मुरसलीन साकी की ग़ज़ल - है सफर जिन्‍दगानी का शायद यही

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मुरसलीन साकी

है सफर जिन्‍दगानी का शायद यही

गम उठाते रहो मुस्‍कुराते रहो

 

तेज तूफाँ भी आये तो कुछ गम नहीं

तुम चरागों को फिर भी जलाते रहो।

 

सामने हो गमों का समन्‍दर तो क्‍या

कश्‍तियाँ तुम खुशी की चलाते रहो।

 

चाहते हो मुअज्‍जिज जमाने हो।

नजरे शैताँ से खुद को बचाते रहो।

 

मुश्‍किलों से भरा ही हो क्‍यों न सफर

साकी फिर भी कदम तुम बढ़ाते रहो।

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मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

पिनः- 262701

मो0ः- 9044663196

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2 टिप्पणियाँ "मुरसलीन साकी की ग़ज़ल - है सफर जिन्‍दगानी का शायद यही"

  1. तेज तूफाँ भी आये तो कुछ गम नहीं
    तुम चरागों को फिर भी जलाते रहो।
    सतत प्रयत्नशील रहने की सीख,वाह !


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