गुरुवार, 24 जनवरी 2013

मोतीलाल की कविता - ओ मेरी धरती

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ओ मेरी धरती
तूने क्या दिया मुझे
महज सांसों के एवज में
बताओ तो जरा ।

फेंक दिया तूने मुझे
मेरे मकान के मलबे तले
जिनके नींव के पत्थरों को
एक-एक कर सहेजा था मैंने
ताकि ढह न जाए मकान
तुम्हारी आँधी का सामना किए बगैर
और तुम देर तक हंसते रहे
मेरी जिंदगी के पन्नों को बंदकर
ताकि डोरी के टूट जाने का डर
कहीं तुम्हें सालता न रहे जिंदगी भर
और दो अंगुली
अपने माथे के सामने कर
उठते-गिरते सांसों की गिनती
तुम बड़े आराम से गिनते रहे ।

थपकी दे-देकर
तुम मुझे सुलाते रहे
उस असीम प्रहर तक
ताकि मैं आँखें न खोल सकूं
और न उड़ा सकूं
तुम्हारी एकछत्र सत्ता की चिन्दी-चिन्दी ।

हाँ
सांसों के एवज में
यही दिया तूने मुझे
ओ मेरी धरती ।

अब भी तलाश है
टूटती-बिखरती जिंदगी की चिन्दी
समेट पाऊँ अपने दामन में
और निकल पड़ूं
उस अनकहे रिश्ते की तलाश में ।



* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

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