गुरुवार, 24 जनवरी 2013

आर.वी. सिंह का आलेख - महिलाओं के लिए उचित संबोधन

शब्द-चर्चा

महिलाओं के लिए उचित संबोधन

डॉ. आर.वी. सिंह

24 जनवरी 2013 के टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय पृष्ठ पर बच्ची करकारिया का एक लेख छपा है, जिसमें महिलाओं को मैडम, मैम, बेन, और सर आदि संबोधनों से संबोधित किए जाने का उल्लेख है (मुंबई-मराठी- मध्यप्रदेशीय हिंदी के कुछ और संबोधन भी हैं, जिनका लखनऊ में भदेस अर्थ होने के कारण यहाँ उल्लेख नहीं किया जा रहा)। साथ ही, यह सूचना भी कि गुजरात काडर की एक आईपीएस अधिकारी ने किसी कार्यक्रम में लोगों से कहा कि वे उनको मैडम या बेन न बुलाएँ बल्कि सर कहें।

हमें तो यही समझ नहीं आता कि महिलाएँ चाहती क्या हैं। महिलाओं को ही नहीं, हमें (गोकि हम पुरुष हैं और दिखते भी हैं) भी लगता है कि हमारा पूरा तंत्र पुरुष-प्रधान है। सदियों से हम महिलाओं को अपने अधीन रखते आए हैं और उनके महिला होने का नाजायज फायदा उठाते चले आ रहे हैं। सरकारी पत्राचार हो या सामान्य सामाजिक व्यवहार, हर जगह महिलाओं की उपेक्षा की जाती है और पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है। विभागीय परिपत्रों में संबोधन करना हो तो हम सर लिखते हैं। कर्मचारी, अधिकारी, स्टाफ सभी शब्द पुल्लिंगी हैं। यदि इनका स्त्रीवाची बनाना हो तो इनसे पहले ‘महिला’ शब्द लिखना पड़ता है, जैसे महिला कर्मचारी, महिला अधिकारी, महिला स्टाफ, महिला कॉन्स्टेबल आदि। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि हमारी सारी व्यवस्था पुरुष-प्रधान है।

हम अक्सर जेंडर सेंसिटिविटी की बात करते हैं, जो बिलकुल उचित है। हम जेंटर न्यूट्रल होने की बात करते हैं। यह और भी उचित है। लेकिन हर उचित कार्य हम करें, यह कोई जरूरी नहीं। पुलिस आदि विभागों में हमने प्रायः देखा है कि अपनी महिला अधिकारी को संबोधित करते समय अधीनस्थ कर्मचारी सर शब्द का इस्तेमाल करते हैं। विभाग से बाहर के व्यक्तियों को यह अटपटा लग सकता है, किन्तु विभागीय कर्मचारी इस परिपाटी को अपना चुके हैं और पूरी तरह उसके अभ्यस्त हो चुके हैं।

गहराई से सोचने पर हमें इस संबोधन में एक विसंगति नज़र आती है। यदि हमें समाज में पुरुष की प्रधानता और महिलाओं को पुरुष की अधीनता नहीं चाहिए, तो क्या यह उचित नहीं होगा कि वे सर जैसे पुरुषवाची संबोधन से भी बचें? यदि कोई महिला खुद को सर कहलवाना चाहे, तो इसका सीधा-सा आशय क्या यह नहीं हुआ कि उसे खुद को पुरुषों की भांति संबोधित कराना अच्छा लगता है, सम्मानजनक लगता है। क्या इसका आशय यह भी नहीं हुआ कि उसे महिला होकर महिला कहलाने में गुरेज है और पुरुष न होकर भी पुरुषों जैसा व्यवहार पाने की तमन्ना है। यदि ऐसा है तो उस नारी स्वाभिमान का क्या होगा, जो महिलावादी आंदोलनों का सर्वस्व है।

इसका आशय तो यही हुआ कि महिला को महिला होने पर शर्म आती है। वह इसी वजह से हीन भावना की शिकार है और कहीं न कहीं उसके मन में यह टीस है कि हाय, मैं पुरुष क्यों न हुई! यदि महिलाओं को पुरुष होना और पुरुषों की भांति संबोधित किया जाना इतना स्पृहणीय लगता है, तो क्या समाज में पुरुषों के लिए अलग मानदंडों का होना अनुचित है? तो क्या बच्ची की तुलना में बच्चे के जन्म की आकांक्षा करना अनुचित है? निजी तौर पर मेरा मानना है कि है यह अनुचित। लेकिन फिर महिला होकर भी पुरुष संबोधन की आकांक्षा करना भी तो अनुचित है।

अपने लेख के अंत में बच्ची करकारिया ने अपने खास अंदाज में लिखा है कि उन्हें आंटी पुकारा जाना पसंद नहीं। यही सच भी है। आंटी संबोधन सुनते ही महिलाएं रुष्ट हो जाती हैं, क्योंकि आंटी शब्द उनके वयोवृद्ध घोषित किए जाने का द्योतक है और दुनिया की बहुत कम संभ्रांत महिलाएँ इसका तसव्वुर भी करना पसंद करेंगी।

महिलाओं के मान-सम्मान का जिक्र आने पर हम अकसर अपनी महान परंपराओं की बात करते हैं। हमारे ऐतिहासिक उपन्यासों, नाटकों आदि में महिलाओं के लिए कौन-कौन से संबोधन प्रचलित थे? क्या हमने कभी उस ओर झाँकने की कोशिश की है?

आर्ये, भद्रे, हे देवि आदि वे संबोधन हैं जो हमारे साहित्य में महिलाओं के लिए परंपरा से प्रयुक्त होते आए हैं। तो ऐसी क्या आफत है कि हम अंग्रेजी के पुरुषवाची संबोधन सर का ही इस्तेमाल महिला अधिकारियों के लिए करें? माना कि मैडम संबोधन महिलाओं के लिए कुछ खास अच्छा नहीं है, बल्कि कुछ हद तक आपत्तिजन है, क्योंकि उसका संधि-विच्छेद होता है- मा + डेम- यानी मेरी महिला, और गँवई-गाँव की भाषा में कहें तो मेरी स्त्री। इस संदर्भ में नर्सरी की राइम याद आती है- बाबा-बाबा ब्लैक शीप हैव यू ऐनी वूल। येस सर-येस सर, थ्री बैग्स फुल। वन फॉर द मास्टर एंड वन फॉर हिज डेम। एन्ड वन फॉर द लिट्ल बॉय, हू लिव्स डाउन द लेन। मास्टर की डेम यानी उसकी स्त्री और मा डेम यानी मेरी स्त्री। किसी भली महिला (और खास तौर से ऐसी महिला, जो ऊँचे सरकारी ओहदे पर हो) को हर कोई मेरी स्त्री, मेरी स्त्री कहे, यह उसे या किसी को भी, क्योंकर अच्छा लगेगा?

इसलिए हमें बहुत पहले मैडम (madame) शब्द को अपने सार्वजनिक जीवन से निकाल बाहर फेंकना चाहिए था। लेकिन फिर उसके स्थान पर कौन-सा शब्द लाया जाए? सर? शायद नहीं। शायद क्यों? बिलकुल नहीं। गुजरात की उस आदरणीया आईपीएस अधिकारी से पूछा जाना चाहिए कि वह मैडम, सर अथवा बेन (बहनजी) के अलावा क्या कहलाना पसंद करेंगी? आर्ये, भद्रे, महोदया, साहिबा, कुमारीजी, श्रीमतीजी, अधिकारीजी, देवीजी, कालीजी, दुर्गाजी, सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, महारानीजी, अथवा और क्या? और जो भी संबोधन चुना जाए उसे पूरे देश में विज्ञापित किया जाए, ताकि हम महिलाओं के लिए मैडम जैसे लानत भरे संबोधन और सर जैसे पुरुषवाची संबोधन से इतर कोई और सम्मान-पूर्ण संबोधन अपना सकें।

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रामवृक्ष सिंह

ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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