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मंजरी शुक्ल की रम्य रचना - दर्प

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दूर बर्फ के पेड़ों पर ढकी हुई बर्फ यूँ लग रही थी मानों आसमान से कहीं से महीन पतली चाँदी की चमकती हुई चादर बिछा दी हो और जिस पर चाँद की किरणें एक दूजे को ढूँढ़ते हुए चारों ओर चांदनी की खूबसूरती की शोभा में चार चाँद लगा रही हो I रात के सन्नाटे में डूबी हुई चुप्पी में सारा शहर जब नींद के आगोश में सोया हुआ था तो एक बूढ़ा अपनी झुकी हुई कमर के साथ अपनी एकमात्र पुरानी लाठी के सहारे धीमे धीमे आगे बढ़ रहा था I शरीर के मैले हो चुके कपड़ों को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि ना जाने कितने दिनों से ना तो उसने नहाया था और ना ही कपड़े बदले थे I फटे हुए पैरों से हल्का सा खून भी रिस रहा था और बिना चप्पल के चलते हुए बार बार उसे जब कोई ठोकर लग जाती थी और उसके पैरों मैं कोई कंकड़ या काँटा चुभ जाता था जिसे वो बड़े ही इत्मीनान से चेहरे पर बिना कोई दर्द या उपेक्षा का भाव लाये निकाल देता था I रात सोच रही थी,  यह मुझे क्यों तंग कर रहा है चुपचाप अपने घर में सोता क्यों नहीं I चाँद सितारों से पूछ रहा था कि मुसाफिर को कहाँ तक जाना था ताकि वो थोड़ा सा ओर तेज चमके जिससे उसे आगे बढ़ने में परेशानी न हो पर किसी के पास इस बात का…

बच्चन पाठक 'सलिल' की कविता - नया वर्ष मंगलमय हो

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नया वर्ष मंगलमय हो
               -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'परम पिता से यही प्रार्थना हमारी आज
नया साल आया, आप सबका मंगल हो ,
परिजन, पुरजन सबहीं प्रसन्न रहें
राजनीति गलियों में भले दंगल हो।चाहे मॉल खूब बने, इन सारे शहरों में
पर्यावरण शुद्ध रहे, खूब जंगल हो
योजना सिंचाई की न द्रौपदी का चीर बने
हर एक राज्य में ही, भाखरा नंगल हो।बीता है पुराना साल दिल दहलाने वाला
खुशियाँ उमंग लिए नया साल आया है
देते हैं बधाई आज सब एक दूसरे को
प्रेम का माहौल यह सब को ही भाया है।लगता विषाद की है निशा अब बीत गयी
हर्ष का वितान आज चारों ओर छाया है
हिंसा,अशांति उठ जाये इस धरती से
नर नारी कह उठे नया साल आया है।जमशेदपुर
झारखण्ड

मनोज 'आजिज़' की नव वर्ष पर एक ग़ज़ल - इक साल फिर

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नव वर्ष पर एक ग़ज़लइक साल फिर ... (ग़ज़ल)                   -- मनोज 'आजिज़' इक साल फिर बीत गया उम्र भी ढली  फिसल गए इतने दिन कर आँख मिचौली  न साथ दे पाया काफ़िले-ख़्वाब को हमने  सोचता हूँ कब हुई ख्वाहिशात भली  ये भी सच जो बीत गया बात गयी  पर रहते हैं ज़ेहन में यादें खट्टी मखमली  आशनाई, फ़र्जो रहम क़त्ल हुए देखे गए  कोई बताये क्या होनी कभी टली  इक साल फिर आ गया नेमत इसे समझ  छोड़ ज़िन्दगी की 'आजिज़' वो सँकरी गली    --- नज़्म     बस इसलिए ...दीवारें फीकी पड़ रही थी  झरोखों में पसरी थी धुंध  नज़रों से ओझल था आसमान  हवा भी दुबक बैठी थी                   दूर ऊँचे पहाड़ों पर। मौजूद सिर्फ एक सिसक  बरबस आहें  अनकही पुकार  और कुछ बेबस यादें। ये हालत बस इसलिए  कि हम बसे थे -- उम्मीदों के शहर में-- जमशेदपुर  झारखण्ड

प्रेम मंगल की कविता - दिल्ली बलात्कार कांड

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दिल्ली रेप काण्ड
सुनकर ही लगता है जैसे शून्य हो गया हो ब्रम्हाण्ड,
सोचा नहीं जाता कुछ सुना नहीं जाता मूकबधिर सा हो गया है सारा ब्रम्हाण्ड भारतीय संस्कृति
डूब गई है संस्कृति भारत की
मिट गई है शान सारी मानवता की
हद पार हो गई है अमानुषिक प्रवृत्ति की
खत्म हो चुकी है मर्यादा इस जहान कीजानवरों से भी बदतर हो गई है हवस जहां की
हवस नहीं गर ईर्ष्या थी तो हद पार हो गई उसकी
जलाते हो पुतला हर वर्ष रावण का
याद रखो कभी चीर हरण नहीं किया उसने सीता कातुमने तो समाप्त कर दी एक भाई की आत्मा
खत्म कर दिया सारे जहां में जमीर पिता का
न तुम लायक हो पति बनने के
न तुम बन सकते हो पुत्र किसी केन सम्मान माँ का तुम्हारी नजर में
न कलेजा भाई का तुम्हारे हृद्य में
न हीर रांझा सा प्यार तुम कर सकते
न कभी पिता सा धैर्य तुम रख सकतेशुम्भ निशुम्भ के लालच से गिरी नहीं देवी
चण्ड मुण्ड का संहार करने में पीछे नहीं रही यह देवीबच्चियां सारी उन्ही देवीं का रुप है
गर बनोगे राक्षस बच नहीं पाओगे
लूट कर इज्जत बच्ची किसी की
क्या मिली शान्ति तुम्हें दिल कीबच्ची को कहा जाता है देवी
देवी ने बक्शा नहीं कभी राक्षसों को
चण्डिका कब बन जायेगी यह नारी
समझ नहीं पाओ…

क़ैस जौनपुरी की कविता - कोई दे जवाब

कविता(संदर्भ - दिल्ली में हालिया बलात्कार व हत्या कांड) क़ैस जौनपुरीकोई दे जवाबफूल जैसी थी मैं किसी के लिए किसी के अरमानों का सबूत भी थी किसी की दुआ किसी की मन्‍नत किसी का न टूटे उसूल थी मैं हो रही है बहस अब मेरे हाल पे छिन गया क्‍या आएगा अब लौटके कोई दे जवाब बता दे मुझे कुछ घाव हैं जिस्मों पे मेरे कुछ दाग हैं चेहरे पे मेरे हो सकूंगी किसी की न मैं अब कभी हो सकेगा न मेरा कोई अब कभी एक अहसास था कितना प्यारा सा जो हो गया है ज़हर जबरन पिला के मुझे हक़ तो मेरा भी था खुल के जी लेती मैं कोई दे जवाब बता दे मुझे क्‍या मैं देखूंगी सपने सुनहरे कभी खिलखिलाके हसूंगी क्‍या सबमें कभी दोष मेरा क्‍या था मैं तो नाज़ुक सी थी क्‍यूं था मसला गया मेरे ज़ज़्बात को क्‍यूं था कुचला गया मेरे अहसास को कोई दे जवाब बता दे मुझे मुझसे पूछो अगर चाहती हूं मैं क्‍या फूल जैसी हूं मैं बस जरा प्यार दो हूं मैं मरती हुई बस जिला दो मुझे

हिमकर श्याम की नववर्षाभिनंदन कविता - शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

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शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो -हिमकर श्याम व्यथित मन में मधु रस घोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो झोली में लेके ख्वाब नया देखो आया है साल नया अरमानों की गठरी खोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो जो बीत गया सो बीत गया वो दुःख का गागर रीत गया उम्मीदों का दर फिर खोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो दूर नहीं खुशियों का प्याला उस पार खड़ा है उजियाला संग ज़माने के अब हो लो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो राह नयी है, लक्ष्य नया है जीवन में संकल्प नया है पहले अपने पर तो तोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो क्या खोया, क्या पाया हमने खूब हिसाब लगाया हमने जख्म पुराने सारे धोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो छंद नया है, राग नया है होठों पे फिर गीत नया है सरगम के नव सुर पे डोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो पीड़ा- ताप मिटे जीवन की पूरी हो इच्छा हर मन की अंतर्मन के बंधन खोलो शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

गोवर्धन यादव की कहानी - नए वर्ष से एक मुलाकात

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अंतिम सप्ताह दिसंबर का चल रहा है। चार दिन की केजुअल बाकी है। यदि जेब में मनीराम होते तो मजा आ जाता। दोस्तों की ओर से भी तरह-तरह के प्रस्ताव मिल रहे थे। परंतु सभी को कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता हूं, बिना पैसों के किया भी क्या जा सकता था। अतः आफिस से चिपके रहकर समय पास करना ही श्रेयस्कर लगा। 31 दिसम्बर का दिन, पहाड़ जैसा कट तो गया पर शाम एवं रात्रि कैसे कटेगी यह सोचकर दिल घबराने-सा लगा। उड़ने को घायल पंछी जैसी मेरी हालत हो रही थी। अनमना जानकर पत्नी ने कुछ पूछने की हिम्मत की, पर ठीक नहीं लग रहा है, कहकर मैं उसे टाल गया। खाना खाने बैठा तो खाया नहीं गया। थाली सरका कर हाथ धोया। मुंह में सुपारी का कतरा डाला। थोड़ा घूम कर आता हूं, कहकर घर के बाहर निकल गया। ठंड अपने शबाब पर थी। दोनों हाथ पतलून की जेब में कुनकुना कर रहे थे। तभी उंगलियों के पोर से कुछ सिक्के टकराए। अंदर ही अंदर उन्हें गिनने का प्रयास करता हूं एक सिक्का और दो चवन्नियां भर जेब में पड़ी थीं। सोचा एक पान और एक सिगरेट का सेजा जम जायेगा। पान के ठेले पर चिर-परिचितों को पाकर आगे बढ़ जाता हूं। दूसरे पान के ठेले पर भी यही नजारा था। एक …

मंजरी शुक्ल की कविता - तुम कब आओगे मेरे राम

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उस राह पर आज तक निःशब्द असहाय और अकेली बैठी हुई पथ के कांटे चुन रही हूँ मैं जिस पर त्याग गए थे महर्षि गौतम सदिओं पहले अहिल्या को ... श्राप देकर पाषाण की प्रतिमा बनाकर मुहँ फेरकर चल दिए और वो बैठी रही मूर्त रूप में अपने राम की राह देखती निश्छल अविचल तटस्थ होकर... पर मेरी विडंबना देखो मैं भी वही अहिल्या हूँ पर हाड़- मांस की चलती फिरती जिसकी केवल नियति पाषाण की हुई हैं जिसकी साँसों से उसके जीवित होने का भ्रम होता हैं धमनियों में बहता लहूँ प्रमाण देता हैं कि सभी अंग सुचारू रूप से अपना -अपना कार्य संपन्न कर रहे है... पर किसी राम का मुझे इंतज़ार नहीं हैं क्योंकि तुम्हारे सिवा मेरे मन के उस रीते, सीले और अँधेरे कोने को कोई कभी नहीं छू सकेगा .. तुम कब आओगे मेरे राम .... --

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल - जाते 2012, आते 2013 ब्रितानी नववर्ष के नाम -

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~ ~ ~ ~ ~ ~ देँ नव ब्रितानी वर्ष पर हम क्या बधाइयाँ ! गिरती ही जा रही हैँ नीचे ऊँचाइयाँ ॥ जाएँ कहाँ इधर खाई, उधर है कुआँ ; गुमराह हो गईँ खुद ही अगुआइयाँ ॥ हैँ ओहदोँ पर काबिज़ ख़ुदगर्ज़ ताक़तेँ ; सम्मान हथिया रही हैँ अब गद्दारियाँ ॥ शुभकामनाएँ फलीभूत अब होती नहीँ ; होँ शातिरोँ को हासिल कामयाबियाँ ॥ माँ बहन बेटियोँ की चीखो पुकार पर ; दी अश्रुमग्न आँखोँ को अश्रुगैस लाठियाँ ॥ मर्दोँ के ग़ुनाहोँ को ढोती हैँ औरतेँ ; क्योँ औरत के नाम पर 'महरूम' गालियाँ ॥ devendra.mahroom@gmail.com

रमा शंकर शुक्ल की कविताएँ

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वक्त सुनामी
रक्तबीज-से बढे दरिन्दे
कैसे-कैसे रिश्तों के फंदे
रिश्तों में भी कालनेमि है
क्या करेंगे हनुमान परिंदे।कही पे भाई कही पिता हैं
विश्वासों का आधार मिटा है
किनको-किनको फांसी दे दूं
रिश्तों की गरमाहट में धंधे।कहाँ सुरक्षित अस्मत मेरी
जातियां मेरी हों या तेरी
खूनी आँखे घूर रही हैं
शैतानों से मठ के बन्दे।हक्का-बक्का हर चेहरा है
साए पर भी खुद का पहरा है
वक्त सुनामी बनकर आया
रोने को न बचे हैं कंधे।---ग़ज़ल
माई की आँख में न हो आंसुओं का सैलाब
दूध के साथ बेटी में खंजर भी उतारिये।वर्जनाओं की चादर उढ़ाकर न घेरिये उसे
पूरी कायनात में उड़ने का तरीका भी बताइये।ये हालात तो हमने-आपने ही पैदा किये हैं
हो सके तो बेटियों से लाज का पहरा हटाइये।घोसलों में रात दिन दुबकाए ही रह गए हम
वक्त है अब तो उड़ानों में तूफ़ान ले आइये।बहुत हो चुका बेटी-बेटी पुकारते हुए हमें
फासले हटाकर जरा बेटा भी बुलाइये--पुलिस अस्पताल के पीछे,
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश,

मोहसिना जीलानी की कहानी - फटी चादर

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मोहसिना जीलानीफटी चादरवो सफ़ेद बुर्के में लिपटी हुई पाँच वर्षीय फज़लू का हाथ थामें तेज़ी से चल रही थी। फज़लू के पैर, फिलिप फ्‍लॉप चप्‍पलों में जो उसकी साइज से बड़ी थी धूल में अँट रहे थे। खुले गरेबान की बड़ी-सी शर्ट और घुटनों तक लटकी हुई नेकर- वो माँ का हाथ मज़बूती से थामे उसके तेज़ तेज़ क़दमों का साथ देने की अनथक कोशिश कर रहा था। छोटे-छोटे ख़तरों ने उस नन्‍हें मस्‍तिष्‍क को घेर रखा था। अगर कहीं माँ का हाथ छूट गया तो वो खो जायेगा और फिर उसे घर का रास्‍ता भी नहीं मालूम। सीधी सड़क से निकल कर वो एक गली में प्रवेश कर गई। गर्मियों की सुनसान दोपहर, एक गली से दूसरी गली पार करते-करते वो पसीने में चूर हो चुकी थी। गर्म हवा की उलझी-उलझी साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। हर तरफ़ सन्‍नाटा था। और गली सुनसान थी। लेकिन ख़दीजा एक ऐसी भीड़ में खो जाना चाहती थी जहाँ उसे कोई पहचानता न हो, चलते-चलते वो इतनी निढाल हो गई कि उसे दम लेने के लिये रुकना पड़ा। फ़ज़लू इस बात से अनजान था कि आख़िर वे कहाँ जा रहे हैं। शायद माँ को बहुत ज़रूरी काम है। जब वो किसी ज़रूरी काम से निकलती है तभी उसके पैरों में इतनी तेज़ी आती …

नजमा उस्‍मान की कहानी - बाद दुआ के मालूम हो

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बाद दुआ के मालूम होनजमा उस्‍मान इमरान की उंगलियाँ बड़ी तेज़ी से की बोर्ड पर चल रही थी और वो उसकी उंगिलयों के साथ स्‍क्रीन पर उभरते हुए शब्‍दों को बड़े ध्‍यान और आश्‍चर्य चकित नज़रों से देख रही थी दादी ः- “ऐ बेटा, वो सब कुछ लिख दिया है ना जो हमने कहाँ” “कहा है?” “जी दादी जाना! सारा मैसेज लिख दिया है”परे सफ़ाई से न चाहते हुए झूट बोल गया अब दादी जान भी तो न जाने क्‍या-क्‍या लिखवा रही थी। बहुत से वाक्‍य, बहुत सी बातें वो हज़ार कोशिश के बावजूद अंग्रेजी में ट्रान्‍सलेशन नहीं कर पा रहा था इधर दादी के ताबड़ तोड प्रश्‍न जारी थे। दादी ः- ये मशीन भला कितनी देर से पत्र हमारी फ़िसा तक पहुँचा देगी और हाँ! ये कैसे पता चलेगा कि हमने उसे पत्र भेजा है? इमरान ने नये सिरे से उन्‍हे इन्‍टरनेट और ई-मेल के विषय में आसान भाषा में समझाया। इमरान ः- देखे दादी जान, यहाँ जो कुछ मैंने लिखा है वो बिल्‍कुल उसी तरह नफ़ीसा फूफू के कम्‍प्‍यूटर तक पहुँच जायेगा ये देखें मैंने बटन दबाया और यहाँ पर ये बाक्‍स आ गया कि हमारा खत फूफू के कम्‍प्‍यूटर तक पहुँच गया अब वो इसे अपने स्‍क्रीन पर पढ़ लेगी। दादी जान अब भी चिंति थीः दाद…

बानो अशरद की कहानी - एक चैलेंज

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बानो अरशदएक चैलेंज घर में सब बहनों से बड़ी होने के कारण मुझमें जिम्‍मेदारी की भावना भी बहुत थी। अम्‍मा को तो सदैव बीमार देखा, इसलिए घरेलू कामों में भी उनका हाथ बटाती। घर का ऐसा कौन सा काम था जो मुझे न आता हो, हर वक्‍त घर संभालते-संभालते कुशलता मेरी दूसरी आदत बन गई थी। अब्‍बा को समय पर भोजन देना, उनका बटुआ भरना, बहनों को तैयार करना, बस। अम्‍मा भी निश्‍चित रहती परंतु कभी-कभी पड़ोस से आने-जाने वालियों से यह अवश्‍य चर्चा करती, “मेरी बेटी बहुत नेक और आज्ञाकारी है, खुदा उसको ससुराल अच्‍छी दे।” अब्‍बा भी ढेर सारी दुआएँ दिया करते। छोटी सी थी जब से हंटर कलिया पकाना और गुड़िया खेलना, उनके कपड़े सिलना मेरा काम था। अब्‍बा के हठ पर स्‍कूल में दाख़िला लिया परंतु छः सात कक्षा से अधिक न पढ़ा सके क्‍योंकि फिर छोटे भाई-बहनों को कौन देखता। रेहाना, फ़रज़ाना भी बड़ी हो रही थी और मुन्‍ना जो घर में हम सब का लाड़ला था। उसकी देखभाल भी मेरे ही जिम्‍मे थी। उसे समय पर स्‍कूल भेजना, कपड़ों पर इस्‍त्री करना, यह सब काम करके मुझे बहुत मज़ा भी आता था। शाम को घर में बड़ी चमक-दमक होती। सब साथ खाना खाते, अब्‍बा चुटकुले …

बानो अरशद की कहानी - नन्‍ही परी

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बानो अरशद नन्‍ही परीहेड टीचर के कहने पर सरवत ने स्‍कूल के समस्‍त मुस्‍लिम बच्‍चों के लिए नमाज़ पढ़ने के स्‍थान की जिम्‍मेदारी स्‍वीकार कर ली थी। वैसे उसके स्‍कूल में मुस्‍लिम बच्‍चे आटे में नमक के बराबर थे। परंतु सरवत को अपनी इस्‍लामीं संस्‍कृति, भाषा और जीवन मूल्‍य की हिफ़ाज़त का एहसास था, यद्यपि वह स्‍वयं इतना अधिक इन पाबंदियों को पूरा न कर पाती मगर एक बार जब से वह अपने मुल्‍क से बाहर आई थी एक बात का बहुत ध्‍यान रखती कि वह यहाँ अपने देश की प्रतिनिधि है और अँग्रेजी समाज हर रूप में उसको एक इस्‍लामी एवं पाकिस्‍तानी नागरिक मानता है और उसके प्रत्‍येक कदम पर उस को उसी दृष्‍टि से देखेगा, जैसे चावल दम होने पर एक दाना देखकर राय का़यम की जाती है कि चावल गल गये। न्‍याय-अन्‍याय का उसको बहुत ध्‍यान रहता था। इसीलिए स्‍कूल में अपने परिधान (लिबास), अपनी प्रतिष्‍ठा के कारण बहुत सम्‍मान से देखी जाती । भोजन के समय स्‍कूल के कुछ विद्यार्थी उसके पास भेज दिये जाते जो नमाज़ के पाबंद हुआ करते थे। उन बच्‍चों को वह उस कमरे में भेज दिया करती थी जो उसने स्‍कूल से बहुत प्रयास के बाद उन शिष्‍यों के लिए हासिल किय…

जितेन्‍द्र बिल्‍लू की कहानी बिछड़ती धूप

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बिछड़ती धूपपल-पल गुज़रती ठंडी रात सुबह की ओर सफर कर रही है सर्दी की तीव्रता इतनी ज़्यादा है कि खिड़की से हाथ निकालने पर हाथ शरीर से अलग होने का एहसास दिलाता है। हल्का-हल्का हिमपात भी हो रहा है। मैं अपने टैरिस हाउस की लाइब्रेरी में बैठा देखने में कोई किताब पढ़ रहा हूँ लेकिन मेरे कान घर के दरवाज़े पर लगे हुए हैं और वह इस इंतज़ार में हैं कि कब चाबी घूमने की आवाज़ सुनाई दे, दरवाज़ा खुले और सिम्मी प्रवेश करे। फिर वह सावधानी से नपे-तुले कदम उठाती हुई काठ की सीढ़ी तय करके पहली मंज़िल पर पहुँच जाएगी और दायें हाथ घूम कर अपने कमरे में दाख़िल हो जाएगी। उस समय वह अनजाना डर, जो हरदम सीने पर कुंडली मारे बैठा रहता है, एकाएक दूर हो जाएगा और मैं लाइब्रेरी के सोफे पर पसर कर नींद की गोद में चला जाऊँगा। लगभग हर वीकऐंड पर सिम्मी का फ्रेंड्स के साथ, जिनमें ज़्यादातर इंग्लिश लड़के-लड़कियाँ हैं, कोई न कोई प्रोग्राम अवश्य रहता है। कभी डिस्को, कभी म्यूज़िकल नाइट, कभी बर्थडे पार्टी, कभी ड्रिंक पार्टी, कभी लिट्रेरी सेशन, कभी लेट नाइट फिल्म शो और कभी लांग ड्राइव- और मुझे ज़बरदस्ती उसका इंतज़ार करना पड़ता है। ज्यों-ज्यों रात आगे ब…

क़ैसर तमकीन की कहानी - बुरा वक्त

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बुरा वक्तअभी दिन पूरी तरह नहीं निकला था, फ़िर भी बादशाह जानी बिस्‍तर छोड़ कर उठा ख्‍ड़ा हुआ। उसने चेहरे पर उल्‍टा हाथ फेर कर देखा अगर दाढ़ी ज़्‍यादा न बढ़ी हो तो शेव न करे लेकिन उसको याद आ गया कि आज तो ईद है। उसने ताक पर रखे आइने के टुकड़े में मुख्‍तलिफ़ जावियों से अपना चेहरा देखा और कुछ सोचने लगा। पिछले कई महीनों में वह इतने सवेरे नहीं उठा था। ईद होने की वजह से उस्‍ताद ने उसको ईदगाह के इलाके में काम करने की हिदायत की थी। उसके गिरोह में मुसलमान काम करने वाले अब दो तीन ही रह गए थे। ज़्‍यादातर साथी शहर में काम की कमी की वजह से दूसरी जगहों पर चले गए थे। जो हिन्‍दू, मसीही या सिख थे, उन पर पाबन्‍दी थी कि ईदगाह की चहादीवारी के अन्‍दर क़दम रखने की भी कोशिश न करें। इसी तरह की पाबन्‍दी मुसलमानों पर थी। वह भी महाबीहरों को मेले में सिफ़र् आस-पास ही काम कर सकते थे। इबादतगाहों के अहाते में जाने की इजाज़त उनको नहीं थी। उस्‍ताद नेपोलियन को अच्‍छी तरह मालूम था कि इन कायदों में ज़रा भी बेएहतियाती हुई, कोई मुसलमान किसी मन्‍दिर या गुरुद्वारे के पास या कोई गैर मुस्‍लिम किसी मस्‍जिद या इमामबाड़े की हुदूद …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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