्मीर का यह पिछला हिस्सा सौंदर्य से भरपूर है. प्रकृति नटी का अनुपम नजारा आपको यहां देखने को मिलता है.

अमरनाथ की यात्रा यद्यपि कठिन अवश्य है,लेकिन मन में यदि उत्साह और उमंग है तो निःसन्देह इसमें आपको भरपूर मजा आएगा. यदि आपने प्रकृति के इस अद्भुत नजारे तो नहीं देखा तो सब बेकार है. अतः एकबार पक्का मन बनाइये और बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों का लाभ उठाइये. यात्रा करने से पहले हमें क्या-क्या करना चाहिए और कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए, उस पर थोड़ा ध्यान दिए जाने की जरुरत है.

1-यात्री अपना नाम-पता-टेलीफ़ोन नम्बर-मोबाइल नम्बर आदि को अपनी जेब में अवश्य रखें और साथ ही अपने साथियों के नाम पते भी रखे,जो जरुरत पड़ने पर बडा काम आएगा.

(2) अपने साथ सूखे मेवे,नमकीन अथवा भूने चने तथा गुड अवश्य रख लें.

(3) सर्द हवा से चेहरे को बचाने के लिए वेसलीन,मफ़लर,ऊनी दास्ताने,बरसाती,मोजे,कोल्ड क्रीम साथ रखें ,क्योंकि यहां कभी भी बारिश अथवा बर्फ़ पड सकती है. खुला आसमान और खुली धरती के बीच आपको यहां रहना होता है. फ़िर यहां टैंटों के अलावा कोई शैड-वैड आपको देखने को भी नहीं मिलेगे

( 4) यदि आप पिट्टु या घोड़े वाले को साथ लेते हैं तो उनका रजिस्ट्रेशन -कार्ड अपने पास रख लें और यात्रा की वापसी में लौटा दें.

(5) रास्ता उबड-खाबड अथवा फ़िसलन भरा मिलेगा ही, अतः जूते वाटरप्रूफ़ तथा ग्रिप वाले ही पहनें.

(6) चढाई करते समय थक जाएं तो बीच-बीच में आराम करते चलें. अपने आपको ज्यादा थका देने का प्रयास न करें.

(7) आवश्यक दवाएं अपने पास रखें. हालांकि यहां पर पूरी व्यवस्था सरकार बना कर चलती है,फ़िर भी अपने पास दवाओं का किट रख लें.

(8) मुझे यह कहने मे तनिक भी संकोश नही हो रहा है कि हम भारतियों मे यहां-वहां कचरा फ़ेंक देने की बुरी आदत है. कृपया इससे बचें. अपनी खाली प्लास्टिक की बोतलें अथवा प्लास्टिक की थैलियां यहां –वहां न फ़ेके. जब गांव-शहर में ही समुचित सफ़ाई की व्यवस्था हम नहीं बना पाते तो पहाडॊं के दुर्गम स्थान पर कौन सफ़ाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा. कई सज्जन लोग बोतल को आधी भरकर उसे नदी मे बहा देते हैं. पता नहीं, अनजाने में ही हम पर्यावरण का कितना नुकसान कर बैठते हैं.

(9) मेडिकल फ़िटनेस का सर्टिफ़िकेट यात्रा से पूर्व अवश्य बनवा लें.(

(10) भारत सरकार ने चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कड़े बन्दोबस्त किए हैं. इसके अलावा आपकी निगरानी के लिए हेलीकाप्टर से भी नजर रखी जाती है. अतः सैनिकों के द्वारा दिए गए निर्देशों का कड़ाई से पालन करे.

--

संपर्कः

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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गरिमा जोशी पंत की कविताएँ

गुलदाऊदी लगाऊंगी

इस बार मैं भी गुलदाऊदी लगाऊंगी।

हां मैं भी

मेरा घर बहुत छोटा है

उसमें कोई बगीचा नहीं

तो क्या

गमले में लगाऊंगी

हां इस बार मैं भी गुलदाऊदी लगाऊंगी।

बड़े बड़े गुंदे फूल लगेंगे

सफ़ेद पीले अलग से लाल सफेद से झांकते गुलाबी भी

इस आशा से गुलदाऊदी लगाऊंगी

कैसे कब लगती है पौध

खांचेदार पत्तियां कब बड़ी हो जाती हैं

खब कलियां आती हैं

कब कब पानी से सीचूंगी

इधर उधर से पूछूंगी

पर मैं अवश्य ही गुलदाऊदी लगाऊंगी।

कीटों से बचाने उन्हें

नीम की पत्तियों का काढ़ा पिलाऊंगी।

धूप आंधी से बचाने

अपनी तन्मय देखभाल का आंचल फैलाऊंगी

हंा मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी।

और फिर एक दिन कलियां आएंगी

रंगबिरंगे फूल खिलेंगे

और फिर मैं भी अमीर आधुनिकाऔं की तरह

ञ्ल्के फुल्के कपद़े पहने

अपनी सखियों को उन्हें दिखाने बुलाऊंगी

जब मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी

और कुछ ना सही उन्हें पकौड़ों के संग चाय पिलाऊंगी

जश्न होगा

नकली ही सही पर कहकहे लगेंगे

उस हंसी को खोजने और बंाटने के लिए

मैं गुलदाऊदी लगाऊंगी।

मुस्कुराने का बहाना ढूंढना है

मुस्कुराते फूलों में मिल जाएगा

कड़ी मेहनत के बाद मुस्कुराते फूलों में मिल जाएगा

इसलिए मैं भी गुलदाऊदी लगाऊंगी।

 

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खिल गई गुलदाऊदी

बहुत खुश हूं

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

छोटी छोटी नाज़ुक पौध थी

पानी डाला खाद डाली

गुड़ाई की नराई की

इससे पहले जबकि

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

कई रंगों की खिली खिली कलियंा

जैसे सूरज की किरणों से ताल मिलातीं

ऐसी मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

महक नहीं थी पर एक

सकारातमक ऊर्जा फैलाती

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

गौरवान्वित हो मेरा

व्यक्त़ित्त्व निखर गया

जबसे मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

लोग आए मिलने

जैसे किसी नन्हे नवजात से

राय लेते गए कुछ थमा गए कि

कैसे मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

आप कहोगे कि ऐसी भी क्या बात हो गई बड़ी

कि ऐसा दीवानापन हां भई खिल गई खिल गई

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

पर आप नहीं समझोगे

समझाने का मन भी नहीं मेरा

ना ही कोरी बहस में पड़ने का

मैं खुश हूं कि

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

दौड़ती भागती शहर के हर मोड़ से

लड़ती झगड़ती

कई चेहरे बदलती

कितने तेजाबों से नित नहाती

पानी की निर्मल बूंदों को तरसती

दिब्बों से बंद घरों में

पसीना पसीना हो जाती मेरी जिंदगी

पल भर सुकून भरी मुस्कान पा जाती है

जबसे घर के उस कोने में रखे गमलों में

मेरी गुलदाऊदी खिल गई।

 

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मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ व गीत

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बेटी

बेटी,सखी,

माँ का दुलार!

बहन का स्नेह,

हंसी के पल!

मुस्कराहट के क्षण,

जीवन का उदय!

फूलों की डगर,

मंजिल का पता!

उम्मीद की राहें!

बेटी हर पिता का गुरुर है!

पूरा सच यही है,

कि कोई सच नहीं बोलता!

 

इश्क

इश्क ही आंच,

बुझ ना जाये!

इस लिए हर पल,

हवा देती हूँ

मुहब्बत के चूल्हे में,

हर वक्त अंगारे,

सुलगाये रखती हूँ !

गाहे-बगाहे,

तीली भी दिखाती हूँ,

जब लौ फडफडा,

उठती है तो!

गहराई से प्यार की,

रोटी सिंकती है!

फिर जी भर के

सेंक लेती हूँ,

अपनी मुहब्बत को!

 

स्वाद

दरातों से काट-काट कर,

मौसम की फसलें!

हर मौसम को, 

चखा है मैंने!

कुछ मैने थाली,

भर-भर के खाए!

कुछ बस कटोरी, 

भर कर!

कुछ को मैंने, 

बस चम्मच ही

से चखा,

कितने स्वादिष्ट थे!

कुछ पल,

कुछ खट्टे केरी जैसे,

उनमें से कुछ थे!

करेले जैसे,

फिर भी मैंने!

स्वाद ले ले कर,

खाया!

जैसे भी थे, वो

मेरी फसलें थीं!

 

दरारें

रिश्तों के चिकने,

फर्श पर!

पड़ी दरारों का

वापस पहले सा!

समतल दिखना,

महज एक मन,

का भ्रम है!

सतह में जाने,

कितने खड्डे!

मुंह उठाये,

पड़े रहते हैं!

--

हद

आज तो शब्दों ने

हद कर दी!

रात भर जेहन में

रेंगते रहे!

नींद में भी

ताने-बाने बुनते रहे!

बहुत कोशिश की,

जाल से बाहर!

निकल आने की,

पर उलझती गयी!

--

 

लम्हें

सिरहाने कितने लम्हे,

यूं हीं बिखरे पड़े थे!

फड-फड़ा रहे थे,

सिमटने के लिए!

पर ज्यादा बिखर गये,

शोर बढ़ता गया!

फिर अँधेरे में,

गुम हो गये,

टूटी हुई टहनियों

की तरह कमजोर!

कुछ पाँवों तले

कुचले गये,

कुछ सिकुड़ कर

छोटे हो गये!

 

पथ

मैं पथ गीला,

नहीं होने दूंगी!

अश्रुओं से,

मैं मन मैला,

नहीं होने दूंगी!

कडवे बोलों से,

थमने ना दूगीं!

गति को,

वेग से चलूंगी,

धरती सा धैर्य,

गढ़ूंगी!

विजय पथ पर,

बढूंगी,

उंची-नीची,

डगर देख

पाँव ना,

फिसलने दूंगीं

मैं पथ गीला,

ना होने दूंगी

---

 

जाग्रति के पथ पर सदा,

पांव रक्त-रंजित होते रहे!

नव चेतना, नव कल्पना पर,

फिकरे कसे जाते रहे सदा!

पर  गति कहाँ विश्राम लेती है,

ना वो कभी अधीर होती है!

 

--

एक भूखे बच्चे ने माँ से पूछा

ये जो गोल गोल सूरज है

सुबह-सुबह निकल आते हैं

चाँद जिसे हम मामा कहते

शाम ढलते ही आ जाते हैं

क्यों फिर माँ गोल-गोल रोटी

मुझ को रोज नहीं मिलती है

 

--

उजड़ी बस्ती

उजड़ी उजड़ी,

बस्तियों का

बन गया है!

निशान

मेरा भारत,

कुछ बंजर पड़ी

झुर्रियों से भरी

प्यासी धरती!

कुछ कचरे से

भरे कुँए

मरती हुई

कुछ उम्मीदें!

जहाँ हर पल

जिन्दगी मुस्काती थी,

, जहाँ की मिटटी भी

सोने सी बिकती थी!

वहीं आज किसान की

मौत बिक रही है

राज नेताओं की

रोटी सिंक रही है!

--

 

संसार

एक दरी, एक चादर में

लिपटा है सारा संसार!

एक लोटा पानी बस,

एक छ्लनी बरसात!

एक रोटी, एक कटोरी

दाल जिनका है!

जीवन सार फिर भी,

लिपटा रहता है!

सारे विकारों में

तेरा मेरा, उसका, जिसका

कहाँ काम आता है!

रुई की डोरी से,

जकड़ी सांसें हैं!

कुछ पल साथ

बिताले हंस के,

बस वही जायेगा

तेरे साथ!

एक गज जमीन

चार कंधे,दो आंसू

मिल जाये तो

बस समझ लेना

मिल गई इंसानी

योनि से मुक्ति!

 

चांदनी

जैसे ही छत का दरवाजा खोला मैंने

चांदनी लपक कर मेरे पास आई

और बेताबी से बोली मुझे

क्या मैं तुम्हारे घर पर फैल जाऊं

मैंने उसे आश्चर्य से देखा

और गुस्साए शब्दों से बोली

तू वहाँ क्यों नहीं फैलती जाकर

जहाँ एक दिया भी नहीं है

मेरे घर में बहुत रौशनी है

क्या तुझे भी इंसानों सी

आदत लग गयी है

जहाँ सब कुछ है वहीं

मडराती रहती है पर जहाँ

जरूरत है वहाँ से मुहं फेर लेती है

 

---

सोने की तरह,रिश्ते भी

जीवन की भट्टी में

तपाकर बनाना,

तो शायद जंग लगे लोहे

से बदरंग नहीं होंगे

--

(ऊपर का चित्र - निवेदिता की कलाकृति)

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1․बादल
रोज निहारूँ नभ में तुझको,
काले बादल भैया।
गरमी से सब प्राणी व्‍याकुल,
रँभा रही घर गैया॥

पारे जैसा गिरे रोज ही,
भू के अन्‍दर पानी।
तल-तलैया पोखर सूखे,
बता रही थी नानी॥

तापमान छू रहा आसमां,
प्राणी व्‍याकुल भू के।
बिजली खेले आँख मिचोली,
झुलस रहे तन लू से॥

जल का दोहन बढ़ा नित्‍य है,   
कूँए सूख गए हैं।
तुम भी छुपकर बैठे बादल,
लगता रूठ गए हैं॥

गुस्‍सा त्‍यागो, कहना मानो,
नभ में अब छा जाओ।
प्‍यासी नदियाँ भरें लबालव,
इतना जल बरसाओ॥

छप-छप, छप-छप बच्‍चे नाचें,
अगर मेह बरसायें।
हर प्राणी का मन हुलसेगा,
देंगे तुम्‍हें दुआयें॥
------------------
(2) धूप

जाने कब घुसती खिड़की से,
कमरे में ये प्‍यारी धूप।

सुबह को मीठी आती नींद।
मुझे बहुत ही भाती नींद॥

सोती रहती, सोती रहती,
मुँह को चूमे न्‍यारी धूप।

देख रही में अपना पिटना।
समझ रही मैं देखूँ सपना॥

पीट रही माँ कहती अब उठ,
लगी लौटने सारी धूप।

जाड़े में लगती है प्‍यारी।
धूप सेकना है हितकारी॥

पर सरदी में ये हो जाती,
बहुत बड़ी नखरारी धूप।

मन को कभी सुहाती धूप।
तन को कभी जलाती धूप॥

बिना कहे संध्‍या को जाती,
ऐसी है बजमारी धूप।
---------

सन्‍तोश कुमार सिंह
कवि एवं बाल साहित्‍यकार
मथुरा।
मोबाइल 9456882131

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ग़ज़ल 21

क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II

माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II

 

जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ,

जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ II

 

ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी ,

उनका दिल तक कर हसीनाओं को न धड़के यहाँ II

 

कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ ,

अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ II

 

कुछ कुसूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो ,

रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ II

 

उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें ,

जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ II

 

पहले थर्राते थे दरवाज़ो शज़र तूफाँ से सच ,

खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ II 

 

               

कविताएँ 

(1) अगर तुझे कवि बनना है

कविता के लिए विषय ढूंढना /

निशानी नहीं है/ 

कवि होने की/

कविता तो परिभाषित है/ 

कवि कर्म रूप में /

फिर क्यों इतनी परवाह विषय की /

प्रेरणाओं के तत्वों की /

कविता लिखने का संकल्प मात्र /

कविता को जन देगा /

तू लिख .....और सुन.......

गोल पत्थर को छील काट कर /

फ़ुटबाल बना देना /

लम्बोतरे को 

डंडा या खम्भा /

या टेढ़े मेढ़े को 

सांप बना देना /

मौलिक नहीं नक़ल होगा /

गोले में गेंद की कल्पना 

बालक भी कर लेगा /

कवि तो सुना है ब्रह्मा होता है /

अरे ओ शिल्पकार 

मज़ा तो तब है 

जब तेरे सधे हुए हाथ /

तेरी छैनी हथौड़ी /

सुकृत विकृत पत्थर को/ 

जो उससे दूर दूर तक न झलके 

वैसा रूपाकार दें /

और तराशते समय निकलीं 

एक एक छिल्पी /

एक एक किरच /

ये भी निरूपित हों /

जैसे 

घूरे से बिजली /

गंदगी से खाद /

सृजन तो ये है /

तू ऐसा ही कवि बनना ,

बुनना उधेड़ मत करना I


(2) दूसरों के लिए

बार बार 

संपादक /प्रकाशक की 

''सखेद वापस'' की टिप्पणी 

सहित लौटी 

रस छंद अलंकार 

कथ्य और 

सार्थक उद्देश्य से आप्लावित

जैसा कि आप मानते हैं 

और मैं आप पर बड़ा विश्वास रखता हूँ 

आपकी अनन्य अद्भुत और 

नितांत मौलिक काव्य कृति 

हफ़्तों महीनों या वर्षों की 

कड़ी मेहनत से 

बड़े अरमानो से जिसे आपने 

तैयार किया था 

जब 

रद्दी कागजों का 

एक पुलिंदा मात्र बनकर रह जाती है 

दिलो जान से कवि होकर भी आप 

कवि की संज्ञा प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं 

तब 

यदि उसे जला नहीं डालते निराश होकर 

तो 

आप उसे 

यूं ही दे  देते हैं 

किसी नामी गिरामी कवि या गीतकार को 

अथवा बेच देते हैं 

चाँद रुपयों में 

बिना नाम के 

अगले ही दिनों वह मचा देती है खलबली 

साहित्य जगत में 

ध्वस्त कर देती है 

बिक्री के सब कीर्तिमान 

पूर दिया जाता है उस खरीदार को 

पुरस्कारों और नकदी से 

वह हो जाता है 

रातों रात ध्रुव  तारा 

आप ज़िन्दगी भर कविताएँ लिखते हैं 

उसके नाम से 

अपनी आजीविका के लिए 

बेचते हैं 

लिखते हैं 

बेचते हैं 

पर उम्र भर 

कवि नहीं कहला पाते 

खरीदार कवि बन जाते हैं I 

 

(3) ढांपने वाला डिज़ाइन बनाओ

कविता कहानी उपन्यास या नाटक 

जो चाहे उठाओ 

अभी भी शेष है 

साहित्य की तमाम विधाओं में 

आना वह नई बात 

जिसे पढने के लिए 

चाट डालता है बहुत कुछ अखाद्य भी 

बहुत दिनों का कोई भूखा जैसे 

बहुत कुछ अपठनीय भी 

न चाहकर भी पढ़ डालती है 

नई पुस्तकाभाव में 

एक पुस्तक प्रेमिका 

सचमुच

लेखक और कवि कुछ नहीं सिवाय दर्जी के 

सभ्य-आधुनिक-आकर्षक शब्दों में 

फैशन डिज़ाइनर के 

जो सिला तो करते हैं 

तन ढांपने को 

वस्त्र 

देखने में जो होते हैं 

बहुत आकर्षक और भिन्न 

सभी 

आतंरिक या बाह्य परिधान 

किन्तु सिलते तो आखिर कपडा ही हैं 

वह सूती खादी रेशम या टेरिकाट  चाहे जो हो 

वही हुक वही काज वही बटन 

वही जिप वही इलास्टिक 

(जैसे पञ्च तत्वों से निर्मित अष्टावक्री या

सुडौल काया किन्तु महत्वपूर्ण आत्मा )

साहित्यकार रूपी लेडीज़ टेलर 

गीतों के ब्लाउज 

कविता के पेटीकोट 

छंदों की मीडियां

मुक्तक  के टाप

उपन्यास की साड़ियाँ 

लघु कथाओं की चड्डीयाँ

भले ही 

अपनी बुद्धिमत्ता को प्रमाणित करते हुए 

बाजारवाद के हिसाब से 

मांगानुसार सिल रहा है 

किन्तु वह कपडे को बदनाम कर रहा है 

क्योंकि उसका डिज़ाइन 

ढाँकने की बजाय 

नंगा कर रहा है I 

 

 

(4) चित्रकला जीविका के लिए

दृष्टि

कहीं भी 

फेंकिए डालिए या लगाइए 

जैसा यहाँ ये दृश्य है 

लगभग सभी कैनवास 

जितनी भी होती हैं 

एक दो तीन चार या दस 

बल्कि ऊपर और नीचे भी 

सभी दिशाओं के 

रंगे पुते गुदे पड़े हैं 

लगभग लगभग ऐसे ही परिदृश्यों से 

तूलिका रंग और कैनवास 

ऐसे दृश्यों की 

बारंबारता के 

कदापि नहीं हैं गुनाहगार 

बल्कि है तो वह चित्रकार 

जो 

कला के लिए नहीं 

मनोरंजन के लिए नहीं 

जीवन के लिए नहीं 

पलायन के लिए नहीं 

आत्म साक्षात्कार के लिए नहीं

सेवा के लिए नहीं 

बल्कि अपनी कला को 

प्रदर्शित करता है आजीविका के लिए 

बखूबी ये जानकर कि

कला बेची नहीं जाती 

बेचता है भरण पोषण के लिए 

हाथ कंगन को आरसी क्या 

बाजारवाद के इस युग में 

वही तो खरीदा जायेगा 

जिसे हम खरीदने के लिए 

देखते हुए 

यह भी देखते हैं 

कि कोई यह देखते हुए 

हमें देखता तो नहीं 

यानि वह चित्र जो 

खंडित करता है 

हमारे ब्रह्मचर्य को 

और जब सपरिवार भूखा चित्रकार 

ऐसे तथाकथित चित्र  प्रेमियों को 

अपनी चित्रकला  

बेचता है ऊंचे दामों में 

तब हो जाता है गुनाहगार ....

खरीदार 

जब सच्चे चित्रकार भूखे मरते हैं 

आवरण युक्त चित्र पड़े पड़े सड़ते हैं 

नंगे धड़ा धड़ बिकते हैं 

तब होता है गुनाहगार ....

समाज 

 

 

(5) दृष्टव्य बंधन

जो तुम चले जाते हो

तो 

ये बहुत बुरा लगता है 

कि 

मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगता 

मैं चाहता हूँ 

मुझे सबसे अच्छा लगे 

जब तुम मेरे पास रहो 

क्योंकि 

हम बंधे हैं उस बंधन में 

चाहे किसी परिस्थितिवश 

जब तक दृष्टव्य है यह बंधन 

सर्वमान्य है जिसमें यह 

कि एक पल का बिछोह 

या क्षण भर की ओझलता

कष्टकारी होती है 

रुद्नोत्पादी होती है 

सख्त कमी की तरह खलती है 

कुछ करो कि 

मैं तुम्हारे बिना 

अपना अस्तित्व नकारुं 

तुम्हे तड़प तड़प कर 

गली गली कूंचा कूंचा पुकारूं 

जैसे नकारता पुकारता था 

इस बुरा न लगने की परिस्थिति से पहले 

क्या हो चुका है हमें

तुम भी बहुत कम मिलते हो 

मुझे भी इंतजार नहीं रहता 

तुम जाने को कहते हो 

मैं रोकता नहीं हूँ 

तुम्हे भी अच्छा लगता है  

मुझे भी अच्छा लगता है 

हमें एक दूसरे से 

जुदा होते हुए 

सिर्फ बुरा लगना चाहिए

सिर्फ बुरा ही लगना चाहिए I 

 

 

(6) मौत का वक़्त

जब हम हँस रहे हों 

किन्तु 

फूहड़ कामेडी देखकर 

अथवा 

भद्दा चुटकुला सुनकर नहीं 

बल्कि हम खुश हों 

संतुष्ट  हों यह जानकर 

अथवा समझकर 

भले ही वह झूठ हो कि 

हमने पूरे कर लिए हैं वे कर्तव्य 

निभा डाली हैं वे सारी जिम्मेदारियां 

जो हमारी अपने बड़े बूढों के प्रति थीं 

बच्चों के प्रति थीं 

देश दुनिया समाज के प्रति थीं 

और जब हम अपना सम्पूर्ण दोहन करा चुके हों 

हमारे रहने न रहने से 

किसी को कोई फर्क पड़ना शेष न रह गया हो 

हमारी उपयोगिता समाप्त हो चुकी हो 

यद्यपि हम अभी उम्र में जवान हों 

पूर्णतः स्वस्थ हों और हों निस्संदेह दीर्घायु 

आगे जीना सिर्फ सुखोपभोग के लिए रह गया हो शेष 

तथापि एन इसी वक़्त 

किसी डूबते को बचाते हुए 

किसी के द्वारा किसी को चलाई गई गोली 

धोखे से अपने सीने में घुस जाते हुए 

या सांप से डस लिए जाने से 

या हृदयाघात से 

और नहीं तो 

स्वयं ही फंदे पर झूल जाकर 

अपने जीवन का अंत हो जाना 

अपनी मृत्यु का सौन्दर्यीकरण होगा 

मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि 

हमारी मृत्यु को लोग 

महात्मा गांधी का क़त्ल समझें 

या रानी लक्ष्मीबाई की आत्मह्त्या या 

भगत सिंह,  खुदीराम, चन्द्र शेखर आज़ाद की 

कुर्बानी समझ कर 

कारुणिक चीत्कार  अथवा मूक रुदन करें 

किन्तु अवश्यम्भावी 

विशेषतः तवील वक़्त से चली आ रही 

घोषित असाध्य बीमारी 

जो अपने तीमारदारों को भी 

हमारी शीघ्र मुक्ति (मृत्यु) कामना को 

मजबूर करती है 

ऐसी मृत्यु 

चाहे कार्यरत प्रधानमंत्री 

राष्ट्रपति या जनप्रिय अभिनेता अभिनेत्री 

या अन्य किसी अच्छे -बुरे व्यक्ति की हो 

मृत्यु का वीभत्स नज़ारा है 

कितु चाहने से क्या होता है कि

मौत हो तो अनायास हो 

कटी टांग का घोडा गोली खाकर ही कीर्ति को प्राप्त होता है I 

 

 

(7) कसाई का बकरा बनना चाहता हूँ

झुण्ड में बकरियों के 

नौजवान इक बकरा 

गोपिकाओं में सचमुच 

कृष्ण सा दिखाई दे

जबकि भरे यौवन में 

तरसता अकेला हूँ 

किन्तु कसम बकरे की 

लोभ नहीं मैथुन का 

मेरी नज़र में तो बस 

उसका कसाई के घर 

काटने से पहले तक 

पुत्र सा पाला जाना है 

मरने से पहले उसको हर 

वो ख़ुशी मयस्सर है

जो कि गरीब इन्सां को 

ख्वाब में भी दुष्कर है 

दो जून की रोटी को 

दिन रात काम करता है 

फिर भी इतना मिलता है 

पेट नहीं भरता है 

और अगर मरता है 

खाली पेट मरता है 

बकरा बेफिक्र 

भरे पेट कटा करता है 

अपने गोश्त से कितने 

पेट भरा करता है 

हम तो न पाल पाते हैं

और न पले  जाते हैं 

क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं 

बेरोजगार दुनिया में 

सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं 

बकरे नहीं मरा करते 

वे तो कुर्बान होते हैं 

जो कुर्बान होते हैं 

वे महान होते हैं 

मुझको बकरा बनना है 

जन्म अगर हो अगला I 

 

 

(8) हत्या का आवेदन

उनसे 

मुझसे 

मठे से 

नमक के घोल अथवा तेजाब से

किन्तु गुस्से से नहीं

महज भावावेश में भी नहीं 

और हताश होकर तो कदापि नहीं 

बल्कि प्रेम से 

चेतना की परिपूर्णता में 

और स्वेच्छा तथा आत्म विश्वास के समंदर में 

मेरी सब तमन्नाओं की

मूसला और झकड़ा

दोनों जड़ें

अंतिम स्नान चाहती हैं 

जो कभी मेरे खून पसीने से 

गहरा - छितरा रही थीं 

मानस की उर्वरता को जकड रही थीं 

आज बेताब हैं उखड़ने को 

मुझसे उन्हें 

अपनी अमूर्तता चिर स्थाई लगती है 

जबकि वे सजीव होना चाहती हैं 

बंगला ,गाड़ी ,नौकर-चाकर ,

सुरा-सुंदरी ,डालर -पौंड आदि आदि रूपों में 

वे समझ चुकी हैं मुझपे अब सूखा मच रहा है 

बूँद बूँद से मै उनकी प्यास नहीं बुझा सकूंगा 

तडपा तडपा कर मार दूँगा 

अतः वे दूरदर्शी तमन्नाएँ 

किसी योग्य 

ऊगते सूरज ,

या पानी भरे मेघ के यहाँ जन्मना चाहती हैं 

बड़ी ज़ल्दबाज़ी है उन्हें 

वे सोचती हैं 

कल मरना ही है तो आज अभी क्यों नहीं ?

वे आत्मा की तरह अमर हैं 

और पुनर्जन्म में उनका पूर्ण विश्वास है 

अतः मेरे यहाँ से मरकर 

कहीं और अवतार लेने की तमन्ना से 

मुझको सविनय 

अपनी हत्या कर डालने का 

आवेदन पत्र लिख रही हैं I

 

 

(9) सोचो

अपनी ही रचना है भाग्य 

आश्चर्य !

अपने ही स्रजन को तुम बुरा कहते हो 

न पा सके उसे जिसे चाहते थे तुम 

मगर क्यों ?

क्या तुम खुद न थे इसका एकमेव कारण ?

देखो झूठ बोलना घोर पाप है 

तुम्हीं कहा करते थे ;अक्सर 

गाहे बगाहे , जब तब 

जहाँ चाह  वहां राह

तुम्हारी भटकन 

तुमसे न सही या शायद तुमसे भी 

भले तुम न कहो 

चीख-चीख कर करती है ये चुगली 

कि तुम 

चल रहे थे जिस राह पर 

सिर्फ क़दम थे तुम्हारे वहां 

भटक रहा था किसी और राह पे 

किसी और को तलाशता तुम्हारा मन

जिसे तुम कहते थे मंजिल

थी वो औरों की दी हुई विवशता 

सलाह थी बिन मांगी 

वो हाथी का दिखाने वाला दांत थी 

ईख तो तुम आज तक भी न ढूंढ सके 

चबाने वाले दांत किस काम के ?

परखो .....तुम खुद के प्रति अपनी ईमानदारी 

वरना काटने को तो पत्थर भी काट दिए हैं रस्सियों ने

तुम सब कुछ नहीं पा सकते बिना परिश्रम के ;

भाग्य  भी ...ये मैं नहीं लोग कहते हैं 

एकनिष्ट भक्त कि अनन्य भक्ति से ही 

प्रकट करता है दानव के सम्मुख 

भगवान को 

विवश करता है मनचाहा वर देने को I

           

 

(10) कैसा बसंत ? (विरह गीत )

जब पास नहीं हैं कन्त,अरे कैसा बसंत ?

हिरदै में विरह जीवंत ,अरे कैसा बसंत ?

देके पहली रात ही सदमा ,

ऐसे निकले घर से बलमा ,

हो गए साधू संत ,अरे कैसा बसंत ?

खुद को उनसे पूरा जोड़ा ,

इक पल उनका ध्यान न छोड़ा ,

सिल ही रहे भगवंत ,अरे कैसा बसंत ?

होंठ सिले चेहरा उतरा ,

मन में ऐसा फैला पसरा ,

दुःख दर्द असीम अनंत ,अरे कैसा बसंत ?

फूलों कि नहीं इक डाल जहाँ ,

काँटों से भरे जंजाल जहाँ ,

औ' चलना वही हो पंथ ,अरे कैसा बसंत ?

इक दो घर बस हँसते गाते ,

दस बीस सिसकते चिल्लाते ,

घर घर जो नहीं आनंद ,अरे कैसा बसंत ?

--

   

हिंदी की दुर्दशा

 

अंग्रेजी  ने  हिंदी की  चिंदी  चिंदी  कर  डाली है II

अपने  ही घर से  रुखसत बेचारी  होने  वाली है II

अंग्रेजी का ज़हर देश में  नित्य फैलता जाता  है ,

मृतभाषा की इक मिसाल अब हिन्दी होने वाली है II

हिन्दी सी वैज्ञानिक भाषा दुनिया में न होगी पर ,

यह भाषा जाहिल गंवार लोगों की होने वाली है II

अपने ही घर में जब दूजे हुक्मरान बन आते हैं ,

समझ लीजिये घर वालों की छुट्टी होने वाली है II

पढ़ालिखा वो नहीं जो हिन्दी में लिखता बतियाता है ,

पढ़े लिखों की  भारत में अंग्रेजी बोली चाली है II

हिन्दी शिक्षक अंग्रेजी में हिन्दी को समझाते हैं 

लगता है अब रोमन लिपि हिन्दी की होने वाली है II

____________________________________

 

फिर चुनाव आये

           

फिर चुनाव  सर आ बैठे  पहुंचेंगे अब  दर  दर  नेता II

भीख वोट की झुक झुक मांगेगे आकर घर घर नेता II

ये गूलर के फूल फकत मिलते हैं मतलब की खातिर 

फिर  मशाल  ले  ढूंढोगे आयेंगे  नहीं  नज़र नेता II

एक  वोट की खातिर  सौ सौ  झूठ सत्य सा बोलेंगे 

कितने ही  कसमें वादे  ये  करेंगे सर छूकर नेता II

बात जीत की छोडो बस मतदान ही तो हो जाने दो 

जिनके  पैर  पखारेंगे  कल  मारें गे ठोकर  नेता II

किसे वास्ता है जनहित से किसे देश की चिंता है ,

धन और नाम कमायें कैसे करते यही फिकर नेता II

संस्कार आदत स्वभाव कैसे वर्षों के छूटेंगे ,

एन  केन  बन  जाएँ  डाकू कातिल भी रहबर नेता II

सोच रहा हूँ किसको अपने मत का दान करूंगा मैं ,

मेरी  नज़रों  में  नालायक  नाकाबिल है  हर नेता II

_____________________________________

           [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

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मोहनी राधिका से कह रही थी ‘देख बेटी परिवार के बुजुर्ग तुम्हें कॉलेज भेजने के खिलाफ थे। लेकिन मैंने सबको समझा-बुझाकर मना लिया कि मोहल्ले की किसी एक लड़की की गलती की सजा सभी लड़कियों को देना कहाँ का न्याय है ? कुछ भी हो अपनी राधिका वैसी नहीं है। उसको हमने अच्छे संस्कार दिए हैं। वह हम लोगों का नाम रोशन करेगी। अतः बेटी हमारी लाज रखना। सुमन की तरह कुछ मत करना कि समाज में हम लोगों की नाक नीची हो’।

राधिका बोली ‘क्या आपको मुझपे विश्वास नहीं है ? माँ जी मैं कसम लेती हूँ कि कभी भी और कुछ भी आप से नहीं छुपाऊँगी। और न ही कुछ ऐसा करूँगी जिससे आपको अपने निर्णय पर पछताना पड़े’।

राधिका कॉलेज जाने लगी। फर्स्ट ईयर पास भी कर लिया। छुट्टी चल रही थी। और छाया नामकी उसकी किसी सहेली का फोन अक्सर आया करता था। एक दिन मम्मी को समझा-बुझाकर और छाया का जन्मदिन बताकर वह छाया के घर भी गई थी।

एक दिन उसकी माँ एक रेस्तरां में बैठी हुई थी। वहाँ पर दो लड़के आपसे में झगड़ सा रहे थे। बीच-बीच में वे राधिका नामकी किसी लड़की का नाम ले रहे थे। इसलिए मोहनी उनकी बात ध्यान से सुनने लगी।

उनमें से एक बोला ‘मोहन तुमने आज कमसे कम दो सो रूपये खर्च करने को कहा था। लेकिन काम हो जाने पर अब अपने वादे से मुकर रहे हो। मेरा काम आसान नहीं है। आसान हो अथवा नहीं। उसके बिना तुम राधिका से बात भी तो नहीं कर सकते। उसके घर वाले पुराने खयालात के हैं। राधिका को किसी लड़के से बार-बार फोन पर बात करने की इजाजत नहीं है। और तुम लड़की की आवाज भी नहीं निकाल पाते हो। इसलिए ही तुम्हें हमारी मदद की आवश्यकता पड़ती है’।

मोहन बोला ‘है तूँ सच में बड़ा काम का आदमी। कैसी एक्टिंग करता है। आंटीजी नमस्ते ! मैं राधिका की सहेली छाया बोल रही हूँ। उससे बात करा दीजिए’। उसके बाद राधिका जैसे फोन पर आई तुम्हारी छुट्टी। फिर तो मैं घंटों की खबर लेता हूँ। आज जाने दे। कल दो सो नहीं पूरे पाँच सो खर्च करूँगा। बस तूँ नाराज न हो। अभी छुट्टी दो हफ्ते शेष है’।

मोहनी को लगा जैसे पूरा रेस्तरां गोल-गोल घूम रहा है। उसने सर टेबल पर रख लिया। एक ही ख्याल उसके दिमांग में आ रहा था कि राधिका भी सुमन के रास्ते पर ही चल निकली। वह समझ नहीं सकी कि राधिका ऐसा छल क्यों कर रही है ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ व गीत :

वो सागर पीकर भी,

प्यासा ही रहा !

मै बूंद से गला ,

तर करती गयी ! 

---

जब मेरा जिक्र आया तो

तेरी आँखों में नमी क्यों

खामोश रही  जुबान जो बरसों,

आज बोलने को बेताब क्यों

जख्मों को छिपाए रहते थे

आज हर एक को दिखते क्यों

--

आज सूरज को मैंने ,

अँधेरी कोठरी में,

उतरते देखा !

अँधेरे- उजालों को ,

लिपट कर

एक साथ सोते देखा  !

--

सफेद बालों के झुरमुट से !

एक अकेला काला बाल,

झाँक रहा था !

और मगरूर हो रहा था ,

उस पर वक्त का बुरा

असर नहीं पड़ा !

पर कितना नादान था ,

उसे नहीं मालूम था !

सफेद बालों ने,

अनुभवों का कितना

स्वाद चखा था !

खोखली होकर भी, मधुर धुन छेडती बांसुरी !

भरी होकर भी बन्दूक ,  आग उगलती है !

---

मेरी नन्ही परी की तेजस्वी आँखों में,

मैंने भविष्य का सूरज उगते देखा है

किरणें जैसे उसके पांव पखारे

सुबह उसी के लिए होती है

धरती अपना आंचल बिछाए

भूले से भी उसे ठोकर ना लग जाये

पर्वत जिसके आगे झुक जाए

नदियाँ जैसे खुद थम जाये

तूफान की क्या मजाल जो

उसका रास्ता रोके

--

मैं गौरव गाथा गाऊंगी,

हर समय हर हाल में ,

तिरंगा लहराऊंगी !

मैं शहीदों की चिताओं पर ,

हर शाम, हर मौसम में ,

दीप जलाऊँगी !

मैं भारत की मिटटी के,

कण-कण में हर वक्त,

वीरों की फसल उगाऊँगी !

मैं गौरव गाथा गाऊँगी !

---

मोतीलाल की कविताएँ

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मेरे आँगन से

 

 अभी-अभी शाम की लालिमा 

जिस झुरमुट की ओट मेँ

इतराने को आतुर

मचलती हुई सी बैठी है

दिल मेँ सावन की झड़ी लिए

वहाँ दिल अभी कहाँ मचली है

कि राग की रागिनी

अभी कहाँ फूट पायी है

कि लहरोँ का संगीत

अभी कहाँ उतरी है

कि बादल अभी कहाँ बरसा है

अभी-अभी तो शाम

सभी फुनगियोँ को चूमकर

मेरे आँगन मेँ पसरी है

और रात-रानी की खुश्बू

महकने को आतुर है

तभी तो सुगन्ध के लिए

सारी बजने की मिठास

और झंकार का साया

किसी गजल की तरह

पूरी देह मेँ

तरंगित हे रही है

मेरे दिल के कोने मेँ

कोई अंधेरा नहीँ है

और उजाले की तमन्ना मेँ

कोई राख भी नहीँ बुझी है

मेरे चूल्हे मेँ

कि वसंत इतनी जल्द बीत जाए

और सावन की घटा

खेतोँ से फिसलकर

आँखोँ से ओझल हो जाए

मालूम ही नहीँ था

नहीँ तो

पलाश के फूल सा

आकाश को रंग देता मैँ

फिर देखता

कैसे साँझ की लालिमा

आँखोँ से ओझल हो पाती है ।

--

 

खौफ

 

 मैँ जब 
घर से बाहर निकलता हूँ 
अपनी आँखोँ को 
दराज मेँ 
कानोँ को 
अलमारी मेँ 
और जुबान को 
किताब के भीतर 
बंद कर जाता हूँ 
मैँ जब 
घर वापस आता हूँ 
अपनी आँखोँ को 
दराज से 
कानोँ को 
अलमारी से 
और जुबान को 
किताब से 
निकालकर लगा लेता हूँ 
क्या मैँ 
बहुत डरा हुआ आदमी हूँ 
बेशक हूँ 
तभी तो मैँ 
खौफ से घिरा रहता हूँ ।
 

* मोतीलाल/राउरकेला

* 9931346271

---

 

देवेन्द्र कुमार पाठक के नवगीत  - 
 
धुप्पल मारेँ  
 
भरे पेट की गर्राहट मेँ        
हम कविताई धुप्पल मारेँ;       
यानी चालू मुहावरे मेँ                 
शब्द-शूर हम,                   
बाल उखाड़ेँ !  
 
जनमत की लाठी से हमने   
ठलुए मुफ्तख़ोर हैँ हांके ;  
प्रजातंत्र का खेत आज भी   
पाथर चाटे,धूधुर फांके ; 
                                            
वही पादुका-पूजन, 
विरुदावलि-गायन, जयकारेँ                                       
नई सदी की गर्म हाट मेँ      
सजी सूचना-संजाली ;     
उतरेँ-चढ़ेँ मूल्य या मानक  
हर मुद्रा मेँ पुजे दलाली ;  
                                      
बाज़ारू उस्तरे अधमरी -   
प्रजा-गऊ की खाल उतारेँ.                                       
अँधरी लिप्सा काजर आँजे  
देख रही दुनिया सतरंगी ;  
ज़श्न मनाए ताज़ पहनकर 
आधी दुनिया हो अधनंगी ;                                       
प्रायोजित बक-झक मेँ बढ़  चढ़,
बक-चातुर विश्लेषण झाड़ेँ. 
--
 
अनुराग तिवारी की कविता
 image
यूं न उड़ाकर ले जाओ हवाओं!
 
यूं न उड़ाकर ले जाओ
बादलों को मेरे शहर से।
मुद्दतों बाद ये फिर 
आज नजर आये हैं,
प्यासी धरती की 
आस बन के छाये हैं।
खेत में किसान 
माथे पर हाथ रख;
देखता आसमान,
चिन्तित, किन्तु आशावान;
दीख पड़ता मेघ का 
कोई एक टुकड़ा,
दीप्त होती क्षीण आशा;
स्वप्न तिर जाते नयन में
असंख्य करता परिश्रम,
बहाता पसीना,
धीरे-धीरे अपने पंखों से 
इन्हें नीचे उतार 
भर दो हर खेत,
गली, कुन्ज, द्वार....
बरसा दो जीवन-सपने 
हो सकें पूरे;
जन-जन के तन-मन को
पुलकित कर दो....
हवाओं! यूं न उड़ाकर ले जाओ
बादलों को मेरे शहर से।



सी ए. अनुराग तिवारी
---
 


शेर सिंह की कविता


समय



लम्‍बे पंजों / तीखी चोंच से

ले जाता है सब / सुख

समय / नोंचकर

अंगार से भर दिये हों / आंखों में

और कंठ में / ढोल / दांतों में जकड़े / झंकार फूटे न

मुंह के / कपाट खोलकर ?

समय का ही / दिया है

ये सब / राहें / चीन्‍हें - अनचीन्‍हें/ और कहीं- कहीं

कर्म का ही / दूध पिलाया है ।

मुखौटे के अंदर / मुखौटा

सादे आवरण में / धारियां

सत्‍य को / छिपा लो / मिथ्‍या को बढ़ा दो

समय / सब कुछ / उजागर -

कर ही डालता है ।

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शेर सिंह

के. के.- 100

कविनगर, गाजियाबाद- 201 001

E -Mail: shersingh52@gmail.com

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मोहसिन खान की ग़ज़ल


ग़ज़ल-1

दिल में उठा है दर्द रात कटेगी कैसे ।

हो गई बरसात अब थमेगी कैसे ।

बारिशों के धुएँ में चिंगारी सी तुम,

लग गई आग अब बुझेगी कैसे ।

कर दिया पहाड़ों को परेशान तुमने,

बर्फ़ उनकी अब जमेगी कैसे ।

घर की खिड़कियों को छोड़ दिया खुला,

कोई नज़र अब झुकेगी कैसे ।

उठी है दिल में शिद्दत से कोई बात,

होठों तक आकार अब रुकेगी कैसे ।

 

ग़ज़ल-2

हमको तुम्हारी कमी लगने लगी ।

बदली-बदली ज़मीं लगने लगी ।

घर की हदों से बाहर किधर जाएँ,

हर शक्ल अजनबी लगने लगी ।

हर रुत से बेअसर बूत से क्यों हो गए,

सांसें रुकीं, धड़कन थमीं लगने लगी ।

इक तेरे होने से दिले-सुकून कितना था,

रूहे-ग़म की बेचैनी लगने लगी ।

ख़ुश्क मंज़र, ख़ुश्क सबा, ख़ुश्क मैं भी,

फिर क्यों आँखों में लगने लगी ।

डॉ. मोहसिन ख़ान ‘मनमीत’

सहा.प्राध्यापक हिन्दी

जे.एस.एम. महाविद्यालय,

अलीबाग (महाराष्ट्र)

मो. 09860657970

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संशर्मा (संजीव शर्मा की कविताएँ)

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माँ

माँ मुझे बदली-बदली सी नज़र आती है ,

माँ जो सबसे अच्छी लगती है

पर अब पहले की तरह

लगता है मुझको प्यार नहीं करती

माँ पापा की तरह कमाती है

सुबह खाना बनाकर नहीं देती

पैसे देकर यूंही टरका देती है

नए कपडे लाती है पर

कपडे तैयार नहीं करती

पहले जब माँ बनाती थी

कितनी अच्छी लगती थी

अब हर बात पर झिड़क देती है

छोटी-छोटी बात पर चिल्लाती है

माँ सबसे हंसकर बात करती है

पर मुझे ही क्यों डांट देती है

लगता है माँ बदल गई है

कि माहोल ने बदल दिया है

माँ अब बदली बदली सी नज़र आती है,

पहले माँ पलकों पर उठाये रहती थी

हर पल दुलारती थी

मेरे सब नखरे उठती थी

मेरी हर इच्छअ पूरा करती थी

अब तो माँ का रूप भी बदल गया है

माँ का पहनावा बदल गया है

माँ का श्रृंगार बदल गया है

माँ का सत्कार बदल गया है

माँ अब बनावट सी लगती है

माँ अब बदली-बदली सी नज़र आती है.

 

तेरे बगैर

तेरे बगैर अब तो मुझे नींद भी न आएगी

लगता है ये जिंदगी ऐसे ही गुजर जाएगी

मैं तुझे चाहता हूँ तुझसे मैं कैसे कहूं

मेरी ख़ामोशी मेरी जान ले के जायेगी

एक झोंके की तरह मेरी सिम्त आना तेरा

उम्र भर के लिए तनहाइयाँ दे जायेगी

तू भी जो मेरी बेकसी की पा ले अगर

मेरे अरमानों को शक्ल सी मिल जाएगी

बख्त है बेवफा शिकवा हो क्या ज़माने से

प्यार की हर नजर जज्बा नया दिखाएगी

एक मुद्दत के बाद आस्तां पे तू है खड़ी

सोचता हूँ की कहर किस तरफ से आएगी

मुझे मैय्यत सी नजर आती है मेरी ख़ुशी

मैं तो 'मुर्दा' हूँ मेरे प्यार मैं तू क्या पायेगी

 

मुहब्बत

लोग कहते हैं कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ

लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगें

मुझे भी लगता है कि दिल के किसी कोने से

एक ही नाम बार-बार कहीं गूंजता है

तुझे शायद कि इस बात का अहसास नहीं

मुझको इस बात से जीने कि वजह मिलती है,

लोग तो ये भी कहते हैं कि मुहब्बत करके

सैंकड़ों जख्म इस दिल पे उठाये जाते हैं

मैं तो सदियों से मुहब्बत तुझे करता हूँ

और ये मुझको कभी ग़मज़दा नहीं करती,

ये और बात है कि तू मुझे चाहती नहीं लेकिन

हर गली, हर सड़क, हर नुक्कड़ पर

मैं तुझे यूं ही भटकता हुआ मिल जाऊँगा

जिस एक तेरी गली में तेरे दरवाजे पर

रोज सर अपना झुककर मैं चला आता हूँ

जब भी जाता हूँ तो नई उम्मीद के साथ

और आता हूँ तो फिर उन्हीं मायूसियों के साथ.

 

हरजाई

दिल करता है दिल से खेलूं और वफ़ा बदनाम करुं

करते हैं जो छुपके मुहब्बत उनके चर्चे आम करुं

रात गुजारी पी के घर पर और सुबह मंसूर हुए

ऐसे लोगों के मंसूबे नई शाम तक आम करुं

छुप छुपकर उस चन्द्र बदन ने कईयों को बर्बाद किया

उफ़ क़यामत उसके जलवे उसके क्या क्या नाम धरूँ

घुट घुट कर जीने को उस हरजाई ने मजबूर किया

हाय उस कमबख्त के मैं अब और क्या नाम करुं.

संशर्मा (संजीव शर्मा)

1/2750 Ram Nagar

Shahdara, Delhi 110032

पिछले दिनों राजस्‍थान के रणथम्‍भोर अभयारण्‍य में मवेशी घुस गये। अभी इसकी आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक अन्‍य अभयारण्‍य में आग लगने की खबर मिली। आखिर हम अपने जंगलों, पशु, पक्षियों के प्रति कब सुधरेंगे। यह अरण्‍य रोदन कब तक। प्रसंगतः पर्यावरण का आयोजन अभी तक कुछ स्‍वैच्‍छिक संस्‍थाओं और कुछ जागरूक नागरिकों की निजी निष्‍क्रियता क्‍यों बन गया है।

अब तक का अनुभव बताता है कि हम विकास की सड़क पर नाक की सीध में जाने में विश्‍वास रखते हैं। हम यह नहीं देखते कि विकास के रथ के पीछे की सड़क क्‍यों टूट-फूट रही है, उड़ती हुई धूल और उद्योगों की चिमनियों से उठता हुआ धुआं हमारे आकाश को कितना और क्‍यों विषैला बना रहा है।

लेकिन कौन सुनता है, जब पृथ्‍वी पर पेड़-पौधे जंगल, वन, पशु, पक्षी नहीं होंगे तो मनुष्‍य क्‍या बच पायेगा ? कैसे बच पायेगा ? तब चारों तरफ मौत का सन्‍नाटा होगा और इसके जिम्‍मेदार होंगे हम ․․․ केवल हम। आवश्‍यकता इस बात की है कि सरकार भाषण और घोषणाओं से आगे बढ़कर कुछ करे।

परिसंवाद, गोष्‍ठियों का आयोजन तो होता रहता है कुछ बुद्धिजीवी विशेषज्ञ मिल-जुलकर अपने गुबार निकालते हैं और संयोजक खुश होते हैं कि मंत्री आ गये। चाय-नाश्‍ते का प्रबन्‍ध सुन्‍दर हो गया। फोटो खिंच गये। अखबारों में छप गये। लेकिन आगे क्‍या हुआ ? क्‍या पर्यावरण सुधरा ? क्‍या मवेशी अभयारण्‍य में घुसने से रुके ? क्‍या पशु, पक्षियों की जान का खतरा टला?

जंगल पर आदमी का राज्‍य हो, यह तो ठीक हो सकता है, मगर आदमी जंगल को साफ ही कर दे तो क्‍या समाज बचेगा। और क्‍या बचा हुआ समाज हिरोशिमा, नागासाकी जैसा नहीं हो जायेगा। समस्‍या पर विचार नये सिरे से किया जाना चाहिये।

सरकार चाहे तो पर्यावरण प्रसंग पर चिन्‍ता को एक ईमानदार आधार दे सकती है। ताकि धरा हरी-भरी हो। हवा स्‍वच्‍छ हो। आकाश नीला हो। और जंगल खुशनुमा हों। मौसमा सुहावना हो और जीवन जीने में मजा आये। परिसंवाद काफी नहीं काम होना चाहिये। खेजड़े को बचाने के लिए एक जिम्‍मेवारी चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी सुख शान्‍ति से जीवन यापन करें। कहीं कोई आग नहीं लगे। साईबैरियाई पक्षी घना में उतरें, निर्बाध विचरण करें। चीतल और नील गायें कुलाचें भरें। कोयल भी तान छेड़े और पपीहे पी कहां पी कहां की रट लगायें।

चारों तरफ एक उत्‍सवी वातावरण हो कही कोई भोपाल या दिल्‍ली बनें। कोटा उदयपुर की हवाओं में तैरती तेजाबी बारिश का खतरा न हो, आवश्‍यकता इस बात की है कि जलवायु और सम्‍बन्‍धित प्रदूषण से सब मुक्‍त हों। समूचे देश में भ्रमण करने पर भी कहीं कोई विटामिनों की कमी से मरता हुआ नहीं दिखे। पहाड़ों पर जाओ तो मैदानों में या समुद्र के किनारे या झरनों के सहारे मौसम में एक खुला निमन्‍त्रण हो और यह निमन्‍त्रण प्रदूषण से मुक्‍त है।

एक बार फिर जंगली पशु, पक्षियों ने पर्यावरण के बहाने हमें अपनी व्‍यथा-कथा सुनाई है और हमें तथा हमारे योजनाकारों को आगाह किया है कि पर्यावरण पदूषण के बढ़ते खतरों को नजर अन्‍दाज करने से कभी पूरा देश भोपाल हो सकता है। देश भोपाल न बने, इसके लिए आवश्‍यक है कि हम सभी मिलजुल कर कुछ ऐसे प्रयास करें कि जंगल पर आदमी का शिकंजा कमजोर हो। जो लोग जंगलों पर आधिपत्‍य करना चाहते हैं सरकार उनकी कानों पर जूं को रंगाए और एक बड़े खतरे से हम सब बच सकें।

जंगल बचेंगे तो आदमी बचेंगे, आदमी बचेंगे तो समाज बचेगा। और यदि जंगल नहीं बचे तो कुछ भी नहीं बचेगा क्‍योंकि अंग्रेंजी में कहा है- इफ ट्रीज और लोस्‍ट, एवरी थिंग इज लोस्‍ट।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

मऋउंपसरू लाावजींतप3/लींववण्‍बवउ

व्यंग्य

शीर्षक में क्या धरा है ?

                                                  [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

शीर्षक ! शीर्षक ! शीर्षक ! आख़िर क्या धरा है शीर्षक में ?

अरे जनाब शीर्षक में ही तो सब कुछ धरा है। मुखड़ा ही सुन्दर न होगा तो अंतरा कौन सुनेगा ?चेहरा ही सुन्दर न होगा तो जुगराफिया कौन निहारेगा ? भैये , चेहरे में दम हो तो चक्कू सी लड़की गोली सी घल जाती है ; हथिनी सी काया हिरनी सी चल जाती है। जिस तरह इंसान कि पहचान उसके चेहरे से होती है -लेख की पहचान उसके शीर्षक से लगाई जाती है। ये अलग बात है कि चेहरे पर मुखौटा हो अथवा शीर्षक हो झूठा।

शीर्षक का तो इतना महत्व है कि लोग गुड़ के घोल पर शहद का लेबल देखकर चाट जाते हैं , करेले के रस की बोतल पर खास का शरबत लिखा देखकर गटागट करके पी जाते हैं और तो और दवा के नाम पर लोग ज़हर तक स्वाद से खा जाते हैं उस पर तुर्रा यह कि अनंत काल तक जीवित भी रहते हैं।

शीर्षक का महत्व और प्रभाव देखकर यदि आगे चलकर इस टी. वी. बाबाई चैनली भक्ति युग देखकर धार्मिक सीरियलों अथवा फिल्मों को इंटरनेट कनेक्टेड मोबाइल धारक ; कैशौर्य छोड़कर यौवन में पदार्पण कर रहे युवाओं में हिट करने के लिए  उनका नाम कूल-कूल  '' जय बजरंगबली '' अथवा ''जय माता दी ''न रखा जाकर हॉट - हॉट  ''मल्लिका'' अथवा  ''राखी''  जैसा  सैक्सी सैक्सी रखा  जाने लगे तो कोई आश्चर्य मत करने लग जाना ,धर्मशास्त्र पर कोकशास्त्र लिख लिख कर बेचा जाने लगे तो ये भी असंभव न समझना क्योंकि महान लोग कहते हैं नथिंग इज इम्पासिबल इन द वर्ल्ड।

अपने मुंह मिंयाँ मिट्ठू लोग इतने मनोवैज्ञानिक हो गए हैं कि चेहरा देखकर ही अंतर्मन कि बातें भांप जाते हैं किन्तु शीघ्र ही उन्हें पता चल जाता है कि जिसे वे राम समझ रहे थे वह लंकेश है और जिसे पुकार रहे थे  सीते सीते वह पामेला बोर्डेस है। मै तो कई बार ऐसे धोखे खा चुका हूँ फ़िर भी कुत्ते की दम मेरी नज़र जब भी ठहरती है तो चेहरे पर ही आई मीन शीर्षक पर ही। ऐसा मै मानता हूँ कि अब तो मैं इतना एक्सपर्ट हो चुका हूँ कि लिफाफा देखकर ही ख़त का मजमून समझ लेता हूँ। शीर्षक पढ़ते ही मुझे रचना का सारतत्व पता लग जाता है अतः उसे पढने की नौबत ही नहीं आती। लोग जाने कैसे घंटों घंटों अख़बार से चिपके रहते हैं मुझे तो एक ग्रन्थ निपटाने में भी इतना समय नहीं लगता।

खैर ! छोडिये इन सब बातों को ,बहुत हो गया मजाक। हाँ तो मैं अर्ज़ कर रहा था कि शीर्षक में क्या धरा है ? वास्तव में एक सही शीर्षक में सम्बद्ध रचना का सत्व निहित रहता है और यह शीर्षक का ही आकर्षण होता है कि हम उसके फेर में पड़कर पूरी रचना पढ़ जाते हैं किन्तु आजकल ये बात बहुत देखने में आ रही है कि पूरी रचना पढने के बाद भी कई शीर्षक उससे मेल नहीं खाते ;ठीक वैसे ही जैसे ' डर ' और 'अंजाम '

फिल्म  में हम शाहरुख खान को हीरो समझ लेते हैं और यदि क्लाइमेक्स न देखें तो ज़िंदगी भर उसे ही हीरो मानते रहें जबकि वो खलनायक है।

शीर्षक जितना ही आकर्षक देखते हैं रचना उतनी ही विकर्षक पाते हैं जैसे शीर्षक के महत्व को जानकर सारी प्रतिभा शीर्षक निर्माण में ही झोंक दी हो। यह शीर्षक का दुरूपयोग है। कई लोग शीर्षक पर ही लिखते हैं और कई रचना के उपरांत शीर्षक तय करते हैं। शीर्षक निकालना कोई बहुत आसान काम नहीं है तभी तो शेक्सपियर इससे डरते थे। एक बार वे अपनी शीर्षक विहीन रचना लेकर प्रकाशक के पास पहुंचे ,प्रकाशक ने शीर्षक पूछा उन्होंने जवाब दिया ''जैसा आप चाहें ''  लीजिये यही रचना का नाम पड़ गया किन्तु हर कोई तो शेक्सपियर नहीं होता कि उनके नाम से ही रचना बिक जाये अतः शीर्षक निर्माण में पर्याप्त सावधानी अपेक्षित होती है।

      'शीर्षक में सब कुछ धरा है'  और 'शीर्षक में कुछ भी नहीं धरा ' दोनों बातें अपनी अपनी जगह सही हैं। कुछ लोग चेहरा देखते हैं कुछ मन।

प्रश्न अनुभव और ज्ञान का है कि आप कहाँ तक सही निकलते है ?

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व्यंग्य
इसे पढ़ना सख्त मना है !

                            [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]    

क्योंकि आजकल सभी बचपन से ही ' जाकी ' के जांगिये पहनने लगे हैं ( और अब तो  पहलवान भी लंगोटी कि जगह सपोर्टर पहनकर डंड पेलते हैं ) अतः मस्तराम को मैं अपना लंगोटिया  यार नहीं बल्कि जांगिया दोस्त कहूँगा। वो मेरा  बेस्ट फ्रैंड है और अपने नाम 'मस्तराम ' की तरह इकदम मस्त मस्त। आजकल तो सर्च लाईट लेकर ढूँढने पर भी ऐसे यथा नाम तथा गुण ,गुण संपन्न व्यक्ति म्यूजियम में भी नहीं मिलेंगे।

अब हमारे पड़ोसी को ही ले लीजिये . पेशे से बीमा कम्पनी के एजेंट हैं .नाम तो अपना रखे है 'बुद्धूराम' किन्तु यकीन जानिए अपनी चतुर -चालाक-चतुराई भरी लच्छेदार बातों से घाघ से घाघ लोमड दिमाग लोगों को भी उनके लाख न चाहने पर भी एक न एक बीमा पॉलिसी खरीदने को मजबूर कर ही देते हैं। वहीँ उनकी विकराल काली कलूटी खूबसूरत बीवी जिनका नाम उनके माँ बाप ने न जाने क्या सोचकर 'शांति' रख दिया था अपने नाम के विरुद्ध घर तो घर सारे मोहल्ले में अपनी कर्कश काक वाणी से मौका बेमौका तहलका ओ कोलाहल मचाये रहती हैं।

खैर। इधर पिछले कई दिनों से मैनें मस्तराम की हरकतों को देखते हुए उसका नूतन नामकरण कर दिया है- निषेधाज्ञाराम।कुछ लोग लाल लगाते हैं , कुछ कुमार लगाते हैं , कुछ सिंह लगाते हैं उसी तरह मस्तराम के खानदान में सभी लोगों के मूल नाम के साथ राम का प्रत्यय जोड़ा जाता है अतः मैनें भी इसका ध्यान रखते हुए  राम लगाना जरूरी  समझा वरना केवल निषेध अथवा निषेधाज्ञा से ही काम चल सकता था और मित्र ने भी इस नाम को सहर्ष स्वीकार करते हुए इसको सार्थक करने में कोई कोर क़सर बाकी नहीं रख छोड़ी। कैसे ?

चाहे किसी और बात में वह अद्वितीय हो न हो किन्तु निशेधाज्ञाओं का उल्लंघन करने में अब कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता। धूम्र पान का तो वह लैला के लिए मजनूँ की तरह दीवाना है। टाकीज और बसों में धूम्रपान करने में उसे विशेष आनंद की अनुभूति होती है ,चाहे नो स्मोकिंग के कितने ही बड़े बड़े बोर्ड क्यों न लगे हों। जब कोई सिगरेट के धुंए से परेशान होकर उसे टोक देता है तो उसका मूड आफ हो जाता है अतः या तो वह बस से उतर जाता है अथवा टाकीज से बाहर आ जाता है या फ़िर लड़ झगड़कर पिट पिटा या पीट पाट कर दोबारा मूड बनाता है।

दूरदर्शन की सीख चाहे सबको लग जाये कि रेल के डिब्बों में गंदगी नहीं फैलाना चाहिए किन्तु मस्तराम को मूंगफली और केले खाकर छिलके फ़ैलाने में महान मज़ा आता है। पान गुटका खाकर सीट के नीचे पुच्च पुच्च करके थूकना तो उसकी आदिकाल से आदत रही है। वैसे डिब्बे के अन्दर मद्यपान वह अत्यंत सावधानी पूर्वक  अवसर देख कर ही करता है किन्तु स्मोकिंग सरेआम बिंदास  बेझिझक।

राह चलते चलते यदि एकाएक पेशाब लग आये तो कभी कभी वह ऐसी जगहों पर भी मूत्र विसर्जन करने में नहीं हिचकता जहाँ स्पष्ट लिखा हो ''कृपया यहाँ पेशाब मत कीजिए '' बल्कि मूतते मूतते इस निषेधात्मक विनयवाक्य में से '' मत '' शब्द को काट या मिटाकर एवं  ''यहाँ '' को ''यहीं '' करके ही अपनी जिप ;चैन या बटन बंद करता है।

सचमुच अपने किसी भी नाम को सार्थक सिद्ध करने में वह नंबर एक है। और चाहे कुछ पढ़े या न पढ़े किन्तु उन लेखों को तो वह अवश्यमेव पढता है जिसे कतई न पढने के लिए उससे कहा जाए।

मस्तराम उर्फ़ निषेधाज्ञाराम की तरह कहीं आप भी तो इस तरह की छोटी छोटी  कुच्चु- कुच्चु किन्तु अतिशय महत्वपूर्ण निषेधाज्ञाओं  के प्रति सविनय अवज्ञाकारी आन्दोलन में तो लिप्त नहीं हैं ? बोलिए बोलिए। मुझे तो कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। अब देखिये न मेरी चेतावनी ''इसे पढना सख्त मना है '' के बावजूद भी आप अभी तक निरंतर पढ़ते ही चले जा रहे हैं-पढ़ते ही चले जा रहे हैं। अरे अभी भी मान जाइए जनाब , अब तो पढना बंद कर दीजिये। देखिये यदि आप मूसलों की मार से नहीं डरते हैं तो आगे पढ़ते चलिए वरना यहीं स्टॉप कर दीजिये क्योंकि आगे पढने का मतलब ओखली में खोपड़ी देना है , सांड को मारने का न्योता देना है , अपनी हुज्जत करना है। आप फ़िर भी नहीं न मानते हैं तो आपकी मर्ज़ी। पढ़िए ,आँखें गड़ा गड़ा के पढ़िए।

मेरा और मस्तराम का तो यह बिलकुल नितांत पर्सनल निजी अनुभव है परन्तु शायद आपने भी कभी कभार देखा होगा कि टाकीजों में जब भी कोई ए प्रमाणपत्र वाली फिल्म लगती है जिसके पोस्टर पर लिखा होता है  ''कृपया अठारह साल से कम उम्र वाले न देखें '' तब भी उन टाकीजों के बुकिंग आफिस के सामने अठारह साल से कम उम्र के काफी महानुभाव टिकट लेते और हँसते मुस्कुराते हुए एन्टर होते पाए जाते हैं। भई हमने तो बचपन में ऐसी कई फ़िल्में देखी थीं और मजाल थी किसी की कि किसी ने हमें कभी टिकट देने से मना किया हो ?आखिर ये क्या बात हुई कि एक तो मन में जिज्ञासा जगा दी और ऊपर से देखने की भी बेरोक टोक मनाही। सब दिखावा है ,बल्कि मैं तो फिल्म और सीरियल निर्माताओं को ये मुफ्त किन्तु अत्यंत कारगर सलाह दूंगा कि वे अपनी फिल्म को हिट करने के लिए सभी पोस्टरों पर ,विज्ञापनों में बोल्ड लैटर्स में छपवाएँ ''अठारह साल से कम उम्र वाले न देखें ''। देखिये आपकी फिल्म कैसे हॉउस फुल नहीं जाती ? ऐसी निषेधाज्ञाओं को कौन मानता है और कौन उल्लंघन से रोकता है ?.........बात करते हैं। हुंह।

सिगरेट  बीडी तम्बाकू शराब आदि की पैकेजिंग पर सूक्ष्म अक्षरों में अंकित वैधानिक चेतावनी का क्या अर्थ है जबकि होना तो यह चाहिए कि इन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाये अथवा इन चेतावनियों की औपचारिकताओं -ढोंग ढकोसलों पाखंडों को प्रतिबंधित किया जाए। जब कोई मानता नहीं जब कोई दण्डित नहीं होता तो यह सब फालतू है। मैनें तो अक्सर देखा है कि जब गाड़ी प्लेट फार्म पर खड़ी होती है तब तो प्लेटफार्म पर खड़े या किसी को छोड़ने आये बैठे लोग चढ़ चढ़ कर हगते -मूतते हैं जबकि टायलेट के दरवाज़े पर लिखा होता है और एनाउन्स्मेंट भी होता रहता है कि ''कृपया जब गाड़ी स्टेशन पर खड़ी हो तो शौचालय का प्रयोग न करें ''I भला कौन मानता है ऐसी बेतुकी चेतावनियों को ?

चेतावनियों की अवहेलना करना और निषेधाज्ञाओं को न मानना हम भारत वासियों के लिए बांये हाथ का गैर रोमांचकारी खेल है इनमें हम कोई जोखिम नहीं देख ते। जहाँ तक संभव होता है हम इनकी अवज्ञा करने की ही फ़िराक में रहते हैं बल्कि इसे एक अधिकार एक उपलब्धि मानते हैं। अब देखिये न ,आप अपने को ही ले लीजिये ......इफ यू डोंट माइंड ...... मेरी दो चेतावनियों के बावजूद भी आपके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। आप लगातार मेरी चेतावनी ''इसे पढना सख्त मना है'' का उल्लंघन किये जा रहे हैं। क्या मैं ग़लत हूँ ?

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