रविवार, 13 जनवरी 2013

मुरसलीन साकी की ग़ज़लें

 

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ये उम्र बीत जाये न यूं रूठते हुए ।

क्‍यूं आप जा रहे हैं मुझे, देखते हुए।

 

उस वक्‍त से ये पलकें मेरी भीगती रहीं।

दिल खो गया था तुमको जहां देखते हुए।

 

बरसों से इस चमन में कोई गुल नहीं खिला।

हर फूल खिल रहा तुम्‍हें देखते हुए

 

बुलबुल भी गुनगुनाने लगी है खुशी के गीत।

है खुशनुमा फजा भी तुम्‍हें देखते हुए।

 

साकी मैं उसके हुस्‍न की अब क्‍या मिसाल दूं।

खुद चाँद ढल रहा उसे देखते हुए ।

 

--

2

गुलशन में बहारों का किस तरह बसेरा है।

हर फूल है सहमा सा, हर शाख अन्‍धेरा है।

 

हर सू हैं पड़ी लाशें , और सुर्ख फिजायें हैं।

इस शाम थी आजादी, क्‍या खूब सवेरा है।

 

मासूमों की अस्‍मत है, हर रोज कहीं लुटती।

हैवानों का दुनिया में , क्‍या सिर्फ बसेरा है।

 

मजलूम बहुत सारे , हमदर्द नहीं कोई ।

अब किस से कहें जाकर हर शख्‍स लुटेरा है।

 

सोचा था यही हमने, मंजिल है बहुत आसां।

कश्‍ती है भंवर में अब और दूर किनेरा है।

--

मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

मो0 9044663196

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