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नव वर्ष की कविताएँ

मंजुल भटनागरनव वर्षजीवन क्रम में
एक दिवस नया
चंहु ओर नवागत
आह्लाद नया
नव वर्ष अभिनन्दन .गाते भौरें गीत नया
पक्षी करते मंगला चरण
नव सूर्य पदार्पण
जुड़ता जाता आशाओं का
इतिहास नया .सुन्दर आयोजन
रोज आवाहन
नए विश्वासों का
शुभागमन .जीवन कर्म में
जुड़ता है जीवन रंग मंच पर
एक पृष्ठ नया
एक वर्ष नया .

Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxमनोज 'आजिज़'

नव वर्ष मेंनव प्रात लिए, नव आस लिए
नव वर्ष का नव सोपान है
नव प्रीत लिए, नव भाव लिए
पुरातन का अवसान है । है बीता जो भी अशुभ उसे
रखना नहीं है स्मरण में
नव ऊर्जा धारण करना है और
नव उत्ताप भी नव जागरण में । हो मन में स्नेह का नव अंकुर
नव उच्छ्वास का मलय बहे
क्रोध, अहं, द्वेष, विराग छोड़
नर-नार जगत में सदय रहे । ज्ञान, चेतना, मति की धारा
नव श्रृंखला में प्रवाहित हो
नव उद्दोग से नव वर्ष में
जन-जन उन्नत, पुलकित हो ।
-------नव वर्ष पर एक ग़ज़ल इक साल फिर ...(ग़ज़ल)
इक साल फिर बीत गया उम्र भी ढली
फिसल गए इतने दिन कर आँख मिचौली न साथ दे पाया काफ़िले-ख़्वाब को हमने
सोचता हूँ कब हुई ख्वाहिशात भली ये भी सच कि जो बीत गया बात गयी
पर रहते हैं ज़ेहन में यादें खट्टी मखमली आशनाई, फ़र्जो रहम क़त्ल हुए देख…

अश्वनी कुमार शर्मा की कविताएँ

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अश्‍वनी कुमार शर्मा

उदास रंगसूने घर में
कब से पड़े
रंग
उदास हो रहे
कहते
अपने मन की गाथा
झर झर बहते
उनके आंसुओं को
कोई भी
रोक ना पाता।और फिर
उनकी
मुख मुद्रा, हाव भाव
मैं
ज़रा भी
समझ ना पाता।तड़प रहे
वो
केनवास पर
जल्‍दी से
छा जाने को!
‘‘ललक‘‘ उनकी
कुछ तो कहती
कुछ भी
कर जाने को।फिर भी
ऐसा तो लगता
बोलते वो ‘रंग‘
रंगों में डूब जाने को।
उदास रंग
कहते मुझसे
गले उनके लग जाने को।
सेवानिवृतअभी तो
तू सेवानिवृत्त नहीं हुआ है
मत घबरा
एक युग का अन्‍त
दूसरा शुरु हुआ है।वो थी पहली पारी
दूसरी का
आगमन हुआ हैं।
अभी तो
चलना है
मीलों आगे
उसी में तेरा
सुनहरा जीवन
छुपा हुआ है। न सुध थी
न होश था
दिन रात मेहनत कर
आज भी
36 वर्षो का अनुभव
तुझ में पड़ा हुआ है
तभी तो
तू सेवानिवृत्त नहीं हुआ है।सुर्ख शामदिन की रोशनी
शरमा कर
सुर्ख शाम
बन गयी
वही शाम
तनहा
रात में
ढल गयी।रात-वो
काली रात
झिलमिल सितारों से
सज गयी
सितारों से सटे
आकाश में
आकाश गंगा
बह गयी।मैं एकटक
यह रोचक नजारा
देखता ही रह गया
पता ही न चला
मुझे,
वो रात कब
सुहानी भोर में
ढल गयी।
और फिर
दिन की रोशनी
शरमा कर
सुर्ख शाम में ढल गयी।ओ माझीं रेदूर है किनारा
मांझी मतवारा
मंझधार
सागर के बीच
मीठे सुर में
कुछ तो गाये …

मनोज सिंह जादौन की कहानी - ठिठुरन

ठिठुरन मनोज सिंह जादौन रेल्वे स्टेशन पर अब भीड़ नहीं थी, क्यों कि ट्रेन तो सुबह छ; बजे ही चली जाती है और फिर दोपहर बारह बजे जाती है अब तो बस वे ही लोग स्टेशन पर होते हैं, जो किसी न किसी वजह से वहीं रहते हैं स्टेशन मास्टर, ऑफिस क्लर्क और जीआरपी वाले तो नौकरी की वजह से सारी सुविघाओं के साथ वहॉ रह रहे हैं, लेकिन कुछ लोग वहीं बसेरा करते हैं, खुशी से नहीं वरन मजबूरी में उनमें से भी बढ़ती ठंड में जो लोग कहीं सुरक्षित जगह पर जा सकते थे वे चले गये बस इन दो अभागों को कहीं ठौर नहीं था पगलूराम और कचरो। पगलूराम को पगलूराम नाम भी स्टेशन वालों ने ही दिया है,उसका असली नाम कोई नहीं जानता दरअसल वह है कौन कोई नहीं जानता। हां वह किसी के लिये हानिकारक नहीं था,सो किसी को कोई समस्या नहीं थी, सिवाय जीआरपी के एक हवलदार मोहनबाबू के। हालांकि ये खुद मोहनबाबू भी नहीं जानता था कि वो पगलूराम से क्यों चिढ़ता है। मोहनबाबू पिछले दस साल से इसी स्टेशन पर पोस्टेड था, ये राज वो किसी को नहीं बताता कि कैसे उसका ट्रांसफर इन दस सालों में कहीं और नहीं हुआ ,पर इन दस सालों में इस प्लेटफार्म पर उसका एकछत्र राज रहा है यदि किसी क…

रामवृक्ष सिंह का आलेख - हिन्दी के अग्रदूत उड़न सिक्ख श्री मिल्खा सिंह

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हिन्दी-प्रेमी श्री मिल्खा सिंहहाल ही में लखनऊ के जयपुरिया स्कूल में आयोजित एक समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए उड़न-सिक्ख श्री मिल्खा सिंह ने कहा कि वे दुनिया के शताधिक देशों में गए हैं और हर जगह उन्होंने अपनी बात कहने के लिए हिन्दी का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि यदि दुनिया के बाकी देशों के लोग अपनी-अपनी भाषा में अपनी बात कह सकते हैं तो हम हिन्दी वालों को ही अपनी भाषा, यानी हिन्दी में अपनी बात सबके सामने रखने में शर्म क्यों करनी चाहिए? खेल-कूद के मैदान में अपने दम-खम और क्रीड़ा-कौशल का प्रदर्शन करके देश-वासियों के दिलों में दशकों तक के लिए जगह बना लेनेवाले हमारे खिलाड़ी और क्रीड़ा-जगत के लोग जब ऐसी बातें कहते और करते हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है। देश के सबसे लोक-प्रिय खेल क्रिकेट से जुड़े मदनलाल अकसर और कभी-कभी कपिल देव भी हिन्दी में बोलते दिख जाते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू का हिन्दी और अंग्रेजी पर समान अधिकार है और वे भी कई बार हिन्दी में बात करते हैं। हिन्दी सिनेमा से जुड़े ज्यादातर लोग अंग्रेजी-दां हैं। बहुत कम लोग हिन्दी को अपनी रोज-मर्रा की सामाजिक जिन्दगी में इस्तेमाल क…

पद्मा मिश्रा की लघुकथा - एक नई शुरूआत

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लघुकथा - एक नई शुरुआत --पद्मा मिश्रा  दादी अभी भी नाराज चल रही है ,सुबह से केवल चाय पी और ठाकुरजी के आगे बैठकर माला जप रही हैं - -स्निग्धा को कभी कभी दादी पर बहुत तरस आता है -बेचारी क्या करें ,पुरानी परम्पराओं में जकड़ी हुई अपनी रूढ़ियों और संस्कारों को नहीं छोड़ पातीं - -उन्होंने तो बचपन से यही देखा था कि बेटा अमूल्य अमानत है ,श्रेष्ठ है  क्योंकि वह वंशबेल बढ़ाता  है वारिस है घर का  , ,और बेटियां तो पराया धन ! , ,उन पर खर्च क्यों करें ? ,उस दिन यही सब बातें उन्होंने पापाजी के सामने कह दीँ - - तब कभी भी ज्यादा न बोलने वाले पापाजी ने दादी का घोर विरोध किया था -कड़े शब्दों में फटकार लगाईं थी ,बेचारी माँ !,कभी दादी तो कभी पापा के बीच दौड़ती रही थीं ,पर विस्फोट तो हो चूका था ,दादी नाराज हो गई थीं - -बात यूँ थी कि स्निग्धा मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षा में अव्वल आई थी और उसके नामांकन के लिए पैसों की व्यवस्था  पापा ने मुश्किल से की थी ,यद्यपि बड़ी कम्पनी में कार्यरत थे -पैसों की कोई विशेष परेशानी नहीं होती यदि पिछले वर्ष यह फ़्लैट नहीं ख़रीदा होता ---छोटे भाई के स्कूल आठवीं के छात्रों का टूर गंगटोक जा…

राम नरेश ‘उज्‍ज्‍वल' की बाल कहानी - जंगली

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राम नरेश उज्‍ज्‍वल जंगी पूरा जंगली था। ज्‍यादातर जंगल में ही रहता। पशु-पक्षियों का शिकार करता। उन्‍हें पका कर खाता। इस काम में उसे बड़ा मजा आता। उसके परिवार के लोग समझाते-‘‘देखो,जीव-जन्‍तुओं को मारना पाप है। इनमें भी हम लोगों की तरह जान होती है। इन्‍हें दर्द होता है। इन्‍हें भी जीने का अधिकार है। इन्‍हें मारना-खाना ठीक नहीं।'' ‘‘इन्‍हें दर्द होता है,तो मैं क्‍या करूँ ? मुझे इनका गोश्‍त अच्‍छा लगता है। ये जब तड़प-तड़प कर मरते हैं, मुझे बहुत मजा आता है।'' वहीं पर एक चुहिया फुदक-फुदक कर खेल रही थी। जंगी की नजर उस पर पड़ गयी। उसने झपट कर उसे पकड़ लिया। चुहिया चीं-चीं करने लगी। जंगी ने उसकी पूँछ बाँधकर उल्‍टा लटका दिया। नीचे आग जला दी। चुहिया चीं-चीं कर रही थी। जंगी उसे घुमा-घुमा कर आग की लौ में पका रहा था। कुछ देर में चुहिया शान्‍त हो गई। अब नरम-नरम गोश्‍त पककर तैयार था। जेब में वह हर समय नमक-मिर्च की पुड़िया रखता ही था। जंगी आज जंगल में भटकते-भटकते काफी दूर निकल आया। अभी तक कोई शिकार नहीं मिला था। चारों तरफ सन्‍नाटा था। नजरें शिकार ढूँढ रही थीं। उसी समय जंगी की कनपटी पर व…

अजय कुमार दुबे की लघुकथा - प्रोबेशन पर

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शशी की शादी बड़ी धूम-धाम से राजेश से हुई थी। ससुराल वालों की तारीफ करते शशि के मम्मी पापा अघाते नहीं थे हरतीज -त्यौहार पर रस्म के अनुसार फल ,मिठाई कपड़ों आदि की सौगात भेजते रहते थे i शशि के विवाह के समय पाँच लाख नकद ,कपडे ,गहने मोटरसाइकल ,बर्तन आदि का दहेज़ दिया गया था। वह अपने सास ससुर की बहुत तारीफ करती थी और अपने पति के साथ खुश थी। उसको ससुराल वालों से केवल एक ही शिकायत थी कि उसे घर के किसी मसले पर निर्णय का अधिकार नहीं था, और न ही उसको बात में शामिल किया जाता है बड़ी बहू होने पर भी हर निर्णय से दूर रखा जाता था शशि की एक लड़की थी सास  -ससुर अपनी पोती का बहुत ख्याल रखते थे धीरे -धीरे तीन साल बीत गए। लड़की अपने दादा -दादी के साथ के घर से काफी दहेज आया ,किसी बात की कमी नही की उन्होंने "-सास कह रही थी। शशि थमक कर खड़ी हो गई। बात उसके बारे में ही हो रही थी। "वो तो ठीक है ,अभी हमे चार साल और चुप रहना है ,उसके बाद देखा जायेगा -क़ानून जो है -सात साल के बाद दहेज़ का कानून लागू नहीं होता "! वो सन्न रह गई। ये क्या कह है। लगा किसी ने पिघला शीशा डाल दिया हो। बना -उसका बनाया सपनों का महल …

विनायक दामोदर सावरकर के संस्मरण - मेरा आजीवन कारावास

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वीर सावरकर के संस्मरण (विनायक दामोदर सावरकर) संकलनकर्ता - डॉ. एस. एस. तँवर एवं मृदुलता (एम.ए.) संकटों के पराभव की कहानी बतलाने का आनंद अनुभव करने के लिए अत्यन्त उत्सुक होने पर भी परिस्थिति पुनः-पुनः मार्ग अवरूद्ध कर देती थी। तथापि, जो कुछ भी आधा-अधूरा अथवा अल्प-स्वल्प सद्यःकालीन परिस्थिति की परिधि बतलाने लायक होगा, उसे तो आपको कह देना ही होगा। (पृ0 17) डोंगरी कारागृह - बंबई स्थित डोंगरी का कारागृह में सुपरिटेंडेंट आया और नियमानुसार परन्तु सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में मुझसे बोला, ''आगे से आपको बंदी के कपड़े तथा अन्न मिलेगा। आपका पचास वर्ष का दंड आज से लागू हो गया है।'' इतने में सिपाही ने एक लोहे का बिल्ला लाकर हाथ में दिया। यही वह 'क्रमांक' है जो प्रत्येक बंदी की छाती पर झूलता है। उस बिल्ले पर बंदी की मुक्ति का दिनांक अंकित होता है। मेरा मुक्ति दिनांक! मुझे मुक्ति भी है क्या? मृत्यु भी है क्या? मृत्यु ही मेरी मुक्ति का दिनांक है। कुछ जिज्ञासा, कुछ निराशा, कुछ विनोदमिश्रित भाव से मैंने उस बिल्ले की ओर देखा। मुक्ति का वर्ष था - सन् 1960। पल भर के लिए उसका कुछ भी अर्थ…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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