सोमवार, 28 जनवरी 2013

कविता "किरण" का आलेख - औरतनामा

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औरतनामा---

-डॉ. कविता "किरण"

         मैं! हां! मैं! एक हादसे की तरह इस दुनिया में आई! जिंदगी को जिसे अनचाहे झेलना पडा। मेरा स्वागत मुस्कुराहट ने नहीं, मातम ने किया। आँख खोलते ही दर्द की सांवली परछाइयों ने मुझे अपने वजूद में समेट लिया और शुरू हो गया चिंता से चिता तक का कांटों भरा सफर।

जिंदगी बहुत वाहियात चीज रही है मेरे लिए। इसे जीने में कभी सुकून महसूस नहीं हुआ। मैं तन्हाइयों के किले में कैद थी। आज भी हूं और मेरी दुनिया इसी किले की चहारदीवारी में सिमटकर रह गई। मेरे खयालों ने, मेरे जज्बातों ने कभी इन दीवारों को तोडने की, इनसे बाहर आने की कोशिश भी नहीं की।

हां! वक्त और उम्र के साथ कुछ ख्वाब जरूर आते-जाते मेरी आँखों के रोशनदान में चुप-से झांक गये और मेरे भीतर किसी दूसरे का अनजाना, अनपहचाना-सा वजूद छोड़ गये।

मैं उन डूबती हुई शामों का आईना रही हूं, जिसमें आसमान पर एक सुनहरी सुबह की तरह उगने की ललक है, लेकिन अफसोस ! वो शाम कभी उस सुबह का नाम अपने होठों पर नहीं ला सकी।

मैं उन अंधेरी काली रातों की अनजान राहों की मुसाफिर हूं, जो सिर्फ गमजदा लोगों लिए बनी है, जिनका आगाज तो है, पर अंत नहीं।

वक्त ने मेरे माथे पर बस एक ही लफ्ज लिखा है - ‘आँसू’।

दो बोल उम्मीदों के, प्यार के, हौसलों के किसी ने मेरे आँचल में नहीं डाले।

जन्दगी में कहने को बहुत-से अपने हैं। मगर कोई अपना नहीं। रिश्ते रिसते घावों की तरह तकलीफदेह हैं। बस एक दर्द, एक तन्हाई है। और है एक बेमौत मरती-सी जिंदगी, जो मेरी साँसों के साथ- साथ अपना सफर तय कर रही है। अनचाहे। अनबोले।

सच ! औरत होना कितना बड़ा गुनाह है।

बहुत चाहा। तकदीर कभी कहीं कोई ऐसा पल मुझे दे, जो मेरे अस्तित्व को रेखांकित करे। मेरी ‘मैं’ को गौरवशाली बनाये। जिसमें मैं अपने आत्मसम्मान की परिभाषा लिख सकूं। जिसमें मुझे अपने औरत होने पर शर्मिन्दगी महसूस न हो।

लेकिन, दुनिया का इतना बड़ा दिल कहां जो मुझे मेरी खुदी, मेरी ‘मैं’ मुझे तोहफे में दे। पता नहीं, मैंने तकदीर से इतनी उम्मीदें क्यों बांध ली। यह जानते हुए भी कि जिंदगी के हाथ बहुत छोटे हैं और इच्छाओं का आँचल बहुत बडा।

आदमी को सपने कभी नहीं देखने चाहिए, क्योंकि सपने कभी पूरे नहीं होते। वो तो टूटने के लिए ही बने हैं। और जब वो टूटते हैं तो उनकी आवाज बेशक सुनाई नहीं देती, लेकिन टूटे हुए सपनों की किरचें जो घाव दिल पर बनाती हैं, उसे वक्त का मरहम भी कभी नहीं भर पाता।

फिर भी मैं इंतजारती रही, उस आहट को जो मेरे मन के खालीपन को भर दे। मेरी उदासियों को नोंचकर कहीं दूर फेंक दे और खुशियों के लिबास से मेरे आज को, मेरे वर्तमान को सजा दे। मेरा होना जिसे अच्छा लगे। मेरी मौजूदगी जिसे सुकून दे। मेरे अस्तित्व की खुशबू का जो कायल हो।

मैं राह तकती रही उस वक्त की, जिसके कदम खुशकिस्मती बनकर मेरी उम्मीद की दहलीज पर कदम रखे और जो प्यार, खुशी, चैन और सुकून का पूरा परिवार अपने साथ लेकर आए।

फिर एक दिन जंदगी के सफर में चलते- चलते अचानक एक साया मेरे सामने आकर खडा हो गया। हँसी-खुशी से लबरेज। बेफिक्री और जिंदादिली की तस्वीर। पता नहीं क्यूं उसने सफर में मेरे साथ-साथ चलने की इजाजत मांगी। मेरी आँखों के सपनों पर अपना हक मांगा। मेरी जन्दगी में अपनी एक खास जगह मांगी और मेरे ख्यालों में अपनी दुनिया बसानी चाही।

मगर मैं ? मैंने तो कभी अपने आने वाले कल को सोचा ही नहीं था। हमेशा अपने आप में ही इतनी मशगूल रही कि कभी अपने रास्ते के आस-पास खडे पेडों तक को नहीं देख पाई। नजर सीमाओं में बंधी हुई थी। ख्यालों की भी अपनी एक हद थी और सपनों का तो कोई वजूद ही नहीं था।

फिर एकाएक ये कौन सा हिमालय बिना निमंत्र्ण के मेरे सामने आकर खडा हो गया। मैंने घबराकर, बचकर निकल जाना चाहा। पर उसने बांहें फैलाकर मेरा रास्ता रोक लिया।

मैं गम थी। दर्द के अनंत सफर की राहगीर। जानती थी खुशी और गम दो अलग-अलग अहसास हैं जो कभी इकट्ठे नहीं रह सकते।

मेरी उदास आँखों के इंकार ने उस हिमशिखर को गलते देखा। खण्ड-खण्ड पिघलते देखा। टुकडे-टुकडे होते, घुटनों पर झुकते देखा। मैं हैरान थी। ये सब क्या मेरे लिए ! एक सहमी-सी तसल्ली अपने भीतर महसूस हुई। यह देखकर कि कोई है, जिसके लिए मैं खास हूं। जो औरत की अहमियत को समझता है। उसकी कद्र करता है, उसकी इज्जत करता है। कोई तो है जिसकी जरूरत सिर्फ मैं हूं। जिसकी मोहब्बत सिर्फ मैं हूं। मेरा इंकार कमजोर पड गया।

उसने मेरी मरजी, मेरी इजाजत की परवाह किये बगैर मेरा हाथ थामा और दूर क्षितिज की तरफ उंगली उठाकर इशारा किया जहां धरती और आकाश आपस में गले मिल रहे थे। मन में आशा की एक किरण जगा दी उसने। सपनों की झीलों में हसरतों के गुलाब खिला दिये। पानी की खामोश सतह पर मानो उसने एक कंकड उछाल दिया और गहराई तक हलचल भर दी।

और फिर मैं सारी दुनिया को छोडकर, सारे असमंजस और अंतर्द्वन्द्वों से मुंह मोडकर, आँखें बंद किये अपना हाथ उसके हाथों म सौंपकर बेफिक्र-सी बढ गई, उस ओर, जिधर भी वो ले गया। लगा वो क्षितिज ही मेरी मंजल है। मानो मेरे ‘स्व’ का संरक्षक मुझे मिल गया। मैंने ऊपर वाले की दुनिया में अपनी एक अलग ही सपनों की दुनिया बसा ली। अरमानों को पंख लग गये। इच्छाओं को आकार मिल गया। कल्पनाएं साकार लगने लगीं। मुझे जिंदगी से प्यार हो गया। वर्तमान सुनहरे भविष्य के ताने-बाने बुनने लगा। इस बात से बेखबर कि ऊपरवाले ने आफ लिए वो नहीं सोचा होता जो आप अपने लिए चाहते हो।

और एक दिन उस हकीकत से सामना हुआ कि क्षितिज जो महज एक भ्रम है। जमीन और आसमान कभी एक नहीं होते। एक होने का भ्रम होता है। क्षितिज कायम है। भ्रम कायम है। मैं हूं। और बौना होता जाता हिमालय भी।

मैं जर्रे को आफताब समझ बैठी थी। दर्द, चैन का लिबास पहनकर आया था, सो धोखा खा गई। जिसे खास समझा, वो बहुत आम निकला। आदमी कभी औरत को आदर नहीं दे सकता। चाहे वो किसी भी रिश्ते की शक्ल में हो। औरत का कद उसके बराबर हो वो ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। पुरुष के लिए नारी सिर्फ सामान है, इंसान नहीं।

चेहरे ने फिर खामोशी ओढ ली। सब्र ने होंठ सी दिये। पर सीने में एक कोलाहल था। अंतहीन। एक ऐसा शोर, जिसका न ओर था न छोर।

कई बार उस रचयिता से सवाल करती हूं। औरत को बनाया ही क्यूं गया ? क्या अपमान और तिरस्कार को परिभाषित करने के लिए ? या पुरुष की प्रभुता को सिद्ध करने के लिए ? या फिर उसके अहंकार को महिमामण्डित करने के लिए ?

लेकिन शून्य भला क्या उत्तर देता।

पुरुष का अहंकार कछुए की खाल की तरह कठोर होता है, जो कभी नहीं टूटता। टूटना चाहता ही नहीं। और नारी का स्वाभिमान, उसका अंतस्, उसका अस्तित्व एक कच्ची कोंपल की तरह, जो गर्म हवा के स्पर्श से ही झुलस जाता है।

मैं औरत हूं। मेरा फर्ज है अपने आप को औरों के सांचे म ढालना। मुझे अपने बारे में सोचने का कोई हक नहीं। अपना आसमान तलाशने की बिल्कुल इजाजत नहीं। यही अहसास दुनिया में पहला कदम रखते ही समाज ने मेरी साँसों में घोल दिया। मेरी आँखों से न जाने कितने आँसुओं के सैलाब बहे। जिन्हें समय की रेत अनवरत सोखती चली गई। किसी को कुछ फर्क नहीं पडता। अपनी अस्मिता की लडाई में औरत अकेली है।

आज दुनिया कहती है, मैं आजाद हूं। औरत अब वस्तु नहीं है, व्यक्तित्व है। पर सच तो यह है कि इस आजादी की भी एक लक्ष्मण रेखा है जो पुरुषों के बनाए समाज ने खींची है। स्वतंत्र्ता मिली तो है, पर पराधीनता की परिधि में।

समझ नहीं आता।

कब तक मैं पुरू के अहंकार की कांटों भरी सलीब पर लटकायी जाऊंगी और अपने धैर्य की परीक्षा देती रहूंगी।

कब तक सहनशीलता के नाम पर छली जाऊंगी ?

कब तक सब्र की तरह आजमाई जाऊंगी ?

आखिर कब तक ?

थक गई हूं एक अंधा सफर तय करते। अपने भीतर के अंधेरों से लड़ते। किश्तों में मरते और हालातों से समझौता करते।

हर रोज अपने मन के सागर में डूबते उतराते सूरज को देखते रहना अब अच्छा लगता है। आदत बन चुका है। अच्छा लगता है, अब अपने भीतर उगते सांझ सवेरों से मुलाकात करना, मौन से बतियाना, रोज खुद में जीना और खुद ही में मर जाना भी। तन्हाइयां जिंदगी की जरूरत बन गई हैं। ये सब अब न हो तो अचंभा लगता है। एक अथाह खालीपन का रेगिस्तान-सा मुझमें समा गया है। मुझे पीता-सा। मुझे जीता-सा।

मैं औरत हूं। सोच रही हूं। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, चेहरे और मौसम भी। क्या कभी मेरा भाग्य भी बदलेगा ?

                    ++++++++++++++++++++++++++++++++

डॉ. कविता "किरण"

24 blogger-facebook:

  1. Very Nice Lines. I have seen a feelings of females.

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  2. Ek aurat ki aapbiti/anubhuti ki marmi peshkash hai,yeh rachana!DHANYAVAD.

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    1. ji aabhar..apne padha..aur samjha istri mann ko..:))

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    2. अल्फाज दिल का आइना होते हैं
      सच है मगर ????
      पुरुष क्या हमेशा कांटे ही बोते हैं ?
      कभी उनकी भी सुनो कहानी
      कई बार वे भी गम का हलाहल पी
      खुद की खुदी ही खोते हैं |
      केवल रचना की द्रष्टि से देखें तो शानदार
      किन्तु यथार्थ के धरातल पर अतिशयोक्ति
      :):):) आज का दिन मंगलमय हो |

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  3. Ek aurat ki aapbiti/anubhuti ki marmi peshkash hai,yeh rachana!DHANYAVAD.

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  4. Ek aurat ki aapbiti/anubhuti ki marmi peshkash hai,yeh rachana!DHANYAVAD.

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  5. bahut hi khoobsurat lekh ek aurta ke man ko bkhobi lafzon mein dhala hai ..bahut hi samvedna ke sath likha gaya ye khoobsurat lekh man ko chu gaya kavita ji

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    1. bahut bahut shukriya Siya ji...ek koshish thi aurat ke mann ko ek aurat ki tarah padhne aur vyakt karne ki..jo kamyaab huyi...shukriya..:))

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    2. bahut bahut shukriya Siya hi..ek koshish thi aurat ke man ko padhne aur abhivyakt karne ki...jo kamyaab huyi..shukriya..:)

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  6. अदभुत, नारी मन की व्यथा को इतनी गहराई में जाकर समझ पाना और अक्षरश: उसे शब्द रुपी मोतियों में पिरोकर संवारना निश्चित ही एक साहसिक और ह्रदय को छू लेने वाला कार्य है, बधाई

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    1. Dil se nikali baat dil tak pahunch gayi..mera prayaas sarthak ho gaya..dhanywad apki badhayi k liye...:)

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  7. अदभुत, नारी मन की व्यथा को इतनी गहराई में जाकर समझ पाना और अक्षरश: उसे शब्द रुपी मोतियों में पिरोकर संवारना निश्चित ही एक साहसिक और ह्रदय को छू लेने वाला कार्य है, बधाई

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  8. एक औरत के ह्रदय की अनकही को आपने अपने अलफ़ाज़ दे दिए ...मनो उस के अंदर छुपी पीड़ा को बह जाने का रास्ता मिल गया ....सच में कविता जी यह सब की कहानी है ...पर किसी से अपनी पीड़ा बाँटने में न जाने क्यूँ झिझक जाते हैं ....

    मैं औरत हूं। सोच रही हूं। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, चेहरे और मौसम भी। क्या कभी मेरा भाग्य भी बदलेगा ?

    उम्मीद को जगाने के साथ साथ बधाई !!!!

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    1. umeed par to duniya kaayam hai Neerja ji..zaroorat hai istri bechargi ke aavrann ko utarkar aatmvishwas ka dushalaa odhne ki...dhanywad..aabhar!!

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  9. soo touching kiran ji.......keep it up....

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  10. कविता जी आपके शब्दों जादू हैं । यह आलेख मैंने एक बार नही कईं बार पढा और हर बार ऐसा लगा की अभी मैं औरत के दर्द को समझ नही पया हूँ । ऐसा क्यों होता हैं पुरूष प्रधान समाज औरत के दर्द को नहीं समझ पता ।

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  11. एक बार फिर कविता जी के आलेख को पढना पढा जब भी रचनाकार पर कदम रखता हूँ तो कह आलेख मानों अपनी और खीच लेता हैं ।

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  12. yah is rachna ki safalta aur sarthakta hai savan ji jo apko yah itni pasand aa rahi hai..purushon ka man darasl itna bada nahi hota..apka punah aabhar is samaan k liye..kavita..

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  13. Manjar parmar9:58 am

    Bahut khubsurat likha hai ..lajawab

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  14. डॉ.हरीशंकर शास्त्री6:25 pm

    बहुत सुन्दर रचना गढ़़ी
    शब्दों के धागे में पिरोकर
    काव्य के उपवन के सुमन की लड़ी
    औरत की दर्द भरी हूक में तिरोकर
    मन के अंधियारे पाख की घडी़
    लोक के अलौकिक मधुमास सरोवर
    निर्झर झरते हुऐ झरने की झड़ी
    रचित नित नयी ऊँचाई मनोहर
    शास्त्री की 'किरन'कनक फुलझड़ी
    दिखती दिगंत दिक दामनी सी यशोधर

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