गुरुवार, 17 जनवरी 2013

सुरेश कुमार 'सौरभ' की 'सैनिक चालीसा'

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¤₹ सैनिक चालीसा ₹¤
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दोहा-

जिस पर माता भारती, करती है अभिमान।
कोटि-कोटि तुमको नमन, सैनिक वीर जवान।।

चौपाई-

जय सैनिक जय राष्ट्र-पुजारी।
श्रद्धा के तुम हो अधिकारी।।

वक्ष विराट भीम सम काया।
शिरस्त्राण दृढ़ शीश लगाया।।

है विशिष्ट परिधान सुशोभित।
अस्त्र-शस्त्र सँग रहे सुसज्जित।।

हिरणों के जैसी चंचलता।
तुममें अद्भुत छिपी चपलता।।

वर्षा, ग्रीष्म, शरद तुम सहते।
कठिनाई से लड़कर रहते।।

तीव्र तप्त रेगिस्तानों में।
घने वन्य में, वीरानों में।।

बर्फीली आँधी से लड़ते।
दुर्गम पथ पर आगे बढ़ते।।

पर्वत के दुरूह अंचल में।
तुम पयोधि के गहरे जल में।।

तुम घाटी की गहराई में।
तुम हो नभ की ऊँचाई में।।

सीमा के चौकन्ने प्रहरी।
दृष्टि शत्रु पर प्रतिपल ठहरी।।

जहाँ शत्रु की आहट पाते।
अस्त्र तुम्हारे झट उठ जाते।।

शत्रु नहीं टिक पाये आगे।
हुँकारों से डरकर भागे।।

प्रिय तुमको है शीश कटाना।
पग को पीछे नहीं हटाना।।

ऐसे हो तुम वीर समर के।
चलते प्राण हथेली धर के।।

माँ को आँख उठा जो ताके।
फोड़ दिया करते हो आँखें।।

कफ़न बाँध रणभूमि उतरते।
कभी मृत्यु-भय से ना डरते।।

चीन देश ने जब ललकारा।
तुरत चुनौती को स्वीकारा।।

शत्रु पक्ष था पर्वत उपर।
तुम पर्वत के नीचे रहकर।।

ऐसी जागी राष्ट्र भावना।
डँटकर करते रहे सामना।

लहू-रंग से खेली होली।
अन्तकाल तक झेली गोली।।

अद्भुत साहस को दर्शाया।
मातृभूमि पर प्राण लुटाया।।

यही वीरता की है गाथा।
झुका हिमालय का ना माथा।।

लड़कर हो जाते बलिदानी।
किन्तु कदापि हार ना मानी।।

करगिल में जब पाकिस्तानी।
सीमा में घुसने की ठानी।।

पाकी रावण तुमने देखा।
खींच दिया तब लक्ष्मण रेखा।।

सिंह समान शत्रु पर गरजे।
काल-मेघ बनकर फिर बरसे।।

बही रक्त की ऐसी धारा।
पाक-सैन्य-दल डूबा सारा।।

भारत माँ का उजला अंचल।
बना रहा वैसे ही निर्मल।।

अपने गाँव-नगर को छोड़ा।
सरहद से जब नाता जोड़ा।।

निकले जब तुम अपने घर से।
काँप गई तब माता डर से।।

गिरा अश्रु माँ के नयनों का।
किन्तु नहीं जाने से रोका ।।

कहा पुत्र भारत भी माँ है।
इसका पद मुझसे ऊँचा है।।

मन से इसकी सेवा करना।
इस पर जीना इस पर मरना।।

सफल हुआ पितु का भी जीना।
फुला गर्व से उनका सीना।।

दे आशीष कहा सुत जाओ।
भारत माँ का कर्ज़ चुकाओ।।

पत्नी ने निज धर्म निभाया।
प्रिय पति का उत्साह बढ़ाया।।

रो कर दुर्बल नहीं बनाया।
हँसते-हँसते विदा कराया।।

धन्य पिता वो माताएँ हैं।
वीर लाल जो जन्माएँ हैं।।

भाग्यवान वो नगर-ग्राम हैं।
जो शहीद के जन्मधाम हैं।।

स्वयं जगे ही रात बिताते।
और चैन से हमें सुलाते।।

संकट में अपने को डाले।
सावधान तुम शस्त्र सम्भाले।।

करते रक्षा सदा हमारी।
देश तुम्हारा है आभारी।।

दोहा-

हे सपूत इस राष्ट्रके, तुम हो सर्व महान।
तुमसे ही ये टिका है, अपना हिन्दुस्तान।।

भारत माँ तुमको करे, ऊर्जा-शक्ति प्रदान।
रखें सुरक्षित हर जगह, सदा तुम्हें भगवान।।


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रचनाकार - सुरेश कुमार 'सौरभ'
व्यवसाय- विद्यार्थी
पता- ज़मानियॉ कस्बा, ज़िला ग़ाज़ीपुर, उत्तर-प्रदेश

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