शनिवार, 19 जनवरी 2013

गरिमा जोशी पंत की कविता - तू और मैं

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तू और मैं

कल हम दोनों की रात
कट गई आंखों में
रात भर जागते रहे
तू और मैं।

दोनों जलते दीए के पास
बैठे थे
अपनी हथेली को उसकी लौ पर रख
तू और मैं।

मैंने रात भर काजल सेंता
अपनी हथेली पर और तूने भी
दोनों लगे थे
तू और मैं।

मैंने काजल बनाया तेरी नज़र उतारने को
तूने मेरे चेहरे पर कालिख पोतने
दोनों सउद्देश्य थे
तू और मैं।

हम लाख छुपाएं
पारखी समझ गए
हममें हव्वा कौन
मैं या तू
हममें आदम कौन
तू या मैं।

                  गरिमा जोशी पंत

3 blogger-facebook:

  1. garima joshi ji ki kavita too or mai achchi hai ,par unhe desh kaal or samaj par bhi kavitaye likhna chahiye

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी कविता निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें। आप द्वारा सहमति प्राप्त होने पर आपकी कविता निर्झर टाइम्स साप्ताहिक के 28 जनवरी के अंक में प्रकाशित की जाएगी। इस प्रकाशन के लिए कोई पारिश्रमिक देय नहीं होगा।
    सादर!

    उत्तर देंहटाएं

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