मंगलवार, 29 जनवरी 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - जयपुर में साहित्य महोत्सव के बहाने से रचनाकारों से सवाल

जयपुर में साहित्य महोत्सव के बहाने से रचनाकारों से सवाल:

दिनांक 23 जनवरी, 2013 को राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर के डिग्गी पैलेस में राज्यपाल मार्गेट अल्वा और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साहित्य महोत्सव की शुरूआत की ।

उद्घाटन भाषण में राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रेखांकित किया। इसी के साथ इस बात पर भी जोर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा यह है कि उससे लोगों की भावनाओं को चोट न पहुँचे ।
राज्यपाल ने हाल ही में भारत, पाकिस्तान और अरब देशों में हुए प्रदर्शनों को रेखांकित किया। पूरी दुनिया में असहनशीलता और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती जा रही है। साहित्यकारों का कर्तव्य है कि इनके उन्मूलन के लिए प्रयास करें।
23 जनवरी,2013 से लेकर 28 जनवरी,2013 तक पांच दिनों तक चलने वाले महोत्सव में अनुमान था कि महोत्सव के 174 सत्रों में करीब 280 से अधिक साहित्यकार,लेखक,अदाकार, स्क्रिप्ट राइटर,सोशल एक्टिविस्ट और विभिन्न विधाओं के महारथी भागीदारी करेंगे तथा विचार विमर्श करेंगे।

दुनिया की प्रतिष्ठित महिला पत्रकार टीना ब्राउन ने भारत में होने वाले इस साहित्यिक मेले को दुनिया का सबसे महान साहित्यिक जमावड़ा बतलाया।

इस मेले में देश और दुनिया के तमाम नए-पुराने लेखक हिस्सा लेते हैं। लोगो को मौक़ा मिलता है कि वे अपनी पसंदीदा किताबों के बारे में जान सकें तथा अपने पसंदीदा लेखक से रूबरू हो सकें। लेखक भी अपने पाठकों की प्रतिक्रिया से आत्मसात कर पाते हैं।

इन साहित्यिक महोत्सवों के आयोजन का इतिहास महज़ 6 साल पुराना है। साहित्यिक महोत्सवों के आयोजन की प्रासंकिगता साहित्यिक मुद्दों पर मंथन होना है। मगर यह त्रासदी है कि इन आयोजनों में विवादों की ही चर्चा अखबारों की सुर्खियाँ बनती रही हैं। पिछले साल मेले में सलमान रुश्दी के मेले में हिस्सा लेने के लिए भारत आना ही विवादों का मुख्य विषय रहा । हम सब जानते हैं कि रुश्दी अपने विवादित उपन्यास ‘सेटेनिक वर्सेस’ के कारण पिछले कई सालों से देश से बाहर ही रह रहे हैं।

इस साल भी किताबों के इस मेले में समाजशास्‍त्री आशीष नंदी ने अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा रेखा का अतिक्रमण किया तथा यह विवादित एवं अमर्यादित टिप्‍पणी की कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदायों के लोग ‘सबसे भ्रष्ट’ होते हैं। नंदी ने यह बयान देकर साहित्य के दायित्व की घोर अवहेलना की। इस प्रकार के बयान गतिशील जीवन मूल्यों को अवरोधित एवं निरोधित करते हैं। इसी कारण अमान्य, अस्वीकार्य, त्याज्य एवं निंदनीय हैं। मैं भी भर्त्सना करता हूँ। किसी भी संवेदनशील साहित्यकार को न तो सनसनीखेज़, आवेशकारी, उन्मादकारी, उत्तेजक एवं भड़काऊ खबरों का संवाददाता होना चाहिए और न ऐसी टिप्पणी करनी चाहिए जिससे समाज की समरसता, समता, गतिशीलता के जीवन मूल्य खंडित हों।

जो रचनाकार यथार्थ के निरुपण के नाम पर समाज में अवसाद, घुटन, निराशा, संत्रास आदि को फैलाने का काम करते हैं, उन्हें आत्म चिंतन करना चाहिए। कभी कभी यह भ्रम फैलाने की कोशिश होती हैं कि हमारे समाज में चारों ओर अँधेरा व्याप्त है, पतन की पराकाष्ठा है, मूल्यों का विघटन हो रहा है, जीवन मूल्यों का क्षरण हो चुका है और इन कारणों से हमें अधिकार है कि हम अपने सामयिक समाज की सही सही तस्वीर पेश करें। मैं इस समय विस्तार में नहीं जाना चाहता। रचनाकारों के सोचने के लिए केवल एक सवाल खड़ा करना चाहता हूँ, एक प्रश्न उपस्थित करना चाहता हूँ।

टूटे दर्पण में देखने पर हमें अपना चेहरा खंडित नजर आता है। इसी कारण क्या हमें अपने चेहरे को खंडित कर लेना चाहिए अथवा उस टूटे दर्पण को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

कोई भी गतिशील एवं मानवीय मूल्यों को प्रस्थापित करने वाला साहित्य आस्था एवं विश्वास के बिना न तो लिखा जा सकता है, न पढ़ा जा सकता है। साहित्य को संवेगों एवं संवेदनओं की अवनति का कारक नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत उसे उनके परिष्कार एवं उन्नयन का कारक होना चाहिए।

- प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203 001

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  1. साहित्य को संवेगों एवं संवेदनओं की अवनति का कारक नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत उसे उनके परिष्कार एवं उन्नयन का कारक होना चाहिए।

    जो रचनाकार यथार्थ के निरुपण के नाम पर समाज में अवसाद, घुटन, निराशा, संत्रास आदि को फैलाने का काम करते हैं, उन्हें
    आत्म चिंतन करना चाहिए।
    टूटे दर्पण में देखने पर हमें अपना चेहरा खंडित नजर आता है। इसी कारण क्या हमें अपने चेहरे को खंडित कर लेना चाहिए अथवा उस टूटे दर्पण को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

    --------------सत्य कथन ...तभी तो साहित्य समाधान परक होगा अन्यथा उसका मूल्य ही क्या है...

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