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August 2012
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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सबसे पहले भूमिका जो व्यंग्य का शून्यकाल से ही ली गई है -

"शून्यकाल वही है जो गोल कर दे. गोल घुमा देगा तो व्यंग्य हो जाएगा. यह टोटका कविता में काम नहीं आएगा. कविता में घुमाने की कोशिश की तो चुटकुला बन जाएगा. इसी चुटकुले ने तो हास्य-कवियों को हास्यास्पद बनाया है. मंच पर जो उन्हें पिला रहे थे, अब वही रुला रहे हैं. गोल करना वैसे विजय का प्रतीक भी है. अब यह प्रतीक क्रिकेट में कारगर नहीं है. क्रिकेट में रन बनाने होते हैं. रनों के घोड़े दौड़ाने होते हैं. सचिन दौ़ड़ा रहा है. पर यदा-कदा वह भी हांफ जाता है. रन बनाने से तात्पर्य यह नहीं है कि आपने इधर रन सुना और उधर दौड़ लगा दी. बुद्धि और विवेक दोनों का समन्वयकारी उपयोग करना पड़ता है. गोल हॉकी में किए जाते हैं. फुटबाल गोल होती है इसीलिए उसमें भी किए जाते हैं. बुद्धि जिनकी गोल होती है वह तो सदा गोल ही करते रहते हैं..."

भूमिका से ही किताब की सलर, हंसती गुदगुदाती हर दूसरे वाक्य में व्यंग्य मारती भाषा शैली का पता चलता है, जो बदस्तूर सभी लेखों में जारी रहता है. 110 पृष्ठों की इस किताब में अविनाश वाचस्पति के एक कम चालीस व्यंग्यों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है. व्यंग्यों की विषय वस्तु आम जीवन से लिए गए हैं और जीवन के प्रायः तमाम पहलुओं को छुआ गया है. कुछ व्यंग्यों के शीर्षक से ही आपको इसका अनुमान हो जाएगा -

दाल का अरहरापन

अरे महंगाई रुक

खरबूजा आपका है कौन

छिलकों में संभावनाएं

पैट्रोल पेट का रोल

बिजलीबाई आई

दिल्ली में पैदल

फैशन में घोड़ा क्रांति .. इत्यादि

अविनाश के व्यंग्यों में कहीं कहीं सामाजिक विद्रूपों को दूर करने की समझाइशें भी हैं. बेशक उनके व्यंग्य उतने मारक नहीं बन पाए हैं, मगर पढ़ते पढ़ते आपके चेहरे पर स्मित मुस्कान खींच लाने का माद्दा जरूर रखते हैं. और सबसे बड़ी बात यह है कि व्यंग्यों में पठनीयता बनी रहती है. भाषा कहीं भी बोझिल नहीं है.

यह इस संकलन का दूसरा, सजिल्द संस्करण है जो इस किताब की लोकप्रियता को स्वयं ही बयान करता है. इस संस्करण का गेटअप, कागज व छपाई इत्यादि उच्च कोटि की है.

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व्यंग्य का शून्यकाल

व्यंग्य संग्रह

व्यंग्यकार - अविनाश वाचस्पति

पृष्ठ 110, मूल्य 180 रुपए

अयन प्रकाशन - 1/20, महरौली, नई दिल्ली - 110 030

ISBN NO. 978-81-7408-561-0

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भैया हमारे सनातन ऋषि तो पहले ही कह गए कि काजल की कोठरी में रहोगे तो थोड़े बहुत काले होगे ही। अब बेचारे निष्‍काम निर्लिप्‍त प्रधानमंत्री ने काजल की इस कोठरी में रहने की मजबूरी तो पूरे छह साल ढोई, सो सफेद पोशाक पर थोड़े बहुत काले छींटे पड़ भी गए तो उनकी यह नादानी क्षमा के काबिल है।

अब विपक्ष संसद में चाहे जितना हल्‍ला बोले। बहस न होने दे। आप भले ही कहते रहें ‘‘कोयले की दलाली है, सारी कांग्रेस काली है।‘‘ मूर्ति सदृश्‍य मनमोहन इस्‍तीफा देने वाले नहीं हैं। ऐसे कई अवसरों का दिलेरी से मौन साधे वे कई मर्तबा सामना कर चुके हैं। टूजी स्‍पैक्‍ट्र्रम घोटाला, राष्‍ट मण्‍डल खेल धोटाला और सार्वजानिक निजी साझेदारी के कई ऐसे कई मुद्‌दे संसद में परवान चढ़े, पंरतु संसद में साधना के मौन हठयोग के चलते उन्‍होंने सब पर पार पा ली। हठयोग की इस सिद्धी की सीख बाबा रामदेव को मनमोहन से लेने की जरुरत है। संसद के बाहर बेचारे अण्‍णा और रामदेव भ्रष्‍टाचार, धोटालों और लूट की सरकार होने का मंत्रजाप करते ही रह गए, किंतु मंत्र सिद्धि दूर की कौड़ी ही रही।

अब जो समन्‍वय समीति की बैठक काग्रेंस आलाकमान के धर हुई है, उसमें गठ जोड़ की गांठ और मजबूत होकर उभरी है। सर्वसम्‍मति से सहमति बनी कि बाजार में आवारा पूंजी का प्रवाह बनाए रखने और विकास दर चढ़ाए रखने के लिए आंखें मूंदी रखना जरूरी था। जिससे कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहें। इस दलाली को बढ़ावा देने के लिए लाचार प्रधानमंत्री को भाजपा शासित राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों  ने तो मजबूर किया ही पश्‍चिम बंगाल के माकपा मुख्‍यमंत्री भी कब पीछे रहे। बतौर प्रमाण कैग रिपोर्ट में इनकी चिट्‌ठियों का हवाला है। अब अण्‍णा सदस्‍य के अरबिंद केजरीवाल कहते रहें कि संसद में कांग्रेस और भाजपा के बीच सबकुछ फिक्‍स है किसी दल के पास यह नैतिकता नहीं बची है कि वह कोयला घोटाले के खिलाफ आवाज को बुलंदी दे सके। माया का मोह अच्‍छे अच्‍छों की नैतिकता और ईमान डिगा देता है। यही वजह है भैया, सार्वजानिक जीवन में नैतिकता का संकट गहरा रहा है और आर्दश के प्रतिमान बदल रहे हैं।

मिलीभगत बनाम्‌ फिक्‍सिंग की कार्यवाहियां अब दलों और क्रिकेट का हिस्‍सा भर नहीं रह गई हैं। इस बुराई का विस्‍तार राज्‍यसभा में भी पहली बार देखने को मिला। संसदीय मामलों के मंत्री ने सभा के नये उपसभापति के कान में कुछ फुसफुसाया और सदन में हंगामा होते ही सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए टाल दी गई। मैच फिक्‍सिंग का यह अनैतिक वार्तालाप वीडियों कैमरो में फिक्‍स होकर सार्वजनिक भी हो गया। मौजूदा सियासत के सामाजिक सरोकार तो अब भैया सिमटकर ही चंद पूंजिपातियों को बेजा फायदा पहुंचाने तक रह गए हैं। नीति नियम और तौर तरीको में ढीले देगें तभी तो कुदरती भू संपदा को दोनों हाथों से लूट पायेंगें। और फोर्ब्‍स पात्रिका में नाम दर्ज कराने की लायकी हासिल करेंगें। इस लूट पर छूट का शिकांजा कस दिया जाएगा तो चुनाव खर्च के किए राजनीतिक दलों को चंदा कौन देगा ?

अब भारत अमेरिका तो है नहीं कि आप राष्‍ट्र्र प्रमुख के पद बैठे रहें और अरोप लगें तो आपकी संवैधानिक प्रवाधनों के तहत जांच भी शुरू हो जाए। और अरोप सिद्ध हो जाने पर बिना कोई अपील किए चुपचाप इस्‍तीफा दे दें। हमारे यहां जैसे कोलगेट कांड हुआ, वैसा ही अमेरिका में सत्‍तर के दश्‍क में वाटर गेट स्‍केंडल हुआ था। हमारे यहां घोटाले सीएजी, पीएसी और अदालतों में दायर जनहित याचिकाओं के जरीए बाहर आ रहे है जबकि वाटरगेट कांड का खुलासा वहां के समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्‍ट' ने 1972 में किया था। जांच बैठी और जांच में लगे आरोप सिद्ध हुए, वैसे ही राष्‍टपति रिचर्ड निक्‍सन ने 1974 में इस्‍तीफा दे दिया। अब बेचारे अण्‍णा ऐसे राजनीतिक घोटालेबाजों पर नियंत्रण के लिए ही तो जन लोकपाल को कानूनी दर्जा देने की बात कर रहे हैं। अब भला इसमें हर्ज ही क्‍या है।

पर सरकार है कि कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहे इसलिए खदानों में नीलामी के नियामों को दरकिनार रखेगी। साथ ही उल्‍टे पैर चलकर कोशिश करेगी कि किन्‍हीं ऐसे उपायों को अंजाम दिया जाए, जिससे सीएजी, पीएसी और सर्वोच्‍च न्‍यायालय की सक्रीय चाल में बेडि़या पड़ जाएं। आर्थिक उदारवादी दौर का भी यही तकाजा है कि कानून के हाथ बंधे रहें, जिससे बाजारवाद उन्‍मुक्‍त ताण्‍डव के लिए मुक्‍त हो जाए।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007, 232008

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

नई गरीबी रेखा
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वे गरीब नहीं थे
चाहते थे करना
महसूस
गरीबी क्या है

नामी मॉल गए
देखी/परखी
ब्रांडेड ब्लू जींस/ टॉप
छपे थे
फटे थेगले
जिस पर
आगे पीछे
चूना सा पुता था
दूसरी पर
लटक रहे थे
पायंचो के धागे
तीसरी के

खुश हुए
खरीद लिए
सारे कपड़े
जो उन्हें
दिखाते थे गरीब
अपने लिए
बीबी/ बाबा/बेबी/केलिए
अब वे भी थे नीचे
हाई क्लास
गरीबी रेखा के
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बार बार
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यह जानकार भी
रंग बिरंगे/ चमकीले
कागजों से लिपटे 
डब्बे में
सस्ता सा
उपहार होगा
मन आँखें
उत्सुक होते हैं
देखने/ छूने/ खोलने के लिए
यही
जिज्ञासा/ बेचेनी/ अतृप्ति
कदमो को
ले जाती है
फिर फिर
अज्ञात की
तलाश में
ठगाने के लिए

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अथ:राजनीतिज्ञ कथा
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खरबूजों का समाज है
सडान्ध मारते/ गंधाते
यहाँ स्वागत नहीं
किसी अन्य का
रेल के डब्बे
में आये
नए यात्री के समान

अपने है नियम/कायदा/ कानून
यहाँ रंग बदलना है
हर खरबूजे को
गिरगिट के समान
दूसरे खरबूजे
को देख
यहाँ
खींचनी हैं टांग
केकड़े
के समान
दूसरे की
अलग/ अलग
झपटकर
मिल/बांटकर
खाना/ नोचना है
गिद्धों के समान


यह समाज है
राजनीतिज्ञों का
गिद्धों का
खरबूजों का
गिरगिटों का
केकड़ों का
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उपक्रम
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बुना हुआ/ गढ़ा हुआ
सन्नाटा
मौन
तोड़ें
भंग करें
पसरी नीरवता
उदासी

चीख से
चाहे
उसांस से
कनखी से
आहट से
दस्तक से
या
दिल की
एक
धड़कन से

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रास्ता
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ये रास्ता
जाता है
जहाँ
वो
नहीं रहते
वहां

वे रहतें हैं
जहाँ
कोई रास्ता
नहीं जाता
वहां

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खोज
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जो मिले
उन्हें खोजा
न था


जिनकी तलाश थी
वे खोये
न थे

ढूँढ रहे थे
अपने को ही
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कहानी

तांगेवाला

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

मन बड़ा चंचल और चलायमान होता है इस पर‌ बड़े बड़े देवता, ऋषि मुनि और‌ साधु संत तक‌ नियंत्रण नहीं कर सके तो इंसान बेचारा तो हाड़ मांस का पुतला ही है किसी अज्ञात की डोरी से बंधा उसी के इशारे पर जिंदगी भर नाचता रहता है। फिर भी कभी कभी ऐसी घटनायें हो जातीं हैं जो मन मस्तिष्क पर अमिट और गुदगुदाने वाली छाप छोड़ जातीं हैं। बात कोई पच्चीस साल पहले की है। दिन के बारह बज चुके थे। मैं अपनी पत्नी सविता और बड़ी दीदी के साथ तांगे में बैठा स्टेशन की ओर बढ़ा जा रहा था। तांगे का वह मरियल सा घोड़ा अपने मालिक की तरह सुस्त सा सड़क पर टक टक करता चला जा रहा था। मेरे मुहल्ले धरमपुरा से हमारे शहर दमोह का रेलवे स्टेशन कोई तीन किलोमीटर के लगभग था। तांगेवाला हमारे लिये अपरचित था। धरमपुरा में हमारा पुस्तेनी घर है। शहर से जुड़ा हमारा यह गाँव अब शहर की गोद में समाकर उसका एक मोहल्ला बन गया है। पहले यह एक मालगुजार के अधीनस्थ चालीस पचास गाँव की मालकियत का केन्द्र था। हमारा यह गाँवनुमा मोहल्ला राजसी मर्यादाओं और परिपाटियों में बाधित था। हिन्दू मुसलमान और सभी छोटी बड़ी जाति के लोग एक मर्यादित परिवार की तरह रहते थे। कितनी भी छोटी जाति के लोग हों किन्तु हम बुजुर्गों को कक्का काकी,चच्चा चाची और भैया इत्यादि कहकर ही सम्बोधित करते थे ।

गांव में जैसा कि प्रतिष्ठित घरों के लिये चलन होता था,नाई धोबी अहीर कुम्हार ढीमर और कुछ नियमित कर्मचारियों जैसे होते थे। धोबी नियमित तौर पर कपड़े ले जाता था। सप्ताह में तीन दिन उसे आना ही था,कपड़े मिले तो ठीक नहीं मिले तो ठीक। नाई भी सप्ताह में एक बार अपनी पेटी लेकर आ जाता था। दाड़ी कटिंग मालिश चंपी ,सबको उसका इंतजार रहता। हमारा खानदानी नाई जग्गू खबास पेटी लेकर आया नहीं कि हम सब बच्चे चिल्लाते खबास कक्का आ गये ओ ओ। जिन बच्चों को कटिंग कराने में डर लगता वे भीतर कमरों मे जाकर छुप जाते, किंतु आखिर कब तक, घर के बुज़ुर्ग उन्हें पकड़ लाते और जग्गू के हवाले कर देते। जग्गू बड़ी बेरहमी से अपने दोनों घुट्नों के बीच सिर दबाकर उनकी कटिंग कर देता। गोली बरौआ को जिन्हें हम गोली कक्का कहते थे कभी नहीं भूल सकते। अपने बरौआ कर्म के अतिरिक्त वे एक अनुभवी और कुशल वैद्य भी थे। हमारा बचपन उन्हीं के चूर्ण और भस्में खाकर स्वास्थ्य की पायदानें चढ़कर युवावस्था में प्रविष्ट हुआ।

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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हमारा तांगेवाला भी खनदानी था, दौआ तांगेवाला। हमारे परिवार को कहीं जाना होता तो को सूचना मिलते ही वह तुरंत हाजिर हो जाता। कभी भी कहीं भी जाना होता वह इनकार नहीं करता था और भाड़ा तांगे से उतरने के बाद जो भी दे दो सब कबूल कर लेता था। आठ आने दो तो ठीक एक रुपये दो तो ठीक, कहता 'मेरे बच्चे सो आपके बच्चे आपको ही पालना है। 'भला ऐसे में दौआ को मेहनताना कम मिले कैसे संभव था' डोल ग्यारस के दिन बनेटी खेलते [आग के पलीते] अखाड़े में हलकी पतली तलवारों के करतब दिखाते हमारे मित्रों की न्योछावर उतारते, अट्ठन्नियाँ चवन्नियाँ लुटाते लोग कितनी मस्ती में झूमते गाते चलते थे, आंखों के सामने चित्र सा खिंच जाता है। डोल ग्यारस का रथ पीछे पीछे चलता,बाजे बजते और रथ में बिराजमान भगवान विष्णु चंदन तलैया तक ले जाये जाते,लक्ष्मी सहित वे जल बिहार करते बुर्जों से तलैया में कूदते, इत्तन इत्तन पानी, घोर घोर रानी का खेल खेलते, एक दूसरे पर पानी उछालने वाली, हमारी मित्र मंडली के लोग न मालूम अब कहाँ कहाँ हैं। उस दिन हमें बाहर जाना था। दौआ के यहाँ सूचित किया कि स्टेशन जाना है, साढ़े बारह की ट्रेन पकड़ना है, किंतु मालूम पड़ा कि दौआ बीमार है। मजबूरन हमें दूसरे मोहल्ले से ताँगा मंगाना पड़ा। ताबड़ तोड़ ताँगे में सामान रखा, पेटी बिस्तर नाश्ते की डलियां, और उस मरियल से घोड़े वाले ताँगे में हम बैठ गये। सविता और दीदी पीछे की तरफ और मैं ताँगेवाले के पास आगे बैठ गया।

  'काकी सीताराम, चच्चा राम राम,

"भैया कहाँ चले। "

"बस सागर तक थोड़ा फुआ के यहाँ तक शादी में जा रहे हैं। "बातों का आदान प्रदान करते हम अपने मोहल्ले की सरहद पार कर चुके थे। ताँगा धीरे धीरे चल रहा था, शायद घोड़ा बीमार था या ताँगे के अस्थि पँजर ढीले थे।

हमें जल्दी थी। ट्रेन न छूट जाये इसलिये मैंने तांगेवाले से कहा "थोड़ा जल्दी चलो। "मेरी बात सुनकर तांगेवाले ने चाबुक फटकारा और तांगा चर्र चूं की आवाज करता हुआ थोड़ा तेजी से आगे बढ़्ने लगा। अचानक ऐसे लगा जैसे भूचाल आ गया हो, तांगा एक तरफ झुकता चरमराकर गिर पड़ा। उसका चक्का टूट गया थ घोड़े को रोकते रोकते तांगे वाला तांगे में लुढ़क गया। मैं तांगे के पटिये से लटक गया। सविता और दीदी सम्हलते सम्हलते भी तांगे से बाहर गिर पड़ी। मैं क्रोध से पागल सा हो गया। दीदी को उठाया, सविता को उठाया और मुश्किल से खुद को सम्हाला। दीदी के हाथ में खरोंचें और खून की लकीरें देखकर मैं आपा खो बैठा। तांगेवाले को तांगे से बाहर खींचकर तीन चार चाँटे मार दिये। वह चुपचाप अपराधी निगाहों से देखता हुआ पिटता रहा जैसे चक्का उसी ने तोड़ा हो।

"जब तांगा सड़ियल है तो क्यों चलाते हो, नालायक कहीं के, थोड़ा भी तमीज नहीं है, सड़ा घोड़ा लिये हैं और चल्रे हैं तांगा चलाने" मेरा क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया था। टेंप्रेचर इतना बढ़ा की पारा थर्मामीटर फोड़्कर बाहर आ गया।

तांगेवाला कोई साठ पैंसठ साल का कमजोर सा आदमी था। मेरा हाथ फिर उठने को हुआ कि दीदी ने पकड़ लिया' अरे यह क्या कर रहे हो चक्का टूट गया तो वह बेचारा क्या करे' वह जोर से चिल्लाईं।

ट्रेन आने का समय हो चुका था। पास से गुजरते हुये एक रिक्शे को मैंने रोका ,जल्दी से उसमें सामान रखा और स्टेशन पहुंच गये। गाड़ी आ चुकी थी। सामान प्लेट फार्म पर पहुंचाने के लिये मैंने एक कुली बुला लिया। टिकिट की खिड़की पर लम्बी लाइन लगी थी। पुरुषों की लाइन लम्बी हो तो नारियों की सहायता लेना ही बुद्धिमानी होती है, ऐसा सोचकर मैंने सविता को टिकिट लेने को कहा "तुम टिकिट ले लो मैं सामान गाड़ी में रखवाता हूँ" मेरे कहने पर वह लाइन में लग गई। लाइन में चार पांच महिलायें ही थीं। मैंने दीदी को साथ लिया और सामान लेकर प्लेटफार्म पर आ गया। बहुत भीड़ थी। ट्रेन करीब आधा घंटे रुकती थी। अभी भी पन्द्रह मिनिट बाकी थे चलने में। एक डिब्बे में कुली की मदद से सामान रखवाया और सीट तलाशने लगा। कुछ परिचितों के मिल जाने से कोई परेशानी नहीं हुई। दीदी को सीट पर बिठाकर मैं लगभग दौड़ता सा बाहर आया। टिकिट विंडो की तरफ बढ़ा तो देखा कि सविता परेशान सी एक तरफ खड़ी है।

मैंने पूछा "टिकिट ले ली"

"नहीं"

"क्यों क्या हुआ"

"पर्स नहीं है"

मैं भौंचक्का रह गया "कहाँ गया तुम्हारे पास ही तो था ?"

"शायद ताँगे में रह गया, रिक्शे में सामान रखते समय भूल गये। "

मैं परेशान हो गया। पेंट में इतने पैसे तो थे कि टिकिट ले लें,पर अन्य कार्यों के लिये शादी वाले घर में किससे माँगेंगे। फिर पर्स में एक हज़ार रुपये के लगभग थे। मैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया। सविता को दो चांटे मारने की इच्छा हो आई। दीदी ट्रैन में बैठी थीं ,सामान ट्रैन में था और हम बाहर टिकिट घर के पास। तांगे वाले की निरीह आँखें मेरी आँखों में झूलने लगीं। शायद उसी की बददुआओं का असर हो। गाड़ी छूटने में पाँच सात मिनिट ही बचे होंगे। इतना समय भी नहीं था कि कहीं से पैसों की व्यवस्था की जा सके।

सविता पर क्रोध उतारने लगा "भगवान ने बुद्धि तो दी ही नहीं पर्स हाथ में रखना चाहिये था, क्यों ताँगे में रखा, फिर सामान उठाते समय कैसे भूल गईं, होश ही नहीं रहता। वह चुपचाप मेरा भाषण सुन रही थी, पतिव्रता नारियों की तरह गुमसुम।

"चलो केंसिल करो, सामान उठा लाओ दीदी को बुला लेते हैं बाद में चलेंगे" वह बोली।

"क्या खाक.." मेरे मुँह से ये शब्द निकलते इससे पहले ही मैंने देखा कि सामने से वह बूढ़ा तांगेवाला पसीने से लथपथ हाँफता हुआ सायकिल से चला आ रहा है। पलक झपकते ही वह सायकिल से उतरकर सीढ़ियाँ चढ़कर मेरे पास आ गया "बाबूजी आपका पर्स तांगे में छूट गया था" हाँफने के कारण वह मुँह से ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। पर्स मेरे हाथ में देकर जैसे उसकी आत्मा को शांति मिल गयी हो।

मुझे ऐसा लगा जैसे वह मानवता की मंजिल की कई सीढ़ियाँ एक साथ चढ़ गया हो।

सविता के चेहरे पर फिर से प्रसन्न्ता झलकने लगी, जैसे कोई अपराध करते करते बच गई हो।

उसने दस रुपये निकालकर तांगेवाले को देना चाहे। "नहीं बेटा इसका मैं क्या करूँगा, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ, तुम लोगों को स्टेशन नहीं पहुंचा सका। चक्का कमजोर था, तंगी के कारण नहीं बनवा सका। आप लोगों को कहीं चोट तो नहीं आई" यह कहकर वह हमारी तरफ निरीह आँखों से देखने लगा।

"तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंचा दी मन को तसल्ली हो गई। मेरी गलती को माफ कर देना, मुझको भी अपना दौआ समझ लेना। "

शायद उसे पता था कि दौआ हमारा खानदानी तांगे वाला था।

मेरा दिमाग झनझना गया। हम ट्रेन में बैठ चुके थे। ट्रेन चल चुकी थी "मुझे भी अपना दौआ समझ लेना" तांगेवाले के यह शब्द मेरे कलेजे को चीरकर बार बार भीतर घुस रहे थे। मैं इतना निर्दयी कैसे हो गया। एक कमजोर निरीह आदमी पर कैसे में हाथ उठा सका। गाँवं में कक्का काकी दद्दा चाचा अम्माजी जैसे संबोधन देने वाला मेरा कंठ गालियाँ कैसे दे गया। डिब्बे के सब बूढ़े जैसे मुझे तिरस्कार की नजरों से देख रहे थे। पत्नी व्यंग्य से जैसे ताना मार रही थी कि मेरी बहादुरी के किस्से अपनी सहेलियों को अवश्य सुनायेगी। दीदी जैसे बचपने से निकलने की सीख दे रहीं थीं। मैं सोच रहा था कि यह वीर रस मेरे शरीर में कहाँ से प्रवाहित हो गया ।

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कहानी                        

नहीं चाहिए आदि  को कुछ......

वंदना अवस्थी दुबे

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' ये क्या है मौली दीदी?"

" आई-पॉड है."

"ये क्या होता है?"

" अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?"

इतना सा मुंह निकल आया आदि का.  क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता  है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम  सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है.

"अरे पागल,  ये आई-पॉड है, इसमें बहुत सारे गाने भरे हैं. पांच सौ से ज्यादा गाने डाउन-लोड कर सकती हूँ मैं इसमें. और हाँ ये एम्.पी. फ़ोर है."

" इत्ते सारे गाने? इसमें??? ..............वैसे मौली दी, ये एम्. पी. फ़ोर क्या है......?"

पूछते हुए अपने आप में सिमट गया था आदि, पता नहीं अब कौन से विशेषण से नवाज़ा जाएगा उसे..........

" अरे इधर आओ बसंतकुमार, मैं तुम्हें समझाती हूँ. "

आदि झिझकते-सकुचाते मौली के पास बैठ गया.

" ये देख , स्क्रीन दिखता  है इसमें?"

"............................"

" दिखता है या नहीं?" 

' दिखता तो है"

' तो जब हम कोई वीडियो क्लिप इसमें डाउन-लोड करेंगे तो वो हमें इसी स्क्रीन पर दिखाई देगी. समझा कुछ?"

" हां...समझा तो...."

" और गाने सुनने के लिए वही, ईयरफोन"

" ये कितने का आता है मौली दी?"

" मंहगा नहीं है यार, बस टू थाऊजंड का है."

" टू थाऊजंड..........यानि सौ के कितने नोट मौली दी..?"

सात साल का आदि , मुश्किल में पड़  गया था.........

" अरे बुद्धू, हंड्रेड के ट्वेंटी नोट यानि सौ-सौ के बीस नोट."

" सौ -सौ  के बीस नोट.................... तब तो बहुत सारे रूपये चाहिए....."

" अब इतने सारे भी नहीं हैं ये. अपने पापा से कहना, तो वे ला देंगे तुम्हारे लिए."

बारह साल की मौली ने अपना ज्ञान बघारा.

आदि, यानी पांडे जी का छोटा बेटा, जब भी मौली के घर जाता है, चमत्कृत होता है. कितना बड़ा घर, कितना सारा सामान..... सबके अलग-अलग कमरे..

कितने सारे सामानों के तो नाम ही नहीं जानता आदि.... वो तो मौली दी बहुत अच्छी हैं, सब सामानों के बारे में बताती हैं.

आदि हमेशा सोचता है, उसका घर मौली के घर जैसा क्यों नहीं है?  हम लोग किराए के घर में क्यों रहते हैं?  मौली दी कोई फरमाइश करें, तो उनके मम्मी-पापा तुरंत पूरी  करते हैं, मेरी फरमाइशें क्यों पूरी नहीं होतीं?  जब भी कुछ मांगो तो फट से सुन लो "  हमारे   पास पैसों का पेड़ नहीं है, जो तोड़-तोड़ के  तुम्हारी ऊटपटांग मांगें पूरी करते रहें."

मौली दी के बगीचे में पैसों का पेड़ लगा है क्या?

ज़रूर लगा होगा ! उसी से तोड़-तोड़ के सामान खरीदते होंगे.

आदि को मौली के घर में रहना बहुत अच्छा लगता है. सब एक दूसरे से कितने प्यार से बातें करते हैं. आदि भी पूरे घर में कहीं भी आ-जा सकता है. कोई मनाही नहीं. उसके घर में तो जब देखो तब चख-चख . मम्मी कुछ घरीद लें, तो पापा घर सिर पे उठा लेते हैं. कितना चिल्लाते हैं! दिन रात खटने की दुहाई देते हैं. हर बात में कह देते हैं, पैसा नहीं है....

पता नहीं , पैसों का पेड़ क्यों नहीं लगा लेते.....पौधा तो मौली दी के घर से मिल ही जाएगा. शायद कलम लगती हो.........

पूछेगा आदि मौली से.

मौली दी के पापा कितने अच्छे हैं. कितनी बड़ी बड़ी चॉकलेट लाते हैं उनके लिए. आदि को सब चॉकलेटों के नाम और स्वाद मालूम हैं. मौली दी उसे भी खिलाती हैं न!  चॉकलेट खाने के बाद जब मौली दी उसका रैपर फ़ेंक देती हैं , तो आदि चुपचाप उसे  उठा लेता है, एकदम नज़र बचा के. पूरा डिटेल पढ़ता है. बार-बार सूंघता है रैपर को ...और फिर सहेज के रख लेता है.

आदि के पापा तो कभी चॉकलेट खरीदते ही नहीं. कभी-कभार टॉफी ला देते हैं, तो वो भी बस दो-दो ही मिलती हैं दोनों भाइयों को. और मांगो तो डपट देते हैं कि  " दाँत खराब करना हैं क्या?"

मौली दी के दाँत  तो एकदम सफ़ेद हैं.....................

मौली दी के पापा गाड़ी से ऑफिस जाते हैं. एकदम चमाचम गाड़ी. सुबह सबसे पहले उनका नौकर गाड़ी ही साफ़ करता है. मौली दी का नौकर उनकी गाड़ी, और उसके पापा अपनी सायकिल लगभग एक ही समय पर साफ़ करते हैं.

अच्छा नहीं लगता आदि को......................

उसके पापा गाड़ी क्यों नहीं खरीदते? पूछा था आदि ने पापा से, लेकिन उन्होंने हंसी में उड़ा  दिया.....आदि समझ ही नहीं पाता पापा की बातें.

लेकिन आदि को मौली दी की तरह रहना अच्छा लगता है. उसके दोनों दोस्त , रोहन और अनवर भी तो मौली दी की तरह ही रहते हैं. पैरेंट्स-मीटिंग में उनके पापा भी तो गाड़ी से ही आते हैं. लेकिन आदि के पापा....................

पिछली बार सायकिल के डंडे पर बैठा आदि कितना शर्मिंदा हो गया था , जब रोहन की गाड़ी ठीक उसकी बगल में आकर खड़ी हो गई थी.

अब तो आदि भी कई बार झूठ बोल देता है............. सब बड़ी-बड़ी बातें हैं.....अगर वो झूठ न बोले और बता दे कि उसका कोई कमरा नहीं , वो तो रात को बाबा आदम  के ज़माने के , तांत की बुनाई वाले सोफे पर सोता है, तो कौन उससे दोस्ती करेगा? भला हो मौली दी का , जिनके कारण न केवल उसे हर आधुनिकतम सामान देखने को मिलता है, बल्कि उनका इस्तेमाल भी जानता हा. इसीलिये अपने दोस्तों के बीच किसी भी सामान के बारे में ऐसे बताता है , जैसे वो मौली का नहीं, उसका खुद का हो.

काश! उसने मौली के घर जन्म लिया होता!

अपने घर में वो जब भी आसनी बिछा के खाना खाने बैठता है तो उसे मौली दी की डाइनिंग टेबल  खूब-खूब याद आने लगती है. चमकती हुई...शीशे की.....उस पर क्रॉकरी....

कितनी नफ़ासत  से सब थोड़ा-थोड़ा खाना निकालते हैं प्लेट में...

उसके पापा तो जब खाना खाने बैठते हैं , तो मम्मी रोटियों कि पूरी गड्डी  ही रख देती हैं थाली में. सब्जी भी ऊपर तक भर देती हैं कटोरी में. मौली दी के यहाँ खाते समय कोई आवाजें नहीं करता, और आदि के यहाँ? 

पापा तो इतनी आवाजें करते हैं न, कि दूसरे  कमरे में बैठा आदि   बता सकता है, कि वे कब क्या खा रहे हैं. चाय भी ऐसे सुड़क-सुड़क के पीते हैं, कि आदि सोते से जाग जाता है.

पहले आदि को पापा की सारी आदतें बहुत अच्छी लगती थी. वो भी चाय सुड़कने लगा था. लेकिन  मौली दी की  मम्मी ने समझाया , उसने चाय सुड़कना  बंद कर दिया.

समझाया तो उन्होंने  ये भी था कि  बच्चे चाय नहीं पीते, तुम दूध पिया करो.

उसने मम्मी से कहा भी था कि  वे उसे  दूध दिया करें. लेकिन मम्मी ने कहा कि अभी कुछ दिन चाय पियो, फिर अगले महीने से दूध बढ़ा लेंगीं. लेकिन वो अगला महीना आया ही नहीं......

उसकी कोई भी बात मम्मी पूरी नहीं करतीं. पिछली बार अपने जन्मदिन पर आदि ने कहा था कि उसे भी मौली दी की तरह केक काटना है. मौली दी से कन्फेक्शनरी  का पता भी ले आया था. पापा गए भी थे दूकान तक, लेकिन फिर बिना केक के लौट आये . बोले- बहुत महंगे हैं. मम्मी झट से बोलीं-  मैं घर में बना दूँगी. आदि खुश.

लेकिन मम्मी ने क्या किया? हलवा बना के उसी को केक के आकार  में जमा दिया!  

कितनी अच्छी हैं मौली दी की  मम्मी.....एक उसकी मम्मी हैं...दिन भर काम करती हैं, और अपनी ही साड़ी से हाथ पोंछती रहती हैं. कभी आदि को डांटती हैं कभी भैया को.

काश! मौली दी कि मम्मी उसकी मम्मी होतीं.................

सुबह देर  से आँख खुली  थी आदि की. किसी ने जगाया ही नहीं. जब उठा तो घर कितना सूना-सूना लग रहा था. न मम्मी की आवाजें न पापा की. कहाँ गए ये लोग?

अन्दर से बाहर तक ढूंढ लिया मम्मी को, नहीं मिलीं. केवल भैया बाहर बैठा था. उसी ने बताया कि बड़े सबेरे मम्मी कि तबियत अचानक ही ख़राब हो गई, तो पापा उन्हें हॉस्पिटल ले गए हैं. और ये भी कि दस बजे जब भैया स्कूल जाएगा तब आदि को मौली के घर छोड़ देगा, पूरे दिन के लिए.

मौली दी के घर! पूरे दिन!! बांछें खिल गईं आदि की. मम्मी बीमार हैं, ये भी भूल गया. फटाफट नहा-धोकर तैयार हो गया.

मौली दी भी उस समय स्कूल में थीं, जब आदि उनके घर पहुंचा. आंटी ने उसे ढेर सारी स्टोरी बुक्स दे दीं.

लेकिन कितनी देर पढता आदि? थोड़ी देर में ही बोर होने लगा. तभी आंटी ने उसे ब्रेक-फास्ट के लिए बुलाया . आदि प्रसन्न. टेबल पर आंटी, अंकल और आदि. आंटी ने टोस्ट पर बटर  लगाया, प्लेट  उसकी ओर  खिसकाई.

गपागप खा गया आदि. और की  इच्छा थी, लेकिन मांगे कैसे? सब दो पीस ही खा रहे थे. उसका घर होता तो मम्मी पहले ही चार ब्रेड देतीं.

फिर लंच के समय भी............

उसका मन हो रहा था कि  कुर्सी पर ही आलथी-पालथी  लगा के बैठ जाए लेकिन............

मन हो  रहा था कि चम्मच फेंक के , पूरी कटोरी की दाल चावल में उंड़ेल के, हाथ से   खा ले, जल्दी-जल्दी लेकिन..................

बहुत बंधा-बंधा सा महसूस कर रहा था आदि................मम्मी की  याद आ रही थी. पता नहीं उन्हें क्या हो गया?  अपने घर की  भी बहुत याद आ रही थी.  शाम होते-होते उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, न कम्प्यूटर, न वीडियो गेम न और कुछ......................

                                                 " आदि आओ बेटा....." पापा की आवाज़ सुन उछाल पड़ा आदि, जैसे बरसों बाद सुनी हो ये आवाज़. लगा कितने दिन हो गए, घर छोड़े...............

दौड़ता हुआ बाहर आया. मौली दी को बाय तक कहना भूल गया.........

घर पहुँच के मम्मी से लिपट गया आदि. कितना सुकून......................कितना सुख. न नहीं चाहिए उसे मौली का घर, मौली की मम्मी.

भैया चाय बना लाया था. पापा अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सुड़कने लगे. आदि मुस्कुराया. अपना कप उठाया, प्लेट में चाय डाली, और खूब जोर से सुड़क गया.

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परिचय-

नाम- वंदना अवस्थी दुबे

शिक्षा- विज्ञान स्नातक, पुरातत्व विज्ञान में स्नातकोत्तर.

आकाशवाणी छतरपुर में अस्थाई उदघोषिका के रूप में छह वर्ष, और बाद में  दैनिक "देशबंधु " समाचार-पत्र में वरिष्ठ उपसंपादक के रूप में बारह वर्षों का कार्यानुभव. वर्तमान में स्वतन्त्र पत्रकारिता, लेखन और निजी माध्यमिक विद्यालय का संचालन.

पता- केयर पब्लिक स्कूल, मुख्त्यार गंज, सतना-म.प्र., पिन- 485001

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पुस्तक--- मेघा

लेखक-----बसन्त चौधरी

मूल्य-----१०० रूपये

प्रकाशक-------श्री लूनकरणदास गंगादेवी चौधरी साहित्यकला मन्दिर,नेपाल,२०१२

जिस प्रकार बंजर हो चुकी भूमि के लिए बारिश की बूँदें वरदान साबित होकर उसकी प्यास बुझाती हैं ठीक उसी प्रकार जीवन में हार मान चुके व निराश हो चुके लोगों के लिए ‘ कवि बसंत ’ कृत मेघा संकलन की कविताएँ आशावादी दृष्टिकोण पैदा करते हुए अतृप्त मन को तृप्त करती हैं l मेघा संकलन में मानव -जीवन की सच्चाई ,रिश्तों की अहमियत ,अकेलेपन ,संघर्ष ,परिवार व माता –पिता के प्रति गहन आस्था ,प्रेमिका के प्रति भावनात्मक प्रेम ,यादें ,आशाएं –निराशाएं सभी का मिलाजुला संगम है .मेघा सहज कलात्मक अभिव्यक्ति है .किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसका बचपन अनमोल होता है . बचपन की यादें ताउम्र हमारे साथ रहती हैं ठीक इसी प्रकार कवि ने कविता 'मासूम बचपन ' में इन्हीं बचपन के बीतों दिनों का याद करवाया है ----

“ मेरा वह मासूम बचपन

खो गया है

वक्त के लम्बे सुरंग में

चुपचाप कहीं सो गया है

आज जी करता है उसको

कहीं से भी ढ़ूँढ़ लाऊँ ”

बचपन के उपरान्त व्यक्ति यौवन के दहलीज चढ़ता है जहाँ उसे प्यार जैसी सुखद अनुभूति भी होती है परन्तु प्यार का सफर आसान नहीं होता .कवि अपनी कविता ‘तुम कहती हो दूरवीरानी' में कहता भी है---

“ सुना तो था

प्यार की पगड़ण्डियाँ

होती कठिन हैं

घिरी रहती हैं

कंटीली झड़ियों में ”

इसी कठिन सफर में प्रेमी की टीस और अकुलाहट देखने को भी मिलती है . ‘ कविता खाक बनाकर चले गए ’ इस बात का सशक्त प्रमाण है--

“ वह कहते थे हमें खुशी बनकर आए हो

अब खुद ही मुँह मोड़,खुशी छीन हमारी चले गए ”

सच्चाई तो यह भी है कि प्रेमी चाहे कितनी भी मुसीबतों का सामना करें परन्तु प्यार में ऐसी शक्ति होती है कि प्यार उस दर्द के लिए मरहम बन जाता है .कवि ने अपनी कविता ‘ सवालात रहने दो ’ में यह बात बखूबी स्पष्ट की है----

“ तुम्हारी यादों ने आतुर कर दिया

मैं अधूरा था

तुम्हारे दर्द ने दिल भर दिया “”

एक ऐसा ही अन्य उदाहरण कविता ‘अनसोया आसमां ‘ में भी दृष्टव्य है--

“ जिन्दगी झुलसाती है

तो चलो थोड़ा

प्यार का मरहम लगा लें

चुभन देती है यह दुनिया "

कवि बसन्त हर बात को जिन्दादिली से कहते हैं वे जहाँ अपनी कविताओं में थके - हारे व्यक्ति की झलक दिखाते हैं वही वे उस हताश हुए व्यक्ति को हौंसला देते हुए कहते हैं----

“ प्यार खोकर कर भी मुस्कुराए हम

जिन्दगी में ऐसे दिन भी बीते हैं "

----- कविता (शिकस्त )

कवि ने इन उपरोक्त पँक्तियों को पढ़कर ‘ जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं ’ स्मरण हो आती हैं .कवि अत्यंत भावुकता से अपनी कविताओं में बचपन ,प्यार ,परिवार ,रिश्तों ,प्रकृति के प्रति आस्था प्रकट करते हैं.आस्थावादी कवि बसंत ने परिवार को वाटिका और सदस्यों को फूलों की उपमा देकर कविता के सौंदर्य को और भी बढ़ा दिया है .कविता का शीर्षक ही प्रतीकात्मक है----

मेरा परिवार :मेरी वाटिका

मेरी तरह

इस वाटिका में

कई सुन्दर फूल हैं

हर फूल

वाटिका का हार है

यही हमारा एक

जीवंत परिवार है "

अब जब कवि ने परिवार रूपी वाटिका के प्रति श्रद्धावन्त होकर भाव प्रकट किये तो ऐसे में कवि का प्रेम ,आस्था कुछ यूँ अपने पिता के प्रति प्रकट हुई है---

“हम सभी शाख हैं

उस वृक्ष की

पिता की

जिसने हमको उठ खड़ा होना

सिखाया "

कवि के माता के प्रति भी भाव उमड़ आएँ----

“ हम हैं पत्तियां

उस लता की

अपनी माँ की

जिसने हमको

प्यार से पलना सिखाया "

ऐसे लगता है मानों इन कवितायों में कवि ने अपने जीवन की कहानी ही बयान कर दी है .चाहे वह कवि के आस –पास का वातावरण हो या पारिवारिक सदस्य .सभी के प्रति कवि भाव –विभोर हो कर गीतों की लड़ी पिरोता चला जाता है .कवि ने अपनी जीवन संगिनी के प्रति भी गुनगुनते हुए कहा है---

“ मेरे गुनगुनाते गीत का

पहला अन्तरा हो ?

या मेरे हर सपने की

साकार प्ररेणा हो तुम ?’’

------ कविता (क्या हो तुम ) ?

जब कोई भी व्यक्ति घर –परिवार की दहलीज से बाहर कदम रखता है तो उसका सामना समाज की सच्चाई से भी होता है जहाँ अक्सर अनेक मुखौटों वाले लोग,अजनबीपन ,संघर्ष ,पैसों की होड़ आदि भावनायों का सामना करना पड़ता है .कवि बसंत तत्कालीन समाज की कड़वी सच्चाई को बेबाक होकर प्रस्तुत करते हैं ----

“अब जमाने का यह दस्तूर हुआ

आदमी आदमी से दूर हुआ “

कविता (मजबूर हुआ )

आज की भागदौड़ की जिंदगी में व्यक्ति छोटे -छोटे सुख भी खोता जा रहा है .चूंकि आज के मानव का लक्ष्य अधिक से अधिक पैसा कमाना ही रह गया है . ‘ सामने दरख्त नहीं ’ कविता इसका स्पष्ट उदाहरण है ----

" पाने के लिए दौड़े थे

पर खो चुके हैं सब

रास्ता न मंजिल है

गर्क़ हो चुके हैं सब "

सच्चाई तो यह है कि युग के बदलाव साथ प्रगति की अन्धी दौड़ में भागते हुए व्यक्ति और रोबोट में कोई अंतर नहीं रहा.कवि अपनी कविता 'आदमी और रोबोट ' के माध्यम से व्यग्यं करते हुए कहना चाहता है कि आज के इस मशीनीकरण युग में मनुष्य का जीवन अपनी स्वाभाविकता खोकर यान्त्रिक ही हो गया है--

" यह खबर भी सच है शायद

आदमी तो खो गया है

अभी जो चल फिर रहा है

वह तो अब रोबोट ज्यादा हो गया है "

यहाँ तक कि इसका प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ रहा है कभी-कभी व्यक्ति खुद को ही अस्तित्वहीन समझ बैठता है-----

" मैं कौन हूँ

यह प्रश्न

यूँ तो व्यर्थ है

फिर भी कभी-कभी

मन में उठता है

मैं कौन हूँ ?

-------कविता (कौन हूँ ? )

आज का इन्सान सही मायनों में समय के हाथों की कठपुतली भी बनता जा रहा है जो सरेआम समाज में हो रहे अत्याचारों का तमाशा देखकर विद्रोह नहीं कर पाता .कई बार तो 'खून की होली ' देखकर भी उसे खून के आँसू पीने पड़ते हैं क्योंकि वह परिस्थितियों के कारण मजबूर होता है-----

" खून की होली

यहाँ हर तरफ गोली है

चुप रहो,मर जाओगे

यह समय की बोली है

---------कविता (खून की होली )

कहते हैं कि एक रचनाकार बेबाक होकर अपनी बात कहता है जहाँ कोई दुराव- छिपाव नहीं होता . जिससे उसकी रचनाओं में समाज का सच समाहित हो जाता है. इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है . कवि बसंत भी जीवन की सच्चाई को पूरे हौंसले से कहते हैं ---

" जिन्दगी के सफे पर

तुझे

एक गजल की तरह

उतारता हूँ "

----- कविता ( गीत तेरे नाम )

जब तक कवि अपने मन की बात को कागज पर उतार नहीं देता तब तक वह बात उसके भीतर कचोटती रहती है ----

" लिखता हूं तो

सुकून महसूस करता हूँ

अँकुरित शब्दों को

जी भर उगने देता हूँ "

----- कविता ( मौन आवाज )

समाज की कड़वी सच्चाई को देखकर भी कवि आशावादी दृष्टिकोण अपनाए हुए है . कवि जीवन को सुखों- दुखों के दो पहलू बताते हुए कहता है---

" जिन्दगी में खुशियां है

तो गम भी, हजार हैं "

---- कविता ( जिन्दगी )

इस प्रकार कवि बसंत शुरू से लेकर अंत तक जीवन के प्रत्येक खट्टे- मीठे अनुभव का वर्णन करते हैं . मानों कविताओं में भावों की लड़ी पिरोई गई है. भावपक्ष की तरह कलापक्ष भी सुंदर बन पड़ा है . कवि की भाषा में ऐसा भाव है कि मानों पूरा बिम्ब ही आँखों के समक्ष उभर आता है. प्रकृति की सुंदर अठखेलियों का यह मनमोहक बिम्बात्मक भाषिक विधान दृष्टव्य है---

" हवा चंचल बह रही है

कर रही है वृक्ष से अठखेलियाँ

बिना किसी पँख के

उड़ रही है "

----- कविता ( हवा के पँख )

कहीं भी कवि अपनी बात को तोड़- मरोड़ कर नहीं कहता अपितु सीधी सरल भाषा में उनकी बात पाठक हृदय को इस प्रकार छू जाती है कि जैसे एक ठण्डी बयार का झौंका छूकर निकल जाता है ---

" रूपसी

तेरी यह मुस्कान है

अधखिली

एक धूप- सी "

-----कविता ( गीत तेरे नाम )

कवि अपनी भाषा में गूढ़ , पण्डिताऊ और किलष्ट शब्दों के स्थान पर सरल , सुबोध , आम बोलचाल एवं रोजमर्रा की भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे स्याही से लिखे अक्षर भी जीवंत हो जाते हैं . कवि बसंत जी के अनुभव सँसार की भाँति उनकी कविताओं के अन्तर्गत उनका भाषा -कोश भी समृद्ध ,उन्नत व गतिशील है .निश्चित रूप से यह काव्य-संग्रह अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों ही स्तरों पर प्रंशसनीय है

समीक्षक----डॉ.प्रीत अरोड़ा

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नाम- डॉ.प्रीत अरोड़ा

शिक्षा-एम.ए हिन्दी पँजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से (यूनिवर्सिटी टापर ),पी.एचडी(हिन्दी )पँजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से,बी.एड़ पँजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से .

कार्यक्षेत्र—शिक्षिका

अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद । अनेक प्रतियोगिताओं में सफलता, आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में नियमित लेखन जिनमें प्रमुख हैं- हरिगंधा, पंचशील शोध समीक्षा,शोध-दिशा, अनुसन्धान, अनुभूति,गिरिराज,हिमप्रस्थ,गर्भनाल,मनमीत,समृद्ध सुखी परिवार,गुफ्तगू,हिन्दी-चेतना(कैनेडा)पुरवाई(ब्रिटेन),कर्मभूमि ,(अमरीका),हिमालिनी (नेपाल ),हिन्दी पुष्प (साउथ एशिया ) आलोचना,अक्षयगौरव,कथाचक्र,वटवृक्ष,सृजनगाथा,सुखनवर, वागर्थ,साक्षात्कार,पुष्पगंधा,नया ज्ञानोदय,लमही ,हंस,जनसत्ता अखबार ,हमारा मैट्रो,छतीसगढ़ अखबार,इतवारी अखबार ,नव-निकष, युवा संवाद,सद्भावना दर्पण पाखी,परिकल्पना,मुस्कान.युग्म, दैनिक भास्कर,चण्डीगढ़ भास्कर ,दैनिक जलते दीप,प्रवासी-दुनिया,हिमाचल गौरव उत्तराखंड,तंरग भारत,हस्तक्षेप.काम,मेरी सहेली,हम सब साथ-साथ,समृद्ध सुखी परिवार,मैट्रो उजाला ,छू लो आसमान आदि में लेख,कविताएँ,लघुकथाएं,कहानियाँ, संस्मरण,समीक्षा,साक्षात्कार व शोध-पत्र आदि। वेब पर मुखरित तस्वीरें नाम से चिट्ठे का सम्पादन.

अनेक किताबों में रचनाएँ प्रकाशित

सम्मान-अमर उजाला की ओर से सम्मानित

पुरस्कार-‘वुमेन आन टाप ’पत्रिका के ओर से कहानी पुरस्कृत (मई-2012 )

युवा लेखिका के लिए राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड (२०१२) से सम्मानित

अनुभूति नामक काव्य-संग्रह का सम्पादन (प्रकाशाधीन )

मनमीत पत्रिका का अतिथि सम्पादन

ईमेल---arorapreet366@gmail.com

ब्लॉग--http://merisadhna.blogspot.in/

http://deep-dehari.blogspot.in/

http://www.facebook.com/#!/groups/340012012727913/

ईमेल—arorapreet366@gmail.com

मेरा पता---
डॉ.प्रीत अरोड़ा
मकान नम्बर---405,गुरूद्वारे के पीछे
दशमेश नगर,खरड़
जिला--मोहाली
पँजाब
पिन नम्बर—140301

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मैं नीर माँ.......

जीवन, देह में विचारों ,भावनावों और क्रियाओं का योग है और विश्व शिव संग माँ का परमयोग है। मानव आदिगुरू का  प्रयोग हैI देह को तो गुरुत्व का बंधन है पर विचार तो मुक्त है, आकाश के अनंत आयामों में इसे उपग्रह बना कर स्थापित करना चाहता हूँ, विचारों को तो कम से कम सत्य का आधार दिया जा सकता है, भाव अतिसूक्ष्म  है और चेतना सूक्ष्मतम है,  भाव चेतना और विचारों के बीच की कड़ी है, क्रिया ही जीवन है, करनेवाला 'मैं' है, जीने के लिए जीवन में सत्य से समझौता करना पड़ता है,  झूठ का भी सहारा लेना पड़ता है, पर औरों को क्षति पहुचाएं बिना यह उतना हो जितना रोटी में नमक हो और ये संभव है। उस ईश्वर ने सत्य और असत्य के बीच यह जीने का  रास्ता दिया है यहाँ पर पद, प्रतिष्ठा और धन संतुलित रहता है,  विश्व पंचतत्वों के संतुलन से दिखाई देता है मेरा भी ऐसा ही कुछ है, सबको गुरुत्व का आधार है, जीवन जीने के लिए तरलता और सरलता की आवश्यकता है पर गतिमयता और आनंदमयता से जीवन रंगीन हो जाता है, इन्द्रधनुष की तरह दर्शनीय हो जाता है, मैं अपनी पूरी चेतना को नीरमय करना चाहता हूँ , जल तो स्नेह और तरलता का परम तत्व है पर नीर बन कर नदी संग बहना चाहता हूँ और क्षीर बन कर समुद्र के अन्तःस्थल में स्थापित होना चाहता हूँ पर यह नहीं भूलना चाहता की  मैं बूंद हु अंश हूँ, निरुद्देश्य हूँ, इसलिए नदी का आधार चाहिए, मैं ये नहीं जानता की मैं ऐसा क्यों हूँ, नदी तो गुरु माँ की तरह है जो मुझे सागर से आकाश तक ले जा सकती है

 

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ, 

चूमता मैं ज्वार से आकाश को ये चन्द्र माँ मैं तेरा बिम्ब माँ, 

बादलों के द्वार पर मैं नृत्य करता नटराज सा मैं तेरा अंश माँ, 

घटाओं से आलिंगन करता मुकताकाश माँ, 

बिजली बन भयंकर भयंकर भरता हाहाकार करता, 

कड़ कड़ गीत गाता कण कण गीत गाता, 

रज रज के कण कण में फ़ैल जाता मैं हर बूंद माँ,

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

घटाओं संग प्रेम करता उसमे रंग भरता,                                                 

मैं रंगरेज माँ  हर रंग माँ आकार माँ, 

मैं कालिमा लालिमा नीलिमा मैं इंद्र का टंकार माँ, 

मैं हरीतिमा मैं तेरी गरिमा ये गौरीमाँ,

मैं मेघ माँ मल्हार माँ मैं बरखा बहार माँ, 

मैं धरती का प्यार माँ, 

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

मैं संत माँ बसंत माँ मैं तेरे अंक माँ, 

मैं धरती का प्यास माँ कृषक की आश माँ, 

घुंगरू  सा बजता मैं बरखा का बूंद माँ बौछार माँ, 

हलधर के मस्तक पर मोतियो सा बूंद बनता, 

वन वन मीत गाता संगीत गाता,

भौरों संग गुनगुनाता लता संग झूम जाता,  

मैं ओस माँ हर ओर माँ  हर छोर माँ,  

हर पात माँ प्रातःकाल माँ, 

वनदेवी का हार बनता अलंकार बनता,

जगमग जगमगाता प्रातःधूप माँ,  

बालाओं के घुँगरू संग रुन झुन रुनझुन रुन्झुनाता,

पद चाप बन छप छप छप छपाता,

थप थप थप थापता सबके संगमा,

मैं नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

हिमगिरी के शीश पर गतिहार बनता जलधार बनता, 

माँ  का गीत गाता हरी गीत गाता, 

मैं गंगानीर गाता ये गंगा धीर जा, 

ये गिरिजा पाषाणों पर मैं गिरता मैं लिखता,

मैं गंगा आदि माँ, अंग माँ ,अनंत माँ,

मैं धुआंधार माँ कल कल गीत गाता,

छल छल छलछलाता,

मैं शांत माँ ,गति आनंद माँ,

मैं नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ

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डाक्टर चंद जैन 'अंकुर'

[D.C. Jain (ankur), Dr. bais gali, behind new hanuman mandir, Brahmanpara, Raipur C.G (492001)

Mob. 98261-16946]

कहानी

दिल्ली की दोपहर

त्रिपुरारि कुमार शर्मा

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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मंदर के साफ़ पानी में काली कतार बनाकर तैरती हुई मछलियों की तरह, उजली और चमकती हुई चमड़ी पर नीली नसें निकल आई थीं। मालूम पड़ता था कि लड़की की देह में बहते हुए लाल लहू का रंग अब काला हो गया है। वह जून का जलता हुआ दिन था। दिल्ली की सबसे गर्म और सफ़ेद दोपहर। उसने जेब में हाथ डाला, जैसे कुछ टटोल रहा हो। कुछ देर बाद उंगलियों के बीच फँसा हुआ बादामी रंग का रुमाल दिखाई पड़ा। हवा में हिलता हुआ रुमाल, जो सीधा उसके चेहरे पर आकर रुका। उसने दोनों हथेलियों से चेहरे को छुपा लिया। फिर धीरे से रुमाल को नीचे की ओर सरकाने लगा। ऐसे, जैसे पसीने के साथ-साथ सारी परेशानियाँ भी पोंछ कर फेंक देना चाहता था। मेट्रो में जो थोड़ी देर को ‘राहत’ मिली थी, अब दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी।

वे अब मेट्रो स्टेशन से बाहर आ चुके थे। बाईं आँख के सबसे नजदीक था पालिका बाज़ार और सेंट्रल पार्क के लिए दाईं आँख से सटे दूसरे दरवाज़े से अंदर जाने का रास्ता था। पलकों को ऊपर उठाने पर रीगल सिनेमा या दूसरी बिल्डिंग्स भी देखी जा सकती थी, लेकिन दोनों ने इसकी कोई ज़रूरत नहीं समझी। सूरज, सिर के सबसे करीब था और आसमान पहुंच से बहुत दूर हवा में झूल रहा था। लड़की ने कुछ इशारा किया और वे सेंट्रल पार्क की ओर बढ़ने लगे। उसे यह बात समझते देर नहीं लगी कि लड़की का लगाव इस पार्क से कुछ ज़्यादा ही हो गया है। तभी तो हर एक संडे यहाँ आने को कहती थी। पूरी दोपहर यहीं बिताती, फिर शाम को सज़दा करने किसी ‘बार’ में जाती थी। सप्ताह के दो दिन का रुटीन तय हो गया था। संडे सीपी में और मंडे को आराम। मंडे की शाम को यह भी तय हो जाता कि अगले सप्ताह कहाँ-कहाँ जाना है?

जब वह पहली बार उससे मिला था, महकते हुए मार्च की महीन धूप छतों पर छतरी लगाए बैठी थी। हवा किसी अदृश्य आदमी के साथ अठखेलियाँ कर रही थी। वह चुपचाप अपनी बालकनी में खड़ा आसमान के टुकड़े में उभरती हुई शक्लों से बातें कर रहा था। यह उसका सबसे पसंदीदा खेल था, क्योंकि इस खेल को अकेले ही खेला जा सकता था। ऐसा नहीं था कि उसे दूसरों के साथ खेलना पसंद नहीं, मगर एक मज़बूरी थी, जो अब आदत बन चुकी थी। आदत? उसे तो ज़िंदगी भी ज़रूरत नहीं, एक आदत-सी लगती थी। उसने बहुत बार सोचा कि ज़िंदा रहने की ज़रूरत क्या है? उसके बिना भी दुनिया उसी तरह चलती रहेगी, जैसे हमेशा से चलती रही है। फिर वह सोचता कि अगर ज़िंदगी ही न होती, तो ये सारी शकायतें वह किससे करता? अचानक उसे माँ की याद आ जाती और वह एक ‘बच्चा’ में बदल जाता...

जब वह तेरह साल का था, तो उसके बाबूजी की मौत हो गई थी। तब से वह अकेला ही रहने लगा था। कुछ तो वक़्त का तकाज़ा था और कुछ उसका स्वभाव भी। अब उसे अकेला रहना अच्छा लगने लगा था। वह अपने ‘अकेलापन’ को ‘एकाकीपन’ कहता था। वह कहता था कि ‘अकेलापन’ में व्यक्ति दूसरों के साथ रहना चाहता है—क्योंकि मजबूरन उसे अकेला रहना पड़ता है—जबकि ‘एकाकीपन’ में व्यक्ति अपने आप में पूरा होता है। उसे किसी के साथ रहने की इच्छा तो नहीं होती, मगर किसी का साथ मिल जाए, तो उस एकाकीपन का रंग और ख़ूबसूरती, दोनों निखर आते हैं। वह अजीब-अजीब-सी बातें किया करता था।

वह अपने खेल में मशगूल था...तभी एक हसीन-सी हँसी से कुछ टूटे हुए टुकड़े उसके कान के परदों पर आकर गिरे। पहले तो उसने ध्यान ही नहीं दिया। जब हँसी की हरी और ताज़ी बूँदें उसके कानों पर दोबारा गिरीं, तो उसने दाईं ओर मुड़कर देखा, जहाँ से आवाज़ छन-छनकर आ रही थी। उसकी बालकनी के सामने एक लड़की अपने मकान की बालकनी में खड़ी थी। होंठों पर हँसी की बूँदें अब भी चिपक रही थीं। हवा के हल्के से झोंके से बाल बार-बार बिखर जाते थे, जिसे वह अपनी अंगुलियों से बीच-बीच में सम्भालती रहती थी। चेहरे से चिपकती हुईं अपाहिज आँखों पर उसने मटमैले रंग के मोटे-से फ़्रेम का चश्मा चढ़ा रखा था। उसकी नाक की टीप पर एक छोटा-सा काला तिल भी था, जो उसके चेहरे का सबसे आकर्षक हिस्सा था। गाल बहुत ज़्यादा गुलाबी तो नहीं थे, मगर उजालों की ओट में खिले हुए लिली के फूल की तरह लग रहे थे। उसके पाँव नहीं दिखाई दे रहे थे, पर उजली टाँगों और नंगी जाँघों के ऊपर हिलती हुई ब्लू स्कर्ट नज़र आ रही थी। लाल रंग की टी-शर्ट के नीचे चौड़ी और दुबकी हुई देह और छोटी-सी छाती पर उम्र के उभरे हुए तकाज़े, आँधी के बाद एक गुच्छे से लटकते हुए आख़िरी दो कच्चे टिकोलों की तरह लग रहे थे। हवा जब भी उन्हें छूती, तो वे टिकोले अपना आकार बदलकर आम की शक्ल इख़्तियार कर लेते थे।

एक पल के लिए उसे लगा कि वह भ्रम के भँवर में भटक गया है। उस मुहल्ले को वह बरसों से जानता था। अपने घर के ठीक सामने खड़े उस पुराने मकान से भी उसका पुराना परिचय था। उसकी माँ ने एक बार ज़िक्र किया था—लगभग 40-45 बरस पहले की बात होगी—सुरेंद्र कपूर ऊर्फ़ ‘कर्नल साहब’ के घर आधी उम्र के बाद एक बच्चा हुआ था। बच्चे के पैदा होने के कुछ देर बाद ही हॉस्पीटल के बेड पर उनकी पत्नी ने आख़िरी साँस ली थी। यह सब उनकी आँखों से गुज़रा, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी औलाद की परवरिश बड़े प्यार से की। बेटा जब बड़ा हुआ, तो अमेरिका की किसी कम्पनी में उसकी नौकरी लग गई। वह अमेरिका चला गया। कर्नल साहब की आख़िरी इच्छा थी कि वे बेटे की शादी अपनी पत्नी के दोस्त जसविंदर सिंह की बेटी गगनदीप से कराएँ, जो पेशे से डॉक्टर थी। मगर बेटे ने एक अमेरिकी लड़की से शादी कर ली। दोबारा लौट कर भी नहीं आया। हाँ, हर साल वैशाखी और क्रिसमस पर उसके भेजे तोहफ़े ज़रूर आते थे। जब उन्हें पता चला कि बेटे ने ब्याह रचा लिया है, तो वे यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके। मखमली बिस्तर पर सोने वाले कर्नल साहब की देह, एक सप्ताह के भीतर-भीतर अर्थी पर लेटी हुई नज़र आई।

जब कर्नल साहब अर्थी पर लेटे थे। वह चाहकर भी उनके पास नहीं जा सका था। नन्ही-सी उम्र हमेशा कर्नल साहब की सफ़ेद-ओ-स्याह दहकती हुई दाढ़ी और मूँछ देखकर डर जाती थी। उसे, उनकी देह से एक अजीब क़िस्म की बदरंग-सी बू आती थी। उसे लगता था कि कहीं कर्नल साहब दाढ़ी और मूँछ के पिटारे में बंद न कर दें। वह जब कभी उनको देख लेता, तो लॉन मे लगे पेड़ों के पीछे छुप जाता था। परदे के पीछे भी कई बार कर्नल की काली-लाल आँखों से बचकर उसने अपनी जान बचाई थी। तब उसने कर्नल को आख़िरी बार देखा था। तब वह बहुत छोटा था। पिछले बीस बरस में न तो वैशाखी और न ही क्रिसमस पर कोई तोहफ़ा आया था। हाँ, घर के दरवाज़े पर एक चौड़ी-सी चुप्पी का ताला लटका रहता था। जब कभी धूप का धब्बा उस ताले पर पड़ता, तो ताला चमकने लगता—ठीक उस बच्चे की तरह जो बात को बिन समझे, महज अपनी माँ को हँसते हुए देखकर अपने दूध के दाँत दिखाने लगता है।

इतने बरसों में धूल की एक धुँधली-सी परत मकान की दरकती हुई दीवारों पर जम गई थी। अँधेरी रातों में यह मकान किसी भुतहा हवेली के अनोखे रहस्य की तरह लगता था—लेकिन जब कभी छतों और मुँडेरों पर चाँदनी चुगने के लिए उतरती, तो सारा रहस्य खुलने लगता। ऐसा लगता कि अभी कुछ देर में कर्नल साहब डोलते हुए अपने कमरे से बाहर निकलेंगे और सबकुछ सामान्य हो जाएगा। यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए लाइन में लगे स्टूडेंट्स की तरह कमजोर समय एक धक्का खाकर पीछे चला जाएगा। जैसे वह फिर से बच्चा बन सकता है। अपने बचपन में लौट सकता है।

“तुम किससे बातें कर रहे हो” – लड़की ने पूछा।
“अपने बाबूजी से...”
“क्या तुम्हारे बाबूजी बादलों में रहते हैं?”
“...” - वह ऊपर की ओर ताकने लगा।
“मेरा नाम योगिता कपूर है...”
“तुम ऊपर कैसे आई...वहाँ तो ताला लगा था?”
“ताला खोलकर...और कैसे...कल रात जब तुम सो रहे होगे तब...”
“लेकिन...”
“तुम कर्नल सुरेंद्र कपूर को जानते हो...ही वाज माय ग्रेंड पा...”
“तुम अमेरिका से आई हो?”
“हाँ...अब मैं यहीं रहूँगी कुछ महीनों तक...”
“...और तुम्हारे ममी-पापा?”
“ममी नहीं आई...पापा आए हैं...पर वे कल ही चले जाएँगे...”

तब वह पहली बार उससे मिला था। धूप, धीरे-धीरे अपना पंख फैलाने लगी थी। बालकनी में बैठे हुए गमलों के गले में अटके पौधों की पत्तियाँ कुछ ज़्यादा ही हरी दिखाई दे रही थीं। फूलों के रंग थोड़े-से गहरे हो गए थे। उसके दिमाग़ की पीली परतों में कुछ पकने लगा था।

“तुम क्या करते हो?”
“कहानी लिखता हूँ।”
“और नौकरी...?”
“फ्रीलांसिंग करता हूँ...कुछ अख़बारों में कॉलम लिखता हूँ...”
“क्या तुम मुझे यहाँ घुमाने ले चलोगे?”
“हाँ, क्यों नहीं...”

सुबह-सुबह वे दोनों घूमने निकल जाया करते थे। दोनों की उम्र में कुछ ही बरसों का फ़ासला था। कम ही दिनों में काफ़ी नजदीक आ गए दोनों। एक दिन जब लड़की ने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी, तो एक थकी हुई-सी आवाज़ ने रिप्लाई दिया कि वह घर में नहीं है। “क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?” लड़की ने कहा। “आ जाओ” यह उसकी माँ थी, जो बूढ़ी और बीमार-सी मालूम पड़ती थी। लड़की ने कमरे में मौजूद उसकी माँ से कहा, “कहाँ गया होगा?” उसकी माँ चुप रही। कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा सिमटा रहा। जवाब मिलने की कोई उम्मीद नहीं रखते हुए लड़की ने फिर पूछा, “क्या उसकी कोई दोस्त है?” माँ का मटमैला चेहरा जब बहुत देर तक चुप रहा, तो लड़की को लगा कि वे सो रही हैं। सोती हुई पलकों पर परेशानी के पत्थर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर बिखर गए थे।

लड़की कुछ देर तक अनमने भाव से देखती रही। उसे अपनी ममी का मुँह याद हो आया। जब वह अमेरिका में थी। उसकी ममी एक बार बीमार पड़ी थी, तो उसके पापा बिल्कुल भी परेशान नहीं हुए थे। हाँ, वह ज़रूर परेशान हो गई थी। अपनी नन्ही-नन्ही उजली-उजली उंगलियाँ ममी के गोल-मटोल मुँह पर फेरती और कहती—गेट वेल सून ममी...आई विल नेवर हर्ट यू...प्रॉमिस—और जैसे लगता कि वह उठकर बैठ जाएगी। ऐसा करने पर भी जब उसकी ममी उठकर नहीं बैठीं, तो वह क्रॉस पर लटकते हुए क्राइस्ट से ‘प्रे’ करने लगी—कहती कि वह अगर ममी को आज रात ही ठीक कर देगा, तो पाँच चॉकलेट देगी...प्रॉमिस। लड़की ने सोचा कि अगर यहाँ भी क्राइस्ट से ‘प्रे’ करेगी, तो उसकी माँ ठीक हो सकती है। उसने इधर-उधर देखा, मगर कहीं कोई ‘क्राइस्ट’ नज़र नहीं आया। वह हैरान होकर सोचने लगी कि इंडिया में कोई ‘क्राइस्ट’ नहीं है, शायद इसलिए ही यहाँ के ज़्यादातर लोग इतने ग़रीब हैं और इसलिए यहाँ इतनी बीमारियाँ भी हैं।

दोपहर की देह अब दोहरी हो चुकी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? तभी वह दिखाई दिया। “तुम यहाँ?” उसने आते ही पूछा। “तुम्हें खोजते हुए आ गई...”, लड़की ने कहा। “मैं दो दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ...” उसने कहा, “तुम चाहो तो मेरी माँ के पास रह सकती हो।” लड़की चुपचाप देखती रही, जैसे किसी ने गहरी नींद से जगा दिया हो। “मुझे अभी निकलना होगा...” और वह कपड़ा बदलने के लिए अपने कमरे में चला गया।

कपड़ा बदलते हुए उसके हाथों ने एक दुखती हुई दोपहर के दामन को छू लिया—बाबूजी की मौत के कुछ महीनों बाद ही माँ बीमार पड़ गई थीं—डॉक्टर की सलाह यह थी कि बीमारी के घाव को सिर्फ़ पैसों की मरहम-पट्टी से ही सुखाया जा सकता है। परीक्षा के इसी तरल समय में सगे-सम्बंधी भी एक-एक करके अपना परिचय देने लगे थे। साधारण सुविधाओं से सम्पन्न घर के नाम पर कुछ दीवारें और एक छत थीं। बैंक से अब आख़िरी रिश्ता यही बचा था कि बाबूजी के नाम का एक पासबुक अलमारी के अँधेरे दराज़ में बंद सिसकता रहता था। वह दिल्ली की सबसे दूषित दोपहर थी, जब उसने एक फ़ैसला लिया था। बहुत समय तक सोचने के बाद उसने अख़बार के कोने में छुपा हुआ एक फोन नम्बर नोट किया—जो कनखियों से शायद उसी को देख रहा था। फिर काँपती हुई उंगलियों से उसने नम्बर डायल कर दिया।

इस बिज़नेस में वह सबसे कम उम्र का था और उसकी माँग सबसे ज़्यादा थी। तब वह बिल्कुल नया था—महज चौदह साल का ‘जिगोलो’—जिसका न कोई नाम था, न कोई पहचान—हड्डियों के ढाँचे के ऊपर सुसज्जित ढंग से कई परतों में बिछे हुए माँस की एक मटमैली-सी देह था, जो दूसरी देह की ज़रूरतों को पूरा करना जानता था और इसके बदले में उसे उम्मीद से कहीं ज़्यादा पैसे और अच्छे तोहफ़े भी मिलते थे। घाव को सुखाने का, इससे बेहतर तरीका उसके पास नहीं था।

“पता है… मैं तुम्हें क्यों पसंद करती हूँ?”
“...”
“क्योंकि तुम बहुत अच्छे मर्द हो।”
“आपके हसबैंड कहाँ गए?”
“कितनी बार कहा है...मुझे आप मत कहा करो...” पैंतीस की परमजीत ने ज़रा-सा खिसियाते हुए कहा।
“वे दो दिनों में वापस आएँगे?”
“हाँ...अब हमें दो दिनों तक कोई डिस्टर्ब नहीं करने वाला...सिर्फ़ मैं और तुम”
“मुझे कुछ एक्स्ट्रा पैसों की ज़रूरत है...क्या...”
“हाँ-हाँ, ले लेना...आख़िर वो सरदार कमाता है किसके लिए...मेरे लिए और मैं किसके भरोसे ज़िंदा हूँ...तुम्हारे लिए...”
“अच्छा...जब मैं नहीं था तब?”
“मैं पैग बनाती हूँ।” - वह थोड़ी देर तक चुप रही फिर बोली।
“पता है...मुझे शुरू से ही सरदार पसंद नहीं थे। सबसे ज़्यादा चिढ़ मुझे उसकी दाढ़ी-मूँछ से होती है...स्मूच भी ठीक से नहीं कर सकते...साले...”
“तो फिर शादी क्यों की?”
“पैसे के लिए...”
“सिर्फ़ पैसे के लिए?”
“साउथ दिल्ली में इतना बड़ा घर...पाँच-पाँच गाड़ियाँ...बैंक बैलेंस...विदेश का टूअर...और फिर जब चाहो तुम जैसे नए लड़को का प्यार...इतना सबकुछ...एक साथ कहाँ मिलता है?”

वह सोचने लगा कि वाकई इतना सबकुछ कहाँ मिलता है? सपने में या सपने से परे किसी और दुनिया में, जहाँ नसीब नाम की कोई चीज़ होती है। लेकिन क्या प्यार पाना इतना आसान है? क्या प्यार का मतलब सेक्स ही है...जिसे जब चाहो...जहाँ चाहो...पैसे से खरीदा जा सकता है? क्या ‘संतुष्टि’ और देह के पार भी कोई चीज़ होती है? यह सोचते हुए उसे महसूस हुआ कि उसकी पैन्ट की जिप खोली जा रही है। कुछ देर तक चिपचिपी-सी आवाज़ कमरे के शून्य में तैरती रही। फिर उसने देखा कि अजंता की नंगी मूर्ति उसके सामने खड़ी है। वह मूर्ति से लिपट गया...चूमने लगा। उसकी जमी हुई जीभ ज़िंदा हो उठी और मूर्ति की नाक से नाभि की दिशा में आगे बढ़ने लगी। वह अब थोड़ा और नीचे झुक गया था...औरत बिस्तर पर लेट गई। उसे लगा कि आम के पकने का मौसम आ गया है। कमरे में जलती हुई मोमबत्तियों की मध्यम रोशनी में दो देह नजदीक से नजदीकतर आते चले गए। मोमबत्ती की पीली परछाईं पिघल कर पसरने लगी...।

जब वह दो दिनों के बाद घर लौटा, तो लड़की बालकनी में खड़ी थी। शनिवार की शाम का सूरज छतों से अपने लाव-लश्कर समेटने लगा था। पेड़ की सबसे ऊपरी फुनगी पर, जैसे वह कुछ देर के लिए ठहरना चाहता था। सारे शहर को आँख भरकर देख लेना चाहता था। फिर तो पूरे बारह घंटे के बाद मुलाक़ात होनी थी। पता नहीं, रात भर चाँद शहर के साथ क्या सलूक करता होगा। ...और सूरज की आख़िरी साँस भी पिघल गई। उजाले और अँधेरे के झुरमुट में वह उतनी ही ख़ूबसूरत दिखाई दे रही थी, जैसे उसने पहली बार देखा था। वह अपने घर जाने से पहले लड़की के पास चला गया। लड़की दौड़कर आई और उसकी छाती से लिपट गई। थोड़ी देर तक लिपटी रही और फिर झटके से दूर हट गई।

“क्या तुम किसी के साथ सोए थे?”
“तुम यह कैसे कह सकती हो?”
“तुम्हारी देह से उसकी गंध आ रही है...”
“अगर मैं कहूँ...नहीं, तो?”
“तुम झूठ बोलोगे...”
“तुम कैसे पहचान सकती हो?”
“...जब भी वह (लड़की का अमेरिकन साथी) किसी और लड़की के साथ सो कर आता था...मैं पहचान लेती थी...तुम्हें भी पहचान लिया...”
“मगर...कैसे...?”
“लड़की हूँ न! पहचान सकती हूँ...”

थोड़ी देर तक सिर्फ़ हवा के बहने की आवाज़ कमरे में आती रही। जब हवा तेज़ हो गई तो लड़की ने उठकर ख़िड़कियों को बंद कर दिया और लाइट का स्वीच ऑन कर दिया। बाहर बारिश से पानी टूटने लगा था। पेड़ों की पत्तियों को पानी की बूँदें बदहवास होकर चूम रही थीं। दोनों के भीतर कुछ था, जो पिघलने लगा था। दोनों की देह से एक गंध उठती थी और शून्य में सहम कर रह जाती थी। उसने महसूस किया कि उसकी देह को एक दूसरी देह पुकार रही है। यह पुकार अजनबी होते हुए भी इतनी पहचानी-सी लग रही थी कि उसकी पुकार को अनसुनी करना बेहद मुश्किल था। होंठों पर होंठों के साए मँडराने लगे। यह सोच कर खुशी भी हुई कि वह क्लीन सेव करता है। उसने देखा कि दो पके हुए पीले आम ब्रा से बाहर झाँक रहे थे। धीरे-धीरे अमेरिका और इंडिया के बीच का फ़ासला ख़त्म हो रहा था। सोग में डूबा हुआ सारा शहर अँधेरे की आगोश से ऊपर उभर रहा था। हल्की रोशनी के हरे-हरे टुकड़े ट्यूबलाइट से टूटकर फैली हुई फ़र्श की सफ़ेद सतह पर औंधे मुँह गिर रहे थे।

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त्रिपुरारि कुमार शर्मा
ए-203, गाँधी विहार
नई दिल्ली-110009
फोन : +91-9891367594
ई-मेल: tripurariks@gmail.com

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विनय कुमार सिंह

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अपवादों में सोशल मीडिया का शोषण

अपने नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सरकार वर्तमान में अपवादों का जरिया सोशल मीडिया को बताकर सोशल मीडिया के शोषण में जुट गई हैं। जिसका उदाहरण असम हिंसा हैं।

पिछले एक महिने से असम में तेजी से बढ़ती जा रही हिंसा को रोकने में जब केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकार की सभी कोशिशों विफल हो गईं तो अपने गले से इस फांस को टालने के लिए दोनों ही सरकारों ने इस हिंसा का मुख्‍य आरोपी सोशल मीडिया को करार दे दिया और आरोपी सोशल मीडिया को इसके बदले अपने करीब 300 से ज्‍यादा वेबसाइटों और ब्‍लॉगों के साथ-साथ कई अन्‍य सेवाओं का बलिदान देना पड़ा। अब तक तो आपने मानसिक शोषण, शारीरिक शोषण दोनों के बारे में सुना होगा, लेकिन सोशल मीडिया का शोषण ये नाम आपके गले नहीं उतर रहा होगा न? लेकिन सच्‍चाई भी यही है। जनता को जिस मंच से एक मजबूत जनाधार मिलता है। जहां से एक नया जनतंत्र का मंच तैयार होता है। जिस जगह से एक व्‍यक्‍ति की आवाज हजारों की आवाज बनती है। जिसके माध्‍यम से एक दूसरे का आपसी संवाद होता है। जहां से देश बचाने की मुहिम छेड़ी जाती है। जिसके जरिये से भ्रष्‍टाचार के खिलाफ देष एक मंच पर आकर अन्‍ना को समर्थन देता है। वो जरिया जो पल भर में काले करतूतों और अपराधिक प्रवृति के लोगों को बेनकाब करने में सहायक होता है। आज वही सोशल मीडिया अपराधी बनकर केन्‍द्र व असम राज्‍य सरकार के कटघरे में खड़ा है। अपराधी कौन है? किसने किया है अपराध? इस बात का तो अभी तक कोई सुराग नहीं, लेकिन अफवाहों को बढ़ावा देने के जुर्म में सोशल मीडिया को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रश्न यहां पर यह उठता है कि क्‍या सोशल मीडिया के अपराधी घोषित होने और कार्रवाई के बाद बंद की गई साइटों के बाद असम हिंसा में रोक लग गई है? क्‍या लोगों के दिल में जो डर पैदा है उसे निकाला जा चुका है? क्‍या जो लोग हिंसा से बचने के लिए पलायन कर रहे थे उन्‍हें रोकने में सरकार इस फैसले से सफल है? तो जबाब यह है कि न तो अभी तक असम हिंसा पर काबू पाया जा चुका और न ही पलायन करने वाले लोग रूक रहे हैं, बल्‍कि हिंसा का दौर और बढ़ता ही जा रहा है।

बस मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि अपवादों में जनतंत्र का गला घोंटने का काम क्‍यों हो रहा है? असम हिंसा में अफवाहों को बढ़ावा देने के जुर्म में आखिरकार सोशल मीडिया का शोषण क्‍यों किया जा रहा है? सरकार जब असम हिंसा को रोकने में नाकाम है तो वो सोशल मीडिया को मुजरिम करार देकर अपने आप को बचाने की कोशिश क्‍यों कर रही है? बात घूम फिरकर वहीं सरकार की कार्यप्रणाली पर आ जाती है। हिंसा का दौर समाप्‍त कब होगा? इसके बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन सरकार को इसके खिलाफ सख्‍ती से ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि समय रहते ही हिंसा की चिंगारी को बुझाया जा सके, वरना कुछ दिनों बाद ये आग के शोलों में तब्‍दील हो जाएगी और पुरी दुनिया को जलाने में कामयाब रहेगी ।

vinaymedia.pratap@gmail.com

ग़ज़लों पर महंगाई का असर

कुछ चुनिन्दा शे'र और अगर वे आज के ज़माने में लिखे जाते तो कैसे होते --इसे पेश

कर रहा हूँ,मीर साहब,कतील शिफई साहब ,शहरयार साहब,फैज़ साहब और खुमार साहब की आत्माओं से माफ़ी माँगते हुए,अगर माफ़ कर सके तो.

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सिरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलो

टुक रोते-रोते सो गया है.

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पेटी अनार  के आहिस्ता खोलो 

भाव पहुँच के बाहर हो गया है.

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.एक धूप सी जमी है निगाहों के आस-पास

ये आप है तो आप पर कुरबान जाइए .       [ कतील शिफई ]

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एक हूक सी उठी है कलेजे के आस-पास

हल्दी २०० Rs /kg है,दाल बिना हल्दी के खाइए.

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.माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास

लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिये.  [शहरयार.]

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माना कि शासकों को नहीं शासितों का ख्याल

लेकिन ये क्या कि हँसते-हँसते जान लीजिये.

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दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के

वो जा रहा है कौन शबे-ग़म गुजार के.      [फैज़]

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बेज़ार है वो दाम बढ़ने से ,बार-बार के

कोई  जा रहा है बाज़ार झक मार के.

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कैसे-कैसे गिले याद आये 'खुमार'

उनके आने से कब्ल, उनके जाने के बाद.

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कैसे-कैसे बोझ लाद दिये हज़ार

कुछ बजट से पहले, कुछ बजट के बाद.

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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नारद जी जब दरबार में पहुंचे तो देखा ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों सिर झुकाए चिंतित एवं उदास मुद्रा में बैठे हैं। ‘नारायण नारायण’ कहने और अपनी वीणा के तार झनझनाने पर भी तीनों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, और न ही समाचार पूछे। कारण पूछने पर भी तीनों में से किसी ने भी उत्तर नहीं दिया।

बहुत आग्रह करने पर विष्णु जी ने कहा कि वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं। शिवजी और ब्रह्मा जी ने अपना सिर हिला कर सहमति प्रकट की। नारद जी को महान आश्चर्य हुआ।

‘नारायण नारायण’ नारद जी ने अपनी भृकुटि को किंचित ऊपर चढ़ा कर माथे पर बल डालते हुए कहा, ”परंतु सृष्टि के निर्माता, तीनों लोक के नियंता और पालनहार, आप तीनों देव ऐसा विचार क्यों ला रहे हैं अपने मन में? प्रभु क्या मैं कारण जानने की घृष्टता कर सकता हूं।“

”अरे ऐसे पूछ रहे हो मानों आपको कुछ पता ही न हो? फिर भी यदि कहते हो तो बताए देते हैं। देखिए संक्षेप में बात यह है कि इस युग में हम लोग अपने भक्तों से बेहद तंग आ चुके हैं। न दिन में चैन लेने देते हैं न रात में। अब तो लक्ष्मी जी भी दुखी हो गईं हैं। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए? इन भक्तों से छुटकारा कैसे मिले?“

”परंतु आखिर हुआ क्या? आप तो युगों-युगों से भक्तों की नैया पार लगाते आ रहे हैं।“ नारद जी ने फिर कुरेदा।

इस पर भगवान शिव ने गहरी सांस भरते हुए कहा, ”पता नहीं कब, क्यों और किसने भगवान को भक्तों के बस में कर दिया था। पहले तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा पर अब न जाने कैसे भक्त पैदा हो गए हैं... आकर तरह-तरह के काम कराने के लिए हम पर दबाव डालते रहते हैं जो हमें बिल्कुल पसंद नहीं। पर कभी करने पड़ जाते हैं। हमारी आत्मा बड़ी दुखी होती है और हमारी साख भी घटती है... क्या बताएं दुविधा में पड़ जाते हैं। काम करो तो अपयश मिलता है और न करो तो भक्त बुरा मानते हैं।“

”भगवन् ! आप तो पहेलियां सी बुझा रहे हैं। कुछ स्पष्ट बताइए ना। देखिए इस युग में लोग तो आपका इतना आदर-सम्मान करने लगे हैं। जगह-जगह जहां जगह मिल पाती है लोग भव्य मंदिर खड़ा कर देते हैं। आपकी मूर्तियों में मानों जान डाल देते हैं, उनको सचल बना देते हैं... लाखों करोड़ों के चढ़ावे चढ़ रहे हैं। आप तो महादेव हैं अरे छोटे-मोटे देवताओं तक के मंदिरों में अपार, अभूतपूर्व भीड़ें हो रहीं हैं। सारा देश ईशमय हो रहा है। किंचित विचार तो कीजिए... आपका गुणगान करने, आपकी लीला बखान करने वाले प्रवचनों में कैसी बड़ी संख्या में लोग टूटते हैं... सब आपकी लीला है... अपरंपार है आपकी महिमा प्रभु...।“

”बस भी करो नारद! कोरा स्वार्थ है।“ भगवान शिव किंचित क्रोधित होकर बोले, ”आकंठ पाप में डूबे हैं, प्रवचन करने वाले और सुनने वाले दोनों ही।“

”पर प्रभु हुआ क्या?“ नारद जी ने अपनी चिरपरिचित स्थाई मुस्कान के साथ पूछा।

”अरे हुआ क्या पूछते हो? कभी-कभार की बात हो तो टाल भी जाएं। अब तो यह रोज का सिर दर्द हो गया है...“। थोड़ा सोच कर फिर बोले, ”बहुत दिनों से एक व्यक्ति पीछे पड़ा है। पुराना भक्त है। बचपन से ही हमारी सेवा कर रहा है। घर में हमारा विशाल मंदिर बनवाया है। उसमें हम सभी देवताओं की भव्य प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित किया, और मानों कि हम पर पूरा भरोसा न हो उसने अनेक नए देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लगा दी हैं। पहले ये सब हमारे निष्छल भक्त होते थे...अब उनकी भी पूजा करता है...

'' तो आपको ईष्या क्यों हो रही है,भगवन!,'' नारद जी ने फिर निशाना साधा।

''अरे बात यह नहीं है। बात यह हैं कि कुछ महीने पहले उसने पहले बिजनेस में अपने एक प्रतिद्वंदी की सरे आम हत्या कर दी और जेल पंहुच गया। अपने वकील के जरिए पुलिस और निचली अदालत में रिश्वत देकर जमानत पर बाहर आ गया। तब से मेरे पीछे पड़ा है। दिनरात मंदिर में पड़ा रहता है,कहता है कि नीचे तो मैने सबको पटा रखा है पर मेरा वकील कहता है कि इसके आगे वे कुछ नहीं कर सकते, बस भगवान ही बचा सकते हैं। गवाहों को वे ही तोड़ सकते हैं और उपर की अदालत का दिमाग को वे अर्थात आप ही पलट सकतें हैं। वह मामले से बरी होकर चुनाव लड़ना और मंत्री बनना चाहता है......भक्त पक्का है । बताओ क्या करूं ? आखिर मेरी भी तो रिपुटेशन है। इसके मैं पहले भी सही गलत काम करा चुका हू्ं कि वे इसके बिज़नेस से जुड़े थे। पर यह तो धोर पाप है......वो भी सबके सामने दिन दहाड़े! अब उसने भगवती जागरण बिठा दिया है कि यदि मैं नहीं करूंगा तो अपना काम वह पार्वती से करा लेगा..अजब दुविधा में हूं...अब तो मैं भक्तों से ही पीछा छुटाना चाहता हूं .... ''

''अरे आप मना कर दीजिए! सिंपल। निर्णय तो लेने ही पड़ते है,'' अपनी वीणा के तार टनटनाते हुए नारद जी बोले।

''अरे एक मामला हो तब ना!यहां तो अब लाइन लगी है। पहले तो दो चार पापी भक्त होते थे। क्षमा करके वैतरणी पार करा देते थे। अनंत काल तक स्वर्ग में पड़े रहते थे किसी को कोई हानि पहंचाए बिना। हमें भी परेशानी नहीं होती थी। पर इनका क्या करें। इनको न तो मोक्ष चाहिए और न स्वर्ग। ये तो पृथ्वी पर ही भोगविलास करते अजर अमर बने रहना चाहते है। अब मेरी उलझन देखो! मेरे अनन्य भक्तों में एक डाक्टर है। अभी कुछ समय पहले तक वह नामी डाक्टर था अब वह उतना ही बदनाम है। फुसला धमका कर वह गरीब लोगों की किडनी चुरा कर अमीरों को बेच देता था। करोड़ो अरबों कमाए। अपने दुनिया भर में बने घरों और तथाकथित अस्पतालों में शानदार मंदिर बनवाए, धर्मार्थ संस्थांए स्थापित कीं। साधु संतों का आना जाना बना रहता था। पर होनी को कौन कब तक टाल सकता है। पकड़ा गया। अब जेल में पड़ा है साल भर से। वहां कोई काम धंधा तो है नहीं, दिन भर पूजा पाठ करता रहता है। दूसरे देवी देवताओं से सिफारिश भी कराता रहता है। जेल में मौज मस्ती का प्रबंध तो हनमानजी ने करा दिया था,जेलर भी हनुमान जी का भक्त है। अब वह मेरे पीछे पड़ा है कि मैं कैसे ही उसे बरी करा दूं। उसकी पहली पतिव्रता पत्नी देश भर के मंदिरों मोटा चढ़ावा चढ़ाती फिरती है। मेरे दूसरे असरदार भक्तों से संपर्क कर दबाव बना रही है.....मैं तो बहुत दुखी हो गया हूं इन भक्तों से.... ''

''नारायण नारायण,''नारद जी ने किंचित व्यंग्य भाव से कहा, ''पर भगवन आप भी तो इन भक्तों का माल उड़ाते रहते हैं। छप्पन प्रकार के भोग, सोने चांदी के मुकुट, सिंहासन सहर्ष स्वीकार करते रहते है। यह कभी सोचते विचारते भी नहीं कि यह अकूत संपदा कहां से आती हैं इनके पास। जब पाप का माल डकारोगे तो सिफारिशें तो करनी पड़ेंगी।''

कह कर अपनी वीणा के तार टनटना कर नारद जी नारायण नारायण कहते हुए वहां से विदा हो गए।

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नरेंद्र तोमर

कहानी

कल्पतरु

चंद्रकांता 

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उफ्फ़! कितनी गहरी पीड़ा है यह मानों तालाब के पार्श्व पर पानी और उसके भीतर मछली तड़प रही हो. तुम्हें कैसे समझाऊं सुवास !तुम्हारे होते हुए भी एकाकीपन का यह बोध ह्रदय की भीत पर हर रोज़ उठा-पटक करता है. तुम ही कहो! तब, तुम्हारे होने का क्या औचित्य है ?

यह संदिग्धता वश किया गया कोई आक्षेप नहीं है; बल्कि हमारे इस संबंध से साधिकार किया गया बेहद स्वाभाविक सा प्रश्न है ताकि हमारे भविष्य पर कोई प्रश्न-चिह्न ना रहे.. और ये मौन को पालना कहाँ से सीख लिया तुमने !यह तो तुम्हारा स्वभाव नहीं था !.जानते हो, तुम्हारा यह अपरिचित मौन रात-दिवस अट्टहास सा करता आता है जिसके अनचाहे आलिंगन से मैं बिंध कर रह जाती हूँ ..और तुम्हें भी तो भीतर ही भीतर तोड़-मरोड़ रहा है यह.. आखिर ऐसा क्या जो तुम मुझसे साझा नहीं कर सकते ?

जिस दिन भावनाओं के उफान से इस मौन का बाँध टूटेगा तुममें भी, तुम बाकी ना रहोगे. प्लीज़ चुप मत रहो! अब तो परिभाषित करो इस मौन को. सुनो! अब यह घाव बनकर रिसने लगा है.. पल्लव ने उस मौन की कठोर दीवारों को अपने जवाब दे चुके धैर्य से आच्छादित करते हुए कहा.

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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कॉलेज के दिनों से ही साथ थे पल्लव और सुवास. दिल्ली यूनिवर्सिटी में इन दोनों का प्रेम हमेशा चर्चित रहा. आज प्रणय के सात वसंतों बाद भी उनके सम्बन्ध में वही ताज़गी और वही आकर्षण था जो उस वक़्त हुआ करता था .संघर्ष के तोड़ देने वाले दिनों में भी उनके विश्वास और समर्पण की दीपशिखा प्रज्ज्वलित रही. प्रणय निवेदन की तो कभी जरुरत ही ना हुई मन की भाषा से ही सब लिखा पढ़ी हो गयी थी दोनों के बीच.

सुवास एक बेहद सुलझा हुआ पुरुष था. गंभीर व्यक्तित्व किन्तु लड़कपन की छुअन जिसमें अभी तलक बाकी थी. मेल ईगो जैसे कुंठित सूत्रों से अनभिज्ञ सुवास किसी भी स्त्री की अभिलाषा हो सकता था.

मैं तुम्हें खुश रखना चाहता हूँ पल्लव ..तुम भी जानती हो..जानती हो ना! एक अजीब सी छट-पटा-हट से टकराते सुवास ने पल्लव से कहा. शब्दों का माप-तौल तो नहीं जानता लेकिन, तुम मेरे जीवन का आधार हो..मेरी प्रतीक्षा, मेरी प्रेरणा हो ..हाँ, सही कहा तुमने - मुझमें, मैं भी बाकी ना रहूँगा.

लेकिन, तुम्हारे मेरे जीवन में नहीं रहने पर यह जीवन एक विवशता बनकर रह जाएगा. तुम्हारे बिना मर तो नहीं जाऊँगा क्यूंकि, दायित्वों का अधिभार इतना है कि, मरने को भी स्वतंत्र नहीं हूँ. ..मैं तो स्थितियों के अधीन रंगशाला की कठपुतली बनकर रह गया रह गया हूँ. जिसे स्टेज पर अभिनय तो करना होता है किन्तु, संवाद में जिसकी कहीं कोई भूमिका नहीं. और हिलती-डुलती भी है तो है स्वेच्छा से नहीं परवशता से...

पल्लव ठीक से कुछ समझ नहीं पायी कि आखिर सुवास क्या कहना चाह रहा है. मन ही मन वह उन टूटे सूत्रों को जोड़ने लगी और सुवास से कहा –

‘ और मैं तुम्हारे जीवन में क्यूँ नहीं रहूंगी? आगे कहो सुवास, रुको नहीं कहते रहो..तुमहें भीतर ही भीतर घुटता देख बहुत दुःख होता है. मेरी चिंता नहीं करो आज अपने मन का समस्त भार मेरी पलकों पर उतार दो..’

पल्लव बहुत प्रयास किये लेकिन अंततः मेरा ट्रांसफर आगरा हो गया है अब वहीँ लेक्चररशिप करनी होगी और इधर माँ ने जिद पकड़ ली है कि बहन के लिए अपना कर्तव्य पूरा करो. पहले उसका ब्याह करो. और उन्होंने यह भी कहा कि 'मुझे तुम्हारा पल्लव से मिलना जुलना पसंद नहीं. घरेलू लड़कियों जैसी तो कहीं से नहीं दिखती वह..कपड़े पहनने का शहूर नहीं..कभी दुपट्टा लेते नहीं देखा उसे ..कल को बहू बनकर इस घर में आ गयी तो कहे देती हूँ एक गिलास पानी के भी मोहताज़ हो जायेंगे हम. दो क्लास पढ़-लिख क्या ली खुद को इंदिरा गांधी समझती है. न्याय दिलाती फिरती है लोगों को.

अरे! कल को कोई ऊँच-नीच हो गयी तो कौन जिम्मेदार होगा इसके लिए. खैर! मैं कौन होती हूँ तुम दोनों के बीच बोलने वाली. तुम्हारे बाबूजी चले गए एक दिन मैं भी चली जाउंगी इसी तरह. बस अपनी बहन के हाथ पीले कर दो फिर जो जी में आये करना'. .

इतना कहकर सुवास चुप हो गया और परिस्थितियों के समक्ष एक बेबस याचक की तरह पल्लव को निहारने लगा. पल्लव का सांवला रंग-रूप, किसी शिल्पकार की कूची से गढ़ी हुई उसकी गहरी काली मिटटी जैसी आँखें, बाहर परिवेश में आषाढ़ की दस्तक, घुमड़ते-बलखाते बादलों का शोर और उन्मादी बूंदों की खनक यह सब उसे और अधिक आकर्षक बना रहा था.

कभी तितली की तरह मचलती और चिरैया की तरह चहचहाती, गुड़िया सी दिखने वाली पल्लव अपना उत्तर पाकर भी एकदम शांत थी. जैसे बहुत लंबा सफ़र तय कर आई अल्हड़ हवा किसी तंग परबत पर आकर ठहर गयी हो.

कुछ क्षणों के लिए पल्लव भी मौन हो गयी. फिर ना मालूम क्या सोचकर बोली-

‘सुवास तुमने तेज़ बारिश के बाद आँगन में फर्श पर बाकी रह गए पानी को देखा है कभी ! उसमें आस-पास की जड़ता का जीवंत अक्स दिखाई देता है लेकिन जैसे-जैसे वह पानी सूखता जाता है कुछ देर पहले उसके भीतर दिखाई पड़ने वाला वह अक्स धुंधला होता जाता है और एक वक़्त बाद वहां कुछ भी शेष नहीं रहता. ठीक ऐसे ही हमारा मन-मस्तिष्क भी खूबसूरत रोमानी कल्पनाओं के सरोवर में मनचाही डुबकी लगाता है ..भीगता है.. और बीच-बीच में हवा का स्पर्श पाने से जब गीली देह सूखने लगती है तो शरीर कमल की पंखुड़ियों की तरह सिकुड्ने लगता है और कुछ क्षणों पश्चात वापिस अपनी चिर-नियत गति पा लेता है.’

हमारी तुम्हारी यह चाहना भी कुछ ऐसी ही है. जिसमें हमारे अभिसार के अमिट पलछिन हैं, कल्पनाओं की वह खूबसूरत मासूम दुनिया है जहाँ केवल हम-तुम हैं सोसायटी की कड़वी हकीक़त और उसके घुन चुके रिवाजों से सामना करने वाला वह आत्मविश्वास भी है जो हमें एक साथ रहने का आधार देता है .सुवास जीवन का आरोह-अवरोह कितना ही विचलित कर देने वाला क्यूँ न हो मैं तुम्हारे हर निर्णय में तुम्हारे साथ हूँ.. और साथ नहीं रह पाने से हमारा एक दूसरे के लिए प्रेम कम नहीं हो जाएगा.

सुवास हम तुम आपस में गुंथे हैं जैसे शब्द में भाव गुंथा होता है.

बीहड़ में खो जाने के डर से तुम्हारा खूबसूरत साथ छोड़ दूँगी यह ख़याल भी मन में नहीं लाना. मेरे लिए प्रेम सुविधा का नहीं समर्पण का नाम है.

अपनी धमनियों की आहट से अपरिचित सुवास एकाग्रचित हो पल्लव की हर एक बात उसके कहे एक-एक शब्द को ध्यान से सुन रहा था चेहरे पर कहीं कोई शिकन नहीं थी ..कोई प्रश्न नहीं था..मानो सांझ अपने सुरमई पंखों को क्षितिज पर फैलाकर धीरे-धीरे सागर की गोद में उतर रही हो और सागर उसके इस शिवत्व पूर्ण सौन्दर्य से अभिभूत होकर जड़वत रह गया हो.

...अनायास ही उसकी समाधि भंग हुई ..तेज़ हवा के झोंकों से खिड़कियाँ आपस में बज रही थीं हवा अपनी पूरी शक्ति से पर्दों के पीछे की तरफ धकेल रही थी..उसने देखा कि पल्लव उसके पास ही जमीन पर आकर बैठ गयी है..और बेहद इत्मीनान से उसने अपने दोनों हाथों को उसकी गोद में रखा हुआ है. जैसे कोई थक चुका पथिक किसी कल्पतरु का आश्रय पाना चाहता हो .सुवास ने भी पल्लव के हाथ थाम लिए और अपलक देखता रहा उसकी और.. मानों अपनी समस्त वेदना उन हाथों में उतार देना चाहता हो ..

शायद बहुत कुछ कहना चाहता था अपनी पल्लव से; उसे बताना चाहता था की समाज उनके बीच कहीं नहीं है लेकिन उसे कुछ वक़्त चाहिए उन सपनों को पूरा करने के लिए जो उन्होंने साथ बुने हैं.

एक और पहर बीत गया उन दोनों को इसी तरह बैठे हुए. अचानक पल्लव की देह में हरकत हुई और किसी पराजित वीरांगना की तरह उसने कहा..

‘चलती हूँ सुवास. तुम्हारे मौन पर तुम्हारा स्वत्व, मुझे संवाद की ये आड़ी-तिरछी शिलाएं लांघने की इजाजत नहीं देता. तुम्हें समझती हूँ, तुममें खुद को जीती रही हूँ अब तक ..और कुछ कहने की जरुरत नहीं लेकिन एक निवेदन है तुमसे अपनी इस विवशता के लिए कभी खुद को कटघरे में मत रखना. जानते हो! प्रेम की सार्थकता एक साथ रहने से कहीं अधिक उसे निभाने में है..

कभी वक़्त के नियत पृष्ठों के उस पार मिलना तुम्हें तुम्हारे हिस्से की गुनगुनी धूप लौटानी है.. और पल्लव ने सुवास की भीगी पलकों पर अपनी नरम गुलाबी अधखुली पंखुड़ियों को स्पर्श करते हुए कहा तुम्हारे साथ थी..साथ रहूंगी. .लेकिन अभी जाने की इजाजत दो..भोर होने ही वाली है ..’

. . . . . .

लेखिका का नाम:चंद्रकांता
परिचय:स्वतंत्र लेखक,चित्रकार,सोशल एक्टिविस्ट
पता:आर.के.पुरम दिल्ली.
ई मेल :chandrakanta.80@gmail.com

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कहानी
उसके लायक
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
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ह जिस दिन पहली बार कक्षा में आई थी ,उस दिन तो सबने ऐसा मुँह बना लिया था जैसे धोखे से कड़वी ककड़ी चबा गए हों .....

दो माह पहले मैं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में कचनार के पेड़ के नीचे बैठा  अनायास ही पन्द्रह साल पहले के उन दिनों को याद करने लगा था जब मैं आठवीं कक्षा पास कर आगे की पढ़ाई के लिये बुआ के पास सुजानगढ़ में रहा था। 

कस्बा कम देहात ज्यादा लगने वाला सुजानगढ़ मुख्य सड़क से दूर एक पहाड़ी कस्बा है। गढ़ के नाम पर एक छोटा सा किला है जहाँ कभी राजा रहते थे। कभी उनका ही राज चलता था पर अब वहां स्कूल ,बैंक और डिस्पेंसरी चलती है। पहाड़ी के नीचे एक छोटी सी नदी बहती है। इन पन्द्रह सालों में वहाँ इतना अन्तर आया है कि गोपू हलवाई की दुकान बीच बाजार से हट कर बस-स्टैंड पर आ गई है और उसके पेड़ों में अब वह बात नहीं जो कभी सुजानगढ़ की पहचान थी। नदी में पानी की जगह बच्चे खेलते हैं और लड़कियाँ जो दुपट्टा को कन्धों पर पैला कर और गर्दन को कन्धों के समानान्तर रख कर बहुत जरूरी होने पर ही सड़क पर निकलतीं थीं वे निस्संकोच खूब हँसती-बतियाती हुई स्कूल जातीं हैं और हर तरह के बिल भरने तक का काम करतीं हैं। जो बात आज भी वहाँ के लोगों में देखी जाती है वह है लोगों की बेफिक्री व मौजमस्ती। कहो तो ताश खेलते-हँसते पूरा दिन गुजार दें और कहो तो जरा सी बात पर विधानसभा में हंगामा खड़ा कर दें। खैर यह सब मेरी कहानी का हिस्सा बिल्कुल नहीं है। मेरी कहानी सोलह-सत्रह साल पहले के केवल अपने स्कूल पर केन्द्रित है। स्कूल में भी  हमारी कक्षा और कक्षा में भी उस एकमात्र लड़की पर केन्द्रित है जो मेरे साथ स्कूल में पढ़ी थी हालाँकि नियमित रूप से एक-डेढ़ साल ही कक्षा में आई थी। बाकी डेढ़ साल उसने कैसे पढ़ाई की। और परीक्षा-परिणाम क्या रहा ,मुझे नहीं मालूम था। 

पहले यह बता दूँ कि जी.पी. कॅालेज के प्रांगण में मैं इस तरह अतीत की गलियों में गुजरने के लिये नहीं बैठा था। वहाँ मैं एक प्रतियोगी परीक्षा के लिये आया था और मेरे लिये एक-एक पल महत्त्वपूर्ण था। बस नौ बजे ही मुरैना पहुँच गई थी और परीक्षा प्रारंभ होने में अभी एक डेढ़ घंटा था। तब तक यही बेहतर था कि इधर-उधर भटककर समय गुजारने की बजाय याद किये हुए को दोहरा लूँ।

सच पूछा जाए तो परीक्षा से ठीक पहले कुछ पढ़ना या याद करना तेज चलती ट्रेन के डिब्बे गिनने जैसी कोशिश करना है। कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता। लेकिन जब तक कोई हाथ से किताब छीन कर न रख दे छोड़ने का मन भी तो नहीं होता। लगता है कि कुछ और समय मिल जाए तो पूरी तैयारी हो ही जाएगी। जैसे कि उन पलों की तैयारी पर ही सारी सफलता टिकी होती है। जो भी हो वह परीक्षा मेरे कैरियर की दिशा में बड़ी महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अन्तिम परीक्षा भी थी। कुछ ही महीनों बाद मैं ओवरएज जो होने वाला था। और आपको आज यह बात बड़ी खुशी के साथ बता रहा हूँ कि अब मैं उस परीक्षा में सफल भी हो चुका हूँ। आज ही परिणाम की सूचना मिली है और इस सफलता के बाद तो और भी जरूरी है कि मैं आपको वह सब बताऊँ जो कहीं न कहीं इस परीक्षा से जुड़ा है। क्योंकि परीक्षा के दौरान जो कुछ हुआ उसके तार मेरे स्कूली जीवन से भी जुड़े है।

जीवन की कई घटनाएं अप्रत्यक्ष रूप से आपस में जुड़ी होतीं हैं। समय आने पर उनके जुड़े होने का अहसास हमें रोमांचित करता है।

हाँ तो मैं बता रहा था कि मैं कालेज के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे अकेला ही बैठा था और गाइड खोल कर कुछ और भी पढ़ने--समझने की कोशिश कर रहा था कि एक महिला  वहाँ से गुजरी। जाने क्यों उसे देख कर अपनी क्लासमेट सरिता याद आ गई। मैं अनायास ही स्मृतियों की उन गलियों में पहुँच गया जहाँ उम्र के वसन्त में हर टहनी पर कलियाँ फूट निकलने को आतुर होतीं हैं। सूरज क्षितिज की बाँहों से छूट कर पूरे आसमान में फैल जाने को उत्साहित रहता है।
 
मिडिल स्कूल के छोटे से दायरे से निकल कर बड़े स्कूल में पहुँचना मेरे लिये काफी रोमांचक था। नए दोस्त ,नया माहौल ,नए शिक्षक और उम्र के नए अहसास...। अभी पढ़ाई विधिवत् शुरु नहीं हुई थी। केवल प्रेजेन्ट लेने हिन्दी वाले सर आते थे और नागरिकशास्त्र वाले सर संविधान की कुछ चलताऊ कहानियाँ सुना कर चले जाते थे। बाकी समय में हम लोग या तो चुटकुले सुनाते रहते या स्कूल से भागने की योजना पर अमल करने की सोचते रहते थे तभी एक दिन एक सहपाठी घनश्याम ने एक सूचना दी ----"अरे भाइयो सुनो-सुनो ,ध्यान लगा कर सुनो। अभी-अभी पता चला है कि हमारे क्लास में एक लड़की भी आने वाली है। उसके पिताजी आज ही उसका फार्म व फीस जमा करने आए हैं।"

उन दिनों किसी लड़की का पढ़ने जाना और वह भी लड़कों के स्कूल में एक ब्रेकिंग न्यूज जैसा था
उस सूचना पर हम सब ऐसे केन्द्रित होगए थे जैसे बरसाती रात में जलते बल्ब के आसपास कीड़े-मकोड़े जमा होजाते हैं।

घनश्याम हमारे क्लास का मसखरा था। मस्त व बेफिक्र। बात बात पर चुटकुले सुनाना ,गीत गा गाकर कमर-कूल्हे मटकाना और मिमिक्री करना--ये सारी खूबियाँ उसे खूब लोकप्रिय बनातीं थी। दूसरे स्थानों पर हो न हो लेकिन सुजानगढ़ के स्कूल में लड़की के पढ़ने आने की बात सचमुच एक खास घटना थी। सुदूर अंचलों में किसी बिसाती के पहुँचने जैसी। पूरे इलाके में एक ही हायर सेकेन्डरी स्कूल था। लड़कियों के लिये भी वही एक स्कूल होने के बावजूद लड़कियाँ वहाँ कम ही पढ़ने आतीं थीं। तब देहात में तो लड़कियों को कोई पढ़ाता ही नहीं था। पर सुजानगढ़ के पढे-लिखे अच्छे घरों की लड़कियाँ भी नाम लिखाने के बाद सीधी परीक्षाओं में ही दिखतीं थी। बात यह थी कि सुजानगढ़ का स्कूल हुल्लड़बाजी के लिये जिलेभर में जाना जाता था। वहाँ आकर बाहर गाँवों के सीधे लड़कों के भी मानो सींग निकल आते थे।

क्या बात कर रहा है तू। जगदीश एकदम उछल पड़ा। उस सूचना ने लगभग सभी को जिज्ञासा से भर दिया था।
"अरे घनश्याम जी बड़ी मीठी सी खबर लाए हो। जरा हमें तो बताओ कि लड़की कौन है कैसी है ?"-मुंशी ने शरारती अन्दाज में पूछा।

"बड़ी जल्दी में हो--- सुरेश मुस्कराया----अरे यार लड़की है तो अच्छी ही होगी" ।
मुंशी ,जगदीश ,ओम, सुरेश वगैरा दो-दो साल के फेलुअर थे। उनका काम नए लड़कों पर रौब चलाना ,शरारतें करना और लड़कियों पर फब्तियाँ कसना था। रात-रात में जंगल से लकडियाँ काट बेच कर सुबह तक सुजानगढ़ लौट आते थे। मैं कक्षा में सबसे छोटा था। अपेक्षाकृत होशियार और स्मार्ट भी माना जाता था। इस कारण वे सब मुझे प्रिंस कहते थे। और इसी बहाने अपने छूटे हुए काम मुझसे करवा लेते थे। घनश्याम की बात सुनने के बाद से सब यही सोच रहे थे कि कक्षा में लड़की रहेगी तो रौनक तो रहेगी ही। यही नहीं बैठने की जगह ,उसकी मदद और उसके साथ जोड़ी भी बनाने की योजनाएं विधिवत् बना ली गई थीं। जोड़ी बनाने की बात पर खूब खींचतान हुई। मुंशी उस पर अपना दावा करता और जगदीश अपना। सुरेश ने मेरा भी नाम उसके साथ जोड़ दिया। मुझे ऐसा सोचना काफी अच्छा भी लगा था। अच्छा और नया।

लेकिन पहली बार जब वह कक्षा में आई ,उसे देख कर पहले तो यही हुआ कि सबकी हालत फूँक मार कर बुझाई हुई बत्ती जैसी होगई। जो सामने था वह कल्पना से एकदम उल्टा था। एकदम अनगढ़ पत्थर सी वह लड़की तो लड़की नाम को भी लजा रही थी। न रंग की न रूप की। किसी भी कोण से आकर्षक नहीं। ऊपर से खींच कर बाँधी गईं चोटियों के कारण आँखें खिंची--खिंची सी होगईं थीं। चेहरे पर चमकता तेल पुरानी फ्राक प्लास्टिक की जूतियाँ और कन्धे में टँगा हुआ हाथ का सिला थैला उसकी फूहड़ता को दर्शा रहे थे। उसे देख कर हमारी आशा व जिज्ञासा दोनों ही मन से निकल गईँ। टायर से जैसे हवा निकल जाती है। वह चार-पाँच कि.मी. दूर देहात से पैदल चल कर आती थी। कभी--कभी साइकिल से भी आती थी। उसकी साइकिल काफी पुरानी व जंग खाई थी। उसके हिसाब से काफी ऊँची भी थी। शायद उसके पिता की होगी। उसके पाँव पैडलों तक ठीक से नहीं पहुँचते थे। पूरा पैडल घुमाने के लिये उसे लगभग आठ-आठ इंच आजू-बाजू झुकना पड़ता था।

उसके पिता प्राइमरी स्कूल के मास्टर हैं। सो इतना जरूर समझते होंगे कि भगवान ने अगर रंगरूप देने में कमी कर दी है तो उसे पढ़ा-लिखा कर पूरी किया जा सकता है। तभी तो अकेली लड़की को इस तरह पढ़ने भेज दिया है।----सुरेश ने बताया। उसकी पूरी पत्रिका उन लोगों के पास आ चुकी थी 
और सीधा हमारे सिर पर ठीकरा फोड़ दिया है।

"यार घनश्याम यह क्या जलेबियों की जगह रूखी रोटियाँ ले आया वह भी बाजरे की।-"-जैसे ही वह पहली बार कक्षा में आई थी मुंशी रोने का अभिनय करके बोला। निराशा जब सीमा पार होजाती है तब व्यंग्य व प्रतिशोध जन्म लेता है।

सुरेश ने पुचकारा--"-वत्स चिन्तित न हो। इसके लिये हमारा सुरेन्द्र है न। एकदम फिट। राम मिलाई जोड़ी एक अंधा एक कोढ़ी।"
सब लड़के हँसने लगे। लड़की चकित सी सबकी ओर देखने लगी। 

सुरेन्द्र हमारी कक्षा का सबसे कुरूप लड़का था। गहरा स्याह रंग ,पीले कंचे जैसी आँखें और नाक आँखों के बीच पूरी तरह गायब रह कर सीधी होठों के ऊपर निकली थी। डेल्टा के आकार में। उसके घर में आटा माँगने का काम होता था इसलिये मुंशी उसे चुकट्या कहता था जिसका वह उतना बुरा नहीं मानता था जितना उसे उस लड़की के साथ जुड़ने की बात सुन कर लगा। तिलमिला कर बोला---
अच्छा , तो तुम लोगों ने मुझे बस उसके लायक ही समझा है और खुद को सलमान खान समझते हो। कि तुम्हारे लिये कोई माधुरी दीक्षित आएगी ..।

वह वह सहमी सी चुपचाप एक तरफ बैठ गई। उसके बगल वाले लड़के इधर-उधर भागने लगे तो हँसी का एक फव्वारा फूट कर बह चला। और कक्षा में इस तरह स्वागत हुआ उस लड़की सरिता का। 

सरिता...हाँ यही नाम था उसका। पर लड़के उसे सरीता कहते थे। फिर सरीता से सरौंता भी होगया। हाँ मैंने जरूर आज से पहले उसे उसके नाम से कभी नहीं पुकारा। मुझे लगता है कि नाम लेने का आधार अच्छी जान-पहचान व अपनापन होता है। नहीं होता तो बनने लगता है। मेरे साथ न तो पहली स्थिति थी न ही दूसरी बनने वाली थी। मेरे लिये तो वह मात्र एक 'परसन' थी। एक लड़की। बस और कुछ नहीं। उसके लिये अगर कोई भाव था तो वह था उसके समग्र व्यक्तित्त्व से वितृष्णा का। कुछ--कुछ हेयता का भी। यह भाव दो कारणों से था। एक तो यही कि वह लड़की होकर भी लड़कों के स्कूल में पढ़ने आ गई थी। लड़की का लड़कों के साथ बैठ कर पढ़ना यानी लड़कों बदतमीजी करने तथा उसके बदनाम होने के पूरे सौ परसेंट चान्स। दूसरे उसकी बोलचाल व बर्ताव बड़ा ही उजड्ड व गँवारू सा था।

स्कूल में एक-दो लड़कियाँ और भी थीं पर वे थीं काफी सम्पन्न घराने की और सलीके वालीं लड़कियाँ । उनके घरों में न केवल एक-दो लोग अच्छी नौकरियों पर थे और अंग्रेजी बोल सकते थे बल्कि थाने से लेकर मंत्रालय तक उनकी पहुँच थी। उनके विषय में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का साहस भी नहीं था किसी में। उनमें एक लड़की बहुत खूबसूरत भी थी। मुंशी वगैरा उसे दबी जुबान से आपस में ही मृगनयनी कहा करते थे। वे लड़कियाँ जब भी स्कूल आतीं ,सरिता को ऐसे देखतीं थीं जैसे किसी शानदार मॅाल में कोई ठेठ अनपढ़ देहाती घुस आया हो। वह  एकदम फूहड़ किस्म की देहातिन लगती भी थी। उसके बालों व फ्राक की जेबों में घास के तिनके या कुट्टी के टुकड़े मिलते थे। शायद घर में भैंस-गाय होंगी। उसके होंठ खुले रहते थे। और कभी-कभी नाक भी भरी हुई रहती थी। कपड़े भी एक ही जोड़ थे क्योंकि कई बार उसका पाजामा अधसूखा होता था
अनगढ़ पत्थर सी वह छोटी और नासमझ लड़की हमारे किसी काम की नहीं थी। दादी के शब्दों में कहूँ तो --बिल्ली का गू। न लीपने का न थापने का। जोड़ी बनाने की बात पर सबने एक दूसरे को जलती आखों से देखा।
वह या तो बिल्कुल ही नासमझ थी या फिर नासमझी का दिखावा करती थी हालाँकि दिखावा करने लायक अक्ल उसमें लगती नहीं थी। क्योंकि वह हमारी उपेक्षा से अनजान कई तरह के सवाल करने में नहीं हिचकिचाती थी जैसे कि चार बजे यहाँ से कौनसी बस जाती है। कि अँग्रेजी में सर ने कितना पढ़ा दिया है। या कि एक दिन के लिये अपनी कापी दे दो भैया ..।

अरे यार क्या मजाक है यह तो बहन-भाई का रिश्ता जोड़ने लगी --मुंशी रुआँसी मुद्रा में कहता। सुरेश हँसता--अच्छा है न। दूसरे रिश्ते लायक वह है भी नहीं।

 यही नहीं जगदीश ,मुंशी और दूसरे लड़के अक्सर उसे सुनाने के लिये बहुत ही फालतू से कमेंन्ट्स करते रहते थे। जैसे कि यार सुरेश पेड़ में ढंग से पानी नहीं दिया होगा वरना इसमें भी फूल--फल तो आ ही जाते। एक तो गिलोय ऊपर से नीम चढ़ी यार कैसे पीसें और पियें। यही नहीं वह आकर जहाँ भी बैठती कोई न कोई अपनी किताबें रख देता वह खड़ी रहती। शिक्षक जब क्लास में आते तो चुपके से जगह खाली कर देते। यह सब वह चुपचाप देखती रहती पर किसी से कोई शिकायत करना ही नहीं जानती थी। उसे अपने होने का कोई भान ही नहीं था जैसे। एक दिन तो गजब ही हो गया---

मुंशी लड़की की ओर इशारा कर जगदीश से कह रहा था---"ए टेक माइ पेन्....।"
जगदीश को पूरा यकीन था कि मुंशी इसके आगे भी कुछ अक्षर जोड़ना चाहता था सो ढिठाई से हँसता हुआ बोला---"मुझे नहीं चाहिये। मेरे पास तो अपना है उसे दे दे जिसको जरूरत हो। जगदीश का इशारा भी लड़की की तरफ था।"
"चल हट मेरी चीज ऐसे-वैसे लोगों के लिये नहीं है ..।"
सुन कर सब हँस पड़े। वह लड़की भी हँस पड़ी। जगदीश बोला---"यह तो सचमुच निरी बेवकूफ है।
अभी बच्ची है।"--सुरेश ने भी दया दिखाई।

कक्षा में उसके होने न होने का कोई अर्थ नहीं था। और पूरे साल वह इस तरह कक्षा में बनी रही जिस तरह किसी के बाजू वाले फ्लैट में कोई सालों साल रह जाता है पर न कोई विवाद और नहीं कोई संवाद।  
लेकिन आगे के दो सालों में संवाद जरूरी लगने लगे और जब उसमें व्यवधान आए तो विवाद हुए और उसमें हमारी प्रतिपक्षी होने के लक्षण उसमें जल्दी ही दिखने लगे। फिर एक बार तो ऐसा हुआ कि लड़की को स्कूल छोड़ना ही पड़ा।

हुआ यह कि जब उस लड़की में उम्र के साथ चेहरे में कुछ लोच और आकर्षण आ गया तो उसके प्रति लड़कों का नजरिया भी कुछ बदल गया। मुंशी उससे कोई परेशानी होने पर बेझिझक मदद माँगने का आग्रह करता तो जगदीश उससे किसी न किसी अधूरे रहे होमवर्क के बारे में पूछता। तो सुरेश ,जब भी वह कुछ पढ़ती सबको ऊँची आवाज में निर्देश देता--अरे यार डिस्टर्ब मत करो। पढ़ने वालों को पढ़ने दो। लेकिन वह गजब की मट्ठर थी। इन गतिविधियों से बेअसर जैसे भारी वर्षा में कोलतार की सड़क। व्यवहार में नाम का भी लोच नहीं आया। मदद माँगना तो दूर वह एक दूरी सायास बनाए रखती थी तथा सबसे अलग अनजान बनी सी अपनी किताबें पढ़ती रहती थी। हालाँकि मेरी नजर में एक लड़की के लिये यह उचित भी था। मेरा तो यह भी मानना था कि वह इन लोगों की बातों से बचने के लिये ही व्यस्त रहने का दिखावा करती थी। पढ़ाई क्या खाक करती होगी। पर उसका यों कट कर रहने के लिये पढ़ने का बहाना खोजना मुंशी और उसी जैसे दूसरे लड़कों को अपना अपमान लगने लगा। ऐसा कैसे हो सकता था कि एक लड़की उनके होते हुए न केवल पढ़ती रहे। बल्कि उनके कमेंट्स पर भी ध्यान न दे। अकड़ और गरूर तो खूबसूरत लड़कियों को शोभा देता है। उस पर यह भी गजब कि कक्षा में वही सबसे पहले अपना काम पूरा करके शाबासी पाती। सर लोग हम सब लड़कों को सम्बोधित कर कहते सरिता को देखो और सीखो कि जब काम करना ही होता है तो कोई बहाना नहीं चलता। यह लड़की होकर भी गाँव से पढ़ने आती है घर के काम करती है और तुम सबसे अच्छा काम करके दिखाती है।

एक दिन बात बहुत बढ़ गई। हुआ यह कि पीरियड खाली था। मुंशी रजिस्टर से तबला बजा कर कोई भद्दा सा गीत गाने लगा। वह लड़की क्लास से बाहर जाकर आफिस के पास पड़े स्टूल पर बैठ कर पढ़ने लगी। गुप्ता सर ने उसे यही निर्देश दे रखा था। लेकिन हमारी बदकिस्मती से सिंह साहब (प्रिंसिपल) ने यह सब देख लिया। यानी लड़की को कक्षा से बाहर और हमें गाते बजाते। सिंह साहब अपने अनुशासन के लिये जिले भर में जाने जाते थे। बस हम चार-पाँच लड़कों को बुलवाया। शायद वे पहले से कुछ समझ रहे होगे हमारे बारे में वरना नाम लेकर हमें ही क्यों बुलवाते। बुलाकर उन्होंने हमें एक लम्बी नसीहत व चेतावनी दीं कि अगर ऐसी वैसी हरकतें कीं , किसी लड़की को परेशान किया तो ठीक नहीं होगा। कि सारा लफंगापन निकाल देंगे कि स्कूल से रेस्टीकेट कर देंगे आदि..। इस बात से मैं और सुरेन्द्र जैसे ओम के मन में तो जैसे आग ही सुलगा दी। ओमपाल शर्मा तेजपाल शर्मा का बेटा था जो सुजानगढ़ के जाने हुए लोगों में से था और जनपद अध्यक्ष भी। यह जाना-माना-पन केवल धन का ही नहीं तमाम हथकण्डों का भी था जिनके बल पर अपनी सत्ता जमाए था। सत्ता को बनाए रखना सत्ता हासिल करने से कम कठिन नहीं होता।

अब तो यह प्रस्टेज पाइंट बन गया। दो कौड़ी की लड़की के कारण हम अपमानित हो रहे हैं।---मुंशी ने दाँत चबाते हुए कहा--- "परेशान अब तक तो नहीं किया था पर अब करके दिखाएंगे। नदी में रह कर मगर से बैर। अब यह सुजानगढ़ में नहीं पढ़ पाएगी। हमने सोचा था कि चलो गाँव की सीधी-सादी लड़की है ..। पर यह तो हमें ही रास्ता बताने लगी।"
इसके बाद ऊपर से सब शान्त पर भीतर भारी उथल-पुथल। संकल्प। पुरुष को जो सबसे ज्यादा अखरता है वह है स्त्री की अपराजेयता। उसे तोड़ना ही उसके लिये जैसे सबसे जरूरी काम हो जाता है। फिर सचमुच उसके लिये बहुत सारी मुश्किलें पैदा की गईं। कभी उसकी किताबें गायब की जाने लगीं। कभी उसके नाम चिट्ठियाँ ड़ाली जाने लगीं। यही नहीं उसके नाम के साथ दीवारों ,फर्श ,छत और रास्ते में कहीं भी अश्लील बातें लिखी जाने लगीं। पहले तो स्कूल में खूब हलचल मची। सर लोगों को लाख कोशिशों के बाद कोई सबूत हाथ नहीं लगा। क्योंकि राइटिंग किसी से मेल ही नहीं खाती थी। बिना सबूत के तो चोर राजा बराबर ही होता है। धीरे-धीरे पूरे सुजानगढ़ में इसकी चर्चा होने लगी। लड़की जिधर से भी निकलती ,उसे देखते ही हर कोई कहता ---"अरे देखो वो लड़की है जिसका नाम कोई बड़े गन्दे तरीके से लिख जाता है। बाप जी उसे बनाने चले थे पिराम मिनस्टर। हमारी भी तो लड़कियाँ हैं।"

उस लड़की के गाँव के दूसरे लड़के भी पढ़ने आते थे उन्होंने हमें बताया कि थू-थू होरही है सब जगह। गाँव में जहाँ देखो यही कहा जा रहा है कि कितनी मना करी थी कि लड़की को मत पढ़ाओ। जमाना खराब है पर कान्तीलाल को तो धुन सवार हुई कि लड़की को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाना ही है। इस सबका असर यह हुआ कि वह अकेली पड़ गई। स्कूल में तो वह अकेली थी ही पर अब गाँव से भी उसके साथ कोई नहीं आता था। सुनसान रास्तों से अकेली कब तक स्कूल जाती। आखिर लड़की ही तो थी।

और अन्ततः उस लड़की का स्कूल आना बन्द हो ही गया।  मजे की बात यह कि दोषी अपशब्द लिखने वाले को नहीं बल्कि उस लड़की को माना जिसके लिये वह सब लिखा गया। आखिर बदनामी लड़की की ही होती है न। मुंशी ने सिकन्दर की तरह सबको देखा। छाती ठोकी। मुझे लगा कि लड़की ने यह ठीक ही किया। पढ़ लिख कर भी वह कौन सी इन्दिरा गान्धी बन जाती। इतनी बदनामी झेल कर पढ़ना क्या जरूरी है। कम से कम लड़की के लिये तो बिल्कुल नहीं।

मजे की बात यह कि उसके घर से कोई शिकायत करने भी नहीं आया। यह हमारी जीत थी।
"कौन आता ! पिता तो वैसे ही शर्म के मारे गर्दन झुकाए बैठा होगा।"--जगदीश बोला --मेरी दादी कहती थी कि रूप और गुणहीन कन्या का पिता सबसे ज्यादा बेचारा होता है फिर यह तो बदनाम भी होगई थी। हाँ परीक्षा देने के लिये वह जरूर आई थी लेकिन वैसे ही जैसे कोई सुरक्षा के बीच कोई अपराधी लाया जाता है। इसके बाद क्या हुआ। वह पास हुई या फेल ( वैसे फेल होने के चांस ही ज्यादा लग रहे थे।) शादी हुई या नहीं कुछ पता नहीं चला। इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी। हमारे लिये वह गए साल के कैलेण्डर की तारीख भर थी। पर उस साल के गुजर जाने का कही हल्का सा भी मलाल नहीं था ,यह कहना भी मुश्किल था। दूब की जड़ की तरह वह घटना मन की जमीन में कहीं दबी थी तभी तो एक महिला को देख कर एकदम हरियाने लगी थी। हालाँकि यहाँ इतने बड़े कालेज में उसके मिलने की कल्पना मुझे एक बारगी निरर्थक ही लगी।

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परीक्षा प्रारंभ हुई। पेपर देख कर मुझे पहले तो पसीना ही आ गया। उसमें हिन्दी वाला भाग मुझे सबसे ज्यादा मुश्किल लगा। वैसे जितनी भी कठिनाइयाँ हैं वह हिन्दी में ही आतीं हैं। वह भी साहित्य के इतिहास और काव्य सिद्धान्त में। मैं खीज उठा। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि दुष्यन्त कुमार गीतकार हैं या गजलकार कि निराला जी छायावाद के कवि हैं। पर उनकी कविताओं में प्रगतिवाद के स्वर सबसे ज्यादा हैं कि ध्वनि सिद्धान्त का ज्ञान किस काम का है और साधारणीकरण किसका होता है। किस काम के हैं ये सवाल।
अब समझ आ रहा है कि लड़के-लड़कियाँ ऐसे सवालों को छोड़ क्यों तकनीकी शिक्षा में जा रहे हैं।उन्हें हिन्दी आए न आए पर अशिक्षित मजदूर वर्ग में बच्चों की पैदावार की तरह ही उग रहीं कम्पनियाँ उन्हें धड़ाधड़ नियुक्तियाँ दे रही है। मैं सोच रहा था कि क्यों नहीं मैंने भी उस तरफ ध्यान क्यों नहीं दिया। खैर....।

पिछली बार की अपेक्षा इस बार पेपर कुछ ठीक रहा और मैं उम्मीद के साथ लिखने में व्यस्त था कि एक गुलशन ग्रोवर टाइप एक व्यक्ति ने अचानक आकर मेरी कापी उठाली और कड़क कर कहा --"आउट। यही सब बचकानी हरकतें कर रहे हो।" उसे मेरे पास ही पड़ी दो चिटें मिलीं थी और संयोग से मैं वही सब लिख भी रहा था।
"सर वो मेरी नहीं हैं। आप यकीन करें मैंने कुछ नहीं किया।"--मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
ऐसे में कैसी दयनीय हालत हो जाती है। पर वह मुझसे फार्म भरवाने अड़ा ही रहा।
"फार्म भर कर तो मेरा कैरीयर चौपट हो जाएगा सर।"--मैं फिर गिड़गिड़ाया।

यह पहले नहीं सोचा था। वह बोला। वह सचमुच बड़ा ही कठोर अधिकारी था। जरा नहीं पिघला । मैंने असहाय होकर चारों ओर देखा। एक-दो लोग और भी आगए। मन का ज्वाला मुखी ठंडा पड़ चुका था। वरना इतना सुनने के बाद कौन चुप रहता। अपनी बेइज्जती सहने का आदी कहाँ था मैं। पर गरज जो थी। पिताजी व माँ की उम्मीद भरी आँखें मन में ज्वार उठा रही थी। तभी एक पतली मगर मजबूत आवाज आई----"राजीव जी वहाँ मैं देखती हूँ आप इधर आइये...। आपको हिन्दी के विभागाध्यक्ष श्री तोमर साहब याद कर रहे हैं।"

मैं चौंका। यह तो वही महिला थी जो प्रांगण में मेरे सामने से गुजरी थी। जिसे देख कर मुझे सरिता वर्मा का ध्यान आया। अब वह ध्यान और भी निरन्तर हो गया। इसकी तो आवाज भी सरिता जैसी है। कहीं यह वही तो नहीं ...। हाँ वही तो है। एकदम सरिता वर्मा। बाकी कमी उसकी  इस टिप्पणी ने कर दी जो मेरे अतीत को खोल रही थी ----"यह क्या है। आप अपने कैरियर के प्रति आज भी सचेत नहीं हैं ?"

मैं मुश्किल से ही उसे देख पाया। वह काफी सुलझी सँवरीथी। सुरुचिपूर्ण वेश में शालीन भी लग रही थी। यहाँ उसकी ऐसी स्थिति है कि उसकी आवाज पर ही निरीक्षक मेरे नकल प्रकरण को छोड़ कर उसके पीछे चला गया। मेरे लिये यह सब अप्रत्याशित था। और दिल--दिमाग पर पूरी तरह छा जाने वाला भी पर वह समय केवल परीक्षा देने का था। मैं कुछ समय सब कुछ भूलकर उत्तर लिखने लगा। लेकिन उसकी बात अन्त तक दिमाग में गूँजती रही।

परीक्षा देकर जैसे ही मैं बाहर जाने लगा ,एक आदमी ने मुझे पुकारा---"ओ भाई ,आपको वो मैडम बुला रहीं हैं। छह नं. वाले रूम में।"
उसी आदमी से मुझे पता चला कि सरिता यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर है। उसके पति भी इसी कालेज में ही हैं। वाह सरिता वर्मा कैसी हार उपहार में दी है तुमने। मुझे याद आया कि लड़के उसे मैडम क्यूरी , लैक्चरारनी , प्रोफेसरनी ..और न जाने किन किन नामों से नवाजते थे। जगदीश कहता---"इतना मत जलो ,मास्टरनी तो वह बन जाएगी।"

"अरे भाई जगदीश की बातें हैं ...वरना यह मुँह और मसूर की दाल..।"
मैं कक्ष में जाने में झिझक रहा था। किस मुँह से सामने जाऊँ। पुरानी बातें पीछे छोड़ भी दे तो इस हाल की बात पर क्या शर्मिन्दा न करेगी यह सरिता वर्मा।
"अरे नरेश भाई ,आओ। "

उसकी आवाज पर मैं फिर चौंक उठा। वह निश्छलता से कहे जा रही थी ---"मैंने तुम्हें देखते ही पहचान लिया। अन्दर आओ।" मैंने कृतज्ञता दिखाते हुए अभिवादन किया।
आप यहाँ ...वाह क्या बात है एकदम अप्रत्याशित। कहाँ वे सब विवाद और कहाँ आपकी यह पोजीशन...।
"अरे वह सब छोडो। यह बताओ पेपर कैसा गया ? कौन सा अटेम्प्ट है यह ?
"मैडम आखिरी है बस। देखते हैं...।"

"इस बार तो निकल जाओगे मेरा विश्वास है। लेकिन वह क्या मामला था जो भदौरिया जी कापी छीन रहे थे। उन्हें मैंने ही वहाँ से हटाया था।"
"उसमें मेरी गलती नहीं थी मैडम ..।"
"अरे, यह मैडम--मैडम क्या लगा रखी है ? मैं सरिता हूँ भाई। आपकी क्लासमेट। ..और उन लोगों के क्या हाल हैं ? मुंशी ,सुरेश ..जगदीश.. ओम..।"
"ये लोग बड़े शरारती थे-"--हँसते हुए उसने अपने पति को बताया---"दिमाग में जाने क्या-क्या चलता रहता था। असल में भविष्य के तय होने का समय भी वही होता है न !"

मैं अवाक् था। उसकी बातों में सहजता थी। कोई कटुता या मलाल नहीं था। आज भी अगर वह न होती तो....।
उस दिन मुझे लगा कि अचानक मेरा कद बहुत छोटा होगया है। बौना कहलाने लायक। मुझे एक बार फिर याद आया कि सुरेन्द्र जैसा लड़का भी सरिता वर्मा को अपने लायक नहीं समझता था लेकिन आज यह सच साबित हो ही गया कि उसके लायक वहाँ कोई था ही नहीं। न सुजानगढ़ के सर्वसम्पन्न और प्रतिष्ठित घर का ओम और न ही स्कूल भर में प्रिंस कहाने वाला मैं।

"रिजल्ट आए तो बताना जरूर---" ग्लानिबोध के साथ जब मैं पीछा छुड़ाता हुआ सा वहाँ से भाग रहा था ,उसकी आवाज मेरा पीछा कर रही थी।

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

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