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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -95- राजीव सागरवाला की कहानी : बापू

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कहानीबापूराजीव सागरवालाअर्से पहले एक सपना मैंने देखा था।
ऐसा सपना था कि मेरे दिल ओ दिमाग पर असर कर गया। ऐसा कि अब तक मैं नहीं भुला पाया हूँ ।
कितने साल का हुआ हूँगा। उस समय। कह नहीं सकता ठीक से। शादी नहीं हुई थी। सरकारी नौकरी में लगा हुआ था। उसकी तरफ से भी कोई चिंता नहीं थी।
मां-बाप दोनों जिंदा थे। बापू अभी नौकरी में थे। इधर से भी कोई चिंता नहीं थी। सेहत भी ठीक-ठाक थी उनकी
फिर भी मैंने सपना देखा। क्यों देखा?  मेरी समझ से बाहर है।
करीब बीस साल तक वो सपना मेरे साथ रहा। 
सपनों के बारे में कहा जाता है कि ज्यादातर भुला दिये जाते हैं। बाज वक्त तो नींद से बाहर आते ही दिमाग पर जोर डालना पड़ता है कि क्या देखा था। फिर भी याद नहीं आता।
यह वैसा नहीं था।
जब भी मैं उसके बारे में सोचता पूरा दृश्य सामने आ जाता। सिहरन होने लगती। दहशत हो जाती। यह जानते हुए भी कि वह महज़ एक सपना है। फिर भी।
सपना क्या है एक हारर मूवी का ट्रेलर।
हम सागर के उसी घर में रह रहे हैं जिसमें मेरा बचपन बीता था। जहां नौकरी पर शहर से बाहर जाने से पहले करीब सतरह साल बिताए थे।
यह घर मकरोनिया गांव के पास बनी मिलेट्री की पुरानी बैरकों में स…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -94- वंदना सिंग की कहानी : न दैन्यं न पलायनं

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न दैन्यं न पलायनंचित्रा !आज फ्री हो ?.....तुम्हारी बेटी तुमसे मिलना चाहती है” इरा ने फोन पर  बताया . “ओह नव्या !वो कब आई” मैनें पूछा तो दूसरी तरफ से पुलकित नव्या का स्वर सुनाई दिया ...मौसी मिलकर बात करेंगे मेरी पसंद का खाना तैयार रखना . खाना तैयार करते हुए सब कुछ एक फिल्म रील की तरह चल रहा था – “चित्रा दी !चित्रा दी !जल्दी दरवाजा खोलिए .” यह रेवा की आवाज थी ,घड़ी की ओर देखा रात के साढ़े दस बजे थे .दरवाजा खोला तो वो कुछ घबराई सी लगी . “घर चलो और अपनी सहेली के हाल देखो” कहते हुए उसने सामने पड़ा बैग व स्टेथोस्कोप उठा लिया .एक बारगी तो मैं कुछ समझ नहीं पायी लेकिन जल्दी ही इरा का चेहरा सामने घूम गया, “शायद उसके पति ने मार पीट की होगी” यंत्रवत कदम उनके घर की ओर बढ़ गए . घर पर ताई (इरा की माँ )भी बैचैन दिखाई दी अरुण चाचा जो कि हमारे पडोसी हैं इरा के पास बैठे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे .बदहवास सी पड़ी इरा की फटी फटी आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे . देखते ही समझ आ गया कि शारीरिक आघात सहते रहने की आदी हो चुकी इरा इस बार विशेष मानसिक पीड़ा से जूझ रही है .दवाइयों के साथ नींद का इंजेक्शन दिय…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -93- अनिता अतग्रेस की कहानी : " गीता हो या सीमा...कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता...."

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"आज फिर तुम इतनी देर से आई गीता? तुम्हारी तो रोज़ की यही आदत हो गयी है, मैं बोल-बोल कर थक गयी ! अब तो मुझे भी टोकने में शर्म आने लगी है पर  तुम्हें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता..." , सीमा, दर्द की दवा की गोली गटकते हुए.., खीजी हुई गुस्से भरी आवाज़  में बोले जा रही थी ! उसे बुखार सा महसूस हो रहा था, सिर और हाथ-पैरों में बेहद दर्द हो रहा था...! अचानक उसने देखा, रोज़ कोई न कोई बहाना बनाने वाली गीता आज चुपचाप झाड़ू लेकर सामने आ खड़ी हुई और पूछ्ने लगी, "किधर लगाऊं पहले?" उसे जैसे सीमा की बातें सुनाई ही नहीं दी ! सीमा भी कड़े स्वर में बोली, " मेरे कमरे में..."  और पैर पटकती हुई अपने कमरे की तरफ चल दी ! आज सीमा भी बहुत चिड़चिड़ाई हुई, गुस्से में थी ! पीछे पीछे गीता भी आ गयी ! चुपचाप झाड़ू लगाने लगी !      सीमा एक पढ़े-लिखे, सभ्य, शालीन, उच्च मध्यमवर्गीय छत्तीस (३६) वर्षीया महिला थी ! उसके पति का अपना निजी व्यवसाय था, जिसके सिलसिले में उन्हें अक्सर शहर से बाहर जाना पड़ता था ! उनके एक ही बेटी थी, जो दूसरे शहर में  कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी ! सीमा अकेले घर में ऊब जाती …

राजीव आनंद का आलेख - दलदली बुखार : मलेरिया

प्रत्‍येक वर्ष विश्‍व में 7.80 लाख लोग दलदली बुखार यानि मलेरिया से मरते हैं। भारत में लगभग 2.5 लाख लोग और झारखंड़ में लगभग 15 हजार लोग हर वर्ष इस बीमारी के शिकार होते हैं। डब्‍लूएचओ ने अप्रैल 2012 के अपने रिपोर्ट में यह माना है कि वर्त्‍तमान विश्‍व में 3.3 अरब लोग मलेरिया से प्रभावित होते हैं जिसमें सबसे ज्‍यादा पांच वर्ष से कम उम्र के बच्‍चे शामिल हैं, दूसरे नंबर पर गर्भवती महिलाएं आती हैं। मलेरिया मादा एनोफिलिस मच्‍छर के काटने से होने वाली एक खतरनाक बीमारी है। सरकार द्वारा इस बीमारी के रोकथाम के लिए अरबों रूपए खर्च किए जाते हैं फिर भी मलेरिया हर वर्ष और भी विकराल रूप में सामने आ रहा है। उल्‍लेखनीय है कि मलेरिया नामक बीमारी का इतिहास मानव इतिहास जितना ही प्राचीन है। इस बीमारी का जिक्र चीन के इतिहास में 2700 ई.र्पू. के आसपास मिलता है। इटालियन भाषा का यह शब्‍द ‘मलेरिया' या ‘माला एरिया' का अर्थ ‘बुरी हवा' होता है, इसे दलदली बुखार भी कहा जाता है। 1880 ई. में एक फ्रांसीसी सैन्‍य चिकित्‍सक चाल्‍से लुई अल्‍फोन्‍स लेबेरेन ने सबसे पहले अल्‍जीरिया में यह पता लगाया था कि एक प्रोटोजो…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -92- राजीव सागरवाला की कहानी : मां अब....

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कहानीमां अब....... 
राजीव सागरवाला    उसने एक आफ व्हाईट मटमैले थैले से, जिसका रंग यक़ीनन कभी सफेद रहा होगा एक प्लास्टिक का आयताकार डिब्बा निकाला और उसमें से एक इंकपेड, दो तीन रबर स्टेम्प, बालपेन, लिफाफे में रखे कार्बन पेपर और मोड़ कर रखे गये छपे फार्म एक-एक कर इत्मीनान से निकाल अपने सामने रखे। सारी चीज़ें वह इस समय डाईनिंग टेबुल पर फैलाए, कुर्सी पर बैठा था जिस पर एक मटमैली होती हुई चाकलेट-रंगी काड्राय की गद्दी बिछी थी, जिसे उसकी दिवंगत पत्नी ने सालों पहले अपने हाथों से बनाया था
    बदन पर सोते समय पहनी हुई बुशशर्ट और पैजामा था। पास ही लोहे का फोल्डिंग पलंग, जिसकी प्लास्टिक की निवाड़ बदरंग हो चली थी..और जिस पर उसने पिछली रात सोने की असफल कोशिश की थी, एक तकिये के साथ पंखे के नीचे फैला हुआ था। चादर नहीं थी।
    समय..........? भोर हुआ चाहती थी...... कोई पांच एक बजा होगा। अंधेरे की गहराई कुछ कम हो चुकी थी।
    डाईनिंग टेबुल पर, जहां वह इस समय बैठा था वहां........उसके सामने.. .. एक दीवार थी जिसके उस पार इस दीवार से लगी... .. .. साथ के मास्टर बेडरूम की बाकी तीन दीवारें थीं जिनमें से एक में बगीचे …

रजनी नैय्यर मल्होत्रा की कहानी - वेदना

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सौरभ आज मानवी की तस्वीर लिए ऐसे फफक कर रो रहा जैसे उसने मानवी को अपनी दुनिया से नहीं इस दुनिया से खो दिया हो। सौरभ और मानवी का विवाह परिवार के सहमति से हुआ था. मानवी छोटे कस्बे की लड़की थी, साधारण नैन नक्श गेंहुआ रंग ,काले घुंघराले बाल , पर एक ऐसा आकर्षण व्यक्तित्व पर जो बरबस ही किसी को आकर्षित कर ले। उसे देख कर कोई कहता साक्षात् दुर्गा लगती है, कभी उसके भोले चेहरे को देखकर कहता लक्ष्मी का रूप। मानवी की बारहवीं पढ़ते पढ़ते ही विवाह की बातचीत चलने लगी, और उसका डॉ. बनाने का सपना बस सपना ही रह गया। उसने अपने कुछ बनने के सपने को मन में ही दफ़न कर लिया। माता पिता से कुछ कह ना पाई, उसके पिता विवाह तय कर आये, सौरभ उन्हें मानवी के लिए उपयुक्त वर लगा , और मानवी का सौरभ के साथ विवाह संपन्न हो गया। अपने गृहस्ती की गाड़ी मानवी कुशलता से सँभालने लगी , वो एक कुशल गृहिणी थी उसने बहुत से कामों में निपुणता हासिल कर ली थी ,कोई भी काम हो वो हर काम मन लगाकर करती थी, सौरभ के कमाए गए रुपयों से बचत कर उसने एक एक कर घर के कई सामान बना डाले, जिनका सौरभ को जब पता चलता वो एक ही बात दुहराता " अच्छा है सामान ब…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल रचना - (बिजली के) खंभे चाचा की पाती

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बच्चों के नाम खंभे चाचा की प्यार भरी पाती
प्यारे बच्चों
आपके खंभे चाचा का आप सब बच्चों को प्यार भरा नमस्कार
बच्चों आपने अनुभव किया होगा कि रात्रि को कभी कभी अचानक बिजली गुल हो जाती है और चारों ओर बिल्कुल अँधेरा हो जाता है। कुछ भी नहीं दिखाई देता है , तब आपको डर लगने लगता है और आप मम्मी मम्मी चिल्लाने लगते हैं। कोई कोई पापा को आवाज़ लगाते हैं। यदि घर में दादा दादी भी साथ रहते हैं तो आप उनको भी आवाज लगाते हैं जोर से चिल्लाते हैं। तब घर के लोग कहते हैं बच्चों डरना मत हम अभी आपके पास आते हैं। फिर कोई टार्च तलाशता है तो कोई माचिस ढ़ूंढता है और‌ कोई मोबाइल की लाइट जलाकर तुम्हारे पास आ जाता है और तुम्हें पलंग ,सोफे अथवा किसी सुरक्षित स्थान पर बिठा देता है। इतने में कोई मोमबत्ती अथवा दीपक जलाकर प्रकाश कर देता है। गांव में तो अभी भी कहीं कहीं लालटेन अथवा लेंप घरों में दिख जाते हैं। यदि मिट्टी का तेल घर में उपलब्ध रहता है तो इन लालटेनों लेंपों को जलाकर घरों में उजाला कर देते हैं। उजाला होने से बच्चों आपको आपके मम्मी ,पापा ,दादा, दादी सब लोग दिखने लगते हैं। मगर भैया इनका उजाला बहुत कम होता है। इसमे त…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल साहित्य पर आलेख - बाल‌ विकास में परिवार की दैनिक चर्या की भूमिका

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आजकल बाल साहित्य और बाल विकास के चर्चे जोरों पर हैं। वैश्वीकरण के इस दौर मे जहाँ सारे विश्व में पश्चिम का बोलबाल है भारत भी इसकी मार से अछूता नहीं रहा। हमारा देश वैदिक परंपराओं ,पुरातन सनातन ,संस्कारों में रचा बसा सिद्धांतों, नैतिकता और मानवमूल्यों का पोषक देश रहा है । यहां मर्यादा पुरषोत्तम राम के समान पिता के वचनों के पालनार्थ राज पाठ त्याग करने वाले देव पुरुष पैदा हुये हैं तो धर्म की रक्षार्थ कृष्ण के समान लीला पुरुष भी अवतार लेकर आये हैं। जहां नैतिकता, सिद्धांत, धर्म मानव मूल्य, सचाई, करुणा ,दया ,प्रेम, परहित ,कर्तव्य ,इन सभी शब्दों को अक्षरश: पालन करने के लिये बुद्ध, महावीर, परम हंस ,विवेकानंद जैसे महामानवों ने जन्म लिया है,वहीं स्वदेश की रक्षार्थ ,मातृभूमि की सेवा में राणा प्रताप और शिवाजी जैसे देश भक्तों ने अपनी सारी जिंदगी दुखों और महान कष्टों में गुजार दी। विदेशी आतताईयों की अधीनस्था स्वीकार कर वे विलासिता पूर्ण शाही जीवन जी सकते थे। किंतु स्वदेश प्रेम और स्वाभिमान के चलते यह लोग यायावर की जिंदगी जीते हुये भी आतताइयों से युद्ध करते रहे। वीर शिवाजी ने अपने जीते जी मुगलों को चै…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -91- देवी नागरानी की कहानी : ऐसा भी होता है

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कहानी ऐसा भी होता है देवी नागरानीकहाँ गई होगी वह? यूं तो पहले कभी न हुआ कि वह निर्धारित समय पर न लौटी हो। अगर कभी कोई कारण बन भी जाता तो वह फोन ज़रूर कर देती। मेरी चिंता की उसे चिंता है, बहुत है, लेकिन आज मैं उसकी चिंता की बेचैनी मुझे यूं घेरे हुए है, कि मेरे पाँव न घर के भीतर टिक पा रहे हैं और न घर बाहर के बाहर क़दम रख पाने में सफल हो रहे हैं। कहाँ जाऊँ, किससे पूछूँ ? जब कुछ न सूझा तो फोन किया, पूछने के पहले प्रयास में असफलता मिली क्योंकि उस तरफ़ कोई फोन ही नहीं उठा रहा था, निरंतर घंटियाँ बजती रहीं, ऐसे जैसे घर में बहरों का निवास हो। जी हाँ, मेरी समधन के घर की बात कर रही हूँ। अब तो कई घंटे हो गए हैं, रात आठ बजे तक लौट आती है, अब दस बज रहे हैं। बस उस मौन-सी घड़ी की ओर देखती हूँ, तकती हूँ, घूरती हूँ, पर उसे भी क्या पता कि जीवन अहसासों का नाम है, उसे क्या पता कि अहसास क्या होता है? छटपटाहट क्या होती है? इंतज़ार क्या होता है? और अचानक दिल कि धड़कन तेज़ हो गई। फ़ोन ही बज रहा था। हड़बड़ाहट में उठाने की कोशिश में बंद करने का बटन दब गया और बिचारा फोन अपनी समूची आवाज़ समेटकर चुप हो गया। मैंने अपना माथ…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -90- रमाकंत बडारया ‘‘बेताब'' की कहानी : जैसा पेड़ वैसा फल

कहानीजैसा पेड़ वैसा फलरमाकंत बडारया ‘‘बेताब''प्रस्‍तावना ः प्रस्‍तुत मंचीय, नुक्कड़ नाटक शैली की कहानी 'जैसा पेड़ वैसा फल' लिखने की प्रेरणा मुझे 1975 में जांजगीर जिला-बिलासपुर में पड़े भयंकर अकाल से मिली. तब मैंने बैंक में सर्विस के दौरान गावों में प्रवास के समय देखा, मीलों खेतों में फसलें सूखी पड़ी हैं. खेत सूखे पड़े हैं. पानी के आभाव में खेतों की जमीन में दरारें पड़ी हुयी हैं. लोगों के चेहरों की चमक गायब है, लोगों के पेट और पीठ आपस में मिले हुये हैं. बड़ा ही दर्दनाक माहौल वातावरण देखने मिलता, आखें नम हो जातीं. जहां देखो पलायन करने वाले किसान नजर आते. किसी घर के सामने दरवाजे पर, कटीली झाडियों को देखो तो समझ जायें,परिवार पलायन कर गया है. मैंने 1975 में इन चंद लाइनों में उसका आखों देखा हाल कुछ इस तरह लिखा हैये हकीकत है कि, छतीसगढ जल रहा है.पापी इन्‍द्र है जो, इसको छल रहा है.मीलों चले जाइये, खेतों में धान नहीं मिलेगी.लोगों के चेहरों पर, मधुर मुस्‍कान नहीं मिलेगी.चौंकों में चले जाइये, चून नहीं मिलेगा.काटोगे तन को लोगों के, तो खून नहीं मिलेगा.मैंने प्रण, किया, मुझे जब भी म…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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