सोमवार, 28 जनवरी 2013

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ और ग़ज़लें

इतिहास में

कतरा-कतरा खून बंद है

आजादी के इतिहास में

हमने इसे नहीं पाया

खेल-खेल में

ना जाने कितनी माँओं ने

अपने लाल खोये हैं !

आंचल को आंसुओं से

भिगोये हैं !

ना जाने कितनी पत्नियों ने

अपने सुहाग खोये हैं

चूड़ियों को तोड़-तोड़ ,कर

सिने पर जख्म खाए हैं

ना जाने कितने पिताओं ने

अपने जिगर खोये हैं !

अपनी सर जमीं के लिए

बलिदान सपूत किये हैं !

ना जाने कितनी बह्नों ने

न्योछावर भाई किये ,

अपने वतन के खातिर

तीर दिल पर सहे हैं !

फिर भी देश वासी

क्यों अपने ही देश को

लुट रहे हैं !

नेताओं के भेष में

विदेशी यहाँ घूम रहे हैं !

कतरा-कतरा खून बंद है

आजादी के इतिहास में

हमने नहीं पाया इसे

खेल-खेल में !

--

ग़ज़ल

इन चरागों में रौशनी कम क्यों आजकल

लो जला दो दिलजलों को चरागों में रौशनी कम है

 

ना लेला सा हुस्न ना केश का जिगर आलकल

लो जला दो के तक्तो-ताज को चरागों में रौशनी कम है

 

आज मुझ से कल तुम से मुहोब्बत क्यों है आजकल

आशिकों को जलने दो के चरागों में रौशनी कम है

 

क्यों नहीं जलने दे ते शमा को जमाना आजकल

जलने दो परवानों को के चरागों में रौशनी कम है

 

क्यों नहीं आते वो रुसवा करने को आजकल

लो आओ फिर से दगा देने के लिए के चरागों में रोशन कम है

 

अपने दर्द-ए-दिल की ना ,तू दवा कर मीनू

तुम जलाती रहो जिगर चरागों में रौशनी कम है

 

ग़ज़ल

मेरी तन्हाइयों पर तेरी नजर क्यों है साकी

यूँ शाम सहर मुझ को महफ़िल में ना बुला

 

पर सकूं जिन्दगी है मेरी माझी के बिना

मेरे सीने में मुहब्बत की प्यास न बढ़ा

 

उस की बेरुखी में भी एक नशा है साकी

मुझ को रहने दे बेहोश ना होश में ला

--

 

शेर

नहीं चाहिए शोहरत भरी जिन्दगी

मुझ को रहने दे बेनाम उसके शहर में

 

दूर रहकर क्या ख़ाक जिन्दगी होगी

उसके पहलू में तोड़ने में मजा है

4 blogger-facebook:

  1. मीनाक्षी जी मेरे समझ नहीं आरहा है कि आप विदुषी हैं या मैं नासमझ मेरे समझ से यह ग़ज़ल का कौनसा रूप है? नहीं पता !!! इससे पहले भी आपकी ग़ज़ल पढ़ीं कभी समझ ही नहीं आईं । आप कुछ अच्छे गजलकारों से इस्लाह करें और अपनी ग़ज़ल को जाँचे , परखें । ग़ज़ल क्या है ज़रा समझने का प्रयास करें । मेरी टिप्पणी का अन्यथा न लें , अभी आपको ग़ज़ल में न और ना का अंतर या उपयोग/प्रयोग करना भी नहीं आ रहा है !!! आश्चर्य है !!!
    मोहसिन ख़ान
    अलीबाग

    उत्तर देंहटाएं
  2. BHAWNAYEN ACHCHHI HAIN, PAR GAZALEN,GAZAL KI PARIBHASHA KE ANURUP NAHI HAI. ADHYAYAN JAROORI HAI.
    MUJHE KSHAMA KAREN.

    उत्तर देंहटाएं
  3. माफ कीजीएगा देवी जी! लगता है आपको अभी गजलेँ लिखना नहीँ आता!
    क्योँकि आपकी गजलोँ मेँ मुझे "काफिया" और मात्राओँ जैसी गलतियाँ दिखायी देती हुयी प्रतीत हो रही हैँ!
    अन्यथा न ले!
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. माफ कीजीएगा देवी जी! लगता है आपको अभी गजलेँ लिखना नहीँ आता!
    क्योँकि आपकी गजलोँ मेँ मुझे "काफिया" और मात्राओँ जैसी गलतियाँ दिखायी देती हुयी प्रतीत हो रही हैँ!
    अन्यथा न ले!
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------