मंगलवार, 15 जनवरी 2013

प्रेम मंगल की लघुकथा - फिर वही इंतजार․․

फिर वही इंतजार․․

बादलों की गड़गड़ाहट,घोर अंधकार,तूफानी इंझावतों के बीच में फंसी हुई करिश्‍मा एक पत्‍थर की मूर्ति बनी खड़ी है उसका शायद सब खून किसी ने चूस लिया था, रंग पीला पड़ गया था, नेत्र खुले के खुले थे।

एक समूह इस झंझावत को लांघता हुआ आया और उसकी और आगे बढ़ा, और पकड़कर पूछा तुम्‍हें क्‍या हुआ है क्‍यों परेशान हो चलो तुम्‍हें कहां जाना है।

परंतु करिश्‍मा अवाक्‌ मुंह फाडे़ खड़ी थी। पर समूह कुछ मानवों का था इसीलिये उन्‍होंने उसे जर्बदस्‍ती उठाया अस्‍पताल में भर्ती कराया, गुमशुदा की तलाश में नाम दर्ज कराया ताकि उसका कुछ पता चल सके।

चंद दिनों के बाद बहुत रोता बिलखता कुमुद आया उसने करिश्‍मा को देखा, करिश्‍मा उससे लिपटकर चीख चीखकर रोने लगी। कुमुद ने बड़े़ रुधित कंठ से कहा तुम कहां चली गई थीं एक तो मुझे मुकुल छोड़ कर चला गया फिर तुम․․। इतना सुनते ही करिश्‍मा फिर अवाक्‌ हो गई और अचेतावस्‍था मे चली गई। चिकित्सकों के अथक प्रयास करने पर भी करिश्‍मा की अचेतावस्‍था समाप्‍त नहीं हुई डॉक्‍टर्स ने कुमुद से पूछा कि मुकुल कौन है क्‍या हुआ? मुकुल ने चीखते चिल्‍लाते हुए कहा मुकुल मेरा इकलौता बेटा है मैंने उसे देशसेवा हेतु आर्मी में भर्ती किया था।

मुकुल छः सालों से देश की पूर्ण निष्ठा से सच्‍चे देशसेवक की भांति सेवा कर रहा था परंतु एक माह पहले सूचना मिली कि बार्डर से घुसकर विदेशी उसका वध कर गये है। यहां तक कि उसका मृत शरीर भी ले गये है।

पूरे देश में हड़बड़ मच गई। करिश्‍मा को सूचना मिलते ही वह अवाक हो गई और उस समय से अभी तक स्‍तब्‍ध है। यकायक एक रात देखा कि करिश्‍मा अपने बिस्‍तर पर नहीं है वह दिनरात यही चिल्‍लाती थी कि मुझे मेरा मुकुल चाहिये, मुकुल को खोजकर लाओ उसी मुकुल की खोज में करिश्‍मा आज तक अचेतावस्‍था में है। करिश्‍मा ही नहीं इस धरा की कितनी मातायें ऐसे ही अपने कई लाल खो चुकी है। जिनके दिल के दर्द को समझाना आसान नहीं है।

मां एक है सपूत अनेक हैं।

भगवान एक है अल्‍लाह एक है।

मसीहा एक है, गुरु एक हैं।

फिर क्‍यों फैला इतना गम है।

लहू की नदियां क्‍यों बहती है।

कलेजा क्‍यों चीरा जाता मां बहन का है।

क्‍यों यह अनाचार होता है

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Smt.Prem Mangal
O/SUPDT.Swami Vivekanand
College Of
Institutions Indore

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