गुरुवार, 17 जनवरी 2013

राकेश भ्रमर की कहानी - गांठें

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कहानी

गांठें

-राकेश भ्रमर

‘‘हर औरत के दो चरित्र होते हैं।’’ दिनेश के बोल उसके कानों में अभी तक गूंज रहे थे। उसके हृदय में एक अजीब पीड़ा हो रही थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि किस प्रकार अपने दिल को इस अनजानी पीड़ा से बचाए। कैसी अजीब बात थी कि उसके पास दुःखी और पीड़ित होने का कोई खास कारण नहीं था। फिर भी वह दु:खी था। पीड़ा से उसका शरीर ही नहीं आत्मा भी तड़फड़ा रही थी।

बगल में सोई पत्नी को एकटक घूर रहा था। सोती हुई पत्नी का चेहरा कितना मासूम लग रहा था। कितना भोलापन था उसकी सुन्दरता में ? क्या ऐसी सुन्दर और भोली पत्नी के भी दो चरित्र हो सकते हैं ? पत्नी को देखता है तो उसे विश्वास नहीं होता, परन्तु फिर जब दिनेश की बातों की तरफ गौर करता है, तो लगता है, सचमुच उसकी बातों में कुछ दम है, अजीब सी खलबली मची है उसके दिलो-दिमाग में। सो भी नहीं सकता वह। नींद का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं है। सोने का मन भी तो नहीं कर रहा है। क्या करे वह ?

आज शाम की ही तो बात है। ऑफिस से लौटते समय बस में दिनेश से मुलाकात हो गई थी। काफी दिनों बाद मिले थे दोनों। कालेज में दोनों साथ थे। यह तो नहीं कह सकते कि दोनों में गहरी दोस्ती थी, लेकिन जान-पहचान अच्छी थी। काफी दिनों बाद मिले थे सो दिनेश ने ही प्रस्ताव रखा था कि कहीं बैठकर चाय पी जाए तथा पुरानी यादों को नए सिरे से ताजा किया जाए। ऐसे मौके मुश्किल से लौटकर किसी की जिन्दगी में आते हैं। अतः वह भी राजी हो गया था। हालांकि शादी के बाद ऑफिस से सीधे घर पहुंचना उसका नियम बन गया था।

चाय के साथ-साथ बातों का सिलसिला शादी-ब्याह की तरफ मुड़ गया था। दिनेश ने तैश में आकर कहा था, ‘‘मुझे शादी से घृणा है। शादी क्या है... ? एक अनजान लड़की को अपने घर में लाकर बिठा लेने से क्या आप समझते हैं कि दो पवित्र आत्माओं का मिलन हो गया है। ऐसा समझना एक महान मूर्खता है। हम उस लड़की को ता-उम्र सुरक्षा प्रदान करें, उसकी सुख-सुविधाओं का ख्याल रखें, जिसके चरित्र के बारे में रंचमात्र भी पता नहीं है। ऐसी गलती हम क्यों करें ? और फिर हम बचपन से लेकर जवानी तक तमाम परेशानियां झेलते हुए अपनी शिक्षा पूरी करते हैं, नौकरी के लिए हाथ-पैर पटकते हैं, तो फिर अपनी खून-पसीने की कमाई में किसी को हक़दार क्यों बनाए, जिसका हमारे जीवन को संवारने में नाममात्र का भी योगदान नहीं है। क्या किसी लड़की का बाप किसी बेरोजगार युवक से अपनी बेटी की शादी करने लिए राजी होगा। नहीं... तो फिर उसकी बेटी का भार हम जीवन भर क्यों उठाते फिरें ?’’

दिनेश की बातों को वह पचा नहीं पाया। उनसे सहमत होना तो दूर की बात थी, ‘‘यह तो सामाजिक व्यवस्था है जिसमें ज्यादा फायदा पुरुष को ही होता है। लड़की अपने मां-बाप का घर छोड़कर हमारे घर आती है। हमारी सारी जरूरतों का ख्याल रखती है। इसके बदले में अगर हम उसे खाना-कपड़ा और सुरक्षा प्रदान करते हैं तो कोई महान काम नहीं करते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से तो हम लड़की को ही महान ठहराएंगे।’’

‘‘तुमने ठीक तरह से मेरी बात को नहीं समझा है। मैं इस बात के खिलाफ नहीं हूं कि औरत का भार उसकी शादी के बाद हम उठाते हैं। मेरा मुद्दा यह है कि उस औरत का भार क्यों हम उठाएं जो समाज में एक मुखौटा लगाकर जीती है। सबके सामने वह चरित्रवान बनती है और अपनी सच्चरित्रता का प्रमाण-पत्र सबको दिखाती फिरती है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि प्रत्येक औरत के दो चरित्र होते हैं। एक वह जो वह पति तथा समाज के समक्ष प्रस्तुत करती है तथा दूसरा वह जो उसके हृदय में कैद रहता है। दूसरा चरित्र किसी को नज़र नहीं आता है। उसका उपयोग औरत रात के अन्धेरे के एकान्त में करती है। ऐसी मुखौटे ओढ़ने वाली औरतों की अपेक्षा मैं किसी चरित्रहीन लड़की से शादी करना ज्यादा पसन्द कंरूगा जो किसी को अपनी सच्चरित्रता का प्रमाण तो नहीं देती फिरती।’’

उसकी समझ में नहीं आया कि दिनेश के मन में औरतों के प्रति ऐसी नफ़रत क्यों है ? क्यों उनके बारे में ऐसी धारणा बना रखी है ? हो सकता है किसी औरत ने उसे धोखा दिया हो। प्यार में धोखा खाने के बाद ही पुरुष स्त्री जाति से नफ़रत करने लगता है, वरना कोई कारण नहीं है कि हमें हर औरत चरित्रहीन ही नज़र आए।

दिनेश की बातों पर मनन करता वह कई पलों तक गुमसुम बैठा रहा। वह उसकी बातों से सहमत नहीं था, फिर भी उसे पता नहीं था कि किस प्रकार उसके तर्कों को काटा जा सकता था। किसी भी विषय पर न तो उसका गहरा अध्ययन था, न तो किसी चीज को गहराई से समझने की आदत। फिर भी उसने कहा, ‘‘मैं नहीं जानता, तुम्हारी बातों में कहां तक सच्चाई है। बस इतना जानता हूं कि हमारी सामाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हमें दाम्पत्य-सूत्र में बंधकर सदियों पुरानी परम्परा को निभाना ही पड़ता है। इस बात का हमारे लिए अधिक महत्व नहीं है कि शादी के पूर्व स्त्री का क्या चरित्र था या शादी के बाद अपने पति के प्रति वह वफ़ादार नहीं रह पाती है। फिर भी मैं तुमसे एक बात पूछना चाहूंगा कि औरतों के प्रति तुम्हारे मन में इतनी घृणा क्यों है ? चरित्रहीन तो पुरुष भी होते हैं। फिर तुम उन्हें गलत क्यों नहीं ठहराते हो ?’’

दिनेश उसकी बात सुनकर हंसा, ‘‘इसे तुम हमारी कमजोरी कह सकते हो। चूकि हम स्वयं गलत होते हैं और गलत इन्सान में इतना आत्मविश्वास नहीं होता है कि वह अपनी गलती किसी के सामने स्वीकार करने की हिम्मत जुटा सके।’’ इतना कहने के बाद दिनेश चुप हो गया था। हालांकि उसकी बातों का पूरा जवाब नहीं दिया था दिनेश ने, उसने दुबारा पूछा भी नहीं। पहले ही उसे काफी देर हो चुकी थी और वह नहीं चाहता था कि बातों का सिलसिला कुछ ऐसे मोड़ से गुजरे, जिधर उसे जाना पसन्द नहीं था। दिनेश पत्नी, परिवार, समाज तथा देश के बारे में क्या सोचता है, यह उसका अपना व्यक्तिगत मामला था। यह कोई जरूरी नहीं था कि हर व्यक्ति उसकी बातों से सहमत ही हो। वह भी नहीं था।

फिर भी चाहे दिनेश के साथ हुई बातों से वह सहमत न हुआ हो, लेकिन एक सन्देह उसके मन में जरूर घर कर गया था। रह-रहकर उसके कानों में दिनेश द्वारा कहा गया यह वाक्य ‘‘हर औरत के दो चरित्र होते हैं’’ गूंज उठता था। कई सालों के दाम्पत्य जीवन में आज तक उसे पत्नी के चरित्र पर कभी सन्देह नहीं हुआ था। सन्देह करने का कोई कारण भी उसे नज़र नहीं आता था। दोनों एक दूसरे के प्यार में कुछ इस तरह गुंथे हुए थे कि अन्य बातों की तरफ ध्यान मुश्किल से जाता था।

उस दिन घर में पत्नी की मधुर मुस्कान भी उसे आह्लादित न कर सकी। पत्नी की हर क्रिया को वह सन्देह की नज़र से देखता। अब तो उसे हर बात में छल नज़र आने लगा था। पत्नी का उसके प्रति अत्यधिक प्यार क्या इस बात का सबूत नहीं है कि वह अपनी पिछली जिन्दगी को ढंकने की कोशिश कर रही थी। घर में आकर ही उसे लगा था कि दिनेश की बातों का उसके ऊपर कितना गहरा असर हुआ था।

सोते-जागते उसके मन में बस एक ही धारणा बल पकड़ती जा रही थी कि उसकी पत्नी का भी कोई न कोई दूसरा चरित्र जरूर होगा। शादी के पहले का चरित्र... जिसका ज़िक्र आमतौर पर स्त्रियां शादी के बाद किसी से नहीं करती हैं। पति से तो भूलकर नहीं, तो भी वह इस बात का पता कैसे लगाए ? प्रत्यक्ष रूप से पूछना अच्छा नहीं होता। पत्नी सोचती वह कितनी नीच मानसिकता का शिकार है। आदमी भुलावों में जीने का आदी होता है। काश उसकी मुलाकात दिनेश से कभी न हुई होती। भुलावे में ही सही वह शान्ति से जी तो रहा था।

उसकी उदासीनता, व्यवहार का ठण्डापन और हर बात को शक़ की नज़र से देखना पत्नी की नज़रों से छिपा न रह सका। एक दिन पूछ ही बैठी, ‘‘आपके व्यवहार में आजकल कुछ अजीब सा परिवर्तन होता नजर आ रहा है। क्या बात है ? कोई परेशानी है आपको ?’’

‘‘नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।’’ उसने उसी ठण्डेपन से जवाब दिया था। पत्नी संतुष्ट नहीं हुई। वह उसके नज़दीक आकर खड़ी हो गई और शर्ट के बटनों से खेलती हुई बोली-

‘‘आप कहते हैं तो मैं मान लेती हूं, परन्तु जब हमें साथ-साथ रहना है तो आपस में दुराव-छिपाव क्यों ? मैं क्या देखती नहीं कि कई दिनों से न तो आप ठीक से बात करते हैं न ही पहले की तरह मुझे प्यार। छोटे-छोटे अन्तर तो बहुत जल्दी स्पष्ट हो जाते हैं। फिर उन्हें छिपाना क्या ?’’

‘‘यही बात मैं तुमसे कहूं तो?’’

‘‘क्या मतलब ?’’ वह थोड़ा चौंकी।

‘‘देखो, हम आपस में पति-पत्नी हैं। हममें से कोई एक अगर दूसरे से कुछ भी छुपाता है तो क्या इसे विश्वासघात की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। हालांकि यह मेरी तुम्हारे प्रति ज्यादती होगी अगर मैं शादी के पूर्व की तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में कोई सवाल करता हूं। परन्तु कभी-कभी परिस्थितियां हमें यह जानने के लिए मजबूर कर देती हैं।’’

उसके स्वर की दृढ़ता पत्नी को अन्दर तक हिला गई। वह सहमकर एक कदम पीछे हट गई और फटी-फटी आंखों से उसके गंभीर चेहरे को ताकने लगी। एक बार तो उसकी समझ में नहीं आया कि पति की बातों का तात्पर्य क्या है ? फिर जब समझी तो हृदय की धड़कन असामान्य रूप से बढ़ गई थी। एक दिन पति उसकी पिछली ज़िन्दगी के आगे एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा। ऐसा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था।

और उसी दिन से उन दोनों के जीवन में बिष का एक बीज पड़ गया जो धीरे-धीरे वट वृक्ष का रूप लेने लगा था। उनकी बेहद खुशहाल ज़िन्दगी में ऐसा परिवर्तन आ जाएगा, दोनों को ही आशा नहीं थी। उसने अगर यह सोचा हो कि पत्नी अपनी पिछली जिन्दगी के बारे में कुछ बताएगी तो यह उसकी भूल थी। स्त्रियां विवाह-पूर्व संबन्धों की चर्चा न तो पति से करती है, न ही किसी दूसरे को बताने की भूल; ऐसा दिनेश ने कहा था। शादी के बाद उनका केवल सती-सावित्री का रूप ही पति को नज़र आता है। इस संबन्ध में जितना ही वह सोचता, उतना ही ज्यादा गांठें उसके मन में पड़ती जा रही थीं। क्या करे वह ? हारकर उसने किताबों में अपना मन लगाने की कोशिश की। हालाकि यहां भी उसकी कोशिश यहीं रहती कि स्त्रियों के चरित्र का गहराई से अध्ययन किया जाए।

एक बार उसने हितोपदेश में एक कथा पढ़ी- वणिक् स्त्री और उसके यार की कथा। कथा कुछ इस प्रकार थी, ‘‘बहुत पहले किसी शहर में एक बनिया रहता था। उसकी स्त्री अपने नौकर के साथ रति-क्रीड़ा में रत रहती थी। एक दिन बनिए ने अपनी स्त्री को उसे चुम्बन देते देख लिया। कुलटा तुरन्त पति के पास जाकर कहने लगी, ‘स्वामी, यह दुष्ट नौकर प्रतिदिन काफूर चुराकर खाता है। मैंने इसका मुंह सूंघकर देखा है।’ बनिए ने पत्नी की बात का विश्वास कर लिया।’’

उसने इस कथा पर काफी मनन किया, तो ऐसी होती है स्त्रियां। बुद्विचातुर्य द्वारा वह अपने पति को उल्लू बनाए रखती हैं। एक तरफ तो वह व्यभिचार में व्यस्त रहती हैं, दूसरी तरफ चतुराई के साथ अपने पतिव्रत धर्म का अनुपालन भी करती रहती हैं। कहा भी है, पुरुष के भाग्य तथा स्त्रियों के चरित्र को देवता भी नहीं जानते, मनुष्य की क्या बिसात ?

उसने इस कथा का जिक्र पत्नी से किया, इस आशा से कि वह कुछ टिप्पड़ी करेगी, परन्तु पत्नी सुनकर चुप रह गई थी। उसने सन्देह को इससे और बल मिला। सचमुच अगर वह चरित्रवान होती तो कुछ न कुछ जवाब अवश्य देती। इस तरह चुप्पी नहीं लगा जाती।

धीरे-धीरे उनके संबन्धों में ज़ंग लगता जा रहा था। औपचारिक किस्म की बातों के सिवा उनमें और कोई बातें न होती। कभी-कभी उसे पछतावा होता कि पत्नी के चरित्र पर संदेह कर के उसे क्या हासिल हुआ। अगर दिनेश की बातें सच हैं, तो सभी स्त्रियां चरित्रहीन होती हैं। तब तो परिवार नाम की चीज का अस्तित्व ही इस दुनिया से मिट जाएगा। वैसी हालत में क्या कोई खुश रह सकता है ? ..... कदापि नहीं। तो फिर क्यों नहीं हम एक दूसरे पर विश्वास करके जीते हैं ? औरत या मर्द की पिछली जिन्दगी से किसी को कुछ लेना-देना न रहे, तभी हम खुश रहने की उम्मीद कर सकते हैं। इसके सिवा और चारा क्या है ?

लेकिन अब तो बिष-वृक्ष काफी बड़ा हो चुका था। उसे काट पाना उनके लिए बिलकुल असंभव था। तो फिर क्या इसे इसी तरह पनपने देना होगा। पत्नी अपने आप में कुछ अलग ढंग से रहने लगी है। उसकी बातों का बहुत नपा-तुला जवाब देती है। ज्यादा तो कभी नहीं। हां कभी-कभी जवाब में लिपटे शब्द जरूरत से काफी कम होते हैं और उसे पत्नी का तात्पर्य समझने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देना पड़ता है। खीझने की आदत नहीं है। गुस्सा भी कम ही करता है। बस चुपचाप पड़ा रह जाता है।

दोनों के संबंधों में पड़ी दरार चौड़ी-दर-चौड़ी होती जा रही थी। उसे पाट पाना दोनों के लिए असंभव था। अतः एक दिन उसने तय किया कि इस संबंध में पत्नी से साफ-साफ बात कर के देखे कि उसका इरादा क्या है। पलंग पर लेटे हुए उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, ‘‘मैं मानता हूं कि तुम्हारी पिछली ज़िन्दगी के बारे में पूछ कर मैंने बहुत बड़ी गलती की थी। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं अब उस गलती को सुधार भी सकता हूं। यह तुम्हारी खुशी थी कि तुमने अपने बारे में कुछ नहीं बताया। लेकिन मेरी गलती की सजा तुम क्यों भुगतो ? हमारे संबंध अब उस स्थिति में नहीं रह गए है कि जीवन पथ पर एक कदम भी साथ-साथ आगे बढ़ा जा सके। तो हमारे लिए बेहतर यहीं होगा कि हम दोनों इच्छानुसार अपने अपने रास्ते चुन लें। बोलो, तुम क्या कहती हो ? मुझे आशा है कि मेरी बात से तुम जरूर सहमत होगी ?’’

पत्नी कुछ देर तक छत की तरफ निहारती रही। फिर बोली, ‘‘गलती तो मेरी भी है। पति होने के नाते पत्नी के बारे में आपको कुछ भी पूछने का अधिकार है। भूल तो मुझसे हुई कि मैंने आपको कुछ बताया नहीं। बता देती तो शायद हमारे संबंधों में आज इतना कड़वापन नहीं होता। तो भी मैंने कुछ सोचकर ही नहीं बताया था। सोचा था, आपसे कुछ नहीं बताऊंगी तो आपको विश्वास हो जाएगा कि शादी-पूर्व मेरा किसी से काई संबंध नहीं था। शायद यहीं मैं कुछ भूल कर गई। मेरे सोचे अनुसार तो कुछ नहीं हुआ। बल्कि उसका उल्टा ही हो गया। फिर भी मुझे इसका कोई पश्चाताप नहीं है कि मैंने आपके साथ विश्वासधात किया। अब जब हमारे संबंध ढह ही रहे हैं तो मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि विवाह-पूर्व मेरे संबंध किसी से अवश्य रहे हैं। परन्तु शादी के बाद मेरा पहला प्यार मेरे लिए एक स्वप्न के समान था। मैं उसे पूरी तरह भूल चुकी थी। आपने याद दिलाया तो सोए हुए जज्बात फिर से जाग उठे। हां, मैंने अपराध किया है और उसकी सजा भी भुगत रही हूं। इतना सब जान लेने के बाद कोई भी पति अपनी पत्नी को सच्चे दिल से स्वीकार नहीं कर सकता है। आप भी नहीं करेंगे, ऐसी मुझे आशा है। मेरे अपराध की यह सबसे बड़ी सजा है।’’

पत्नी के स्वर में कोई घबराहट, कोई कम्पन नहीं था। लग रहा था जैसे वह पति को कोई कहानी सुना रही थी।

पत्नी की बात सुनने के बाद उसने कहा, ‘‘मेरे पूछने पर अगर तुम यह सब बता देती तो भी तुम्हें स्वीकार कर लेता, ऐसा अब मुझे नहीं लगता है। तब भी नहीं लगता। आज तुमने अपनी खुशी से सब कुछ बताया है तो अब यह भी बता दो कि तुम क्या चाहती हो ?’’

‘‘आपकी कोई चाहत नहीं है ?’’ पत्नी ने उसकी तरफ मुंह घुमाकर पूछा।

‘‘मेरी चाहत का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। तुम अगर मेरे साथ रहना चाहती हो तो रह सकती हो। मुझे न तो खुशी होगी, न ही दुःख... जीना मुझे आता है। मैं हर हाल में जी लूंगा।’’

‘‘संबंधों में अगर ऐसा तनाव रहे कि वह अब टूटें, तब टूटें तो जीने का क्या मतलब रह जाता है ?’’

‘‘संबंधों को हर हाल में निभाया जा सकता है। बशर्ते कि उनको निभाने की शक्ति हममें हो। यह कोई जरूरी नहीं कि उनसे एक विशेष खुशी हासिल हो ही।’’

‘‘आप यह क्यों भूल जाते है कि मैं एक औरत हूं और औरत पति से केवल खुशी ही नहीं, कुछ अधिकारों की भी अपेक्षा करती हैं। खुशी न सही अगर अधिकार ही मुझे मिल जाए तो मैं आपके साथ गुजारा कर सकती हूं।’’

‘‘अधिकारों से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?’’

‘‘पत्नी के जो अधिकार होते हैं..... पति की सेवा करना, उससे मातृत्व पाना और यह अपेक्षा करना कि वह किसी दूसरी औरत के आगोश में न लुढ़क जाए।’’

‘‘इन अधिकारों की आशा करना तुम्हारे लिए व्यर्थ है। मैं एक इन्सान हूं, भगवान नहीं। मैं तुम्हें सहारा दे सकता हूं, इसके सिवा कुछ नहीं।’’ उसने दृढ़ता से कहा और करवट बदलकर आंख मूंद ली।

पत्नी ने दरारों को पाटने की एक कमजोर कोशिश की थी। लेकिन उसके एक धक्के से दरार और चौड़ी हो गई थी। अब और कोशिश करनी बेकार थी।

वह दोनों अदालत जाने के झमेले में नहीं पड़े। आपसी समझौते के तहत दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। पत्नी अपनी मां के घर चली गई थी। इतना सब होने के बाद उसके लिए शादी करना एक मूर्खता होगी। अतः उसने तय किया कि अकेला रहना ही उसके लिए बेहतर होगा।

आज पत्नी से अलग होने के बाद जब वह दिनेश की बातों पर गौर करता है तो उसे उसकी बातों की सच्चाई का एहसास होता है। स्त्रियां सचमुच दोहरा चरित्र जीती हैं। पुरुष भी कितने मूर्ख होते हैं जो उसके चरित्र की गहराई तक नहीं पहुंच पाते हैं।

पत्नी से अलग हुए कई महीने हो चुके थे। अब तो न उसे घर पहुंचने की जल्दी होती थी, न ही इस बात की चिन्ता कि घर में आवश्यक वस्तुओं की कमी हो गई है। उनका प्रबंध करना है। घर वह केवल सोने के लिए जाता था। खाना वह होटल में खा लेता था।

तो दिन ऐसे ही गुजर रहे थे कि एक दिन अचानक फिर दिनेश से बस में मुलाकात हो गई। उसने दिनेश को धन्यवाद देते हुए कहा, ‘‘भई, मैं तो तुम्हारी बातों का कायल हो गया हूं। सचमुच स्त्रियों के चरित्र का तुमने गहरा अध्ययन किया है।’’ फिर उसने विस्तार से अपनी कहानी दिनेश को सुनाई।

कहानी सुनकर दिनेश हंसा, ‘‘तुम पहले व्यक्ति हो, जिसने मेरी बातों को इतनी गहराई से महसूस किया है और उन्हें अपने जीवन में अमल करके भी दिखा दिया। लेकिन शायद तुम्हें यह सुनकर भी आश्चर्य हो कि मैंने शादी कर ली है।’’

उसे सचमुच आश्चर्य हुआ, ‘‘अच्छा... तब तो जरूर तुम्हें कोई ऐसी लड़की मिल गयी होगी, जिसने अपनी पिछली जिन्दगी की सारी अच्छाइयां-बुराइयां सच-सच तुमसे बता दी होंगी।’’

‘‘उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। हम दोनों काफी पहले एक दूसरे को प्यार करते थे। वह मेरे पड़ोस में रहती थी, परन्तु तब सामाजिक रीति-रिवाजों ने हमें एक होने नहीं दिया था। फलतः उसकी शादी एक दूसरे व्यक्ति से हो गई थी। लेकिन कुछ महीनों पूर्व पति-पत्नी में किसी कारणवश तलाक हो गया तो मैंने उससे शादी कर ली।’’

‘‘अच्छा, यह तो बहुत अच्छी बात है। परन्तु क्या तुमने उससे उसके पहले पति के बारे में नहीं पूछा ?

‘‘यह पूछकर अपने दिल को क्यों जलाएं ? जो उसका अतीत है, वह मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता, तो उसको जानकर मुझे क्या करना ?’’ दिनेश ने बताया।

वह सोच में पड़ गया। पत्नी के अतीत के बारे में पूछकर उसने कोई गल्ती तो नहीं की थी ? वह कुछ समझ नहीं पाया। थके मन से बोला, ‘‘अच्छा, तो क्या अपनी पत्नी से मुझे नहीं मिलवाओगे?’’

‘‘क्यों नहीं जरूर मिलवाऊंगा? आज ही चलो।’’

दिनेश के साथ जाते हुए वह सोच रहा था- क्या उसने कोई भूल की है। दिनेश की बातों में पड़कर उसने तो अपना दाम्पत्य-जीवन समाप्त कर लिया था। दूसरी तरफ दिनेश ने अपना घर बसा लिया। ऐसी औरत के साथ जो पहले से शादी-शुदा थी। तो क्या वह अपनी पत्नी के साथ नहीं निभा सकता था ? जरूर निभा सकता था। बशर्ते कि उसमें पत्नी की गलतियों को माफ कर सकने की शक्ति होती। गलतियां मनुष्य से ही होती हैं। और उन्हें माफ किया जा सकता है। उसने क्यों न माफ किया पत्नी की गलती को, जब उसने सच्चे मन से उसके सामने सब कुछ बयान कर दिया था।

सारे रास्ते वह गुमसुम रहा। दिनेश के घर पहुंचकर भी वह गुमसुम ही था। दिनेश ने घण्टी का बटन दबाया। अन्दर एक जल तरंग की सी आवाज उठी। उसका दिल पता नहीं क्यों असामान्य रूप से धड़कने लगा था। शायद कुछ अप्रत्याशित घटित होने वाला था।

किसी के कदमों की आहट दरवाजे की तरफ आती हुई प्रतीत हुई। फिर पी होल से किसी की एक आंख ने बाहर झांककर देखा। सिटकनी गिरने की आवाज आई और फिर एक झटके के साथ पूरा दरवाजा खुल गया। उसने दरवाजे का पल्ला पक्ड़कर खड़ी औरत को देखा और उसे लगा कि वह भरभराकर गिर पड़ेगा। उसने तुरन्त अपना हाथ दीवाल पर टिका दिया।

वह फटी-फटी आंखों से दरवाजे पर खड़ी अपनी पत्नी को घूरे जा रहा था। उसकी अपनी भूतपूर्व पत्नी... संज्ञाशून्य होते जा रहे अपने कानों में उसने दिनेश की आवाज सुनी-

‘‘मिलिए मेरी पत्नी प्रज्ञा से और प्रज्ञा यह है मेरे कॉलेज के दिनों के दोस्त......’’

(समाप्त)

--

(राकेश भ्रमर)

ई-15, प्रगति विहार हास्टल,

लोधी रोड, नई दिल्ली-110003

मोबाइल- 09968020930

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