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November 2012
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महुआ के वृक्ष

ऊंचे-ऊंचे दरख्तों से उतरकर अंधियारा सड़कों-खेतों, खलिहानों में आकर पसरने लगा था। गांव के तीन चार आवारा लौंडे खटिया के दाएं-बाएं दीनदयाल के हाथ पांव दबा रहे थे। दीनदयाल ने वहीं से पसरे-पसरे आवाज लगाई।

‘अरे कल्लू... कहां मर गया रे- देखता नहीं अंधियारा घिर आया है। दिया-बत्ती क्या तेरा बाप करेगा?’

‘आया हुजूर।’ कहता हुआ कल्लू दौड़ता-हांफता उसके पास आकर खड़ा हो गया। अनायास ही उसके हाथ जुड़ आए थे।

‘क्या कर रहा था रे... दिखता नहीं.... गैस बत्ती तो जला ले लपककर।’

‘हुजूर, गायों को बांधकर चारा-पानी दे रहा था, बस थोड़ी सी देर हो गई। माफ करें अभी दिया बत्ती करता हूं।’

कल्लू ने पेट्रोमैक्स निकाला। हवा भरी, माचिस की तीली दिखाई, थोड़ी ही देर में पेट्रोमैक्स दूधिया रोशनी फेंकने लगा।

दीनदयाल अभी भी चित्त पड़ा अपने थुलथुल शरीर को दबवा रहा था।

गांव के बाहर, लाला दीनदयाल की दारू की भट्टी थी। शाम होते ही वहां अच्छी खासी चहल पहल हो उठती थी। गांव के सारे दरुवे इकट्ठे होने लगते। रूपलाल भी दारू-भट्ठी के पास, अपनी टिनमिनी जलाए आलू बोंडे, भजिया-समोसा, तेज मिर्च वाला चिऊड़ा थाली में सजाने लगता। लोग दारू खरीद लाते फिर अपने-अपने झुण्ड बनाकर बैठ जाते और दारू गटकने लगते। दारू के हलक के नीचे उतरते ही कच्चा चिट्ठा खुलने लग जाता। कभी किसी छिनाल की बात, तो कभी झगड़ा-फसाद की बात हवा में तैरने लगती। सभी बातों में मगन रहते, लगभग वही बात बार-बार दुहराई जाती।

‘गुरु... क्या शरीर पाया है... दबाते-दबाते सारी उंगलियां दुखने लगीं।’ एक चमचा चहका।

‘साले... हरामी के पिल्ले, अभी पांच मिनट भी नहीं हुए तेरे को पैर दबाते और तेरे हाथ दुखने लगे। समझता हूं बेटा... तेरे हाथ इतनी जल्दी क्यों दुखने लगे। अरे कल्लू एक पऊआ तो भेजना जरा।’ लाला ने काउन्टर पर बैठे कल्लू को हांक लगाई।

पव्वे का नाम सुनते ही तीनों के हाथ फिर तेजी से चलने लगे थे। कल्लू ने पूरा साज-समान लाकर खटिया के पास पड़े एक लकड़ी के खोके पर लाकर जमा दिया और वापिस अपने गल्ले पर जा बैठा।

एक ने ढक्कन खोला और ग्लास में उड़ेलने लगा। ग्लास में दारू डालते समय वह इस बात पर विशेष ध्यान दे रहा था कि किसी को कम अथवा ज्यादा न डल जाये। शेष दो बैठे हुए उतावले हुए जा रहे थे, उन्हें इस हरकत से चिढ़ होने लगी थी, उन दो में से एक गुर्राया- ‘एक तो साला फोकट का माल, और तू कि एक-एक बूंद गिन-गिनकर डाल रहा है, जल्दी कर साले।’ जल्दी बोलते हुए वह अपने सूखे ओठों पर जीभ फिराने लगा था।

अब तक तीनों ग्लास भरे जा चुके थे। लपककर तीनों ने ग्लास उठा लिए और एक ही सांस में पूरा गटक गए। पांव दबाते-दबाते एक ने बीड़ी सुलगाई। अब वह बीड़ी तीन लोगों के बीच धुआं उगलती नाच रही थी।

पांव दबाते-दबाते भूरा की नजरें कचरू से जा टकराईं। कचरू बिना दारू पिये, अनमना सा चला जा रहा था, शायद वह गांव जा रहा था। उसके गांव जाने का रास्ता इसी दारू भट्ठी के पास होकर निकलता है। भूरा के दिमाग का मीटर तेजी से घूमने लगा था। वह लाला से बोला, ‘उस्ताद... एक बहुत ही फाईन आइडिया दिमाग में आया है, हुकुम करो तो बोलूं।’ टांगें दबाते हुए भूरा चहका।

‘समझ गया बेटा- समझ गया। लगता है तेरा हलक फिर सूखने लगा। क्या बाप की दुकान समझ रखी है तूने, जब मुंह उठाया कर दी दारू की फरमाईश...।’ लाला गरजा।

‘नइ-लाला- नइ, ऐसी बात नहीं है। सुनोगे तो नाचने लगोगे, कसम मां की फिर खुशामद भी करोगे और कहोगे, भूरा... हो जाए इस बात पर।’ भूरा बोला।

‘अच्छा तो झट से बता तेरे दिमाग में कौन सी स्कीम घूम रही है।’ लाला अब थोड़ा नरम पड़ा था।

‘लाला- एक दिन तुम बता रहे थे न! मकान बनाना है, लकड़ी की जरूरत है, लकड़ी मिल नहीं रही है। तुमने जंगल के हरामखोरों को खूब पटाया, पर साले माने नहीं।’ भूरा बोला।

‘हां- बात तो तेरी सही है, पर साले साफ-साफ बतलाता क्यों नहीं, आखिर तेरे दिमाग में रेंग क्या रहा है।’ लाला बोला।

‘अरे हुजूर- वही तो बताने जा रहा हूं। कचरू को जानते हो न? अरे वही बाड़ेगांव वाला। बड़ी कड़की में चल रहा है बेचारा। इस साल उसके यहां फसल भी ठीक नहीं हुई और ऊपर से बैल भी मर गया है उसका। पैसे-धेले के लिए गांव-गांव भटक रहा है बेचारा। सरकार, उसकी मदद कर देते तो हमारा भी काम जम जाएगा।’ भूरा अपनी स्कीम धीरे-धीरे उगल रहा था।

‘साला, मतलब की बात जल्दी बतलाता नहीं। बस है कि हांके जा रहा है।’ लाला को बेहद गुस्सा आ रहा था। ‘लाला- बोलने भी तो दो। बीच-बीच में बोल देते हो तो भूल जाता हूं।’

‘जल्दी बक क्या बोलना चाहता है तू?’ लाला गरजा।

‘हुजूर- कचरू के आंगन में चार महुआ के झाड़ हैं, इत्ते बड़े कि दो लोग मिलकर घेरें, फिर भी पकड़ में न आएंगे। कुछ झाड़ सागौन के भी लगे हैं। अड़ी का मामला है। थोड़ी सी रकम सरकाओ, तो बात जम जायेगी। बोलो तो बुलाऊं साले को।’ भूरा अब अपनी पूरी स्कीम उगल चुका था।

‘हां- हां बुला ले हरामी के पिल्ले को।’ लाला अब थोड़ा नरम पड़ा था। अपने दूसरे साथी को इशारा करते हुए भूरा चहका- ‘गुड्डू जा तो रे लपक के। थोड़ी ही दूर गया होगा कचरू। जा जरा जल्दी कर।’

गुड्डू दौड़ता हुआ गया और कचरू को साथ लेता आया।

‘जै राम जी की लालाजी।’ हाथ जोड़कर कचरू लाला की खाट के पास खड़ा हो गया।

‘अरे बैठ कचरू बैठ। आज तू यहां से बिना पिए कैसे चले जा रहा है। वो मेरी नजर पड़ गई तुझ पर, तो गुड्डू को भेजकर बुलवा लिया।’ कचरू को स्टूल पर बैठने का इशारा करते हुए लाला उठ बैठा।

लाला का इशारा पाकर भूरा उठा और दारू लेने चला गया, जब वह लौटकर आया तो उसके हाथ में एक पूरी बोतल और पांच ग्लास थे। मुंह साफ करने के लिए चिउड़े का पैकेट वह पहले ही जेब में डाल चुका था। पास पड़े खोखे पर उसने ग्लास जमाया, बोतल खोला और पांचों ग्लास लबालब भर दिए।

बहुत दिनों के बाद दारू से भरा ग्लास कचरू के सामने रखा था। लाला बार-बार उससे ग्लास उठाने के लिए मना रहा था। कचरू भी निर्णय नहीं ले पा रहा था कि वह ग्लास उठाए अथवा नहीं। आखिर जीत तृष्णा की ही हुई। उसने लपककर गिलास उठाया और एक ही सांस में खाली कर दिया। इसके बाद एक नहीं-पूरे चार ग्लास खाली कर दिए थे उसने। चार ग्लास हलक के नीचे उतर जाने के बाद वह तेज चिउड़ा चबाने लगा था।

‘कचरू, मैंने सुना है कि आजकल तू बहुत परेशानी में चल रहा है और हमको बताया तक नहीं। क्या हम इतने पराए हो गए हैं।’ लाला के सहानुभूति के दो शब्द सुनकर कचरू की सारी कड़वाहट, एक कड़वे घूंट के साथ ही घुल गई थी। उसने अपनी परेशानियों की गठरी लाला के सामने खोलकर रख दी।

‘बस इत्ती सी बात, खैर... परेशान होने की अब जरूरत नहीं है। हम हैं न तेरे साथ।’ कहते हुए लाला ने जेब से सौ-सौ के पांच नोट निकालकर कचरू के हाथ में थमा दिए। कचरू की आंख से गरमागरम आंसू की दो बूंदें टपक पड़ीं। कृतघ्नता से उसके हाथ जुड़ आए थे।

‘कचरू, तुमसे एक बात बतलाना तो भूल ही गया। सुना है तेरे आंगन में महुआ और सागौन के ढेर सारे पेड़ लगे हैं। हमें तो भाई लकड़ी की सख्त जरूरत है। मकान बन रहा है और लकड़ी है कि साली मिल नहीं रही है।’

कचरू ने मन ही मन अपने आपको तौला, उसकी समझ में आ चुका था कि लाला आज इतना मेहरबान क्यों है। जो जेब से एक फूटी कौड़ी भी नहीं जाने देता, आज बड़े-बड़े नोट पकड़ा रहा है। एक बार जी में आया कि साफ मना कर दे। पर वह जानता है कि नोटों की क्या कीमत होती है। अगर जेब में नोट न हों तो न धर्म कमाया जा सकता है और न ही पाप किए जा सकते हैं। केवल कुछ दिनों के लिए ही, वह लोगों से उधार मांगते घूम रहा है पर नोटों की बात मुंह पर आते ही लोग कन्नी काटने लग जाते हैं। जानता है वह कि विगत चार दिनों से उसके घर का चूल्हा जला नहीं। बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे हैं। बूढ़ी मां पन्द्रह दिनों से बीमार पड़ी है। नोटों के हाथ में आते ही और भी अनेक समस्याएं धारदार हो उठी थीं। चाहकर भी वह नोट वापिस नहीं कर पाया था। नोटों को जेब के हवाले करते हुए अपने ग्लास में बची दारू एक घूंट में उतार गया और चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।

कचरू जाने के लिए उद्यत हुआ ही था कि लाला बोला- कचरू, एक दो दिन में बैल जरूर खरीद लेना और पैसों की जरूरत पड़े तो सीधे चले आना मेरे पास, एक दो दिन में आदमियों को भेज दूंगा तो वे झाड़ काट लायेंगे अरे- हां बैलगाड़ी तो है ही तेरे पास। बैल आ जाए तो लकड़ी भैयालाल के टाल पर पटक आना।

लाला की बातें सुनकर, चलते हुए कचरू के पैरों में जैसे ब्रेक ही लग आए थे। पीछे पलटते हुए कचरू ने लाला से कहा- दस पन्द्रह दिन रुक जाते लाला तो अच्छा रहता। सामने दीपावली का त्यौहार है और सबसे बड़ी अमावस्या भी पड़ रही है। तीज पावन पर हरे-भरे झाड़ काटना ठीक नहीं होता- अपशगुन माना जाता है।’

‘अच्छा- अच्छा ठीक है, जब तू कहेगा भेज दूंगा आदमियों को। अब तू जा।’ लाला के शब्दों में जैसे चाशनी ही घुल आई थी।

अंधकार अब गहराने लगा था। अंधकार स्याह-गहरा हो जाए, इससे पूर्व वह गांव पहुंच जाना चाहता था। उसका गांव बाड़ेगांव यहां से लगभग 6-7 कोस दूर था और रास्ता ऊबड़-खाबड़ जंगली। रास्ते में दवा की दुकान देखकर वह रुक खड़ा हुआ। दुकानदार को मां की स्थिति बतलाया और दवा देने की विनती की। दुकानदार ने दो-चार प्रकार की गोलियां दीं। दवा लेने का तरीका भी बतलाया। दवा बंडी में रखते हुए उसने बीड़ी निकाली। बीड़ी जलाकर धुआं उगलने लगा तब दुकानदार ने शेष बचे पैसे लौटा दिए थे। पास में ही अनी साव की किराना की दुकान थी। उसने दो किलो आटा, पाव भर बेसन, हरी मिर्च, धनिया, प्लास्टिक की थैली में खाने का तेल और प्याज खरीदा। चलते समय उसकी नजर अंडों पर भी पड़ी। उसने अंडे भी बंधवा लिए। आज उसने तबीयत से पिया था, अतः लगा कि अण्डे खाना जरूरी है।

घर पहुंचा। देखा। बच्चे सो रहे हैं। बूढ़ी मां कथड़ी में लिपटी एक कोने में पड़ी है। बीच-बीच में उसके खांसने की आवाज आ जाती थी। शायद यह उसके जिंदा रहने का प्रमाण था। झुनिया, उसकी पत्नी दीवार से पीठ टिकाए बैठी थी। शायद उसके लौट आने का इंतजार कर रही थी। आले में रखा भपका टिमटिमा रहा था और काला धुआं उगल रहा था।

सामान की पोटली झुनिया को देते हुए उसने चूल्हा जलाने को कहा, जो चार दिन से सुकड़ा पड़ा था। उसने बंडी में से गोलियां निकालीं। ग्लास में पानी भरा और फिर मां के करीब बैठते हुए, बांहों का सहारा देकर उसे उठाया। दो गोलियां मुंह में डालीं। पानी पिलाया और फिर बांहों का सहारा देकर लिटा दिया। मां का बदन गरम तवे की तरह जल रहा था।

झुनिया ने चूल्हा जलाया और खाना पकाने में जुट गई। बेसन बना चुकने के बाद उसने आटा मांडा और रोटियां सेंकने लगी। मक्के की मोटी-मोटी रोटियों की गंध से पूरा कमरा धमकने लगा था।

झुनिया ने आवाज दी कि वह बच्चों को उठा लाए। बीड़ी के चुट्टे को जमीन से रगड़कर बुझाते हुए वह बच्चों को उठाने का प्रयास करने लगा। एक को उठा कर बिठलाता, तो दूसरा पसर जाता। दूसरे को उठाता तो पहला पसर जाता। जैसे-तैसे उसने बच्चों को जगाया। झुनिया ने तब तक थाली लगा दी थी। सामने थाली देखकर बच्चे जैसे झपट ही पड़े थे और ठूंस-ठूंस कर रोटियां खाने लगे थे। बच्चों को इस तरह खाना खाते देख बड़ी खुशी हो रही थी। काफी दिनों बाद बच्चों ने खाना खाया था। मारे खुशी के उसकी आंखें डबडबा आईं। खाना खाकर बच्चे पैर तन्ना कर सो जाते हैं।

कचरू उठा और आले में रखे बम्फर को उठा लाया। घर आने से पहले वह एक पूरी शीशी लाला के दुकान से उठा लाया था। उसने ढक्कन खोला। ग्लास में उड़ेला और मां को सहारा देकर उठाते हुए बोला ‘‘बऊ जे थोड़ी सी दवा है- ले ले।’’ दारू की तीखी गंध ने बुढ़िया के बूढ़े शरीर में हलचल पैदा कर दी थी, कांपते हाथों से उसने ग्लास पकड़ा और गटागट पी गई। झुनिया ने थाली लगा दी थी। बमुश्किल बुढ़िया ने एक-सवा रोटी खाकर थाली सरका दी। कचरू को आज बड़ा ही अच्छा लग रहा था कि मां ने बड़े दिनों बाद कुछ खाया है।

झुनिया अब भी रोटियां सेंक रही थी। शायद यह उसकी आखिरी रोटी थी। रोटी सेंककर वह चूल्हे में जलती हुई लकड़ियों को बाहर निकालकर बुझाते हुए कचरू के तरफ मुंह घुमाकर बैठ गई। कचरू को भी शायद इसी क्षण का इंतजार था। उसने ग्लास खंगाला। दारू से भरा और झुनिया की तरफ बढ़ा दिया। उसने सहज रूप से ग्लास ले लिया और एक ही सांस में पूरा उतार दिया।

तीखे-कड़वे घूंट के अंदर जाते ही पेट में हलचल मचनी शुरू हो गई। उसके काले गाढ़े रंग पर, एक और रंच चढ़ आया था, जिसे चाहते हुए भी वह कचरू की नजरों से छिपा नहीं पाई। भपके की टिमटिमाते मद्धम रोशनी में दोनों की नजरें मिलीं। दिल एक बार जोरों से धड़का। अपने आप ही उसकी नजरें झुक आई थीं। लजाते हुए उसने फिर से ग्लास कचरू की ओर बढ़ा दिया था। शायद वह और थोड़ी सी लेना चाह रही थी।

दो-चार घूंट हलक के नीचे उतरते ही वह कुछ दार्शनिक हो चली थी। ग्लास की ओर देखते हुए वह सोचने लगी थी कि कितनी अहम चीज होती है दारू हम आदिवासियों के लिए। अगर दारू का सहारा न मिला होता तो हमारे जंगल में रह पाने की कल्पना ही बेमानी होती। माना कि हम प्रकृति-प्रेमी हैं, तभी तो बियावान जंगल में, जंगली-जानवरों, विषैले कीट-पतंगों के बीच हंसी खुशी से रह लेते हैं। डर नाम की कोई चीज होती है, यह भी भूल जाते हैं। डर तो आखिर डर ही होता है। वह भला किसे नहीं डराता। दिन में अक्सर जंगल शांत रहता है। पर जैसे ही दिन ढलता है, अंगड़ाई लेकर जाग खड़ा होता है। फिर जंगल पूरी तरह जागता रहता है। यदि उसे बीच में झपकी भी आ जाए तो शेरों की दहाड़ के साथ ही वह चौंक-चौंककर उठ बैठता है। कलेजा चीर देने वाली बर्फीली हवाएं भी उसे कंपा जाती हैं। ऐसी भयावह रात में कौन भला यहां रुकना चाहेगा। दिन में पहाड़ भले ही अच्छे लगें, पर अंधियारे में घिरते ही वे दैत्य के-से दिखने लगते हैं। शायद दारू ही ऐसा शक्तिशाली पेय है जो हम आदिवासियों के दिलों में हिम्मत का जज्बा बनाए रखता है। सारे प्रकार के डरों से मुकाबला करने की हिम्मत जुटाए रखती है। शायद यही कारण था कि दारू हम आदिवासियों की दिनचर्या का एक आवश्यक अंग बन गई है। हमारी संस्कृति में रच-बस गई है।

हाथ में ग्लास थामे झुनिया, सिर लटकाए अपने ही विचारों की दुनिया में मस्त थी। कचरू को ऐसा लगा कि कुछ उसे ज्यादा ही चढ़ गई है, तभी तो वह सिर लटकाए बैठी है। उसने उसे झंझोड़ा तब जाकर वह जंगल के तिलिस्म के घेरे को तोड़कर बाहर आ सकी थी। कुछ चैतन्य होते हुए उसने बची हुई दारू को हलक के नीचे उतार लिया।

अब वह थाली लगाने लगी थी। थाली लगाकर उसने कचरू की ओर बढ़ा दिया। कचरू ने खाना खाया और दीवार से पीठ टिकाकर बीड़ी पीने लगा। बीड़ी पीकर वह पास ही पड़ी कथड़ी पर जाकर पसर गया। झुनिया ने भी खाना खाया। जूठे बर्तन समेट कर एक ओर रखते हुए वह भी कचरू के पायताने आकर लेट गई। कचरू ने उसकी बांह पकड़कर अपनी ओर खींचा। वह भी सहज ही उसकी उसकी ओर खिंची चली गई थी। शायद वह इसके लिए, पहले से ही मानसिक रूप से तैयार भी थी। कचरू ने वहीं से पड़े-पड़े आले में जल रहे भपके को फूंककर बुझा दिया। अब उसकी खुरदरी हथेलियां झुनिया के बदन पर फिसलने लगी थीं।

मुर्गे की बांग के साथ ही वह उठ बैठा। बऊ के पास सरकते हुए वह अपनी उंगलियों के पोरों को बुढ़िया के नथूनों तक ले गया। सांसें चल रही हैं यह जानकर उसे अच्छा लगा। उसने मन ही मन बड़े देव को धन्यवाद दिया और बाड़ी में निकल आया।

बाड़ी की ओरती से पीठ टिकाकर बैठते हुए उसने बंडी में से बीड़ी निकाली। चकमच चमकाई। जलता हुआ कपास बीड़ी के मुंह पर लपेटा और फूंक-फूंक करते हुए धुआं उगलने लगा।

बीड़ी को ओठों से एक ओर दबाते हुए उसने बंडी में हाथ डाला। नोटों को निकाला और गिनने का उपक्रम करने लगा। सौ-सौ के चार और दस-दस के पांच नोट अब भी शेष बचे थे। धुआं उगलते हुए वह भावी योजना को क्रियान्वयन करने की सोचने लगा। आज हाट बाजार का दिन है। घाटी के नीचे जमकर बाजार लगेगा। सप्ताह में पड़ने वाला त्यौहार से पहले का बाजार है। ढेरों सारी दुकानें लगेंगी। बच्चों और घरवाली को लेकर वह हाट पहुंचेगा। धन्नु हलवाई की दुकान पर पहुंचकर वह सभी को गुड़ की जलेबी खिलायेगा। फिर बच्चों के कपड़े-लत्ते खरीदेगा। बऊ और झुनिया के लिए साड़ियां खरीदेगा।

दोनों की साड़ियां भी तो तार-तार हो चली हैं। कपड़ों की कमी तो उसके स्वयं के पास है पर इस साल जैसे-तैसे काम चला लेगा। पर अंगोछा जरूर ही खरीदना होगा। सिर ढकने को तो इसकी जरूरत पड़ती ही है। कुछ राशन पानी भी भरना जरूरी है। उसने गणित लगाया कि इन सब पर लगभग तीन-साढ़े तीन सौ खर्च हो ही जाएंगे। बचेंगे डेढ़ दो सौ के करीब। तो वह एक सौ का नोट घरवाली के पास रख छोड़ेगा। आड़े बखत में काम आएंगे। पचास रुपए वह स्वयं के लिए बचाकर रखेगा।

सहसा उसे ध्यान आया कि काला-मुर्गा-नींबू-रेशमी धागे लेना तो वह भूल ही गया। कल बड़ी अमावस्या है। हर साल वह बड़े देव को इसी दिन काला मुर्गा चढ़ाता आया है। भगत इसी दिन धागा मंतर कर देता है। बच्चों के लिए वह धागा बनवायेगा। देव पर चढ़ाने को दारू भी तो लगती है। खैर! दारू तो सारे सगा लोग मिलकर उतारेंगे ही दारू वहीं से मिल जाएगी।

जोड़-घटाने में इतना निमग्न था कचरू कि उसे याद नहीं रहा कि बीड़ी कभी की बुझ गई और झुनिया बर्तन मलने के लिए बाड़े में आ चुकी है। झुनिया ने उसे दो-तीन बार टोका कि वह क्या सोचा रहा है। पर वह तनिक भी ध्यान नहीं दे पाया था।

बर्तन मलते हुए झुनिया ने फिर टेर लगाई। अब की बार उसने ऊंचे स्वर में आवाज दी थी। अपनी काल्पनिक दुनिया से निकलते हुए कचरू हड़बड़ा कर उठ बैठा। झुनिया बर्तन मलते-मलते उसकी इस दशा को देखकर खिलखिला कर हंस पड़ी थी। झुनिया का इस तरह हंसना उसे अच्छा लग रहा था। लगभग दांत निपोरते हुए झुनिया ने ताना उछाला, ‘का सोच रओ थे बैठे-बैठे।’ हलक को थूक से गीला करते हुए कचरू ने कहा, ‘कुछ तो नई, हाट-बाजार से कपड़ा-लत्ता-तीज-त्यौहार का सामान खरीदने वास्ते सोच रहो थो।’

‘रात खें तो खूब मजा मारी तैने।’ झुनिया ने शर्माते हुए कहा।

झुनिया के कठोर मगर उन्नत उरोजों से खेलते हुए तो कभी नितम्बों पर हाथ फेरकर उत्तेजित करते हुए का दृश्य आंखों के सामने एकबारगी घूमने लगा। उसके कान गरम होने लगे थे। सांसें तेज होने लगी थीं। वह और कुछ सोचे, झुनिया ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा, ‘जे ते बता, इत्ते सारे पइसा कहां से लाव तूने।’ पैसों के बारे में पत्नी का पूछना वाजिब था। विगत पन्द्रह दिनों से वह पैसों के लिए, कभी इस गांव तो कभी उस गांव घूम रहा था। गिड़गिड़ाने के बाद भी उसे रकम नहीं मिल पाई थी। आज अचानक इतने सारे पैसों को देखकर उसका पूछना उचित भी था।

कचरू मन ही मन सोच रहा था कि बात कहां से शुरू की जाए। बात छिपाने से कोई मतलब भी नहीं था। अगर वह सही बात, आज भी न बतला पाए तो कल तो सभी पर उजागर होकर ही रहेगी। सारी हिम्मत को बटोरकर उसने अपनी सारी व्यथा-कथा झुनिया पर उजागर कर दी। जब वह अपनी बात कह रहा था, तब उसे यह ध्यान ही नहीं आया कि कथड़ी में पड़ी बीमार मां भी सुन रही होगी। तभी बुढ़िया दीवार का सहारा लेते हुए, हांफते-कांपते झोपड़ी से बाहर निकल आई थी।

‘मने तेरी सारी बातें सुन लई है रे कचरू। जे काम तो तूने कछु अच्छो नइ करो, अरे! मरद जात है बनी-मजदूरी करके काम चला लेतो, पर मेरे मरद की निसानी बेचन को कोई हक नइया तेरे को। मैं इत्तीसी थी (हाथ से ऊंचाई बतलाते हुए) तभे तेरे बाप के संगे बिहा के आई थी। हम दोनों मिलखे पानी डालत थे झाड़न में। दूर नदी से पानी लात थे। तेरे बाप ने ढेर सारी मिट्टी खोद के लाव थो और मैं थाप-थाप के चबुतरा बनाई थी। देखत ही देखत झाड़ बड़े होन लगे। खूब महुआ फरत थो। मैं आंगन लीप के साफ करत थी। ढेर सारो महुआ आंगन में टपकत थे। हम दोनों झन बीन-बीन के सुखा-सुखू के मंधोला में भर के रखत थे और बारो मैना खात थे। एक जोरो अकाल पड़ो थो, महुआ तो थो हमारे पास ना, नई तो हम बचन वारे नइ थे, जब तू तो पइदा भी नइ भव हथो।’

बुढ़िया की आवाज में तलखी थी। दर्द में सनी आवाज थी। बोलते समय वह बीच-बीच में हांफ भी जाती थी। बुरी तरह खांसते-खखोलते वह अपनी व्यथा-कथा को शब्द दे रही थी। कचरू भी अचकचाकर खड़ा हो गया था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या यह वही बऊ है जो विगत पन्द्रह दिनों से बिस्तर से लगी है, इसमें आज अचानक इतना बोलने की हिम्मत कहां से आ गई। वह सोचने लगा था कि बऊ जो कुछ भी कह रही है सच ही कह रही है। उसका सच उसके साथ है। पर आज सच यह है कि उसकी जेब में उसका अपना धन नहीं है जो तीज-त्यौहार पर परिवार के काम आ सके। चाहता तो वह भी है कि उसकी जेब हमेशा नोटों से भरी रहे। पर रकम आए भी तो कहां से। इस साल फसल-पानी भी तो ढंग से नहीं हुई। एक बैल भी ऊपर से मर गया। मां बीमार पड़ी है। उसके दवा दारू को भी तो पैसा चाहिए था। भगत-भुमका तो वहकर ही चुका था। रोज नई परेशानी सामने आकर खड़ी हो रही है। बारह महीने में एक दिन पड़ने वाला त्यौहार भी सामने है। बच्चों के तन पर कपड़ा नहीं है। झुनिया और मां की साड़ियां भी तो जर-जर हो गई हैं। जानता है वह पैसों में कितनी ताकत है। यदि उसने झाड़ बेच भी दिए तो क्या गुनाह किया है। परिवार के लिए ही तो उसने इतना बड़ा सौदा किया है।

बऊ अब तक अर्र-सर्र बके जा रही थी। अब तो वह जमकर हांफने व खांसने भी लगी थी। उसने लपककर बुढ़िया को सम्हाला और पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे बैठ कर आराम करने को कहने लगा।

बड़ी ही असमंजस की स्थिति से गुजर रहा था कचरू इस वक्त। उसका मन हुआ कि रकम लाला को सखेद वापिस लौटा दे। अगर वह रकम लौटा देगा तो झाड़ों के साथ-साथ मां भी बच जाएगी अन्यथा वह भी अपनी जान दे देगी। अगर रकम लौटा देता है तो बच्चे दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे। नंगे, उघाड़े तो रहा जा सकता है, पर पेट खाली हो तो...। किसी तरह उसने मां को समझाया कि वह रकम वापिस कर देगा। आश्वासन पाकर बुढ़िया अब सामान्य होने लगी थी।

बुढ़िया को सहारा देते हुए वह उसे अंदर ले गया। कथड़ी पर लिटाते हुए उसने आले में रखी शीशी को अंटा किया और अभी आता हूं कहकर बाहर निकल गया।

देनवा के किनारे एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ कर उसने ढक्कन खोला। बची-खुची पेट में उतारी। बीड़ी सुलगायी और गहनता से सोचने लगा। सामने बड़ी समस्याओं को देखकर उसने निर्णय लिया कि वह किस्तों में रकम लाला को लौटा देगा। किसी भी तरह वह लाला को पटा लेगा या फिर उसके यहां नौकरी कर लेगा और धीरे-धीरे रकम अदा कर देगा।

सूरज ऊपर तक चढ़ आया था। उसने देखा, नीचे घाटी में जगह-जगह तंबू उग आए हैं। चहल-पहल बढ़ चुकी है। वह समझ गया कि हाट लग चुका है। उसने छोटू को कंधों पर चढ़ाया। दूसरे का हाथ पकड़े वह झुनिया के संग घाट उतर रहा था। ऊपर से देखने में ऐसा प्रतीत होता है, बाजार यह रहा, पर ऊबड़-खाबड़ पथरीली पगडंडियों से चलते हुए पूरे तीन कोस का फासला तय करना होता है। उसने सोचा।

बाजार पहुंचकर, सबसे पहले उसने धन्नू हलवाई की दुकान से गुड़ की जलेबी सबको खिलायी। खुद ने भी खाया। कढ़ाहे में सिंक रही जलेबी की मीठी-मीठी गंध पूरे वातावरण में फैल रही थी। फिर उसने सौदा-सुलफ खरीदना शुरू किया, झुनिया के लिए रिबन-कंघा-चोटी-टिकली, बच्चों के लिए कपड़े, दो साड़ियां, एक मां के लिए दूसरी झुनिया के लिए। कपड़ों की आवश्यकता तो खुद उसके अपने लिए भी थी। वह केवल गमछा खरीदकर काम चलाने की सोच रहा था। पर झुनिया की जिद के आगे उसे अपने लिए धोती-कमीज खरीदनी पड़ी। सभी घरेलू खरीददारी के बाद उसने काला मुर्गा, अंडा-ताबीज व अन्य चीजें पूजा के लिए खरीदीं। जब वह घर पहुंचा तो विशेष खुशी से लबालब भरा हुआ था।

बड़ी सुबह से ही घाटी में चहल-पहल शुरू हो गई थी। हर गांव से स्त्री-पुरुष-बच्चे अपनी-अपने पारंपरिक वेशभूषा में एक जगह इकट्ठा होने लगे थे।

दो-चार-पांच घर को मिलाकर एक गांव होता है। कोई आध-एक कोस दूर तो कोई-कोई एकदम सटे हुए। गोंडीढाना-नीमढाना-सुकलूढाना ऐसे 12-13 गांव (ढाने) एक घाटी में समाए रहते। जब भी तीज त्यौहार पड़ता है सारे सगा लोग एक जगह-इकट्ठे होकर आमोद-प्रमोद मानते हैं।

ढोल-ढमाके, तांसे-तुरही फूंकी जाने लगी थी। स्त्रियां मंगलगीत समवेत स्वरों में गा रही थीं। अब पूजा का समय हो चला था। सारे सगा अब बड़ा देव की पूजा के लिए निकल पड़ते हैं। एक पुराने बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे एक मढ़िया बनी थी। पेड़ के नीचे, तने से सटकर, ऊबड़-खाबड़ काले पत्थरों में आकृतियां उभरी थीं। ये ही आदिवासियों का बड़ा देव है। भीड़ को देखकर, पुजारी का उत्साह, देखते ही बनता था।

ओझा ने पूजा-पाठ शुरू कर दिया। खट्टे फल, नारियल चढ़ा देने के बाद काले मुर्गे की गर्दन मंत्रोच्चार के बाद काट दी गई और गरमागरम खून मूर्तियों पर डाला जाने लगा। फिर महुआ के पत्तों के दोनों में भर-भर कर ताजी दारू। महुआ जब भी फूलता उसकी दारू इस विशेष पूजा में उतारकर सुरक्षित रख दी जाती थी।

मुर्गे की गरदन कटने एवं खून टपकाए जाने के साथ ही ओझा अजीब-अजीब सी हरकतें करता हुआ उछल-कूद मचाने लगा था। अब वह पूरे जोश के साथ उछल-कूद करता हुआ अर्र-सर्र भी बकते जा रहा था। सारे सगा लोग सांस रोके, ओझा के सिर पर सवार देव की आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे थे। फिर ओझा ने वहीं से खट्टे फल उतारकर गांव की सीमाएं बांधना शुरू कर दिया था ताकि कोई बीमारी-महामारी गांव में न घुस सके।

अब लोग बारी-बारी से बाबा का आशीर्वाद पाने के लिए आने लगे थे। कोई गंडा ताबीज बनवाता, तो कोई धुनी राख-भभूत पाकर संतुष्ट हो लेता और झुककर प्रणाम करता और अपनी जगह आकर बैठ जाता। कचरू ने अपने लिए तथा परिवार के लिए बाबा से प्रार्थना की कि वह उन्हें परेशानियों से बचाए। ओझा ने कुछ धागे मंतर कर दिया। एक उसने गले में बांध लिया। शेष बंडी में रखते हुए वह भी अपनी जगह आकर बैठ गया। बाबा का आशीर्वाद उसे संजीवनी की तरह लगने लगा था। लंबी चौड़ी पूजा के बाद अब सभी लौटने लगे थे। जब वे लोग लौट रहे थे तब शाम घिर आई थी।

एक बड़े प्रांगण में सारे लोग जुड़ आए थे। आंगन के बीच में लकड़ियों के ठूंठ जला दिए गए थे। सभी एक निश्चित दूरी पर घेरा बनाकर बैठ गए थे। अब सभी को परसादी का इंतजार था। महुआ के दोनों में भरकर दारू बांटी जाने लगी। एक ने मटकी संभाली, तो दूसरे ने ग्लास। अब नारियल की नारेटी में दारू भरकर सभी के पात्रों में डाली जाने लगी। पान-परसादी कम अथवा ज्यादा मांगने पर प्रतिबंध नहीं रहता। परसादी बंट जाने के बाद, बड़ी-बूढ़ी औरतें खाना पकाने में जुट गईं।

युवक-युवतियों का नर्तक दल नाचने-गाने के लिए बेताब हुआ जा रहा था। सभी नर्तक दल अपनी-अपनी पारंपरिक पोशाकों में सज-धज कर आए थे। जलती हुई लकड़ियों के ढेर के एक तरफ युवतियां तो दूसरी तरफ युवाओं का दल। अर्धचंद्राकार परिधि में एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले थिरकने लगते थे। कभी युवतियों के समूह से, किसी गीत की दो पंक्तियां गाई जातीं तो युवक दल उसका जवाब देता। कभी युवक दल गीत उठाता तो, युवतियां उसे पूरा करतीं। बीच-बीच में हास-परिहास भी चलता जाता था। ढोल-टिमकी की थाप, झांझरों की टिमिक-टिमिक पर सारा नर्तक दल, एक लयबद्ध तरीके से नाचता। सभी के पैर एक साथ आगे बढ़ते-पीछे हटते। अब सामूहिक नृत्य शुरू हुआ। हर युवक की बगल में युवती होती। इस तरह एक लंबी शृंखला देर रात तक थिरकती रही।

सामूहिक नृत्य में कचरू, झुनिया की पतली कमर में हाथ डाले थिरक रहा होता है। नृत्य करते-करते वह रोमांचित हो उठता है। सहज ही उसे बीते क्षणों की याद ताजा हो उठती है। ऐसे ही एक सामूहिक नृत्य में दोनों एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरक रहे थे। दोनों की नजरें एक दूसरे की दिल की गहराईयों में उतरकर दोनों को मदहोश किए जा रही थीं। जी भर नाचे थे दोनों। पल-दो-पल के नृत्य में इस छोटे से परिचय ने अपना विस्तार लेना शुरू कर दिया था। मन ही मन वे एक दूजे के हो चुके थे। एक दिन वे दोनों घर से भाग भी खड़े हुए थे। सगा समाज में यदि लड़की-लड़के को भगा ले जाए तो यह समझा जाता है कि वे शादी के बंध में बंधने को तैयार हैं। फिर समाज की बनी परंपरा के अनुसार शादी करा दी जाती थी। शायद दोनों ही पुरानी यादों को ताजा करते हुए रोमांचित हुए जा रहे थे।

पांच दिन तक चलने वाले इस उत्सव का एक-एक क्षण, एक-पल पल, प्यार, समर्पण, सहयोग-सदाचार के साथ संपन्न होता है।

कचरू विगत दो दिनों से अपनी झोपड़ी के बाहर नहीं निकल पाया था। शायद वह अपनी थकान मिटा रहा था। जब भी मूड होता, चढ़ा लेता और टुन्न होकर पड़ा रहता अथवा दोस्तों के साथ मछली मारने निकल पड़ता। उत्सव का सारा खुमार अब उतार पर था। सारे लोग अब अपने-अपने काम धंधे पर निकल पड़े थे।

गहरी नींद में सोया था कचरू। उसने एक भयानक सपना देखा। लाला के लोग हाथों में कुल्हाड़ियां गंडासे लेकर आ धमके हैं। कचरू झाड़ काटने के लिए मना कर रहा है। लाला के लोग मान नहीं रहे हैं। वे झाड़ काटने के लिए उतावले हुए जा रहे हैं। कचरू गिड़गिड़ा रहा है। उसने अब लाला के पैर पकड़ लिए थे। लाला भी तैश में था। भला इतनी बड़ी रकम देकर उसने सौदा पक्का जो किया था और अब वह पिछले दो-तीन बार की तरह खाली हाथ लौटना भी नहीं चाहता था। लाला ने उसकी अनुनय को ठुकराते हुए, उसे परे धकेलते हुए अपने आदमियों को झाड़ काटने की आज्ञा दी। बस क्या था। दनादन चोटें वृक्षों पर चलने लगी थीं। कचरू को ऐसा लगा कि वार वृक्षों पर न पड़कर उसके शरीर पर पड़ रहे थे। वह एक चीख के साथ उठ बैठा था।

आए दिन उसे भयानक सपने घेरने लगते थे। झुनिया भी समझाती पर उसकी समझ में आने से रहा। जानता है वह अपना भविष्य कि कल क्या होगा। उसकी हर रात दहशत में कटती, तो दिन बेचैनी के साथ।

सुबह सोकर उठ ही पाया था कि लाला के लोग आ धमके। सभी के हाथों में कुल्हाड़ियां-गंडासे मजबूत रस्सियों के बंडल थे। दल के मुखिया ने आगे बढ़कर झाड़ काटने का हुक्म दिया। दल आगे बढ़ने लगा।

कचरू ने मुखिया के पैरों में गिरते हुए कुछ दिन की और मोहलत मांगी। उसने और मोहलत देने से इंकार कर दिया था। वह नहीं चाहता था कि बार-बार ही एक बात दुहराई जाए।

दहाड़ मारकर रो पड़ा कचरू । अपने वृक्षों को बचाने के लिए वह गुहार लगाता रहा। अब उसके साथ-साथ उसके बीवी बच्चे भी जुड़ आए थे।

वृक्षों पर पड़ती कुल्हाड़ी की चोटों की आवाज, जिस पर परिवार के चीखने चिल्लाने की आवाज सुनकर आस-पास के गांवों के लोग अपने-अपने हाथों में तीर कमान, लठ-भोंगा लेकर दौड़ पड़े।

माहौल में उत्तेजना भरती जा रही थी। चारों तरफ घेरो-पकड़ो मारो के सम्मिलित स्वर हवा में गूंजने लगे थे।

लोग जमकर लाठियां बरसाने लगे थे। कोई वार करता तो कोई बचा कर ले जाता। देखते ही देखते लोगों के बीच सर फुटव्वल होने लगी थी।

एक हट्टे-कट्टे लौंडे ने कचरू पर भरपूर वार उछाला। लट्ठ सांय-सांय करता हुआ कचरू की ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक बुढ़िया बीच-बचाव की मुद्रा में आकर खड़ी हो गई। कोई नहीं जानता कि वह कब झोपड़ी में से निकली और कब बीच में आकर खड़ी हो गई।

हवा की परतों को चीरता हुआ लट्ठ तेजी से आया और बुढ़िया की कनपटी पर लगा। एक मिनट भी नहीं बीता होगा कि बुढ़िया जमीन पर भरभराकर गिर पड़ी और तड़पने लगी।

वार करने के लिए उठे हाथ-बीच में ही रुक गए थे। सभी सांस रोके बुढ़िया को तड़फता हुआ देख रहे थे। हर किसी के मन में ये प्रश्न फन उठाए डोल रहा था कि वे आए थे किसी और काम से, पर हो क्या गया है

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103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

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समय

समय प्रतीक्षा करता नहीं किसी की,

घड़ियां सदा चलती रहती हैं उसकी,

वर्षा ,धूप ,सर्दी, गर्मी सब रूक जाती,

समय की गति कभी नहीं रूक सकती।

गम भी आते रहते,खुशियां भी आतीं रहतीं,

अपना-अपना जोर दिखाकर सब चली जाती,

समय की गति है, जो कभी भी नहीं है रूक सकती,

गतिमान है वह ,जो तीव्र गति से चलती है रहती ।

सखा-मित्र आते और जाते हैं रहते,

सुख-दुख तो छाया बनकर ही रहते,

दिनरात कभी अपना वक्‍त नहीं बदलते

वक्‍त के हाथों वक्‍त को ही छुपाये हैं रखते ।

एक-एक बूंद से है रीता धट भर जाता,

इक पल ,मानव की जिन्‍दगी है बदल देता,

मत करो गुमान इस मनुष्‍य योनी का भ्राता,

हर सुख दुख देने वाला है केवल इक विधाता

 

प्रभु-मिलन की चाह

राहें इतनी आसान नहीं,

कि जल्‍दी से उनको मैं लांघ सकूं,

कंटकाकीर्ण देखती जब राह को हूं,

कांटे निकालने बैठ जाती हूं

कंटक जैसे ही दूर हटते,

जमीन कीचड़ से लबालब हो जाती है,

कीचड़ को दूर करने हेतु,

पत्‍थर जमीन में बिछाने की जो कोशिश करती,

चहुं ओर से विषैले जानवर आ जाते हैं।

जानवर हटाने का प्रबन्‍ध जैसे करती,

अन्‍य विपदा आकर घेर लेती मुझको है

प्रभु मैं कैसे तेरे पास जाती,

राहें इतनी आसान नहीं,

कि जल्‍दी से उनको लांघ जाऊं।

हालांकि यह भी सच है,

बहती धारायें केवल भ्रम की हैं,

भ्रम में पड़कर खो जाती हूं

मायामोह के विषम जाल में,

विपदाओं को आमंत्रित करती स्‍वयं हूं,

दोष देती हूं प्रभु तुझको।

प्रयास करुंगी,राहों को आसान बनाऊं

प्रभु तुझसे मिलकर इस जन्‍म को धन्‍य बनाऊं

 

मुक्‍तक

• पत्‍थर की दीवारों में भी ,सीना हुआ करता है,

सुन्‍दर महल कांच का ,नाजुक बहुत ही होता है,

पत्‍थर की दीवारों में ,सीने में दिल छिपा होता है,

षीष के महल में ,दिल पत्‍थर का हुआ करता है ।

 

• दीवारें पत्‍थर की ,समझतीं जज्‍बातों को तो हैं,

महल शीश के कुचलते जज्‍बातों को ही तो हैं,

पत्‍थर की दीवारों मे सच्‍चे दिल से आतिथ्‍य सत्‍कार हुआ करता है,

शीशे के महल में दिखावे से भरा मखमली सत्‍कार हुआ करता है।

 

• पत्‍थर के घरों में मस्‍तिष्‍क वाले रहा करते हैं,

महल शीशों वाले मस्‍तिष्‍क का कारोबार करते हैं,

उपयोग कर ,चांदी के टुकडों का धन्‍धा बढ़ाते हैं,

उपभोग करके उनका ,दिल तोड़ दिया करते हैं।

 

अश्कों की व्‍यथा

मासूम चेहरों को,,भीषण अत्‍याचारों को सहते खूब देखा है

मधु .मुस्‍कानों को अश्कों में , बदलते हुए तेा खूब देखा है

दीनों पर धनवानों को, यंत्रणायें देते हुए तेां बहुत देखा है

अफसोस कभी अश्कों को ,मुस्‍कानों में बदलते नहीं देखा है।

यूं तो हंसते सभी दिखाने को इस जग में हैं

मखमल में लिपटे हुए दिखावा हंसी हंस लेते हैं

अन्‍त-स्‍तल में दर्द को बिठाये कितना बैठे सब हैं

कुछ तो अपने कर्मों से कुछ मजबूरी में हंसते हैं ।

हर इन्‍सान समझता इस जग में चतुर अपने आपको है,

भूल जाता वह जहां में रहने वाले असंख्‍य चतुरों को है,

जेा भी आया यहां ,मस्‍तिष्‍क तो दिया भगवान ने सबको है,

कोई उससे सृजन करता,कोई बढावा देता आतंको को है ।

सीता का करके हरण रावण ने,जहां में मिटा दिया नाम अपने को है,

राम ने वध करके रावण का,पहुंचा दिया स्‍वर्ग मार्ग उनको है

राम ने अग्‍निपरीक्षा लेकर सीता की किया सार्थक नाम अपने को है,

थे जो मर्यादा पुरुषोत्तम वे राम, गिरने नहीं दिया अपनी मर्यादा को है ।

राजपाट को त्‍याग कुटिया में रहकर थी सबने उनको हंसते देखा है,

मत दो गम किसी को भैया,मुफ्‌त में ही मिलता पिटारा वह सबको हैं,

अश्कों को पोंछ सको तो पोंछों,छुपानेे मत दो अपने अन्‍त.स्‍तल में तुम उनको,

बदल सको तो मुस्‍कानों में बदलो तुम, इन लाचार व्‍यथित अवाक्‌ अश्कों को

मासूम चेहरों को भीषण अत्‍याचारों को सहते खूब देखा है

मधु..मुस्‍कानों को अश्कों में , बदलते हुए तेा खूब देखा है

दीनों पर धनवानों को , यंत्रणायें देते हुए तेां बहुत देखा है

अफसोस कभी अश्कों को, मुस्‍कानों में बदलते नहीं देखा है।

 

ताकत की होड़

सूरज कहे चंदा से मेरी ताकत तुझसे ज्‍यादा,

चंदा कहे तू क्‍या समझे मेरे आगे तू है प्‍यादा,

हवा कहे तुम दोनों चुप हो,मैं ताकतवर हूं सबसे,

बादल कहे तुम क्‍या जानो,मेरी ताकत आगे है सबसे।

मची होड़ सबमें भयंकर चले सभी ताकत आजमाने,

सूरज ने दिखलाई प्रचण्‍डता,लगे सभी जन बौखलाने,

चंदा ने दी जब भरपूर शीतलता ,लगे सभीजन ठिठुराने,

क्रोधित होकर ताकत अपनी दिखलाई जब बादल ने,

कहीं बाढ औ कहीं गर्जना,डूबे असंख्‍य बच पाये नहीं मौत से।

मेरी ताकत ,तेरी ताकत,किसकी ज्‍यादा,किसकी कम है,

सारी धरा पर सुनलो सब जन,इसी बात का ही इक गम है,

किसी को कम मत तुम समझो, सबको होशियार समझो अपने से,

अपने झान को दूजों को बांटो, अच्‍छी अच्‍छी बातें सीखो दूजों से,

ष्‍श्‍ ताकत की इस होड़ में बन्‍धुओं अपने आपको नष्‍ट मत करो,

मिलकर रहो इस धरा पर, मानव का जीवन सार्थक तुम करो ,

ईर्षा,क्रोध,मद,औ लोभ को दूर भगाके, जीवन में सद्‌कर्म करो,

ताकत की इस होड़ में बन्‍धुओ अपने आपको नष्‍ट मत करो

ताकत की इस होड़ में बन्‍धुओ, व्‍यर्थ तुम बर्बादी को न बुलाओ,

तकनीकों का ज्ञान बढ़ाओ,रु स औ अमेरिका से आगे तुम जाओ ,

बडो आगे बुद्धि औ दिमाग से,आतंकवाद,लूटपाट को दूर भगाओ,

भारत की पावन भूमि को,अपने पावन संस्‍कारों से तुम सजाओ।

 

अभिलाषा

मैं दीया नहीं सोने का,न चांदी न हीरे का हू,

मैं तो दीपक केवल ,पैरों की पावन माटी का हूं,

स्‍वजनों परिजनो के सच्‍चे प्रेम का तेल डालती हूं,

परोपकार की बाती से सदा उसको जलाती हूं।

जितना पावन प्रेम का तेल मिलेगा,

उतना दीपक प्रज्‍जवलित रहेगा,

गर अपनों का प्रेम न मिलेगा,

यह दीपक बुझ ही जायेगा।

दीपक को इक दिन तो बुझना ही है,

गर पाकर प्‍यार सभी का यह बुझता है,

जलना उसका सार्थक हो सकता है,

सार्थकता अब बस हाथ आपके है ।

 

होली

हाय हाय हाय होली आई रे आई रे होली आई रे,

तरह-तरह के रंग भरे हैं मेरी अद्‌भुत पिचकारी में,

तरह- तरह के रंग भरे हैं मेरी अद्‌भुत पिचकारी में,

आई रे आई होली आई रे आई रे आई होली आई रे।

क्षितिज कहे इक छत केनीचे,क्षितिज कहे इक छत के नीचे,

सारे इकट्‌ठे हो जाओ रे, भैया सारे इकट्‌ठे हो जाओ रे ,

गंगा बोले,जमना बोले,सारे मेरे रंग मे मस्‍ती से रंग जाओ रे,

पानी का कोई रंग नहीं होता,मानव कोई अलग नहीं होता रे।

भेदभाव को दूर हटाके,मन के सारे मैल मिटाके,

प्‍यार के रंग से भरके पिचकारी रंग दो चुनरिया सारी रे,

ईर्षा ,क्रोघ और बैर भगाके,ईर्षा, क्रोघ और बैर भगाके,

प्‍यार भरा इक जाम यू पीके रंग दो चुनरिया सारी रे ।

इक दिन होली ब्रज में होवे, इक दिन वृन्‍दावन में,

कृष्‍ण रंग में मग्‍न हो जायें बडे प्रेम से होली खेलें,

खूब पीटे हैं नर नारियों से लम्‍बी-लम्‍बी छडियों से

बच्‍चे बूढ़े सब इक रंग में रंग जायें मन से खेलें होली रें,।

हाय हाय हाय होली आई रे आई रे होली आई रे,

तरह-तरह के रंग भरे हैं मेरी अद्‌भुत पिचकारी में,

तरह- तरह के रंग भरे हैं मेरी अद्‌भुत पिचकारी में,

आई रे आई होली आई रे आई रे आई होली आई रे।

 

जज्‍बात

जज्‍बात शब्‍द बहुत छोटा है, अर्थ छुपे उसमें बहुत ही गहरे हैं,

जज्‍बातों को समझना भी अमानवीय जनों की बुद्धि से कहीं परे है,

जज्‍बातों से खेलना तो आसान है, समझने में उनको पड़ते दौरे हैं ,

कद्र करे जो सबके जज्‍बातों की , उसके लिये मोहरे ही मोहरे हैं।

मोहरे से तात्‍पर्य सुख शान्‍ति घैर्य औ संतोष से है,

जिसे पा सकना बहुत ही कठिन दिखाई देता है,

जो पा लेता है धन्य खुद को वही समझ सकता है,

कद्र करें जज्‍बातों दूजों की जो धन्य वही हो सकता है।

जज्‍बात नहीं मिट्‌टी का ढेला, खेले कूदे औ फेंक दें उसे अकेला,

जज्‍बात नहीं है चाट का ठेला,खाया पिया फेंक दिया इक शोला,

जज्‍बातों की कद्र करे गर सहेला, जीवन बन जाये इक सुन्‍दर मेला

जज्‍बातों को ठेस लगे गर,जीवन बन जाये इक मौत का झूला।

 

होली

जितने रंग इस होली के हैं,उतने रंग इस जीवन के हैं,

लाल रंग लालिमा है देता, सबके दिल को है हर्षा देता,

हरा रंग है हरीतिमा लाता ,मन की बगिया खिलाके जाता,

पीला रंग षुभ संकेतों को देता,नई-नई जोडियां है बनातां।

रंग सफेद है षांति प्रदाता, काला रंग शनि महाराज को है भाता,

रंग गुलाबी की बात करो मेरे भ्राता,जो खुशियों से सबको रंग देता

खुशियां भर सबकी झोली में, मन सबका उज्‍जवल कर दो मेरे दाता

मन के सारे मैल मिटाके शुद्ध ह्रदय से, मिले हर कोई हंसता गाता ।

हंसने में कोई मोल न लगता, दिल का भार हल्‍का ही हो जाता,

दुःख का कमरा तो हर धर मे होता ,उसे सजाता कोई न दिखता ,

भिन्न-भिन्न की समस्‍याओं के उपहारों से,वह तो खुद ही सज जाता,

शुद्ध भावना रखने वाला,सबके ह्रदय को निर्मल और स्‍वच्छ है करता।

जितने रंग इस होली के हैं,उतने ही रंग का जीवन है होता,

सब रंगों को साथ मिला के प्रेम का प्‍याला तैयार है होता ,

हर घूंट में नशा बड़ा होता,गर प्रेम से इसको पीया गया होता

यह जीवन इक स्‍वर्ग बन जाता,सब विपदाओं का नाष हो जाता

जितने रंग इस होली के हैं,उतने रंग इस जीवन के हैं,

जितने रंग इस होली के हैं,उतने रंग इस जीवन के हैं,

 

केन्‍द्रीयकरण

केन्‍द्रीयकरण इक मंत्र है , गर वो फूंका जाये

सब जन स्‍वकेन्‍द्रित हो जायें,ह्रदय षून्‍य हो जाये

ह्रदय शून्‍य हो जाये , तबाह सब कुछ हो जाये

हवा पानी जो बन्‍द हो जाये इन्‍सान भूखा मर जाये

सूरज गर रश्मियां न फैलाये,सितारे गर न टिमटिमायें,

चंदा शान्‍ति गर न देवे,सागर प्रतिबन्‍घित जल को करले,

वसु भार ढोना जो छोड़ दे,मानव अस्‍तित्‍वहीन हो जाये,

केन्‍द्रीयकरण वह मंत्र है,जो सबको ह्रदयहीन करता जाये।

केन्‍द्रीयकरण को दूर भगा ,मिलजुल कर हे मानव तुम जीयो,

प्‍यार बांटो तुम दिल खोलकर भाई-भाई सबको तुम समझो,

सुख-दुख बांटो सब इक दूजे का ,पर पीडा का हरण करो,

मानव की योनी है मुश्किल, कीमत सदकर्मों से उसकी अदा करो।

 

मेरा देश भारत

मेरा देश भारत है

जो समस्‍याओं का देश है

समस्‍याओं की लहरें

आती हैं तीव्रगति से

एक समस्‍या खत्‍म होती है

दूजी आ जाती है

राम मन्‍दिर समस्‍या

थी जटिल समस्‍या

निराकरण में उसके

लग गईं सारी शक्‍तियां

आंखें गढी रहीं

सबकी उसके निर्णय पर

आखिर निर्णय हुआ जून 10 में

प्रसन्न हो गये सब

पटाखे चल गये

मिठाइ्रर्यां बंट गईं

खूब शंखनाद हुआ

आल्‍हाद का संचार हुआ

परन्‍तु समस्‍या तो समस्‍या है

फिर वह आगई सबके मन में

2011 में मस्‍तिष्‍क घिर गया

फिर इस समस्‍या से

राम मन्‍दिर मुद्‌दे को फिर

बना दिया गया भीषण मुद्‌दा

कोशिश की जा रही है

भुनाने की उसको ।

उससे भी भीषण आगई

इक घोर समस्‍या

नाम है उसका लोकपाल विघेयक

लोकपाल या लोकनाश है ये विघेयक

कुछ भी हो फिलहाल बन गई है

बहुत बडी इक मुश्किल

बाबा रामदेव ने लगाई पूरी ताकत

सरकार ने कर दी

खराब यूं उनकी ही हालत

अन्ना हजारे भी आ गये उग्रता में

अनशन का तैयार किया

भयानक मसविदा उन्‍होंने

मनमोहन सिंह जी ने भी दिखाई सख्‍ती

लोकपाल विघेयक में शामिल

होने में दिखाई नहीं बेरुखी

देखिये अब इन समस्‍याओं का अन्‍त क्‍या होगा

अन्‍त होगा भी या नहीं होगा

पर यह निश्चित है

अन्‍य समस्‍यायें आयेंगी

घबराइये नहीं

स्‍वागतार्थ तैयार रहिये

आपको भी अपने में मिलाके ले जायेंगी ।

 

बूढी मां

फैलाकर आंचल बैठी रहना,दो शब्द प्रेम के सुनने को तुम तरसती रहना,

रैना बीते लाल मेरो मिलन मोहे आये,खिड़कियां में निहारते बैठी रहना,

गर क्रोघित हो दो बोल बोल दिये,पापिन,दुष्‍टा कहलाओगी,

जहर का चुपचाप कडवा घूंट पीकर सहनशील कहलाओगी,

यह जीवन इक व्‍यस्‍त जीवन है,समय कहां किसी को तुम्‍हारी सुनने का,

पागलपन है कुछ अपनी कहने का,समय तुम्‍हारा है सिर्फ चुप रहने का,

घर आंगन गर महकाना चाहो,दिल पर पत्‍थर अपने रख लो,

हर कारज में खुशी दिखाओ,सलाह-मशविरा दूर भगाओ,

नहीं जीवन है इतना सस्‍ता,सुखी रहने का तुम अब ढूंढा रास्‍ता,

चाहत से सुख कभी न मिलता,अन्‍तःस्‍तल में ही सुख है बसता ।

 

मन और वाणी

अबोली भाषा मन की , हर बात बोल देती है,

सुलझें न सुलझें गुत्‍थियां,हर राज खोल देती हैं ।

अवाक रहकर जमाने को देखते ही रहिये,

अन्‍दर की बात ओठों तक आने न दीजिये,

मन औ जिगर की भाषा पहचान में आने न दीजिये,

अपनी हर बात को अन्‍तःस्‍तल में समा के ही रखिये ।

जमाना इतना अच्‍छा नहीं,कद्र तुम्‍हारे विचारों की करे,

फुर्सत कहां किसी को,बात जिगर तुम्‍हारे की वो सुने,

लभ पर आकर कोई बात,क्‍यों ठिठोली जग की यूं बने,

जहां मेला है मखमली,बात क्‍यों कोई सज्‍जनता की सुने।

नयनों में रखो स्‍थिरता, चलने उनको न यूं दीजिये,

चलकर दूजों के हाथ में बिकने का मौका न दीजिये,

े अभिराम ,विराम की भाषा को अंर्तज्‍योति में समेटे रहिये,

नयनों के अश्क नयनों से बाहर कभी आने न दीजिये।

जालिम है यह दुनिया,लूट लेगी कब किसकी जिन्‍दगी ,

हस्‍ती मिट जायेगी ,डूब जायेगी तुम्‍हारी जीवन किष्‍ती ,

जीयो न तुम जिन्‍दगी, यूं बन कटी हुई इक पतंग सी ,

जो भी मिले भर दो प्‍यारे मीठे बोल से उसकी झोली।

मिश्री प्‍यार की घोलिये, मत उसमें अपने आपको डुबाइये,

सराबोर होकर भी अपने आपको अलग ही बनाये रखिये।

 

बच्‍चों को सीख

आलोचना,प्रत्‍यालोचना,औ समालोचना,

तीनो की ही होनी चाहिये सराहना।

आलोचना कमियों कों है प्रदर्शित करती

प्रत्‍यालोचना कमियों का है विश्लेषण करती

समालोचना कमियों को है सही रुप देती।

आलोचनाओं से निराश कभी न होना,

मन अपने को कमजोर कभी न करना

द्रढ. निश्चय से सदा तुम लडते रहनाश्‍,

हर गल्‍ती से शिक्षा तुम हमेशा लेना।

 

मानव स्‍वभाव त्रुटि करना है

महानता उसे स्‍वीकार करना है

त्रुटियों को अपना शिक्षण स्‍थल तुम समझो

सदाचरण से अपना आंचल तुम भर लो

तभी यशकीर्ति इस जग में प्राप्‍त कर पाओगे

उज्‍जवल भविष्‍य तुम अपना बना पाओगे ।

 

मानव - जीवन

क्‍या सोचा,क्‍या किया औ क्‍या पाया,

मानव जीवन हे मनवा तूने यूं ही गंवाया ।

खुद ही खुद में मस्‍त रहा,जीवन का अर्थ तू समझ न पाया,

लेता रहा जिन्‍दगी भर सबसे,देने को हाथ कभी बढा न सका।

अपनी तो क्‍या बात है तेरी,घर अपने का बना रहा तू प्रहरी,

‘पर' निकाल अपने मन से तू ‘स्‍व' पर सदा करता रहा सवारी।

आदर्शों औ सिद्धान्‍तों का चोला पहनकर लूट मचायी तूने अन्‍तस्‍तल से,

मन का टोका तूने न जाना,दुखी हुआ चाहे अर्न्‍तमन से।

लोभ,मोहमाया के जाल में फंसकर जलता रहा भाई.बन्‍धु से,

इस लोक को तू संवार न सका,गिला क्‍या कर सकेगा परलोक से।

चकाचौंध इस जग की देख भटक रहा तू बीच राह में,

सही गलत का भेद न जाना छला जा रहा अपने आप से।

पर बिगडा कुछ अभी भी नहीं है गर मुक्‍ति पाले पापी मन से ।

परोपकार की सीढी चढकर जरुरतमन्‍द की झोली भरदे दान से ।

जो बोयेगा वह काटेगा,नहीं तो मनवा फिर पछतायेगा,

सद्‌कर्मों से लोक सुधरेगा,परलोक में भी लेखा लिखा जायेगा।

 

नुक्‍स निकालने वाला अधिकारी

नुक्‍स निकालने वाला अधिकारी हूँ मैं,

मीन मेक में दक्षता की डीग्रीधारी हॅूं मैं

कर्तव्‍यों को नहीं ,अधिकारों कों पहचानता हूँ,

स्‍वयं सुखी भवः के सिद्धान्‍त को अपनाता हूँ।

यह भी ठीक नहीं,वह भी ठीक नहीं, ऐसा नहीं, वैसा नहीं,

तुम्‍हारा कोई काम ठीक नहीं की रट लगाये रहता हूँ,

मीन मेक में पूर्णरुपेण दक्षता रख स्‍नातकोत्तर डिग्रीधारी हूँ,

नुक्‍स अधिकारी नाम है मेरा, नुक्‍स निकाला करता हूँ।

मक्‍खी बनकर घूमता हूँ, सबके नुक्‍स निकालता हूँ,

नुक्‍स अधिकारी नाम है मेरा,खुद ऐश से जीता हूँ,

जरुरत नहीं समझता,मेहनत और मशक्‍क्‍त करने की,

पारखी हूँ मीनमेख निकालने का,सबको मैं खटकता हूँ

चींटी बनकर लगे रहो कारज में,

मक्‍खी बनकर मैं हंसी उडातां हू।

याद रखो चींटी कितनी भी तेज चले,

मक्‍खी का उससे कोई मुकाबला महीं,

खुशफहमी है मुझको,मैं अत्‍यधिक अक्‍लमन्‍द व्‍यक्‍ति हूँ,

कितना करे कोई काम अच्‍छा,मैं नुक्‍स निकाल देता हूँ ,

बीबी खाना कितना अच्‍छा पकाये,मैं नुक्‍स निकाल देता हूँ ,

सजाधजा घर कितना हो,डस्‍टबीन देख शोर मचाता हूँ।

सरकार बनाये कुछ भी नियम,विरोध बेहिचक करता हूँ,

कोई प्रपोजल कुछ भी बनाये, मैं कमी निकाल देता हूँ ,

जब प्रपोजल मै खुद बनाता, वैसा ही पेश कर देता हूँ,

अपने अन्‍दर नहीं झांकता,औरों को देखता रहता हूँ।

झूठ बोलना धर्म है मेरा, दूजों को झूठ नहीं बोलने देता हूँ,

चौकन्ने रहते सभी हैं मुझसे, क्‍योंकि सभी की पोल मैं खोल देता हूँ

मीन मेख में पूर्णरुपेण दक्षता रख स्‍नातकोत्तर डिग्रीधारी हूँ,

नुक्‍स अधिकारी नाम है मेरा, नुक्‍स निकाला करता हूँ।

 

माँ

सारे दर्दों को अपने अन्‍दर समाहित करने वाली है केवल मां,

तभी तो हर दुख दर्द में मुख से निकलता है केवल इक मां,

ऊर्जा को देने वाली,सच्‍ची पथ प्रदर्शक है बस इक मां,

तभी तो , तभी तो जड़ को भी चेतन बना देती है मां।

समन्‍दर बनकर अश्रुरुपी सरिताओं को अपने अन्‍दर समेट लेती है बस मां

सहनशीलता वसुन्‍धरा सी गम्‍भीरता आकाष सी रखती है केवल इक मां,

समन्‍दर सी लहरों सी कल-कल कर बहती रहती है केवल इक मां,

तभी तो बच्‍चों को संघर्षों में जीवन जीना सिखाती है बस इक मां।

खुद भूखी रहकर भी बडे प्‍यार से बच्‍चों को खिलाती है केवल इक मां,

सुखकर्ता ,दुःखहर्ता ,पथगामिनी, सुभाषिणी, सुहासिनी है केवल इक मां,

मां जानकी,मां यशोदा,मां पार्वती,मां टेरेसा जैसी बने जहां की हर इक मां,

धैर्यशील,मृदुलतांमयी,वात्‍सल्‍यमयी,कर्मठी और शक्‍तिशाली बने हर इक मां।

हर बाधा को चूर-चूर कर,अग्‍निपथ मे कूद-कूद कर,

जग को कठिन परीक्षा देकर,सफलता को चूमे हर मां,

सुनामी लहरें बनकर घातक रुप धारण न करना कोई मां,

कैकई बनकर राम रुपी बच्‍चों की खुशियां न छीनना कोई मां।

जो हैं मॉयें,जो नहीं हैं वे भी बनेंगी इक दिन मांयें,

सबके अन्‍दर सब गुण हैं,बहुत प्रतिभाशाली हैं, सहनशील हैं ये मांयें ।

दुआ प्रेम की सबसे है,सभी पहुंचो उस सीमा वर जिसके आगे राह नहीं,

सब माताओं के लाल पहुंचे उस स्‍थल पर,जिससे ऊॅचा कोई स्‍थल नहीं।

--

प्रेम मंगल

कार्यालय अघीक्षक स्‍वामी विवेकानन्‍द इंजीनियरिंग कॉलेज इन्‍दौर म.प्र.

सेवानिवृत्त संभागीय लेखाकार,मण्‍डलीय कार्यालय,

इंदौर

होनी

‘बाबूजी ,कुछ रुपयों की मदद कर दो । बहू को सात माह का गर्भ है । कसाई पीलिया उसके प्राण लेना चाहता है ।' मंगल ने अपने रइर्स रिश्‍तेदार से याचना की ।

‘तुम्‍हारा बेटा कुछ इंतजाम नहीं किया ? ' रिश्‍तेदार ने सवाल किया ।

‘इंतजाम में ही परदेश गया है । कुछ रुपए भेजा भी था । उसे क्‍या मालूम था ये आफत आ जाएगी ।'

‘तो उसके भेजे रुपए कहां चट कर दिए । '

‘एक पाई नहीं उजाड़ा बाबूजी ।सब बहू के दवा -दारू में लग गए ।'

‘मुझसे हजार रुपए से अघिक की मदद न होगी। मेरे भी दिन इस समय अच्‍छे नहीं चल रहे हैं ।'

‘लेकिन मैं आपके पास बड़ी उम्‍मीद लेकर आया था । पाई -पाई चुका दूंगा बाबूजी । फिर मेरे जान-पहचान , नात रिश्‍तेदारों में आप -सा सबल कोइर् और नहीं है ।'

रइर्स रिश्‍तेदार ने पांच-पांच सौ रुपए के दो नोट थमाए और चुपचाप अपने दूसरे कामों में लग गया ।यह उसका मौन उत्‍तर था जिसे मंगल ने भी समझ लिया था ।

अगले दो दिन बाद मंगल के घर दिवंगत के नाम पर इकटठी हुई साड़ियों में उसकी दी साड़ी सबसे मंहगी थी ।उसे मंगल को सौंपते हुए उस रईस रिश्‍तेदार ने मंगल को सीने से लगा लिया और कहा , ‘मंगल , होनी को कौन रोक सकता है ?'

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सुरेन्‍द्र कुमार पटेल

वार्ड क्रमांक -4,

ब्‍योहारी जिला - शहडोल म0प्र0

484774

ईमेल surendrasanju.02@gmail.com

साक्षात्कार.

अपनी असफ़लता का स्वाद चख चुके बाकी के प्रतियोगियों ने उसे घेर लिया.   वे सभी इस सफ़लता का राज जानना चाहते थे. आत्मविशवास से भरी उस युवती ने कहा=" मित्रों...मैंने अपनी छोटी सी जिन्दगी में कई कडे इम्तहान दिए है. मैं बहुत छोटी थी,तब मेरे पिता का साया मेरे सिर पर से उठ गया. माँ ने मेरी पढाई-लिखाई का जिम्मा उठाया. उसने कड़ी मेहनत की. घरॊं-घर जाकर लोगों के जूठे बर्तन साफ़ किए. घरों में पॊंछा लगाया. रात जाग-जाग-जाग कर कपड़ों की सिलाई की .इस तरह मेरी आगे की पढाई चल निकली.लेकिन बूढी हड्डियाँ कब तक साथ देतीं. एक दिन वह भी साथ छोड़ गयी. पढने की ललक और कुछ बन दिखाने की जिद के चलते, मुझे भी घरों में जाकर काम करना पडा. इन कठिन परिस्थियों में भी मेरा आत्मविश्वास नहीं डगमगाया. जिस साक्षात्कात की बात आप लोग कर रहे हैं, वह तो एक मामूली सा साक्षात्कार था. बोलते हुए उस युवती के चेहरे पर छाया तेज देखने लायक था.

प्रतियोगिता.

चित्रकला प्रतियोगिता चल रही थी .कई चित्रों में से दस चित्रों को अलग छांटकर रख दिया गया था. इन्हीं दस में से किसी एक चित्र को पुरस्कृत दिया जाना था. इन दस चित्रों में एक चित्र ऎसा था जो सभी का ध्यान आकर्षित कर रह था. उसकी सबसे ज्यादा संभावना थी कि वही प्रथम घो‍षित किया जाएगा.

जब परिणाम घो‍‍षित हुआ तो उस प्रतियोगी का नाम लिस्ट से ही गायब था.

मरते-मरते लखपति बना गयी.

एक कांस्टेबल को किसी जुर्म में सस्पेन्ड कर दिया गया. वह दिन भर जुआं खेलता और शाम को टुन्न होकर घर लौटता. घर पहुँचते ही मियां-बीबी में तकरार होती .वह घर खर्च के लिए पैसे मांगती तो टका सा जबाब दे देता कि जेब में फ़ूटी कौडी भी नहीं है. बच्चॊं को कई बार भूखे पेट भी सोना पडता था. उसकी बीबी थी हिम्मत वाली. उसने सब्जी-भाजी की दुकान, एक पडौसन से कुछ रकम उधार लेकर शुरु की. उसका व्यवहार सभी के साथ अच्छा था. देखते-देखते उसकी दूकान चल निकली. अब वह दो जून कि रोटी कमाने लायक हो गई थी. लेकिन उसके पति मे कोई सुधार के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे

उसने कुछ अतिरिक्त पैसे भी जोड लिए थे. तभी उसकी बड़ी बेटी के लिए एक रिश्ता आया और उसने धूमधाम से बेटी की शादी भी कर दी. कुछ दिन बाद वह कांस्टेबल भी बहाल हो गया. नौकरी पर बहाल हो चुकने के बाद भी उसने अपनी दूकान बंद नहीं की.

कुछ दिन बाद उसकी बेटी के घर कोई पारिवारिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. उसकॊ वहाँ जाना था. अपने पति और बच्चॊं के साथ वह रेल्वे स्टेशन पहुँची. ट्रेन के आने में विलम्ब था. ट्रेन के आगमन के साथ ही एक दूसरी ट्रेन भी आ पहुंची. दोनों ट्रेनों का वहाँ क्रासिंग़ था.जल्दबाजी में पूरा परिवार दूसरी ट्रेन में सवार हो गया,लेकिन शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि वे गलत दिशा की ट्रेन में सवार हो गए है. पता लगने के ठीक बाद ट्रेन चल निकली थी. ट्रेन की स्पीड अभी धीमी ही थी ,इस बीच उसके परिवार के सारे सदस्य तो उतर गए लेकिन उतरने की हड़बडी में उसका पैर उलझ गया और वह गिर पड़ी. दुर्योग से उसकी साड़ी उलझ गयी थी और वह ट्रेन के साथ काफ़ी दूर तक घिसटती चली गई.

पति चिल्लाता -भागता दूर तक ट्रेन का पीछा करता रहा. पब्लिक का शोर सुनकर ट्रेन के परिचालक ने ट्रेन रोक तो दी लेकिन तब तक तो उसके प्राण पखेरु उड़ चुके थे..पुलिस केस दर्ज हुआ. सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद उसका शव परिजनॊं को सौप दिया गया. वे एक खुशी के कार्यक्रम मे शामिल होने जा रहे थे,लेकिन नहीं जानते थे कि दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था लगातार.

उसके मृत्यु को अभी सात-आठ माह ही बीते होंगे कि इसी बीच रेल्वे से क्लेम की राशि स्वीकृत होकर आ गई. जेब में रकम आते ही उसने दूसरी शादी कर ली और एक नय़ी इन्डिका खरीद लाया. अब वह अपनी नई बीबी के साथ कार मे सवार होकर फ़र्राटे भरने लगा था. पास-पडॊसी कहते" बीबी मर तो गई लेकिन उसे लखपति बना गई.".

बाप की कमाई.

मेरे एक मित्र है करोडीमल. जैसा नाम उसी के अनुरुप करोडॊंपति भी. उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई बडा खर्च कभी किया हो,ऎसा देखने में नहीं आया. कपडॆ भी एकदम सीधे-सादे पहनता. कोई तडक-फ़डक नही. उनसे उलट है उनका अपना बेटा .दिल खोलकर खर्च करता. मंहगे से मंहगे कपडॆ पहनता .कार में घूमता. देश-विदेश की यात्रा में निकल जाता. जब कोई करोडी से पूछता कि वह क्यों नहीं शान से रहता? कभी दिल खोलकर खर्च नहीं करता?. बाहर घूमने-फ़िरने नहीं जाता तो हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब देता:-"भाई...उसका बाप करोड़पति है.इसीलिए वह दिल खोलकर खर्च करता है. महंगी से महंगी गाडियों में घूमता है.वह जो लुटा रहा है,उसके बाप की कमाई है. मैं ठहरा एक गरीब बाप का बेटा.अतः चाहकर भी मैं कोई खर्च नहीं कर पाता.यदि थोड़ा सा ज्यादा खर्च हो जाता है तो मुझे दुःख होता है.

समझौता एक्सप्रेस.

सत्ता का स्वाद चख चुके नेताओं को पक्का यकीन हो चुका था कि वे इस बार शायद ही चुनकर आएं ,सो उन्होंने एक नया रास्ता खोज निकला .समान विचारधारा वाली पार्टियों को साथ मिलाकर एक नया दल बनाया और उसे एक नाम दिया गया, और सभी ने मिलकर साथ चुनाव लड़ने का ऎलान कर दिया. वे जानते थे कि लोकसभा की सीढियाँ चढने के लिए दो तिहाई बहुमत का होना जरुरी है.उन्होंने यह भी तयकर रखा था कि जिस दल में सदस्यों की संख्या ज्यादा है, उसी में से कोई एक प्रधानमंत्री बनेगा.

चुनाव हुये और गठजोड़ करने वाली पार्टी, चुनाव एक्सप्रेस में सवार होकर चुनाव जीत गई. जिस दल में संख्या बल ज्यादा था उसका व्यक्ति प्रधान मंत्री की कुर्सी पर आसीन हो गया और शे‍ष सदस्यॊं ने अपने-अपने दल-बल के आधार पर मंत्री पद हथिया लिए.थे.

वापसी का टिकिट

बरसों-बरस बाद मेरा दिल्ली जाना हो रहा है. मैं अपनी मर्जी से वहाँ नहीं जा रहा हूँ, बल्कि पिताजी के बार-बार टेंचने के बाद मैं किसी तरह वहाँ जाने के लिए राजी हो पाया हूँ.

दरअसल मेरा दम घुटता है दिल्ली में. चारों तरफ़ शोर मचाते भागते वाहन,वाहन में लटकते हुए यात्रा करते नौजवान, कार्बनमोनोआक्साइड-कार्बन्डाइआक्साइड जैसे जहरीली गैस फ़ैलाते आटॊ-रिक्शे,चारों तरह भीड़ ही भीड़ देखकर मुझे उबकाई सी होने लगती है , फ़िर घर का माहौल तो उससे भी ज्यादा दमघोंटू है.

इसी दमघोंटू वातावरण में मेरे भैया एक सरकारी महकमें में मलाईदार पोस्ट पर कार्यरत हैं. बार-बार पत्र लिखने और टेलीफ़ोन पर बातें करने के बाद भी जब कोई सकारात्मक जवाब उन्होंने नहीं दिया तो पिताजी ने फ़रमान जारी कर दिया कि मैं वहाँ जाकर आमने-सामने बात करुं .उन्हें अपनी घरेलू समस्या से अवगत करवाऊं और कोई हल निकाल लाऊं..

मैंने पिताजी से कहा कि मैं उनसे उम्र में छोटा पडता हूँ, उन्हीं के दिए पैसों से अपनी पढाई जारी रख पाया हूँ. मैं भला उनके सामने समस्याओं को लेकर मुँह कैसे खोल सकता हूँ. मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा कि यदि आप स्वयं चले जाएं तो चुटकी बजाते ही सारे समस्याओं को हल किया जा सकता है. लेकिन वे जाने के लिए राजी नहीं हुये.

अन्तोगत्वा मुझे ही जाना पडा. स्टेशन से बाहर निकलते ही मैंने एक अच्छी सी दूकान से बच्चॊं के लिए मिठाइयां और एक खारे का पैकेट खरीद लिया था.

. दरवाजे पर मुझे देखते ही सभी ने घेर लिया था. मैंने अपने झोले में पडॆ पैकेट निकालकर उन्हें दिया और वे हो-हल्ला मचाते हुए अन्दर की ओर भागे और अपनी माँ को सूचित करने लगे कि चाचाजी आए हैं. सोफ़े पर बैठते ही मेरी नजरें कमरे का मुआयना करने लगी थी. भैया के ठाठबाट देखकर मैं दंग रह गया था. काफ़ी देर तक यूंही बैठे रहने के बावजूद भाभीजी अपने कमरे से बाहर नहीं आ पायी थी. मुझे कोफ़्त सी होने लगी थी.और मेरा धैर्य चुकने लगा था. मैं अपनी सीट से उठ ही पाया था कि वे नमुदार हुईं .मैंने आगे बढकर उनके च्ररण स्पर्ष किए.और उन्होंने सोफ़े में धंसते हुए सभी के हालचाल जानने चाहे. सभी के कुशल क्षेम का समाचार मैंने कह सुनाया.अभी मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि उन्होंने पत्थर सा भारी एक प्रश्न मेरी ओर उछाल दिया" ये तो सब ठीक है लाला,,लेकिन तुम्हारा इस तरह, अचानक चले आना, समझ में नहीं आया वैसे. मैं तुम्हारे आने का मकसद अच्छी तरह जानती हूँ. तुम निश्चित ही अपने भाई से पैसे ऎंठने के लिए आए होगे.तुम यदि इसी मकसद से आए तो तुम्हें शर्म आनी चाहिए.क्या हम लोगों ने तुम लोगों का ठेका ले रखा है. तुम पढ-लिख गए हो, कोई जाब-वाब क्यों नहीं कर लेते?.

भाभी की बातें सुनकर तन-बदन में आग सी लग गई थी. जवाब में मैं काफ़ी कुछ कह सकता था,लेकिन कुछ भी न कह पाना मेरी अपनी मजबूरी थी. मैं जानता था कि बात अनावश्यक रुप से तूल पकड लेगी. इससे बेहतर था कि मैं चुप रहूं. उन्हें टालने की गरज से मैंने कहा कि काफ़ी दिनों से मैं आप लोगों के दर्शन नहीं कर पाया था, सो दर्शन करने चला आया था. उसी क्रम को जारी रखते हुए मैंने भैया के बारे में जानना चाहा कि वे दिखलाई नहीं दे रहे हैं..तो पता चला कि वे किसी आवश्यक काम से बाहर गए है और बस थोडी ही देर में वापस आ जाएंगें.

काफ़ी इन्तजार के बाद भैयाजी से मिलना हुआ. मुझे देखते ही उन्होंने भी वह प्रश्न दागा जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी" रवि...अचानक कैसे आना हुआ? घर में सब ठीक-ठाक तो है न ?

मैंने उनसे कहा "भैया..सब ठीक ही होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों .मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी है.

" ठीक है, तो हम लोग ऐसा करते हैं कि किसी होटल में चलकर भॊजन करते हैं और

बैठकर बातें भी कर लेंगे. मैं समझ गया कि भैया भाभी की उपस्थिति में कोई भी बात करना नहीं चाहेगें.,

स्टेशन के पास ही एक होटल थी. उन्होंने एक थाली का आर्डर दिया और मुझसे मुखातिब होकर मेरे आने का कारण जानना चाहा. मैंने विस्तार से घर के हालात कह सुनाया और कहा कि जो रकम आप भेज रहे हैं,उसमें घर का गुजारा चल नहीं पा रहा है. मेरी बात सुनकर वे देर तक खामोश बैठे रहे फ़िर उन्होंने कहा:"-रवि..इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है.जबसे अन्नाजी ने जंतर-मंतर पर बैठकर अनशन शुरु किया था,उसके बाद से किसी में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह किसी से दो पैसे भी ले सके. अब तुमसे क्या छिपाना,मेरे अपने घर का हाल भी बुरा है. बिना मेहनत किए अलग से जो रकम मिला करती थी उसने सभी की आदतें बिगाड़ दी है.पत्नी भी अनाप-शनाप खर्च करने की आदि हो गयी है. शायद ही कोई ऎसा दिन नहीं जाता कि उसने अपनी ओर से किटी पार्टी में जाने से इन्कार किया हो. उसे अपने स्टेटस सिंबल की चिन्ता ज्यादा रहती है. रही बच्चॊं की बात तो वे भी अपनी माँ पर गए है. रोज एक नयी फ़रमाइश उनकी ओर से बनी ही रहती है. कमाई दो पैसे की नहीं है और खर्चा हजारों का है. अब तुम्हीं बताओ रवि कि मैं ज्यादा पैसे कैसे भेज सकता हूँ.? भवि‍ष्य में अब शायद ही भेज पाऊँगा. यही कारण था कि मैं पिताजी को फ़ोन पर यह सब बता नहीं पा रहा था.और बतलाता भी तो किस मुँह से.? ये तो अच्छा हुआ कि तुम चले आए.और तुमसे मैं अपनी मन की बात कह पाया. शायद पिताजी से कहता तो वे शायद ही इसे बर्दाश्त कर पाते.

भोजन बडा ही सुस्वादु बना था लेकिन भैया की बातें सुनकर स्वाद अब कडवा सा लगने लगा था ,जैसे-तैसे मैंने खाना खाया और भैया से कहा " अच्छा मैया, अब मैं चलता हूँ..

उन्होनें जेब में हाथ डाला और पर्स में से एक सौ का नोट पकडाते हुए मुझसे कहा कि

अपने लिए टिकिट कटवाले. मैंने बडी ही विनम्रता से कहा:- भाईसाहब मैंने वापसी की टिकिट पहले से ही बुक करवा लिया था..वे कुछ और कह पाते, ट्रेन अपनी जगह से चल निकली थी.मैंने दौड लगा दी और फ़ुर्ती से कम्पार्ट्मेन्ट में जा चढा था.ट्रेन ने अब स्पीड पकड ली थी.

पूरे परिवार को इस बात का इन्तजार था कि भैया कब आते हैं. वे गर्मी में पडने वाली छुट्टियों में परिवार सहित आते रहे हैं. वे जब-जब भी आए हैं,सभी के लिए कोई न कोई सौगात साथ लेकर जरुर आते हैं. इन बार न जाने क्यो उन्हें आने में देरी हो गई थी.

काफ़ी इन्तजारी के बाद उनका आगमन हुआ. आश्चर्य इस बात पर सभी को हुआ कि इस बार वे अकेले ही आए थे. उनके हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस था. अब पूरे परिवार की नजर उस सूटकेस पर थी कि वह कब खुलता है.

बारिश.

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी.

बारिश से बचने के लिए एक लड़के ने दरवाजा खटखटाया

मकान मालिक ने दरवाजे पर जड़े शीशे में से झांक कर देखा और उसे वहाँ से भाग जाने का इशारा किया.

. थोडी देर बाद बारिश में भींगती एक नवयुवती ने दरवाजा खटखटाया. मकान मालिक ने झांककर देखा. फ़ौरन दरवाजा खोला और युवती को खींचकर अन्दर किया और झट से दरवाजा लगा लिया.

खजाना

" तुम पर मैं कई दिनों से नजर रख रहा हूँ. बड़ी सुबह ही तुम समुद्र- तट पर आ जाते और देर शाम को घर लौटते हो ?

" मुझे अच्छा लगता है, यहां आकर."

" कभी समुद्र की गहराई में उतरे भी हो कि नहीं?"

" नहीं ..एक बार भी नहीं ?"

"फ़िर समझ लो तुम्हारी पूरी जिन्दगी बेकार में गई. यदि तुम एक बार भी समुद्र में उतरते तो तुम्हारे हाथ नायाब खजाना लग सकता था. क्या तुम्हारा ध्यान इस ओर कभी नहीं गया .?"आखिर तुम करते क्या हो इतनी सुबह-सुबह आकर?"

" बडी सुबह मैं इसी इरादे आता हूँ, लेकिन आसपास पडा कूडा-कचरा देख कर सोचने लगता हूँ कि पहले इसे साफ़ कर दूं ,फ़िर इतमीनान पानी में उतरूंगा. बस इसी में शाम हो जाती है."

" आखिर यह सब करने से तुम्हें मिलता क्या है?.

" कुछ नहीं, बस मन की शांति. मन की शान्ति मिलती है मुझे.".

" बकवास...बकवास.मैं खजाने की बात कर रहा हूँ और तुम..शांति की"

" क्या शांति से बढ़कर और कोई खजाना भी हो सकता है ?"उसने पलटकर जवाब दिया था.

न्याय.

"द्रौपदी इस साम्राज्य की महारानी है और एक महारानी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी ही प्रजा की झोपडियों में आग लगाए. उन्होंने एक अक्ष्म्य अपराध किया है. उन्हें इसके लिए कडी से कडी सजा दी जानी चाहिए. मैं महाराज युधि‍ष्टर, कानुन को धर्मसम्मत मानते हुए उन्हें एक साल की सजा दिए जाने की घो‍षणा करता हूँ."

महाराज का फ़ैसला सुनते ही राजदरबार में सन्नाटा सा छा गया था.चारों तरफ़ इस फ़ैसले पर कानाफ़ूसी होने लगी थी,लेकिन उनके खिलाफ़ बोलने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था.

फ़ैसला सुन चुकने के बाद भीम से रहा नहीं गया.अपनी जगह से उठकर उन्होंने आपत्ति दर्ज की"-महाराज फ़ैसला देने के पूर्व आपको यह तो सोचना चाहिए था कि वे एक महारानी होने के साथ-साथ, आपकी- हमारी धर्मपत्नि भी है. यदि उन्होंने ऎसा किया है तो जरुर उसके पीछे कोई बड़ा कारण रहा होगा.उन्होंने जानबूझ कर तो ये सब नहीं किया होगा. अगर झोपडियां जल भी गयी है तो इससे क्या फ़र्क पडता है.हम उन्हें नयी झोपड़ियां बनाने के लिए बांस-बल्लियां मुहैया कर सकते हैं. वे दूसरी झोपड़ी बना लेगें."

" भीम...ये तुम कह रहे हो. एक जवाबदार आदमी इस तरह की बात कैसे कर सकता है .मैंने उन्हें सजा देने का आदेश जारी कर दिया है. अब उन्हें एक साल तक कारावास में रहना होगा. इस फ़ैसले में अब कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है."

" महाराज...यदि महारानी ने अपराध किया ही है तो उसकी सजा आप हम भाइयों को कैसे दे सकते हैं ?."

" भीम ...आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ?".

" महाराज..एक वर्ष में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं. यदि इसमें पांच का भाग दिया जाये तो तिहत्तर दिन आते है. जैसा कि माँ का आदेश है कि उस पर सभी भाइयों का समान अधिकार रहेगा .मतलब साफ़ है कि वे बारी-बारी से तिहत्तर दिन हम प्रत्येक के बीच गुजारेगीं. एक वर्ष की सजा का मतलब है कि हमारे तिहत्तर दिन भी उसमें शामिल होंगे और हमें यह मंजूर नहीं कि हम उस अवधि की सजा अकारण ही पाएं. यह कैसा न्याय है आपका ?".

भीम की बातों में दम था और वे जो कुछ भी कह रहे थे उसे झुठलाया नहीं जा सकता था. अब सोचने की बारी महाराज युधि‍ष्ठिर की थी. काफ़ी गंभीरता से सोचते हुए उन्होंने इस समस्या का हल खोज निकाला था. उन्होंने कहा:-" चूंकि महारानी ने एक अक्ष्म्य अपराध किया है,और उन्हें इसकी सजा अवश्य ही मिलेगी. उन्हें एक साल का सश्रम कारावास दिया जाता है. सजा की अवधि उनके अपने स्वयं की अवधि-

नौकर

“दादाजी....आप छॊटॆ-बडॆ हर काम श्याम से ही क्यॊं करवाते हैं?.कभी मुझे भी कोई काम करने का मौका तो दिया करें.” “ सुनो राजु...मैंने तुम्हें कितनी बार बतलाया है कि वह हमारा नौकर है. क्या इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में नहीं उतरती.अरे हम ठहरे खानादानी रईस..हमारे हर काम को बजा लाना हमारे नौकरों का फ़र्ज बनता है. फ़िर हम उन्हें इस बात की तन्खाह भी तो देते हैं.” “ दादाजी..ठीक है,वह हमारा नौकर है. पर अभी उसकी उम्र ही कितनी है.? दादाजी कुछ बोल पाते इसके पूर्व श्याम ने कहा:- भाईजी, इतनी छोटी सी बात के लिए दादाजी से शिकायत नहीं करते. वे जो भी आदेश देते हैं, मुझे उसे पूरा करने में गर्व ही महसूस होता है. फ़िर हम ठहरे नौकर...नौकर का काम ही है कि वह अपने मालिक की मर्जी के अनुसार काम करे. काम के बदले वे मुझे रुपये भी तो देते है. यदि मैं कोई काम नहीं करुंगा,तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा. श्याम दिन भर वहां रहकर कड़ी मेहनत करता और घर आकर अपनी किताबों की दुनियां में खो जाता.प्रायवेट परीक्षा देकर उसने मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास किया. उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एम.काम.की परीक्षा उत्तीर्ण कर उसने यू.पी.पी.एस.सी की परीक्षा प्राप्त कर एक काबिल अफ़सर बन गया था. आज वह अपनी मेहनत और लगन के बल पर अच्छा सुखी जीवन जी रहा है.

संदर्भ ः- भारतीय दंतचिकित्‍सक सविता की मौत से जुड़ा आयरलैंड का मामला।

चर्च से जुड़ा अंधविश्‍वास

प्रमोद भार्गव

आमतौर से पश्‍चिमी देश दुनिया को मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते हैं। इन देशों में भी भारत, पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश उनके निशाने पर प्रमुखता से रहते हैं। भारत को तो वे मदारी और सपेरों का ही देश कहकर आत्‍ममुग्‍ध होते रहते हैं। वहीं पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में इस्‍लामी मान्‍यताओं के चलते महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने की निंदा करते हैं। अब आयरलैंड में भारतीय मूल की दंत चिकित्‍सक सविता हलप्‍पनवार की मौत ने तय कर दिया है कि चर्च के बाध्‍यकारी कानूनों का पालन करने वाला पश्‍चिमी समाज कितना पाखण्‍डी है ? सविता की कोख में 17 माह का सजीव गर्भ विकसित हो रहा था। पर गंभीर जटिलता के कारण गर्भपात की स्‍थिति निर्मित हो गई। 31 साल की सविता को गैलवे के अस्‍पताल में भर्ती कराया गया। चूंकि सविता खुद चिकित्‍सक थी, इसलिए जांच रिपोर्टों के आधार पर उसने जान लिया था कि गर्भपात नहीं कराया गया तो उसकी जान जोखिम में पड़ सकती है। इसलिए उसने खुद पति प्रवीण हलप्‍पनवार की सहमति से चिकित्‍सकों को गर्भपात के लिए कहा। लेकिन चिकित्‍सकों ने माफी मांगते हुए कहा, ‘दुर्भाग्‍य से आयरलैण्‍ड कैथोलिक ईसाई देश है। यहां के ईसाई कानून के मुताबिक हम जीवित भ्रूण का गर्भपात नहीं कर सकते।' हलप्‍पनवार दंपत्‍ति ने दलील दी कि हम हिंदू धर्मावलंबी हैं, लिहाजा हम पर यह कानून थोपकर हमारी जान खतरे में न डाली जाए।' किंतु अंधविश्‍वासी आयरलैंड समाज के चिकित्‍सकों ने इन दलीलों को ठुकरा दिया और सविता की मौत हो गई। बाद में शव-परीक्षण से पता चला कि सविता की कोख में घाव था, जो सड़ चुकने के कारण सविता की दर्दनाक मौत का कारण बना।

कहने को ग्रेट ब्रिटेन से 1922 में अलग हुआ आयरलैंड एक आधुनिक और प्रगतिशील देश है। दुनिया के सर्वाधिक धनी देशों में इसकी गिनती है। यहां के शत-प्रतिशत नागरिक साक्षर व उच्‍च शिक्षित हैं। 2011 में संयुक्‍त राष्‍ट द्वारा घोषित मानव विकास सूचकांक में आयरलैंड विकसित देशों की गिनती में सातवें स्‍थान पर है। इस सब के बावजूद चर्च के बाध्‍यकारी व अमानवीय कानूनों के चलते यह देश मानसिक रुप से कितना पिछड़ा है, इस तथ्‍य की तसदीक सविता की मौत ने कर दी है। हालांकि कट्‌टर ईसाई कानून की इस अमानवीयता ने दुनिया भर संवेदनशील लोगों को झकझोरा है। आयरलैंड, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और भारत समेत दुनियाभर में हुए प्रदर्शनों में उमड़े जनसैलाब, मीडियाकर्मियों और सोशल साइटों पर आ रही प्रतिक्रियाओं ने सविता की मौत की कड़े शब्‍दों में निंदा करते हुए इस जानलेवा चर्च के कानून को तत्‍काल बदलने की मांग की है। एमनेस्‍टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्‍टीय मानवाधिकार संस्‍था पर भी जनप्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाया है कि वह आयरलैंड शासन-प्रशासन पर पर्याप्‍त हस्‍तक्षेप कर इस रुढि़वादी कानून को बदलवाए।

हालांकि इस कानून को बदला जाना इतना आसान नहीं है। क्‍योंकि आयरलैंड सरकार चर्च कानून के दिशा-निर्देशों से ही संचालित होती है। इसलिए वहां इस कानून में परिवर्तन के समर्थन में बहुमत नहीं है। करीब 20 साल पहले भी एक एक्‍स-प्रकरण ने भी आयरलैंड को झकझोरा था। इस मामले में 14 साल की एक स्‍कूली छात्रा दुष्‍कर्म के चलते गर्भवती हो गई थी। इस छात्रा के पालकों ने प्रशासन से गर्भपात की अनुमति मांगी थी। किंतु कानून की ओट लेकर इजाजत नहीं दी गई और लड़की ने आत्‍महत्‍या कर ली थी। तब आयरिश सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने आदेश दिया था कि भ्रूण और मां दोनों को जीने का समान अधिकार है। इसलिए आत्‍महत्‍या की आशंका के चलते गर्भपात की इजाजत मिलनी चाहिए। लेकिन न्‍यायालय की इस दलील को खारिज कर दिया गया और इस क्रूर व अमानवीय कानून में अभी तक कोई बदलाव संभव नहीं हुआ।

दरअसल आयरलैंड में गर्भपात न किए जाने का जो कानून वजूद में है, उसके पीछे मूल-भावना यह निहित हो सकती है कि जीवन को किसी भी हाल में नष्‍ट न किया जाए। यह कानून तब तक तो ठीक था, जब तक अल्‍टासाउंड जैसी आधुनिक चिकित्‍सा प्रणाली का अविष्‍कार नहीं हुआ था और यह समझना मुश्‍किल था कि कोख में शिशु किस हाल में हैं। किंतु अब ऐसी जांच तकनीकें अस्‍तित्‍व में आ गई हैं, जिनसे कोख में विकसित हो रहे शिशु की पल-पल की जानकारी ली जा सकती है। सविता के मामले में भी जांचों से साफ हो गया था कि कोख में घाव पक रहा है। इसलिए सविता का गर्भपात किया जाना नितांत जरुरी था। ऐसा नहीं हुआ, इसलिए अजन्‍मे शिशु के साथ 31 साला सविता की भी मौत हो गई। यदि अंतरराष्‍टीय मानवाधिकार कानून को ही सही मानें तो मां के जीवन के खतरे को यदि भांप लिया जाए तो सुरक्षित व कानून के दायरे में गर्भपात कराना महिला का मौलिक अधिकार है। किंतु ‘कानून' शब्‍द आ जाने से इस दलील की अंतरराष्‍टीयता, किसी देश की राष्‍टीयता के दायरे में आ जाती है और आयरलैंड में चर्च कानून किसी भी प्रकार के गर्भपात पर रोक लगाता है। लिहाजा जरुरी है कि इस कानून पर पुनर्विचार हो और इसे चर्च की जड़ता से मुक्‍त किया जाए।

ज्‍यादातर पश्‍चिमी देश दुनिया के दूसरे देशों के धर्मों पर न केवल सवाल खड़े करते हैं, बल्‍कि उन देशों के धर्मों की खिल्‍ली उड़ाने वाले बुद्धिजीवी अथवा लेखकों को अपने देशों में शरण भी देते हैं। सलमान रुश्‍दी को इसलिए ब्रिटेन में शरण मिली हुई है। बांग्‍लादेश की क्रांतिकारी लेखिका तस्‍लीमा नसरीन को भी ब्रिटेन अपने देश बुलाना चाहता है। भारतीय देवी-देवताओं के अपत्‍तिजनक चित्र बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन का जब भारत के कट्‌टरपंथियों ने विरोध किया तो उन्‍हें भी ब्रिटेन शरण देना चाहता था, किंतु वे खुद दुबई जाकर रहने लगे थे।

आधुनिकता का दंभ भरने वाली ईसाइयत मध्‍ययुगीन अंधेरे में कितनी जकड़ी है, यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि जब भारतीय मूल की दिवंगत नन, सिस्‍टर अल्‍फोंजा को वेटिकन सिटी में पोप ने संत की उपाधि से विभूषित किया था, तब उसके पीछे मध्‍ययुगीन पाखण्‍डी मानसिकता ही काम कर रही थी दरअसल ऐसा इसलिए किया गया था, क्‍योंकि अल्‍फोंजा का जीवन छोटी उम्र में ही भ्रामक दैवीय व अतीन्‍द्रिीय चमत्‍कारों का दृष्‍टांत बन गया था। जबकि इस उपाधि की वास्‍तविक हकदार ईसाई मूल की ही मदद टेरेसा थीं। जिन्‍होंने भारत में रहकर हजारों कुष्‍ठ रोगियों की निर्लिप्‍त भाव से सेवा की। अपना पूरा जीवन मानव कल्‍याण के लिए समर्पित कर दिया। किंतु जन-जन की इस मदद टेरेसा को ‘संत' की उपाधि से अलंकृत नहीं किया जाता, क्‍योंकि उनका जीवन चमत्‍कारों की बजाय यथार्थ रुप में मानव कल्‍याण से जुड़ा था। मानवीय सरोकारों के लिए जीवन अर्पित कर देने वाले व्‍यक्‍तित्‍व की तुलना में अलौकिक चमत्‍कारों को संत शिरोमणि के रुप में महिमामंडित करना किसी एक व्‍यक्‍ति को नहीं पूरे समाज को दुर्बल बनाता है। यही अलौकिक कलावाद धर्म के बहाने व्‍यक्‍ति को निष्‍क्रिय व अंधविश्‍वासी बनाता है।

यही भावना मानवीय मसलों को यथास्‍थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईश्‍वरीय तथा भाग्‍य आधारित अवधारणा को प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। यही कारण है कि आयरलैंड में 20 साल पहले एक प्रकरण सामने आने और सर्वोच्‍च न्‍यायालय की हिदायत के बावजूद इस कानून को आज तक नहीं बदला जा सका है। अब डॉ सविता की मौत के बाद आयरलैंड के प्रधानमंत्री इनडा केनी कह रहे हैं कि जांच के बाद कोई प्रभावी कदम उठाएंगे। दरअसल इस मामले जांच से कोई चिकित्‍सकों की जबावदेही तय नहीं की जानी है, जिसके लिए जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जाए। चिकित्‍सकों ने तो कानून के चलते न करने की लाचारी जताई थी। इसलिए जरुरी है इस कानून में वैसे तो आमूलचूल परिवर्तन हो ही, फिर भी यदि चर्च का मान रखना भी पडे़ तो आयरिश सरकार इस कानून में इतनी छूट तो तत्‍काल दे ही, जिसके चलते अन्‍य धर्मविलंबियों को आयरलैंड में गर्भपात कराने की छूट मिलें और डॉ सविता जैसी मौत की पुनरावृत्‍ति न हो ?

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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नारी

प्रेरणादायिनी, सह्रदया, कोमलता की प्रतीक हो तुम

तेजस्‍विनी, महिमामयी, कर्तव्‍यनिष्‍ठावान हो तुम,

सर्वरुपिणी, विश्‍वेश्‍वरी, अखिलेश्‍वरी भी हो तुम,

दीनों का दुःख हरने वाली, मदर टेरेसा हो तुम ।

 

राष्‍ट्र निर्माता,शासन चालक,राष्‍ट्रपति औ प्रधानमंत्री भी हो तुम,

अन्‍वेषणकर्ता,व्‍यवसायी औ समन्‍दर जाकर घ्‍वज को फहराने वाली,

एवरेस्‍ट चोटी चढने वाली,मंगलग्रह तक जाने वाली भी हो तुम,

मानवसंसाधन, विश्‍वविद्यालय औ संस्‍थायें चलाने वाली भी हो तुम

फोटोग्राफी ,करने वाली मीडिया कर्मी ऊर्जा स्‍त्रोत भी हो तुम

प्रेम, क्रोध औ पथ प्रदर्शक, सब रूपों में दिखने वाली हो तुम ।

 

प्रथम रूप में बेटी बनकर प्‍यार सभी का पाती हो तुम

द्वितीय रूप में बहना बनकर सच्‍चा प्‍यार लुटाती हो तुम,

तृतीय रूप में पत्‍नि बनकर धर-संसार चलाती हो तुम ,

चतुर्थ रूप मे मां बनकर सबको गले लगाती हो तुम ।

 

कौन क्षेत्र वंचित है तुमसे कहां नहीं पहुंच पाई हो तुम

गरिमा बनकर अपनी मर्यादा में रहकर सबसे आगे बढ़ने वाली हो तुम

दृढ़ निश्‍चय अटूट तुम्‍हारा कभी न धोखा खाने वाली हो तुम

दुआ प्रेम की सबसे यह है नित नये स्‍त्रोतों से ऊॅचाइयों को छुओ तुम

 

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प्रेम मंगल

कार्यालय अघीक्षक

स्‍वामी विवेकानन्‍द इंजीनियरिंग कॉलेज

इन्‍दौर म...․प्र․

मैं आंसू गिराती हूँ 
एक सीलन भरी खोली में
और घुटती रहती हूँ
ठेहुने के बीच सर रखकर ।

मैं मशीन बन जाती हूँ
घर में रसोई की तरह
आफिस में कम्प्यूटर की तरह
बच्चों में नाखूनों की तरह
जो समय बचा पाती हूँ
पलंग के सिलवटो में गुम हो जाती है ।

न जाने कितने वर्ष गुजर गये
उन कविताओं को छुए हुए
होंठों पर के गीत
कहीं भीतर दम तोड़ चुका है
न जाने मन का सुग्गा कहाँ उड़ चला है ।

मैं लागातार बहती रहती हूँ
हस्ती की लय भोगते हुए इसी जमीन में
चेहरे के गरजते सागर में
कोई फूल नहीं उगा है
मैं बेचैन चहलकदमी करती
गमले बन जाने की पीड़ा में
उकड़ू बैठी उस आँच को निहारती हूँ
जहाँ समय की परिधी में कोई रस्सी
लताएं बनकर सामने नहीं आती हैं ।

कभी-कभी मुझे लगता है
इन आंसुओं के पार
इस सीलन से दूर
किसी पेड़ की छांह में जा बैठूं
और निहारुं उन लाल-नीली चिड़ियों को
जो गाते नहीं थकते मधुर गीत
फुनगी के पार फैले अनंत आकाश को
भर लूं अपनी बाहों में
और बन जाऊं एक चिड़िया
डैनों को खोल
उड़ता फिरु अनंत हवाओं में ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

बाज़ार की चपेट में लोक-हास्य

डॉ. दौलत राव वाढ़ेकर

लोक जीवन में हास्य और  व्यंग्य की सृष्टि का एक बड़ा आधार आपसी नोकझोंक और हाजिर जवाबी रही है। इसमें से ज्यादातर वाचिक परंपरा या बोलचाल में व्यक्त हुआ है और इसलिए लिखित प्रमाण कम ही मिलते हैं। लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाजों, भांड़ों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। मृच्छकटिक नाटक के रचयिता राजा शूद्रक हैं । वह ब्राह्मणों की खास पहचान यज्ञोपवीत की उपयोगिता के बारे में ऐसा व्यंग्य करते हैं जिसे सुन कर हंसी आती है । वह कहता है कि यज्ञोपवीत कसम खाने के काम आता है । अगर चोरी करना हो तो उसके सहारे दीवार लांघी जा सकती है । व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हमें हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं–‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरी की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, ‘‘तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।’’ रामचरितमान में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, ‘‘दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।’’
नागार्जुन ने ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘नयी पौध्, ‘जमनिया का बाबा’, ‘दुखमोचन’ आदि उपन्यासों में पात्रों के जरिए ही आम जनजीवन की समस्याओं को उठाया है। जमींदारों के अत्याचार और शोषण से लेकर दहेज की समस्या, अनमेल विवाह, ढोंग-पाखण्ड, बेतुके रीति-रिवाज आदि ज्वलंत प्रश्नों को यहाँ उठाया गया है। भारतीय समाज अनेकानेक जातियो और वर्गों में विभक्त होने के कारण जातिगत और वर्गगत विषमताओं का हमारे समाज में अम्बार-सा लगा हुआ है। नागार्जुन जाति की उच्चता और विचारों की निम्नता पर ‘रतिनाथ की चाची’ उपन्यास में बुध्ना चमार की पत्नी के माध्यम से प्रहार करते हैं...‘एक बात कहती हूँ, माफ करना, बड़ी जातिवालों की तुम्हारी यह बिरादरी बड़ी मलिच्छ, बड़ी निठुर होती है, मलिकाइन। हमारी भी बहू-बेटियाँ राँड़ हो जाती हैं, पर हमारी बिरादरी में किसी के पेट से आठ-आठ, नौ-नौ महीने का बच्चा निकाल कर जंगल में फेंक आने का रिवाज नहीं है। ओह कैसा कलेजा है तुम लोगों का! मइया री मइया।

इन दिनों कवि शैलेन्द्र चौहान का बहुचर्चित कथा रिपोर्ताज ‘पाँव ज़मीन पर’ आया है। भारतीय ग्राम्य जीवन की कुछ अनछुई छवियाँ , ध्वनियाँ यहाँ कवि की स्मृतियों के रूप में दर्ज हैं। कवि ने अपने लयात्मक गद्य और पैनी दृष्टि के सहारे ग्राम्य परंपराओं पर तटस्थता के साथ ज़रूरी टिप्पणियाँ की है। भारत नाम के इस देश को एक दम भीतर जा कर समझने समझाने का प्रयास करती यह एक लाजवाब किताब है। कुछ अंश यहाँ शेयर कर रहा हूँ : दशहरे के कुछ दिन पहले की बात है, आठ दस साल की उम्र वाले चार छ्ह लड़के घर के सामने गीत गाते हुए आए . ‘ टेसू अटर करें, टेसु बटर करें, टेसु लेई के टरैं.’ मेरे लिए यह कौतूहल पूर्ण था। छोटी अईया ने कहा ‘टेसू आए हैं’ . मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था कि लड़के और टेसू , आखिर टेसू क्या चीज़ है ? छोटी अईया ने इतनी देर में कहीं से दो पैसे ढूँढ निकाले। पैसे और अनाज का कटोरा ले कर वे दरवाज़े की ओर चलीं, मैं भी पीछे पीछे गया। वहाँ देखता क्या हूँ कि उन लड़कों में से एक ने दोनों हाथों में बिजूका जैसा कुछ पकड़ रखा है. वह लकड़ी का बना हुआ था. उस के सिर पर पगड़ी रखी हुई थी, जो शायद मिट्टी पका कर बनाई गई थी. सबसे आश्चर्यजनक बात थी कि उस के पैर सीधे लम्बवत न हो कर एक दूसरे को काटते हुए दिख रहे थे, अंग्रेज़ी के एक्स अक्षर की तरह. टेसू का यह राज़ मेरी समझ में कभी नही आया. फिर तो टेसू दशहरे के एक दिन पहले तक रोज़ ही आते रहे। ‘ टेसू अटर करें, टेसु बटर करें’ गा कर अनाज ले जाते रहे. उधर टेसू जिस दिन से आना शुरू हुए , उसी दिन या उस के एकाध दिन बाद कुछ लड़कियाँ भी गाती हुई आईं. क्या गा रही थीं, याद नहीं पड़ता पर उन के पास खूबसूरत सी कंदील नुमा मटकी थी , जो पकी हुई मिट्टी की बनी थी और बहुत बड़ी भी नहीं थी. उस में चारों तरफ गोल और लम्बे कटे हुए छेद थे, जिन में से प्रकाश बाहर आ रहा था। उस के अंदर दीपक रखा था। यह ‘झाँझी’ थी। उन्हें भी अनाज दे कर विदा किया गया। दशहरे के एक दिन पहले तक यह क्रम चलता रहा.दशहरे के दिन घर में तलवार और दूसरे लोहे के औज़ारों की पूजा हुई तो वहीं हुकुम सिंह दाऊ के घर के सामने टेसू और झाँझी का विवाह सम्पन्न हुआ. विवाह स्थल गोबर से लीपा गया, आटे से चौक पूरा था. चारों और आदमी औरतों की भीड़ थी . बीच मे बच्चे थे. लड़के टेसू लिए थे, लड़कियाँ झाँझी. कोई पंडित भी था. टेसू और झाँझी की भाँवरें पड़नी शुरू हुईं तो औरतों ने मंगल गान गाने शुरू किए, आदमी मज़े से हँस रहे थे। विवाह संपन्न हुआ तो पंडित जी ने सब के हाथों में लाल पीले धागे बाँधे, बतासे बाँटे गए। कुछ ही देर बाद लोग बाग दूल्हा दुल्हन को ले कर पोखर की ओर चल पड़े. टेसू और झाँझी विवाह के तुरंत बाद पोखर के हवाले कर दिए गए। सब लोग हँसते बोलते अपने घर लौट आए. मुझे यह अंत क़तई अच्छा नहीं लग रहा था पर कर भी क्या सकता था?

गुण और दोष का मिश्रण ही मनुष्य की खास पहचान है । हम आनंद की अनुभूति के लिये पैदा हुये हैं । रोने-धोने, बिसूरने और निषेधात्मक भयादोहन करने वाली चिंताओं में बैचेन रह कर जिंदगी गुजारना हमारे जीवन का मकसद कतई नहीं है । समाज में विषमताएं हैं, गरीबी है, आर्थिक द्वंद हैं, दुरूह समस्याएं हैं इसके बावजूद हर हाल मे हंसते रहना और चुनौतियों का डट कर मुकाबला करना हमारी संस्कृति का मूल संदेश है । इसलिये हम आये दिन त्यौहार मनाते हैं और सारे गमों को भुलाकर आनंद की नदी में डुबकी लगाते हैं । हम बूढ़े नहीं होते । हमारा शरीर बूढ़ा होता है । बुढ़ापे में भी फागुन आता है तो होली के हुड़दंग में जवान महिलाओं को बुढ़ऊ बाबा से देवर का रिश्ता जोड़ने में कोई हिचक नहीं होती । वे मगन हो कर गाने लगते हैं -

फागुन में बाबा देवर लागे ।

लोक जीवन का हास्य बोध हमारे आधुनिक जीवन में कभी-कभार अचानक प्रकट होकर हमें चौंका देता है, जैसा कि पीपली लाइव जैसी एक फिल्म ने कुछ समय पहले किया था। हास्य और विनोद के क्षण वैसे तो हम सभी के जीवन में आते हैं और काफी आते हैं, लेकिन बहुत कम स्थान और अवसर हैं जहां उन्हें सर्वसुलभ और सुरक्षित रखा जा सके। संसद की कार्यवाही विधिवत दर्ज होती है, इसलिए इसके सदनों में मनोविनोद के किस्से आम तौर पर हमारी स्मृति में रहते हैं। यही वजह है कि अक्साई चिन की सुरक्षा पर चल रही बहस में जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने थोड़ा गुस्से से कहा था कि वहां एक तिनका तक नहीं उगता, तब एक वरिष्ठ विरोधी सांसद की वह हाजिर जवाबी हमें आज भी गुदगुदा देती है जिसमें अपने गंजे सिर को आगे करते हुए उन्होंने मासूमियत से कहा था कि प्रधानमंत्री जी, उगता तो मेरे सिर पर भी कुछ नहीं है लेकिन क्या इसीलिए मैं इसे दुश्मन के हवाले कर दूं!

हिन्दी और उर्दू साहित्य के विकास के साथ ही हास्य व्यंग्य विधा परवान चढ़ने लगी । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और अकबर इलाहाबादी जैसे कवियों ने इसे कलेवर दिया । बाबू बालमुकुंद गुप्त अपने अन्योक्तिपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये व्यंग्य साहित्य में एक नया मानक बनाने मे सफल हुये । उर्दू शायरों ने तो ब्रिटिश शासनकाल में  अंग्रेजियत पर ऐसे तीखे प्रहार किये कि अंग्रेज उसे समझ भी नहीं पाते थे और हिन्दुस्तानी उसका जायका लेते थे ।
जनाब अकबर इलाहाबादी ब्रिटिश अदालत में मुंसिफ थे लेकिन वे अपने व्यंग के तीरों से ऐसा गहरा घाव करते थे कि पढ़नेवाला एक बार उसे पढ़कर हजारों बार उस पर सोचने को मजबूर हो जाता था । लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दति का पोस्टमार्टम जिस बेबाकी से अकबर साहब ने किया उसकी गहराई तक आज के व्यंगकार सोच भी नहीं सकते हैं -
तोप खिसकी प्रोफेसर पहुंचे । बसूला हटा तो रंदा है ।
प्लासी की लड़ाई में सिराज्जुदौला को शिकस्त देकर तमाम देसी  रियासतों को जंग में मात देकर अंग्रेजों ने तोप पीछे हटा ली और अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रोफेसरों को आगे कर दिया । तोप के बसूले ने समाज को छील दिया और प्रोफेसर के रंदे ने उसे अंग्रेजों के मनमाफिक कर दिया । तोप और प्रोफसर का यह तालमेल ब्रिटिश शिक्षापध्दति पर बेजोड़ और बेरहम हमला है ।

हमारे शहरों में आए दिन होने वाले कवि सम्मेलनों के मंच एक और ऐसा स्थान हैं जहां कविताओं के अलावा कवियों की नोकझोंक और हाजिर जवाबी के दिलचस्प प्रसंगों के जरिये हास्य की अनवरत गंगा बहती है। ऐसे प्रसंग भी या तो खुद कवियों की स्मृति में जिंदा है या श्रोताओं की स्मृति में। उनमें से कई उन कवियों और श्रोताओं के साथ दुयरेग से विलुह्रश्वत भी हो चुके होंगे। चिक परंपरा की जिस कविता धारा में स्नान करने हजारों-लाखों लोग रात-रात भर बैठे रहते हैं, वही महफि़ल कविता के अधिक घनत्व के कारण या आनंद की खुमारी में कई बार बोझिल हो जाती है। तभी कवि सम्मेलनों में कवियों और संचालक के बीच होने वाली सहज बातचीत उसे इतनी रोचक, तात्कालिक और आनंददायिनी बना देती है कि सारा वातावरण फिर उत्फुल्ल हो उठता है। एक बार चेतना सारे परिवेश में न केवल उमगने लगती है, बल्कि और उत्सुक होकर बोलती-बतियाती महसूस होती है। जनकवि नाथूराम शर्मा शंकर की दावेदारी के बाद भी जब एक बड़ा पुरस्कार थोड़े कम ज्ञात और कम मान्य कवि त्रिशूल जी ले गए, तो उस पर तत्काल की गई नाथूराम शर्मा शंकर (अब स्वर्गीय) की टिह्रश्वपणी - ‘पुरस्कार तो ले गया शंकर का हथियार’ - अपने समय में काफी चर्चित रही थी। इसी प्रकार प्रसिद्ध हिंदी ग़ज़लगो स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग एक बार अनेक कवियों के साथ उत्तर प्रदेश में इटावा से एटा जा रहे थे। रास्ते में किसी कवि ने सड़क किनारे मिले मित्र को सूचनात्मक लहजे में बताया कि ‘इटावा से एटे चले जा रहे हैं’। इस पर रंग जी ने शेर ही कह डाला - ‘इटावा से एटे चले जा रहे हैं, किसी लक्ष्मीपति के बुलावे पे देखो, सरस्वती के बेटे चले जा रहे हैं’।
कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं जीता, उसकी सांसें तो ‘लोक’ में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो ही नहीं सकता। हिंदी के सारे बड़े कवि तुलसीदास, कबीर, रसखान, मीराबाई, सूरदास लोक से ही आते हैं। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है। भारत गांवों में बसने वाला देश होने के साथ-साथ एक प्रखर लोकचेतना का वाहक देश भी है। आप देखें तो फिल्मों से लेकर विज्ञापनों तक में लोक की छवि सफलता की गारंटी बन रही है। बालिका वधू जैसे टीवी धारावाहिक हों या पिछले सालों में लोकप्रिय हुए फिल्मी गीत सास गारी देवे (दिल्ली-6) या दबंग फिल्म का मैं झंडू बाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए इसका प्रमाण हैं। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं।

किंतु लोकजीवन के तमाम किस्से, गीत-संगीत और प्रदर्शन कलाएं, शिल्प एक नई पैकेजिंग में सामने आ रहे हैं। इनमें बाजार की ताकतों ने घालमेल कर इनका मार्केट बनाना प्रारंभ किया है। इससे इनकी जीवंतता और मौलिकता को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। जैसे आदिवासी शिल्प को आज एक बड़ा बाजार हासिल है किंतु उसका कलाकार आज भी फांके की स्थिति में है। जाहिर तौर पर हमें अपने लोक को बचाने के लिए उसे उसकी मौलिकता में ही स्वीकारना होगा। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं। एक विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली हजारों बोलियां, उनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना, प्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है, जिस तक पहुंचने के लिए अभी काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ इसी ‘लोक’ का हिस्सा हैं।आज़ादी के 6 दशकों में जिन गाँवों तक हम पीने का पानी तक नहीं पहुँचा पाए, वहाँ कोला और पेप्सी की बोतलें हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मुँह चिढ़ाती दिखती हैं। गाँव में हो रहे आयोजन आज लस्सी, मठे और शरबत की जगह इन्हीं बोतलों के सहारे हो रहे हैं। ये बोतलें सिर्फ़ लोक की संस्कृति का विस्थापन नहीं हैं, यह सामूहिकता का भी गला घोंटती हैं। गाँव में हो रहे किसी आयोजन में कई घरों और गाँवों से मांगकर आई हुई दही, सब्जी या ऐसी तमाम चीजें अब एक आदेश पर एक नए रुप में उपलब्ध हो जाती हैं। दरी, चादर, चारपाई, बिछौने, गद्दे और कुर्सियों के लिए अब टेंट हाउस हैं। इन चीज़ों की पहुँच ने कहीं न कहीं सामूहिकता की भावना को खंडित किया है।

भारतीय बाज़ार की यह ताकत हाल में अपने पूरे विद्रूप के साथ प्रभावी हुई है। सरकारी तंत्र के पास शायद गाँव की ताकत, उसकी संपन्नता के आंकड़े न हों, लेकिन बाज़ार के नए बाजीगर इन्हीं गाँवों में अपने लिए राह बना रहे हैं। नए विक्रेताओं को ग्रामीण भारत और लोकजीवन की सच्चाइयाँ जानने की ललक अकारण नहीं है। वे इन्हीं जिज्ञासाओं के माध्यम से भारत के ग्रामीण ख़जाने तक पहुँचना चाहते हैं। उपभोक्ता सामग्री से अटे पड़े शहर, मेगा माल्स और बाज़ार अब यदि भारत के लोकजीवन में अपनी जगह तलाश रहे हैं, तो उन्हें उन्हीं मुहावरों का इस्तेमाल करना होगा, जिन्हें भारतीय लोकजीवन समझता है। विविधताओं से भरे देश में किसी संदेश का आख़िरी आदमी तक पहुँच जाना साधारण नहीं होता। कंपनियां अब ऐसी रणनीति बना रही हैं, जो उनकी इस चुनौती को हल कर सकें।

चुनौती साधारण वैसे भी नहीं है, क्योंकि पांच लाख 72 हजार गाँव भर नहीं, वहाँ बोली जाने वाली 33 भाषाएं, 1652 बोलियाँ, संस्कृतियाँ, उनकी उप संस्कृतियाँ और इन सबमें रची-बसी स्थानीय लोकजीवन की भावनाएं इस प्रसंग को बेहद दुरूह बना देती हैं। यह लोकजीवन एक भारत में कई भारत के सांस लेने जैसा है। कोई भी विपणन रणनीति इस पूरे भारत को एक साथ संबोधित नहीं कर सकती। गाँव में रहने वाले लोग, उनकी ज़रूरतें, खरीद और उपभोग के उनके तरीके बेहद अलग-अलग हैं। शहरी बाज़ार ने जिस तरह के तरीकों से अपना विस्तार किया वे फ़ार्मूले इस बाज़ार पर लागू नहीं किए जा सकते। शहरी बाज़ार की हदें जहाँ खत्म होती हैं, क्या भारतीय ग्रामीण बाज़ार वहीं से शुरू होता है, इसे भी देखना ज़रूरी है। ग्रामीण और शहरी भारत के स्वभाव, संवाद, भाषा और शैली में जमीन-आसमान के फ़र्क हैं। देश के मैनेजमेंट गुरू इन्हीं विविधताओं को लेकर शोधरत हैं। यह रास्ता भारतीय बाज़ार के अश्वमेध जैसा कठिन संकल्प है। जहाँ पग-पग पर चुनौतियाँ और बाधाएं हैं।

भारत के लोकजीवन में सालों के बाद झाँकने की यह कोशिश भारतीय बाज़ार के विस्तारवाद के बहाने हो रही है। इसके सुफल प्राप्त करने की कोशिशें हमें तेज़ कर देनी चाहिए, क्योंकि किसी भी इलाके में बाज़ार का जाना वहाँ की प्रवृत्तियों में बदलाव लाता है। वहाँ सूचना और संचार की शक्तियां भी सक्रिय होती हैं, क्योंकि इन्हीं के सहारे बाज़ार अपने संदेश लोगों तक पहुँचा सकता है। जाहिर है यह विस्तारवाद सिर्फ़ बाज़ार का नहीं होगा, सूचनाओं का भी होगा, शिक्षा का भी होगा। अपनी बहुत बाज़ारवादी आकांक्षाओं के बावजूद वहाँ काम करने वाला मीडिया कुछ प्रतिशत में ही सही, सामाजिक सरोकारों का ख्याल ज़रूर रखेगा, ऐसे में गाँवों में सरकार, बाज़ार और मीडिया तीन तरह की शक्तियों का समुच्चय होगा, जो यदि जनता में जागरूकता के थोड़े भी प्रश्न जगा सका, तो शायद ग्रामीण भारत का चेहरा बहुत बदला हुआ होगा। भारत के गाँव और वहाँ रहने वाले किसान बेहद ख़राब स्थितियों के शिकार हैं। उनकी जमीनें तरह-तरह से हथियाकर उन्हें भूमिहीन बनाने के कई तरह के प्रयास चल रहे हैं। इससे एक अलग तरह का असंतोष भी समाज जीवन में दिखने शुरू हो गए हैं। भारतीय बाज़ार के नियंता इन परिस्थितियों का विचार कर अगर मानवीय चेहरा लेकर जाते हैं, तो शायद उनकी सफलता की दर कई गुना हो सकती है। फिलहाल तो आने वाले दिन इसी ग्रामीण बाज़ार पर कब्जे के कई रोचक दृश्य उपस्थित करने वाले हैं, जिसमें कितना भला होगा और कितना बुरा इसका आकलन होना अभी बाकी है?

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दौलतराव वाढ़ेकर

वरिष्ठ व्याख्याता, हिन्दी

केन्द्रीय विद्यालय,

Seminary Hills, Nagpur -440001

डॉ.रामविलास शर्मा : मूल्यांकन की कसौटी
शिखर जैन

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित होते हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। उनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।

इतिहास की समस्याओं से जूझना मानो उनकी पहली प्रतिज्ञा हो। वे भारतीय इतिहास की हर समस्या का निदान खोजने में जुटे रहे। उन्होंने जब यह कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं, तब इसका विरोध हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य पश्चिम एशिया या किसी दूसरे स्थान से भारत में नहीं आए हैं, बल्कि सच यह है कि वे भारत से पश्चिम एशिया की ओर गए हैं। वे लिखते हैं - ‘‘दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है।

इसी दौरान भारतीय आर्यों के दल इराक से लेकर तुर्की तक फैल जाते हैं। वे अपनी भाषा और संस्कृति की छाप सर्वत्र छोड़ते जाते हैं। पूँजीवादी इतिहासकारों ने उल्टी गंगा बहाई है। जो युग आर्यों के बहिर्गमन का है, उसे वे भारत में उनके प्रवेश का युग कहते हैं। इसके साथ ही वे यह प्रयास करते हैं कि पश्चिम एशिया के वर्तमान निवासियों की आँखों से उनकी प्राचीन संस्कृति का वह पक्ष ओझल रहे, जिसका संबंध भारत से है। सबसे पहले स्वयं भारतवासियों को यह संबंध समझना है, फिर उसे अपने पड़ोसियों को समझाना है।

भूखमरी, अशिक्षा, अंधविश्‍वास और नए-नए रोग फैलाने वाली वर्तमान समाज व्यवस्था को बदलना है। इसके लिए भारत और उसके पड़ोसियों का सम्मिलित प्रयास आवश्‍यक है। यह प्रयास जब भी हो, यह अनिवार्य है कि तब पड़ोसियों से हमारे वर्तमान संबंध बदलेंगे और उनके बदलने के साथ वे और हम अपने पुराने संबंधों को नए सिरे से पहचानेंगे। अतीत का वैज्ञानिक, वस्तुपरक विवेचन वर्तमान समाज के पुनर्गठन के प्रश्‍न से जुड़ा हुआ है।’’ (पश्चिम एशिया और ऋग्‍वेद पृष्ठ 20)

भारतीय संस्कृति की पश्चिम एशिया और यूरोप में व्यापकता पर जो शोधपरक कार्य रामविलासजी ने किया है, इस कार्य में उन्होंने नृतत्वशास्त्र, इतिहास, भाषाशास्त्र का सहारा लिया है। शब्दों की संरचना और उनकी उत्पत्ति का विश्‍लेषण कर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आर्यों की भाषा का गहरा प्रभाव यूरोप और पश्चिम एशिया की भाषाओं पर है।

वे लिखते हैं - ‘‘सन्‌ 1786 में ग्रीक, लैटिन और संस्कृत के विद्वान विलियम जोंस ने कहा था, ‘ग्रीक की अपेक्षा संस्कृत अधिक पूर्ण है। लेटिन की अपेक्षा अधिक समृद्ध है और दोनों में किसी की भी अपेक्षा अधिक सुचारू रूप से परिष्कृत है।’ पर दोनों से क्रियामूलों और व्याकरण रूपों में उसका इतना गहरा संबंध है, जितना अकस्मात उत्पन्न नहीं हो सकता। यह संबंध सचमुच ही इतना सुस्पष्ट है कि कोई भी भाषाशास्त्री इन तीनों की परीक्षा करने पर यह विश्‍वास किए बिना नहीं रह सकता कि वे एक ही स्त्रोत से जन्मे हैं। जो स्रोत शायद अब विद्यमान नहीं है।

इसके बाद एक स्रोत भाषा की शाखाओं के रूप में जर्मन, स्लाव, केल्त आदि भाषा मुद्राओं को मिलाकर एक विशाल इंडो यूरोपियन परिवार की धारणा प्रस्तुत की गई। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ने भारी प्रगति की है। अनेक नई-पुरानी भाषाओं के अपने विकास तथा पारस्परिक संबंधों की जानकारी के अलावा बहुत से देशों के प्राचीन इतिहास के बारे में जो धारणाएँ प्रचलित हैं, वे इसी ऐतिहासिक भाषा विज्ञान की देन हैं। आरंभ में यूरोप के विद्वान मानते थे कि उनकी भाषाओं को जन्म देने वाली स्रोत भाषा का गहरा संबंध भारत से है। यह मान्यता मार्क्स के एक भारत संबंधी लेख में भी है।’’

अँग्रेजों के प्रभुत्व से भारतीय जनता की मुक्ति की कामना करते हुए उन्होंने 1833 में लिखा था, ‘‘हम निश्‍चयपूर्वक, न्यूनाधिक सुदूर अवधि में उस महान और दिलचस्प देश को पुनर्जीवित होते देखने की आशा कर सकते हैं, जहाँ के सज्जन निवासी राजकुमार साल्तिकोव (रूसी लेखक) के शब्दों में इटैलियन लोगों से अधिक चतुर और कुशल हैं, जिनकी अधीनता भी एक शांत गरिमा से संतुलित रहती है, जिन्होंने अपने सहज आलस्य के बावजूद अँग्रेज अफसरों को अपनी वीरता से चकित कर दिया है, जिनका देश हमारी भाषाओं, हमारे धर्मों का उद्गम है, और जहाँ प्राचीन जर्मन का स्वरूप जाति में, प्राचीन यूनान का स्वरूप ब्राह्यण में प्रतिबिंबित है।’’ (पश्चिम एशिया और ऋग्‍वेद पृष्ठ 21)

डॉ. रामविलास शर्मा मार्क्सवादी दृष्टि से भारतीय संदर्भों का मूल्यांकन करते हैं, लेकिन वे इन मूल्यों पर स्वयं तो गौरव करते ही हैं, साथ ही अपने पाठकों को निरंतर बताते हैं कि भाषा और साहित्य तथा चिंतन की दृष्टि से भारत अत्यंत प्राचीन राष्ट्र है। वे अँग्रेजों द्वारा लिखवाए गए भारतीय इतिहास को एक षड्यंत्र मानते हैं।

उनका कहना है कि यदि भारत के इतिहास का सही-सही मूल्यांकन करना है तो हमें अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना होगा। अँग्रेजों ने जान-बूझकर भारतीय इतिहास को नष्ट किया है। ऐसा करके ही वे इस महान राष्ट्र पर राज कर सकते थे। भारत में व्याप्त जाति, धर्म के अलगाव का जितना गहरा प्रकटीकरण अँग्रेजों के आने के बाद होता है, उतना गहरा प्रभाव पहले के इतिहास में मौजूद नहीं है। समाज को बाँटकर ही अँग्रेज इस महान राष्ट्र पर शासन कर सकते थे और उन्होंने वही किया भी है

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"वृन्दावन",

रायपुर, देहरादून (उत्तराखंड)

हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी!
सदियों से मैं मजदूर हूं
चलाता रहा हूं चरखा
कभी खोदता रहा हूं गडढा
बनाता रहा हूं इमारत 

बहाता रहा हूं पसीना
सदियों से मेरे पसीने पर
मेरे खून पर
तुम करते रहे हो मौज
मैं देखता हूं, समझता हूं
पर खामोशी से चलाता हूं कुल्हाड़ी
मुझे पता है मेरे बिना नहीं अस्तित्व तुम्हारा
जिस दिन चाहूंगा हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी
लेकिन खामोशी में ही मेरी है खुशी
पसीना बहाए बिना मुझे नींद नहीं आती।
राकेश कुमार मालवीय

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Rakesh Kumar Malviya
Journalist

www.patiyebaji.blogspot.com

http://www.bhaskar.com/

कहानी –  भुज्यु-राज की सागर में डूबने से रक्षा ... ( अश्विनीकुमार बंधुओं का एक और सफल आपात-चिकित्सकीय अभियान )
                                                           (डॉ. श्याम गुप्त)
श्रीकांत जी घूमते हुए महेश जी के घर पहुंचे तो वे लिखने में व्यस्त थे। क्या हो रहा है महेश जी ? श्रीकांत जी ने पूछा तो महेश जी ने बताया, ‘ एक कथा लिखी है, लो पढ़ो’,  महेश जी ने श्रीमती जी को- ‘अरे भई, चाय बनाइये, श्रीकांत जी आये हैं’- आवाज लगाते हुए कहा। श्रीकांत जी पढने लगे


विश्व-शासन व्यवस्था के अधिपति श्रीमन्नारायण की केन्द्रीय राजधानी के “क्षीर-सागर” स्थित महा-मुख्यालय से स्वर्गाधिपति इंद्र के माध्यम से विश्व-चिकित्सा महामुख्यालय के प्रभारी अश्विनी-बंधुओं को आकाशवाणी द्वारा एक आपातकालीन सन्देश प्राप्त हुआ कि श्रीमन्नारायण के सुदूर-उत्तरवर्ती महासागर स्थित मित्र-देश “नार-वेश” के भुज्यु-राज को सागर में डूबने से बचाना है। अश्विनी-बंधु अपने तीव्रगति से आकाशगामी त्रिकोणीय रथ द्वारा तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए।


भुज्यु-राज पृथ्वी के सुदूर उत्तरवर्ती महासागर स्थित तटीय राज्य ‘नारवेश’ के तटीय अन्न-उत्पादक क्षेत्रों एवं सागरीय भोज्य-पदार्थों के उत्पादक एवं विश्व की खाद्य-पदार्थ सामग्री आपूर्ति की एक प्रमुख श्रृंखला थे। तीव्रगति से अकाश-गमनीय त्रिकोण-रथ वाले भ्राता-द्वय, वैद्यराज अश्विनीकुमार ही सर्व-शस्त्र-शास्त्र संपन्न, सचल-चिकित्सावाहन के एकमात्र नियामक, संचालक व विशेषज्ञ थे। देव, असुर, दानव, मानव सभी के द्वारा स्वास्थ्य, चिकित्सा व आपातकालीन उपायों हेतु उन्हीं से अभ्यर्थना की जाती थी| वे विश्व भर में अपने सफल चिकित्सकीय व आपातकालीन अभियानों के लिए प्रसिद्ध थे।
अपने रथ पर गमन करते हुए अश्विनी-कुमारों ने ज्ञात कर लिया कि भुज्यु-राज का भोज्य-सामग्री वितरक एक वाणिज्यिक जलयान हिम-सागर के मध्य किसी हिम-शैल से टकराकर क्षतिग्रस्त हुआ है और डूबने जा रहा है। वे जिस समय ‘नार-वेश’ पहुंचे वहाँ रात्रि थी। प्रातः के नाम पर सूर्यदेव सिर्फ कुछ समय के लिए दर्शन देकर अस्ताचल को चले जाया करते थे। वे पहले भी एक बार इस प्रदेश में एक सफल अभियान कर चुके थे, जब देव-गुरु बृहस्पति की गायों को असुरों ने अपहरण करके इस अंधकारमय प्रदेश की गुफाओं में छुपा दिया था। उन्होंने बृहस्पति, सरमा व देवराज इंद्र के साथ सफल अभियान में गौओं को पुनः खोजकर मुक्त कराया था। यद्यपि उस समय उन्हें लंबी रात के समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी पड़ी थी और दिन होने पर ही गायों की खोज हो सकी थी। परन्तु यह आपात-स्थिति थी अतः दिन होने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी।


अश्विनी-बंधुओं ने तुरंत ही यान में स्थित सामान्य सूर्य व चन्द्रमा के ‘प्रकाश-सकेन्द्रण व एकत्रण’ यंत्रों के सहायता से दुर्घटना-स्थल का स्थान खोजने का प्रयत्न किया परन्तु सुनिश्चित स्थल का निर्धारण नहीं हो पा रहा था। अतः उन्होंने तुरंत ही अपने विशिष्ट सूर्यदेव व चंद्रदेव के स्तुति-मन्त्रों द्वारा तीब्र प्रकाश उत्पन्न करने के यंत्रों का आवाहन किया। उनके अवतरित होते ही संचालन कुशलता से समस्त क्षेत्र की खोज की गयी| नार-वेश के तटीय समुद्र से और सुदूरवर्ती उत्तरी सागर-भाग में उन्हें भुज्यु-राज का डूबता हुआ जलयान दिखाई दिया, जो एक बहुत बड़े हिम-शैल से टकराकर उसकी ओर झुकता हुआ धीरे-धीरे डूब रहा था। त्वरित कार्यवाही करते हुए यान से स्वचालित रज्जु-मार्ग को लटकाते हुए भुज्यु-राज एवं उनके समस्त साथियों को बचाकर त्रिकोणीय--आकाश-रथ पर चढाया गया जो आवश्यकतानुसार छोटा व विस्तारित किया जा सकता था एवं चिकित्सकीय व जीवनोपयोगी सर्व-साधन संपन्न था।


शीत-लहरों के थपेडों व मौसम से आक्रान्त व भयाक्रांत भुज्यु-दल को उचित सर्वांग- चिकित्सा सहायता से जीवनदान व स्वास्थ्य प्रदान किया गया एवं उन्हें उनके आवास पर पहुंचाया गया।


इस प्रकार अश्विनी-बंधुओं का एक और कठिन, साहसिक, चिकित्सकीय आपात-सेवा अभियान संपन्न हुआ| विश्व शासन व्यवस्था के महालेखाकार ‘व्यास’ द्वारा इस अभियान का पूर्ण-विवरण विश्व-शासन के शास्त्रीय अभिलेखों के संचयन-कोष ‘वेदों’ के स्मृति-खंड में लिखकर संचित व संरक्षित किया गया।


        ‘ये क्या कपोल-कल्पित गप्प लिख मारी है|’  श्रीकांत जी बोले, ’कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा जोड़-जाड कर।’


        ‘हाँ यार ! कहानी है तो गल्प तो होगी ही। और गल्प में इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर ही लिखा जाता है|’, महेश जी हंसकर बोले, ’परन्तु जो कुछ इधर-उधर से जोड़ा जाता है वह उसमें तथ्य होगा तभी तो वह इधर-उधर भ्रमण कर रहा होगा। कहीं से लेखक की पकड़ में आया और उस पर कथा का भवन खड़ा हुआ।’


      ‘ तो क्या इसमें कुछ तथ्य भी है ?’, श्रीकांत जी ने आश्चर्य से पूछा।
       ‘कुछ तो है, सोचो।’ महेश जी ने कहा।


      ‘यार ! जैसा स्थान-समय, दिन-रात आदि का वर्णन है इससे तो...’ वे सोचते हुए बोले, ‘जितना मैं जानता हूँ उत्तरी-ध्रुवीय प्रदेशों ...नार्वे आदि से मिलता जुलता है, और कुछ तो मेरी समझ से बाहर है।’


      ‘सही पहुंचे। शेष तो पहचान सकते ही हो कि वैदिक -पौराणिक नामों, स्थानों का काल्पनिक सामंजस्य ही है।’ महेश जी ने बताया।


      ‘क्या बात है ! तुम कवि-लेखक लोग भी खूब हो। कहाँ-कहाँ से दूर की कौड़ी समेट लाते हो।’ श्रीकांत जी चाय पीते हुए कहने लगे।

आती है आतंकवाद की सलगिरह,

शहीदों की मृत्यु जयन्ती आती है -

जब नवम्बर की छ्ब्बीसवीं तारीख आती है /

त्राहिमाम की आवाज से गूंज उठ था भारतवर्ष /

बम्ब के विस्फोटों ने हिला दी थी सत्य और अहिंसा की दीवारें /

भारत माँ ने न जाने खोई थी कितनी संतानें /

द्रवित हो जाता है दिल ,

आँखों से नीर बहता है -

जब छब्बीस नवम्बर का वो दृश्य यादों में तैरता है /

ताज होटल ,नरीमन हाऊस ,पर्यटन स्थल नहीं

श्मशान बन गए थे /

यहाँ पर आतंकवाद के नए पताके गढ़ गए थे /

मिटा दिया हमने कसाब को/

कसाबियत नहीं मिटा पाए /

अब भी घूम रहे हैं कई कसाब आजाद

उन्हें हम अब तक सजा नहीं दे पाए /

सोचता हूँ- क्या ये सिर्फ छब्बीस नवम्बर को ही होता है ?

अरे! ये तो वो हर उस दिन होता है जब भारत का कोई बच्चा भूखा सोता है /

आज गरीबी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने भारत माँ को रुलाया है /

फिर क्यू हमारे उसूलों को हमने अब तक सुलाया है ?

वो हर दिन जब हमारा रूपया डॉलर के आगे छोटा पड़ जाता है,

वो हर दिन जब कोई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है ,

जब जला दी जाती है कोई दुल्हन दहेज़ की आग में ,

गोटालों की बम्बारी से जब हमारी नैतिकता को रौंदा जाता है -

वो हर दिन नवम्बर की छब्बीसवीं तारीख बन जाता है /

हर उस दिन छब्बीस नवम्बर की उसी घटना को फिर से दोहराया जाता है /

कुछ ही समय में हम जनसंख्या में

चीन से भी आगे पहुँच जाएँगे /

अधिकतम जनसंख्या वाला देश कहलाएँगे /

कभी सोचा है- क्या खाएँगे और क्या खिलाएँगे?

इतिहास कहता है- भारत सोने की चिड़िया था

इसका हर एक पंख सुनहरा था /

मैं तो कहता हूँ -भारत अब भी सुनहरा है

सोने की चिड़िया है /

लेकिन नोच दिए हैं उसके पंख

भर दिया उन पंखों को काले धन के नालों में

क्यों .........?

क्यों हर तारीख छब्बीस नवम्बर बना दी जाती है ?

1ली किश्त | 2री किश्त | 3री किश्त | 4थी किश्त | 5वीं किश्त | 6वीं किश्त | 7वीं किश्त

वसीयत – ८ : उपन्यास: हरीन्द्र दवे – भाषांतर: हर्षद दवे

‘आप का ही नाम मानसिंह है, ठीक है?’ इन्स्पेक्टर न्यालचंद ने पिछले तीन दिन से पुलिस की हिरासत में रखे गए मुलजिम की पूछताछ शुरू की 

‘जी हाँ, साहब.’ जवाब देनेवाला युवक मानसिंह चतुर था. उस के चेहरे पर कुछ थकान थी. पुलिस कस्टडी में उस पर शायद बलप्रयोग हुआ हो ऐसा लगता था. परन्तु उस के कसकर बंद किये गए होंठों पर दृढ़ता थी और आँखों में चमक थी.

‘आप श्रीमती मोहिनी पंडित को जानते थे?’

‘पिछले तीन दिन में यह प्रश्न मुझ से बीसवीं बार पूछा गया है. आप पुलिस के आदमी एक ही सवाल बार बार पूछकर सामने वाले आदमी को क्यों थका देते हो?’

‘कभी थकान में सच बोल दें इसलिए,’ इन्स्पेक्टर ने हंसकर कहा: ‘इसलिए इक्कीसवीं बार आप इस प्रश्न का उत्तर दीजिए ऐसी मेरी इच्छा है.’

‘इन्स्पेक्टर साहब, आप आपके साथियों से कुछ अलग से दीखते है, इसलिए आप को अधिक मात्रा में सत्य बताना पसंद करूँगा,’ मानसिंह ने गंभीरतापूर्वक कहा.

‘मैं सुन रहा हूँ.’

‘पहली बार मुझ से यह सवाल किया गया तब मैं इस नाम से बिलकुल अपरिचित था. परन्तु बाद में पुलिस बार बार यह प्रश्न पूछती रही और अब मुझे इस नाम की आदत पड चुकी है. जिस स्त्री को मैंने कभी देखा तक नहीं, उस स्त्री के बारे में मुझे बहुत कुछ मालूम हो गया है. मुझे मालूम है की इस स्त्री की ह्त्या हुई है.’

‘आप को कैसे मालूम हुआ?’

‘साहब, विदेशिओं के साथ राजस्थान में गाइड के रूप में घूमना हो तो आपको अखबारों पर नजर डालनी ही होगी. आप के लिए यह बहुत ही पेचीदा मामला है और एक चुनौती मानकर उसे आपने हाथ में लिया है, ऐसा आप ने एक पत्रकार को बैंगलोर में कहा था यह भी मैंने पढ़ा है.’

‘आप इस केस का दिलचस्पी से अभ्यास करते है ऐसा लगता है. कॉफ़ी लेंगे?’

‘अवश्य, इन्स्पेक्टर साहब. इस पुलिस कस्टडी में मेरे साथ इंसानियत से बात करनेवाले आप दू दूसरे आदमी है.’

‘पहला कौन था?’

‘जिस के सामने मुझे रिमांड के लिए पेश किया गया था वे मजिस्ट्रेट मानवतापूर्ण थे. उन्होंने आप के मदद्नीश को स्पष्टरूप से पूछा था कि इस आदमी पर संदेह करने के लिए कोई खास वजह है? आप के मदद्नीश के पास साफ़ जवाब नहीं था, परन्तु मेरी पूछताछ करने से शायद हत्या का कोई महत्वपूर्ण सुराग मिल सकता है ऐसा कहकर मुझे इस पुलिस कस्टडी में रहने का अनुभव करवाया. टूरिस्टों को भारतीय संस्कृति के साथ भारत की गरीबी, भारत के भिखारी नागरिक सभ्यता से विरुद्ध के भारतीय नागरिकों का व्यवहार इत्यादि बताता फिरता हूँ. अब एक चीज और दिखा पाऊंगा – भारत की पुलिस का हवालात.’

‘ज्यादा स्मार्ट बनाने की कोशिश मत कीजिए, मानसिंह,’ इन्स्पेक्टर न्याल्चंद ने हवलदार को दो कॉफ़ी लाने के लिए कहा.

‘यदि सच कहना स्मार्टनेस हो तो स्मार्टनेस के लिए माफ़ी चाहता हूँ. परन्तु श्रीमती मोहिनी पंडित के बारे में मुझे सब से पहले सवाल किया गया तब वह नाम याददाश्त पर जोर दे कर ढूंढा परन्तु परिचित सा नहीं लग रहा था. किन्तु बाद में अख़बारों में इस के बारे में काफी कुछ पढ़ा था. पहली बार पुलिस ने मेरी पूछताछ की तब ऐसा लगता था कि चलो जान छूटी. लेकिन अभी आपके मददनीश ने पूछताछ के लिए मुझे हिरासत में लिया तब ऐसा लगा कि इस बदनसीब स्त्री की जायदाद तो जिसे मिलनी होगी उसे मिलेगी. किन्तु मेरा इस स्त्री के साथ सम्बन्ध जोड़ा जाएगा और मुझे कुछ रातें पुलिस कस्टडी में बितानी पड़ेगी.’

‘आई एम सॉरी, मानसिंह, आप अभी हिरासत में हैं इस बात का असर आप के दिमाग पर होगा यह मैं समझ सकता हूँ. परन्तु अगर आप मुझे सहयोग देंगे तो मुझे अच्छा लगेगा.’

‘साहब, मैं नशा नहीं करता. परन्तु आपने जिस प्रकार से इंसानियत दर्शाई, आप के साथ बिठाकर कॉफ़ी के लिए पूछा इस खुशी में मैं जो कुछ भी जानता हूँ वह सब कुछ सच सच बता दूंगा.’

‘बाइसवीं बार भी मुझे इसी सवाल से शुरूआत करनी पड़ेगी...’

‘श्रीमती मोहिनी पंडित का नाम सब से पहले आप के मददनिश सब-इन्स्पेक्टर जायसवाल ने जब तक नहीं पूछा था, तब तक मैं नहीं जानता था. इस के बाद अख़बारों ने यह नाम मुझ से अपरिचित नहीं रहने दिया.’

‘वेल,’ न्यालचंद ने जेब से मोहिनी की तसवीर निकाली और उसे मानसिंह के हाथ में रखते हुए कहा : ‘आप इस तसवीर में नजर आ रही व्यक्ति को जानते हैं?’

‘यह तसवीर मैंने अख़बारों में कई बार देखी है, परन्तु आप से यह कहने के लिए तैयार हूँ कि इस तसवीरवाली व्यक्ति को मैंने देखा है.’

न्यालचंद चौंका. परन्तु अपने चेहरे पर पलभर में पहले की सी स्वस्थता ला कर उसने कहा: ‘इंटरेस्टिंग, श्रीमती मोहिनी पंडित को उन की हत्या से पहले देखनेवाले आप पहले ही अज्ञात व्यक्ति हो. आप ने कब और कैसी स्थिति में उन को देखा था?’

‘डेनिस मेकार्थी एवं श्रीमती लिली मेकार्थी के नामों से आप अच्छी तरह से परिचित हैं.’

‘हाँ, परन्तु आप के जितना नहीं.’ न्यालचंद ने कहा.

‘अच्छा कपल है. वे जब भी भारत आते हैं तब जयपुर एवं राजस्थान के प्रदेश में उनकी महेमान नवाजी मुझे ही करनी होती है. कभी वे मुझे दिल्ली तक ले गए हैं.’

‘आप के इन प्रवासों से मैं अनभिज्ञ था.’

‘इन्स्पेक्टर साहब, आप के डिपार्टमेंट का होमवर्क उतना कच्चा होगा. मैं बकायदा गाइड हूँ और आप के टूरिजम विभाग को मेरे ये सारे ‘असाइनमेंट’ के बारे में पूरी जानकारी है.’

न्यालचंद ने होंठ चबाये. यह युवक या बिलकुल सही बोल रहा है, या फिर कुछ ज्यादा ही

जानता है! उन्होंने जवाब नहीं दिया केवल प्रश्नसूचक दृष्टि से मानसिंह की ओर देखा.

‘टू द पॉइंट बात बताऊँ तो ये दोनों पुरातत्वशाश्त्री हैं. मेरा स्पष्ट ख्याल है कि इस फोटोग्राफ में दिख रही स्त्री को मैंने पिछले साल दिल्ली के मौर्य शेरेटन में मिस्टर एंड मिसेज मेकार्थी के साथ खाना लेते हुए देखा था.’

‘यह जानकारी आप ने पहले की पुलिस छानबीन में क्यों नहीं दी?’

‘मुझ से पूछा नहीं गया था.’

‘वेल, आप सरसपुर के डाक बंगले तक इस कपल के साथ गए थे?’

‘नहीं.’

‘क्यों?’

‘उन की भारत की ये छठवीं मुलाकात थीं. हरेक जगह वे मुझे अपने साथ ले कर ही जाते थे ऐसा नहीं है. सरसपुर गए तब वे अकेले गए थे.’

‘उन का कार्यक्रम क्या था?’

‘वे वहाँ से आगे किसी पुरातत्व से सम्बंधित जगह की तलाश करनेवाले थे. वहाँ से गाड़ी के जरिये दिल्ली जानेवाले थे. फिर सीधे अपने देश जानेवाले थे.’

‘वे कहाँ से है?’

‘यह एक सवाल का जवाब आप जानते हैं. ये दोनों डबलिन के हैं. वहाँ की यूनिवर्सिटी में दोनों पुरातत्वविद्या के संशोधन विभाग में कार्य करते हैं.’

‘वे दोनों श्रीमती मोहिनी पंडित को पहचानते थे?’

‘हाँ. अच्छी तरह से पहचानते हैं ऐसा लगा मुझे.’

‘उन्होंने श्रीमती पंडित के साथ क्या बातें की यह आप बता सकते हैं?’

‘साहबलोग अपने मेहमान को फाइवस्टार होटल में भोजन के लिए जब ले जाते हैं तब गाइड को साथ नहीं रखते. होटल के लाउंज में वे लोग मिले तब संयोग से मैं उपस्थित था. उन की अच्छी जानपहचान हो ऐसा लगा.’

‘जो कुछ भी थोड़े-बहुत शब्दों का आदान-प्रदान उन लोगों के बीच हुआ हो यह बता सकते हैं आप?’

‘हाँ, श्रीमती मेकार्थी और मैं दोपहर के बाद के कार्यक्रम के बारे में बातें कर रहे थे. तभी डेनिस मेकार्थी ने ‘वेलकम मेडम’ कहकर एक मध्यम उम्र की सुन्दर स्त्री का सत्कार किया और श्रीमती मेकार्थी भी मेरे साथ बातें छोड़कर उन से हाथ मिलाते हुए बोलीं: ‘आप आज मिलने का प्रबंध कर पाएं इसलिए आप का शुक्रिया. हम कल ही डबलिन जा रहे हैं, इसलिए आज आप से मुलाकात हो पाई इस बात की बहुत ही खुशी हुई है.’ बाद में श्रीमती मेकार्थी ने मुझ से कहा: ‘मान, तूं दोपहर तीन बजे हमें यहीं पर मिलना. हम तुम्हारा इन्तजार करेंगे.’ उस के बाद मैं वहाँ से निकल गया. उस समय दोपहर के साढ़े बारह बजे थे. फिर तीन बजे पहुंचा तब श्री एवं श्रीमती मेकार्थी तैयार हो कर मेरे साथ बाहर निकलने के लिए मेरा इन्तजार कर रहे थे.’

‘वाहन से आप कहाँ गए?’

‘हरियाणा में एकाध आर्कियोलोजिकल साईट देखने के लिए गए थे.’

‘उनकी बातचीत में कहीं भी श्रीमती पंडित का नाम सुनाई पड़ा था?’

‘नहीं.’

‘क्या आप को यकीन है कि आपने पिछले साल दिल्ली के मौर्य शेरेटन में जिन को देखा था वह श्रीमती पंडित ही थी?’

‘हाँ.’

‘आप उन से कब मिले थे यह बता सकते हैं?’

‘हाँ. तारीख और दिन के साथ कह सकता हूँ परन्तु इस के लिए मुझे मेरी डायरी देखनी पड़ेगी. या यहाँ के टूरिज्म विभाग में भी मेरा वह प्रवास नोट किया हुआ है, वह रिकार्ड देखना होगा.’

न्यालचंद यह चतुर फिर भी सच्चे व पारदर्शी युवक की और देखते रहे. ‘आप ने यह सब पहले क्यों नहीं बताया?’

‘अभी मैंने कहा न कि मुझ से पूछा नहीं गया था. और फिर आप से मिलकर लगा कि आप की जांच में उपयोगी हो सके ऐसा कुछ कह पाऊं तो अच्छा.’

‘और भी ऐसा कुछ जानते हैं जो मेरी इस जांच में सहायक हो सके?’

‘विशेष कुछ नहीं. फिर भी डेनिस मेकार्थी उन की पत्नी से बातें कर रहे थे कि जरूरत पड़ेगी तो हम दिल्ली से काठमांडू जाएंगे.’

न्यालचंद चौंके: ‘किस सन्दर्भ में वे ये बातें कर रहे थे?’

‘यह मुझे नहीं मालूम. मैं उन के नजदीक गया तब उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़े उस के पहले उनके द्वारा कहा गया यह अंतिम वाक्य था. बाद में उन्होंने मुझे ‘टीप’ दी और वे सरसपुर जाने के लिए निकल गए.’

‘वेरी इंटरेस्टिंग,’ न्यालचंद ने कहा, ‘आपने एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है. वे दिल्ली से नहीं परन्तु नेपाल से अपने देश गए हो ऐसा हो सकता है.’

‘इसी दृष्टि से मेरा सुना हुआ यह वाक्य मुझे अर्थपूर्ण लगा.’

‘मैं आज ही मजिस्ट्रेट के पास आप को भेज रहा हूँ. आप की पूछताछ पूरी हो गई है. आप को मुक्त कर दिया जाएगा – केवल जरूरत पड़ने पर आप इसी तरह से सहयोग देंगे इस शर्त पर! और एक बात यह कि जयपुर छोड़ने से पहले आप को हमारी अनुमति लेनी होगी.

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शेफाली के आने के दिन उस के हॉस्टल में एक छोटा सा उत्सव मनाया गया. श्रीमती डिसूजा शेफाली से गले लगकर फूट फूटकर रो पड़ी: ‘बेटी, तेरे जाने के बाद तूने एक चिठ्ठी भी नहीं लिखी? परन्तु हमने अखबार में पढ़ा. डॉक्टर अंकल चल बसे उस पर अफ़सोस हो रहा है. साथ ही तेरे ऊपर वसीयत में जो ममता दर्शाई गई है इस बात का हर्ष भी है.’

‘मेडम’, शेफाली की आँखे भर आईं. वह कुछ कह नहीं पाई. उसने अपना सर श्रीमती डिसूजा के कंधे पर रख दिया. श्रीमती डिसूजा ने शेफाली के सर व बदन पर सहलाया और उसे दिलासा दिया.

देखते देखते सारा हॉस्टल श्रीमती डिसूजा के कक्ष के बाहर जमा हो गया. सामान्य संजोग होते तो श्रीमती डिसूजा के लिए यह ऐसी अनुशासनहीनता असह्य बन जाती. परन्तु आज वह खुद ही गुस्सा होने के मूड में नहीं थीं. ‘नंदिता’, उन्होंने कहा, ‘शेफाली को उस के रूम पर ले जा. अब तुम यहीं रहनेवाली है न?’ उन्होंने पूछा. शेफाली अभी भी सिसक रही थी. शंकर ने पानी लाकर दिया. पानी पी कर स्वस्थ हो कर उस ने कहा: ‘अभी पन्द्रह दिन तक निश्चित रूप से यहीं पर हूँ.’

‘क्यों?’

‘लगता है कि अब वहाँ पढ़ाई करनी पड़ेगी.’

श्रीमती डिसूजा ने आगे कोई प्रश्न नहीं पूछा. इस जवाब से उसे बहुत कुछ समझ में आ गया. अब शेफाली राव किसी मध्यवर्गीय परिवार की पुत्री या डॉक्टर पंडित नाम के एक नामी डॉक्टर की पालित पुत्री नहीं रही. वह इस हॉस्टल के हर किसी से भी ज्यादा दौलतमंद थी. और डॉक्टर पंडित की वसीयत, श्रीमती पंडित की हत्या, उस का वारिस इत्यादि बातें बढाचढा के अखबारवाले व पत्रिकावाले बढ़ाचढाकर प्रकाशित करते थे इसलिए शेफाली भी प्रख्यात हो गई थी.

नंदिता एवं अन्य सखियाँ शेफाली को उस के रूम में ले गई. सब के बीच जैसे जुदाई का एक भाव पैदा हो गया हो इस प्रकार से सब व्यवहार करने लगीं थी. अपने कक्ष का सबकुछ यथा स्थान पर वैसा का वैसा ही था. मुंबई छोड़ने से पहले डॉ. उमेश मिश्र का फोन आया तब टेबिल पर अधूरा छोड़ा उपन्यास भी अभी ऐसे ही पडा था. हाँ, टेबिल की सफाई करते वक्त सफाई करने पर उस की रूम-मेट राजश्री ने उसको अवश्य छूआ होगा. किन्तु बुकमार्क का स्थान नहीं बदला था. उस के लोकर में चाबी भी ऐसे ही लगी हुइ थी: ‘राजश्री कह रही थी कि तू लोकर बंद करना भूल गई थी. परन्तु तेरे लोकर में किसी का प्रेमपत्र कहाँ से मिल पाता!’ नंदिता ने मजाक किया. शेफाली हंसी. बोझिल माहौल कुछ हलका हुआ.

शेफाली के लिए ये दिन काफी मुश्किल के बन गए. उस रात वह राजश्री एवं नंदिता के साथ बातों में मशगूल हो गई. कोलेज में क्या हुआ था इस विषय पर जो बातें थीं वो तुरंत खत्म हो गईं.

‘शेफाली, अचानक ये सारी घटनाएं घटीं इस से तुझे कैसा लग रहा है?’ राजश्री ने पूछा.

‘राज, मैं घबरा गई हूँ. दरअसल मुझे जरूरत थी डॉक्टर अंकल के स्नेह की, वसीयत की नहीं. और एक साथ दो दो मौतें... मैं अब तक उस सदमे से संभल नहीं पाई हूँ. ऐसी स्थिति में मैं हूँ.’

‘सॉरी, हमें तुझे ऐसी एम्ब्रसिंग स्थिति में नहीं रखना चाहिए था. परन्तु कल तक हमारे साथ बातें करती, घूमती फिरती, गपशप करती मित्र आज जैसे हमसे अचानक दूर दूर चली गई हो ऐसा लगता है.’

‘नहीं, मैं कहीं नहीं गई संयोग ने मुझे बैंगलोर में रहने के लिए मजबूर किया है. परन्तु इससे यह हॉस्टल, यह मुंबई का सागर, ऐसे मित्र दूर थोड़े ही हो जाते है? आप के साथ बातें करने से मुझे कुछ अच्छा लग रहा है. आप को यह पूछने को भी मन करता है कि यदि आप के साथ यदि ऐसा होता तो आप क्या करतीं?’

‘मुझे इतने सारे रुपये मिले तो शायद मैं पागल ही हो जाऊं.’ नंदिता ने कहा.

‘मैं उस लड़के के साथ ब्याह कर के वसीयत का झगड़ा ही मिटा देती.’ राजश्री ने कहा.

तीनों एक साथ हंस पड़ी.

‘इस बात का हल अगर इतना आसान होता तो कब का मामला निपट गया होता.’ नंदिता ने कहा, ‘जीवन में सरल हल तो होते ही नहीं है.’

‘राज, नंदिता बिलकुल ठीक कह रही है. पहले मेरे निर्वाह के लिए मैं पैसे को ज्यादा एहमियत देती थी. अब मुझे इस संपत्ति का बोझ उठाना पड रहा है. इतनी सारी संपत्ति का मैं क्या उपयोग कर सकती हूँ? फिर भी अखरनेवाली बात यह है कि इस के लिए मुझे मुकद्दमा लड़ना पड रहा है.’

‘वह लड़का कैसा है?’

‘कौन?’ शेफाली ने पूछा और फिर तुरंत हंस पड़ी, ‘सरदार पृथ्वीसिंह की आप बात करतीं हैं? अच्छा लड़का है. सुसंस्कृत, विवेकपूर्ण, चारु, हँसमुख एवं बच्चे जैसा निर्दोष है.’

‘फिर झगड़ा किस बात का है?’

‘अखबारों में लिखते हैं कि वसीयत का झगडा है. भारत के कानून के इतिहास में अद्वितीय ऐसा केस बैंगलोर की अदालत के सामने आया है.’

‘झगड़ा तो है नहीं. मुझे जो भी मिला है वह भी ज्यादा है. पृथ्वीसिंह भी कुछ ज्यादा चाहता हो ऐसा नहीं लग रहा. वे तो केवल मोहिनी आंटी की हत्या का भेद खुल जाए इस का बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं.

‘आंटी की हत्या का कारण क्या हो सकता है?’

‘यह तो मैं भी समझ नहीं पा रही. मोहिनी आंटी किसी से बैर रख ही नहीं पाते, न तो उनकी किसी से कोई अनबन हो सकती है. फिर कोई उन की हत्या क्यों करता?’

ऐसी ही कुछ बातों के बाद राजश्री, नंदिता सो गए. शेफाली अपने बिस्तर में जागृत अवस्था में पड़ी रही. वह पहली ही बार इस जगह अकेलापन महसूस करने लगी. तीन साल वह इस कक्ष में रही है. हाँ, उस के रूम पार्टनर बदलते रहे थे. परन्तु उस का बिस्तर इसी जगह पर रहा है. खिड़की के पास, कम्पाउंड का वृक्ष और आसमान दिखाई दे उस प्रकार से. वृक्ष एवं आसमान उसे अत्यंत प्रिय थे. इस समय भी वह आसमान की ओर देख रही थी. वृक्ष को देखते ही उसे बैंगलोर याद आया. पृथ्वीसिंह को जब वह पिछली बार मिली तब अपने द्वारा कहे गए शब्द याद आये: ‘मुंबई में वृक्ष खोजने पड़ते हैं. यहाँ वृक्ष हमें खोजते हुए आते हैं.’ इस समय उसे पृथ्वीसिंह की याद क्यों आ रही है? राजश्री हँसते हँसते कैसा बोल गई. यदि वह स्वयं पृथ्वीसिंह से शादी कर लेती तो – परन्तु वह उस विचार तक पहुँच ही नहीं पाई. पृथ्वी उसे पसंद था. वह उस के साथ बातें करना पसंद करती थी. उसकी पारदर्शी सरलता एवं निर्दोषता उसे भीतर तक छू गई थी. पृथ्वीसिंह में सरलता थी, मधुरता थी और संपत्ति के बारे में निस्पृहता भी थी. फिर भी उस के लिए एक मित्र की हैसियत से आगे वह कुछ सोच नहीं पाई. उस रात उसे नींद में कभी राजश्री, कभी पृथ्वीसिंह तो कभी मोहिनी आंटी एक के बाद एक दीखते रहे. अशांत रात के बाद वह जब बिस्तर से उठी तब राजश्री कब की तैयार हो कर बैठी थी, ‘चल, कॉलेज चलना है न?’

शेफाली ने जंभाई लेते हुए कहा: ‘रात देर से बाद मेरी आँखें लगीं...हम..घंटेभर के बाद निकलते हैं.

इस एक घंटे के दौरान शेफाली प्रथम श्रीमती डिसूजा के पास गई और कहा: ‘आप की प्रार्थना में मैं शाम को शरीक होउंगी ही, परन्तु अभी भी आप मेरे लए प्रार्थना कीजिये. मैं बहुत घबडाई हुई हूँ.’

‘फ़िक्र मत कर, बेटी, सब ठीक हो जाएगा. इशु जिस का ख्याल रखते हैं उस का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता.’ श्रीमती डिसूजा ने कहा. उन्होंने आँखे मूंदीं. मन ही मन कुछ अस्पष्ट स्वर में बोलीं और शेफाली के सर पर हाथ रखकर कहा: ‘जो कुछ भी करें उस में ईश्वर शामिल है उतना याद रखना. सब कुछ ठीक हो जाएगा.’ शेफाली को बहुत ही अच्छा लगा.

वह हॉस्टल से बाहर निकली. सामने ही बस-स्टाप था. वहाँ से उसे बस मिल सकती थी. बस की क़तार में उस के हॉस्टल की उन से जुनियर दो तीन लड़कियां थीं. शेफाली बस-स्टाप पर खड़ी रहे इस से वह हैरत में पड गईं. उन्होंने शेफाली को आदर के साथ देखा और स्मित किया.

शेफाली कॉलेज पहुंची. उन के अध्यापक, सहाध्यायी सब शेफाली को देखकर खुश हुए. परन्तु शेफाली अब मुंबई में नहीं पढ़ेगी यह जानकर वे हताश हो गए. यूनिवर्सिटी ट्रांसफर करवाने के लिए आवेदन कैसे करें, कहाँ करें इस के बारे में मार्गदर्शन प्राप्त किया. के.इ.एम्. अस्पताल के इस कॉलेज बिल्डिंग के साथ उसे लगाव हो गया था. जब वह उस विशाल मकान की शानदार सीढ़ियाँ उतर रही थी तब उस का कुछ उस मकान में पीछे छूट रहा था ऐसा वह अनुभव कर रही थी. जो यहाँ छोड़कर जा रही थी वह उसे बैंगलोर से मिलनेवाला था उस से कहीं अधिक मूल्यवान था ऐसा उसे लगता था. वह सन्न हो कर अंतिम सोपान उतर ही रही थी कि सहसा कोई परिचित आवाज उस के कानों में पड़ी: ‘शेफाली!’ वह चौंकी, उस ने देखा तो सामने की लिफ्ट में दरवाजे पर डॉ. उमेश मिश्र खड़े थे.

शेफाली के विस्मय का ठिकाना न रहा. वह बैंगलोर में नहीं मुंबई में ही है इस की तसल्ली करने के लिए उस ने एक बार चारों और देख लिया और फिर पूछा: ‘डॉ. मिश्र, आप यहाँ कैसे?’

‘अपने एक पेशंट को मैंने मुंबई ऑपरेशन के लिए कहा था. पेशंट का आग्रह था कि ऑपरेशन के समय मैं उपस्थित रहूँ.’

‘यहाँ के. इ. एम. में है?’

‘नहीं, वह जसलोक में है. ऑपरेशन भी हो गया. पेशंट की स्थिति काफी अच्छी है. इसलिए सोचा कि आप से मिलने का चांस लूं.’

‘आप को कैसे पता चला__’

‘कल मुझे निकालना था इसलिए मैं आप से और श्री कृष्णराव से मिलने आपके घर पर आया था. मुझे पता चला कि आप चौबीस घंटे पहले ही मुंबई चली गई हो. कृष्णराव ने मुझ से कहा कि आप को नो-ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट प्राप्त करने में मैं मदद करूं. इसलिए जसलोक में कार्य पूरा हो गया कि तुरंत मैं यहाँ आया.’

‘थेंक यूं, परन्तु मेरा काम ठीक से चल रहा है. मुझे मदद की जरूरत नहीं है. आप मिल गए यह अच्छा हुआ. लेकिन आप आप के कार्य के लिए जा सकते हैं. वापस कब जानेवाले हैं?’

‘यह अभी निश्चित नहीं बता सकता. रात को फिर से अस्पताल जाना है. तब तक फ्री हूँ. बाय द वे, आप कहाँ जा रही है?’

‘मैं यूनिवर्सिटी जा रही हूँ.’

‘यदि आप को एतराज न हो तो मेरे मित्र की गाड़ी है. मुंबई में ड्राइव करते समय किसी मार्गदर्शक साथ में हो तो मुझे ठीक रहेगा. मैं आप के साथ यूनिवर्सिटी चलूँ. मुझे वक्त ही गुजारना है.’

‘यू आर वेलकम. परन्तु आप का बेश कीमती वक्त को बर्बाद करके कुछ भी मत करना.’ शेफाली ने एक बार फिर से जोर देते हुए कहा.

‘आप के साथ बिताया गया समय शायद इस शहर में मेरा श्रेष्ठ समय होगा. आप इस के बारे में फ़िक्र न करें.’ डॉक्टर मिश्र ने कहा और कम्पाउंड में पार्क की हुई गाड़ी का दरवाजा शेफाली के लिए खोल दिया और वे खुद स्टीयरिंग सीट पर बैठे.

शेफाली ने अंदर बैठते हुए कहा: ‘थेंक यू डॉ. मिश्र.’

गाड़ी को कोलेज के कम्पाउंड से बाहर लेते हुए डॉ. मिश्र ने कहा, ‘शेफाली, आप मुझे ‘डॉ.मिश्र’ कहती हैं तब कुछ ज्यादा औपचारिक लगता है.’

‘उमेशभाई कह कर पुकारूं?’

यह सुनकर उमेश का हाथ स्टीयरिंग पर जरा सा कांप उठा. उस के चेहरे की रेखाएँ कुछ तंग हुईं परन्तु यह जवाब जैसे सूना ही न हो ऐसे उस ने कहा: ‘शेफाली, मैं आप का यह शहर आप की नजरों से देखना चाहता हूँ. दिखाएंगी न?’

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गुरु रामदास सराय के एक कक्ष में त्यागी और कुलदीपसिंह बैठे थे. कुलदीपसिंह के चेहरे की रेखाएँ कुछ तंग थीं.

‘करतार...’

‘करतार नहीं, त्यागी.’

‘हाँ त्यागी...’ कुलदीप ने होंठ चबाये: ‘इस लड़के को कुल मिला के कितनी जायदाद मिलनेवाली है? पन्द्रह करोड़, पचीस करोड़, पचास करोड़? इतनी राशि केलिफोर्निया के मेरे चार मित्र मिलकर दे सकते हैं. इस के लिए इतने सारे कार्यकर्ताओं का समय तू क्यों खराब कर रहा है?’

‘कुलदीप, तूं क्या यह समझता है कि मेरी नजर उस लड़के के करोड़ रूपये पर है?’

‘फिलहाल तो ऐसा ही लगता है.’

‘कुलदीप तेरा दिमाग ठिकाने पर तो है न? तुझे मालूम है कि डॉक्टर पंडित की कश्मीर मैं संपत्ति है?’

‘हँ...!’ कुलदीप की आँखों में चमक दिखाई दी.

‘उसका एक फ़ार्म पाकिस्तान की सरहद के करीब ही है. और श्रीमती पंडित मूल पंजाबी है यह तो मालूम है न तुझे?’

‘हाँ.’

‘उनके पिता की संपत्ति यहाँ से (अमृतसर से) कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर पकिस्तान की सरहद से दस-बारह किलोमीटर ही दूर है. ये दोनों संपत्ति की कीमत सबकुछ मिला के चालीस लाख से ज्यादा नहीं. परन्तु हमारे लिए ये अरबों से भी ज्यादा मूल्यवान हैं. पाकिस्तान से जाते और आते हमारे आदमिओं के बारे में किसी को संदेह पैदा न हों ऐसा भूमिगत निवास्थानॉ का निर्माण इन दोनों स्थानों पर किया जा सकता है. अब इस प्रकार सरहद के नजदीक की सैंकडों एकड़ जमीन आसानी से हमारे हाथ लग सकती हो तो उसे क्यों जाने दें?’

कुलदीपसिंह ने त्यागी का हाथ हाथ में ले कर कहा: ‘शाबाश, दोस्त, तूं गुरु का नाम रोशन करेगा.’

‘उस लड़के को अमृतसर लाने के पीछे मेरा एक दूसरा मकसद भी है.’

‘क्या?’

‘यहाँ की संगत, जरनलसिंह के आसपास के लोग आदि को वह देखें फिर उस का हिंदुओं के बारे में अभिप्राय बदल जाएगा.’

‘वह इतना झनूनी नहीं लग रहा.’

‘संत जनरलसिंह खालसा भी कहाँ जुनूनी थे? यह लड़का अभी मितभाषी व शांत है. कुछ दिनों में हम उस की आँखों में जुनून ला देंगे.’

दोनों हंस पड़े.

बाहर कीर्तन चल रहा था. पृथ्वीसिंह अपना ज्यादातर समय कीर्तन सुनने में बीतता था. दो तीन घंटे वह संत भिंडरांवाले की संगत में बैठता था. उसकी इच्छा संत हरचंद लोंगोवाल से मिलने की थी, परन्तु सब उसे उस तरफ जाने से रोकते थे. कुछ ही क़दमों का फांसला था. परन्तु सामने के ‘समंदरी’ मकान में जाने के लिए उसने जितनी बार कोशिश की उतनी बार किसी न किसी बहाने उसे रोक दिया गया था. वह कीर्तन से उठा और गुरु नानक निवास की ओर जाने के बजाय सीधा समंदरी पर गया. वहाँ दाखिल होते ही बाएं हाथ पर ऑफिस था. वह उस में दाखिल हुआ. टेबिल पर एक मध्य उम्र का सीख इस युवक को देखकर करीब करीब खड़ा हो गया. ‘कौन हैं आप?’ उसने पूछा.

‘मेरा नाम पृथ्वीसिंह. मैं संतजी से मिलना चाहता हूँ. आप ही अविनाशिसिंह है न?’

‘हाँ. क्या काम है संतजी से?’

‘संतजी ने मुझे लुधियाना में आशीर्वाद दिए उस के बाद मेरे जीवन में भारी परिवर्तन हुआ. मैं उन से सलाह मशविरा करना चाहता हूँ.’

‘संतजी आज जालंधर में हैं. दो दिन के बाद मिलेंगे.’

पृथ्वीसिंह वहाँ से बाहर निकला तब दरवाजे के करीब त्यागी खड़ा था. उसने हंसकर कहा: ‘पृथ्वी, संतजी यहाँ नहीं है. वरना मैं ही तुझे उनके पास न ले जाता? तेरे जाने से पहले वे तुझे अवश्य मिलेंगे. चल, ऊपर संगत में बैठें.’

‘नहीं भाईसाहब, मैं ज़रा बाजार जा रहा हूँ.’

‘किसी को साथ में भेजूं?’

‘मेरे ऊपर निगरानी रखने के लिए?’

‘नहीं, यह तो...’

‘मैं पहली बार अमृतसर नहीं आया. यहाँ के रास्ते मेरे लिए अपरिचित नहीं है.’

त्यागी ने स्थिर दृष्टि से पृथ्वीसिंह की और देखा. उस दृष्टि में कुछ सख्ती थी. वह उस दृष्टि के आगे विवश हो रहा हो ऐसा अनुभव पृथ्वी कर रहा. त्यागी बिना कुछ बोले वापस लौट गया. पृथ्वीसिंह को बाजार जाने का मन नहीं हुआ. उस के पाँव सहज भाव से हरमन्दिर की दिशा में मुड गये.

उस के दो और दिन इसी प्रकार से बीते. वह घबड़ा गया था. उसके मन में आया कि वह अमर दासपुर जा कर गुरूजी के साथ बात करें. शायद उससे उसे सान्त्वन मिले. रामदास सराय में त्यागी के आने के बाद उसे दी गई कोठरी में से वह बाहर निकला. बाहर बेंच पर एक अखबार पडा था. उस ने सहज भाव से अखबार उठाया. सहसा उस की नजर अखबार में बड़ी अक्षरों में छपी खबर की और गई. ‘रहस्यमय हत्या का सुराग मिला!’ ऐसे शीर्षक के अंतर्गत उस ने पढ़ा: ‘एक चंद्रसेन नाम के युवक को राजस्थान की पुलिस ने पकड़ा है. यह नौजवान दिल्ली का बेंक लूटने की घटना में एवं सरसपुर के डाक बंगले में हुई रहस्यमय हत्या की घटना में शामिल था ऐसा उसने कबूल किया है!’

पृथ्वी के हाथों से अखबार छूट गया. उस की नजर के सामने मोहिनी की मृतदेह छा गई. मेरी माँ को मौत की नींद सुला देनेवाला यह मानवी कौन होगा? पृथ्वी का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह वहीँ बेंच पर ही बैठा रहा.

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