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January 2013
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मुख्यधारा

सारा घर अस्त व्यस्त था। मिसेज बनर्जी सब  कुछ समेटने में जुटी थीं. आज उनके बेटे सुहास का जन्मदिन था। उसने और उसके मित्रों ने मिलकर खूब धमाल किया था। सुहास अपने कमरे में बैठा अपने उपहार देख रहा था। " मम्मी देखो विशाल ने मुझे कितना अच्छा गिफ्ट दिया है। ड्राइंग बुक। अब मैं इसमें सुंदर सुंदर ड्राइंग बनाऊंगा।" सुहास अपने कमरे से चिल्लाया।

अपने पति से अलग होने के बाद सुहास की सारी जिम्मेदारी मिसेज बनर्जी पर आ गयी। उन्होंने भी पूरे धैर्य और साहस के साथ स्थिति का सामना किया। सुहास अन्य बच्चों की तरह नहीं था। उसकी एक अलग ही दुनिया थी। वह अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था। आज वह पूरे इक्कीस बरस का हो गया था किन्तु उसके भीतर अभी भी एक छोटा बच्चा रह रहा था। लोगों को यह मेल बहुत बेतुका लगता था। अक्सर पारिवारिक कार्यक्रमों में उनके रिश्तेदार उन्हें इस बात का एहसास करते रहते थे। शुरू शुरू में मिसेज बनर्जी  को लोगों का व्यवहार बहुत कष्ट देता था। उन्होंने बहुत प्रयास किया की सुहास भी अन्य बच्चों की तरह हो जाये। किन्तु समय के साथ साथ उन्होंने अपनी सोच बदल दी। वह क्यों अपने बेटे में दोष निकाल रही हैं। उसे ईश्वर ने जैसा बनाया है वह वैसे ही बहुत अच्छा है। उसकी मासूमियत ही उसकी सबसे बड़ी खूबी है। अब उन्होंने लोगों की बातों  पर ध्यान देना छोड़ दिया है। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है उनकी बहन का फ़ोन आया था। बातों ही बातों में वह कहने लगीं " तेरे बारे में सोचती हूँ तो बुरा लगता है। पति से अलग हो गयी। एक बेटा है वह भी कम अक्ल इस उम्र में भी तुम्हारी जिम्मेदारी बना है।" मिसेज बनर्जी ने जवाब दिया " दीदी जो भी है वह ईश्वर की इच्छा है। रही बात सुहास की वह मेरे लिए क्या है मैं ही जानती हूँ।"

कभी कभी वह यह सोच कर परेशान हो जाती हैं की उनके बाद सुहास का क्या होगा। किन्तु जीवन में कुछ प्रश्नों का जवाब समय ही देता है। अतः सब कुछ ईश्वर पर छोड़ कर निश्चिन्त हो जाती हैं।

सारा काम निपटा कर उन्होंने सुहास के कमरे में झाँका। वह बहुत तल्लीनता से अपनी बनायी ड्राइंग में रंग भर रहा था। मिसेज बनर्जी ने सोचा भले ही दुनियाँ उसे मुख्यधारा से अलग रखे किन्तु उससे अलग भी उसका एक वजूद है।

जयपुर में साहित्य महोत्सव के बहाने से रचनाकारों से सवाल:

दिनांक 23 जनवरी, 2013 को राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर के डिग्गी पैलेस में राज्यपाल मार्गेट अल्वा और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साहित्य महोत्सव की शुरूआत की ।

उद्घाटन भाषण में राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रेखांकित किया। इसी के साथ इस बात पर भी जोर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा यह है कि उससे लोगों की भावनाओं को चोट न पहुँचे ।
राज्यपाल ने हाल ही में भारत, पाकिस्तान और अरब देशों में हुए प्रदर्शनों को रेखांकित किया। पूरी दुनिया में असहनशीलता और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती जा रही है। साहित्यकारों का कर्तव्य है कि इनके उन्मूलन के लिए प्रयास करें।
23 जनवरी,2013 से लेकर 28 जनवरी,2013 तक पांच दिनों तक चलने वाले महोत्सव में अनुमान था कि महोत्सव के 174 सत्रों में करीब 280 से अधिक साहित्यकार,लेखक,अदाकार, स्क्रिप्ट राइटर,सोशल एक्टिविस्ट और विभिन्न विधाओं के महारथी भागीदारी करेंगे तथा विचार विमर्श करेंगे।

दुनिया की प्रतिष्ठित महिला पत्रकार टीना ब्राउन ने भारत में होने वाले इस साहित्यिक मेले को दुनिया का सबसे महान साहित्यिक जमावड़ा बतलाया।

इस मेले में देश और दुनिया के तमाम नए-पुराने लेखक हिस्सा लेते हैं। लोगो को मौक़ा मिलता है कि वे अपनी पसंदीदा किताबों के बारे में जान सकें तथा अपने पसंदीदा लेखक से रूबरू हो सकें। लेखक भी अपने पाठकों की प्रतिक्रिया से आत्मसात कर पाते हैं।

इन साहित्यिक महोत्सवों के आयोजन का इतिहास महज़ 6 साल पुराना है। साहित्यिक महोत्सवों के आयोजन की प्रासंकिगता साहित्यिक मुद्दों पर मंथन होना है। मगर यह त्रासदी है कि इन आयोजनों में विवादों की ही चर्चा अखबारों की सुर्खियाँ बनती रही हैं। पिछले साल मेले में सलमान रुश्दी के मेले में हिस्सा लेने के लिए भारत आना ही विवादों का मुख्य विषय रहा । हम सब जानते हैं कि रुश्दी अपने विवादित उपन्यास ‘सेटेनिक वर्सेस’ के कारण पिछले कई सालों से देश से बाहर ही रह रहे हैं।

इस साल भी किताबों के इस मेले में समाजशास्‍त्री आशीष नंदी ने अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा रेखा का अतिक्रमण किया तथा यह विवादित एवं अमर्यादित टिप्‍पणी की कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदायों के लोग ‘सबसे भ्रष्ट’ होते हैं। नंदी ने यह बयान देकर साहित्य के दायित्व की घोर अवहेलना की। इस प्रकार के बयान गतिशील जीवन मूल्यों को अवरोधित एवं निरोधित करते हैं। इसी कारण अमान्य, अस्वीकार्य, त्याज्य एवं निंदनीय हैं। मैं भी भर्त्सना करता हूँ। किसी भी संवेदनशील साहित्यकार को न तो सनसनीखेज़, आवेशकारी, उन्मादकारी, उत्तेजक एवं भड़काऊ खबरों का संवाददाता होना चाहिए और न ऐसी टिप्पणी करनी चाहिए जिससे समाज की समरसता, समता, गतिशीलता के जीवन मूल्य खंडित हों।

जो रचनाकार यथार्थ के निरुपण के नाम पर समाज में अवसाद, घुटन, निराशा, संत्रास आदि को फैलाने का काम करते हैं, उन्हें आत्म चिंतन करना चाहिए। कभी कभी यह भ्रम फैलाने की कोशिश होती हैं कि हमारे समाज में चारों ओर अँधेरा व्याप्त है, पतन की पराकाष्ठा है, मूल्यों का विघटन हो रहा है, जीवन मूल्यों का क्षरण हो चुका है और इन कारणों से हमें अधिकार है कि हम अपने सामयिक समाज की सही सही तस्वीर पेश करें। मैं इस समय विस्तार में नहीं जाना चाहता। रचनाकारों के सोचने के लिए केवल एक सवाल खड़ा करना चाहता हूँ, एक प्रश्न उपस्थित करना चाहता हूँ।

टूटे दर्पण में देखने पर हमें अपना चेहरा खंडित नजर आता है। इसी कारण क्या हमें अपने चेहरे को खंडित कर लेना चाहिए अथवा उस टूटे दर्पण को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

कोई भी गतिशील एवं मानवीय मूल्यों को प्रस्थापित करने वाला साहित्य आस्था एवं विश्वास के बिना न तो लिखा जा सकता है, न पढ़ा जा सकता है। साहित्य को संवेगों एवं संवेदनओं की अवनति का कारक नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत उसे उनके परिष्कार एवं उन्नयन का कारक होना चाहिए।

- प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203 001

दलित साहित्‍य : कितना दालित्‍य, कितना लालित्‍य!

डॉ0 पुनीत बिसारिया

बीते कुछ सालों से हिन्‍दी जगत में दलित विमर्श एक बड़ी आहट के रूप में हमारे सामने उपस्‍थित हुआ है। वास्‍तव में बीसवीं शताब्‍दी के ढलते हुए वर्षों में यह आहट मराठी से होते हुए हिन्‍दी साहित्‍य में प्रविष्‍ट हुई और देखते ही देखते इसने एक विमर्श का रूप ले लिया। इसने आते ही साहित्‍य जगत में उथल-पुथल मचा दी क्‍योंकि इसने पूर्व परंपरा को नकारते हुए हमारी अपनी परंपरा के मूल्‍य को अधिक महत्‍वपूर्ण माना, जिससे स्‍वानुभूति बनाम समानुभूति या सहानुभूति जैसे बुनियादी सवाल आए। ऐसे सवालों से ब्‍लैक लिटरेचर तथा नीग्रो लिटरेचर एवं अन्‍य भाषाओं के साहित्‍य पहले ही दो चार हो चुके थे लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य में यह विमर्श इसलिए भी विवाद का विषय बन गया क्‍योंकि हिन्‍दी में गैर दलित लेखकों ने भी उत्‍कृष्‍ट दलित व्‍यथा का साहित्‍य लिखा है। फिर परंपरा के नकार से साहित्‍य को वे जड़ें नहीं मिल सकतीं, जिनकी आवश्‍यकता एक नवोदित विमर्श के लिए अपरिहार्य है।

शुक्रवार' पत्रिका की साहित्‍य वार्षिकी में अभी हाल में लेखन में आरक्षण' शीर्षक से एक बहस चलाई गई है, जिसमें स्‍पष्‍ट तौर पर दो खेमे दिखाई पड़ते हैं। एक खेमा गैर दलितों का है, जो यह मानता है कि साहित्‍य इस सिद्धांत को स्‍वीकार नहीं कर सकता कि भोगा हुआ यथार्थ ही लेखन को प्रामाणिकता दे सकता है, अनुभूत नहीं। इसके समर्थन में नामवर सिंह, मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, तुलसीराम, असगर वजाहत, विजय कुमार, वीरेंद्र यादव, अखिलेश, सविता सिंह, प्रियदर्शन आदि न अपने विचार रखे हैं तो विरोध में अनिता भारती का साक्षात्‍कार है। मुझे व्‍यक्‍तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि दलित विमर्श के बहाने जब हम दलित साहित्‍य पर बात करते हैं तो शायद कहीं न कहीं अपने लक्ष्‍य से भटक जाते हैं। आज आवश्‍यकता इस बात की है कि दलित साहित्‍य तथा दलित विमर्श को दो भिन्‍न भिन्‍न संदभों में देखा जाए।

दलित विमर्श दलितों के ऐतिहासिक जीवन क्रम से सम्‍बन्‍धित है, जिसके अंतर्गत दलितों के प्रादुर्भाव, उनके ऊपर किए गए अत्‍याचारों एवं उनके उत्‍थान पर विचार किया जाना चाहिए और यह कार्य समाजशास्‍त्रीय दृष्‍टिकोण को ध्‍यान में रखकर किए जाने की आवश्‍यकता है, साहित्‍य भी अपनी ओर से उसे सहयोग दे सकता है लेकिन यह कार्य मूलतः समाजशास्‍त्रियों का है। दलित साहित्‍य से तात्‍पर्य दलितों द्वारा रचा साहित्‍य' न होकर दलित व्‍यथा की मौलिक प्रस्‍तुति होनी चाहिए वरना दलित साहित्‍य अनजाने में ही प्रेमचंद, फणीश्‍वरनाथ रेणु, अमृतलाल नागर प्रभृति असंख्‍य हिन्‍दी साहित्‍यकारों के दलित लेखन को खो देगा। प्रकारांतर से इसका नुकसान दलित साहित्‍य को ही होगा क्‍योंकि उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य का एक बड़ा अंश दलित स्‍वयं ही अपनी विरासत से दूर कर चुके होंगे। यह न साहित्‍य के लिए अच्‍छा होगा न समाज के लिए। डॉ0 वीरभारत तलवार ने भी कुछ ऐसा ही कहा है,“प्रेमचंद और निराला जैसे लेखकों के सहानुभूतिपरक साहित्‍य को आज के दलित साहित्‍य की सामान्‍य ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि का अंग समझना गलत न होगा। ध्‍यान रखना चाहिए कि सन 1927-28 के बाद प्रेमचंद और निराला ने या मुल्‍कराज आनंद ने दलितों के सवाल पर जो सहानुभूतिपरक साहित्‍य लिखा, उसके पीछे गाँधी जी का अछूतोद्धार आंदोलन नहीं, अम्‍बेडकर के दलित आंदोलन का भी दबाव और असर था।

दलितों द्वारा लिखे गए साहित्‍य में अनुभूति की प्रमाणिकता होती है, इस तथ्‍य से इन्‍कार नहीं किया जा सकता लेकिन भोगा हुआ यथार्थ सिर्फ' आत्‍मकथाओं तक ही लेखक की मदद कर सकता है, अन्‍य विधाओं के लिए तो देखा गया यथार्थ' के प्रस्‍तुतीकरण की भी ज़रूरत पड़ेगी। एक बात और कि प्रत्‍येक काला अक्षर' साहित्‍य नहीं हो सकता और न ही प्रत्‍येक व्‍यथा कथा' साहित्‍य हो सकती है, उसमें साहित्‍यिकता के महत्‍वपूर्ण अवयवों जैसे- अमूर्तता, संश्‍लिष्‍टता, सघना, ऐंद्रियिकता, शैलीगत विशिष्‍टता इत्‍यादि भी अपरिहार्य हैं। अतः मेरा अभिमत है कि साहित्‍य को वर्णवादी व्‍यवस्‍था के सांचे में बाँटकर देखने की प्रवृत्‍ति ही गलत है।

आप क्‍या सोचते हैं?

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औरतनामा---

-डॉ. कविता "किरण"

         मैं! हां! मैं! एक हादसे की तरह इस दुनिया में आई! जिंदगी को जिसे अनचाहे झेलना पडा। मेरा स्वागत मुस्कुराहट ने नहीं, मातम ने किया। आँख खोलते ही दर्द की सांवली परछाइयों ने मुझे अपने वजूद में समेट लिया और शुरू हो गया चिंता से चिता तक का कांटों भरा सफर।

जिंदगी बहुत वाहियात चीज रही है मेरे लिए। इसे जीने में कभी सुकून महसूस नहीं हुआ। मैं तन्हाइयों के किले में कैद थी। आज भी हूं और मेरी दुनिया इसी किले की चहारदीवारी में सिमटकर रह गई। मेरे खयालों ने, मेरे जज्बातों ने कभी इन दीवारों को तोडने की, इनसे बाहर आने की कोशिश भी नहीं की।

हां! वक्त और उम्र के साथ कुछ ख्वाब जरूर आते-जाते मेरी आँखों के रोशनदान में चुप-से झांक गये और मेरे भीतर किसी दूसरे का अनजाना, अनपहचाना-सा वजूद छोड़ गये।

मैं उन डूबती हुई शामों का आईना रही हूं, जिसमें आसमान पर एक सुनहरी सुबह की तरह उगने की ललक है, लेकिन अफसोस ! वो शाम कभी उस सुबह का नाम अपने होठों पर नहीं ला सकी।

मैं उन अंधेरी काली रातों की अनजान राहों की मुसाफिर हूं, जो सिर्फ गमजदा लोगों लिए बनी है, जिनका आगाज तो है, पर अंत नहीं।

वक्त ने मेरे माथे पर बस एक ही लफ्ज लिखा है - ‘आँसू’।

दो बोल उम्मीदों के, प्यार के, हौसलों के किसी ने मेरे आँचल में नहीं डाले।

जन्दगी में कहने को बहुत-से अपने हैं। मगर कोई अपना नहीं। रिश्ते रिसते घावों की तरह तकलीफदेह हैं। बस एक दर्द, एक तन्हाई है। और है एक बेमौत मरती-सी जिंदगी, जो मेरी साँसों के साथ- साथ अपना सफर तय कर रही है। अनचाहे। अनबोले।

सच ! औरत होना कितना बड़ा गुनाह है।

बहुत चाहा। तकदीर कभी कहीं कोई ऐसा पल मुझे दे, जो मेरे अस्तित्व को रेखांकित करे। मेरी ‘मैं’ को गौरवशाली बनाये। जिसमें मैं अपने आत्मसम्मान की परिभाषा लिख सकूं। जिसमें मुझे अपने औरत होने पर शर्मिन्दगी महसूस न हो।

लेकिन, दुनिया का इतना बड़ा दिल कहां जो मुझे मेरी खुदी, मेरी ‘मैं’ मुझे तोहफे में दे। पता नहीं, मैंने तकदीर से इतनी उम्मीदें क्यों बांध ली। यह जानते हुए भी कि जिंदगी के हाथ बहुत छोटे हैं और इच्छाओं का आँचल बहुत बडा।

आदमी को सपने कभी नहीं देखने चाहिए, क्योंकि सपने कभी पूरे नहीं होते। वो तो टूटने के लिए ही बने हैं। और जब वो टूटते हैं तो उनकी आवाज बेशक सुनाई नहीं देती, लेकिन टूटे हुए सपनों की किरचें जो घाव दिल पर बनाती हैं, उसे वक्त का मरहम भी कभी नहीं भर पाता।

फिर भी मैं इंतजारती रही, उस आहट को जो मेरे मन के खालीपन को भर दे। मेरी उदासियों को नोंचकर कहीं दूर फेंक दे और खुशियों के लिबास से मेरे आज को, मेरे वर्तमान को सजा दे। मेरा होना जिसे अच्छा लगे। मेरी मौजूदगी जिसे सुकून दे। मेरे अस्तित्व की खुशबू का जो कायल हो।

मैं राह तकती रही उस वक्त की, जिसके कदम खुशकिस्मती बनकर मेरी उम्मीद की दहलीज पर कदम रखे और जो प्यार, खुशी, चैन और सुकून का पूरा परिवार अपने साथ लेकर आए।

फिर एक दिन जंदगी के सफर में चलते- चलते अचानक एक साया मेरे सामने आकर खडा हो गया। हँसी-खुशी से लबरेज। बेफिक्री और जिंदादिली की तस्वीर। पता नहीं क्यूं उसने सफर में मेरे साथ-साथ चलने की इजाजत मांगी। मेरी आँखों के सपनों पर अपना हक मांगा। मेरी जन्दगी में अपनी एक खास जगह मांगी और मेरे ख्यालों में अपनी दुनिया बसानी चाही।

मगर मैं ? मैंने तो कभी अपने आने वाले कल को सोचा ही नहीं था। हमेशा अपने आप में ही इतनी मशगूल रही कि कभी अपने रास्ते के आस-पास खडे पेडों तक को नहीं देख पाई। नजर सीमाओं में बंधी हुई थी। ख्यालों की भी अपनी एक हद थी और सपनों का तो कोई वजूद ही नहीं था।

फिर एकाएक ये कौन सा हिमालय बिना निमंत्र्ण के मेरे सामने आकर खडा हो गया। मैंने घबराकर, बचकर निकल जाना चाहा। पर उसने बांहें फैलाकर मेरा रास्ता रोक लिया।

मैं गम थी। दर्द के अनंत सफर की राहगीर। जानती थी खुशी और गम दो अलग-अलग अहसास हैं जो कभी इकट्ठे नहीं रह सकते।

मेरी उदास आँखों के इंकार ने उस हिमशिखर को गलते देखा। खण्ड-खण्ड पिघलते देखा। टुकडे-टुकडे होते, घुटनों पर झुकते देखा। मैं हैरान थी। ये सब क्या मेरे लिए ! एक सहमी-सी तसल्ली अपने भीतर महसूस हुई। यह देखकर कि कोई है, जिसके लिए मैं खास हूं। जो औरत की अहमियत को समझता है। उसकी कद्र करता है, उसकी इज्जत करता है। कोई तो है जिसकी जरूरत सिर्फ मैं हूं। जिसकी मोहब्बत सिर्फ मैं हूं। मेरा इंकार कमजोर पड गया।

उसने मेरी मरजी, मेरी इजाजत की परवाह किये बगैर मेरा हाथ थामा और दूर क्षितिज की तरफ उंगली उठाकर इशारा किया जहां धरती और आकाश आपस में गले मिल रहे थे। मन में आशा की एक किरण जगा दी उसने। सपनों की झीलों में हसरतों के गुलाब खिला दिये। पानी की खामोश सतह पर मानो उसने एक कंकड उछाल दिया और गहराई तक हलचल भर दी।

और फिर मैं सारी दुनिया को छोडकर, सारे असमंजस और अंतर्द्वन्द्वों से मुंह मोडकर, आँखें बंद किये अपना हाथ उसके हाथों म सौंपकर बेफिक्र-सी बढ गई, उस ओर, जिधर भी वो ले गया। लगा वो क्षितिज ही मेरी मंजल है। मानो मेरे ‘स्व’ का संरक्षक मुझे मिल गया। मैंने ऊपर वाले की दुनिया में अपनी एक अलग ही सपनों की दुनिया बसा ली। अरमानों को पंख लग गये। इच्छाओं को आकार मिल गया। कल्पनाएं साकार लगने लगीं। मुझे जिंदगी से प्यार हो गया। वर्तमान सुनहरे भविष्य के ताने-बाने बुनने लगा। इस बात से बेखबर कि ऊपरवाले ने आफ लिए वो नहीं सोचा होता जो आप अपने लिए चाहते हो।

और एक दिन उस हकीकत से सामना हुआ कि क्षितिज जो महज एक भ्रम है। जमीन और आसमान कभी एक नहीं होते। एक होने का भ्रम होता है। क्षितिज कायम है। भ्रम कायम है। मैं हूं। और बौना होता जाता हिमालय भी।

मैं जर्रे को आफताब समझ बैठी थी। दर्द, चैन का लिबास पहनकर आया था, सो धोखा खा गई। जिसे खास समझा, वो बहुत आम निकला। आदमी कभी औरत को आदर नहीं दे सकता। चाहे वो किसी भी रिश्ते की शक्ल में हो। औरत का कद उसके बराबर हो वो ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। पुरुष के लिए नारी सिर्फ सामान है, इंसान नहीं।

चेहरे ने फिर खामोशी ओढ ली। सब्र ने होंठ सी दिये। पर सीने में एक कोलाहल था। अंतहीन। एक ऐसा शोर, जिसका न ओर था न छोर।

कई बार उस रचयिता से सवाल करती हूं। औरत को बनाया ही क्यूं गया ? क्या अपमान और तिरस्कार को परिभाषित करने के लिए ? या पुरुष की प्रभुता को सिद्ध करने के लिए ? या फिर उसके अहंकार को महिमामण्डित करने के लिए ?

लेकिन शून्य भला क्या उत्तर देता।

पुरुष का अहंकार कछुए की खाल की तरह कठोर होता है, जो कभी नहीं टूटता। टूटना चाहता ही नहीं। और नारी का स्वाभिमान, उसका अंतस्, उसका अस्तित्व एक कच्ची कोंपल की तरह, जो गर्म हवा के स्पर्श से ही झुलस जाता है।

मैं औरत हूं। मेरा फर्ज है अपने आप को औरों के सांचे म ढालना। मुझे अपने बारे में सोचने का कोई हक नहीं। अपना आसमान तलाशने की बिल्कुल इजाजत नहीं। यही अहसास दुनिया में पहला कदम रखते ही समाज ने मेरी साँसों में घोल दिया। मेरी आँखों से न जाने कितने आँसुओं के सैलाब बहे। जिन्हें समय की रेत अनवरत सोखती चली गई। किसी को कुछ फर्क नहीं पडता। अपनी अस्मिता की लडाई में औरत अकेली है।

आज दुनिया कहती है, मैं आजाद हूं। औरत अब वस्तु नहीं है, व्यक्तित्व है। पर सच तो यह है कि इस आजादी की भी एक लक्ष्मण रेखा है जो पुरुषों के बनाए समाज ने खींची है। स्वतंत्र्ता मिली तो है, पर पराधीनता की परिधि में।

समझ नहीं आता।

कब तक मैं पुरू के अहंकार की कांटों भरी सलीब पर लटकायी जाऊंगी और अपने धैर्य की परीक्षा देती रहूंगी।

कब तक सहनशीलता के नाम पर छली जाऊंगी ?

कब तक सब्र की तरह आजमाई जाऊंगी ?

आखिर कब तक ?

थक गई हूं एक अंधा सफर तय करते। अपने भीतर के अंधेरों से लड़ते। किश्तों में मरते और हालातों से समझौता करते।

हर रोज अपने मन के सागर में डूबते उतराते सूरज को देखते रहना अब अच्छा लगता है। आदत बन चुका है। अच्छा लगता है, अब अपने भीतर उगते सांझ सवेरों से मुलाकात करना, मौन से बतियाना, रोज खुद में जीना और खुद ही में मर जाना भी। तन्हाइयां जिंदगी की जरूरत बन गई हैं। ये सब अब न हो तो अचंभा लगता है। एक अथाह खालीपन का रेगिस्तान-सा मुझमें समा गया है। मुझे पीता-सा। मुझे जीता-सा।

मैं औरत हूं। सोच रही हूं। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, चेहरे और मौसम भी। क्या कभी मेरा भाग्य भी बदलेगा ?

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डॉ. कविता "किरण"

राजा चन्द्रसेन बहुत ही पराक्रमी और प्रतापी राजा था I वह अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था I  उनकी सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था I पर इन सबके बावजूद उसे एक भी व्यक्ति पसंद नहीं करता था और आस पड़ोस के राजा भी उसके शत्रु बन चुके थे क्योंकि उसकी वाणी बहुत कठोर और रुखी थी I वह सोचता था कि वह सबका हित चाहता हैं इसलिए कुछ भी बोल सकता हैं पर सुनने वाले को कटु वचन सुनकर बहुत दुःख होता था, और वे उसे बिलकुल भी पसंद नहीं करते थे I सारे राज्य में किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी,जो राजा को यह बात कह सकता इसलिए वे उसकी तमाम अच्छाइयों के बाद भी बुराई ही करते रहते थे I 

राजा के पास एक जादुई पलंग था जो उसे रोज रात एक कहानी सुनाया करता I वह राजा को बहुत प्यार करता था जब वह दिन भर राजा की बुराइयाँ सुनता रहता तो उसे बहुत दुःख होता क्योंकि वह जानता था कि राजा दिल का बहुत अच्छा हैं I उसने निश्चय किया कि वह कहानी के माध्यम से ही राजा का एकमात्र अवगुण दूर कर देगा उस रात जब राजा  ने पलंग से कहानी सुनाने के लिए कहा तो पलंग ने कहानी सुनाना शुरू किया - महाराज, बहुत समय पहले की बात हैं एक गाँव में एक बहुत ही आलसी आदमी रहता था I  उसका नाम था गोपीनाथ I वह कोई कामधाम नहीं करता था इसलिए उसकी पत्नी ने भी उसे धक्का मारकर घर से निकाल दिया था I पर गोपीनाथ  तो हर से निकले जाने के बाद पहले से भी ज्यादा खुश था I गोपीनाथ की एक विशेषता थी  कि उसकी बोली बहुत मीठी थी I वह जब भी किसी से बोलता तो उसकी कोशिश रहती कि किसी का दिल ना दुखे I घर से निकाले जाने के बाद वह एक सेब के पेड़ के नीचे लेटने लगा I जब भी कोई सेब पेड़ से गिरता तो वह लेटे- लेटे ही खा लेता I उधर से निकलने वाले कई लोगो ने उसे सलाह दी कि पूरा पेड़ सेबों से लदा हैं वह पत्थर मारकर क्यों नहीं तोड़ लेता I इस पर गोपीनाथ कहता - " नहीं,नहीं ..अगर मैं पेड़ पर पत्थर मारूंगा तो उसे दर्द होगा इसलिए मैं जमीन पर गिरे हुए सेब ही खाऊंगा I जबकि गोपीनाथ सोचता कि जब आराम से लेटे लेटे ही सेब खाने को मिल रहे है तो बेकार की मेहनत क्यों की जाए I पर सेब का पेड़ अपने बारे में गोपीनाथ की बात सुनकर उससे बहुत खुश हुआ I उसने सोचा कि गोपीनाथ उसका कितना ध्यान रखता हैं I अब पेड़ खुद गोपीनाथ के लिए पेड़ मीठे मीठे रसीले सेब गिराने लगा I 

गोपीनाथ दिन भर लेटे हुए सेब खाता और रात को वही  सो जाता I एक दिन जब वह दिन मैं लेटा हुआ था तो झाड़ियों  में से एक काला नाग आया और अपना फ़न फैलाकर गोपीनाथ से बोल- " तुम मेरे आने जाने के रास्ते में रोजाना लेटते हो आज मैं तुम्हें जरुर काटूँगा I सुनते ही गोपीनाथ की डर के मारे घिग्गी बंध गई I   उसने  सोचा कि मुझे तुरंत यहाँ से भाग जाना चाहिए पर वह जैसे ही उठने लगा तो उसने सोचा कि मैं जैसे ही भागूँगा तो सांप भी सरपट भागकर मेरे पीछे आ जाएगा और मुझे काट खायेगा इसलिए जब मुझे मरना ही हैं तो फिर बेकार पैरों को क्यों कष्ट दू यही पर आराम से लेटा रहता हूँ I इसलिए  वह साँप से बहुत ही मधुर स्वर में बोला -" नागराज, मैं तो आपकी शरण मैं हूँ अब आप जो चाहे कीजिये I " यह सुनकर साँप अचंभित रह गया और धर्म संकट में पड़ गया I उसने सोचा कि यह मेरी शरण में हैं इस कारण इसके प्राणों की मुझे रक्षा करनी चाहिए I यह सोचकर साँप बोला- " मित्र, मैं तुम्हारे मधुर वचनों से बहुत ही ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ I  मैं तुमको भेंट स्वरुप यह मणि देता हूँ ,  इसको हाथ में पकड़ते ही तुम आने वाली घटना को देख सकोगे और जब भी मेरी जरुरत हो तो झाड़ियों  के पास आकर मुझे पुकारना मैं तुरंत चला आऊंगा I यह  कहकर साँप वहाँ से चला गया I  

गोपीनाथ  तो जगमगाती  हुई मणि देखकर ख़ुशी से पागल हो गया और उसने सोचा की मणि हाथ में पकड़ कर देखता हूँ कि कल क्या होने वाला हैं  I ये सोचकर उसने जैसे ही मणि पकड़ी उसने देखा कि कुछ लकडहारे अपने हाथों में कुल्हाड़ी लेकर सेब के पेड़ को काटने के लिए इधर ही आ रहे हैं I यह देखकर वह घबरा गया और भागकर सेब के वृक्ष के गले लग गया फिर वह आँसूं पोंछा हुआ झाड़ों की तरफ भागा और साँप को सारी बातें बताई I साँप पूरी बात सुनकर बोला -" तुम बिलकुल चिंता मत करो I मैं तुम्हारे पेड़ को कुछ  नहीं होने दूंगा I दूसरे दिन वह कई सापों को लेकर पेड़ के पास बैठ गया I जब लकडहारे पेड़ काटने आये तो इतने सारे साँपों को पेड़ के नीचे बैठा देखकर डर के मारे अपनी कुल्हाड़ियाँ वही छोड़कर सरपट भाग गए I पेड़ गोपीनाथ की दयालुता देखकर बहुत खुश हुआ और वह उससे बोला _" आज से मैं तुम्हारे लिए ढेर सारे रसीले फल गिराया करूँगा I , तुम उन्हें यहाँ बैठे बैठे ही बेचना जिससे तुम्हारे घर का खर्च आराम से निकल जाएगा I यह सुनकर गोपीनाथ मासूमियत से बोला -" मैं सब बेच तो दूँगा, पर बैठे बैठे नहीं लेटे- लेटे I पलंग की यह बात सुनकर राजा जोरों से हंस पड़ा और पलंग से उत्सुकता से बोला - " और फिर क्या हुआ?"

पलंग ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया और महाराज, गोपीनाथ की मीठी वाणी के कारण उसकी तकलीफों का अंत हो गया I राजा बोला -" हाँ, हाँ, वह सचमुच बहुत मीठे वचन बोलता था और मधुर वचन तो सबको प्रिय होते हैं और इस कारण मधुर वचन बोलना वाला सबका प्रिय बन जाता हैं I बिलकुल ठीक महाराज जब गोपीनाथ जैसा आलसी आदमी सिर्फ मीठे वाणी के कारण सब कुछ पा सकता हैं तो आप तो महाप्रतापी और पराक्रमी राजा हैं I आपको तो प्रजा अपनी माता-पिता की तरह प्रेम करेगी और सभी शत्रु राजा आपके मित्र  बन जायेंगे I यह सुनते ही राजा कि  आँखे खुल गई और उसकी आँखों में आँसूं आ गए I वह रूंधे गले से बोला -" आज तुमने मेरी आँखें खोल दी I अब मैं सदा मीठी वाणी ही बोलूँगा I "

राजा के यह बोल सुनकर पलंग की ख़ुशी की तो सीमा ही नहीं रही I दूसरे ही दिन राजा ने राजमहल के मुख्य द्वार पर लिखवा दिया -" मीठे बोल सभी के हृदय को जीत लेते है I "

फिर ऐसा ही हुआ जैसा कि पलंग ने राजा को कहा था I प्रजा राजा को दिल से सम्मान देने लगी I इस तरह राजा ने वर्षों तक अपना राज्य हँसी ख़ुशी चलाया I      

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ग़ज़ल 

कर दिया कुछ ने 

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                  -- मनोज 'आजिज़'

बागे-वतन को जहन्नम कर दिया कुछ ने 

दिले-वतन में जखम कर दिया कुछ ने 

 

ग़रीबों का खून पीकर मस्ती से जीते हैं कुछ 

बेशर्मी से खूब दामन भर दिया कुछ ने 

 

रौशन था नाम बेहद दुनिया में एक ज़माने 

लूट मचाकर झुका सर दिया कुछ ने 

 

इन्सां को इन्सां से इंसानियत की आस थी 

हर सू दह्शती आलम कर दिया कुछ ने 

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जमशेदपुर 

झारखण्ड 

 

mkp4ujsr@gmail.com

अबला न रहे हम

अबला न रहे हम

ऐसी हो हमारी सशक्‍तीकरण

हत्‍या न हो हमारी भ्रूण अवस्‍था में

बदलाव ऐसी आए सामाजिक व्‍यवस्‍था में

मॉ-बाप पालने में न बना दे हमें कुपोषित

लड़के की तरह हमें पालने की हो कोशिश

मिलने चाहिए हमें भी समान सुअवसर

देने में सरकार सुअवसर न रखे कोई कसर

कार्यालयों में न हो हमसे छेड़छाड़

बॉस करें त्‍वरित न्‍याय आरोपी हो तड़ीपार

दहेज के लिए न हम जलाएं जाएं

क्रांति हो औ' समाज में ऐसा बदलाव आए

घरेलू हिंसा से घर में हो हम स्‍वतंत्र

तभी भारत में होगा सत्‍य में गणतंत्र

 

नीरा सिन्‍हा

गिरिडीह 815301 झारखंड़

इतिहास में

कतरा-कतरा खून बंद है

आजादी के इतिहास में

हमने इसे नहीं पाया

खेल-खेल में

ना जाने कितनी माँओं ने

अपने लाल खोये हैं !

आंचल को आंसुओं से

भिगोये हैं !

ना जाने कितनी पत्नियों ने

अपने सुहाग खोये हैं

चूड़ियों को तोड़-तोड़ ,कर

सिने पर जख्म खाए हैं

ना जाने कितने पिताओं ने

अपने जिगर खोये हैं !

अपनी सर जमीं के लिए

बलिदान सपूत किये हैं !

ना जाने कितनी बह्नों ने

न्योछावर भाई किये ,

अपने वतन के खातिर

तीर दिल पर सहे हैं !

फिर भी देश वासी

क्यों अपने ही देश को

लुट रहे हैं !

नेताओं के भेष में

विदेशी यहाँ घूम रहे हैं !

कतरा-कतरा खून बंद है

आजादी के इतिहास में

हमने नहीं पाया इसे

खेल-खेल में !

--

ग़ज़ल

इन चरागों में रौशनी कम क्यों आजकल

लो जला दो दिलजलों को चरागों में रौशनी कम है

 

ना लेला सा हुस्न ना केश का जिगर आलकल

लो जला दो के तक्तो-ताज को चरागों में रौशनी कम है

 

आज मुझ से कल तुम से मुहोब्बत क्यों है आजकल

आशिकों को जलने दो के चरागों में रौशनी कम है

 

क्यों नहीं जलने दे ते शमा को जमाना आजकल

जलने दो परवानों को के चरागों में रौशनी कम है

 

क्यों नहीं आते वो रुसवा करने को आजकल

लो आओ फिर से दगा देने के लिए के चरागों में रोशन कम है

 

अपने दर्द-ए-दिल की ना ,तू दवा कर मीनू

तुम जलाती रहो जिगर चरागों में रौशनी कम है

 

ग़ज़ल

मेरी तन्हाइयों पर तेरी नजर क्यों है साकी

यूँ शाम सहर मुझ को महफ़िल में ना बुला

 

पर सकूं जिन्दगी है मेरी माझी के बिना

मेरे सीने में मुहब्बत की प्यास न बढ़ा

 

उस की बेरुखी में भी एक नशा है साकी

मुझ को रहने दे बेहोश ना होश में ला

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शेर

नहीं चाहिए शोहरत भरी जिन्दगी

मुझ को रहने दे बेनाम उसके शहर में

 

दूर रहकर क्या ख़ाक जिन्दगी होगी

उसके पहलू में तोड़ने में मजा है

विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

पिछले दो-तीन सालों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में जनवरी माह में होने वाले जयपुर साहित्य उत्सव ने सुर्ख़ियों में बने रहने के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। गुलाबी नगरी में होने वाला ये आयोजन पहली बार ज़ियादा सुर्ख़ियों में तब आया जब इसके एक सेशन में अंग्रेजी के कुख्यात लेखक सुहेल सेठ मंच पर ही मदिरा सेवन करते हुए देखे गए। इस कु-कृत्य का विरोध होना जायज़ था और हुआ भी ,उत्सव में शाम को सजने वाली शराब से सराबोर महफ़िलों ने भी लोगों का ध्यान बड़ा आकर्षित किया। इस उत्सव के आयोजकों ने जैसे ही इसमें ग्लैमर का तड़का लगाया भीड़ के साथ–साथ प्रायोजक भी कतार में आकर खड़े होने लगे। मात्र दो–चार लाख के मामूली बजट से शुरू हुए इस मेले का बाज़ार आज करोड़ों तक पहुँच गया।

साहित्य के नाम पर होने वाले इस उत्सव को विश्व के नक्शे पर जगह दिलाने के लिए आयोजकों ने बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत जानबूझकर गत वर्ष सलमान रुश्दी का नाम उछाला। ये लोग जानते थे कि प्रशासन रुश्दी को यहाँ आने तो नहीं देगा मगर उसके नाम और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हम इस “जयपुर लिकर उत्सव “को मक़बूल (प्रसिद्ध ) ज़रूर कर देंगे। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आयोजक अपनी चाल में क़ामयाब हो गए , दो बेशर्म लेखक बड़ी बेहयाई के साथ सलमान रुश्दी की प्रतिबंधित किताब के अंश पढ़ गए और हमारा लचर निज़ाम लाचार खड़ा रहा। पूरे उत्सव के दौरान खुलेआम सिगरेट का धुंआ तमाम पाबंदियों के बावजूद भी वातावरण को प्रदूषित करता रहा और बहुत सी फ़िल्मी हस्तियों का साहित्य के प्रति दिखावटी लगाव देखने को मिला ख़ासकर “ बाबू जी ज़रा धीरे चलो “ जैसे आइटम गीत पर थिरकने वाली याना गुप्ता का साहित्य प्रेम।

डिग्गी पैलेस में होने वाले साहित्य के महाकुम्भ जैसे विशेषण से चर्चित कर दिए गए इस आयोजन से साहित्य का कोई भला होगा ऐसी उम्मीद इस साल भी नहीं थी। जानबूझकर इस बार भी विवादों के शामियाने डिग्गी पैलेस में लगाए गए। उन निर्लज्ज लेखकों को पुनः बुलाने की क्या ज़रुरत थी जिन्होंने पिछले साल रुश्दी की प्रतिबंधित पुस्तक के अंश पढ़े।

पाक सेना ने हमारे दो जवानो को सरहद पर बर्बरता से शहीद कर देती है और एक जवान का सर तक काट कर वे लोग ले जाते हैं ,पाकिस्तान की हुकूमत इस घिनौने कृत्य पर संवेदना तक प्रकट नहीं करती ,फिर क्या ज़रूरी था कि वहाँ के साहित्यकारों को यहाँ बुलाया जाए।

ये सब भी जानबूझ कर किया गया ताकि आयोजन को सुर्ख़ियों में जगह मिलती रहे। अगर भारतीय सेना ने पाक सेना के किसी जवान का यूँ सर काटा होता और ऐसा कोई आयोजन पाकिस्तान में होता तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि वहाँ से हमारे साहित्यकारों का कार्यक्रम में भाग लेना तो दूर उनका वापिस आना तक मुश्किल हो जाता। पंच सितारा होटल में बैठकर अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले लेखक आवाम के दर्द को कहाँ समझ सकते हैं।

अंग्रेजी साहित्य को विशेष तरजीह देने वाले इस उत्सव के आयोजकों ने हिंदी,उर्दू ,और यहाँ की एक-आध ज़ुबान के सेशन रखवा कर थोड़ी मेहरबानी ज़रूर कर दी। अदब के नाम पर होने वाले इस मनोरंजन उत्सव का जब-जब जिस किसी ने विरोध किया उन्हें आयोजकों ने अगली बार आमंत्रित कर लिया या एक आध सेशन में जगह दे दी। जो अख़बार इस मेले की कल तक मुखालफ़त कर रहे थे आज वे ही इसके मीडिया पार्टनर बने हुए हैं। कुछ स्थानीय साहित्यकार और स्वयम्भू साहित्यकार भी पिछले साल खुलेआम इस आयोजन के विरोध में थे मगर इसबार आयोजकों ने बड़ी चतुराई से इन्हें एक –आध सेशन का झुनझुना खेलने के लिए दे दिया और इन अदीबों को ऐसे लग रहा है जैसे इन्हें पदम् विभूषण मिल गया हो।

इस फेस्टिवल का पहला दिन ही एकबार फिर विवादों के साथ शुरू हुआ , आदरणीया महाश्वेता देवी जी ने जमकर नक्सलियों का दर्द लोगों से बांटा ,उन्होंने कहा कि नक्सलियों को सपने देखने का हक़ है काश महाश्वेता देवी जी को नक्सलियों के हाथों शहीद हुए जवानो के सपनों की भी फ़िक्र होती। क्या ज़रूरत थी साहित्य के नाम पर होने वाले उत्सव में इस तरह की बेहूदा बात करने की।

विज्ञापन जगत से फिल्मों में गीतकार हो गए प्रसून जोशी इस मेले के ब्रांड एम्बेसडरों में से एक हैं। प्रसून जी ने पता नहीं क्या सोचकर कहा कि भगवान् कृष्ण भी इव टीजर थे। बड़े अफ़सोस की बात है कि अपने आप को गीतकार कहने वाला कृष्ण के व्यापक दर्शन से ही नावाकिफ़ है समझ में नहीं आता कुछ हटकर बोलने के रौ में ये चमक –धमक वाले लोग इतनी बेतुकी बातें क्यूँ कह जाते हैं। जावेद अख्तर साहब ने भी कुछ हट कर कहने के चक्कर में यहाँ तक कह दिया कि “एक माँ बच्चे के सबसे क़रीब होती है , वही बच्चे को असली तालीम देती है , एक माँ को धर्म से दूर रहना चाहिए ताकि बच्चे को वो सही शिक्षा दे सके।””क्या धर्म किसी माँ को अपने बच्चे को सही तालीम देने से रोकता है ? इस बेतुके बयान का कोई सर पाँव नज़र नहीं आता।

जिस दिन ये मेला शुरू हुआ उस दिन राजस्थान के एक जाने-माने चैनल पर नीचे पट्टी पर ख़बर चल रही थी की प्रसून जोशी जयपुर पहुंचे ..मैरिट होटल में रुकेंगे ....क्या यही मेयार रह गया है ख़बर का ?

लाखों रुपये प्रसून जोशी , जावेद अख्तर , शबाना आज़मी और गुलज़ार साहब को आयोजकों ने शिरकत करने के दियें होंगे और सुना है कि गुलज़ार तो इस बार सिर्फ़ श्रोता का किरदार अदा करने आयें हैं ,यक़ीनन गुलज़ार साहब को श्रोता बनने की भी काफ़ी मोटी रकम मिली होगी।

एक तरफ़ एक सच्चा क़लमकार पैसों के अभाव में अपनी रचनाओं का अपनी डायरी में ही क़त्ल कर देता है दूसरी तरफ़ साहित्य के नाम पर होने वाले इस आयोजन में करोड़ों रुपये सिर्फ़ कुछ स्वयम्भू अदीबों के ठहरने और इनके आने की फीस में उड़ा दिए जाते है ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है।

मुझे तो क्या क़लम से सच्ची मुहब्बत करने वाला हर शख्स जयपुर के इस साहित्य उत्सव को अब यही समझने लगा है :--

जहां अदब के नाम पर , मौज मस्तियाँ जाम।

जयपुर में साहित्य का , कैसा है ये धाम।!

दो साल पहले जयपुर के एक प्रतिष्ठित साहित्यिक प्रकाशक ने दस साहित्यिक किताबों का मूल्य मात्र सौ रुपये रखा , साहित्य के क्षेत्र में ये एक क्रांतिकारी पहल थी , दस लेखकों का क़लाम बहुत से लोगों तक पहुंचा। अदब की दुनिया में ये क़दम एक साहसिक क़दम था और इसकी पज़ीराई भी बहुत हुई। उस वक़्त फेसबुक की वाल पर कुछ दोगले किस्म के अपने आप को अदीब कहने वाले लोगों ने बहुत कुछ लिखा। लेखक के हित का मुद्दा उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से उठाया मगर इस आयोजन के एक सेशन में जगह भर मिल जाने से यही लोग फूले नहीं समा रहें हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखनी के साथ होता हुआ भद्दा मज़ाक क्या इन्हें अब नज़र नहीं आता ? क़लम के इन नकली सिपाहियों को ये सब नज़र तो आता है मगर सुर्ख़ियों में बने रहने की चाह ने इन्हें शब्द के साधक से शब्द का सौदागर बना दिया है।

विवाद का कोई भी मौका ये फेस्टिवल अपने हाथ से जाने ही नहीं देता ,मेले के तीसरे दिन साहित्य के मंच पर ज़ात-पात पे उतर आये समाज शास्त्री आशीष नंदी को अचानक क्या हुआ कि उन्होंने यहाँ तक कह डाला की दलित और पिछड़े ज़ियादा भ्रष्टाचारी है। मीडिया की बदौलत जब ये बात फैली तो दस मिनट के अन्दर – अन्दर नंदी की गन्दी ज़ुबान एक दम पलट गयी वे अपने दिए बयान पर सफाई देने लगे। क्या पूरे मुल्क ने सुना नहीं वो बयान , पहले कहना फिर मुकर जाना ये सब क्या है :--

पहले बोले जोश में , गए बाद में नाट।

सरेआम नंदी गए , अपना थूका चाट।!

किसी साहित्यिक मंच पे ऐसी बहस का सबब समझ से परे है या फिर ये है कि लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का सारा ठेका “जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” के आयोजकों ने ले रखा है।

ऐसे बयान के बाद प्रशासन को चाहिए था की नंदी और आयोजकों को तुरंत गिरफ़्तार करते मगर इनके खिलाफ़ मुकद्दमा भी लोगों के दवाब के बाद दर्ज किया गया।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा एक युवा लेखक की कहानी को ये कहकर लौटा दिया गया था की आप के अफ़साने में अश्लीलता बहुत है , साहित्य में ऐसी कहानी का कोई स्थान नहीं हो सकता और इधर जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों ने उस अश्लील कथाकार गौरव सोलंकी को बाकायदा आने का न्योता दिया है। ऐसा लेखक नई नस्ल को क्या सिखाएगा , ज़हनी तौर से बीमार इस तरह के लेखकों का एहतराम करके आयोजक क्या साबित करना चाहते है।

अभी तक हुई इस मेले की तमाम कारगुजारियों को देखते हुए कहीं से भी नहीं लगता कि इस उत्सव में अदब का भला किसी भी ज़ाविये से हुआ है। अब तो ये सवाल उठता है कि इस आयोजन के साथ साहित्य का नाम क्यूँ चस्पा किया जा रहा है। भविष्य में अगर ये आयोजन हो तो “ जयपुर साहित्य उत्सव “ के नाम की जगह इसका नाम “जयपुर मनोरंजन महोत्सव “ कर देना चाहिए।

राजस्थान के साथ –साथ हिन्दोस्तान के तमाम अदीबों से मेरी गुज़ारिश है कि

अदब के नाम पर जयपुर में हर साल होने वाली इस नौटंकी पे लगाम लगनी चाहिए क़लम के सही मायने में पुजारियों को इस आयोजन का बहिष्कार करना चाहिए। सात से आठ करोड़ के बजट वाले इस आयोजन से आख़िर कुछ विवादों और आयोजकों की जेबों के भराव के अलावा क्या निकल कर आता है।

ऐसे आयोजन से अच्छी तो हमारी ग़रीब साहित्य अकादमियां हैं जो तंग-हालत में भी कम से कम सौ-दो सौ किताबों को छपवाने के लिए लेखकों को आर्थिक सहयोग देती हैं। हमारी अपनी तहज़ीब को मिटाने पे तुले इस “लिटरेचर उत्सव” में जगह पाकर धन्य हुए हिंदी, उर्दू ,राजस्थानी या अन्य हिन्दुस्तानी ज़ुबान के क़लमकार कभी ये क्यूँ नहीं सोचते कि अना नाम की भी कोई शैय होती है। जहां इनकी भाषा के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव हो वहाँ बैठकर ये लोग सांस कैसे ले लेते हैं।

इस नौटंकी के प्रायोजकों का जहां तक सवाल है उन्हें भी अपने फैसले पे एकबार फिर से गौर करना चाहिए। अगर कोई साहित्यिक संस्था इन लोगों के पास थोड़ी इमदाद के लिए जाती है तो इनकी नाक ,भोंहें सिकुड़ने लगती हैं मगर जयपुर की पवित्र धरा पर होने वाले इस मौज़-मस्ती के मेले के लिए लाखों रुपये देने के लिए इन प्रायोजकों में होड़ लगी रहती है।

साहित्य की आत्मा को चोट पहुंचाने के सिवाय इस उत्सव ने अगर किसी का भला किया है तो वो है जयपुर के होटल व्यवसाय का , बड़े- बड़े कारोबारियों का और आयोजकों का , ईश्वर करे जयपुर का नाम विश्व मान-चित्र में छाया रहे ,यहाँ का कारोबार फले-फूले मगर साहित्य के नाम का दुरूपयोग करके नहीं।

इसी विश्वास और उम्मीद के साथ कि आने वाले साल में अगर ये उत्सव हो तो विशुद्ध साहित्य का हो, अगर फिर इसी तरह का मेला लगना है तो इसके आयोजक मुस्तक़बिल में अदब के कांधों पे बन्दूकसाज़ी ना करें।

कविता है ज़ख़्मी यहाँ ,ग़ज़ल रही है कूक।

कांधे पर साहित्य के , चला रहे बन्दूक।!

विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

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एक तितली की मौत 

"ग". ह लाल, पीली, नारंगी, नीली, आड़ी, तिरछी रेखाओं वाली या गोल बूटी वाली साड़ी में बेतरतीबी से लिपटी सेब के बगीचों में, अखरोट के पेड़ों के नीचे, तो कभी खुबानी के या पूलम के बगीचों में पहाड़ी नदी की तरह उछलती मचलती, घास काटती किसी रंगीन तितली से कम न दिखती थी …कभी वह प्यूली के फूलों सी पीली तो कभी लाल बुरांस सी लाल लाल हो जाती .. कोई उसे रोक नहीं सकता था वह इतना खिलखिला कर हँसती कि सामने वाला समझ नहीं पाता था कि वह इतना क्यों हँसी .. दिल की इतनी साफ़ थी कि जो कुछ भी मन में आया रोका नहीं उसने, कह दिया सामने वाले से … और कभी तो जोर जोर से रो भी जाती जब कोई उसका मन दुखाता …तब रास्ते आते जाते लोग ठिठक जाते …पर उसे अपनी फिकर न रहती या कहिये कि उसे किसी की फिकर नहीं रहती कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे .. वह नदी जैसी थी जो कि आने वाले आयें या जाये या कुछ भी कहे उसके लिए, उसकी धारा को, उसकी कलकल को कोई रोक नहीं सकता था … वह निष्कपट खुल कर हँसती उसकी खनकती हँसी वादियों में गूंजती मंदिर की घंटियों से कम न लगती थी जिसको सुन कर एकबारगी लोग रुक जाते और दूसरी तरफ गुस्से का अहसास मात्र लगने पर वह जाहिर करती और कहती कि मैं नाराज हूँ तुमसे, मना लो मुझको ..और जैसे ही कोई मनाने की बात करता वह अगले ही पल खुश हो कर हंस देती पर रंचभर क्रोध या शिकायत को अपने मन में घर बसाने नहीं देती ….

जैसा स्वभाव था ग का वैसा ही उसका पहनावा … साड़ी बस लपेटती भर थी.. साड़ी किस करीने से पहनना है इसका उसे पता नहीं था ना जरूरत ही लगी उसे .. आखिर गाँव में इतना काम करना होता है तो तरतीबी से कब तक पहने ..हल के फल के पीछे दौड़ना, लकड़ी इकठ्ठा करना, खेतों में गुडाई निराई, घर का खाना, चौका बर्तन, गाय भेंसों के लिए घास काट कर लाना, दूध दुहना, गौशाला से गोबर की सफाई, खेतों से अनाज इकठ्ठा करना, दाल कुटना, सेब के पेड़ों और बाग बगीचे की देखभाल के साथ साथ बच्चों की देखभाल घर की साफ़ सफाई ..जाने कितने ही काम … दिन तो वही चौबीस घंटे का होता था, पर पहाड़ की सुबह देर से और शामें जल्दी .. बस कुछ घंटे हाथ में और ढेर सारे काम … तो साड़ी तो वह ऊँची नीची जल्दी जल्दी लपेट कर निकल पड़ती …पर साड़ी खरीदते समय फेरी वाले से बहुत चटख भडकीले रंग की साड़ी ही खरीदती …साड़ी की कीमत नहीं साड़ी के रंग उसको खुशी देते थे । जाने उसके जीवन में कौन से खुशियों के फूल खिल उठते थे उन रंगों के साथ की उसका मन उन रंगों के साथ गद्गद् रहता … जाड़ों के लिए लाल मोज़े खरीदती और अपनी सहेलियों से कहती - अरी! क्यों हँसती हो । लाल रंग देख कर जाड़ों में भी गर्मी का अहसास होता है ..

ग के इतने चटख रंगों का पहनावा -- गर्मी हो जाड़ा हो, उसको फरक नहीं पड़ता .. बस फेरी वाले से लाल पीली नीली हरी चूडियाँ खरीदने का उसका शौक और बहुत ही रंगरंगीली फूलों वाली साडियां, यही तो उसका शौक था .. गाँव में फेरी वाला आया है, यह सुन कर वह अपने हाथों की कुटली, दरांती सब फैंक दूर खेंतो से दौड़ती हुई फेरी वाले के पास आ जाती .. गाँव की औरतें भी फेरी वाले के पास की पोटली से उसके लिए लाल, नारंगी, पीली, नीली, गुलाबी  तीखे रंगों वाली साड़ी निकाल कर उसे दिखाते .. और उसका चेहरा रंगों के साथ अजब खिल उठता । हां, उसके चेहरे पर मेकअप तो कभी नहीं दिखा …उसके तीखे नैन नक्श उनकी सांवली सलौनी सूरत का यूँ भी श्रृंगार करते थे .. ग की निश्छल खिलखिलाहट और उसका पहनावा उसके भोलेपन को उजागर करता था..

गाँव में सभी उसके चटख रंग के पहनावे को ले कर आपस में गुणमुण करते पर उससे कोई कहता नहीं था   …कहे भी कैसे वह गाँव में जब ब्याह के आई थी तब मात्र तेरह साल की थी। अपने से पच्चीस साल बड़े आदमी की दूसरी ब्याहता ..जिसकी पहली पत्नी चौथे बच्चे के प्रसव के समय में चल बसी थी …. पीछे छोड़ गयी थी तीन बच्चे ..और दुनियाभर की खेती का काम .. और मायके में ग का तो कोई पूछने वाला ही नहीं था। माँ बाप बचपन में गुजर गए थे .. मामा की मजबूरी कि वह उसे किसी तरह से पाल रहे थे .. उससे पच्चीस साल बड़े आदमी का रिश्ता और ग की छोटी उम्र भी उन्होंने नजरअंदाज कर दी थी .. फ़ौरन बिना किसी गाजे-बाजे, ढोल शहनाई के और बिन बरात के ग का व्याह कुछ मंत्रोत्च्चारण के साथ हो गया था  .. वह खेती का काम और घर की देखभाल के लिए ब्याह कर घर लायी गयी थी। जब ग ससुराल आई तो पाया उसकी पहली बेटी तो उसके बराबर ही थी .. और उसने झट से उसे अपनी सहेली बना लिया । उनके साथ खूब हँसती, काम करती .. बच्चे जो उसकी उम्र के थे, स्कूल जाते और ग माँ बन कर वह उनको खाना खिलाती और खुद खुशी खुशी  खेत जाती । पर कभी किसी ने ग को शोक में डूबा नहीं देखा … कभी एक बूँद आंसू किसी ने उसके बहते नहीं देखा जो कहे कि उसे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत है। जिंदगी ने उसके जीवन में चटख रंग की साड़ियों के साथ तितली जैसे रुपहले रंग भर दिए थे ..

आज ग के घर में मातम था … ग के पति का देहावसान हो गया । पन्द्रह साल का सुहाग से भरपूर जीवन का अंत हो गया … ग की बहु ने सास ( ग ) को संभाला ..बेटियां भी खबर सुन कर अपने अपने ससुराल से आ गयी … बेटियों ने घर को संभाला … ग भी दो चार दिनों में आने जाने वालों से मुखातिब होने लगी .. तेहरवीं से पहले बच्चे शाम को ग के साथ बैठे हुए थे। बातों बातों में ग के रंगीन साड़ियों वाले बक्से का जिक्र आया तो ग बोली- हाँ वह मैंने संभाला हुआ है अपने कमरे में …. बच्चे बोले वह बक्सा दिखाओ माँ …माँ ( ग ) वह संदूकची ले आई .. बच्चों ने उसे खोला तो लाल पीली बैंगनी नारंगी और रंगबिरंगी फूलों और बूटों वाली साडियाँ खिल उठीं … बच्चे बोले माँ अब आप इन साड़ियों को लोगों में बाँट दो या कहीं रख दो, अब यह तुम्हारे काम की नहीं .. माँ बोली क्यों इन्होंने मेरा क्या बिगाड़ा है कि इन्हें कहीं रख दूँ ..कुछ समय बाद इन्हें पहनूंगी ना ..एक एक साड़ी मेरी पसंद की है .. बेटी बोली - नहीं माँ तुम समझो। अब तुम वही पहनोगी जो हम देंगे …. हम तुम्हारे लायक हल्के हल्के रंग की भूरी काली सफ़ेद साडियाँ खरीद कर भेजेंगे .. ग अवाक रह गयी .. बच्चे बोले माँ परेशान मत हो, हम महंगी से महँगी अच्छे स्तर की साडियाँ लायेंगे तुम्हारे  लिए .. ग कुछ ना बोल पायी  उसकी आवाज रुंध गई और उसके आंसू धार धार बह निकले ..आज जितना दुःख उसने अपने पूरे जीवन में महसूस न किया .. वह व्यथित हो उठी, इतना लंबा जीवन कैसे बीतेगा ..रंगों से भरा उसका संसार उस से छिनने लगा। उसको लगा उसके जीवन को खुशियों से भरने वाली रंगबिरंगी तितली के भरी जवानी में पंख नोच लिए गए और वह तितली बेसहारा तड़प तड़प कर मर रही है .. उसका दम घुटने लगा और साँसे रुकने लगी …उसको अपना पूरा जीवन बेरंग काला सफ़ेद नजर आने लगा ।


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स्व-परिचय


डॉ नूतन डिमरी गैरोला,
जन्मस्थान देहरादून उत्तराखंड।  पिता श्री ताराचंद्र डिमरी, माता श्रीमती रमा डिमरी हैं। मायका जोशीमठ चमोली ( बदरीनाथ के पास) और ससुराल नैणी चमोली उत्तराखंड में है। पति डॉ मित्रानंद गैरोला (सर्जन ) हैं। पिता केन्द्रीय सरकार में इनफोर्मेशन और ब्रोडकास्टिंग में कार्यरत थे जिस वजह से उनके तबादलों के साथ साथ अलग अलग जगह से शिक्षा ली । इसलिए जहाँ देवभूमि की नैसर्गिक सुंदरता और पवित्र वातावरण में पहाड़ का दर्द  बारीकी से जाना वहीँ मध्यप्रदेश में बस्तर जिले में आदिवासियों के जीवन को भी बहुत नजदीक से देखा परखा समझा । कानपुर, लखनऊ, कलकत्ता भी अध्ययन के लिए रही।  बचपन से ही बहुत संवेदनशील होने की वजह से जहाँ कहीं भी समाज में दुख और सुख देखा, मन की गहराईयों से खुद को उसमें डूबा पाया। । पढ़ाई के साथ लेखनी सतत चलती रही। चिकित्सक के रूप में भी हर दिन जहाँ मरीज के दैहिक  दर्द को महसूस किया और  निवारण करने का समुचित प्रयास करती रहीं वहीँ समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके भावात्मक पहलू से भी रूबरू होती रही। और यह दर्द कलम से पन्नों पर उतरता रहा। ।


सम्प्रति – चेयरपरसन और कंसल्टेंट गायनेकोलोजिस्ट मधुर नर्सिंग होम, श्रीनगर, गढवाल, उत्तराखंड
        महिलारोग चिकित्सक , दून चिकित्सालय ( महिला विभाग ), देहरादून ।

वेब पेज - http://amritras.blogspot.in
         http://mylifescan.blogspot.in
         http://mnh-healthylife.blogspot.in

ई मेल.. nutan.dimri@gmail.com

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6) ना सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले

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एक दरिया जो मेरी आँख से बहता है अभी

उसके साहिल पे तेरे नाम की इमारत है कोई

मेरी आँखों के नमकीन पानी की वजह

खंडहर सी दिखती हुई वो मिस्मार सी है

तेरे इश्क में ये बात मैंने कुफ्र की कर दी

तेरी याद में वहां इबादत तेरे बुत की कर दी

न धूप, न कपूर, न लोबान की खुशबू

तेरी यादें, मेरी आहें,और अश्कों की माला

ऐ दोस्त मेरे वजूद ने तुझे इश्क की देवी माना

न सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले

 

7) दिनचर्या

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दिन गुज़रा जब रो रोके

और आँखों से बरसात हुई

दिल और भी तब बेचैन हुआ

जब साँझ ढली और रात हुई

घडी की हर एक टिक टिक का

सम्बन्ध बना मेरी करवट से

तेरी याद में कितना तड़पा हूँ

पूछो चादर की सलवट से

छिपते ही आखिरी तारे के

मेरी आँख की नदिया फूट पड़ी

सूरज की पहली किरन के संग

तेरी यादें मुझ पर टूट पड़ी

दिन गुज़रा जब रो रो के

और आँखों से बरसात हुई

 

8) सबसे खूबसूरत पल

************************

ओ ! प्रियतमे

हमारी जिन्दगी का

सब से खूबसूरत पल

हमारे इंतजार में

बेकरार है वहां

जहाँ पे

फलक और जमी

आलिंगन बद्ध

होते हैं।

फल - जमीं का

मिलन

कोई मरीचिका नहीं है

वह तो

शास्वत सत्य है

जिन्हें हम

दूर की नज़र से

देख सकते हैं

किन्तु नजदीक से नहीं।

क्यों?

क्योंकि यह मिलन

अदैहिक है,

रूहों का है।

अरे ! प्रियतमे

न सही दैहिक

हम आत्माओ से मिले है

जिसे

दुनिया देख नहीं सकती

 

9) फ्रेंडशिप बेंड

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लांघ कर

अपनी अटारी की

मुंडेर

मेरी अटारी पे

आ के

उसने बांधा था

मेरी कलाई पे

लजाते - सकुचाते

फ्रेंडशिप बैंड

जिसका रंग था

राजहंस के पंखों जैसा।

बेंड तो बेंड था

वक़्त के साथ

टूट कर बिखर गया।

लेकिन उसका उजलापन

अब भी मेरी रातों में

चांदनी बिखेरता है

मेरी कलाई पर

तेरी अँगुलियों का लम्स

अब भी महकता है।

में जब भी देखता हूँ

अपनी कलाई

ऐ मेरे

बिछड़े दोस्त मुझे तेरी

दोस्ती

याद आती है।

 

10) हाँ मैं जनता हूँ उसे

*********************

हाँ

में नहीं जनता उसे

कभी मिला भी नहीं

पर उसकी सूरत

न जाने क्यों

तुमसे मिलती है।

ओ ! गंगा के किनारे

मेरे नाम का

घर बनाने वाली लड़की

आ कभी

लहरों पे आके देख

मैंने कश्ती पे

तुम्हारे दुपट्टे का

बादबान बांधा है।

तू एक लड़की का

जिस्म नहीं मेरे लिए

जिसमें, मैं डूबूं या उतराऊं

तू मेरा ही बदन है

क्योंकि बसाया है

मैंने तुझे

अपने रूह की

अनंत गहराइयों में।

हाँ मैं

जनता नहीं तुझे,

हाँ

में जनता हूं

ऐ लड़की !

तेरी आँखों में

मेरी चाहत का

समुन्दर बसा है।

 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'

ग्राम और पोस्ट - गंज जलालाबाद

जनपद - उन्नाव ( उत्तर प्रदेश )

पिन – 209869

Phone: 09619483963 /09699787634 / 09582844580

1 जिओ हजारों साल

आदरणीय हमारे पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटलबिहारी बाजपेयी जी को उनके जन्म दिन पर शुभ कामनाएं
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
महक रहे हो बाग़ बगीचे
ओंठों के अनुराग ,
दिया दिवाली और दशहरा
तुम ही देश की फाग ,
दुगनी छाती भारत माँ की
तुम ही एक मिसाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
सारे रंग त्याग के तुमने
देशभक्ति का पहना चोला ,
कठिन साधना के साधक तुम
मंत्र ह्रदय में सबके घोला ,
शादियों साथ रहो दुनियां के
करते रहो कमाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
तुम ही तो हो
जनमानस की अविरल भाषा,
देश प्रेम की अमित छाप और
तुम ही हो परिभाषा ,
गंगोत्री बन बहो सदा तुम
रहे न धरती कोई मलाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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2 भेड़ियों के पहरों में

रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
दरबारी दरबार के नहीं
और न ही नवरत्न हैं उज्जैनी राज के,
कौन सुने तर्जनी की पीड़ा
अंगूठे सब रत्न हुए राजा के ताज के ,
क्या कहिये
हचर मचर बग्घी के पहिये
टूटेगी धुरी छोड़ हारे हम कह कह के !
हारे हम कह कह के टूटेगी धुरी छोड़
टूटेगी धुरी छोड़ हारे हम कह कह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
यक्ष की पीडाएं भूलकर
गढने लगे कालिदास सूक्तियां अनूठी ,
फाड़ फाड़ मछली के पेट को
खोज रहे साकुंतली अनुपम अंगूठी ,
खप गईं पीढियां
चढ चढ रेतीली सीढियां
सूख गये आंसू आँखों से बह बह के !
आँखों से बह बह के सूख गये आंसू
सूख गये आंसू आँखों से बह बह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
गहरा है ,नया नया घाव है
चुटुक वैदिया में पक पक के हो गया नासूर ,
जीते जी चींटियाँ लीलेंगी अजगर
मिटटी के शेर का क्या है कसूर ,
पत्थर क्या जानें
सांसें पहचानें
छाती की पीड़ा प्राणों को दह दह के !
प्राणों को दह दह के छाती की पीड़ा
छाती की पीड़ा प्राणों को दह दह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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3 उन्माद

कब तक
यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !
बांह बाहु बल
झुठलाने को
तुली हुई है खुली हथेली,
गांठी गांठी
सधी हुई है
रहमहीन वार्तुली पहेली,
अंगुली अंगुली
खुली चुनौती
कितना कौन जिये !
कब तक
यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !
दया धर्म के
दिन झुठला कर
बांह चढी है
नख की पीड़ा,
मन मंसूबे
खोखल करता
कुतर रहा दिल घुन का कीड़ा,
छिन छिन
छलनी होती छाती
कितना कौन सिये !
कब तक
यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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4 समय कहाँ मुझको

सुनों सुनों भैया जी
समय कहाँ मुझको
कुछ और कहूँ किसको
कोयल की रागिनी
कानों में घोल रही मिश्री और क्या सुनूं !
बाग़ और बगीचों में
ठौर की
अमुआं के बौर की
मचली है गंध
बांसुरी बजाऊं या सांसो की सरगम में रंग सा भिनुं !
दिल में तरंगित हैं प्रणय गीत
फुट रहे आँखों में अंखुए अनार के ,
पुलकित है अंग अंग लौटा है फिर मौसम
बिम्ब वही लेकर बहार के ,
गा गा के फाग
खुशियाँ मनाऊं
या कलियों की खुशुबू हो जाऊं
चौकड़ियाँ भर भर के
बिरह बौर भीतर ही भीतर रुई सा धुनुं !
सुनों सुनों भैया जी
समय कहाँ मुझको
कुछ और कहूँ किसको
कोयल की रागिनी
कानों में घोल रही मिश्री और क्या सुनूं !
बाग़ और बगीचों में
ठौर की
अमुआं के बौर की
मचली है गंध
बांसुरी बजाऊं या सांसो की सरगम में रंग सा भिनुं !
उडती पतरोई सा मैं भी उडूं
मन की कहूँ या उठते हाथों को देखूं ,
या उनकी उँगलियों की उठती आवाजों में
खुद को मछली सा सेंकूं ,
मंद मंद बहती
बयार में
बसवट की छेड़ी सितार में
अनचीन्हीं छवियों की
आंख में रंगों के ख्वाब मैं आंख से बुनूं !
सुनों सुनों भैया जी
समय कहाँ मुझको
कुछ और कहूँ किसको
कोयल की रागिनी
कानों में घोल रही मिश्री और क्या सुनूं !
बाग़ और बगीचों में
ठौर की
अमुआं के बौर की
मचली है गंध
बांसुरी बजाऊं या सांसो की सरगम में रंग सा भिनुं !
रक्त की सिराओं में रह रह के
पनप रही कंठों में कजरी की प्यास ,
तेशुओं की रस भीनीं टहनी
खोज रहा अंतर का बौराया अमलतास ,
अमरईया के नये नये
बिरवों की
नयी नयी शाखाओं के सिरवों की
कोंपल से खेलते
चुनगुन चिरैया के जत्थे मैं कैसे गिनुं !
सुनों सुनों भैया जी
समय कहाँ मुझको
कुछ और कहूँ किसको
कोयल की रागिनी
कानों में घोल रही मिश्री और क्या सुनूं !
बाग़ और बगीचों में
ठौर की
अमुआं के बौर की
मचली है गंध
बांसुरी बजाऊं या सांसो की सरगम में रंग सा भिनुं !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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5 देवों के देव हैं

देवों के देव हैं
प्रथम पूजे
मेरे गुरुदेव हैं !
कहते हैं शिला लेख
भोज पत्र हनुमत ही
सत्यमेव देव हैं !
श्री राम साथ जग जननी को
ध्यान धर
छू छू के चरण कमल
अपने हनुमान के,
सेतुबंधू सेनापति
कर्मयोग है जिनके हाथ में
ओंठों में गीत मेरे
ऐसे भगवन के,
जो बिगड़ी बना दे
सबको अपना ले ऐसे हनुमान जी
सबके गुरु देव हैं !
देवों के देव हैं
प्रथम पूज्य
मेरे गुरुदेव हैं !
कहते हैं शिला लेख
भोज पत्र हनुमत ही
सत्यमेव देव हैं !
गाता हूँ धर कर उनपर लगन
हो खुद में मगन
नाचूं मैं अपने मन के अगन,
अपना लो हम पर बरसाकर
दया दृष्टि
पाप भरे कूप से उबारो
सुख सुविधा दे दो होकर मगन ,
जो पर्वत उठाले
लक्ष्मण बचाले ऐसे हनुमान जी
मेरे गुरुदेव हैं !
देवों के देव हैं
प्रथम पूजे
मेरे गुरुदेव हैं !
कहते हैं शिला लेख
भोज पत्र हनुमत ही
सत्यमेव देव हैं !
भोलानाथ
डा,राधाकृषणन स्कूल के बगल में
एन,एच-7 कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश
इंडिया-संपर्क-09425885234
मैहर "

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6 उड़ रही है गंध

उड़ रही है गंध
या चू रही है चांदनी
या किया सिंगार तुमने आज फूलों से !
झूल कर आई अभी तुम
क्या कदम की डालियाँ
या गंधशाली नन्द झूलों से !
घर की तुलसी
औरआँगन के शिवालय में
आलोकित हो रही है आज पिंडी ,
रंग फूलों से भरी पूरी जलहरी
आकाश तक लहरा रही
शिव पर्व की झंडी ,
जलती हुई समिधा में
छूटी जा रहीं आहुतियाँ
छू रही है तर्जनी आग भूलों से !
उड़ रही है गंध
या चू रही है चांदनी
या किया सिंगार तुमने आज फूलों से !
झूल कर आई अभी तुम
क्या कदम की डालियाँ
या गंधशाली नन्द झूलों से !
घर के आगे छत के उपर
मादिनी के रंग में कंठ तक
भींगा है आंचल,
ओठ में टेशू की लाली
और आँखों में पलाशी
हो रहा है आज काजल,
बस रही है कंठ कोयल
छेड़ कर रागिनी
या लौटी बसंत है छंद लिखे कूलों से !
उड़ रही है गंध
या चू रही है चांदनी
या किया सिंगार तुमने आज फूलों से !
झूल कर आई अभी तुम
क्या कदम की डालियाँ
या गंधशाली नन्द झूलों से !
सांसों की बगिया में
जन्मों से गंध बसी
भीतर जो नाम की तुम्हारे,
अंग अंग महक रहीं
पुष्पित पंखुरियां
ओस धुली रात है चाँद क्या विचारे,
चौकड़ियाँ भर भर
हिरनी के शावक देह भर हिराने
वाकिव हैं आदिम उसूलों से !
उड़ रही है गंध
या चू रही है चांदनी
या किया सिंगार तुमने आज फूलों से !
झूल कर आई अभी तुम
क्या कदम की डालियाँ
या गंधशाली नन्द झूलों से !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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7 शिल्पी हूँ गीतों का

मैं तो शिल्पी हूँ गीतों का
समय चूक भूल हुई मझसे
फिर भी मैं म्याख सा
दिल में ठुंक जाऊंगा !
फेस्बूकिया पेजों के
इन घुमावदार मोड़ों पर
पत्थर बन मील का
दिखाने को पंथ रुक जाऊंगा !
विष्मित हूँ बिना वस्त्र
लोगों को देखकर
मशखरे है या मंदारी
मिर्गी की लय में क्यों नाच रहे,
साधकों का रंग नहीं दिखता
फिर ये रामायण के
पन्नों से सरेआम
महाभारत क्यों बांच रहे,
भोंकने को माहिर हैं
गीतों के शेर नहीं
पाले तो इस बन्दर बाँट में
खुद ही चुक जाऊंगा !
मैं तो शिल्पी हूँ गीतों का
समय चूक भूल हुई मझसे
फिर भी मैं म्याख सा
दिल में ठुंक जाऊंगा !
फेस्बूकिया पेजों के
इन घुमावदार मोड़ों पर
पत्थर बन मील का
दिखाने को पंथ रुक जाऊंगा
नामों के साथ और
कितनी संज्ञाएँ समेटे
निस्तारी डबरे में मस्त हैं
आवारा भैंसें,
जुगाली की सरगम
खुद उनकी अपनी है वादकों से
कह दो बीन न बजाएं
और न सांसें हुलैसें,
बीरबल की हंडिया में
आंच नहीं चावल हैं कच्चे
दूर धरे चूल्हे में
मैं भी फुंक जाऊंगा !
मैं तो शिल्पी हूँ गीतों का
समय चूक भूल हुई मझसे
फिर भी मैं म्याख सा
दिल में ठुंक जाऊंगा !
फेस्बूकिया पेजों के
इन घुमावदार मोड़ों पर
पत्थर बन मील का
दिखाने को पंथ रुक जाऊंगा !
हरे भरे जंगल में दिखते हैं
दूर बहुत बरगद
और पीपल के साथ साथ
फूले गुलमोहर के बाग़,
मनसूबे बांधकर
हम भी चले आये हैं
ठंडी ठंडी छाँव में बैठ कर
सीखेंगे छेड़ेंगे राग,
अंतर के वन में
तरासूंगा मूरत
उकेरुंगा छवियाँ फिर उनमे ही
मैं खुद ही लुक जाऊँगा !
मैं तो शिल्पी हूँ गीतों का
समय चूक भूल हुई मझसे
फिर भी मैं म्याख सा
दिल में ठुंक जाऊंगा !
फेस्बूकिया पेजों के
इन घुमावदार मोड़ों पर
पत्थर बन मील का
दिखाने को पंथ रुक जाऊंगा !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234—8989139763

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8 खौन्दा है कितना

बिना सींग गदहों ने
खौन्दा है कितना
वन पूरा भयभीत है !
यह बारहसिंगा दिखाओ
न हमको
मालुम रण नीत है !
तुमसे खतरनाक
खल नायक
और कोई न दूसरा,
कितनो को खा गये
हांका में
मार मार मूसरा,
जंगल में मंगल है
माने ना जाने ना
नपी तुली प्रीत है !
बिना सींग गदहों ने
खौन्दा है कितना
वन पूरा भयभीत है !
यह बारहसिंगा दिखाओ
न हमको
मालुम रण नीत है !
आँधियों के दिन हैं
बगीचे का बरगद
कुछ दूर है,
काँटों से
गिला नहीं
बड़ा मीठा खुजूर है,
भोले हैं वनवासी
करमा और कजरी
उनके जीवन का गीत है !
बिना सींग गदहों ने
खौन्दा है कितना
वन पूरा भयभीत है !
यह बारहसिंगा दिखाओ
न हमको
मालुम रण नीत है !
और म्यूजियम में
सजना
मंजूर नहीं उनको,
समय गया राजशाही का
ख़बरदार
करते हैं तुमको,
अंधी पंचायत के
पचड़ों की गुत्थी
कनमी कुतिया की रीत है !
बिना सींग गदहों ने
खौन्दा है कितना
वन पूरा भयभीत है !
यह बारहसिंगा दिखाओ
न हमको
मालुम रण नीत है !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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9 अपनी कविताओं के साथ

अपने ही कमरे में बंद हूँ
अपनी कविताओं के साथ
कितना बेबस लाचार !
बाहुबली जल्लादी धमकियाँ
ठाढी हैं द्वार पर
हाँथ धरे नंगी तलवार !
जोड़ जोड़ तिनके
पेट बाँध अपना चोंच से सजाया है
सिर की यह छाँव ,
आतंकी माफिया की आँख चढी
जबर जस्ती की बेड़ियाँ
डाल गये मेरे भी पांव ,
कर दूँ मैं कैसे हवाले
और कहाँ जाऊं छोड़ कर
मैं अपना घरबार !
अपने ही कमरे में बंद हूँ
अपनी कविताओं के साथ
कितना बेबस लाचार !
बाहुबली जल्लादी धमकियाँ
ठाढी हैं द्वार पर
हाँथ धरे नंगी तलवार !
कोतवाली कचहरी
सब उनकी हैं घूम लिया
मैं ले कर अपनी फ़रियाद ,
हंसी में उड़ाकर लगाका ठहाके
चापलूस खा खा के रिशपत
बढा रहे म्याद,
उठ गई आश्था अब न्याय से
कुछ भी तो शेष नहीं
कुंठित मन से होगा कैसे निस्तार !
अपने ही कमरे में बंद हूँ
अपनी कविताओं के साथ
कितना बेबस लाचार !
बाहुबली जल्लादी धमकियाँ
ठाढी हैं द्वार पर
हाँथ धरे नंगी तलवार !
तैयार नहीं कोई सुनने को
कुछ भी उनके खिलाफ
रद्दी में फेंक दी कितनी ही अर्जियां ,
रोज रोज फोन पर
लगातार गालियों से भरी हुई
आती हैं नयी नयी भेड़ियों की धमकियाँ ,
बैठ कर अँधेरे में
सोचता हूँ खोजता हूँ सूत्र नए
पंजों से मुक्त कब होगा मेरा संसार !
अपने ही कमरे में बंद हूँ
अपनी कविताओं के साथ
कितना बेबस लाचार !
बाहुबली जल्लादी धमकियाँ
ठाढी हैं द्वार पर
हाँथ धरे नंगी तलवार !
नौकरी भी रही नहीं
आवक के श्रोत सभी
एक एक कर के सूख गये ,
बहुत मुश्किल है
घर से निकलना
होते हैं निर्मित रोज दंगे फसाद नये ,
मुझे खुद ही पता नहीं
अपनी परस्थितियों से हारा
करता हूँ और किसका इंतजार !
अपने ही कमरे में बंद हूँ
अपनी कविताओं के साथ
कितना बेबस लाचार !
बाहुबली जल्लादी धमकियाँ
ठाढी हैं द्वार पर
हाँथ धरे नंगी तलवार !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४

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10 भैया जी

भैया जी बात अपनी
भीटर मत रोकिये
ओंठों पर लाकर
आंख में सजाइए !
दिल में रखना
बहुत अच्छी बात है
पर दिल की
दिलवालों को सुनाइये !
अन्दर ही अन्दर
गुनगुनानें से क्या होगा
चुग जाएँगी चिड़िया खेत,
देखते रह जाओगे
ढेले सजेंगे बहुत मेले
पर समय सरक जायेगा
मुट्ठी से जैसे रेत,
एक पंक्ति के बदले
जीवन भर गीतों में
अपने आप के
बिरह मत बुलाइए !
देखता हूँ मैं
आपकी आँखों में ऊग रहे हैं
नागफनियों के बंज़र,
और आप हैं की गाये जा रहे हैं
आँखों की लगी
भीतर के मंजर,
आप खूब गाइये
झूम झूम गाइये और नाचिये
पर ख्याल रख
किसी और को न रुलाइये !
सजाइए अपने ही भीतर
काम कंदला के मंडप
सांसों में मन की शहनाइयाँ,
जन जन की ओठों में
खूब धरा रसबोरे गीत
अब और नहीं धरिये तन्हाईयाँ,
निकालिए मुहूरत
खरीदिये कंगना और
कांच की हरी हरी चूडियाँ पहनाइए !


भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४


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1.सुनसान रास्ते

डर सा लगता है
अकेले चलने में
अँधियारे और तन्हा से
उन सुनसान रस्तों पर ।

जहाँ कोई नहीं गुजरता
बस एक एहसास है मेरा
जो विचरता है ठहरता है
और फिर चल पड़ता है
उन सुनसान रस्तों पर ।

चौराहे तो बहुत हैं पर
कोई सिग्नल नही
ना कोई आवाज़ आती है
जो रोक सके मुझे
उन सुनसान रस्तों पर ।

गहरे कोहरे और
जोरदार बारिश में भी
पलते हैं ख्याल
जो उड़ते दिखायी देते हैं
बादलों की तरह
और मेरा साथ देते हैं
उन सुनसान रस्तों पर ।

मैं तो बस चलती हूँ
अपने अहसास लिये
कुछ ख़्वाब लिये और
छोड़ जाती हूँ पदचाप
मंज़िल पाने की चाह में
उन सुनसान रस्तों पर ।
© दीप्ति शर्मा

2.शब्द

वो शब्द छोड़ दिये हैं असहाय
विचरने को खुले आसमान में
वो असहाय हैं, निरुत्तर हैं
कुछ कह नहीं पा रहे या
कभी सुने नहीं जाते
रौंध दिये जाते हैं सरेआम
इन खुली सड़को पर
संसद भवन के बाहर
और न्यायालय में भी
सब बहरे हैं शायद या
अब मेरे शब्दों में दम नहीं
जो निढाल हो जाते हैं
और अक्सर बैखोफ हो घुमते
कुछ शब्द जो भारी पड़ जाते हैं
मेरे शब्दों से...
आवाज़ तक दबा देते हैं
तो क्यों ना छोड़ दूँ
अपने इन शब्दों को
खुलेआम इन सड़कों पर
विचरने दूँ अंजान लोगों में
शायद यूँ ही आ जाये
सलीका इन्हें जीने का ।
© दीप्ति शर्मा

3. फसल

वर्षों पहले बोयी और
आँसूओं से सींची फसल
अब बड़ी हो गयी है
नहीं जानती मैं!!
कैसे काट पाऊँगी उसे
वो तो डटकर खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है
कुछ गुरूर है उसको
मुझे झकझोर देने का
मेरे सपनों को तोड़ देने का
अपने अहं से इतरा और
गुनगुना रही वो
अब खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है ।
वो पक जायेगी एक दिन
और बालियाँ भी आयेंगी
फिर भी क्या वो मुझे
इसी तरह चिढायेगी
और मुस्कुराकर इठलायेगी
या हालातों से टूट जायेगी
पर जानती हूँ एक ना एक दिन
वो सूख जायेगी
पर खुद ब खुद

© दीप्ति शर्मा

4.वो अधजली लौ

रौशनी तो उतनी ही देती है
कि सारा जहाँ जगमगा दे
निरंतर जल हर चेहरे पर
खुशियों की नदियाँ बहा दे
फिर भी नकारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

मूक बन हर विपत्ति सह
पराश्रयी बन जलती जाती
परिंदों को आकर्षित कर
जलाने का पाप भी सह जाती
फिर भी दुत्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

जीवन पथ पर तिल तिल जलती
आघृणि नहीं बन कर शशि
हर घर को तेज से अपने
रौशन करते हुए है चलती
फिर भी धिक्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

अपना अस्तित्व कब खोज पायेगी
दूसरों के लिये नहीं अपने लिये
ये भी मुस्कुराकर जी जायेगी
बनावटी नहीं खालिस बन
कब पहचानी जायेगी??
वो अधजली लौ

© दीप्ति शर्मा

5..जिंदगी

जिंदगी की सच्चाई
को छुपाते हुए
हर हाल में बस
मुस्कुराते हुए
गुजर जाता है लम्हा
कभी कभी ।
गुजरे इस लम्हें में
क्या जीवन भी
गुजर सकता है?
शायद हाँ
शायद नहीं भी
बिन सच्चाई अपनाये
ना जिंदगी को समझाये
गुजर तो नहीं सकता
हाँ कट सकता है लम्हा
सच की यादों में
कुछ किस्से पिरोकर
विश्वास के धागे में
लम्हा बढ़ सकता है
जीवन कट सकता है
पर अगर कहीं
सच्चाई मिल जाये
जो विश्वास में
तो एक एक मोती
हकीक़त का जैसे
जुड़ने लगेगा
तब ये लम्हा
गुज़रने लगेगा
और जिंदगी भी
गुजर जायेगी
हँसते हँसते ।
© दीप्ति शर्मा


blog - www.deepti09sharma.blogspot.com

 

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मधु शर्मा की पहली कविता

  • कल सुबह,
    ओस की नन्हीं-नन्हीं बूंदों को
    देखकर
    मन खुश हो गया,
    सोचा,
    धूप निकलने से पहले
    सहेज लूं इनको
    अपने हाथों में,
    वरना सूरज
    इन्हें निगल लेगा.
    हाथ में लेना चाहा तो बिखर गयी ओस,
    रह गया केवल पानी,
    लगा, कुछ लोगों का अस्तित्व
    बस खत्म होने के लिये होता है,
    खत्म करने वाला चाहे सूरज हो या
    इन्सान.

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ख़ाकी में लिपटी संवेदनाएं हैं... “ वो तीन दिन ”

पिछले दिनों राजधानी की मसरूफ़ सड़कों पर हुआ हैवानियत का नंगा नाच फिर पूंछ में एलओसी पे पाक सेना की ना-पाक हरकत और उसके बाद झारखंड के लातेहार में सी.आर.पी.ऍफ़ के सत्रह जवानो का अपने घर के ही दुश्मन माओवादियों द्वारा की गयी बर्बरता पूर्ण कार्यवाही में शहीद हो जाने जैसे तमाम हादसात ने मन को व्यथित कर दिया।ऐसी अजीबो-गरीब फ़िज़ां में भीतर की बैचैनी बड़ी शिद्दत के साथ सुकून तलाशने के काम को अंजाम दे रही थी कि इतेफ़ाक़न कुरियर वाले ने एक लिफ़ाफ़ा थमाया और जब इसे खोल कर देखा तो ख़ूबसूरत कवर के लिबास में सजी एक किताब मिली जिस पर लिखा था.. “वो तीन दिन”....

“ वो तीन दिन “ दरअस्ल इंसान दोस्त ,बेहतरीन शाइर और पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक मोहम्मद फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी साहब के लिखे अफ़सानों (कहानियों ) का मजमुआ (संग्रह ) है। युवा रचनाधर्मी रीताज़ मैनी ने किताब का आवरण पृष्ठ बनाने से पहले यक़ीनन इस मजमुए की एक – एक कहानी को अहसास के प्यालें में पीया होगा तभी तो वे ऐसे मनमोहक कवर की तामीर ( निर्माण ) कर पाए। सबसे पहले भाई रीताज़ को उनके इस रचनात्मक काम के लिए मुबारकबाद देता हूँ। रीताज़ मैनी मेरे लिए एक वो बुलंद मचान हैं जहां से फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी जैसी क़द्दावर और अदबी शख्सीयत को मैं क़रीब से देख पाया।

कहने को तो 95 पन्नों को एकसाथ जोड़कर किताब की शक्ल में ढाल दी गयी “वो तीन दिन ” , एक कहानी संग्रह है मगर जब इसे पढ़ा तो इस नतीजे पे पहुंचा कि “वो तीन दिन ” में वो मादा है जो आम आदमी को ख़ाकी की जानिब नज़रिए के साथ – साथ अपनी ज़हनीयत तक बदलने के लिए मजबूर कर सकता है।

किताब का पहला सफ़्हा (पृष्ठ ) पलटते ही पढ़ने को मिलता है कि ये मजमुआ “ इंसानियत और माँ को समर्पित है जिनसे क़ीमती इस दुनिया में कोई दौलत नहीं है “ यानि पहला पन्ना ही किताब को मन से पढ़ने की कैफ़ीयत पैदा कर देता है।

किताब की इब्तिदा में कथाकार ने अपनी बात को “मैं सोचता हूँ “ के उन्वान (शीर्षक ) से लिखा है। फ़ैयाज़ साहब लिखते हैं कि पुलिस के असंवेदनशील होने की एक वाजिब वज़ह ये है कि ज़िंदगी के बदसूरत पहलू से पुलिस मुसलसल जूझती रहती है और लगातार बुराई का सामना करने के कारण मुजरिमों और आम शहरियों के बीच पुलिस वाले फ़र्क करना भूल जाते हैं। फ़ैयाज़ साहब के इस तर्क से बिना किसी किन्तु-परन्तु के इतेफ़ाक रखा जा सकता है !

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(फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी)

कहानी का अपना एक मनोविज्ञान होता है। किसी क़िस्से की मूरत को अपने तजुर्बात और तसव्वुर के छेनी – हथौड़े से गढ़ना उतना आसान नहीं होता जितना हमे पढ़ते वक़्त लगता है ! एक अफ़साने को जब अफ़साना निगार गढ़ने लगता है तो ना जाने उसमे से कितने और अफ़साने निकल आते हैं।

एक हुनरमंद क़िस्सागो (कथाकार) अफ़साना तो बयान करता ही है उसके साथ –साथ कारी (पाठक) के सामने कुछ सवाल भी छोड़ जाता है और चुपके से अपने क़िस्से में लपेट कर एक सन्देश भी दे जाता है। एक मुकमल कहानी की तमाम ख़ूबियाँ “वो तीन दिन “ के अफ़सानों में देखी जा सकती हैं। फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी मूलतः शाइर हैं मगर उनके कथा–संग्रह “ वो तीन दिन “ को पढ़ने के बाद लगता है कि उनकी शाइरी की फ़िक्र जितनी गहरी नज़र आती है उसी मेयार के फ़िक्रों-फ़न का दीदार उनकी कहानियों में भी होता है।

“ वो तीन दिन “ में चार कहानियां हैं। भारतीय पुलिस सेवा से जुड़ने या यूँ कहूँ ख़ाकी पहनने से पहले बाहर से खूंखार नज़र आने वाली पुलिस के प्रति जो फ़ैयाज़ साहब की सोच थी वो किस तरह तब्दील हुई , किस तरह उन्हें ज़माने को दिखाई ना देने वाले ख़ाकी के पीछे छिपे दर्द का अहसास हुआ और ना जाने कितनी गुज़ारिशें इंसाफ़ के लिए गुहार करते–करते उनके सामने दम तोड़ गयी “वो तीन दिन “ के अफ़सानों में इस तरह के तमाम ज़ाती तजुर्बात संवेदना की सियाही से फ़ैयाज़ साहब ने काग़ज़ पर उकेरे हैं।

पहली कहानी का शीर्षक है “वो तीन दिन “...जिसमे कहानी का मुख्य किरदार कबीर अहमद है जो आई.पी.एस की तरबीयत (ट्रेनिंग ) के दौरान तीन महीने के लिए पंजाब के फीरोज़पुर शहर में एस.एच.ओ की ड्यूटी कर रहा है। तरबीयत ख़त्म होने के आख़िरी तीन दिनों में कबीर अहमद के साथ जो घटित होता है “वो तीन दिन“ उसी घटना का एक ख़ूबसूरत चित्रण है। अपनी कहानी में फ़ैयाज़ साहब पुलिस की ड्यूटी से लेकर उसकी पूरी कार्य –प्रणाली की तस्वीर इतनी खूबसूरती से बनाते हैं कि पूरा किस्सा एक फिल्म की तरह चलता नज़र आता है। कहानी का किरदार कबीर अहमद अर्दली को चाय का हुक्म जब इस अंदाज़ में देता है तो वो भी हैरान हो जाता है “अगर आपको एतराज़ न हो तो मुझे एक कप चाय पीला दीजिये “” ...अर्दली मंद- मंद मुस्कुराता है और वज़ह पूछने पर बताता है की जनाब अफ़सर कभी इतने सलीके से बात कहाँ करते है। फ़ैयाज़ साहब कहानी में किरदार के अन्दर की ज़ाती तहज़ीब को बड़ी ख़ूबी से दर्शाते है और साथ में पुलिस महकमे में अधिकारियों के अपने मातहतों के प्रति अक्सर किये जाने वाले व्यवहार पर भी प्रहार करते हैं। एक पेट्रोल पम्प पर हुई लूट की वारदात , पम्प पर काम करने वाले कारिंदे के क़त्ल की गुत्थी को सुलझाने से लेकर एक जांबाज़ अफ़सर की अपने फ़र्ज़ के प्रति समर्पण के ताने –बाने से संवरी ये कहानी आख़िर तक पाठक की आँखों को किताब के पन्नों से अलग नहीं होने देती।

इसी कहानी की ये पंक्तियाँ पुलिस के प्रति हमे अपना नज़रिया बदलने के लिए विवश करती हैं “ बाहर से कठोर और खौफ़नाक व्यक्तित्व वाले यही पुलिस वाले अपने बच्चों से मिलने की ख़ातिर एक – दो दिन की छुट्टी के लिए भी कैसे गिड-गिडातें हैं। जब सारे सरकारी कर्मचारी त्योहारों पर अपने बच्चों के साथ खुशियाँ मना रहे होते है तब जगमगाती सड़कों और रौशन बाज़ारों में ड्यूटी पर तैनात सिपाही की आँखों की वीरानी पर शायद ही किसी की नज़र पड़ी हो। पुलिस वालों के बच्चे किसी भी तीज–त्यौहार पर अपने पिता के साथ खुशियाँ मनाने की हसरत लिए ही बड़े हो जाते हैं।”

“वो तीन दिन “ संग्रह की दूसरी कहानी है “एक सिपाही “ ...इस कहानी में एक सिपाही के भीतर की टीस को फ़ैयाज़ साहब ने अफ़साना बनाकर अपने सशक्त अफ़साना–निगार होने के पुख्ता सुबूत दिए हैं। इस कहानी में पुलिस का सिपाही जब कप्तान साहब के सामने पेश होने के लिए लेट हो रहा होता है तो वो ऑटो वाले से जल्दी चलने की गुज़ारिश करता है और बाकी सवारियों के भी पैसे उसकी जेब में डाल देता है यहाँ इस तरह के जुमले के इस्तेमाल से कहानी में सच का बेबाकी से प्रयोग होना प्रमाणित होता है :-- “”आम दिनों में थप्पड़ मार कर पैसे छीन लेने वाले पुलिस मुलाज़िम से यात्रा के पैसे मिल जाने पर ऑटो वाले को यक़ीन ही नहीं हो रहा था।“ इस कहानी का अंत भी फ़ैयाज़ साहब बड़ी ख़ूबसूरती से करते हैं।

“वो तीन दिन “ की तीसरी कहानी को लघु–कथा की श्रेणी में रखा जा सकता है। एक शाइर होने का पूरा फ़ायदा फ़ैयाज़ साहब अपनी कहानियों में शानदार और मानीखेज़ जुमलों का इस्तेमाल करके उठाते है। इस कहानी का शीर्षक “जाती धूप है “ शाइर दो मिसरों में पूरी सदी की दास्तान बयान करने का हुनर जानता है इसीलिए इस कहानी के अन्दर एक जुमला पूरी कहानी का सार बता देता है : -- “ये वक़्त भी बड़ा ज़ालिम है किसी का भी सुरूर बाकी नहीं रहने देता , कब कौन इसकी ज़द में आ जाए पता ही नहीं लगता !” इस कहानी को फ़ैयाज़ साहब उस वक़्त अंजाम का जामा पहना देते हैं जब लगने लगता है कि आगे कुछ और आयेगा। मुझे लगा कि इस दमदार और मज़बूत बुनियाद पर और ऊंची इमारत बनाई जा सकती थी।

“वो तीन दिन “ कथा-संग्रह की अंतिम कहानी “मोती समझ के शान –ए – करीमी ने चुन लिए “ उन्वान से है जो कि इस पूरे मजमुए की रूह है। इस अफ़साने में फ़ैयाज़ साहब पाठकों को एक साथ दो मनाज़िर ( दृश्यों ) से रु-ब-रु करवाते हैं। एक अच्छे क़िस्सागो की ख़ुसूसियत (विशेषता ) यही होती है कि वो जब किसी मंज़र का खाका खींचता है तो सुनने या पढने वाले को लगता है कि वो सीन उसकी आँखों के सामने घटित हो रहा है। क़िस्सागोई का ये फ़न फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी साहब की कहानियों के हर पहलू में नज़र आता है। इस अफ़साने में फ़ैयाज़ साहब एक तरफ़ एसएसपी कबीर अहमद की ज़ाती (निजी) ज़िंदगी से लेकर उसके सरकारी काम काज को करने के तरीके दिखाते हैं ,दूसरी तरफ़ समानान्तर में पूर्वी उतर-प्रदेश के दूर दराज़ के गाँव की सामंती वयवस्था में मुफ़लिसी से जूझ रहे एक दलित किसान सरजू और उसके इर्द-गिर्द के ताने-बाने को अपनी शानदार अफ़साना-निगारी के फ़न से काग़ज़ के धरातल पर जीवित कर देतें हैं। इस कहानी को पढ़ते वक़्त शुरुआत में तो ये लगता है कि आख़िर लेखक चाहते क्या है ? कहानी में एक और कहानी को देख पाठक के मन में एक उलझन सी पैदा हो जाती है मगर अंत में फ़ैयाज़ साहब एक मंझे हुए खिवैये की तरह अपनी दोनों नावों को एक साथ एतबार के उस किनारे पर हिफाज़त से पहुंचा देते हैं जहां पहुँचकर दोनों कश्तियों के सवार एक स्वर में बोल उठते हैं “ हे परवरदिगार तुम भी क्या ख़ूब हो जो मज़लूमों की आँख से निकले दर्द को मोती समझ कर चुन लेते हो “। ये कहानी हमारे समाज, हमारे गिरते हुए मानवीय मूल्यों और हमारे लचर निज़ाम पर संयमित भाषा में ना जाने कितने तंज़ कर जाती है।

इस अफ़साने में मुख्य किरदार कबीर अहमद ,आईपीएस एस.एस.पी से उप महानिरीक्षक हो जाता है मगर ख़ाकी में लिपटा उसका हस्सास ( संवेदना ) फीका नहीं पड़ता। फ़ैयाज़ साहब की ये कहानी सूखी हुई आँखों का परिचय नमी से करवाने का हुनर रखती है इसके अलावा हमे इंसानियत का वो सबक सिखाती है जिसकी आज के दौर में सबसे ज़ियादा ज़रुरत है।

अपने आप में बहुत से मआनी समेटे हुए ख़ूबसूरत जुमलों का इस्तेमाल फ़ैयाज़ साहब ने अपनी कहानियों में किया है जो किस्सों में और दिलचस्पी पैदा करते हैं। मिसाल के तौर पे ये जुमले देखें :-- “”रामू काका को हालांकि वोट के बारे में कुछ भी पता नहीं लेकिन उन्हें इतना समझ आ गया था की वोट ज़रूर कोई ऐसी चीज़ है जो अमीर को भी ग़रीब की चौखट पर झुका सकती है।””, “”जज़्बात की शिद्दत से उसकी आवाज़ भर्रा रही थी और फिर उसकी आँखों में क़ैद दरियाओं ने भी अपने किनारे तोड़ दिए। “”

मूलतः ये कहानियां उर्दू में लिखी गयी है और ये कथा-संग्रह नागरी में मूल कहानियों का तर्जुमा है वैसे भी हिंदी और उर्दू इस तरह आपस में गुंथी हुई हैं कि इन्हें अलग करना नामुमकिन है अगर दोनों ज़ुबानों में कोई बड़ा फ़र्क है तो वो है लिपि का फ़र्क।

फ़ैयाज़ साहब ने आख़िरी किस्से में पूर्वी उतरप्रदेश के कुछ आंचलिक जुमलों का इस्तेमाल किया है जैसे “का रे कमला यहाँ क्यूँ बैठी हो ?”’...”इ बताओ इ का तमासा हो रहा है ?”” इस तरह के आंचलिक जुमले यक़ीनन अफ़सानों में आब पैदा करते है मगर “वो तीन दिन “ के तमाम क़िस्सों में उन्होंने पंजाब पुलिस के अपने मातहतों से गुफ़्तगू में ज़रा भी पंजाबी के वाक्यों का प्रयोग नहीं किया। मुझे लगा कि अगर कबीर अहमद साहब अपने इंस्पेक्टर या अपने किसी सिपाही से हुई बातचीत में थोड़े पंजाबी के जुमले इस्तेमाल किये जाते तो क़िस्से और जीवंत हो जाते।

अपने ज़ाती तजुर्बात ( निजी अनुभवों ) और वक़्त के साथ – साथ धूमिल हो गयी अपनी यादों के कैनवास पर बनी तस्वीर को क़िस्सों के रंग से फिर से एक ताज़ा तस्वीर बना “ वो तीन दिन “ जैसा अनमोल कथा–संग्रह फ़ैयाज़ साहब ने पाठकों को दिया है।

इन चारों कहानियों के बारे में तफ़सील से मैंने इस लिए नहीं बताया कि जब आप ये कहानियां पढ़े तो ये ना कहें कि आगे ऐसा होगा ,आगे वैसा होगा और जिस तन्मयता, तल्लीनता के साथ मैंने इन्हें पढ़ा आप भी इन्हें वैसे ही पढ़ सकें।

साहित्य का वातावरण जहां इन दिनों कुछ शौहरत पसंद अदीबों की वज़ह से प्रदूषित होता जा रहा है ऐसे माहौल में फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी की क़लम से इंसानियत और संवेदना की ये इबारत निश्चित तौर पे एक ख़ुशगवार फ़िज़ां बनाएगी। कहानी के नाम पर अश्लीलता और फुहड़ साहित्य परोसने वालों की लेखनी को ये मजमुआ यक़ीनन सही राह दिखा सकता है क्यूंकि “ वो तीन दिन “ की कहानियां हमारे भीतर अहसास की बंजर हो चुकी ज़मीन पर भी संवेदना के बीज फिर से अंकुरित करने की क्षमता रखती है।

फैज़ अहमद फैज़ लिटरेरी फाउन्डेशन लुधियाना ने इस नायाब कथा –संग्रह को प्रकाशित किया है। फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी साहब को इस पते पर ईमेल कर किताब के बारे में और मालूमात हासिल किये जा सकते हैं faiyyaz16@yahoo.co.in

मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा विशवास है कि अफ़सानों का ये गुलदस्ता “वो तीन दिन “ अदबी हल्कों में अपनी अल्हेदा पहचान बनाएगा और फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी साहब जो पहले एक इंसाफ़ पसन्द पुलिस अफ़सर और बतौर शाइर जाने जाते थे अब उनकी शनाख्त एक उम्द्दा अफ़सानागो (कथाकार ) की हैसीयत से भी होगी।

क़िस्से के हर लफ़्ज़ में , लिपटी जग की पीर।

अफ़साने फ़ैयाज़ के , दिल को जायें चीर।!

विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

शुरा (कहानी)

- गोविन्‍द बैरवा

‘‘क्‍यों?,रे शुरा। आज मुँह लटकाए क्‍यों बैठा है।‘‘ सुदामा घर से बाहर निकलकर देखता है कि शुरा नाम का कुत्ता दोनों पैरों के बीच मुँह छुपाकर बैठा हुआ था। शुरा की नजर सिर्फ जमीन पर ही लगी हुई थी। सुदामा की आवाज को सुनकर एक बार सिर ऊँचा कर सुदामा को देखने के बाद फिर वहीं स्‍थिति में सिर नीचा कर खामोश स्‍थिति में बैठा नजर आया।

सुदामा व शुरा का संबंध वात्‍सल्‍य प्रेम से जुड़ा हुआ था। आखिर निसंतान सुदामा को शुरा रूप में वात्‍सल्‍य प्रेम का सरोवर मिला। शुरा व सुदामा का प्रेम रूपी सरोवर में स्‍वार्थ, ईर्ष्‍या, द्वेष के साथ बनावटीपन का रूझान लेश मात्र भी नहीं था। दोनों का प्रेम, स्‍नेह, सहानुभूति के साथ एक-दूसरे की आंतरिक भावात्‍मक सहृदय से जुड़ा हुआ था। यह प्रेम एक मन का, दूसरे मन से, संवेदना के स्‍तर से बंधा हुआ।

‘‘देख शुरा। तू इस तरह मुँह लटकाए बैठा रहेगा तो, मैं तुझसे बात नहीं करूँगा।‘‘ सुदामा आवाज में कठोरता लाकर शुरा से कहने लगा। कहने के साथ धीरे से शुरा के सिर पर थप्‍पड़ मारकर, दुलारता हुआ नजर आता है। शुरा की स्‍थिति वहीं की वहीं नजर आ रही थी। सुदामा ने शुरा को इस स्‍थिति में पहले कभी नहीं देखा था। गाँव में लोगों को परेशान करने वाला शुरा, आज इतना शांत, हताश, खामोश सुदामा को नजर आना, चिन्‍ता का विषय उजागर करवा रहा था।

बार-बार सुदामा के पूछने से, शुरा अचानक खड़ा हुआ। आँसुओं से भरी आँखें, सुदामा की तरफ ले जाकर कुछ देर एकटक देखता रहा। फिर मुँह नीचा कर, बाहर की तरफ ले जाने वाले रास्‍तें पर, धीरे-धीरे चलने लगा।

सुदामा, शुरा को जाता देखकर आवाज लगाता है-‘‘अरे! शुरा। रूक, रूकना। कहाँ जा रहा है।‘‘ शुरा लम्‍बी जीभ बाहर लटकाए, जमीन पर नजरें गडाऐ हुए चला जा रहा था। अधिकतर शुरा के कान ऊँचे उठे नजर आते थे, वे भी सिर पर पड़े हुए थे। लगातार तेज गति से निकलती सांसों का आवागमन भी अहसास करा रहा था कि शुरा के जीवन में कुछ घटा है। जिसका प्रभाव शुरा के मन को अन्‍दर ही अन्‍दर विरह-वेदना में जला रहा है।

शुरा बाहर चला जाता है। सुदामा वहीं चौखट पर बैठा-बैठा शुरा से संबंधित बीते दौर को याद करता है। शुरा, सुदामा की चौखट पर तीन वर्ष पहले आया था। शुरा की माँ! भूरी( कुत्तियाँ) का नाम गाँव वालों ने इस कारण दिया की सभी गाँव के कुत्‍ते-कुत्‍तियों में भूरी के शरीर का रंग भूरा था।

सर्दी के दिनों में भूरी ने तीन पिल्‍लों को जन्‍म दिया। दो पिल्‍ले तो काले रंग के व एक पिल्‍ला भूरा रंग लेकर धरती पर जन्‍म लेकर आया। कुछ ही दिनों में भूरी अचानक पिल्‍लों को छोड़कर चल बसी। दो काले रंग के पिल्‍लें सर्दी के प्रकोप को सहन नहीं कर पाये। माँ! के पीछे-पीछे वह भी चल बसे।

भूरे रंग का दुबला-पतला पिल्‍ला सर्दी के प्रकोप से बचता हुआ, एक रात सुदामा की चौखट पर जोर-जोर से चिल्‍लाने लगा। रात के समय सर्दी का प्रकोप ज्‍यादा था। सुदामा के मन में गर्म बिस्‍तर से बाहर निकलकर चिल्‍लाते पिल्‍ले को देखने की इच्‍छा ही नहीं हो रही थी। पर बार-बार हृदयविराधक पुकार सुदामा की आत्‍मा को विवश कराकर बाहर चिल्‍लाते पिल्‍ले की तरफ बढ़ने का रूझान जाग्रत कर रही थी। सुदामा ने पत्‍नी को जगाने का प्रयास किया पर गहरी नींद के कारण जगा नहीं पाया। आखिर सुदामा दरवाजा खोलने स्‍वयं ही उठता है। दरवाजा खोलकर देखता है, दोनों पैरों के बीच सिर को छुपाऐ, भूरे रंग का पिल्‍ला नजर आता है। सुदामा का मन पिल्‍ले की तरफ भावना के स्‍तर पर जुड़ जाता है। अन्‍दर से गर्म कपड़ा लाकर पिल्‍लें के ऊपर डाल देता हैं। रोज-रोज का अपनापन एक-दूसरे की संवेदना को, भावना के स्‍तर पर बाँधने का परिवेश जोड़ने लगता है। आज सुदामा व शुरा के प्रेम को गाँव के सभी लोग भावना के स्‍तर पर महसूस करते है।

‘‘शुरा मैं जानता हूँ, कि तू बहादुर है। अन्‍यथा तेरा नाम में भूरा से शुरा नहीं रखता। याद है मुझे वह रात की घटना, जिस रात दो चोर घर में घुसकर चाकू की नोंक पर सारा सामान लेकर जाने वाले थे। पर तूने उन चोरों को छटी का दूध याद दिला दिया। उसी दिन से मेरे साथ गाँव के लोग तुझे शुरा नाम से पुकारने लग गये।‘‘ सुदामा चौखट पर बैठा-बैठा अपने-आप से बातें कर रहा था।

‘‘अजी!, चौखट पर बैठे-बैठे किससे बातें कर रहे हो?, जिसे सुनना चाहिए, वह तो चला गया। ना जाने क्‍यों दो-तीन दिन से शुरा ऐसा व्‍यवहार कर रहा है।‘‘ सुदामा की पत्‍नी दरवाजे पर आकर कहने लगती है।

‘‘ये शुरा को, आज क्‍या हो गया।‘‘ सुदामा, पत्‍नी की तरफ देखकर कहने लगा लगता है।

‘‘अजी!, आपने तो आज देखा है। मैं, पिछले दो रोज से यह देख रही हूँ। वो देखो दो रोज की रोटियाँ वैसे की वैसे पड़ी है। कहती हूँ, तो थोड़ी देर मुँह लटकाए एकटक देखता है, फिर उलटे पैर बाहर चला जाता है।‘‘

पत्‍नी की बातें सुनकर सुदामा कहने लगता है-‘‘क्‍या? कहाँ। पिछले दो रोज से शुरा रोटी नहीं खा रहा है।‘‘ सुदामा के चेहरे पर चिन्‍ता अब ज्‍यादा बढ़ गई थीं।

पत्‍नी सुदामा को कहने लगी-‘‘ये शुरा। पहले अगर थोड़ी देर रोटी देने में देरी होती तो, पुरा घर भौं-भौं की आवाज लगाकर सिर पर ले लेता था। परसों सविता काकी के घर सत्‍यनारायण की कथा थी। मैं, भी कथा का लाभ लेने पहुंच गई। सोचा आकर खाना बना लूंगी। पर देर तक चलती कथा के कारण रूकी रही। इतने में, ये शुरा इतनी औरतों के बीच में मुझे ढूंढ़कर जोर-जोर से भौंकने लगा। सभी कथा सुनने वालों का ध्‍यान शुरा की तरफ खींचने लगा। आखिर मुझे कथा को छोड़कर इसके लिए रोटी बनानी पड़ी । तब कही जाकर इसका कहर शांत हुआ।‘‘

सुदामा, पत्‍नी द्वारा शुरा की शरारत को सुनकर बाहर की तरफ चलने लगा। सुदामा को जाता देख पत्‍नी पीछे से पुकारती हुई कहने लगी-‘‘अजी!, आप अब कहाँ जा रहे हो?, खाना लगा दिया है। खाकर चले जाना।‘‘ पत्‍नी की पुकार सुनकर भी सुदामा अनसुनी करते हुए आगे बढ़ते हुए मोहल्‍ले की तरफ चलने लगता है।

अरे!, ओ! सुदामा। कहाँ जा रहे हो इस वक्‍त।‘‘ लकड़ी हाथ में लिए कालूकाका सुदामा की तरफ बढ़ते हुए चले आ रहे थे। सुदामा के करीब आकर कहने लगे-‘‘क्‍या बात है, सुदामा। परेशान नजर आ रहे हो। लगता है, किसी से नाराज हो।‘‘ सुदामा की आँखें कालूकाका को कम व इधर-उधर ज्‍यादा दौड़ रही थी। आखिर सुदामा, शुरा की खोज करने, घर से बाहर निकला था।

‘‘अरे!, बोल तो सही। क्‍या? ढूंढ़ रहा है।‘‘ सुदामा के कंधे को अपनी तरफ खींचकर कालूकाका बोलने लगे।

बार-बार कालूकाका के पूछने पर सुदामा मुँह लटकाए हुए कहने लगता है-‘‘ये शुरा भी, ना जाने कहाँ चला गया, इस वक्‍त।‘‘ सुदामा की चिन्‍ता सुनकर कालूकाका तुरन्‍त बोलने लगे-‘‘तेरा शुरा तो मेरे खेत पर बैठा है।‘‘

सुदामा के मन में शुरा के प्रति बनी चिन्‍ता कुछ कम हुई। ‘‘शुरा, वहाँ क्‍या?,कर रहा है।‘‘ सुदामा, कालूकाका की तरफ देखकर कहने लगे।

‘‘अरे!, सुदामा। मेरे खेत पर रहने वाली छितरी (कुत्‍तियाँ का नाम) को पनघट पर रहने वाला लालियाँ ( कुत्‍ते का नाम) ने कुछ रोज पहले घायल कर दिया था। लालियाँ के दाँतों का घाव छितरी के जीवन को समाप्‍त कर गया। दो रोज पहले ही छितरी की मृत्‍यु हुई है। वह जहाँ मरी, वहीं तेरा शुरा दो रोज से मुँह लटकाए बैठा है। पहले दिन में नजर आता था। पर आज तो वह आते वक्‍त भी, मुझे दिखाई दिया।‘‘

सुदामा की मन, शुरा के मन में समाहित दुःख को अब स्‍पष्‍ट रूप से महसूस कर रहा था। आखिर अपनों से बिछड़ने का गम सभी का समान रूप से अहसास करवाता है। इंसान हो या जानवर सभी के अन्‍तर्गत संवेदना का बहाव समान रूप से बहता है। इंसान अपनी वेदना शब्‍दों के साथ व्‍यक्‍त करता है। पर जानवर विभावों का सहारा लेकर व्‍यक्‍त करते है। जिसे भावात्‍मक स्‍तर से जुड़ा मन ही महसूस करता है। सुदामा का मन, शुरा की यथास्‍थिति से पूर्णःरूप से भावना के स्‍तर से बँधा हुआ था।

‘‘शुरा, अरे! शुरा। इतना बढ़ा दुःख अपने मन में लिए फिरता है, बेटा। मुझे माफ करना, शुरा बेटा। जो मैं तेरी वेदना समझ नहीं सका।‘‘ शुरा के सिर पर हाथ फेरते हुऐ सुदामा, वेदनामयी भावात्‍मक शब्‍द व्‍यक्‍त करते है।

शुरा, छितरी के मरने के स्‍थान पर सिर झुकाकर बैठा हुआ था। सुदामा द्वारा मिलती संवेदना का प्रभाव शुरा की आँखों में भरे आंसू पलक बन्‍द करते ही लकीर बनकर धरती में समाहित हो रहे थे।

‘‘शुरा, घर चल। तेरी माँ! विमला( सुदामा की पत्‍नी) राह देख रही होगी।‘‘ सुदामा ने अपने हाथों से शुरा को खड़ा किया। शुरा वह स्‍थान छोड़ना नहीं चाहता था। सुदामा के बार-बार समझाने पर शुरा साथ चलने लगा। सुदामा के चलन में भी चिन्‍ता रूपी थकान थी। शुरा के चलन में भी हृदयविदारक वेदना झलक रही थी। शुरा, धरती पर नजर गड़ाऐ, चुपचाप धीर-धीरे सुदामा के पीछे चल रहा था। शुरा के शरीर की सारी शक्‍ति समाप्‍त हुई नजर आ रही थी। क्‍योंकि प्रत्‍येक बढ़ते कदम अपने स्‍तर से लडखडाते हुए, जमीन पर पड़ रहे थे। ऐसा महसूस होता है कि शुरा के पीठ पर समता से ज्‍यादा बोझ रख दिया हो।

दरवाजे की चौखट पर विमला खड़ी नजर आती है। सुदामा को देखकर कहने लगती है-‘‘कहाँ, चले गये थे।‘‘ सुदामा का चेहरे पर हताशा का आलम था। पत्‍नी की तरफ देखकर, पीछे आते शुरा को देखने लग जाता है। पत्‍नी समझ जाती है, कि शुरा के पीछे गये थे।

‘‘कालूकाका के खेत पर रहने वाली छितरी (कुत्‍तियाँ) को पनघट पर रहने वाले लालियाँ (कुत्‍तें) ने मार दिया।‘‘ सुदामा, पत्‍नी को दबी आवाज में बताने लगता है।

‘‘अजी! तभी, हीरा बूआ आज पनघट पर मुझे कह रही थी। अरी! विमला, तेरे शुरा और यहाँ पनघट पर रहने वाले लालियाँ में जोरदार लड़ाई दो रोज पहले हुई। शुरा का क्रोध उस दिन ज्‍यादा दिखाई दे रहा था। लालियाँ को चाहता, तो वहीं चीत कर देता। पर तेरा शुरा ने ऐसा नहीं किया। उसने लालियाँ को इतना मजबूर कर दिया कि उसे गाँव छोड़कर जाना पड़ा।‘‘ विमला अपने पति सुदामा को शुरा की वीरता के साथ समझ को व्‍यक्‍त कर रही थी।

सुदामा पत्‍नी के मुँह से पनघट की घटना सुनकर सोचने लगा कि कितना समझदार है, मेरा शुरा। आज दुनियाँ क्रोध में इतना पागल हो जाती है कि हित-अहित का ध्‍यान ही नहीं रख पाता। इतना कष्‍टदायक दुःख में भी शुरा ने लालियाँ को चीत नहीं किया। उसे गाँव से बाहर निकालना गहरी समझ का कार्य था। असामाजिक तत्‍वों को गाँव से बाहर रखना अतिआवश्‍यक, अन्‍यथा किसी और को भी नुकसान पहुँचा सकते है। शुरा का यही निर्णय कर लालियाँ को गाँव से बाहर कर दिया।

‘‘खाना लगा दूँ।‘‘ सुदामा की तरफ देखकर विमला कहने लगी।

‘‘नहीं।‘‘ शुरा की तरफ देखता हुआ, सुदामा कहने लगा।

शुरा के नजदीक जाकर सुदामा कुछ देर खड़ा रहता है। अपने दोनों हाथों से शुरा के सिर पर हाथ फेरते हुए, वहीं बैठ जाता है। शुरा भी सुदामा के पास जमीन पर बैठ जाता है। बड़े प्‍यार से शुरा को पुचकारते हुऐ, सुदामा कहने लगता है-‘‘बेटा!, मैंने तेरा नाम शुरा इसलिए नहीं रखा कि तू परिस्‍थितियों के सामने अपने आप को बेबस सा महसूस करे। जीवन की गतिविधियाँ हैं बेटा!, जिसमें इन्‍सान सोच नहीं पाता, वैसा खेल समय हमसे खिलाता है। पर इस खेल में हताश वहीं होता है, जो अपने आप को घटना के अंतर्गत ही समाहित समझता है।‘‘

सुदामा के ज्ञान भरे शब्‍दों को शुरा बड़ी खामोशी से सुन रहा था। सुदामा के बार-बार हाथों के स्‍पर्श से शुरा के मन में समाहित वेदना आँसुओं के साथ आँख से बाहर निकल रही थी।

‘‘तू, तो मेरा शुरा है। तू ऐसे घुट-घुट कर अपने आप को समाप्‍त करेगा, तो दुनियाँ तुझे कायर समझेगी। जीवन को बेटा!, फिर से आगे नए सिरे से जोड़कर चला। मुझे विश्‍वास है शुरा, आने वाला सवेरा तेरे जीवन में व्‍याप्‍त अंधेरे को दूर करेगा। आगे तेरी इच्‍छा।‘‘ सुदामा, शुरा के पास से उठकर घर के अन्‍दर बढ़ने लगता है। दरवाजे पर खड़ी-खड़ी विमला भी सुदामा व शुरा के अन्‍दर बहते वात्‍सल्‍य प्रेम का वेदनामयी रूप को महसूस करती है। विमला की आँसुओं से भरी आँखें यह अहसास करवाती है।

‘‘अजी!, जरा बाहर जाकर देखिये तो सही। तुम्‍हारा शुरा कहाँ चढ़ गया है।‘‘ पत्‍नी के जगाने पर सुदामा बिस्‍तर छोड़कर दरवाजे की तरफ बढ़ने लगता है। सामने वाली दीवार पर शुरा ऊँचे कान खड़े किए दिखाई देता है। शरीर का संचालन भी स्‍वस्‍थ नजर आ रहा था। सुदामा की आंखें रोटी रखने के स्‍थान पर गई, तो नजर आया कि दो-तीन रोज की भूख शुरा एक साथ पुरी कर गया। पत्‍नी की तरफ देखकर सुदामा कहने लगा-‘‘काश, इंसान भी समझ पाता।‘‘

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लेखक- गोविन्‍द बैरवोध्‍व खेमाराम जी बैरवा

आर्य समाज स्‍कूल के पास, सुमेरपुर

जिला-पाली,(राजस्‍थान) पिन0कोड़-306902

मो0-9928357047, 9427962183

ई मेल-govindcug@gmail.coms

चमत्कारी फल 

बबलू  एक साधारण लड़का था। उसमें आत्म विश्वास की कमी थी। वह कोई भी काम करने जाता तो उसे अधूरा ही छोड़ देता था। उसके स्कूल में स्पोर्ट्स वीक मनाया जाने वाला था। उसमें बहुत सी प्रतियोगिताएं होनी थीं। उसने भी रेस में भाग लिया था। वह रोज़ अभ्यास भी करता था किन्तु फिर भी उसे डर था। 

बबलू  अक्सर कार्टून्स में देखता था की कैसे अलग अलग चरित्रों को कोई न कोई असाधारण शक्ति मिली है। वह सोचता की काश उसे भी कोई ऐसी शक्ति मिल जाए।

रेस के एक दिन पहले वह बहुत ही परेशान था। बार बार उसके मन में यह विचार आ रहा था की वह बीमार होने का बहाना कर रेस में भाग न ले। वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था। वह सर झुकाए बैठा था। तभी पूरा कमरा तेज़ रोशनी से भर गया। उस रोशनी में उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जब रोशनी कुछ कम हुई तो उसने देखा की उसके सामने एक परी खड़ी  थी। परी बोली " क्या बात है तुम इतने परेशान क्यों हो?" बबलू ने कहा " परी कल मुझे रेस में भाग लेना है। पर मैं डर रहा हूँ क्या तुम मेरी मदद करोगी। तुम मुझे ऐसी शक्ति दो की मैं सबको पीछे छोड़ दूं।" परी मुस्कुराते हुए बोली " बस इतनी सी बात" उसने अपनी जादू की छड़ी घुमाई और एक सेब उसकी तरफ बढ़ा दिया " कल रेस से पहले इसे खा लेना।" कहकर वह गायब हो गयी। बबलू खुश होकर सो गया। 

अगले दिन वह पूरे उत्साह के साथ स्कूल पहुंचा। जब रेस की बारी आई तो उसने परी का दिया सेब खा लिया। उसे विश्वास था की सेब की चमत्कारी शक्ति उसे अवश्य जिताएगी। रेस शुरू होने पर वह पूरी ताक़त से भागा। वह रेस में प्रथम आया। वह बहुत प्रसन्न था। अपना ईनाम लेकर जब वह घर आया तो परी के बारे में सोचने लगा। एक बार फिर कमरा रोशनी से भर गया। उसके सामने परी खड़ी थी। परी को देख वह उछल पड़ा " देखो मुझे रेस में ईनाम मिला है। यह सब उस जादुई फल का चमत्कार है।" उसकी बात सुन कर परी जोर जोर से हँसने लगी " तो तुम्हें लगता है की यह सब उस सेब के कारण हुआ।" " तो फिर और क्या" बबलू ने आश्चर्य से पूछा। परी बोली " वह तो साधारण फल था उसमें कुछ नहीं था। देखो, बबलू शक्ति बाहर नहीं व्यक्ति के भीतर होती है। तुम रेस में जीते क्योंकि तुम्हें यह विश्वास था की तुम जीतोगे। आत्म विश्वास से बढ़ कर कोई शक्ति नहीं है। अपने भीतर आत्म विश्वास पैदा करो। फिर तुम किसी से पीछे नहीं रहोगे।" यह कह कर परी अंतर्धान हो गयी।

बबलू  परी की बात पर विचार करने लगा उसने निश्चय किया की अब वह खुद पर यकीन करना सीखेगा।

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हमारा भारत 

अपना भारत प्यारा भारत अपनी आँखों का तारा है ।
भारत में जो रहने वाले उन लोगों का नारा है ।
हम भारत के भारत मेरा भारत देश हमारा है ।।
सच्चे भारतवासी को भारत प्राणों से प्यारा है ।

दुनिया में हैं देश अनेकों सब देशों से न्यारा है ।
धरा गगन का अपना भारत सूरज जैसा तारा है ।।
ज्ञान विज्ञान का जिसके फैला दुनिया में उजियारा है ।
गौरवशाली गाथा इसकी सबने सुना पुकारा है ।।


गिरवर को किरीट सरीखा इसने सिर पे धारा है ।
सागर इसके पैरों को होकर मन  मुदित पखारा है ।
राम कृष्ण की पावन धरती देवों को भी प्यारा है ।
हम भारत के भारत मेरा भारत देश हमारा है ।


भारत माता ने जब-जब रक्षा हेतु पुकारा है ।
वीर सपूतों ने तब-तब अपना तन मन सब वारा है ।।
रहा हो दुश्मन कोई कैसा हमने उसको ललकारा है ।
चढ़-चढ़ कर उसकी छाती पर हम लोगों ने मारा है ।

सभ्यता-संस्कृति की जोड़ न इसके अद्भुत भरा पिटारा है ।।
दुनिया की क्या बात कहें हम देवों ने भी उचारा है ।
गंगा, यमुना सरयू आदिक की बहती अविरल धारा है  ।
धन्य है भारत देश निराला वेद ग्रंथ का नारा है ।।


गद्दारों की बढ़ती टोली जिनका मन ही कारा है ।
चुन-चुन उनको देश निकालों भारत देश हमारा है ।।
उसका क्या है काम यहाँ जिसको न भारत प्यारा है ।
सच्चे भारतवासी को भारत प्राणों से प्यारा है ।।
दुनिया में हैं देश अनेकों सब देशों से न्यारा है ।
हम भारत के भारत मेरा भारत देश हमारा है ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया

भूली -बिसरी यादें हमको फिर-फिर घेर रही हैं
और हमारी त्याग तपस्या हमको फेर रही हैं
बँधुआ बच्चों, मज़दूरों को उन्मुक्त करें
भारत माँ को भ्रष्ट तंत्र से मिलकर मुक्त करें
अपने दिल के घावों को है माँ ने खोल  दिखाया.
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया ।    

    पंजाब,असम,कश्मीर प्रांत सब भारत माँ के हिस्से हैं 
बाहों को कंधों से काटें ये कैसे किस्से हैं
माँ के पूतों के शोणित से धरा लाल होगी तो
श्वान, गीध भी खा न सकेंगे दुश्मन की बोटी को
सवा लाख से एक लड़ा  है वीरभूमि का जाया .
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया । 

    बैरी को भी मीत मान लेते हैं मन से
मित्र कहीं गर शत्रु बन गये, त्यागेंगे तन-मन से
अर्जुन,त्रिशूल, पृथ्वी का जिसको भान नहीं हैं
मिट जायेंगे  धरती से यह अनुमान नहीं है
जो भी आगे बढ़ा समझ लो अपना नाम मिटाया। 
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र दिवस पर छाया।

-डॉ॰गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

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इंडिया औ' भारत : गणतंत्र दिवस पर विशेष

दस करोड़ के बंगले में

कई इंडिया में रहते हैं !

आधी आबादी भारत की

इंदिरा आवास को तरसते हैं !

इंडिया के कई लोग केक औ' दूध

बिठा कर कार में कुत्‍ते को खिलाते हैं !

भारत में रहने वाले लाखों बच्‍चे

चांद को देखकर रोटी-रोटी चिल्‍लाते हैं !


पूरा शहर पी ले इतना पानी इंडिया में

हर रोज होता है बर्बाद रणवास में!

एक परिवार के पीने भर पानी

मयस्‍सर नहीं भारत के इंदिरा आवास में !

हिटरों औ' गिलाफों का ढेर लगा

इंडिया के कई बंगले औ' आवासों में !

फटे बोरों में लिपटकर ठिठुरता

मर रहा भारतीय सपूत फुटपाथों में !

 

हर वर्ष गणतंत्र दिवस

मनाने का है क्‍या अर्थ ?

गर बढ़ती जाती है

असमानता की खाई हर वर्ष !

सही अर्थों में गर मनाना है

भारत में गणतंत्र दिवस !

इंडिया औ' भारत का यह भेद

हर हाल में मिटाने को हम सब हैं विवश !

--

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह, झारखंड़ 815301

मो. 9471765417

उद्धार

श्याम सिंह भदौरिया रंगपुर में माध्यमिक स्कूल में हेडमास्टर थे। आंखों में शील और चित्त में बड़ी उदारता थी। बहुत ही शिक्षित और बड़े उदार पुरूष थे। दो पुत्र थे अजय और विजय। उनकी मंझली संतान पुत्री थी। जिसका नाम उन्होंने रखा था शालिनी। पति-पत्नी ने लाडली बेटी को बेटे-बेटी में बिना किसी भेदभाव के शालिनी को खूब पढ़ा-लिखाकर शिक्षित और काबिल बनाया। धीरे-धीरे वह सयानी और विवाह योग्य हो गई। भदौरिया जी और उनकी धर्मपत्नी शांता देवी को रात-दिन उसके व्याह की फिक्र सताने लगी। घर-वर तलाशते-तलाशते श्याम बाबू काफी परेशान हो उठे। पर, उनकी सारी भाग-दौड़ व्यर्थ गई। काफी प्रयास करने पर भी बात कहीं न बनी। वह बार-बार यही सोचते कि बेटी अब बड़ी हो गई है। आहिस्ता-आहिस्ता मेरे रिटायरमेंट का समय भी निकट आता जा रहा है। कहीं घर मिलता है तो ढंग का वर नहीं और वर मिलता है तो अच्छा घर नहीं। मैं क्या करूं, कहां जाऊं? जो भी जहां बताता है, फौरन चले जाते हैं। यह सोचकर पति-पत्नी चिंतित रहने लगे।

साईंगंज के जाने-माने धनाढ्य जमींदार राघव तोमर का बड़ा बेटा विशाल एक नामी-गिरामी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था। छोटा पुत्र विवेक अभी कालेज में पढ़ता था। तोमर जी बड़े ही विवेकशील और विद्वान पुरूष थे। उनके आंखों में शील और चित्त में बड़ी उदारता थी। मुखकमल हमेशा खिला हुआ ही रहता। माथे पर केसर का तिलक सुशोभित होता रहता। स्वभाव में गजब की कोमलता और हृदय में सत्यता थी। कितने आदर्शवादी थे तोमर जी? छल और कपट तो उन्हें छू भी न गया था। बड़े परोपकारी और दयालु व्यक्ति थे तोमर जी।

श्याम बाबू के एक बड़े ही घनिष्ठ मित्र थे बाबू उदयराज। उनकी सलाह से भदौरिया जी एक दिन लड़के की तलाश में तोमर जी के घर जा पहुंचे। वहां जाकर वह उनसे हाथ जोड़कर बोले- तोमर जी, मैं आपके पास बड़ी उम्मीद लेकर आया हूं। आशा है, आप हमें ना-उम्मीद न करेंगे। मेरे पास एक बेटी है शालिनी। साइंस गेजुएट और गृहकार्य में निपुण है। आपका घर संभाल लेगी। आपका बड़ा बेटा उसके योग्य है। अगर आपको कोई ऐतराज न हो तो यह रिश्ता हंसी-खुशी मंजर करके हमारा उद्धार कीजिए। मैं अपनी लाडली के लिए वर खोजते-खाजते एकदम थक चुका हूं। मेरी मानिए, दोनों की शादी हो जाने दीजिए। बड़ी अच्छी जोड़ी रहेगी। इस विवाह से वे भी खुश रहेंगे और हम-आप भी। हालांकि मैं आपके बराबरी नहीं हूं। फिर भी पूरी कोशिश करूंगा कि आपको कभी किसी शिकायत का अवसर न मिले। हो सकता है, ईश्वर की भी यही इच्छा हो। वरना, मैं आपके दरवाजे पर आता ही नहीं।

यह सुनकर राघव बाबू मुस्कराकर बोले-ठीक है लेकिन, विशाल को पहले लड़की दिखा दीजिए। यदि दोनों एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं तो हमें कोई दिक्कत न होगी। कहीं न कहीं बेटे का विवाह तो करना ही है, आपकी बेटी से ही कर लेंगे। अब रही बात आगे की तो किस्मत और भविष्य को किसी ने नहीं देखा है। होगा वही जो उनके नसीब में लिखा होगा। हम और आप लाख यत्न करने पर भी उसे टाल नहीं सकते। बाद की बातें बाद में ही देखेंगे। उस पर अपना कोई जोर थोड़े ही है। क्योंकि जो लोग ऐसी बातों को लेकर कुछ ज्यादे ही चिंतित रहते हैं, वे सदैव दुखी ही रहते हैं। मैं जीते जी ऐसा हरगिज नहीं कर सकता।

राघव बाबू के हां करते ही श्याम बाबू बड़े प्रसन्न हो गए। वह भावविह्वल होकर बोले- भाई साहब, आपने तो मेरे मन की मुराद पूरी कर दी। आज मैं कितना खुश हूं? बता नहीं सकता। अगर आप चाहें तो विशाल को कल ही हमारे घर शालिनी को देखने के लिए भेज दीजिए।

विशाल ने शालिनी को देखा तो एक नजर में ही वह उसे मन भा गई। फिर कुछ समय बाद बड़ी धूमधाम से भदौरिया जी ने उनका विवाह कर दिया। शालिनी अपनी ससुराल चली गई।

शादी के बाद श्याम बाबू सोचने लगे-इतने बड़े घर में लाडली बेटी का विवाह करके मैंने बहुत बड़ा मैदान मार लिया। नहीं तो आज के समय में इतना अच्छा रिश्ता चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी न मिलेगा। बेटियों के मां-बाप की तो रातों की नींद ही उड़ जाती है। मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूं कि राघव बाबू बिना किसी ना-नुकर के झट आसानी से मान गए। वह भी दान-दहेज की कोई खास मांग के बगैर ही हमारा बड़ा उपकार किए। वरना, घर-वर तलाशने के चक्कर में लोगों के जूते तक घिस जाते हैं।

उधर राघवेंद्र बाबू भी समधी के रूप में भदौरिया जी को पाकर फूले न समाते थे। श्याम बाबू जैसे सुशिक्षित, विनयशील और परोपकारी संबंधी मिलने से उन्हें बड़े गर्व का अहसास होता। एक दिन वह अपनी पत्नी सुकन्या से बोले-देखो, जब लड़की के माता-पिता इतने शिक्षित और कुलीन हैं तो हमारी पुत्र-वधू भी योग्य और संस्कारवान ही होगी। यह बात अलग है कि इक्के-दुक्के बच्चे आधुनिक चकाचौंध में फंसकर संस्कारहीन और मर्यादाविहीन बनकर जीवन भर इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं। इसलिए शालिनी जब श्याम बाबू की ही बेटी है तो मेरे ख्याल से वह भी अपने मां-बाप के समान कुलीन और संस्कारशील रहेगी। हम दोनों की भरपूर सेवा करेगी। तुम देख लेना। कुछ ही दिनों में वह सबका दिल जीत लेगी। एक विद्वान और शिक्षक पिता की पुत्री है।

यह सुनकर सुकन्या ने कहा-अजी, आप अपनी यह सोच अपने तक ही रखिए। फूलकर इतने कुप्पा न होइए। क्योंकि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। आज की औलाद का कोई भरोसा नहीं। न जाने कब क्या कर गुजरे। अभी शालिनी को यहां आए दिन ही कितने हुए हैं? जुम्मा-जुम्मा दो-चार दिन हुए हैं। चिंता न कीजिए। शांत मन से चुपचाप वक्त गुजरने का इंतजार कीजिए। फिर धीरे-धीरे तेल भी देखिए और तेल की धार भी। सब ढोल की पोल खुल जाएगी। जरा पर्दा हटने दीजिए। दूध का दूध और पानी का पानी सब अलग हो जाएगा।

अपनी अर्धांगिनी के तर्क से तोमर जी तनिक भी सहमत न हुए। वह उनका कथन सुनकर एकदम जल-भुन गए। फिर गुर्राकर बोले-तुम औरतों में बस यही कमी है। वक्त-बे-वक्त नाहक ही अंट-शंट बकने लगती हैं। अरे, हमने किसी का कुछ बिगाड़ा थोड़े ही है कि हमारी पुत्र-वधू कोई उलूल-जलूल हरकत करेगी। अरे, जरा सोचो। वह पढ़ी-लिखी और समझदार है। तुम उसकी सासु हो। पर, उस पर तुम्हें लेशमात्र भी यकीन नहीं। क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूं? कि आखिर, ऐसा क्यों?

तब सुकन्या ने पति से बे-झिझक कहा-सच मानिए। अतिविश्वास कभी-कभी टूट जाता है। क्योंकि दुनिया का यह दस्तूर है कि जिस पर अधिक भरोसा होता है, वही सबसे बड़ा विश्वासघात भी करता है। फिर आज के बच्चों के क्या कहने? मैं तो बस इसलिए कह रही हूं कि आगे चलकर कभी कुछ गड़बड़ होने पर आपको अचानक कोइ्र सदमा न पहुंचे। आप इतने भावुक न बनें। अपने दिल और दिमाग को दुरूस्त रखिए। आने वाले दिनों में भला-बुरा सब झेलने के लिए सामर्थ्यवान बने रहिए।

यह सुनते ही तोमर बाबू का माथा ठनकने लगा। वह अपनी पत्नी से कहने लगे-तुम ठीक कहती हो सुकन्या। ज्यादे भावुक व्यक्ति मुसीबत पड़ते ही बहुत जल्दी टूटकर बिखर जाता है। तनावग्रस्त होते ही मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है। उसका विवेक मर जाता है। उसकी बुद्धि मानो घास चरने चली जाती है। अतएव आइंदा से मैं बिल्कुल सामान्य जीवन ही जीने का प्रयास करूंगा। लेना एक न देना दो। अनायास झंझट पालने से क्या फायदा? आज तुमने मेरे मन की बात कहकर मेरी आंखें खोल दी।

विशाल और शालिनी को विवाह बंधन में बंधे हुए आहिस्ता-आहिस्ता दो साल गुजर गए। कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चला। समय चक्र तीव्र गति से चलता रहा। शालिनी भी कुछ गिनी-चुनी बहुओं की भांति सासु-ससुर से मुंह मोड़ने लगी। वह तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर विशाल को उनके खिलाफ उसकाने लगी। एक दिन रात को शालिनी ने विशाल से कहा-चलिए, कहीं अलग चलकर रहते हैं। यहां आए दिन रोज-रोज की किचकिच से मेरा मन ऊब गया है। आपके माता-पिता बात-बात पर टोका-टाकी करते रहते हैं।

तब विशाल ने पूछा-क्यों,क्या हुआ?आज तुम अचानक यह कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?

इस पर शालिनी मुंह बिचकाकर बोली- मेरी तबीयत को कुछ भी नहीं हुआ। एकदम भली-चंगी है। लेकिन, ये दोनों खूसट बुड्ढे और बुढ़िया हर वक्त हाथ झाड़कर अनायास मेरे पीछे पड़े रहते हैं। इनकी तीमारदारी अब मुझसे हरगिज न होगी। हमारे अभी मौज-मस्ती करने के दिन हैं। इनके बंधन में रहना मेरे वश की बात नहीं। जब होता है तभी दोनों बारी-बारी भाषण देने लगते हैं। कहते हैं-बेटी, ऐसा करो, वैसा करो। ऐसे न करो। यह ठीक न रहेगा। ऐसा रहेगा। रात-दिन इनका उपदेश सुनते-सुनते मैं अब आजिज आ चुकी हूं। मैं एक शिक्षित ओर आधुनिक युवती हूं। अपना अच्छा-बुरा सब भलीभांति पहचानती हूं।

शालिनी की बात सुनते ही विशाल बड़े ताज्जुब में पड़ गया। वह कहने लगा-शालिनी तुम जो कुछ कह रही हो,क्या तुम्हें पता है कि इसका नतीजा क्या निकलेगा?उन्होंने तुम्हें ऐसा क्या कह दिया? कि उनके विरुद्ध तुम इतना जहर उगल रही हो। आज तुमने मु-ो आहत कर दिया। जरा सोचो, मम्मी-पापा दोनों अब वृद्ध और लाचार हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें हम दोनों की काफी जरूरत है। उनकी सेवा करना हमारा फर्ज भी है। उन्हें बुढापे में असहाय छोड़ देने पर लोग क्या कहेंगे? लोगों को छोड़ भी दो तो हम अपनी ही नजर में गिर जाएंगे। यार-दोस्त फब्तियां कसेंगे। वे हमारे मुंह पर थूकेंगे।

इतने में शालिनी झल्ला उठी और कहने लगी-मैं लोगों की परवाह नहीं करती। उनका काम कहना है। कहते रहें। जब कोई हमारी फिक्र नहीं करता तो मैं किसी किसी की क्यों करूं?

शालिनी की जिद दिनोंदिन बढ़ती ही गई। वह सबके साथ मिलजुल कर रहने को कतई राजी न थी। आखिर, न चाहते हुए भी विशाल को पत्नी के आगे झुकना पड़ा। वह सारी व्यथा अपने बूढ़े माता-पिता को बताने को विवश हो गया। विशाल की आपबीती सुनकर अपनी अर्धांगिनी सुकन्या से मशविरा लेकर राघव बाबू कहने लगे-कोई बात नहीं बेटे। आज सारी दुनिया का यही हाल है। बेटे-बहू अपना कर्तव्य भूलकर बेवश और लाचार वृद्धों को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए त्याग दे रहे हैं। मां-बाप के जीवन भर की गाढ़े खून-पसीने की कमाई हथियाकर स्वेच्छाचारी बनते जा रहे हैं। इसलिए बहू की जब यही लालसा है तो उसके साथ तुम हमसे अलग जरूर रहो। हमारी बिल्कुल भी चिंता न करो। कुछ दिन और बचे हैं बुढ़ापे के। जैसे-तैसे वे भी रो-गाकर कट जाएंगे। यह सुनकर विशाल ठकुआ गया। वह कुछ बोल न सका। मानो उसे काठ मार दिया गया हो।

बु-ो मन से जब विशाल ने शालिनी को बताया कि अम्मा और बाबू जी मान गए हैं। पर, एक बार फिर सोच लो। कहीं ऐसा न हो कि इनसे अलग रहकर खुशी पाने की चाह में हमें दर-दर की ठोकरे ही खानी पडें। यह सुनकर शालिनी की खुशी का कोई ठिकाना ही न रहा। वह हष्र के मारे उछल पड़ी और बोली- सच? विशाल बोला- सेंट-परसेंट सच। शालिनी फिर बोली-लेकिन, एक बात और है। मुझे जमीन-जायदाद में अपना हिस्सा भी चाहिए। उसे लिए बगैर मैं यहां से न जाऊंगी। हमें अपना हक चाहिए, हक।

यह सुनते ही सुकन्या देवी और तोमर बाबू की आंखों में आंसू आ गए। उनकी यह दशा विशाल से न देखी गई। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ा। परंतु, तोमर जी मानो कलेजे पर पत्थर रख लिए। वह एक लंबी आह भरकर विशाल से बोले-जाओ बेटा, तुम लोग अब खुश रहो। बहू के आने के बाद हमें आज यह दिन भी देखना लिखा था। बेटे, नियति को यही मंजूर था। वरना, भरा-पूरा घर है। कहीं कोई भी कमी नहीं। मैं समझता था कि शालिनी बहू नहीं बल्कि, हमारी बेटी है। फिर भी न जाने क्यों वह हमें ठोकर मारकर हमसे मुंह मोड़ने पर ही तुली हुई है। तुम रोको मत। उसे मनमानी कर लेने दो। फिर देखना, एक न एक दिन उसे अक्ल जरूर आएगी। इधर-उधर की ठोकर खाकर वह लौट आएगी। तुम हमें छोड़ो। जाकर इसके साथ आराम से रहो। हम पर जो कुछ भी गुजरेगी, रो-पीटकर सहन कर लेंगे।

इसके बाद विशाल ने दूसरे मोहल्ले में किराए पर एक मकान ले लिया और शालिनी के साथ वहीं रहने लगा। तोमर बाबू ने उसे दो-चार बर्तनों के सिवा अपनी ओर से और कुछ भी दिया। विशाल और शालिनी अपने साथ बस दहेज में मिला हुआ सामान ही ले जा सके। शालिनी हिस्सा न मिलने पर छटपटाकर रह गई। हिस्से को लेकर पति-पत्नी में कहा-सुनी बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उनमें इतनी अनबन हो गई कि शालिनी रूठकर एक रोज मायके चजी गई।

अपने मां-बाप के पास जाने के बाद शालिनी पुनः विशाल के पास वापस न आई। उसने विशाल से दो टूक एकदम साफ-साफ कह दिया कि कान खोलकर सुन लीजिए। जब तक मु-ो अपना हिस्सा न मिलेगा तब तक कोई बात न बनेगी। पता चलने पर शालिनी के माता-पिता ने उसे समझाने की बड़ी कोशिश किया। पर, वह न मानी। बस, अपनी बात पर अड़ी रही। वह जरा भी टस से मस न हुई। शालिनी के वापस न आने से विशाल को बड़ा दुःख हुआ। हार-थककर वह मायूस हो गया।

विशाल को उदास देखकर एक दिन तोमर जी ने उससे पूछा-विशाल, क्या बात है? बहू अब तक पीहर में ही क्यों है? तब विशाल गर्दन झुकाकर बोला- पापा जी, वह खेती-बाड़ी में हिस्से की बात करती है। वरना,वह कभी न आएगी। आप ही बताइए, अब मैं क्या करूं? यह सुनकर राघव बाबू बोले-बीस बीघा खेत है। वह तुम्हारी मां के नाम है। उसे मैं हरगिज न बेचूंगा। रही बात मकान की तो बिचौलिया बुलाकर दाम लगवा लो। पांच भाग में से जो तुम्हारे हिस्से में आए ले लो। दो तुम हो और दो हम हैं। पांचवा भाग मेरे छोटे बेंटे अनूप का रहेगा। यह सुनते ही विशाल के होश ही उड़ गए। उसका सिर चकराने लगा। बाबू जी, क्षमा कीजिए। मुझसे अनजाने में बडी भूल हो गई। शालिनी आए या न आए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मु-ो आपसे कुछ भी नहीं चाहिए। वह मेरी जीवन संगिनी नहीं वल्कि, गृह विनाशक है।

इसके बाद विशाल फिर कभी अपनी ससुराल न गया। उसका कलेजा मानो पत्थर का हो गया। उसकी बेरुखी देखकर शालिनी तिलमिला उठी। दोनों ओर से समझौते का बड़ा प्रयास हुआ। मामला अदालत तक जा पहुंचा। जज महोदया ममता रानी एक सुघड़ और चतुर महिला थीं। बड़ी समदर्शी ओर न्याय की मूर्ति थीं। उन्होंने भी शालिनी को बहुत समझाने की भरपूर कोशिश किया। पर, शालिनी के अड़ियलपन के चलते सबकी उम्मीदों पर देखते ही देखते पानी फिर गया। जज के पूछने पर विशाल बोला-हम शालिनी को अपने साथ रखने को तैयार हैं। इसलिए कोई खर्चा न दूंगा। काफी हुज्जत और गर्मागर्म बहस के बाद विवश होकर ममता जी ने अपना फैसला सुना दिया। सामाजिक बंधन में बंधे विशाल और शालिनी कचहरी के फैसले से अलग-अलग रहने को मजबूर हो गए।

तभी तोमर बाबू फौरन जज के निकट चले गए। नेत्रों में अश्रुधारा लिए हुए वह उनकी ओर मुखातिब होकर तपाक से बोले- हुजूर, गुस्ताखी के लिए माफी चाहता हूं। मैं इस स्त्री का अभागा ससुर हूं। बहू के छूटने की खुशी में नहीं बल्कि इसलिए कि यह अब तक मेरे घर-परिवार की एक खास सदस्य थी। मैं इसका ऋणी हूं। अब यह हमसे अलग रहने जा रही है। मैं अपनी हस्ती के मुताबिक इसे यह पचास हजार रुपए का बैंक ड्राफ्ट उपहार में देने का इच्छुक हूं। इसे यह अपनी मर्जी से खर्च करने की हकदार है। यह अदालत के फैसले में भी लिख दिया जाए। अब शालिनी मेरी ओर से हर बंधन से मुक्त है। कभी कोई कमी महसूस होने पर मेरे पास किसी भी समय आ सकती है। मैं इसके पिता के समान हूं। इसके लिए मेरे घर का दरवाजा हमेशा खुला रहेगा। यह कहकर राघव बाबू सबके सामने ही फफककर रो पड़े और फिर सिर नीचे करके आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर आ गए।

यह देखकर शालिनी का हृदय द्रवित हो उठा। उसका पाषाणवत कलेजा पिघल गया। वह आत्मग्लानि से भर गई। कलेजा कचोटने लगा। वह बड़ी आहत हो गई। तुरंत श्याम बाबू के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसे बड़ा अपराधबोध का अहसास हुआ। उसका अंतस्तल कमजोर पड़ गया। भूल का अहसास होते ही वह बिलखते हुए राघव बाबू के चरणों पर गिर पड़ी और बोली- बाबू जी, मु-ो आज अपनी करनी की सजा मिल गई। अपना ड्राफ्ट अपने पास ही रखिए। बस, क्षमादान देकर मेरा उद्धार कर दीजिए। आज मेरी आंखें खुल गईं। उन पर अब तक पर्दा पड़ा हुआ था।

यह सुनते ही राघव बाबू हंस पड़े और बोले-अरे पगली, तू तो मेरी लाड़ली है। मैंने तुमसे कहा था न, कि एक दिन ऐसा ही होगा। वह आज हो गया। हां, यह तो बता दो कि अब तो कोई गड़बड़ न होगी? शालिनी सिर झुकाकर बोली- बाबू जी, अब फिर कभी भूलकर भी नहीं। ज्ञान का उदय होते ही चिड़िया घोंसले में फिर चहचहाने लगी। तोमर जी की समझदारी से उनका घर उजड़ने से बच गया। यह देखकर श्याम बाबू की बूढ़ी आंखों में चमक आ गई। उनके नेत्रों से प्रसन्नता के आंसू छलकने लगे। वह राघव बाबू के गले लगकर बोले-क्या मुझे क्षमा नहीं करेंगे? तब तोमर बाबू बोले- भाई साहब, अब इसकी कोई जरूरत नहीं। आप हमारे भाई समान समधी जो ठहरे।

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