संदेश

October, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

रहीम खान का आलेख - वक्‍त के साथ गुम होते बहुरूपिया

चित्र
वक्‍त के साथ गुम होते बहुरूपिया (दूसरों को हंसाने वाला खुद गमगीन)किसी ने सही लिखा है कि इंसान को यदि जिंदगी में कामयाब होना है तो आम जिंदगी में एक कलाकार की तरह अभिनय करें। बचपन में तो हमने उन्‍हें अकसर देखा है पर अब वो कहीं नजर नहीं आते। गांव हो या शहर कभी कभार ही उनके चेहरे दिख जो है जिन्‍हें लोग प्‍यार से बहुरूपिया कहा करते हैं। बहुरूपिये कभी लैला-मजनूं, कभी सन्‍यासी, कभी पागल, कभी शैतान, कभी भगवान शंकर, कभी डाकू, कभी नारद जैसे कई किरदारों को बखूबी निभाते हैं। कहा जाता है कि नायक और खलनायक का रोल कभी एक व्‍यक्‍ति द्वारा नहीं निभाया जा सकता है। यह सब फिल्‍मों में कभी कभार ही नजर आते हैं पर बहुरूपिये इस मिथक को पूरी तरह झुठला देते हैं यह कई किरदारों को इस तरह प्रस्‍तुत करते हैं कि कुछ क्षणों के लिये लोग उसे सही समझ बैठते हैं। कई तरह के किरदारों का स्‍वांग रचने वाले आज के आधुनिक और तेजतर्रार युग में गुम से होते जा रहे हैं। दूसरों को हंसाने वाले ये किरदार दो जून की रोटी की खातिर लोगों के दिल को तो बहला देते हैं, स्‍वयं भीतर से कितने टूटे हुए है इसको यह व्‍यक्‍त नहीं कर पाते। लगी मोहल्‍…

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएँ

चित्र
कंडे का कंडाजानवर मनुष्यब्रह्मा जी ने आदेश दिया कि एक महीने के बाद मनुष्य बनाने का काम बंद कर दिया जाए। देवता जल्दी-जल्दी जानवर बनाए जा रहे थे। ब्रह्मा जी उनके पास बैठे थे। जानवरों के अंगों के ढेर लगे पड़े थे। देवताओं ने पूछा, ‘‘ब्रह्मा जी, हम मनुष्य बनाना क्यों बंद कर रहे हैं?’’ब्रह्मा जी बोले, ‘‘एक मनुष्य को बनाने के लिए एक हजार जानवरों जितना समय लग जाता है। ये मनुष्य नीचे जाकर जानवरों को खाने लगते हैं। हमारा नरक वाला हिस्सा पूरी तरह भरने वाला है। कुछ देर तक यह मनुष्यों से भर जाएगा। इससे पहले कि यह भर जाए मैं दुनिया का नए सिरे से सृजन करूंगा।’’ अब देवता चुप थेड्यूटी‘‘रीना आज फिर तुम 2 घंटे लेट आई हो। मेहता साहब बहुत गुस्से में हैं। तुझे कैबिन में बुलाया है। जल्दी जा कहीं नौकरी से हाथ न धो बैठना।’’ भानू प्रसाद ने कहा। ‘‘मे आई कम इन सर?’’‘‘कम इन। तुम 2 दिन दफ्तर क्यों नहीं आई?’’‘‘सर, मेरी मां बहुत बीमार है, मैं इसलिए नहीं आ सकी।’’‘‘बहुत बढ़िया बहाना है, आज 2 घंटे लेट होने का बहाना। तुम कोई और नौकरी तलाश करो। तुम ड्यूटी को ड्यूटी नहीं समझती।’’ मेहता साहब गुस्से में सामने खड़ी रीना को क…

राजीव का आलेख - शक्ति या रोग

शक्‍ति या रोग झारखंड़ के बोकारो जिला में एक गांव है बालीडीह जहां हर साल दशहरा के नौंवी पूजा के दिन जितनी भीड़ माँ दुर्गा के मूर्ति के पंडाल के पास होती है उतनी ही भीड़ बालीडीह गांव के कुर्मीडीह मोहल्‍ले में मालती देवी के घर के सामने भी होती है क्‍योंकि स्‍थानीय लोग मालती देवी को माँ दुर्गा के अनन्‍य भक्‍त के रूप में देखते हैं और उसके द्वारा दुर्गा माँ से मनौती पूरी कराने की आकांक्षा रखते है। पचास वर्षीय मालती देवी को स्‍थानीय लोग सैकड़ों बकरों का खून झूम-झूम कर पीने वाली दुर्गा माँ की भक्‍तिन के नाम से पुकारते हैं और हर साल की तरह इस साल भी नवमी पूजा के रोज मालती देवी एक के बाद एक बलि चढ़ाये गए लगभग सौ बकरों का खून झूम-झूम कर पीती रही जिससे उसका चेहरा और शरीर भी लाल हो गया था और उसके घर के सामने मेला जैसी भीड़ लग गयी थी। पूछे जाने पर स्‍थानीय लोगों ने बताया कि मालती देवी ऐसा प्रत्‍येक साल करती है। मालती देवी को लोग भूत-पिशाच मारने वाली या बुरी आत्‍माओं से लोगों को मुक्‍ति देने वाली दुर्गा माँ की भक्तिन के नाम से पुकारते हैं। मालती देवी के समर्थन में बोलने वालों का कहना है कि सप्तमी के…

विजेंद्र शर्मा की जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

चित्र
जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म...... ज़रुरत ज़मीं के बदतर हालात देख कभी – कभी उपरवाला भी हो जाता है ग़मज़दा..उसे भी लगता है कोई उसे हँसाएकोई उसे गुदगुदाए और हँसने की फ़िक्र में वो झांकता है आसमां से ज़मीं पर उसकी तलाश ख़त्म हो जाती हैउस शख्स पे जाकर जो मुसलसल कहकहे बाँट रहा है बुझे हुए चेहरों को नुस्खे बता रहा है खिलखिलाने के, ज़िंदगी जीने के यकबयक ...एक आवाज़ आती है चलो , हमे तुम्हारी ज़रुरत है बहुत ठहाके हो गए यहाँ और फिर ..बिना सोचे वो मसखरा सबको हँसाते-हँसाते रुलाकर चल देता है उसको हँसाने जिसके पास निज़ाम है सबको रुलाने का ...सबको हँसाने का ...अब इस तसल्ली के सिवा कोई चारा भी तो नहीं है किउस मसखरे की ज़रूरत हमे नहीं आसमानों को ज़ियादा है .....--विजेंद्र शर्मा Vijendra.vijen@gmail.com

राजीव आनंद की कविताएँ

चित्र
उँ
ब्रह्मांड का प्रतीक है उँ
प्रणव मंत्र
एक ध्‍वनि
शरीर के भीतर भी
शरीर के बाहर भी
    सून हर कोई सकता नहीं
    सुनने लगता है जो इसे
    जुड़ने लगता है परमात्‍मा से
ब्रह्मांड की अनाहत ध्‍वनि
ध्‍वनि के उत्‍पत्‍ति का अपवाद
ब्रह्मांड की समस्‍त ध्‍वनियों में
सबसे शक्‍तिशाली ध्‍वनि
    प्रारंभ तो है इसका अंत नहीं !सबसे बड़ा लोकतंत्र
क्‍या बचा है मेरे पास
बाहर आकर जेल से
दशकों बाद
न बाप
न माँ
न बहन
न भाई
न किए जुर्म की सजा काट
पुलिस साबित न कर पायी एक भी बात
गुम हो गयी लंबी अंधेरी रातों में हयात
मां, बाप, बहन, भाई ने छोड़ दिया साथ
    कैसा है ये न्‍याय का तंत्र ?
    फंसाकर पुलिस निर्दोष को
    रचती है षडयंत्र
    जज साहब एक दशक तक
    फैसला सुनाते है
    जाओ अब जेल से बाहर
    तुम हो स्‍वतंत्र
    क्‍या गरीब को ऐसी ही
    जिंदगी मिलती है भारत में ?
    सूना है देश आजाद है
    और है
    सबसे बड़ा लोकतंत्र !

      कारखाना
इंसानियत का कारखाना
अब हो गया है पुराना
नहीं बना पा रहा
ममता, त्‍याग, प्रेम व करूणा का
औजार
जो जीवित कर सके इंसानों में
मरती हुई इन संवेदनाओं को
औजार घिस गए लगते है
मन-मस्‍तिष्‍क के आनंदित उत्‍पाद
नहीं बना पा रहा …

राजीव आनंद की लघुकथा - खुशखबरी

चित्र
खुशखबरी मधुमेह से जीवन बढ़ जाता है, ये कहना था रविन्‍द्र बाबू का। रविन्‍द्र बाबू बड़े ही मस्‍तमौला किस्‍म के व्‍यक्‍ति थे। बाइपास सर्जरी भी करवा लिया था और जीवन के 70वें पड़ाव पर मस्‍त थे। लक्ष्‍मणपुर गांव के मुखिया रह चुके रविन्‍द्र बाबू को गांव में सभी मुखिया जी कहता था। विनय उनका पड़ोसी था और अपने पिता के हाल में हुए मधुमेह के कारण रविन्‍द्र बाबू से मिलता रहता था। विनय रविन्‍द्र बाबू से एक दिन चौपाल में बैठा देखकर पूछा अच्‍छा चाचा आपको मधुमेह कब हुआ, रविन्‍द्र बाबू ने तपाक से कहा कि मधुमेह मेरे साथ चालीस वर्षों से मेरा साथी बनकर है। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा विनय मधुमेह मेरे जीवन को बढ़ा दिया है। वो कैसे चाचा, विनय ने उत्‍सुकता से जानना चाहा, वो ऐसे भतीजे जब हम जाने रहे कि हमका मधुमेह हो चुका है तो थोड़ा आश्‍चर्य हुआ था काहे कि हम सोचते रहे कि यह बीमारी हमका हो ही नहीं सकती इसलिए कि मीठा हम नहीं के बराबर ही खाते रहे और बर्जिश भी करते रहे पर बाद में चिंतन-मनन करे से पता चला कि यह हमका तनाव के कारण हुआ था। हम तो कहूंगा विनय आज तनाव से मधुमेह ज्‍यादा हो रहा है मीठा खाने से कम। ज…

अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री‘ की कविता - गौरैया की मांग

चित्र
गौरैया की मांगछत पर बैठी गौरैया फुदक-फुदक कर करती मांग। दे दो मुझका दाना पानी, दिखता है बस अब मकान। नहीं मिले अब वो बाग बगीचे, नहीं रहे अब वो उपवन। मेरा मन भी अब उचट गया है, सोच रही हूं छोड़ दू तन। पर काल चक्र के आगे, कौन यहां टिकता है। चाहे जो मन, वो सब कर्म कहां होता है। लेकिन बच्‍चों के खातिर, मुझको आना जाना है। रोज भोर में आकर छत पर, चूं-चूं कर तुम्‍हें जगाना है। बदले में मिल जायेगा मुझको, थोड़ा दाना थेाड़ा पानी। कट जायेगा जीवन मेरा, कर देना बस इतना एहसान। छत पर बैठी गौरैया, फुदक-फुदक कर करती मांग। ---अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री‘

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता - नौसिखुआ न कहो

चित्र
नौसिखुआ न कहो..... जवां हैं हम जवां हैं उमंगें हर ताल पर झूम सजगता की अभिव्यक्ति रंगो से बुना यथार्थ बाजीगरों के नए ठिकाने रोशनी की नई किरण महलों में गूंजता ककहरा परंपरा की डोर थामे उदारता हो प्‍यार का आधार लय की समझ के लिए लिख रही तकदीर परदे पर रग-रग में उतरता राग सुनाई दे रही भविष्‍य की दस्‍तक हरफन मौला हो तो मुश्‍किल नहीं चुनौती एक सपना उंची उड़ान का अनुभव असल जिन्‍दगी के अब यहां से कहां जाए हम सपने कभी नहीं मरते कभी न कभी सच होते हैं कभी अंधेरे में जन्‍मते हैं तो उजाले में पूरे होते हैं000 सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्रीए-305, ओ.सी.आर.विधान सभा मार्ग;लखनऊ

पुस्तक समीक्षा - लघुकथा संग्रह : डोर

पुस्‍तक समीक्षासमीक्षक - दिलीप भाटियारावतभाटा --- डोर (लघु कथा संग्रह) लेखक-पंकज शर्मा, 19 सैनिक विहार, जण्‍डली, अम्‍बाला शहरप्रकाशक-शुभ तारिका प्रकाशन, ।-47, शास्‍त्री कॉलोनी, अम्‍बाला छावनी-133001, पृष्‍ठ-116, मूल्‍य रू150 (पेपर बेक), रू. 200 (सजिल्‍द)यत्र तत्र सर्वत्र प्रकाशित होते रहने वाले पंकज की दूसरी कृति 80 लघुकथाओं के संकलन रूप में साहित्‍य जगत में आई है। सामयिक ज्‍वलंत हर विषय पर गागर में सागर सदृश ये लघुकथाएं एक सकारात्‍मक समाधानात्‍मक एवं विचारणीय संदेश देती हैं। वर्त्तमान रचनाओं से हटकर ये लघुकथाएं पाठक के मन को संतोष, तृप्‍ति एवं आशा की किरण देती हैं। धार्मिक उत्‍सव पर कटाक्ष ‘मजाक‘ में है, ऊर्जा संरक्षण का संदेश ‘संस्‍कार‘ में है, ममता का गुण ‘समानता‘ में है, लॉटरी पर कटाक्ष ‘लाटरी‘ में है, पापा की कमी ‘मेरे पापा‘ में है, अंधेरे की हार ‘रोशनी‘ में है, संवेदनशीलता ‘काश‘ में है, रिश्‍तों की निरर्थक तुलना ‘तुलना‘ में है, रिश्‍वत पर प्रश्‍न चिन्‍ह ‘प्रतिपूर्त्ति‘ में है, घर का महत्त्व ‘ईनाम‘ में है, जीवनसंगिनी का महत्त्व ‘डोर‘ में है, शालीनता एवं मर्यादा का महत्त्व ‘कसूरव…

भूपिंदर सिंह के कुछ शेरो-शायरी

चित्र
1.बन्दा ए दिल ए नाज़ुक का मक़ान है
रात भर छत को नज़र पे उठाये रहता है
2. शर -गफ्त बहक-आदाब और बे-नू सा दिखा
अदना गली का हर शख्स भूखा और मय-बू सा दिखा( शर गफ्त - बुरा बोलने वाला या गालीबाज़ , बहक आदाब - बहके से आचरण वाला , बे-नू - पुराना
मय -बू   - जिस से शराब की महक आती हो )
3. ख़ुर्शीद मग़रिब के इधर आया न कभी
सहरी की दहलीज़ पे मेरे साये ना गए
( खुर्शीद - सूरज , मग़रिब - पश्चिम , सहरी - सुबह या इस शेर में पूर्व दिशा के लिए कहा है )

4परस्तिश के लिए हर दीवार से लटकाया गया
पाबन्द ए दीन ए ईमाँ का बेहतर क्या अंजाम होता(परस्तिश - पूजन , पाबंद ए दीन ए ईमान - ईमानदारी के धर्म का पालक )5कोई किस्मती इबारत सोने आ जाये कभी
पेशानी के बिस्तर से ये सिलवटें हटाइए
( इबारत - लेख , पेशानी - माथा )6 लकीरों का राहगीर सहरा की दौड़ में
छोड़ेगा कोई नज़ीर तो भटकों के वास्ते
( सहरा - रेगिस्तान , नजीर - उदाहरण )7 सिफ़्ल पयामी तेरा न मक़बूल तब्सरा होता
वज़्न शाना तेरे भी और ख़ुश्क गर पैमां होता( सिफ्ल पयामी - जादुई या सफल  वर्णन कार , मकबूल - प्रसिद्द , तब्सरा - चर्चा , वज़न शाना - बोझिल कंधे ,यहाँ ज़िम्मेवारियों के लिए प्रयुक्त , खुश्क - सूख…

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ व गीत

चित्र
पुणे की मेयर के साथ समानित होते हुए पिछली रात पिछली रात मोहल्ले में हो गया हल्ला हल्ला ओ हल्ला किसी ने कहा चोर था किसी ने कहा डाकू मुझ को मालूम  था  रात को आया मेरा चित चोर था हला ओ हल्ला पिछली रात ---------------------------सारी रात जगाया क्या गजब ढाया लेने ना दी अंगडाई भी मेरे तनमन में हो गया हल्ला ओ हल्ला पिछली रात----------------------------जाने लगा तो ठोकर लगी और गिर पड़ा वो घर के सब जागा उठे अंगना मे फिर खूब हुआ हल्ला ओ हल्ला पिछली रात--------------------------------जीवन आधार देखो फिर बरस रही है बूंदे जीवन का आधार लिए तपती हुई धरती पर शीतल फुहार लिए आसमान आज फिर खड़ा है अमृत कलश लिए कुछ बूंदों को बांधे हुए कुछ बूंदों को खोले हुए हंसती हुई सुबह के सारे उल्लास लिए मुरझाये खेतों को आधार  दिए मुंडेर-मुंडेर बहती धारा फूलों की सौगात लिए गीत गाती, गोरियों चेहरे की मुस्कान बने बैलों के गले की रुनझुन के सांझ की आवाज लिए देखो फिर बरस रही है बूंदें जीवन का आधार लिए --- माँ शारदे माँ शारदे है सरस्वती रागेश्वरी , भागेश्वरी माँ-----------------------वर दे वर दे वर दे वीण के तारों सा मुझ को स्…

तेजेन्द्र शर्मा की कहानी : कल फिर आना...

चित्र
कल फिर आना....: तेजेन्द्र शर्मा“देखो रीमा, मैं अब पचास का हो चला हूं। मेरे लिये अब औरत के जिस्म का कोई मतलब नहीं रह गया।.... अब तुम मुझसे कोई उम्मीद न रखना।” कबीर के ये शब्द रीमा के दिल की धड़कन को गड़बड़ा देने के लिये काफ़ी थे। कुछ पल की चुप्पी के बाद उसने मुंह खोला, “कबीर आप पचास के हो गये तो इसमें मेरा क्या कुसूर है? मैं तो अभी सैंतीस की ही हूं।.... आप कहना चाहते हैं कि हमारी शादीशुदा ज़िन्दगी बस आपके एक वाक्य से ख़त्म हो गई?.... जिस तरह पेट को भूख लगती है, कबीर, जिस्म को भी वैसे ही भूख महसूस होती है। वैसे पेट की भूख शांत करने के तो कई तरीके हैं। मगर जिस्म........ ” । रीमा को अपनी बात बीच में ही बन्द करनी पड़ गई। कबीर के बेसुरे ख़र्राटे कमरे में गूंजने लगे। रीमा को वहम है कि 13 की संख्या उसके लिये दुर्भाग्य लेकर आती है। यदि 13 तारीख़ को शुक्रवार हो तो वह घर से बाहर ही नहीं निकलती। और आज तो उसके विवाह को 13 वर्ष पूरे हुए हैं और 13 तारीख़ वाला शुक्रवार भी है। आज कबीर ने यह वाक्य बोल कर रीमा के दिल में 13 के आंकड़े के प्रति भावनाओं को जैसे आधार दे दिया है। क्या अब उसके बाकी जीवन का हर…

दिनकर कुमार का कविता संग्रह - लोग मेरे लोग

चित्र
लोग मेरे लोगदिनकर कुमारऔर मैं सोचा करता था
निहायत सरल शब्द
होंगे पर्याप्त।
जब मैं कहूं, क्या है
हरेक का दिल जरूर चिंथा-चिंथा होगा।
कि तुम डूब जाओगे
अगर तुमने लोहा न लिया
वह तो तुम देख ही रहे हो।
-बेर्टोल्ट ब्रेष्टमां और बाबूजी के लिए
अनुक्रमअपनी आवाज में    1
सारा देश रियल इस्टेट    2
एक एंटेलियो होता है    3
इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य    5
मुझे अभाव से डर नहीं लगता    6
अपनी ही संतानों की    7
अरे ओ अभागे    8
मुझे मत उछालो    9
मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं    10
वेनिस का सौदागर    12
कभी-कभी ऐसा भी होता है    14
तुम प्रजा हो तुम क्या जानो    15
आवारा पूंजी के उत्सव में    16
स्विस बैंकों तक बहने वाली खून की नदी में    18
अपनी शामों को बंधक रखकर    19
टुच्ची दुनियादारी से जब फुरसत मिल जाएगी    20
मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता    21
ग्वांतानामो    22
रूपट मर्डोक    23
जलबंदी    25
वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई    26
वह जो फेसबुक का साथी है    28
पी. साईंनाथ के साथ    29
शहर में जीना    30
एक दिन बचेगा    31
बारिश उतर रही है    32
दासता की जंजीर    33
जीवन का कोलाज    34
अतिमानव बनने की धुन में    3…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.